सोमवार, 21 नवंबर 2022

संवेदनशील रचनाएं ! किसके लिए ?

चार दशक से अधिक पुरानी पुस्तकें पढ़ने की आदत एकाएक ही छूट गई। मन में कहीं कुछ ऐसा आघात लगा कि पढ़ना निस्सार प्रतीत होने लगा। समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं में अथवा ब्लॉग जगत पर भी कुछ पढ़ने को अब जी नहीं करता। लिखना भी अब न के बराबर ही है। फिर भी लिखना शायद इसलिए जारी रहेगा कि यह मेरे लिए अपने मन की घुटन को अल्फाज़ के ज़रिये बाहर निकाल देने का काम करता है। मैंने औरों के पढ़ने के लिए बहुत कम लिखा है। प्रायः आत्मसंतोष के निमित्त ही लिखता हूँ। बहुत बार ऐसा भी हुआ है कि लिखकर इंटरनेट पर डाला ही नहीं, बस लिखा और ख़ुद ही पढ़कर रख दिया - आगे कभी फिर से पढ़ने के लिए। जो कुछ भी लिखकर सार्वजनिक किया; उसे किसी ने पढ़ा तो भी ठीक, न पढ़ा तो भी ठीक। जितनी भी ज़िन्दगी अब बची है, उसमें कुछ  लिखने के लिए तो नज़रिया आगे भी शायद यही रहेगा। 

बचपन में ही समाचार-पत्रों तथा बाल-पत्रिकाओं को पढ़ने का ऐसा व्यसन मनोमस्तिष्क पर चढ़ा कि किशोरावस्था रही हो अथवा युवावस्था अथवा प्रौढ़ावस्था, पढ़ना कभी छूटा ही नहीं। आज अनुभव होता है कि मेरे स्वर्गवासी पिता कितने उदार थे जो परिवार की दुर्बल आर्थिक स्थिति के बावजूद केवल मेरे पठन के निमित्त प्रत्येक मास छः-सात बाल-पत्रिकाएं घर में आया करती थीं। अख़बार बांटने वाले स्वर्गीय गोपीलाल मालाकार जी के आगमन की मैं प्रतिदिन उत्सुकता से प्रतीक्षा किया करता था यह देखने हेतु कि किसी बाल-पत्रिका का नवीन अंक आया है अथवा नहीं। पिता के विद्यालय के पुस्तकालय की भी अधिकांश (संभवतः सभी) पुस्तकें मैंने घर पर ला-लाकर पढ़ डाली थीं (मेरी बाल्यावस्था में मेरे पिता एक राजकीय प्राथमिक पाठशाला में प्रधानाध्यापक थे, यह पाठशाला ग्रामीण क्षेत्र में स्थित एक छोटी-सी पाठशाला थी जिसमें दो ही अध्यापक होते थे तथा मेरे पिता प्रधानाध्यापक होते हुए भी तृतीय श्रेणी की वेतन-शृंखला के अंतर्गत ही थे)। कुछ वर्षों के उपरांत महाविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की तो महाविद्यालय के पुस्तकालय से भी हिन्दी साहित्य की पुस्तकें निर्गमित करवा-करवाकर पढ़ता रहा। किराये पर भी बहुत सारे बाल उपन्यास तथा कॉमिक पुस्तकें ले-लेकर पढ़ीं (उन दिनों बहुत कम दैनिक किराये पर पुस्तकें देने वाली दुकानें चला करती थीं)। इसी  समयावधि में (अर्थात् अपने विद्यार्थी जीवन में) अपने कस्बे में स्थित सार्वजनिक पुस्तकालय (वाचनालय) में नियमित रूप से जाता रहा तथा पत्र-पत्रिकाएं पढ़ता रहा। कोलकाता (कलकत्ता) में रहकर उच्च-शिक्षा प्राप्त करने की अवधि में भी अपने निवास (चित्तरंजन एवेन्यू) के निकटस्थ 'बड़ा बाज़ार' में संध्या को फ़ुटपाथ पर उपन्यासों के ढेर लगाकर बैठने वालों से ले-लेकर दर्ज़नों उपन्यास पढ़े। दो अंग्रेज़ी के तथा एक हिन्दी का समाचार-पत्र तो उन दिनों नियमित रूप से पढ़ता ही था। कहते हैं, शक्करख़ोरे को शक्कर और मूज़ी को टक्कर मिल ही जाती है। जब पहली नौकरी लगी (राजस्थान में सिरोही ज़िले में स्थित लक्ष्मी सीमेंट में) तो वहाँ भी अधिकारियों के क्लब तथा कार्मिकों के मनोरंजन केन्द्र में समृद्ध पुस्तकालय मिले जिनमें हिन्दी की ढेरों पुस्तकें थीं तो पढ़ने का शौक़ पूरा होता ही रहा, कोई कसर नहीं रही। फिर जीवन में चाहे जहाँ रहा, गद्य एवं पद्य दोनों ही की तथा हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों ही भाषाओं की पुस्तकें जमकर पढ़ीं। लुगदी साहित्य से लेकर उत्कृष्ट साहित्य एवं ज्ञानवर्धक पुस्तकें सभी पढ़ीं। हिन्दी तथा अंग्रेज़ी की पाक्षिक पत्रिकाएं पढ़ना भी दशकों तक जारी रहा। भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा देने हेतु मनोविज्ञान तथा समाजशास्त्र को अपने वैकल्पिक विषयों के रूप में चुना तो अध्यवसाय और अधिक बढ़ा तथा पठित सामग्री में और भी विविधता आई। जब सूझा कि कुछ लिखने का भी प्रयास किया जाए तो शीघ्र ही समझ में आ गया कि कविता हो अथवा शायरी, मेरे वश की नहीं थी। अतः गद्य में लिखने पर ही ध्यान लगाया। पर यह पढ़ने-लिखने का चस्का सन दो हज़ार बाईस में आकर मेरे मन से हटने क्यूं लगा ? 

