मंगलवार, 28 जुलाई 2026

हिंदी फ़िल्मों में रहस्यमयी नारियां

हिंदी फ़िल्में विविध विषयों पर बनती हैं जिनमें रहस्य भी एक है। साठ के दशक में ऐसी बहुत-सी फ़िल्में बनीं और उनके कथानक प्रायः ऐसे रहे जिनमें कोई रहस्यमयी नारी दिखाई गई। यह नारी प्रायः श्वेत वस्त्र धारण करती थी और कोई रहस्यभरा गीत गाती थी। नायक को उसके व्यक्तित्व तथा गाए गए गीत से भ्रमित होते हुए दिखाया जाता था। ऐसी फ़िल्में जब अच्छी पटकथा लेकर मनोरंजक ढंग से बनाई गईं एवं उनका गीत-संगीत भी श्रेष्ठ रहा तो दर्शकों द्वारा पसंद भी की गईं। आज ऐसी कई फ़िल्में क्लासिक मानी जाती हैं।

साधना की त्रयी: ऐसी रहस्यमय भूमिकाएं करने में साधना अग्रणी रहीं। पारम्परिक नायिका की छवि से हटकर ऐसी धूसर रंगों वाली भूमिकाएं करना अपने आप में ही एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। लेकिन साधना ने एक बार नहीं तीन-तीन बार ऐसी चुनौती को स्वीकार किया। तीनों ही फ़िल्मों के निर्देशक राज खोसला थे। ये फ़िल्में थीं -

१. वह कौन थी (१९६४): 'वह कौन थी' अपने नाम के अनुरूप ही एक रहस्यमय महिला की कहानी है। इस फ़िल्म का प्रारंभिक दृश्य ही ऐसा है जो दर्शकों को अपने सम्मोहन में जकड़ लेता है। इस दृश्य में बरसात की रात में सड़क पर कार चला रहे मनोज कुमार को श्वेत साड़ी धारण किए हुए साधना मार्ग के बीचोंबीच खड़ी दिखाई देती हैं। वे उन्हें कार में लिफ़्ट देते हैं तथा मार्ग में उनके बीच रहस्यभरा वार्तालाप होता है। साधना उन्हें एक कब्रिस्तान तक ले जाती हैं एवं उनके देखते-ही-देखते उसके भीतर चली जाती हैं। उसके उपरांत सम्पूर्ण फ़िल्म में साधना कई बार अलग-अलग रूपों में मनोज कुमार से मिलती हैं तथा उन्हें भ्रमित करती हैं। वास्तविकता का पता अंत में चलता है। फ़िल्म भी एवं साधना के भिन्न-भिन्न रूप भी दर्शकों को अंत तक बाँधे रखते हैं। अपने सुमधुर गीत-संगीत के साथ यह श्वेत-श्याम फ़िल्म एक अत्यन्त मनोरंजक फ़िल्म है तथा रहस्यमय नायिकाओं वाली फ़िल्मों की श्रेणी में अग्रणी है। लता मंगेशकर के गीत 'नैना बरसे रिमझिम रिमझिम' तथा 'लग जा गले' आज भी संगीत-प्रेमियों का दिल जीत लेते हैं। 

२. मेरा साया (१९६): 'मेरा साया' अपने समय की एक अत्यंत सफल एवं चर्चित फ़िल्म थी जिसमें मुख्य रहस्य साधना का व्यक्तित्व ही है। पुलिस द्वारा गिरफ़्तार की गईं साधना स्वयं को फ़िल्म के नायक सुनील दत्त की पत्नी बताती हैं लेकिन सुनील दत्त की पत्नी का देहांत हो चुका होने के कारण कोई उन पर विश्वास नहीं करता है। फ़िल्म में कोर्ट रूम ड्रामा भी है जो अत्यन्त मनोरंजक है। रहस्य यही है कि साधना सुनील दत्त की पत्नी हैं या नहीं। साधना ने इस फ़िल्म में कमाल का अभिनय किया है एवं सुनील दत्त के साथ उनकी जोड़ी ख़ूब जमी है। इस फ़िल्म का गीत-संगीत भी अत्यंत श्रेष्ठ है तथा आज तक इसके गाने संगीत-प्रेमियों द्वारा बड़े चाव से सुने जाते हैं। लता मंगेशकर का गाया हुआ शीर्षक गीत 'तू जहाँ जहाँ चलेगा' पूरी फ़िल्म में चलता रहता है तथा दर्शकों को रहस्य में डुबोए रखता है।

३. अनीता (१९६७): 'अनीता' संभवतः राज खोसला द्वारा 'वह कौन थी' के प्रभाव (हैंगओवर) में आकर बनाई गई थी। उन्हें लगा होगा कि जैसे दर्शकों ने 'वह कौन थी' को स्वीकार किया था, वैसे ही वे इसे भी स्वीकार कर लेंगे। उन्होंने नायक-नायिका 'वह कौन थी' वाले ही रखे (मनोज कुमार एवं साधना)। लेकिन वे कथानक पर बेहतर काम नहीं कर सके और कमज़ोर पटकथा के कारण ही यह फ़िल्म 'वह कौन थी' जैसी प्रभावशाली नहीं बन सकी। लेकिन केंद्रीय भूमिका में रहस्य के आवरण में लिपटी साधना की भूमिका फ़िल्म की जान रही। साधना ने अपने अभिनय से इस भूमिका को जीवंत बना दिया। इसी कारण तथा अच्छे गीत-संगीत के कारण यह फ़िल्म सफल भी रही। 

ये तीन फ़िल्में तो इस श्रेणी की फ़िल्मों में मील का पत्थर मानी ही जाती हैं, कई और फ़िल्में भी बनीं जिनमें एक रहस्यमयी नायिका फ़िल्म के केंद्र में रही। १९६६ में प्रदर्शित 'लाल बंगला' और 'मैं वही हूँ' जैसी फ़िल्में थीं तो ऐसी ही लेकिन वे कमज़ोर कहानी के कारण दर्शकों को प्रभावित नहीं कर सकीं और सफल नहीं रहीं। पर कुछ अच्छी फ़िल्में जो आज भी क्लासिक मानी जाती हैं, इस प्रकार हैं:

महल (१९९): 'महल' में रहस्यमयी नारी की केंद्रीय भूमिका मधुबाला ने निभाई है। वे श्वेत वस्त्र धारण करके 'आएगा आने वाला' गीत गाती हुई फ़िल्म के नायक अशोक कुमार को उलझाए रखती हैं। 'आएगा आने वाला' गीत ने तो सारे देश में धूम मचा दी थी। इसे लता मंगेशकर ने अपने द्वारा गाया गया सर्वश्रेष्ठ गीत माना था। यह गीत आज भी अत्यन्त लोकप्रिय है। कमाल अमरोही द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म एक क्लासिक रहस्य फ़िल्म मानी जाती है। 

बीस साल बाद (१९): 'बीस साल बाद' में रहस्यमय गीत 'कहीं दीप जले कहीं दिल' गाकर फ़िल्म के नायक  को अपनी ओर खींचने वाली स्त्री श्वेत वस्त्र तो धारण नहीं करती है लेकिन फ़िल्म में रहस्य बहुत उत्पन्न करती है। अब वह किस उद्देश्य से ऐसा कर रही है, यह फ़िल्म के अंत में ही पता चलता है। 

कोहरा (१९): 'कोहरा' की विशेषता यह है कि फ़िल्म की नायिका रहस्यमयी स्त्री नहीं है। नायिका तो स्वयं उस रहस्यमयी स्त्री के होने या न होने की बात को लेकर भ्रमित रहती है जो पहले नायक के जीवन में थी एवं अब मर चुकी है। वह स्त्री श्वेत वस्त्र धारण करती थी एवं ऐसा लगता है कि मरने के उपरांत भी उसकी आत्मा उसी घर में मौजूद है। फ़िल्म में उस स्त्री का चेहरा नहीं दिखाया गया है। मुझे भी एक लम्बे समय के उपरांत पता चला था कि वह भूमिका थेल्मा नामक एक अभिनेत्री ने निभाई थी। वह जो गीत गाती है, वह है 'झूम झूम ढलती रात'।

पूनम की रात (१९६५): 'पूनम की रात' में रहस्य यही है कि नायक मनोज कुमार को श्वेत वस्त्रों में रहस्य भरा गीत गाती हुई दिखाई देने वाली स्त्री वस्तुतः कौन है। लता मंगेशकर द्वारा गाया हुआ यह लोकप्रिय गीत है - 'साथी रे, तुझ बिन जिया उदास रे, यह कैसी अनबुझ प्यास रे, आ जा'। फ़िल्म में नर्सों की भी भूमिकाएं हैं जो वैसे भी श्वेत वस्त्रों में रहती हैं। फ़िल्म विशेष सफल नहीं रही थी लेकिन निर्देशक किशोर साहू ने कहानी को अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है। गाने वाली श्वेत वसना स्त्री एक (मर चुकी स्त्री की) आत्मा जैसी मालूम होती है लेकिन उसकी वास्तविकता अंत में ही पता चलती है। 

यह रात फिर ना आयेगी (१९६६): 'यह रात फिर ना आयेगी' फ़िल्म की रहस्यमयी नायिका हैं शर्मिला ठाकुर (टैगोर) जो नायक को अपने आत्मा होने के भ्रम में डालती हैं। फ़िल्म मनोरंजक तो है ही, इसका गीत-संगीत भी अत्यन्त मधुर है। यह नायिका वस्तुतः कौन है तथा किस उद्देश्य से नायक को अपनी ओर खींच रही है, इसका पता फ़िल्म के अंत में ही लगता है। शर्मिला ने अच्छा अभिनय किया है। 

अनामिका (१९७३): 'अनामिका' की कहानी 'अनीता' की कहानी से प्रेरित प्रतीत होती है। इस फ़िल्म में नायिका को 'अनामिका' इसलिए कहा गया है क्योंकि उसका कोई नाम ज्ञात नहीं है। इस 'अनामिका' की भूमिका निभाई है जया भादुड़ी ने जो नायक संजीव कुमार को अपने अलग-अलग रूपों से भ्रमित करती हैं। नायक-नायिका के सुंदर अभिनय से सजी यह फ़िल्म एक अत्यन्त मनोरंजक फ़िल्म है। इसका गीत-संगीत भी बहुत अच्छा है। शीर्षक गीत (मेरी भीगी-भीगी सी पलकों पे रह गए) तथा 'बाहों में चले आओ' आज भी लोकप्रिय हैं।

रोचक बात यह है कि साठ के दशक में बनीं ऐसी कई क्लासिक रहस्य फ़िल्मों के नायक मनोज कुमार या बिश्वजीत रहे। मनोज कुमार के बारे में मैं ऊपर लिख चुका हूँ। 'बीस साल बाद', 'कोहरा' तथा 'यह रात फिर ना आयेगी' के नायक बिश्वजीत थे। ये नायक ऐसी फ़िल्में बनाने वालों के पसंदीदा क्यों रहे, यह उन्हें बनाने वाले ही बेहतर जानते थे।

'मेरा साया', 'अनीता' और 'अनामिका' को छोड़कर ऐसी सभी फ़िल्में श्वेत-श्याम फ़िल्में हैं क्योंकि रंगीन फ़िल्मों का युग तब तक नहीं आया था। लेकिन इनका श्वेत-श्याम होना इनके रहस्य के तत्व के लिए अच्छा ही रहा क्योंकि श्वेत-श्याम पृष्ठभूमि में रहस्य का वातावरण बेहतर ढंग से उभर पाया। 

रेखा एवं जीतेन्द्र अभिनीत 'जल महल' (१९८०) भी कुछ-कुछ ऐसी ही फ़िल्म है। इसके कुछ वर्ष पूर्व आई फ़िल्म 'वही रात वही आवाज़' (१९७३) में भी किसी स्त्री को 'मेरा मन भटक रहा दीवाना' गाते हुए रहस्य उत्पन्न करते हुए दिखाया गया है। 'नक़ाब' (१९८९) में नायक ऋषि कपूर को भ्रमित करती हुई ऐसी भूमिका फ़रहा ने निभाई तो 'अब क्या होगा' (१९७७) में नायक शत्रुघ्न सिन्हा को भ्रमित करने का काम किया नीतू सिंह ने और 'घुंघरू की आवाज़' (१९८१) में नायक विजय आनंद को भरमाया रेखा ने। लेकिन इन फ़िल्मों की पटकथा कमज़ोर थी। सुदृढ़ पटकथा वाली ऐसी एक फ़िल्म 'दस्तूर' (१९९१) है जिसके आरंभिक दृश्य में श्वेत वस्त्रधारी नायिका को रहस्यमय ढंग से चलते हुए और गीत गाते हुए दिखाया गया है।

प्रश्न यह है कि स्त्रियों को ही ऐसी रहस्यमय भूमिकाओं में क्यों दिखाया जाता रहा, पुरुषों को क्यों नहीं ? उत्तर शायद यही है कि ऐसी कहानियां लिखने वाले भी एवं ऐसी फ़िल्में बनाने वाले भी पुरुष ही रहे और पुरुष के लिए तो स्त्री सदैव ही एक पहेली रही है जिसे सुलझाने का प्रयास वह सदियों से करता आ रहा है। हिंदी उपन्यासकार स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा के तो एक उपन्यास का शीर्षक ही है - 'औरत एक पहेली'। बहरहाल रहस्यमयी नारियों को प्रस्तुत करती हुई क्लासिक हिंदी फ़िल्में आज भी देखें तो एक अच्छा अहसास कराती हैं। 

