बुधवार, 29 जून 2022

चालीस मिनट की ज़िन्दगी

कहते हैं ज़िन्दगी बरसों की नहीं, पलों की होती है। जीना तो बस उन पलों का ही होता है जो जी भरकर जी लिए जाएं और उन्हीं की यादों में बाक़ी की ज़िन्दगी गुज़ार दी जाए। वरना तो सुबह होती है, शाम होती है; उम्र यूँ ही तमाम होती है। बरसोंबरस गीली लकड़ी की तरह धुआँ छोड़ते रहने से कहीं बेहतर है एक बार भभक कर तेज़ी से जल उठना और फिर हमेशा के लिए बुझ जाना। मैदान चाहे जंग का हो या फिर खेल का या फिर कोई और, हर जगह यही मिसाल मौजूं होती है। बरसोंबरस भेड़ की तरह जीने की जगह एक दिन शेर की तरह जियो तो जानो कि ज़िन्दगी क्या होती है।

क्रिकेट का खेल आज बहुत लोकप्रिय हो चुका है और इसके कई छोटे प्रारूप सामने आ चुके हैं जो लंबे और धीमे समझे जाने वाले प्रारूप को लोकप्रियता के संदर्भ में पश्चगामी बनाते जा रहे हैं। लेकिन खेल का दो पारियों वाला लम्बा क्लासिक प्रारूप भी सदा धीमी गति का ही नहीं रहा। विस्फोटक बल्लेबाज़ जो चौके-छक्के मारकर तीव्र गति से रन बनाया करते थे, भी इस खेल के जन्म के उपरांत प्रत्येक युग में अवतरित हुए हैं जिन्होंने दर्शकों के लिए अविस्मरणीय बन जाने वाली पारियां खेलीं। एक शताब्दी से भी अधिक समय पूर्व घटित हुए एक ऐसे ही प्रसंग को आज मैं स्मरण कर रहा हूँ जिसे इस आलेख के प्रथम अनुच्छेद में वर्णित जीवन-दर्शन से संयुक्त करके देखा जा सकता है।

यदि किसी व्यक्ति की बाहें उसकी शेष देह के अनुपात में अधिक लम्बी हों तो उसे संस्कृत में आजानुबाहु कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि ऐसे व्यक्ति को तो किसी देश का राजा होना चाहिए। ६ मार्च१८८४ को इंग्लैंड के वेल्बेक नामक ग्राम में जन्मे एडविन बोअलर एलेटसन की बाहें तो ऐसी ही थीं लेकिन राजाओं वाली उसमें कोई बात नहीं थी। उसने क्रिकेट खेलना शुरु किया तथा युवा होते-होते नॉटिंघमशायर क्रिकेट क्लब से जुड़ गया। काउंटी क्रिकेट प्रतियोगिता प्रथम श्रेणी क्रिकेट की सर्वाधिक लोकप्रिय प्रतियोगिता आज भी है, उस युग में तो थी ही। १९११ में इसी प्रतियोगिता के एक मैच में एक दिन ऐसा आया जिसने एलेटसन को क्रिकेट के इतिहास में अमर बना दिया।


१८ मई १९११ के दिन इंग्लैंड के होव नगर में नॉटिंघमशायर का क्रिकेट दल ससेक्स के दल के विरूद्ध काउंटी प्रतियोगिता के अंतर्गत तीन दिवसीय मैच खेलने के लिए उतरा। एलेटसन वैसे तो बल्लेबाज़ी तथा गेंदबाज़ी दोनों ही किया करता था किन्तु स्थापित सत्य यही था कि उसने तब तक इन दोनों ही कार्यों में कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त नहीं की थी। उसे एकादश में प्रायः एक उपयोगी खिलाड़ी के रूप में सम्मिलित किया जाता था जो अपनी बलिष्ठ देह एवं चुस्ती-फुरती के कारण एक अच्छा क्षेत्ररक्षक था। उसका कुछ रन बना लेना या इक्का-दुक्का विकेट ले लेना ही उसके दल के लिए पर्याप्त होता था।