संसार एवं समाज की अधिकतर समस्याओं व दुखों का कारण जो मैंने समझा है, वह है मानव में संवेदना का अभाव अथवा उसकी अल्पता। यह संवेदनहीनता ही है जो मनुष्य को अत्याचारी एवं अन्यायी बनाती है तथा यह संवेदनहीनता ही है जो प्रायः तथाकथित तटस्थ व्यक्तियों में दृष्टिगोचर होती है। सत्य से नेत्र मूंदकर स्वयं को तटस्थ मान लेने से वस्तुस्थिति परिवर्तित नहीं होती है। भले लोगों की तटस्थता ही बुरे लोगों को (या यूँ कहिये कि बुराई को) विजयी बनाती है। यह संवेदनहीनता का ही एक रूप है। बालकों में एक स्वाभाविक संवेदनशीलता होती है जो बड़े होने के साथ-साथ घटती चली जाती है क्योंकि यह समाज ही है जो सफलता को संवेदना पर वरीयता देता है तथा बालगोपालों से उनकी निर्दोषिता छीन लेता है (और इसी को समाजीकरण बताकर आप ही अपनी पीठ भी थपथपाता है)। राजेश रेड्डी साहब की एक मशहूर ग़ज़ल का एक शेर है - 

मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम-सा बच्चा
बड़ों की देखकर दुनिया, बड़ा होने से डरता है

जब जयजयकार सफलता की हो, संवेदनशीलता की नहीं तो संवेदना स्वतः ही पार्श्व में चली जाती है जबकि सफलता का जादू सर चढ़कर बोलता है। तथापि संवेदना का उदात्त भाव जितना असहाय आज है, उतना पूर्व में नहीं था (जब तथाकथित उदारीकरण एवं भूमंडलीकरण ने अपने पग नहीं पसारे थे तथा उपभोक्तावाद को सर्वोपरि नहीं बनाया था)। तब संवेदनशील व्यक्ति अधिक थे, सवेंदनाएं अपने मूर्त रूप में अधिक स्थलों पर दृष्टिगोचर होती थीं तथा प्राणिमात्र के प्रति संवेदना एक सर्वस्वीकार्य जीवन मूल्य था। यह वह समय था जब प्यासों को (नि:शुल्क) जल पिलाने हेतु प्याऊ स्थापित किए जाते थे, मिनरल वाटर की बोतलें एवं पाउच नहीं बेचे जाते थे। 