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शनिवार, 13 जून 2026

वेद प्रकाश शर्मा का अद्भुत सृजन - विभा जिंदल

जब हिंदी में लुगदी साहित्य की श्रेणी के अंतर्गत विविध उपन्यास नियमित रूप से रचे जाते थे, तब कई उपन्यासकार कुछ ऐसे पात्रों का भी सृजन करते थे जो कि उनके उपन्यासों में दोहराए जाते थे। ऐसे पात्र स्टॉक कैरेक्टर अथवा स्थायी पात्र कहलाते थे। स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की विजय-विकास सीरीज़ के अंतर्गत बहुत-से पात्र ऐसे ही हैं। लेकिन इस सीरीज़ से हटकर भी उन्होंने कुछ ऐसे अद्भुत पात्रों का सृजन किया जो पाठकों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ गये। ऐसे एक पात्र का नाम है - विभा जिंदल।

विभा जिंदल को वेद प्रकाश शर्मा ने सबसे पहले अपने थ्रिलर उपन्यास 'साढ़े तीन घंटे' में प्रस्तुत किया था। वेद प्रकाश शर्मा ने उस उपन्यास में स्वयं को (तथा अपनी पत्नी मधु को) भी प्रस्तुत किया था। यद्यपि विभा का पात्र काल्पनिक ही है, वेद जी ने उन्हें अपने कॉलेज की सहपाठिनी बताया एवं यह बताया कि वे उनसे प्रेम करने लगे थे किन्तु उन्हें यह बात बताने से झिझकते थे। कॉलेज के अंतिम दिन विभा ने उनसे बातचीत की एवं बताया कि वे उनकी भावनाओं से परिचित हैं लेकिन उन्हें इन बातों से परे हटकर अपने लेखन पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि उनमें एक उच्च श्रेणी का जासूसी उपन्यासकार बनने के गुण हैं। वेद जी ने लिखा है (उपन्यास में अपनी पत्नी मधु को बताते हुए) कि विभा की बात को गांठ बाँधकर वे अन्य बातों से ध्यान हटाकर केवल लेखन में ध्यान लगाने लगे। विभा का विवाह एक उद्योगपति परिवार में अनूप जिंदल से हुआ तथा इस प्रकार वे जिन्दल परिवार की बहू बनीं और विभा जिन्दल कहलाने लगीं। वेद जी ने 'साढ़े तीन घंटे' में लिखा है कि वे सपत्नीक विभा से मिलने उनके नगर जिंदलपुरम गये। जिन्दल परिवार के भव्य आवास का नाम 'मंदिर' है क्योंकि उसकी दीवारों पर सम्पूर्ण रामायण अंकित की गई है। वेद जी की इसी यात्रा के दौरान विभा के पति अनूप जिंदल साढ़े तीन घंटे के लिए अपने कमरे में बंद हो जाते हैं तथा उस अवधि के पूर्ण होने पर स्वयं को गोली मारकर आत्महत्या कर लेते हैं। इस उपन्यास का कथानक यही है कि विभा अपने पति को खोने के ग़म को भूलकर किसी कुशल जासूस की भांति उनकी मृत्यु की छानबीन करने लगती हैं तथा अंत में वास्तविक अपराधी को पकड़ने के साथ-साथ सम्पूर्ण रहस्य को भी स्पष्ट कर देती हैं।

कुछ वर्षों के उपरांत वेद प्रकाश शर्मा ने विभा जिंदल को लेकर दूसरा उपन्यास लिखा - 'बीवी का नशा' जिसमें उन्होंने एक बार फिर स्वयं को एक पात्र के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने लिखा कि उनके एक मित्र संजय ने अपनी पत्नी की सहेली की हत्या कर दी थी जिसके आरोप में उसी की पत्नी किरन फंस गई थी और उसके पास कोई ऐसा सबूत नहीं था जिससे वह यह प्रमाणित कर सके कि हत्या उसकी पत्नी ने नहीं, ख़ुद उसी ने की थी। अब वेद जी उसे साथ लेकर चल देते हैं जिन्दलपुरम विभा जिंदल से मिलने और इस मामले में उनकी मदद माँगने। विभा संजय की मदद करती हैं एवं एक कुशल अण्वेषक (इनवेस्टिगेटर) की भांति न केवल सारे रहस्य की परतें खोल देती हैं बल्कि संजय को भी निर्दोष सिद्ध करके वास्तविक हत्यारे को बेनक़ाब कर देती हैं। वेद जी यह भी बताते हैं कि 'साढ़े तीन घंटे' में अपने पति की मृत्यु के समय विभा गर्भवती थीं तथा कुछ समय के उपरांत उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम बाद में वेद जी ने 'विराट' बताया।

एक दशक से अधिक के उपरांत वेद जी ने 'मि० चैलेंज' नामक एक उपन्यास लिखा जिसमें उन्होंने बताया कि उन्हीं के शहर मेरठ के एक कॉलेज में पहले एक महिला व्याख्याता का क़त्ल होता है एवं उसके बाद तो एक के बाद एक क़त्लों का सिलसिला ही चल पड़ता है। अब वे पुनः विभा को जिन्दलपुरम से बुलवाते हैं जिसके लिये वे स्वयं अपना ही अपहरण हो गया दर्शाते हैं। विभा जिंदलपुरम से आती हैं और पहले तो वेद जी को ही ढूंढ़ती हैं तथा उसके बाद सारे मामले की इनवेस्टिगेशन करके हत्यारे के चेहरे को अनावृत कर देती हैं। इस उपन्यास में वेद जी ने समय काल को ध्यान में रखते हुए (अपनी पत्नी मधु के साथ-साथ) अपने चार बच्चों का उल्लेख किया है तथा अपने नन्हे पुत्र शगुन को विभा के साथ-साथ रहकर उनकी इनवेस्टिगेशन में शामिल होते हुए बताया है। चूंकि इस उपन्यास की पृष्ठभूमि वेद जी ने अपने गृहनगर मेरठ को बनाया है, उपन्यास में मेरठ के विभिन्न स्थानों का भी उल्लेख है एवं पाठक उपन्यास के पृष्ठों के माध्यम से मेरठ की सैर करता है।

एक लंबे समय के अंतराल के बाद वेद जी ने विभा को लेकर पुनः एक उपन्यास लिखा - 'क्योंकि वो बीवियां बदलते थे'। इस उपन्यास की ख़ासियत यह है कि उपन्यास में हो रही विभिन्न हत्याओं का कारण उपन्यास के शीर्षक में ही स्पष्ट कर दिया गया है। फिर भी यह उपन्यास अत्यन्त रोचक बन पड़ा है। इस बार विभा को विभिन्न उद्योगपति घरानों के पुरुषों एवं महिलाओं की एक के बाद एक हो रही हत्याओं के रहस्य को सुलझाना है। इस काम में उनकी मदद वेद जी तथा उनका बेटा शगुन भी करते हैं। यह सुदीर्घ उपन्यास पाठकों के दिमाग़ को चकरा कर रख देता है। हत्यारे की वास्तविकता अंतिम पृष्ठ पर अंतिम पंक्तियों में ही पता चलती है। इस उपन्यास में वेद जी ने विभा के व्यक्तित्व पर भी आयु का प्रभाव पड़ा दिखाया है और साथ ही बताया है कि उनका पुत्र विराट अब बड़ा हो चुका है।

विभा जिंदल के ये चारों उपन्यास वेद जी की श्रेष्ठ कृतियों में सम्मिलित हैं। जिस प्रकार विश्वप्रसिद्ध रहस्यकथा लेखिका अगाथा क्रिस्टी ने मिस मार्पल नामक एक उम्रदराज़ महिला जासूस का अत्यन्त लोकप्रिय पात्र रचा है, कुछ-कुछ वैसा ही यह वेद जी द्वारा रचा गया पात्र है। विभा के साथ-साथ स्वयं को एवं अपने परिवार के सदस्यों को भी इन उपन्यासों में प्रस्तुत करके वेद जी ने न केवल इस काल्पनिक चरित्र पर वास्तविकता का रंग चढ़ाया है वरन उपन्यासों की रोचकता को भी बढ़ा दिया है। इन उपन्यासों में वेद जी ने स्वयं को एक सामान्य बुद्धि वाले व्यक्ति के रूप में ही चित्रित किया है। और जहाँ तक विभा के चित्रण की बात है, वेद जी ने अपने शब्दों से विभा के व्यक्तित्व का ऐसा जीवंत चित्र ख़ींचा है कि इन उपन्यासों को पढ़ते समय हमें लगता है मानो हम किसी काल्पनिक पात्र के बारे में नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि अपने सामने जीती-जागती विभा जिंदल को उपस्थित देख रहे हैं। यूँ तो वेद जी ने विकास, वतन, केशव पंडित आदि कई पात्रों का सृजन किया है लेकिन विभा जिन्दल की बात ही कुछ और है। जिन्हें हिंदी उपन्यास पढ़ने में रुचि है, उन्हें मैं सलाह दूंगा कि इन उपन्यासों को पढ़ें एवं जिन्दलपुरम के औद्योगिक साम्राज्य की मालकिन होते हुए भी सादगी से परिपूर्ण इस असाधारण नारी से मिलें।

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बुधवार, 6 मई 2026

वेद प्रकाश शर्मा और सुभाष चंद्र बोस

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के विभिन्न नायकों (एवं नायिकाओं) में से किसी ने मेरे हृदय पर स्थायी रूप से आधिपत्य जमाया है तो वे हैं नेताजी सुभाष चंद्र बोस। सुभाष बाबू ने अपने जीवन को ऐसे जिया कि आज उसका सिंहावलोकन करने पर एक रूमानियत का अहसास होता है। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने जो कर दिखाया, वह आज एक स्वप्न सरीखा लगता है। वे मेरे प्रेरणा-स्रोत रहे हैं और रहेंगे। उनके प्रशंसकों की संख्या वैसे तो करोड़ों में है लेकिन मैं एक व्यक्ति को निश्चय ही जानता हूँ जिसके मन में सुभाष बाबू का वही स्थान रहा जो मेरे मन में है। वह व्यक्ति है - हिंदी उपन्यासकार स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा।

वेद प्रकाश शर्मा ने यूँ तो भारत के स्वाधीनता संग्राम को आधार बनाकर कई उपन्यास लिखे किंतु वे सुभाष बाबू के व्यक्तित्व की दृढ़ता एवं अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठा से बहुत अधिक प्रभावित रहे और उन्होंने कुछ उपन्यास ऐसे लिखे जिनमें सुभाष बाबू स्वयं एक पात्र के रूप में उपस्थित हैं। प्रमुखतः दो ऐसे कथानक उन्होंने रचे - पहला 'ख़ून दो आज़ादी लो' व 'बिच्छू' नामक दो भागों में विभाजित कथानक तथा दूसरा 'जय हिंद' व 'वंदे मातरम' नामक दो भागों में विभाजित कथानक। पहला कथानक पराधीन भारत में अंग्रेज़ों से लोहा ले रहे क्रांतिकारियों की गतिविधियों का वर्णन करता है जबकि दूसरा कथानक स्वाधीन भारत में सुभाष बाबू के जीवन से प्रेरित भारतीय युवकों के एक विदेशी षड्यंत्र द्वारा गुमराह हो जाने का वर्णन करता है। मैं अपने इस लेख में इन्हीं दोनों कथानकों की जानकारी दे रहा हूँ।

'ख़ून दो आज़ादी लो' व 'बिच्छू': वेद प्रकाश शर्मा ने भारत की स्वतंत्रता हेतु अंग्रेज़ों से जूझने वाले एक क्रांतिकारी दल की गतिविधियों को आधार बनाते हुए 'वतन की कसम' नामक थ्रिलर उपन्यास लिखा था जो अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। उसकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर वेद जी ने उसका सीक्वल लिखने का निर्णय लिया जो कि इन उपन्यासों के रूप में सामने आया। 'वतन की कसम' के अंतिम दृश्य से आरंभ हुए इस कथानक में बताया गया है कि 'वतन की कसम' में जिस क्रांति दल का उल्लेख था, वास्तविक क्रांति दल उससे बहुत अधिक बड़ा है जिसके सरदार की वास्तविकता कोई नहीं जानता है। सरदार नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अपना आदर्श एवं प्रेरणा-स्रोत मानता है तथा समय-समय पर उनसे मार्गदर्शन लेता है। नेताजी उसे मार्गदर्शन देने के अतिरिक्त दल की गतिविधियों में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाते हैं। वह अपनी वास्तविकता केवल नेताजी पर ही प्रकट करता है। 

क्रांति दल की गतिविधियों के साथ-साथ एक समानांतर कहानी गगन, धरा एवं नीला नामक तीन व्यक्तियों की भी चलती है। विद्यार्थी जीवन में वे साथ-साथ पढ़ते थे। नीला एवं धरा सहेलियां थीं। गगन को धरा से प्रेम था जबकि नीला को गगन से। धरा गगन को उसे अपनी बहन स्वीकार करने हेतु मना लेती है और वह नीला से विवाह कर लेता है। अब इन घटनाओं को बारह वर्ष बीत चुके हैं तथा गगन एवं नीला का एक दस वर्षीय पुत्र भी है - टिंकू। गगन के पिता एक उद्योगपति हैं तथा अंग्रेज़ सरकार के पिट्ठू बने हुए हैं जबकि नीला के पिता अंग्रेज़ सरकार के वफ़ादार पुलिस अधिकारी हैं। गगन ने अपने कॉलेज जीवन की सारी बातें (धरा एवं नीला से संबंधित बातों सहित) एक डायरी में लिख रखी हैं जिन्हें वह समय-समय पर पढ़ता रहता है। लंबे समय से उसे धरा की कोई ख़बर नहीं है।