नॉटिंघमशायर ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए अपनी पहली पारी में २३८ रन बनाए जिसमें एलेटसन का योगदान केवल सात रनों का था। प्रत्युत्तर में ससेक्स ने शानदार प्रदर्शन करते हुए ४१४ रन बनाए तथा इस भांति पहली पारी में १७६ रनों की बड़ी बढ़त ले ली। एलेटसन ने गेंदबाज़ के रूप में केवल एक ओवर फेंका जिसमें उसे कोई विकेट नहीं मिला। 

पहली पारी में १७६ रनों से पिछड़ी नॉटिंघमशायर के दूसरी पारी में सात विकेट केवल १८५ रनों पर तब गिर चुके थे जब तीसरे और अंतिम दिन अर्थात्  मई १९११ को भोजनावकाश (लंच) से पूर्व एलेटसन नौवें नम्बर पर बल्लेबाज़ी करने के लिए मैदान में उतरा। एक नकारात्मक तथ्य यह भी था कि उस समय एलेटसन की कलाई में चोट लगी हुई थी। दूसरे छोर पर ली नामक बल्लेबाज़ था। सत्र में लगभग पचास मिनट का खेल बाक़ी था जिसमें एलेटसन ने अपेक्षा से बेहतर बल्लेबाज़ी करते हुए सैंतालीस रन बनाए लेकिन उसके दल के दो विकेट और गिर गए तथा स्कोर नौ विकेट पर २६० रन तक पहुँचा। हार का ख़तरा अभी भी नॉटिंघमशायर के ऊपर मंडरा रहा था। 

भोजनावकाश के उपरांत दूसरे सत्र में ४७ रनों पर खेल रहा एलेटसन अंतिम बल्लेबाज़ राइली के साथ अपने दल की दूसरी पारी को आगे बढ़ाने के लिए मैदान में वापस आया। दर्शकों, प्रतिपक्षी दल के खिलाड़ियों तथा खेल के विशेषज्ञों में से सम्भवतः किसी को भी इस पारी के कुछ और मिनटों एवं कुछ और रनों से अधिक चल पाने की आशा नहीं थी। लेकिन जो हुआ, वह किसी की भी कल्पनाओं से परे था। 

अगले चालीस मिनटों में होव के उस सेंट्रल काउंटी मैदान में जैसे कोई भयानक तूफ़ान आया जो ससेक्स के गेंदबाज़ों तथा क्षेत्ररक्षकों पर क़हर बनकर टूटा। आज के टी-20 क्रिकेट के दौर में भी ऐसी असाधारण बल्लेबाज़ी की कल्पना नहीं की जा सकती जैसी उन चालीस मिनटों में एलेटसन ने की। उसने अंतिम बल्लेबाज़ राइली के साथ अंतिम विकेट पर १५२ रन जोड़े जिनमें से १४२ रन उसने अकेले ही बना डाले। उसने ऐसेऐसे शॉट लगाए कि पाँच बार तो गेंदें ही स्टेडियम से बाहर जाकर खो गईं। आख़िर मैच के अम्पायरों ने गेंदों का नया डिब्बा ही खोल दिया। उसके दो शॉटों ने स्टेडियम के दो स्थानों पर शीशे तोड़ दिए। पहली पारी में पाँच विकेट लेने वाले ससेक्स के गेंदबाज़ किलिक के एक ही ओवर में एलेटसन ने चौंतीस रन बना डाले जो कि प्रथम श्रेणी क्रिकेट में एक ओवर में किसी बल्लेबाज़ द्वारा सर्वाधिक रन बनाए जाने का विश्व कीर्तिमान बन गया एवं कई दशक तक बना रहा। दर्शक ही नहीं, प्रतिपक्षी दल के खिलाड़ी भी बदहवास से उस मंत्रमुग्ध कर देने वाले बल्लेबाज़ी प्रदर्शन को देख रहे थे जो अविश्वसनीय था पर उनकी आँखों के सामने हो रहा था। ऐसी बल्लेबाज़ी हो रही थी जो उच्च श्रेणी के क्रिकेट में न पहले कभी देखी गई थी, न सुनी गई थी। मुश्किल से नब्बे मिनटों में खेली गई १८९ की अपनी उस पारी में एलेटसन ने तेईस चौके और आठ छक्के लगाए। उसकी यह कभी न भुलाई जा सकने वाली पारी तब समाप्त हुई जब कॉक्स नामक गेंदबाज़ द्वारा डाली गई गेंद पर सीमा रेखा पर खड़े स्मिथ नामक क्षेत्ररक्षक ने उसका कैच पकड़ लिया। ख़ास बात यह थी कि एलेटसन फिर भी आउट नहीं था क्योंकि कैच लेते समय स्मिथ का एक पैर सीमा रेखा (बाउंड्री वॉल) के बाहर था, अतः खेल के नियमों के अनुसार वह एक और छक्का था। एलेटसन चाहता तो अभी और खेलता रह सकता था और शायद वह प्रथम श्रेणी क्रिकेट के सबसे तेज़ दोहरे शतक का ऐसा कीर्तिमान भी बना सकता था जो एक सदी में भी न टूट पाता। लेकिन उसका मन भर गया था। शायद चालीस मिनट में वह एक पूरी ज़िन्दगी जी चुका था। वह बिना कुछ कहे या अम्पायर की ओर देखे पैविलियन लौट गया।