मैं पहले यह समझा करता था कि साहित्यकार (कवि एवं लेखक) तथा कलावंत संवेदनशील होते हैं। अंग्रेज़ी में मोपासां, ओ हेनरी, हैंस क्रिश्चियन एंडरसन, रस्किन बांड, गुरूदेव रवींद्रनाथ ठाकुर आदि की रचनाएं पढ़ीं; हिन्दी में प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, यशपाल, उषा प्रियंवदा आदि की कृतियां पढ़ीं; मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, रामधारीसिंह दिनकर. हरिवंशराय बच्चन, शिवमंगलसिंह सुमन, जयशंकर प्रसाद आदि की कविताएं भी पढ़ीं एवं काव्य भी पढ़े। बच्चन जी की सुदीर्घ आत्मकथा (चार खंडों में) भी पढ़ी। बांग्ला के मूर्धन्य लेखकों एवं लेखिकाओं (बिमल मित्र, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, आशापूर्णा देवी आदि) की रचनाओं के हिन्दी अनुवाद भी पढ़े। उर्दू साहित्य की भी कई कृतियों के देवनागरी संस्करण पढ़े। और लुगदी अथवा लोकप्रिय साहित्य में अगाथा क्रिस्टी, आर्थर कॉनन डॉयल, सिडनी शेल्डन, जॉन ग्रिशम, वेद प्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक, कर्नल रंजीत, टाइगर आदि की रहस्यकथाओं एवं थ्रिलरों के साथ-साथ गुलशन नंदा, कुशवाहा कान्त, रानू, प्रेम बाजपेयी, राजहंस आदि की सामाजिक रचनाओं को भी पढ़ने में कोई कोरकसर बाक़ी नहीं रखी। हिन्दी के लुगदी साहित्य में तो इतने नामों के (वास्तविक एवं छद्म, दोनों नाम वाले) लेखकों को पढ़ा कि सभी के नाम स्मरण रखना ही व्यवहारतः संभव नहीं। गोपालदास नीरज के गीत भी पढ़े तो ग़ालिब, फ़िराक़, दुष्यन्त कुमार, कुँअर बेचैन, परवीन शाकिर आदि की शायरी से भी नाता जोड़ा। संगीत में भी मन रमाया (चाहे सीख न सका) और सिनेमा-प्रेमी भी बना। लगा कि संवेदनशील कृतियों का सृजन करने वाले सृजनधर्मी स्वयं तो संवेदनशील होंगे ही। 

किसी सीमा तक यह बात मुझे आज भी सत्य के निकट लगती है जब ज़िक्र उस वक़्त का हो जो बीत चुका है। ज़िन्दगी को नज़दीक से देखे बिना प्रेमचंद, यशपाल, बिमल मित्र, रवींद्रनाथ ठाकुर, उषा प्रियंवदा, महादेवी वर्मा आदि अपनी कालजयी रचनाओं का सृजन नहीं कर सकते थे। न ही गुरु दत्त 'प्यासा' और 'काग़ज़ के फूल' जैसी अमर कृतियां रजतपट पर प्रस्तुत कर सकते थे यदि उन्होंने जीवन एवं संसार को निकट से न जाना होता। लेकिन अब ...