क्रांति दल अंग्रेज़ सरकार के पिट्ठू बने हुए लोगों के पीछे पड़ा रहता है। स्वभावतः वह गगन के पिता के भी पीछे पड़ता है। इधर एक अनजान व्यक्ति जो स्वयं को बिच्छू के नाम से संबोधित करता है, भी गगन के पिता के पीछे पड़ जाता है। गगन स्वयं क्रांति दल में सम्मिलित है। एक दिन अचानक उसकी मुलाक़ात धरा से भी हो जाती है। इधर अंग्रेज़ सरकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस को नज़रबंद कर लेती है तथा वे देश से भागकर विदेश जाने की योजना बनाते हैं जिसमें क्रांति दल का सरदार उन्हें सहयोग देता है। देश से बाहर निकलते समय सरदार के कहने से वे गगन और धरा को भी साथ ले जाते हैं। कथानक के अंत में एक ओर तो गगन एवं धरा सुभाष बाबू के साथ-साथ ही विमान-दुर्घटना में फंसकर (सुभाष बाबू को बचाते हुए) शहीद हो जाते हैं जबकि दूसरी ओर संपूर्ण क्रांति दल अंग्रेज़ों के साथ हुई मुठभेड़ में समाप्त हो जाता है। 

इस कथानक में दर्शाई गई कई बातें विश्वसनीय नहीं हैं लेकिन कथानक अत्यन्त रोचक भी है एवं प्रेरक भी। क्रांति दल का सरदार तथा बिच्छू नामक व्यक्ति वास्तव में कौन हैं, यह उपन्यास के अंत में ही पता लगता है। इस वृहत् कथानक में प्रारम्भ से अंत तक देशप्रेम के साथ-साथ एक रहस्य का वातावरण बना रहता है जो कि पाठक को अंतिम दृश्य तक बांधे रखता है। अंतिम पंक्तियों में भी एक रहस्य का ख़ुलासा होता है जो पाठक को चौंका देता है। उपन्यास में भावनाओं का भी भरपूर सम्प्रेषण है। गगन, धरा एवं नीला के पात्रों के माध्यम से मानवीय संबंधों का बड़ा ही सजीव एवं भावुकतापूर्ण चित्रण किया गया है। कुछ कमियों के बावजूद यह एक श्रेष्ठ उपन्यास है जिसमें मानवीय प्रेम भी है तो देश प्रेम भी, एक्शन भी है तो रहस्य भी और सबसे बढ़कर एक पात्र के रूप में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की उपस्थिति भी जो कि उपन्यास के क्रांति दल के लिये ही नहीं, पाठकों के लिये भी प्रेरणा-स्रोत हैं। वैसे तो 'वतन की कसम' अपने आप में संपूर्ण एवं पृथक् उपन्यास है, फिर भी यदि इस कथानक को पढ़ने से पूर्व 'वतन की कसम' को पढ़ लिया जाए तो इसका अधिक आनंद उठाया जा सकता है। 

'जय हिंद' व 'वंदे मातरम': दो भागों में प्रस्तुत यह कथानक वेद प्रकाश शर्मा की विजय-विकास सीरीज़ के अंतर्गत लिखा गया है। इसमें बताया गया है कि देश के युवकों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रति जो सम्मान की भावना है, उसका लाभ उठाकर एक विदेशी षड्यंत्र भारत को अस्थिर करने हेतु रचा जाता है एवं एक नक़ली सुभाष चंद्र बोस प्रस्तुत कर दिये जाते हैं जो कि एक तथाकथित 'अखंड हिंद फ़ौज' की स्थापना कर रहे हैं। बहुत-से देशभक्त युवक उस कथित नेताजी के प्रभाव में आकर उसके दल से जुड़ जाते हैं जिनमें विकास के पिता रघुनाथ भी हैं।  उपन्यास के घटनाक्रम का स्थान राजनगर नामक एक कल्पित नगर है (विजय-विकास सीरीज़ के उपन्यास प्रायः इसी नगर में घटित होते हैं)। जब भारतीय सीक्रेट सर्विस को इन बातों का पता चलता है तो भारतीय गुप्तचर विजय और विकास इस षड्यंत्र को विफल करके निर्दोष भारतीय युवकों को वास्तविकता से अवगत करवाने की ज़िम्मेदारी लेते हैं। इधर वे अपना काम शुरु करते हैं, उधर नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्वयं विजय के यहाँ पहुँच जाते हैं। अब वे असली सुभाष हैं या नक़ली, यह जानना विजय के लिये ज़रूरी हो जाता है। अंत में वास्तविक नेताजी पुनः परिदृश्य से बाहर हो जाते हैं जबकि नक़ली नेताजी बने बैठे विदेशी एजेंट की योजना को विफल करके उसके चंगुल में फंस गये निर्दोष भारतीय युवकों को उसकी वास्तविकता बताकर उसके षड्यंत्र से बाहर निकाल लिया जाता है। 

दो भागों में फैला हुआ यह कथानक बहुत रोचक है किंतु इसमें थ्रिल ही अधिक है, सस्पेंस नहीं। नेताजी बना बैठा व्यक्ति किसी विदेशी षड्यंत्र का हिस्सा है, यह बात बहुत पहले ही स्पष्ट कर दी जाती है, अतः यह कोई रहस्य उत्पन्न नहीं करती। रहस्य वास्तव में कथानक के प्रथम भाग के अंतिम दृश्य में आता है जबकि विजय स्वयं से मिलने आये नेताजी पर संदेह करता है तथा वे वास्तविक हैं या नहीं, यह जानने के लिये अपना दिमाग़ लगाता है। उपन्यास इस बात को रेखांकित करता है कि सुभाष बाबू के प्रशंसक तथा उनके जीवन से प्रेरणा लेने वाले असंख्य लोग भारत में हैं तथा कोई भी व्यक्ति (अथवा भारत का शत्रु देश) इस तथ्य का अनुचित लाभ उठा सकता है। अपने नाम पर की गई विदेशी साज़िश को नाकाम करने के लिए स्वयं नेताजी भारतीय जासूसों को किस प्रकार सहयोग देते हैं, यह भी बड़े रोचक ढंग से चित्रित किया गया है। कुल मिलाकर कथानक आरंभ से अंत तक पाठक को बाँधे रखने वाला एवं प्रभावी है। यह उपन्यास लेखक की विजय-विकास सीरीज़ के संसार (परिवेश एवं विभिन्न पात्रों) से भी पाठकों का परिचय करवाता है। 

सुभाष बाबू हमारे स्वतंत्रता संग्राम के एक विलक्षण नायक रहे हैं जिन्होंने अपनी अत्यन्त विषम परिस्थितियों में भी अंग्रेज़ सरकार को चकमा देकर देश से निकलने एवं विदेश में आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन करके भारत में शासन कर रही गोरी सरकार को चुनौती देने का ऐसा साहसिक कार्य कर दिखाया जिसके विषय में दूसरा कोई तो सोच तक नहीं सकता। वेद प्रकाश शर्मा ने उनके जीवन को अपने लेखन की प्रेरणा बनाया तथा उन्हीं को एक पात्र के रूप में लेकर रोचक एवं प्रेरक उपन्यास अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किये। ये ऐसे उपन्यास हैं जिन्हें एक बार पढ़ना आरंभ कर देने के उपरांत पूरा पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता। मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि वेद जी द्वारा वर्षों पूर्व रचित ये उपन्यास आज भी यदि कोई पढ़ेगा तो उसे मनोरंजन के साथ-साथ अपने देश के लिये कुछ करने तथा अपने जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा प्राप्त होगी।

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सोमवार, 27 अप्रैल 2026

कुछ बातें सीक्वल की

सीक्वल का अर्थ होता है अगली कड़ी। मुख्यतः यह शब्द किसी कहानी के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। कहानी किसी फ़िल्म की भी हो सकती है तथा उपन्यास की भी। यहाँ सीक्वल से आशय यह नहीं है कि किसी कहानी को अपने प्रथम भाग में अधूरा छोड़ दिया जाए तथा उस अधूरे भाग को आगामी कड़ी (या कड़ियों) में पूरा किया जाए। ऐसा पहले तो केवल उपन्यासों के लिए किया जाता था लेकिन अब विगत कुछ वर्षों से फ़िल्में भी इसी भांति बनने लगी हैं जिनमें पहली फ़िल्म में कथा का केवल एक भाग प्रस्तुत किया जाता है जबकि उसका समापन भाग दूसरी फ़िल्म में प्रस्तुत किया जाता है (यह दूसरी फ़िल्म कुछ दिनों या कुछ महीनों के उपरांत प्रदर्शित होती है)। इस लेख में मेरा प्रयोजन उस प्रकार के सीक्वल के बारे में बात करना है जिनमें उसका पूर्व भाग भी अपने आप में सम्पूर्ण होता है तथा उसे देखने के उपरांत दूसरे भाग को देखना अनिवार्य नहीं होता क्योंकि दोनों की कहानियां (कुछ) समान पात्रों को लिए हुए होने के बावजूद स्वतंत्र एवं अपने आप में पूर्ण होती हैं।

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ने ऐसा प्रयोग भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष पर आधारित अपने उपन्यास 'वतन की कसम' में किया था जिसकी पाठक समुदाय में हुई लोकप्रियता के कारण उन्होंने उसका सीक्वल 'ख़ून दो आज़ादी लो' तथा 'बिच्छू' नामक उपन्यासों के रूप में लिखा। इन उपन्यासों में 'वतन की कसम' के अंतिम दृश्य से कहानी को आगे बढ़ाया गया था किंतु 'वतन की कसम' अपने आप में सम्पूर्ण उपन्यास था जबकि सीक्वल के रूप में लिखे गए दो उपन्यासों में उसके कुछ पात्रों को लिए जाने के बावजूद कहानी बिलकुल अलग थी। 

बॉलीवुड फ़िल्मों में ऐसा कई बार किया गया है जब स्थायी पात्र तो सीक्वल में यथावत् रहे किंतु कुछ नए पात्रों के साथ एक नई कहानी दर्शकों के समक्ष रखी गई। देव आनंद की अत्यधिक सफल फ़िल्म 'ज्वेल थीफ़' (१९६७) का सीक्वल एक लंबे अंतराल के उपरांत 'रिटर्न ऑव ज्वेल थीफ़' (१९९६) के रूप में आया किंतु कमज़ोर कथानक एवं निर्देशन के कारण असफल रहा। ऐसा ही फ़िल्म 'हेरा फेरी' (२०००) का सीक्वल 'फिर हेरा फेरी' (२००६) बनाकर किया गया था जिसकी कहानी 'हेरा फेरी' के अंत से आगे बढ़ाई गई थी। वह फ़िल्म भी दर्शकों-समीक्षकों को विशेष प्रभावित नहीं कर सकी। और ऐसा ही अत्यन्त सफल एवं बहु-प्रशंसित फ़िल्म 'रॉक ऑन' (२००८) का सीक्वल 'रॉक ऑन2' (२०१६) बनाकर किया गया जिसमें कुछ प्रमुख पात्रों के साथ कहानी को मूल फ़िल्म के अंत से आगे बढ़ाते हुए एक नई कहानी को परोसा गया पर वह भी मूल फ़िल्म की भांति प्रभावशाली नहीं बन सकी। 

वस्तुतः सीक्वल बनाया तो मूल फ़िल्म की सफलता को भुनाने के लिए जाता है क्योंकि उस फ़िल्म की अच्छी स्मृतियां दर्शकों के मन में होती हैं किंतु किसी भी सीक्वल की सफलता एक सुदृढ़ कथानक, कुशल निर्देशन तथा कलाकारों के अभिनय पर निर्भर करती है। ऊपर मैंने जिन फ़िल्मों का उल्लेख किया उनमें सीक्वल का कथानक, निर्देशन तथा अभिनय पक्ष पिछली फ़िल्म (प्रीक्वल) की भांति प्रभावी नहीं था, इसीलिए सीक्वल दर्शकों का साथ नहीं पा सके। लेकिन जब सीक्वल की कहानी, निर्देशन (चाहे वह प्रीक्वल के निर्देशक द्वारा किया जाए या किसी और के द्वारा),अभिनय एवं तकनीकी पक्ष अच्छे हों तो सीक्वल सफल हो जाता है जैसा कि 'तनु वेड्स मनु' (२०११) के सीक्वल 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' (२०१५) के मामले में हुआ जब सीक्वल भी प्रीक्वल की भांति ही सफल रहा। ऐसा ही 'कोई मिल गया' (२००३) के सीक्वल के रूप में बनाई गई फ़िल्मों - 'कृष' तथा 'कृष3' के मामलों में हुआ जब सीक्वलों ने प्रीक्वल की सफलता को दोहराया। 'दृश्यम' (२०१५) का सीक्वल 'दृश्यम2' (२०२२) भी सफल रहा। सन्नी देओल ने अपनी अत्यन्त सफल (राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित) फ़िल्म 'घायल (१९९०) का सीक्वल 'घायल वंस अगेन (२०१६) स्वयं ही निर्देशित किया और मुँह के बल गिरे लेकिन उनकी सुपरहिट फ़िल्म 'गदर-एक प्रेमकथा' (२००१) का सीक्वल 'गदर2 (२०२३) अपने प्रीक्वल की भांति ही सुपरहिट रहा।