एलेटसन की इस ऐतिहासिक पारी की बदौलत नॉटिंघमशायर ने अपनी दूसरी पारी में ४१२ रन बनाए और हारने की हालत से जीतने की हालत में जा पहुँची लेकिन समय समाप्त हो जाने के कारण वह मैच ड्रॉ (अनिर्णीत) रहा।

एलेटसन ने उसके बाद कभी शतक नहीं बनाया और तीन साल बाद उसका क्रिकेट करियर भी समाप्त हो गया लेकिन उसे क्रिकेट के इतिहास में अमर बना देने के लिए उसकी वह एक पारी और उस पारी के भी अंतिम चालीस मिनट ही काफ़ी रहे।

© Copyrights reserved

रविवार, 8 मई 2022

काश्मीरी पंडितों के दर्द की पहली सिनेमाई आवाज़

ऐसा कहा जाता है कि यदि किसी झूठ को बार-बार दोहराया जाए तो लोग उसे सच मानने लगते हैं। कुछ ऐसा ही इस वर्ष प्रदर्शित हिंदी फ़िल्म 'द कश्मीर फ़ाइल्स' के साथ है जिसके निर्माता उसे जनवरी १९९० में काश्मीर घाटी में काश्मीरी पंडितों पर हुए ज़ुल्मों तथा उनके अपने वतन को छोड़ने की मजबूरी पर बनाई गई पहली फ़िल्म बता रहे हैं, बार-बार बता रहे हैं, ढोल बजा-बजाकर बता रहे हैं। उनके इस शोर का मक़सद अपने झूठ को जनता के गले उतारना और अपनी फ़िल्म से ज़्यादा-से-ज़्यादा मुनाफ़ा कमाना है जबकि सच्चाई यह है कि इस तल्ख़ हक़ीक़त पर बनाई गई पहली फ़िल्म थी - 'शीन' (२००४)।