अब धीरे-धीरे ज़िन्दगी के तजुर्बात से गुज़रते-गुज़रते मुझे समझ में आ गया है कि अन्य विधाओं की भांति ही कला एवं साहित्य से सम्बद्ध विधाएं भी कुछ नैसर्गिक प्रतिभा एवं कुछ अभ्यास के आधार पर ही अवस्थित होती हैं जिसका संवेदनशीलता से नाता होना आवश्यक नहीं। चाहे कलाकार (गायक, गीतकार, संगीतकार, चित्रकार, शिल्पकार आदि) हों अथवा साहित्यकार (लेखक, कवि, नाटककार आदि); मानवीय राग-द्वेष-ईर्ष्या तथा अन्य विकारों से उसी भांति ग्रसित होते हैं जिस भांति अन्य प्रकार के सामान्य मानवगण। वे बातें चाहे जितनी परहित की करें, प्रधान उनके लिए भी निज हित ही होता है (अपवादों को छोड़कर)। कला तथा साहित्य से संबंधित संस्थाओं एवं मंचों में क्षुद्र राजनीति होने का और क्या कारण हो सकता है ? एक बार मैंने बांग्ला एवं अंग्रेज़ी की मूर्धन्य कवयित्री, लेखिका एवं समीक्षिका (वे उच्च कोटि की गायिका भी हैं) गीताश्री चटर्जी से अपना यह विचार साझा किया था तो उन्होंने इससे सहमति ही जताई थी। अंततः कला एवं साहित्य से आबद्ध मनुष्यों के बहुमत को भी सांसारिक सफलता (जिसमें भौतिक सुख-सुविधाएं तथा लोकप्रियता दोनों ही समाहित होती हैं) ही चाहिए। इसीलिए ऐसे व्यक्ति केवल विशुद्ध प्रतिभा के अवलम्ब पर नहीं चलते, भौतिक जगत में वांछित परिणाम देने वाले उपायों का भी अनुसरण करते हैं चाहे वे उनके घोषित आदर्शों के अनुरूप न हों। अन्यथा कविवर निराला एवं कवि प्रदीप की भांति घोर ग़रीबी का सामना करना पड़ सकता है। बानवे वर्ष से अधिक की आयु पाने वाली लता मंगेशकर के निधन पर श्रद्धांजलियों की बाढ़ आ जाती है जबकि मात्र बयालीस वर्ष की अवस्था में आर्थिक तंगी के मध्य प्राण त्याग देने वाली गीता दत्त को स्मरण करके पता नहीं किसी के मन में हूक भी उठती है या नहीं। जो सफल है, वही अभिनंदनीय है, वही पूज्य है। संवेदनाएं भी उसी की (चाहे वास्तविक हों या प्रदर्शनी) देखी और सराही जाती हैं।

मैंने हमेशा अच्छा इंसान होने को कामयाब इंसान होने पर तरजीह दी लेकिन ज़िन्दगी का ज़्यादातर हिस्सा बीत जाने पर (बहुत देर से) इस हक़ीक़त को समझ पाया कि दुनिया का चलन ऐसा है जिसमें अच्छे की अच्छाई और सच्चे की सच्चाई ही उसकी दुश्मन बन जाती है। संसार सफलता को पूजता है, सद्गुणों को नहीं (यद्यपि सैद्धांतिक रूप से ढोल सद्गुणों का ही बजाया जाता है)। मैं स्वयं को संवेदनशील मानता हूँ। क्या मैंने जीवन भर जो संवेदनशील रचनाएं पढ़ीं या सुनीं या देखीं, उन्होंने मुझे संवेदनशील बनाया ? नहीं ! उन्होंने मेरी उस संवेदनशीलता से संवाद स्थापित किया जो सदा से मेरे भीतर थी। इसीलिए अनेक संवेदनशील रचनाओं को पढ़कर मेरा मन आर्द्र हो उठा - बालपन में भी एवं वयस्क होने पर भी। तलत महमूद साहब के गाए हुए कई गीत और आशा भोंसले जी की गाई हुई कई ग़ज़लें सुनकर मेरी आँखों से जल की धाराएं बह निकलीं। वहीदा रहमान और राजेश खन्ना अभिनीत फ़िल्म 'ख़ामोशी' (१९६९) को मैं कभी बिना रोये पूरा देख ही नहीं सका तो लुगदी साहित्य के नाम से प्रचलित (सुरेन्द्र मोहन पाठक रचित) 'काग़ज़ की नाव' तथा (वेद प्रकाश शर्मा रचित) 'एक कब्र सरहद पर' जैसे उपन्यासों के पठन ने भी मेरे नयनों को अश्रुओं से भर दिया। साहित्य में तो सर्वाधिक प्रेमकथाएं ही रची गई हैं। जब पंडित चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी की 'उसने कहा था', जयशंकर प्रसाद जी की 'मदन-मृणालिनी' व 'पुरस्कार',  प्रेमचंद की 'प्रेम की होली' और शरत बाबू की 'मंदिर' जैसी कहानियां पढ़ीं; उषा प्रियंवदा जी कृत 'पचपन खंभे लाल दीवारें', गुलशन नंदा कृत 'जलती चट्टान', 'देव-छाया', 'सिसकते साज़' व 'सूखे पेड़ सब्ज़ पत्ते'; सुरेन्द्र मोहन पाठक कृत 'तीन दिन' और वेद प्रकाश शर्मा कृत 'सुहाग से बड़ा' जैसे उपन्यास पढ़े; 'राजस्थान पत्रिका' में धारावाही रूप से प्रकाशित अनंत कुशवाहा कृत 'जंतर बजता रहा', 'धोरों में दफ़न अमरप्रीत' और 'क्यूं ना जोही बाट' जैसी दुखांत प्रेम की गाथा कहने वाली चित्रकथाओं का अवलोकन किया तथा 'गूंज उठी शहनाई' (१९५९), 'सेहरा' (१९६३), 'दो बदन' (१९६६), 'मिलन' (१९६७), 'टाइटैनिक' (१९९७) और 'गैंगस्टर' (२००६)  जैसी फ़िल्में देखीं तो मन में यही ख़याल आया कि सच्चे मन से प्रेम करने वालों के भाग्य में वियोग नहीं होना चाहिए (केवल प्रेमी-प्रेमिका ही नहीं, अन्य रूपों में प्रेम करने वालों के संदर्भ में भी)। जूते-चप्पल, मोज़े या दस्तानों के किसी जोड़े में से भी एक खो जाता है तो मेरे मन में कसक-सी उठती है। लेकिन ...