'साहब बीवी और गैंगस्टर' (२०११) के भी दो सीक्वल बनाए गए जिनमें से पहला सीक्वल 'साहब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स' (२०१३) तो चुस्त कथानक एवं कुशल निर्देशन के कारण सफल रहा पर जब उसकी भी अगली कड़ी 'साहब बीवी और गैंगस्टर3' (२०१८) के रूप में बनाकर दर्शकों को परोस दी गई तो वह कमज़ोर कथा के कारण असफल रही। इनकी विशेषता यह है कि प्रमुख पात्रों (साहब तथा बीवी) एवं उनके पारस्परिक संबंधों को समझने के लिए दर्शकों हेतु पहली कड़ी को देखना आवश्यक है अन्यथा किसी भी सीक्वल के कथानक को समझने में समस्या हो सकती  है (यद्यपि सीक्वल अपने आप में संपूर्ण हैं)।

सीक्वल ऐसे भी बने हैं जिनमें कहानी को पिछली फ़िल्म या प्रीक्वल से आगे नहीं बढ़ाया गया है केवल प्रमुख पात्रों को लेकर एक नई कहानी बुनी गई है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' (२००३) का सीक्वल 'लगे रहो मुन्नाभाई (२००६) है जिसमें प्रीक्वल के दो प्रमुख पात्रों (मुन्ना तथा सर्किट) को लेकर एक पूरी तरह से नई कहानी कही गई है। चूंकि कहानी, निर्देशन, अभिनय, तकनीकी पक्ष, संगीत आदि सभी उत्तम रहे; स्वाभाविक रूप से सीक्वल भी अत्यन्त सफल रहा। 'इश्क़िया' (२०१०) की सीक्वल 'डेढ़ इश्क़िया' (२०१४) भी इसी प्रकार बनाई गई थी एवं वह भी सफल रही थी। इसी प्रारूप में 'गोलमाल-फ़न अनलिमिटेड' (२००६) के भी कई सीक्वल बनाए गए जो बॉक्स ऑफ़िस पर चल गए। लेकिन सफल फ़िल्म 'स्टाइल' (२००१) का सीक्वल 'एक्सक्यूज़ मी' (२००३) सफल नहीं रहा।

सीक्वल को फ़्रेंचाइज़ फ़िल्मों से अलग करके देखा जाना चाहिए। विदेशों की नक़ल करते हुए बॉलीवुड के भट्ट कैम्प ने अपनी 'राज़' (२००२) तथा 'मर्डर' (२००४) जैसी फ़िल्मों के नामों में 2, 3 आदि लगाकर बिलकुल भिन्न फ़िल्में बनाईं जिनमें मूल फ़िल्मों के पात्र तक नहीं थे एवं तथाकथित अगली कड़ियों का मूल फ़िल्म से किसी भी तरह का कोई लेनादेना नहीं था। लेकिन दर्शकों को मूल फ़िल्म का नाम काम में लेकर भ्रमित करने में फ़िल्मकार सफल नहीं रहे एवं वे फ़िल्में (जो कि सीक्वल न होकर फ़्रेंचाइज़ फ़िल्में थीं) दर्शकों द्वारा नकार दी गईं।

एक विशिष्ट सीक्वल की बात मैं विशेष रूप से करना चाहूंगा। प्रतिष्ठित राजश्री बैनर ने अपनी अत्यधिक सफल एवं लोकप्रिय फ़िल्म 'अँखियों के झरोखों से' (१९७८) का सीक्वल 'जाना पहचाना' (२०११) के रूप में बनाया। जब मैंने वह फ़िल्म देखी तो मैं यह देखकर दंग रह गया कि सीक्वल में कम-से-कम आधा हिस्सा प्रीक्वल के दृश्यों से भरा हुआ है। चूंकि दोनों ही फ़िल्में एक ही निर्माता की हैं, अतः ऐसा करने में कृतिस्वाम्य (कॉपीराइट) की तो समस्या नहीं थी किंतु फ़िल्म पसंद आने पर भी मैंने यह महसूस किया कि जब सीक्वल में आधा हिस्सा प्रीक्वल का ही है तो सीक्वल देखने से बेहतर क्या प्रीक्वल को ही पुनः देख लेना नहीं होता ? शायद ऐसा ही दर्शक समुदाय ने महसूस किया होगा जिसके कारण फ़िल्म सफल नहीं रही (समीक्षकों ने भी इसकी आलोचना ही की)।

बॉलीवुड में अब सीक्वल किसी भेड़चाल की तरह हो गया है। जब भी कोई फ़िल्म सफल हो जाती है, उसके नाम में 2 लगाकर उसके सीक्वल की घोषणा कर दी जाती है। ऐसे फ़िल्मकार यह मानने को तैयार नहीं होते कि आज का दर्शक मूढ़ नहीं है। वह अच्छी तरह समझता है कि सीक्वल वस्तुतः क्या होता है। वह उसी फ़िल्म को अपेक्षित प्रतिसाद देता है जो कि अच्छी कहानी के साथ अच्छे ढंग से बनाई गई हो, फिर चाहे वह सीक्वल हो या नहीं।

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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

वेद प्रकाश शर्मा की क़लम से निकला एक धर्मयुद्ध

इस समय मध्य-पूर्व में जो अवांछित युद्ध चल रहा है, उसके लिए अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एवं इज़राइल के राष्ट्र-प्रमुख बेंजामिन नेतन्याहू की खुली आलोचना सुनने में नहीं आ रही है जबकि ईरान की आलोचना हुई है। निश्चय ही ईरान ने भी ग़लत क़दम उठाया है किंतु किसी राष्ट्र की सार्वभौमिकता पर आक्रमण करके अमरीका एवं इज़राइल ने बहुत बड़ी ग़लती की थी। न तो संयुक्त राष्ट्र में इसकी आलोचना हुई एवं न ही भारत ने इसकी आलोचना की। यदि कोई अन्य राष्ट्र ऐसा ही भारत के साथ करता तो क्या हम उसका सामरिक प्रत्युत्तर नहीं देते एवं अन्य राष्ट्रों से उस आक्रमणकारी राष्ट्र के कुकृत्य की आलोचना की अपेक्षा नहीं करते ? अमरीका ने वही किया है जो कि तथाकथित बड़े देश छोटे देशों के साथ करते आए हैं। यह केवल साम्राज्यवाद है, और कुछ नहीं। केवल डोनाल्ड ट्रम्प की सनक के चलते यह युद्ध बिना किसी चेतावनी के ईरान एवं उसके नागरिकों पर थोपा गया है। यहाँ तक कि अमरीका की संसद ने भी अब तक इसका अनुमोदन नहीं किया है।

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा आज जीवित होते तो निश्चय ही इस विषय को आधार बनाकर कोई उपन्यास लिखते क्योंकि वे सदा समसामयिक विषयों पर अपनी लेखनी चलाने में विश्वास रखते थे। अफ़ग़ानिस्तान में तत्कालीन सोवियत संघ के हस्तक्षेप को आधार बनाकर उन्होंने अपनी विजय-विकास सीरीज़ के अंतर्गत एक यादगार उपन्यास लिखा था। इस उपन्यास का नाम है - धर्मयुद्ध।

'धर्मयुद्ध' कहानी सुनाता है एक काल्पनिक राष्ट्र 'मजलिस्तान' (जिसे हम अफ़ग़ानिस्तान मान सकते हैं) की जिसमें एक विदेशी महाशक्ति 'सेमिनार' (जिसे हम सोवियत संघ मान सकते हैं) के हस्तक्षेप से सत्ता परिवर्तन हो जाता है। वहाँ के शासक सादात को मार डाला जाता है एवं एक कठपुतली शासक इबलीस को गद्दी पर बैठा दिया जाता है। सेमिनार की सेनाएं मजलिस्तान में डेरा डाल देती हैं एवं सामान्य नागरिकों पर अत्याचार होते हैं। सादात की पुत्री मुमताज़ कुछ पुराने वफ़ादारों के साथ मिलकर एक विद्रोहियों का दल बनाती है एवं  इबलीस की सेना तथा विदेशी ताक़तों (जिनके उच्चाधिकारी मजलिस्तान में इबलीस के सिर पर सवार रहते हैं) से लोहा लेती है। प्रेस पर सेंसरशिप लागू होने के कारण बाहरी दुनिया को ये सारी बातें पता नहीं होतीं। बाहरी दुनिया को सिर्फ़ वही बताया जाता है जो इबलीस तथा उसके विदेशी आका बताना चाहते हैं।

विद्रोही दल के लोग डॉक्टर भसीन नामक एक भारतीय वैज्ञानिक का अपहरण कर लेते हैं जिसे छुड़ाने का कार्य भारत सरकार अपनी सीक्रेट सर्विस को सौंपती है। भारत के प्रमुख सीक्रेट एजेंट हैं विजय और विकास। जहाँ विजय एक ठंडे दिमाग़ वाला तथा सोच-समझकर कोई भी क़दम उठाने वाला व्यक्ति है, वहीं मुश्किल से इक्कीस वर्ष का विकास एक जल्दी उत्तेजित हो जाने वाला एवं भावनाओं में बह जाने वाला युवक है। विकास विजय की चचेरी बहन रैना तथा उसके मित्र पुलिस सुपरिंटेंडेंट रघुनाथ का पुत्र है। अपने व्यक्तित्व की कुछ कमियों के बावजूद विकास की विशेषता यह है कि वह चरम सीमा तक देशभक्त है। इस सीरीज़ के अन्य कुछ प्रमुख चरित्र हैं - विजय के पिता ठाकुर निर्भयसिंह जो कि राजनगर (इस सीरीज़ के उपन्यासों हेतु सिरजा गया एक कल्पित शहर) के इंस्पेक्टर जनरल ऑव पुलिस हैं, उसकी मां उर्मिलादेवी, भारतीय सीक्रेट सर्विस का मुखिया अजय उर्फ़ ब्लैक ब्वॉय (जो रैना का सगा भाई है), एक अंतर्राष्ट्रीय अपराधी अलफ़ांसे आदि। 

बहरहाल भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा डॉक्टर भसीन को छुड़ाने का दायित्व भारतीय सीक्रेट सर्विस को सौंपा जाता है और उसका मुखिया ब्लैक ब्वॉय यह काम विकास को सौंप देता है। विकास मजलिस्तान पहुँचता है और काम पे लग जाता है। उसकी मुलाक़ात इबलीस तथा सेमिनार के उच्चाधिकारियों तोम्बो एवं गार्जियन से होती है तो उसका माथा ठनकता है तथा उसे महसूस होता है कि जो कुछ भी बाहरी दुनिया को समाचार-माध्यमों से बताया जा रहा है, वस्तुस्थिति उससे भिन्न है और मजलिस्तान के हालात बहुत ख़राब हैं। डॉक्टर भसीन को छुड़ाने के प्रयास मे उसका सामना मुमताज़ एवं उसके दल से होता है। शीघ्र ही वह सब कुछ समझ लेता है। डॉक्टर भसीन को सुरक्षित भारत वापस भेज देने के उपरांत वह मुमताज़ एवं उसके दल से मिल जाता है तथा उनकी सहायता करने लगता है।

जब यह सूचना भारत पहुँचती है तो विजय एवं ब्लैक ब्वॉय असमंजस में पड़ जाते हैं क्योंकि सेमिनार भारत का मित्र देश है तथा विकास के इस कार्य से यह मित्रता संकट में पड़ सकती है। यद्यपि विकास यह कार्य अपनी निजी हैसियत से कर रहा है किंतु है तो वह भारतीय एजेंट ही। विकास अपने ही देश तथा अपने उच्चाधिकारियों के विरुद्ध जाकर मजलिस्तान की घायल मानवता के पक्ष में कार्य करने को एक धर्मयुद्ध कहता है। उसे रोकने हेतु अब उसके गुरु विजय को मजलिस्तान जाना पड़ता है तथा वह अंततः अपने शिष्य विकास को वापस ले ही आता है। किंतु विजय के अपने इस कार्य में सफल होने से पूर्व ही विकास एक पैम्फ़्लैट बनाकर मुमताज़ को दे चुका होता है जिसमें मजलिस्तान के जनसामान्य से देशद्रोहियों तथा उनसे जुड़ी विदेशी ताक़तों के विरुद्ध उठ खड़े होने का आह्वान होता है। इस पैम्फ़्लैट के सम्पूर्ण मजलिस्तान में वितरण का परिणाम यह होता है कि मजलिस्तान में बड़े पैमाने पर जनक्रांति हो जाती है, विदेशी ताक़तों को देश छोड़ना पड़ता है तथा मुमताज़ मजलिस्तान की नई राष्ट्रपति बनती है।