'शीन' काश्मीरी पंडित समुदाय की व्यथा की कथा कहती है एक संवेदनशील एवं आदर्शवादी शिक्षक पंडित अमरनाथ (राज बब्बर) एवं उनके परिवार के कटु अनुभवों के माध्यम से जो उन्हें १९९० में तब हुए जब उन्हें अपना घर, अपनी मिट्टी, अपनी मातृभूमि से पलायन करना पड़ा। आरंभ में वहीं रहने पर कटिबद्ध पंडितजी और उनकी धर्मपत्नी जनक रानी (किरण जुनेजा) अपने लाड़ले बालक की अलगाववादियों के हाथों मृत्यु का कभी न भर सकने वाला घाव अपने हृदय पर लेकर अंततः अपनी पुत्री शीन (शीन) के साथ घाटी में अपना घर छोड़कर जम्मू स्थित विस्थापितों के शिविर में जाने पर विवश हो गए। पंडितजी का हृदय इस तथ्य से विदीर्ण हो गया कि उनका शिष्य शौकत (अनूप सोनी) जिसे वे अपना समझते थे, पाकिस्तान समर्थित अलगाववादियों के साथ हो गया तथा वही उनके पलायन का निमित्त बना। घर एक बार छूटा तो छूटा। लौटना तो एक सपना ही बनकर रह गया - ऐसा सपना जो कभी पूरा न हो सका, जिसके कभी पूरा हो सकने की उम्मीद भी वक़्त के साथ-साथ धुंधली पड़ती चली गई। उनकी पुत्री शीन जो अपने प्रेमी मानू (तरूण अरोड़ा) के साथ विवाह करके अपना एक सुखी संसार बसाने का सपना देख रही थी, शौकत की चलाई हुई गोलियों से घायल होकर उस समय जीवन और मृत्यु के मध्य झूल रही थी जब पंडितजी अपने उत्पीड़ित समाज की अंतहीन व्यथा को जेनेवा में हुए एक सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अभिव्यक्त कर रहे थे और विश्व समुदाय से साथ देने के लिए आह्वान कर रहे थे। गुमराह शौकत की भी आँखें तो खुलीं लेकिन तब जब बहुत देर हो चुकी थी।

'शीन' काश्मीरी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है - बर्फ़। फ़िल्म की नायिका के नाम पर ही फ़िल्म का शीर्षक रखा गया है तथा शीर्षक भूमिका निभाने वाली नवोदित अभिनेत्री को भी उसके वास्तविक नाम को परिवर्तित करके 'शीन' ही नाम दे दिया गया है। फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अशोक पंडित स्वयं मूल रूप से काश्मीरी पंडित ही हैं तथा उन्होंने यह फ़िल्म पूर्ण निष्ठा एवं संवेदनशीलता के साथ बनाई है। जो सत्य है, उसे बिना किसी लागलपेट के यथावत चित्रित किया गया है परंतु बात स्नेह, सहयोग एवं संवेदना की ही की गई है; घृणा की नहीं जबकि वे चाहते तो ऐसा भी कर सकते थे। अट्ठारह वर्ष पूर्व ७ मई, २००४ को प्रदर्शित 'शीन' कोई अत्यन्त श्रेष्ठ फ़िल्म चाहे न हो, एक प्रशंसनीय फ़िल्म निश्चय ही है - अपने ही देश में शरणार्थी बना दिए गए एक उत्पीड़ित समुदाय की असहनीय पीड़ा को स्वर देने वाली सत्यनिष्ठ कृति, काश्मीरी पंडितों के दर्द की पहली सिनेमाई आवाज़। 


एक समीक्षक के रूप में मैं फ़िल्म में कमियां निकाल सकता हूँ - जैसे कि कुछ प्रसंगों को आधे-अधूरे ढंग से चित्रित किया जाना, यह न बताया जाना कि खलनायक शौकत किस प्रकार एक अच्छे युवक से जिहादियों के रंग में रंग जाने वाला मज़हबी अलगाववादी बना, निर्देशक का युवा कलाकारों से उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय न करवा पाना, युवा नायक-नायिका की प्रेमकथा को अधिक महत्व दिया जाना आदि लेकिन एक सार्थक प्रयास की सराहना ही होनी चाहिए, आलोचना नहीं। अनुभवी फ़िल्म निर्देशक महेश भट्ट को इस फ़िल्म के निर्माण हेतु प्रेरणा देने का श्रेय देने वाले अशोक पंडित यदि डॉ० अग्निशेखर द्वारा रचित इस कथा के निर्देशन का कार्यभार किसी अनुभवी एवं निष्णात फ़िल्म दिग्दर्शक को सौंप देते तो सम्भवतः एक अधिक प्रभावी फ़िल्म बनती। पर जैसा कि मैंने पहले ही कहा, अशोक पंडित ने जिस भावना के साथ यह फ़िल्म बनाई है, वह स्तुत्य है तथा सराहना के योग्य है। 