लेकिन संवेदनशील रचनाओं के तो मुझ जैसे लाखोंकरोड़ों उपभोक्ता (पढ़ने, सुनने या देखने वाले) होते हैं। संवेदनशील रचनाएं उन पर कितना प्रभाव डालती हैं ? आज अपने अब तक के जीवन के सम्पूर्ण अनुभव को निचोड़ कर मैं निस्संकोच कह सकता हूँ कि वे उन्हीं को प्रभावित करती हैं, उन्हीं को पसंद आती हैं, उन्हीं की स्मृति का अंग बनती हैं जो पहले से ही संवेदनशील होते हैं। संवेदनहीन व्यक्ति या तो कला एवं साहित्य में अभिरुचि ही नहीं रखते या उतनी ही रखते हैं जितनी क्षणिक मनोरंजन हेतु आवश्यक हो। संवेदनशील कृतियों का प्रभाव उन पर उतना ही रहता है जितना चिकने घड़े पर पानी ठहरता है। संवेदना से ओतप्रोत सृजन को देखने या सुनने या पढ़ने से यदि किसी का मन भर आता है, हृदय विगलित हो उठता है तथा उस संप्रेषित संवेदना को वह अपने भीतर अनुभव करता है (या करती है) तो इसका अर्थ यही है कि वह दर्शक या श्रोता या पाठक मूल रूप से ही एक संवेदनशील मनुष्य है। संवेदनशील व्यक्ति का मन ही किसी रचना की संवेदना को अनुभूत कर सकता है, इसके निमित्त उस व्यक्ति का स्वयं कोई कलाकार अथवा लेखक अथवा कवि होना आवश्यक नहीं। 

मैंने अपना संवेदनशील स्वभाव अपने पिता से पाया जो किसी के भी दुख-दर्द से पिघल जाया करते थे एवं अपनी दुर्बल आर्थिक स्थिति के बावजूद जितनी सहायता जिस रूप में भी ऐसे किसी व्यक्ति की कर सकते थे, किया करते थे। लेकिन उनकी तो न साहित्य में रुचि थी, न संगीत में, न सिनेमा में और न ही अन्य ललित कलाओं में। और मैंने आयु के व्यतीत होने के साथ-साथ ऐसे कितने ही उच्च कोटि के कवि, श्रेष्ठ लेखक, मधुर गायक एवं अन्य विविध श्रेणियों के कलावंत देखे जिन्हें अपने निहित स्वार्थ के अतिरिक्त अन्य किसी विषय में रुचि नहीं थी। उन्हें अपने कार्यक्षेत्र में अपने प्रतिद्वंद्वी फूटी आँख नहीं सुहाते थे। और वे भौतिक सफलता प्राप्त करने हेतु अपने स्वाभिमान सहित किसी भी वस्तु एवं संबंध का परित्याग कर सकते थे। दूसरे की सफलता पर उनकी बधाई तथा दूसरे व्यक्ति की किसी भी बात हेतु उनकी प्रशंसा (स्पष्टतः) प्रदर्शन हेतु ही होती थी; मन से न वे बधाई देते थे, न प्रशंसा करते थे (वे आज भी वैसे ही हैं)। तो साहित्यकार अथवा कलावंत के रूप में जो संवेदनाएं उनमें अपेक्षित थीं, वे कहाँ गईं ? थीं भी या नहीं ? 