मैंने उपन्यास का सार-संक्षेप दे दिया है लेकिन इस अत्यंत रोचक उपन्यास का वास्तविक आनंद इसे पूर्ण रूप से पढ़कर ही लिया जा सकता है। यह उपन्यास आद्योपांत मनोरंजक है। मजलिस्तान की धरती पर विजय और विकास के टकराव का तो कहना ही क्या ? यह उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ हमें वैश्विक राजनीति से भी परिचित करवाता है एवं स्पष्ट करता है कि महाशक्तियों की राजनीति में छोटे देशों की निर्दोष जनता किस तरह पिस जाती है। यह इस बात को भी स्पष्ट करता है कि कोई भी जनक्रांति विदेशी सहायता से सफल नहीं हो सकती तथा किसी भी देश द्वारा विदेशी सैन्य सहायता ली भी नहीं जानी चाहिए क्योंकि सहायता करने वाला देश फिर अपनी सहायता की क़ीमत वसूल करने में लग जाता है और पीड़ित (छोटे) देश के लिए एक ग़ुलामी से बाहर निकलकर दूसरी ग़ुलामी में फंस जाने का ख़तरा पैदा हो जाता है। लेखक ने हृदयविदारक ढंग से दर्शाया है कि जब किसी देश में विदेशी हस्तक्षेप से सत्ता-परिवर्तन होता है तो निरीह जनता पर किस प्रकार अमानुषिक अत्याचार किए जाते हैं। विकास के माध्यम से लेखक ने भारतीय विदेश नीति के पाखंड की भी आलोचना की है जिसके अंतर्गत भारत तत्कालीन सोवियत संघ से अपनी मित्रता के चलते उसके अफ़ग़ानिस्तान में घुसपैठ करने का विरोध नहीं करता था। 

उपन्यास विजय एवं विकास के चरित्रों को भी विस्तार से दर्शाता है। जहाँ विकास का दृष्टिकोण मानवीय है वहीं विजय यह मानता है कि एक गुप्तचर को भावनाओं से ऊपर उठ जाना चाहिए तथा उसका एकमात्र लक्ष्य वही करना होना चाहिए जो कि उसके देश के हितों के अनुकूल हो। लेकिन लेखक यह भी (इस उपन्यास में तथा इस सीरीज़ के कई अन्य उपन्यासों में) दर्शाते हैं कि किसी को भी प्यार न करने वाला विजय भी अपने शिष्य विकास से बहुत प्यार करता है। 

इस उपन्यास की गुणवत्ता इतनी उच्च है कि इसे उत्कृष्ट साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। कई दशक पूर्व लिखा गया यह उपन्यास आज भी ताज़गी से भरा एवं सामयिक लगता है। सरल हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास वेद प्रकाश शर्मा के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में से एक है। जो भी इसे पढ़ेगा, उसका न केवल मनोरंजन होगा वरन उसके विश्व राजनीति संबंधी ज्ञान में भी संवर्धन होगा। 

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बुधवार, 26 नवंबर 2025

वेद प्रकाश शर्मा और शिखंडी

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ने अपने कई उपन्यास विदेशी फ़िल्मों के कथानकों से प्रेरित होकर लिखे थे। उनका ऐसा ही एक उपन्यास है शिखंडी जो कि हॉलीवुड फ़िल्म माइनॉरिटी रिपोर्ट (Minority Report) से प्रेरित होकर लिखा गया है। यह फ़िल्म २००२ में प्रदर्शित हुई थी एवं १९५६ में प्रकाशित इसी नाम के उपन्यास पर आधारित थी। वेद प्रकाश शर्मा ने इस फ़िल्म से प्रेरित होकर इसके कथानक का पूर्णतः भारतीयकरण करते हुए अपना यह उपन्यास लिखा जो कि एक अत्यन्त रोचक पुस्तक है।

उपन्यास का कथानक भविष्य के हत्यारों को (हत्या करने से पूर्व ही) पकड़ने वाले एक दल के कार्यकलापों को बताता है। इस दल को एक उद्योगपति सिंहानिया द्वारा बनाया गया है जो कि इस दल के माध्यम से कानून की सहायता करने की बात करता है। यह दल अपना काम एक अद्भुत शक्तियों वाले बालक विशेष के कारण कर पाता है जिसमें कि भविष्य में होने वाली हत्याओं को पहले से ही देख लेने की दैवीय क्षमता है। वह जब भी ऐसा कुछ देखता है, उसे इस दल को समय और स्थान की सूचना (जो उसे देखते हुए उपलब्ध हो सके) के साथ-साथ बताता है और फिर यह दल तुरंत उस हत्यारे को हत्या करने से रोकने के लिए संबंधित स्थान की ओर प्रस्थान कर देता है।

इस दल का मुखिया है एक भूतपूर्व कमांडो पारस श्रीवास्तव जो कि एक जांबाज़ युवक है। उसके अन्य साथी भी उसी की तरह साहसी एवं अपने-अपने कार्यक्षेत्र में प्रवीण हैं। पारस एवं उसके साथियों द्वारा कई हत्याओं को होने से पूर्व ही रोक लेने के पश्चात् जहाँ एक ओर सिंहानिया अपने वकीलों के माध्यम से न्यायालय में यह बात रखता है कि भविष्य के हत्यारों को भी वास्तविक हत्यारों की भांति ही दंडित किया जाना चाहिए (यद्यपि उन्हें हत्या नहीं करने दी गई), वहीं दूसरी ओर भविष्य के हत्यारों को पकड़ने के एक प्रोजेक्ट को स्वीकृति हेतु सरकार के पास भेजा जाता है। सरकार मुश्ताक़ नामक एक अधिकारी को विशेष की विशिष्ट क्षमताओं के सत्यापन एवं तदनुरूप इस प्रस्तावित प्रोजेक्ट पर अपनी जाँच रिपोर्ट देने हेतु भेजती है।

विशेष नामक इस बालक के बारे में सिंहानिया सबको यह बताता है कि उसने विशेष को उसके वास्तविक माता-पिता से गोद ले लिया है। उसे एक गोपनीय स्थान पर अत्यन्त कड़ी सुरक्षा में रखा जाता है ताकि कोई अपराधी उस तक न पहुँच पाए। लेकिन मुश्ताक़ सहित सभी लोग तब अचंभे में पड़ जाते हैं जब विशेष अपनी ही माता की हत्या होते देख लेता है और वह भी भूतकाल में। जब सब लोग विशेष के जन्मस्थल तक पहुँचते हैं तो पता चलता है कि हत्या वास्तव में हो चुकी है और वह विशेष के पिता ने की है जैसा कि विशेष ने देखा था। लेकिन मुश्ताक़ यह सिद्ध कर देता है कि विशेष का पिता निर्दोष है।

इधर मुश्ताक़ सरकार को विशेष की क्षमताओं एवं प्रस्तावित प्रोजेक्ट के संबंध में अपनी सकारात्मक रिपोर्ट देने का मन बना ही रहा होता है कि अचानक विशेष इस दल के मुखिया पारस को ही किसी की हत्या करते हुए देख लेता है। पारस यह जानकर भौंचक्का रह जाता है। उस पर दूसरा आघात यह होता है कि उसके पुत्र का कोई अपहरण कर लेता है। अब जहाँ दल एवं सिंहानिया पारस को यह समझाना चाहते हैं कि वह अपने आप को दल की सुरक्षा में रखे, वहीं मुश्ताक़ उसे भविष्य के हत्यारे के रूप में गिरफ़्तार करना चाहता है। लेकिन पारस को अपने पुत्र की चिंता है। वह भाग निकलता है। विभिन्न घटनाओं तथा कथानक में आए अनेक मोड़ों के उपरांत वास्तविकता का पता चलता है।

उपन्यास का नाम शिखंडी इसलिए रखा गया है क्योंकि महाभारत महाकाव्य में शिखंडी नामक एक पात्र है जिसकी ओट में से अर्जुन ने भीष्म पितामह पर बाण बरसाए थे और पितामह उनका उचित प्रत्युत्तर इसलिए नहीं दे पाए क्योंकि शिखंडी पूर्व में स्त्री था एवं पितामह ऐसे व्यक्ति पर प्रहार नहीं कर सकते थे; उपन्यास का केंद्रीय पात्र पारस शिखंडी की ही भांति है जिसकी ओट में से वास्तविक अपराधी अपनी चालें चलता है। पारस को शिखंडी बनाकर ही उसने अपने सम्पूर्ण षड्यंत्र का ताना-बाना बुना था।

उपन्यास चाहे वेद जी की मौलिक रचना नहीं है, इसे उनके श्रेष्ठ उपन्यासों में रखा जा सकता है। पाठक को आरंभ से अंत तक बांधे रखने वाला यह उपन्यास इस तथ्य को रेखांकित करता है कि मनुष्य की नाम कमाने की अभिलाषा भी उससे बहुत कुछ (उचित या अनुचित) करवा लेती है। उपन्यास में एक महात्मा जी का पात्र भी है जो कि दिव्य दृष्टि रखते हैं तथा पारस की सहायता करते हैं (जब वह अपने पुत्र को ढूंढ़ने एवं स्वयं को गिरफ़्तारी से बचाने हेतु भाग निकलता है)। इसमें पारस की पत्नी का पात्र भी है जो पारस से अलग हो चुकी है। उपन्यास में यह भी बताया गया है कि विशेष को जिस सुरक्षित स्थान पर रखा गया था उसके बाहर एक मानव-निर्मित वन है जिसमें अनेक हिंसक पशु हैं। इससे उपन्यास का वह अंश जिसमें पारस उस वन से होता हुआ विशेष तक पहुँचता है, पाठकों को रोमांचित कर देने वाला बन पड़ा है।

हिंदी के जिन पाठकों ने हॉलीवुड फ़िल्म माइनॉरिटी रिपोर्ट नहीं देखी है (एवं संबंधित पुस्तक नहीं पढ़ी है), उनके लिए शिखंडी को पढ़ना एक अद्भुत एवं रोमांचकारी अनुभव होगा। एक बार पढ़ना आरंभ कर देने के उपरांत इस उपन्यास को बीच में छोड़ना संभव नहीं है। अपने मूल प्रकाशन के वर्षों बाद भी यह ताज़गी भरा लगता है। वेद प्रकाश शर्मा की सशक्त लेखनी से निकला सरल हिंदी में लिखा गया यह असाधारण उपन्यास पाठकों को सम्मोहित कर देने वाला है, इसमें संदेह नहीं।

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बुधवार, 5 नवंबर 2025

वेद प्रकाश शर्मा और फ़ेयरफ़ैक्स स्कैंडल

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा सदैव समसामयिक विषयों पर अपनी क़लम चलाने में विश्वास रखते थे। जब भी कोई घटना राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित होने लगती थी, वे उस पर आधारित उपन्यास लिखने लगते थे (अथवा उस घटना को अपने उपन्यास में स्थान दे देते थे)। ऐसी ही एक घटना थी – १९८७ में भारत सरकार द्वारा फ़ेयरफ़ैक्स नामक अमरीकी संस्था को विदेशों में जमा भारतीय धन की जाँच का काम सौंपा जाना। कहा जाता है कि तत्कालीन भारतीय वित्त मंत्री वी.पी. सिंह ने यह कार्य अपने प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की सहमति के बिना किया था। इस बात पर संसद में विपक्ष ने बहुत शोर-शराबा किया था एवं अंततः सरकार ने इस मामले की जाँच हेतु एक आयोग का भी गठन किया था। आम जनता तो इस तथ्य से परिचित नहीं थी कि फ़ेयरफ़ैक्स संस्था वस्तुतः क्या थी एवं उसे भारत सरकार द्वारा क्या दायित्व सौंपा गया था किंतु समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं के माध्यम से कुछ ऐसी धारणा बन गई कि वित्त मंत्री तो ईमानदार थे एवं विदेशों में जमा काले धन का पता लगाना चाहते थे जबकि प्रधानमंत्री ऐसा नहीं होने देना चाहते थे। मामले का सत्य तो आज तक छुपा हुआ ही है किंतु वेद प्रकाश शर्मा को इस मामले में अपने विजय-विकास सीरीज़ के उपन्यास की विषय-वस्तु मिल गई एवं उन्होंने दो भागों में विभाजित एक विस्तृत कथानक अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर दिया।


इस कथानक के दो भागों के नाम हैं – 1. विजय और केशव पंडित तथा 2. कोख का मोती। वेद प्रकाश शर्मा ने इस उपन्यास में विजय, विकास तथा अपने इस सीरीज़ के अन्य स्थायी पात्रों के साथ-साथ अपने ही द्वारा सृजित केशव पंडित के पात्र को भी लिया। उपन्यास में उन्होंने फ़ेयरफ़ैक्स का नाम फ़ेवर फ़ैक्ट्स रख दिया तथा यह बताया कि यह संस्था कोबरा संगठन नामक एक विशाल अपराधी संगठन की एक शाखा थी। चूंकि यह धारणा थी (एवं अब भी है) कि काला धन स्विस बैंकों में रखा जाता है, वेद प्रकाश शर्मा ने उपन्यास में स्विस बैंक को स्वांग बैंक कहा। विजय और विकास भारतीय गुप्तचर हैं जिन्हें भारतीय सीक्रेट सर्विस के मुखिया द्वारा यह दायित्व सौंपा जाता है कि वे स्वांग बैंक में प्रधानमंत्री से संबंधित जो लॉकर है (जिसमें एक विशाल धनराशि जमा है), उसके स्वामित्व की जानकारी को किसी भी सूरत में सार्वजनिक न होने दें। इसके लिए उन्हें आवश्यकता है एक कलाई घड़ी (रिस्टवॉच) तथा अंगूठी (रिंग) की जिन पर स्वांग बैंक के संबंधित खाते के लॉकर नम्बर एवं लॉक नम्बर लिखे हुए हैं।