युवा कलाकारों की तुलना में अनुभवी कलाकारों ने बेहतर अभिनय किया है। अनुभवी फ़िल्म तथा धारावाहिक लेखक रमन कुमार ने पटकथा लेखन में भी योगदान दिया है एवं फ़िल्म के संवाद भी लिखे हैं पर उनका काम कुल मिलाकर औसत से ऊपर नहीं उठ सका। तौसीफ़ अख़्तर का पार्श्व संगीत फ़िल्म के भाव को सही ढंग से उभारता है, वहीं बिजोन दासगुप्ता का कला-निर्देशन एवं नदीम ख़ान का छायांकन फ़िल्म को नयनाभिराम रूप प्रदान करते हैं। आँखों को ठंडक पहुँचाने वाले सुंदर दृश्यों से भरी हुई है यह फ़िल्म। और फ़िल्म के गीत-संगीत का तो कहना ही क्या ! जिन संगीत-प्रेमियों ने 'शीन' के गीत सुने हैं, वे मेरी इस बात की पुष्टि करेंगे कि जहाँ समीर ने सुंदर एवं सार्थक गीत रचे हैं, वहीं नदीम-श्रवण ने उन्हें अत्यन्त मधुर धुनों में ढाला है। फ़िल्म के गीतों को सुनना (तथा पटल पर देखना) एक अवर्णनीय अनुभव प्रदान करता है। 

फ़िल्म में कलेजे को चीर देने वाली यह सच्चाई भी दिखाई गई है कि अपने ही देश में शरणार्थी कहलाने का अपमान सहने वाले काश्मीरी पंडितों के साथ सरकारी तंत्र द्वारा उनके लिए लगाए गए शिविरों में कैसा दुर्व्यवहार किया जाता था जो प्रशासन द्वारा उनके जले पर नमक छिड़कना ही था। अपनी इज़्ज़त की ख़ातिर अपना घर छोड़कर आईं पंडित बहूबहनबेटियों की इज़्ज़त इन कैम्पों में भी महफ़ूज़ नहीं थी। भेड़िए यहाँ भी थे । बस उनके चेहरे अलग थे और जिस्मों पर सरकारी वर्दी थी।

फ़िल्म का अंत पीड़ित काश्मीरी पंडित समुदाय के लिए कोई (झूठी) आशाएं तो नहीं जगाता क्योंकि गिरगिट एवं लोमड़ी के मिलेजुले स्वभाव वाले राजनेताओं का वास्तविक रूप कुछ पहले ही दर्शा दिया गया है परन्तु खलनायक के साथ जो बीतती है एवं उसके उपरांत फ़िल्मकार जो संदेश देता है, वह शाश्वत जीवन मूल्यों में आस्था को ही पुनर्स्थापित करता है। उन्हें चाहे कितने ही आघात लगें एवं वे चाहे कितने ही अव्यावहारिक लगने लगें, जीवन के आदर्श अपने मूल स्वरूप में सदैव वांछनीय ही रहते हैं तथा उनसे भटककर कुमार्ग पर चलने वाले देरसवेर जान ही जाते हैं कि वे कहाँ मार्ग भटके थे और क्या पाप कर बैठे थे - यह अलग बात है कि तब उनके पास पश्चाताप करने का भी अवसर न रहे। 

'शीन' गाथा है उन नेकदिल लोगों की जो ज़ुल्म सहकर भी ख़ुद ज़ालिम नहीं बनते। फ़िल्म में स्पष्ट दिखाया गया है कि सीमापार से समर्थन पाए आतंकवादियों तथा उनके साथ जा मिले पथभ्रष्ट मुस्लिम युवकों के घातक लक्ष्य पर काश्मीरी पंडित तथा अन्य हिंदू ही नहीं, सिख तथा वे मुस्लिम भी थे जो उनके विरूद्ध थे एवं ग़ैर-मुस्लिमों की रक्षा करना चाहते थे। अपने पंडित एवं अन्य ग़ैर-मुस्लिम साथियों के हक़ में अपनी जान तक गंवा देने वाले वे मुस्लिम भाई उन दोगले नेताओं, अफ़सरों और पुलिस वालों से बहुत बेहतर थे जिन्होंने पंडितों की मुसीबतों की आँच पर अपनी ख़ुदगर्ज़ी की रोटियां सेकीं और अपने उन फ़रायज़ को अंजाम नहीं दिया जिनको अंजाम देकर वे हालात को बिगड़ने से बचा भी सकते थे और बिगड़ी को बना भी सकते थे। फ़िल्म नफ़रत का पैग़ाम नहीं देती, भाईचारे का ही देती है। 