महान कवि सुमित्रानंदन पंत जी की अमर पंक्तियां हैं - वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान; निकलकर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान। पंत जी ने अपने समय के काव्य-सृजन की प्रवृत्ति के अनुरूप सत्यवदन ही किया था। हरिवंशराय बच्चन की अनेक भावुक कविताएं पहले उनकी प्रेयसी (जिसे आज की पीढ़ी soulmate कहती है) चम्पा एवं तदोपरान्त उनकी प्राणप्यारी अर्द्धांगिनी श्यामा के वियोग (अकाल मृत्यु) से ही उपजी थीं एवं यदि यह कहा जाए कि उन दोनों स्त्रियों के दुखांत ने ही उन्हें एक असाधारण कवि बनाया तो असत्य नहीं होगा। 'निशा निमंत्रण', 'एकांत संगीत' एवं 'आकुल अंतर' में संग्रहीत कविताएं उनकी सच्ची संवेदना की ही अभिव्यक्ति थीं। किन्तु आज अपवादों को छोड़कर ऐसा प्रतीत नहीं होता कि (हिन्दी भाषा) के कवि-कवयित्रियां जो थोक के भाव में कविताएं रचते हैं, मंचों पर सम्मान पाते हैं एवं समय-समय पर अपने काव्य-संग्रह प्रकाशित करवाते हैं, उनकी रचनाएं संवेदनोद्भूत होती हैं। 

स्वर्गीया डॉ. वर्षा सिंह ने अपने देहावसान से कुछ ही समय पूर्व प्रकाशित अपने एक लेख (कवि बनने का फ़ैशन बनाम पैशन) में इस तथ्य को रेखांकित किया है - काव्य-सृजन को लोग बहुत हलके ढंग से लेते हैं, शायद वे गंभीर होकर सृजन करना ही नहीं चाहते जबकि काव्य-सृजन एक गंभीर कार्य है; कोई भी सर्जक तब तक सृजन नहीं कर सकता है जब तक कि उसमें भावनाओं का विपुल उद्वेग न हो; जीवन की समस्त चेष्टाएं दो भागों में बंटी होती हैं - स्वहित और परहित जिनके बीच मनुष्यत्व की एक बारीक-सी रेखा होती है और जब यह रेखा मिट जाती है तो स्वहित और परहित एकाकार हो जाता है और यहीं मिलता है साहित्य का प्रस्थान बिन्दु जहाँ व्यक्ति की भावनाएं सकल संसार के हित में विचरण करने लगती हैं जिसमें धर्म, जाति, वर्ग, लिंग, रंग के भेद मिट जाते हैं।

मैं वर्षा जी के उपर्युक्त उद्गारों से पूर्ण रूप से सहमत हूँ। मेरा भी यही मानना है कि संवेदना निष्पक्ष होती है। संवेदनशील व्यक्ति वही है जो बिना किसी भी प्रकार के भेदभाव के पराये दर्द को अपना ले। संवेदनशीलता हृदय में होती है - कला अथवा प्रतिभा में नहीं। प्रतिभा से बहुत कुछ रचा जा सकता है किन्तु संवेदनशीलता से बिना कुछ रचे भी किसी के दुख-दर्द को बाँटा जा सकता है। अनुभूति कला पर निर्भर नहीं। और जैसा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'कविता क्या है' में प्रतिपादित किया था - जीवन की अनुभूति ही कविता है (यह तथ्य संवेदना से ओतप्रोत कथा पर भी लागू होता है)। लेकिन जब सृजन करने वाले ही निष्पक्ष न हों तथा उनकी अभिव्यक्तियां धर्म, जाति, वर्ग, लिंग, वर्ण, प्रांत अथवा उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता से प्रभावित होती हों तो उनकी अनुभूति का भी शुद्ध होना संभव नहीं। क्या लाभ ऐसे सृजन का समाज के निमित्त, समष्टि के निमित्त, सृष्टि के निमित्त ? कोरी प्रतिभा (और अभ्यास) से बहुत कुछ रचा तो जा सकता है लेकिन जैसा कि एक शायर ने कहा है - 