इधर केशव पंडित जो कि स्वयं वकील न होते हुए भी भारतीय कानून का ज्ञान वकीलों से अधिक रखता है, राजनगर (वेद प्रकाश शर्मा अपनी विजय विकास सीरीज़ के उपन्यासों का घटनाक्रम इसी काल्पनिक नगर में दर्शाते हैं) में अपनी एक संस्था खोल लेता है जो कि विभिन्न अपराधों में पकड़े गए व्यक्तियों को कानून से बचाने का कार्य शुल्क लेकर करती है। विकास जो कि ऐसी बातों को लेकर अपना आपा खो बैठता है, जाकर केशव एवं उसके कर्मचारियों से मारपीट करता है एवं दुकान को क्षतिग्रस्त कर देता है। अब केशव भी पलटवार करते हुए विकास को गिरफ़्तार करवा देता है। आइंदा घटनाक्रम कुछ ऐसी करवट लेता है कि विकास की मारपीट के कारण केशव की पत्नी सोनू का गर्भपात हो जाता है और उससे प्रतिशोध लेने के लिए केशव पंडित कोबरा संगठन में सम्मिलित हो जाता है। उसके उपरांत होते हैं केशव तथा विजय-विकास के साथ-साथ संपूर्ण भारतीय सीक्रेट सर्विस के बीच घात-प्रतिघात जो तब तक चलते हैं जब तक कि विजय-विकास रिस्टवॉच एवं रिंग प्राप्त नहीं कर लेते तथा उनके एवं केशव पंडित के मध्य की ग़लतफ़हमियां दूर नहीं हो जातीं। अंत में विजय-विकास तथा केशव पंडित कोबरा संगठन के मुख्यालय को भी नष्ट करवा देने में सफल हो जाते हैं।

वेद प्रकाश शर्मा ने उपन्यास एक बहुत बड़े कैनवास पर लिखा है जिसमें घटनाओं की भरमार है तथा विजय-विकास एवं केशव पंडित के टकराव को कोबरा संगठन की गतिविधियों तथा फ़ेवर फ़ैक्ट्स द्वारा स्वांग बैंक में लिए गए लॉकर के तथ्य से जोड़ा गया है। वेद जी ने केशव पंडित नामक पात्र का सृजन पृथक् रूप से किया था एवं कानून के अगाध ज्ञान के कारण वे उसे कानून का बेटा बताते हैं। केशव का पात्र इस उपन्यास में पूरी तरह से उभर कर आता है एवं उपन्यास के अधिकांश भाग तक ऐसा लगता है कि विजय-विकास एवं भारतीय सीक्रेट सर्विस के साथ अपने टकराव में केशव पंडित पूरी तरह दूसरे पक्ष पर हावी है। पर विजय-विकास सीरीज़ के उपन्यास में विजय-विकास की पराजय हो, यह संभव नहीं। उपन्यास के दूसरे भाग का नाम कोख का मोती इसलिए रखा गया है क्योंकि केशव अपनी पत्नी के (जिसका कि गर्भपात हो जाता है) गर्भ में पल रहे शिशु को कोख का मोती कहता है (जिसकी मृत्यु का प्रतिशोध उसे विकास से लेना है)।

इसके अतिरिक्त वेद जी ने विकास को जल्दी उत्तेजित हो जाने वाला तो बताया है पर साथ ही वे यह  भी बताते हैं कि विकास की देशभक्ति अटूट है एवं अपने देश के हित के लिए वह अपने प्राणों पर खेल जाने से भी नहीं हिचकता। वेद जी ने सदा यह भी बताया है कि विजय एक अत्यंत बुद्धिमान एवं ठंडे दिमाग़ वाला व्यक्ति है जो जल्दबाज़ी में कभी कोई ग़लत क़दम नहीं उठाता। वह शांत भाव से परिस्थिति पर विचार करता है एवं सूझबूझ से उचित निर्णय लेता है। उपन्यास में विजय-विकास सीरीज़ के अन्य पात्रों यथा सीक्रेट सर्विस के मुखिया ब्लैक ब्वॉय, अन्य सीक्रेट एजेंट, अंतर्राष्ट्रीय अपराधी अलफ़ांसे, विकास के माता-पिता (रैना एवं पुलिस सुपरिंटेंडेंट रघुनाथ), विजय के पिता ठाकुर निर्भयसिंह जो कि राजनगर पुलिस के इंस्पेक्टर जनरल हैं, धनुषटंकार अथवा मोंटो नामक बंदर (जिसकी देह में मनुष्य का मस्तिष्क है) आदि को भी समुचित स्थान दिया गया है।

जहाँ तक फ़ेयरफ़ैक्स (वेद जी के लिए फ़ेवर फ़ैक्ट्स) मामले का संबंध है, वेद जी ने अपना यह दृष्टिकोण बताया है कि भारत के प्रधानमंत्री तथा वित्त मंत्री दोनों ही ईमानदार थे। चूंकि लॉकर का लिया जाना गोपनीय राष्ट्रीय हितों से जुड़ा था, प्रधानमंत्री ने वित्त मंत्री से त्यागपत्र तो ले लिया किंतु उन दोनों ने लॉकर के रहस्य को उजागर नहीं होने दिया। वेद जी यह भी बताते हैं कि वित्त मंत्री को यह तथ्य पता नहीं था कि वह संस्था किसी अपराधी संगठन की शाखा है। इस प्रकार उन्होंने इस वास्तविक प्रकरण को अपने उपन्यासकार वाले मस्तिष्क से सुलझाते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री दोनों को ही दुग्ध-धवल बताया जो कि सच्चे मन से देश के हित के लिए कार्य कर रहे थे एवं संयोगवश ही यह स्कैंडल उठ खड़ा हुआ था जिसके लिए कोई दोषी नहीं था।

उपन्यास के दोनों ही भाग अत्यन्त रोचक हैं। जहाँ पहले भाग में विकास ही अधिक दोषी दिखाई देता है, वहीं दूसरे भाग में केशव पंडित एक अपराधी सरीखा दिखाई देने लगता है। विजय को भी वेद जी ने उपन्यास के अधिकांश भाग में विवश-सा दिखाया है (उसे केशव पंडित कोबरा संगठन की क़ैद में डलवा देता है) पर उस स्थिति में भी वह कौनसी चाल चल रहा है, यह उत्सुकता का विषय बना रहता है। जहाँ केशव का ध्यान अपने कोख के मोती की मृत्यु के प्रतिशोध पर केंद्रित है, वहीं विजय का ध्यान दोतरफ़ा है – एक ओर उसे विकास को केशव एवं कोबरा संगठन की शक्ति से बचाना है, दूसरी ओर लॉकर के रहस्य को गोपनीय बनाए रखने के अभियान (मिशन) को भी पूरा करना है। पाठक इतना तो अंदाज़ा लगा सकते हैं कि प्रमुख पात्रों में से कोई मरेगा नहीं तथा केशव पंडित भी अंततः कोबरा संगठन जैसे अपराधी संगठन के साथ काम नहीं करेगा लेकिन घटनाक्रम अपने चरम तक कैसे पहुँचेगा एवं लॉकर का रहस्य वास्तव में क्या है, यह जानने की उत्सुकता बनी रहती है। कोबरा संगठन के शक्ति-प्रदर्शन से आरंभ हुए इस उपन्यास का अंत विजय और केशव पंडित द्वारा कोबरा संगठन को पहुँचाई गई चोट से होता है। सभी प्रमुख स्थायी पात्र देशप्रेम से ओतप्रोत हैं।

उपन्यास प्रथम बार १९८७ में वेद प्रकाश शर्मा द्वारा आरम्भ की गई अपनी प्रकाशन संस्था तुलसी पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुआ था। अपनी रोचकता के साथ-साथ उन दिनों भारत में फ़ेयरफ़ैक्स मामले के सुर्खियां बटोरने तथा तत्कालीन वित्त (बाद में रक्षा) मंत्री के त्यागपत्र के संदर्भ में यह सामयिक भी था। आज भी इस विस्तृत कथानक को पढ़ना एक अलग ही अनुभव प्रदान करता है। यह वेद प्रकाश शर्मा के विजय-विकास सीरीज़ के संसार (उसमें उपस्थित परिवेश एवं पात्रों) से भी परिचय करवाता है। एक बार पढ़ना आरंभ कर देने के उपरांत इसे पूरा पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता। वेद जी तो दिवंगत हो चुके हैं किंतु उनका सृजन अब भी सुधी पाठकों हेतु उपलब्ध है एवं यह कथानक उनके श्रेष्ठ उपन्यासों में से एक है, इसमें संदेह नहीं।

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बुधवार, 13 नवंबर 2024

यह लिखा है

हिन्दी फ़िल्म 'ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा' (२०११) में विश्व-भ्रमण पर निकले तीन मित्र - ऋतिक रोशन, फ़रहान अख़्तर तथा अभय देओल अपनी यात्रा के दौरान एक दिन पुरानी बातों को याद करते हुए उन बातों के संदर्भ में एकदूसरे से कहते हैं - 'यह भी लिखा था, वो भी लिखा था'। अर्थात् जो बातें वाक़या हुईं, उनका होना पहले से ही क़िस्मत ने लिख दिया था यानी नियत था उनका होना; वह टल नहीं सकता था। क्या यह सच है ? क्या होनी (या अनहोनी) पहले से तय हो जाती है ? 

मुझे ऑस्कर पुरस्कार जीतने वाली फ़िल्म 'स्लमडॉग मिलियनेअर' विशेष पसंद नहीं आई थी किन्तु जिस बात ने मेरा ध्यान खींचा था, वह इस प्रकार थी - फ़िल्म के प्रथम दृश्य में परदे पर प्रश्न आता है - जमाल प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में भारी धनराशि जीतने की अवस्था में कैसे पहुँचा ? इस प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर भी परदे पर दिए गए हैं - अ‍. उसने बेईमानी की, ब. वह भाग्यशाली है, स. वह अत्यंत प्रतिभाशाली (genius) है, द. ऐसा होना लिखा है (it is written) अर्थात् ऐसा होना पहले से नियत था; उसके पश्चात् पूरे ढाई घंटे की फ़िल्म गुज़र जाती है तथा फ़िल्म के अंतिम दृश्य में प्रश्न का सही उत्तर परदे पर प्रकट होता है - द. ऐसा होना लिखा है (अर्थात् यह प्रारब्ध ने तय कर दिया था)।

मैं पुरुषार्थ की महिमा से भली-भांति परिचित हूँ तथा मानता भी हूँ कि मानव को पुरुषार्थ से कभी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। कृष्ण भी गीता में यही कहते हैं कि अकर्म में आस्था नहीं होनी चाहिए एवं गोस्वामी तुलसीदास भी मानस में यही कहते हैं-'दैव दैव आलसी पुकारा'। किन्तु कृष्ण गीता में यह भी कहते हैं कि आपका कर्म पर ही अधिकार है, फल पर नहीं। क्या अर्थ है इस बात का ? यही न कि कर्म करते रहो पर उसका फल या अभीष्ट आपके भाग्यानुसार (जैसा कि प्रारब्ध ने आपके लिए नियत कर दिया है) ही आपको मिलेगा ? 

मेरे जीवन में ऐसी अनेक घटनाएं घटी हैं जिनके होने की मैं स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकता था। और ऐसी भी अनेक घटनाएं घटते‌-घटते रह गई हैं जिनके होने के लिए मैं मानसिक रूप से बिल्कुल तैयार था और मानकर चलता था कि वे तो होंगी ही। अर्थात् जो सोचा, वो न हुआ एवं जिसके होने की दूर-दूर तक अपेक्षा न की, वो हो गया। क्या है इसका राज़ ? यही कि सृष्टि में जो कुछ भी होता है, वह पहले से तय है। विधि का विधान है वह जो टलता नहीं। और जो विधि के विधान में होना नहीं लिखा है, वह लाख प्रयत्न करने पर भी नहीं होने वाला।

आप मुझे भाग्यवादी कह सकते हैं। पर मैं सदा से भाग्यवादी नहीं था। मुझे भाग्यवादी बनाया है जीवन के निरंतर होते रहने वाले अनुभवों ने। अप्रैल २०२१ में जब मूर्धन्य कवयित्रियों वर्षा सिंह तथा शरद सिंह की माताजी विद्यावती जी अस्वस्थ थीं तो मेरे मन में कई बार आता था कि मैं किसी प्रकार उनसे सम्पर्क साधकर उनकी माताजी का कुशल-क्षेम पूछूं किन्तु मैं उनसे सम्पर्क करने का कोई साधन ढूंढ़ ही नहीं पाया। फिर जब उनकी माताजी के देहावसान का समाचार मिला तो उनके दुख में मैंने भी स्वयं को सम्मिलित अनुभव किया। लेकिन जब उनकी माताजी के देहांत के मात्र बारह दिन बाद ही वर्षा जी अकस्मात् चल बसीं तो मुझ पर जैसे वज्रपात हुआ। इतना समय बीत चुकने के उपरांत भी यदि मैं कहूँ कि मैं उस आघात से पूर्णतः उबर गया हूँ तो यह असत्य ही होगा। क्या स्पष्टीकरण है उनके असामयिक निधन का सिवाय इसके कि उनका जाना ऐसे ही लिखा था ? क्या हैं हम लोग ? क़िस्मत या प्रारब्ध या नियति के हाथ की कठपुतलियां, बस! होना तो वही है जो कर्म की रेख ने पहले ही लिख दिया है, आप चाहे जो कर लें। जो होना है, अपने वक़्त पर होकर ही रहेगा आप बचने के जितने चाहे प्रयास कर लें। और इसी तरह जो नहीं होना है, वो नहीं ही होगा आप उसे करने के चाहे जितने जतन कर लें।

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ने अपने उपन्यास 'रामबाण' में इस बात को रेखांकित किया है कि विधि के विधान में हस्तक्षेप किसी को नहीं करना चाहिए। विधि ने हमारे जीवन में जो एक अनिश्चितता रखी है (हम अपना भविष्य नहीं जान सकते), उसे स्वीकार करना चाहिए। जब होनी टल नहीं सकती और जो अनहोनी है, वो हो नहीं सकती तो भविष्य को जानकर भी हम क्या करेंगे ? 