फ़िल्म के निर्माण हेतु संसाधन लगाए हैं - सुब्रत रॉय की कंपनी सहारा इंडिया ने। सुब्रत रॉय ने अपने जीवन में अगर कुछ ग़लत भी किया तो बहुत-से अच्छे काम भी किए और अच्छे कामों में अपना निस्वार्थ सहयोग भी दिया। 'शीन' फ़िल्म के निर्माण हेतु अशोक पंडित की सहायता करना उनके इसी उदात्त चरित्र का प्रमाण है। 'शीन' को धनार्जन के निमित्त नहीं बनाया गया था, उसके निर्माण का आधार एक पवित्र भाव था। यही कारण है कि जहाँ 'द कश्मीर फ़ाइल्स' इस त्रासदी पर बनाई गई पहली फ़िल्म होने का झूठा प्रचार कर-करके अकूत धन कमा रही है, वहीं 'शीन' वस्तुतः ऐसी प्रथम फ़िल्म होकर भी बिसराई जा चुकी है। इसे यूट्यूब पर घर बैठे ही देखा जा सकता है। मैं सहारा-प्रमुख के उदार हृदय के समक्ष नतमस्तक हूँ एवं नियति के समक्ष उनकी निरूपायता को भी काश्मीरी पंडितों की निरूपायता के समान ही देखता एवं अनुभव करता हूँ। 

मैंने 'शीन' की अंग्रेज़ी में  समीक्षा  सन २०११ में की थी। आज 'द कश्मीर फ़ाइल्स' का अनर्गल प्रचार देखकर रहा नहीं गया तो हिन्दी में भी इस पर लिख दिया। बत्तीस वर्ष पहले जो काश्मीरी पंडितों पर बीती थी, उसका निराकरण न अट्ठारह वर्ष पूर्व 'शीन' के निर्माण तक हो पाया था, न ही ग्यारह वर्ष पूर्व मेरे समीक्षा लिखने तक हो पाया था, न ही आज तक हो पाया है। काश्मीरी पंडितों की आपदा को अवसर बनाकर दूसरों ने बहुत कुछ प्राप्त कर लिया किन्तु उन अभागों को अब तक न्याय नहीं मिला है, अपने घरबार वापस नहीं मिले हैं, अपनी मातृभूमि में पुनः जा बसने का सौभाग्य नहीं मिल सका है। सलमान रुश्दी की एक उक्ति याद आती है - निर्वासन (देशनिकाला) एक अंतहीन मिथ्याभास है जिसमें व्यक्ति सदैव पीछे देखते हुए ही अपने लिए आगे कुछ देख पाता है। कितनी पीड़ादायी अनुभूति होती है यह ! सदा एक मृगमरीचिका का स्वप्न देखते हुए जीना ! और उस स्वप्न को देखते-देखते ही मर जाना !

हे प्रभु, कभी किसी का घर न छूटे। और छूटे तो फिर से मिले। कभी किसी के दिल पर ज़ख़्म न लगें। और लगें तो उन पर मरहम भी लगे। वरना पुराने पड़ते-पड़ते ज़ख़्म लाइलाज नासूर बन जाते हैं। आज जब काश्मीरी पंडितों के लिए आई उस सियह रात के बाद इतना अरसा गुज़र जाने पर भी सियासतदां उनके लिए घड़ियाली आँसू बहाने और गाल बजाने के अलावा कुछ नहीं कर रहे हैं तो ये मज़लूम और बेबस लोग सिर्फ़ यही कह सकते हैं:

                                                    लिखा परदेस क़िस्मत में 
                                                    वतन को याद क्या करना 
                                                    जहाँ बेदर्द हो हाकिम 
                                                    वहाँ फ़रियाद क्या करना

© Copyrights reserved