जोसेफ़ मर्फ़ी ने अपनी विश्वविख्यात पुस्तक 'आपके अवचेतन मन की शक्ति' में यह प्रतिपादित किया है कि मनुष्य के अवचेतन मन में यह शक्ति है कि वह आपकी इच्छाओं को पूरा कर सकता है। कुछ सीमा तक उनका यह सिद्धांत ठीक लगता है किन्तु जब विभिन्न व्यक्तियों की इच्छाएं परस्पर विरोधी हो जाएं तो क्या होगा ? उत्तर स्पष्ट है - वही होगा जो पहले से नियत है, जो प्रारब्ध ने पहले ही सुनिश्चित कर दिया है। 

पच्चीस वर्ष पूर्व उनतीस मार्च, सन उन्नीस सौ निन्यानवे को मैं मुम्बई के बांद्रा स्टेशन पर चलती हुई रेलगाड़ी से नीचे जा गिरा। मेरे बाएं हाथ की हड्डी गंभीर रूप से टूट गई तथा मुझे दो बार शल्य-क्रिया से गुज़रना पड़ा। ठीक होने में महीनों लगे तथा मेरे हाथ में एक असामान्यता स्थायी रूप से आ गई। इसके कारण मैंने बहुत कुछ सहा पर अंततः यही माना कि शायद यह मेरे प्रारब्ध में लिखा था। मैंने इस घटना का उल्लेख अपने संघर्ष फ़िल्म पर लिखे गए लेख में किया है।

क़रीब दो माह पूर्व चार सितम्बर को मैं पुनः दुर्घटनाग्रस्त हो गया तथा मेरे हाथ की पच्चीस वर्ष पूर्व टूटी हड्डी पुनः टूट गई। एक बार पुनः मुझे शल्य-क्रिया तथा उसके बाद की जाने वाली चिकित्सकीय प्रक्रियाओं से गुज़रना पड़ा। इन दिनों मेरी फ़िज़ियोथेरापी चल रही है। एक बार फिर बहुत कुछ मैं सह गया (और अभी भी सह रहा हूँ)। मेरे साथ-साथ मेरे परिवार ने भी इसके कारण बहुत सहा है। इस बार तो दुर्घटना के पीछे मैं अपनी कोई ग़लती भी नहीं ढूंढ़ पा रहा। फिर यह क्यों हुई ? क्योंकि होनी लिखी थी। और इसका क्या स्पष्टीकरण हो सकता है ?

दुर्घटना तो फिर भी बड़ी बात है। मैंने तो अपने जीवन में पाया है कि ज़िन्दगी आपको क़दम-क़दम पर चौंकाती है (सरप्राइज़ देती है)। अच्छे सरप्राइज़ भी मिलते हैं, बुरे भी। जो आपको उल्लास से भर दें, ऐसे सरप्राइज़ भी और जो आपको आघात पहुँचाएं, ऐसे सरप्राइज़ भी। जीवन की छोटी-से-छोटी घटनाओं के पीछे ऐसे कारक हो सकते हैं जिन्हें समझ पाना अथवा जिनकी व्याख्या कर पाना संभव नहीं। आप कुछ न करना चाहें पर अगर आपके हाथ से कुछ ऐसा होना बदा हो तो बानक आप-से-आप ही ऐसे बनते चले जाते हैं कि आप वही करते हैं जो नहीं करने के लिए मन पक्का कर चुके थे। आपकी नियति आपको खींचकर उसी पथ पर ले जाती है और आप नियति की शक्ति के समक्ष विवश हो जाते हैं। इसीलिए कहा गया है - मेरे मन कछु और है, विधना के कछु और।

मैं आत्म-सुधार का विरोधी नहीं। अपनी भूलों को महसूस करके उनसे सबक़ सीखना और आगे के लिए ख़ुद में सुधार करना ही जीवन जीने का सही मार्ग है। बस बात इतनी-सी है कि हम प्रारब्ध (या नियति या विधि का विधान या कर्म की रेख या भाग्य) के अस्तित्व को स्वीकारें तथा बात-बात पर ख़ुद को (या दूसरों को) न कोसें। कभी-कभी इसी सोच से अपने मन को सांत्वना दें कि यही होना लिखा था।

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मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

वे सदा अपने प्रति ईमानदार रहे

(यह आलेख चार वर्ष पूर्व २७ अप्रैल, २०१७ को विनोद खन्ना के देहावसान के उपरांत लिखा गया था एवं मूल रूप से ३० अप्रैल, २०१७ को प्रकाशित हुआ था) 

हिन्दी फ़िल्मों के अत्यंत लोकप्रिय नायक तथा सांसद विनोद खन्ना के अस्वस्थ होने की बात विगत लंबे समय से सुनी जा रही थी  । तथापि उनके देहावसान के समाचार ने मुझे स्तब्ध कर दिया । जैसा कि स्वाभाविक ही है, उनके ऊपर कई श्रद्धांजलियाँ लिखी जा चुकी हैं जो प्रकाशित तथा आभासी दोनों ही संसारों में स्थान-स्थान पर बिखरी पड़ी हैं । लेकिन उनके जीवन और व्यक्तित्व पर सर्वाधिक उपयुक्त टिप्पणी मुझे माधुरी नामक लेखिका के इंटरनेट पर डाले गए आलेख के शीर्षक में मिली जो वस्तुतः प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र साहब की एक ग़ज़ल के एक शेर से लिया गया है – ‘मुहब्बत अदावत वफ़ा बेरुख़ी; किराये के घर थे, बदलते रहे’ । विनोद खन्ना का जीवन सचमुच ऐसा ही गुज़रा । लेकिन उन्होंने ज़िंदगी से कभी कोई शिकवा नहीं किया । वह जैसी उन्हें मिली, उन्होंने उसे वैसे ही जिया और भरपूर जिया । उनकी ज़िन्दगी की तहें जैसे-जैसे उनके सामने खुलती गईं, वे उन्हें वैसे-वैसे ही अपनाते गए बिना किसी अंतर्बाधा के, बिना किसी अपराध-बोध के; सदा अपने कर्तव्य का निर्धारण अपने विवेक-बल से करते हुए ।

पेशावर में जन्मे विनोद खन्ना विभाजन के उपरांत दिल्ली आ बसे एक पंजाबी व्यवसायी के पुत्र थे । पिता नहीं चाहते थे कि वे फ़िल्मी दुनिया का रुख़ करें लेकिन अपने मन में अभिनेता बनने की लगन लगा बैठे विनोद जा पहुँचे बंबई । उनकी प्रबल इच्छाशक्ति ने ही मानो प्रारब्ध का रूप धरकर उन्हें अनायास ही मिलवा दिया बॉलीवुड के चोटी के नायक और निर्माता सुनील दत्त से जो अपने भाई सोम दत्त को नायक के रूप में हिन्दी फ़िल्मों में स्थापित करने के निमित्त एक फ़िल्म बनाने की योजना पर काम कर रहे थे । विनोद खन्ना के रूप में उन्हें अपनी फ़िल्म का खलनायक मिल गया । फ़िल्म थी मन का मीत (१९६९) जो कि उसकी नायिका लीना चंदावरकर की भी पहली फ़िल्म ही थी । भाग्य को यही स्वीकार्य था कि वह फ़िल्म सोम दत्त के नहीं, विनोद खन्ना के करियर की आधारशिला बने । सोम दत्त की वह प्रथम फ़िल्म उन्हें तो उनका अभीष्ट नहीं दिला सकी लेकिन विनोद खन्ना के करियर रूपी वाहन को राजपथ मिल गया । अपनी प्रारम्भिक कुछ फ़िल्मों में वे खलनायक ही बने लेकिन इतने आकर्षक और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले युवक को खलनायक के रूप में कब तक प्रस्तुत किया जा सकता था ? उन्हें नायक ही बनना था और अंततः वे नायक ही बने । लेकिन इससे पूर्व उन्होंने मेरा गाँव मेरा देश (१९७१) में डाकू जब्बर सिंह की यादगार भूमिका निभाई । यही कथानक कुछ वर्षों के उपरांत सर्वकालीन सफलतम हिन्दी फ़िल्म शोले (१९७५) में सामने आया जिसमें डाकू का नाम जब्बर सिंह के स्थान पर गब्बर सिंह कर दिया गया । 

नायक के रूप में विनोद खन्ना की प्रथम फ़िल्म थी हम तुम और वो (१९७१) जिसके शुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में रचित प्रेम गीत – प्रिय प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी के शब्द तथा उन पर विनोद खन्ना का अभिनय दोनों ही आज भी देखने वालों के हृदय को गुदगुदा देते हैं । पुरुषोचित सौन्दर्य से युक्त अपने अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्व तथा अभिनय-प्रतिभा के कारण विनोद खन्ना नायक के रूप में अपने खलनायक रूप से कई गुना अधिक सफल रहे । उन दिनों दस्युओं की कथाओं पर बहुत फ़िल्में बनती थीं और उस दौर में दस्यु की भूमिका में विनोद खन्ना से अधिक प्रभावशाली और कोई नहीं लगता था । मेरा गाँव मेरा देश (१९७१), कच्चे धागे (१९७३), शंकर शंभू (१९७६), हत्यारा (१९७७) और राजपूत (१९८२) जैसी फ़िल्में इस बात का प्रमाण हैं । 

अधिकांशतः मुख्यधारा की फ़िल्में करने के बावजूद विनोद खन्ना ने कई परिपाटी से हटकर बनाई गई सार्थक फ़िल्में भी कीं । असाधारण साहित्यकार और कवि गुलज़ार ने जब फ़िल्म बनाने का निश्चय किया तो बेरोज़गार युवाओं की भटकन के विषय पर आधारित अपनी फ़िल्म मेरे अपने’ (१९७१) में विनोद खन्ना को एक प्रमुख भूमिका में लिया । और पच्चीस वर्षीय विनोद खन्ना ने इस उत्कृष्ट फ़िल्म में अपने यादगार अभिनय से सिद्ध कर दिया कि न तो उनमें प्रतिभा का अभाव था और न ही कार्य एवं कला के प्रति समर्पण-भाव का । जिन लोगों ने इस फ़िल्म में विनोद खन्ना को कोई होता जिसको अपना हम अपना कह लेते यारों गाते हुए देखा है, वे इस तथ्य के साक्षी हैं कि इस अमर गीत को गा रहे स्वर्गीय किशोर कुमार के स्वर में अंतर्निहित खंडित मन और एकाकीपन की पीड़ा को विनोद खन्ना ने चित्रपट पर साकार कर दिया है । उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो वे उस निभाए जा रहे चरित्र में उतरकर उसकी पीड़ा को स्वयं अनुभव कर रहे हों । लगभग यही स्थिति वर्षों बाद ऋषि कपूर और श्रीदेवी अभिनीत यश चोपड़ा की फ़िल्म चाँदनी (१९८९) के गीत लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है में भी मिलती है जिसे गाया तो सुरेश वाडकर ने लेकिन शब्दों और सुरों से प्रतिध्वनित होती पीड़ा को अपने हाव-भावों में प्रतिबिम्बित किया विनोद खन्ना ने । 

एक बार गुलज़ार साहब के साथ काम कर लेने के उपरांत विनोद खन्ना उनके प्रिय अभिनेता बन गए और गुलज़ार साहब ने अपनी अनेक फ़िल्मों में उन्हें लिया । ऐसी सभी फ़िल्मों में जो कि फ़ॉर्मूलाबद्ध न होकर कुछ भिन्न रंग लिए हुए थीं, विनोद खन्ना ने अपनी अमिट छाप छोड़ी । मुख्यधारा की प्रेम एवं अपराध आधारित फ़िल्मों में भी उन्होंने लीक से हटकर भूमिकाएँ कीं यथा इनकार (१९७७) एवं लहू के दो रंग (१९७९) । इस संदर्भ में इम्तिहान (१९७४) का नाम उल्लेखनीय है जिसमें उन्होंने एक आदर्शवादी प्राध्यापक की भूमिका निभाई है । हिन्दी सिनेमा में सत्तर का दशक केवल तथाकथित सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का ही नहीं, विनोद खन्ना का भी था । उस युग में अमिताभ बच्चन की अनेक फ़िल्मों की सफलता में विनोद खन्ना का भी बराबर का योगदान था और अमिताभ बच्चन की शिखर स्थिति को चुनौती देने वाला उन्हीं को माना जाता था । विनोद खन्ना ने अनेक बहुसितारा फ़िल्मों में भी काम किया लेकिन कई नायकों के मध्य रहकर भी उन्होंने किसी भी फ़िल्म में अपनी पहचान को खोने नहीं दिया । साहसी महिला फ़िल्मकार अरुणा राजे ने जब अपने पति विकास के साथ मिलकर (अरुणा-विकास के संयुक्त नाम से) पत्नी की स्वतंत्र सोच को दर्शाने वाली फ़िल्म शक़ (१९७६) बनाई तो उसमें उन्होंने शबाना आज़मी के साथ विनोद खन्ना को लिया और एक दशक से अधिक अवधि के उपरांत जब अकेले ही अत्यंत दुस्साहसी फ़िल्म रिहाई (१९८८) बनाई तो उसमें भी हेमा मालिनी के साथ विनोद खन्ना को ही लिया । इन नायिका प्रधान फ़िल्मों में भी विनोद खन्ना ने निस्संकोच काम किया और स्वयं को दिए गए चरित्रों के साथ पूरा न्याय किया । 

फ़िरोज़ ख़ान निर्मित क़ुरबानी (१९८०) की देशव्यापी सफलता ने विनोद खन्ना को सफलता के शिखर पर पहुँचा दिया । लेकिन तब उन्होंने वह कार्य किया जिसे करने की बात सोचना तक किसी भी सफल व्यक्ति के लिए कठिन है । मैंने अपने लेख सफलता बनाम गुण में लिखा है कि सफल व्यक्तियों की सोच प्रायः यह होती है कि सफलता के लिए कुछ भी त्यागा जा सकता है लेकिन किसी भी बात के लिए सफलता को दांव पर नहीं लगाया जा सकता । विनोद खन्ना ने स्वयं को अपवाद सिद्ध करते हुए १९८२ में फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध और उससे जुड़ी भौतिक सफलता एवं लोकप्रियता से किनारा कर लिया तथा आचार्य रजनीश (ओशो) के आश्रम में चले गए जो कि रजनीशपुरम (अमरीका) में था । मात्र ३६ वर्ष की आयु में भरपूर यौवन, धन-सम्पदा, सफलता, लोकप्रियता तथा परिवार के होते हुए भी सभी सुखों से पीठ फेरकर अध्यात्म की ओर उन्मुख हो जाने का असाधारण निर्णय एक असाधारण व्यक्ति ही ले सकता है । विनोद खन्ना सचमुच असाधारण ही थे जो सफलता का मोह छोड़ सके, उसके नशे से बाहर आ सके । उन्होंने अपने हृदय की पुकार सुनी और उसी के आधार पर निर्णय लेकर अपनी जीवन-यात्रा को एक नया मोड़ दे दिया । उन्होंने अपने इस निर्णय का बहुत बड़ा मूल्य अपनी पत्नी और अपने दो पुत्रों की माता गीतांजलि के साथ विवाह-विच्छेद के रूप में चुकाया । लेकिन संभवतः उन्होंने इन पंक्तियों को अपने व्यक्तित्व में आत्मसात् कर लिया था – हार में या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं; संघर्ष-पथ पर जो मिले, ये भी सही, वो भी सही । आश्रम में रहते हुए उन्होंने बरतन तक माँजे । लेकिन इस सरल-चित्त तथा अहंकार से मुक्त असाधारण पुरुष के लिए यह भी एक सामान्य बात ही थी । 

पाँच वर्ष तक स्वामी विनोद भारती के नाम से आचार्य रजनीश के सान्निध्य में रहने के उपरांत उनका मन पुनः सांसारिक कर्तव्य-पथ की ओर मुड़ा । वे रजनीश के प्रिय शिष्य थे, अतः स्वाभाविक रूप से रजनीश ने उनसे उनके साथ ही रहने तथा उनके कार्यकलापों में हाथ बंटाने के लिए कहा लेकिन विनोद ने उन्हें अत्यंत स्वाभाविक और सच्चा उत्तर दिया – अपने गुरु के साथ मेरी यात्रा यहीं तक थी । जीवन को सदा बहती धारा के रूप में देखने वाले विनोद जैसे पहले बंबई के फ़िल्म संसार में नहीं रुके थे, वैसे ही अब आश्रम के आध्यात्मिक संसार में भी नहीं रुके और अपने पुराने कर्मपथ पर लौट आए । लेकिन पाँच वर्ष के अंतराल के पश्चात् लौटने पर उनके पास अब न पूर्व में अर्जित सफलता थी, न संसाधन, न अर्द्धांगिनी । लेकिन कभी मन न हारने वाले विनोद खन्ना ने सम्पूर्ण साहस और आत्मविश्वास के साथ अपने भाग्य से पंजा लड़ाया और स्वयं को पुनः एक सफल नायक के रूप में स्थापित कर दिखाया । लौटते ही उन्होंने सत्यमेव जयते (१९८७) जैसी सार्थक फ़िल्म की जो कि न केवल व्यावसायिक रूप से सफल रही वरन उसकी चहुँओर प्रशंसा भी हुई । कुछ ही समय के उपरांत लोग उनके लिए कहने लगे कि जब वे गए थे, तब भी नंबर दो पर थे और जब लौटे भी तो सीधे नंबर दो पर ही लौटे । वापसी के उपरांत उन्होंने गुलज़ार साहब की मर्मस्पर्शी फ़िल्म लेकिन (१९९१) में भी प्रभावशाली भूमिका की । इस फ़िल्म में उन पर फ़िल्माए गए सुमधुर गीत सुरमई शाम इस तरह आए (जिसे सुरेश वाडकर ने गाया और हृदयनाथ मंगेशकर ने संगीतबद्ध किया है) को देखना एक अवर्णनीय अनुभव है । 

विनोद खन्ना ने अपने जीवन को सदा अपनी शर्तों पर जिया लेकिन अपने कर्तव्यों से कभी मुँह नहीं मोड़ा । इस तथ्य को उनकी प्रथम पत्नी से उत्पन्न पुत्र भी स्वीकार करते हैं । द्वितीय विवाह कर लेने के उपरांत भी उन्हें अपने प्रथम विवाह की संतानों के प्रति अपने कर्तव्य का सदा स्मरण रहा । उनके ज्येष्ठ पुत्र राहुल ने मुख्यधारा से पृथक् रहकर बनाई गई फ़िल्मों में प्रवेश किया जबकि कनिष्ठ पुत्र अक्षय के लिए उन्होंने स्वयं हिमालय पुत्र (१९९७) नामक फ़िल्म का निर्माण किया जिसमें उन्होंने अक्षय के पिता की भूमिका स्वयं ही निभाई । फ़िल्म व्यावसायिक रूप से असफल रही किन्तु अक्षय नायक के रूप में फ़िल्मों में स्थापित हो गए । वार्धक्य के साथ विनोद खन्ना अपनी आयु से सामंजस्य रखती भूमिकाओं की ओर मुड़े लेकिन तभी नियति ने उनके लिए एक और मार्ग प्रस्तुत किया । उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया तथा गुरदासपुर लोक सभा क्षेत्र से चार बार निर्वाचित हुए । वे केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री भी बने । जब एक बार उन्होंने चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा था, सानू गुरदासपुर नूं पेरिस बना दवांगा (मैं गुरदासपुर को पेरिस बना दूंगा) तो मैंने उनका उपहास किया था लेकिन आज मुझे लगता है कि वे किसी आदी झूठे भारतीय राजनेता की तरह नहीं बोल रहे थे बल्कि वही कह रहे थे जो वे करना चाहते थे और समझते थे कि कर सकते थे । इसका कारण यह है कि वे अपने जीवन में झूठ और पाखंड से सदा दूर रहे । २००४ में केंद्र में सत्ता-परिवर्तन हो जाने के कारण वे मंत्री नहीं रहे और बाद के वर्षों में उनका स्वास्थ्य गिरने लगा । संभवतः इसीलिए वे जनाकांक्षाओं और उनसे जुड़ी अपने मंशाओं पर भलीभाँति अमल नहीं कर सके । इसके अतिरिक्त सांसद और मंत्री बनने के उपरांत भी उन्होंने फ़िल्मों में काम करना नहीं छोड़ा जिसका कारण उन्होंने सार्वजनिक रूप से बिना किसी लागलपेट के सम्पूर्ण ईमानदारी के साथ यह बताया था, मेरी शानोशौकत की ज़िन्दगी है जिसके लिए पैसा चाहिए और पैसा केवल फ़िल्मों से मिल सकता है । सांसद और मंत्री के रूप में तो जो पैसा मुझे मिलता है, उससे गाड़ियों के पेट्रोल तक का खर्च चलना मुहाल है । यह उनके अपने प्रति ईमानदार होने का सबसे बड़ा प्रमाण था । न तो वे लोकदिखावे के लिए तथाकथित सादगी को ओढ़ना चाहते थे और न ही भ्रष्ट साधनों से कमाना चाहते थे । इसीलिए जब तक संभव हुआ, वे फ़िल्मों में काम करते रहे । 

पत्नी गीतांजलि से संबंध-विच्छेद के उपरांत विनोद खन्ना के एकाकी जीवन में उनके प्रारब्ध ने तब पुनः हस्तक्षेप किया जब उनकी भेंट कविता नामक युवती से हुई । आयु में बहुत अंतर होने के उपरांत भी और बॉलीवुड फ़िल्मों में विशेष रुचि न होने पर भी कविता ने उनके विवाह-प्रस्ताव को स्वीकार किया और विवाह के उपरांत न केवल उनके अकेलेपन को बाँटा वरन उनके प्रत्येक कार्य में उनकी सहयोगिनी और वास्तविक अर्थों में उनकी अर्द्धांगिनी बनकर दिखाया । संभवतः यही प्रारब्ध है जिसने दोनों का मिलना और जीवन साथी बनना पहले ही निर्धारित कर दिया था । कविता ने विनोद खन्ना को उनके जीवन के कठिन दौर में भावनात्मक संबल दिया और उनकी पत्नी के रूप में  साक्षी नामक पुत्र तथा श्रद्धा नामक पुत्री को जन्म दिया । विनोद खन्ना ने अपने दोनों विवाहों से विकसित परिवार को किस तरह एकजुट रखा, यह इसी से सिद्ध होता है कि दो बड़े पुत्रों के उपस्थित होते हुए भी उनकी अंतिम क्रिया उनके दूसरे विवाह से उत्पन्न पुत्र साक्षी ने की । 

कविता को विनोद से एकमात्र शिकायत सदा यह रही कि वे अपना अधिक समय ध्यान (मेडिटेशन) को दिया करते थे, उन्हें नहीं । लेकिन वर्षों तक अध्यात्म से जुड़े रहे विनोद ध्यान को आत्मिक शांति के लिए अत्यावश्यक मानते थे । इसी से उन्हें सदा आंतरिक शक्ति प्राप्त होती थी जो उन्हें परिस्थितियों से जूझने का हौसला देती थी । वस्तुतः यही वह आत्मबल था जिसने पहले उन्हें शोबिज़ की चमकीली दुनिया और उसमें मिली कामयाबी की चकाचौंध को छोड़ जाने का हौसला दिया और कुछ अरसे बाद फिर से वहीं लौटकर एक नई शुरूआत करने की भी हिम्मत और ताक़त दी । भौतिक सफलता, लोकप्रियता और सुख-सुविधाओं का आनंद उठा रहे कितने लोग ऐसा साहस कर सकते हैं और अपने आपको चुनौती दे सकते हैं ? 

उनके पुत्र अक्षय ने एक बार अपने पिता के संन्यासी होकर रजनीश के आश्रम में चले जाने के निर्णय का समर्थन करते हुए कहा था कि उन्होंने अपनी ख़ुशी को चुना और अगर आप ख़ुद ख़ुश नहीं हैं तो दूसरों को भी ख़ुश नहीं रख सकते । इस कथन ने मुझे स्वर्गीय वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यास शिखंडी के एक संवाद का स्मरण करवा दिया – स्वयं को पीछे रखकर किसी और के विषय में सोचना मृगतृष्णा होती है । पूर्णतः उचित बात कही है शर्मा जी ने क्योंकि आत्म-विकास करके ही मनुष्य स्वयं को परहित के निमित्त सक्षम बना सकता है, स्वयं की उपेक्षा करके कदापि नहीं  । विनोद खन्ना ने इस सत्य को समझा एवं आत्मसात् किया । उन्हें आजीवन किसी का भय नहीं रहा क्योंकि वे सदा अपने प्रति ईमानदार रहे । अपने साथी कलाकारों द्वारा सदा एक भद्रपुरुष (जेंटलमैन) के रूप में देखे गए विनोद खन्ना अपने जीवन को अपनी शर्तों पर अपने ढंग से पूर्ण संतोष के साथ इसीलिए व्यतीत कर पाए क्योंकि वे उसका मूल्य चुकाने से कभी नहीं कतराए । 

विनोद खन्ना के जीवन-दर्शन को उनकी फ़िल्म कुदरत (१९८१) में उन्हीं पर फ़िल्माए गए इस गीत के बोलों से समझा जा सकता है – छोड़ो सनम, काहे का ग़म, हँसते रहो, खिलते रहो । अपने जीवन के उच्चावचनों से गुज़रते हुए संभवतः वे इम्तिहान (१९७४) में स्वयं पर ही फ़िल्माए गए इस गीत के बोलों से प्रेरणा और ऊर्जा प्राप्त करते रहे - रुक जाना नहीं तू कहीं हार के, काँटों पर चल के मिलेंगे साये बहार के, ओ राही ओ राही  

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