लाख जौहर हों आदमी में मगर
आदमीयत नहीं तो कुछ भी नहीं

अस्तु संवेदनशील रचनाएं उन्हीं के लिए होती हैं जो उन्हें पढ़े (या सुने या देखे) बिना भी संवेदनशील होते हैं क्योंकि वे ही उनसे प्रभावित हो सकते हैं, संवेदना से शून्य व्यक्ति नहीं। वास्तविक अर्थों में संवेदनशील व्यक्ति वही होता (या होती) है जो न केवल अपनी संवेदनाओं के संदर्भ में निष्पक्ष हो वरन अपने शत्रुओं से भी घृणा न करे। इसीलिए सलीब पर चढ़ा दिये जाने वाले ईसा मसीह और प्रार्थना सभा में गोलियों से भून दिए जाने वाले महात्मा गांधी का सिद्धांत यही था - पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। संवेदनशील व्यक्ति न्याय का समर्थक होता है, प्रतिशोध का नहीं। वह स्वयं दुख सह सकता है, किसी को दुख दे नहीं सकता। इसीलिए ऐसे व्यक्ति का जीना सरल नहीं होता। बहुत सुना था मैंने कि दुनिया है दिलवालों की लेकिन सच्चाई यही है कि यह दुनिया दिमाग़ वालों की ही है जहाँ या तो कामयाबी को पूजा जाता है या फिर दिखावे और पाखंड को। यहाँ प्यार पर पहरे लगाए जाते हैं लेकिन नफ़रत करने की ख़ुली छूट दी जाती है। दिलवाले ही संवेदनशील होते हैं जो ताज़िन्दगी दूसरों के ज़ख़्मों पर मरहम लगाते रहते हैं, किसी को ज़ख़्म देते नहीं; जो सारे जहाँ का दर्द अपने जिगर में रखते हैं चाहे उनका अपना हमदर्द कोई न हो। और जहाँ तक उनके अपने मुक़द्दर का सवाल है, उसे बयां करने के लिए एक शायर के ये अशआर ही काफ़ी हैं -

ज़ख़्म ही तेरा मुक़द्दर हैं दिल, तुझको कौन संभालेगा
ऐ मेरे बचपन के साथी, मेरे साथ ही मर जाना  

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गुरुवार, 6 अक्तूबर 2022

सत्य और न्याय ! कितने असहाय !

मुण्डकोपनिषद के एक श्लोक की सर्वज्ञात पंक्ति है - सत्यमेव जयते नानृतम। इसका अर्थ है कि सदा सत्य ही विजयी होता है, न कि असत्य। भारत के संविधान-निर्माताओं ने इसके एक भाग 'सत्यमेव जयते' को हमारे राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न का एक अंग बनाया तथा इसे हमारे न्यायालयों में भी न्यायासन के पश्च भाग पर (प्रायः) उल्लिखित देखा जा सकता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आजीवन सत्य के पथ पर चलने का निर्णय लिया तथा सत्य को ही ईश्वर का रूप माना। आज से कुछ दशक पूर्व जब मुझ जैसे व्यक्ति बाल्यावस्था में थे तो हमारी (हिन्दी माध्यम) की पाठ्यपुस्तकों में सद्गुणों पर बल देने वाले पाठ पढ़ाए जाते थे। इन सद्गुणों में सत्य बोलना (एवं उसके पथ पर चलना) भी सम्मिलित होता था। मैंने उसी काल में इस बात को अपने मन में भीतर तक स्थापित कर लिया। किन्तु जैसेजैसे मैं बड़ा होता गया और अपने चारों ओर उपस्थित संसार को देखता-समझता गया, मुझे धीरे-धीरे ही सही, यह वास्तविकता अनुभूत होती गई कि सत्य की विजय होती तो है परंतु सदा नहीं। मुझे यह भी सूझा कि सत्य का पथ पुष्पाच्छादित नहीं होता, कंटकाकीर्ण होता है जिस पर चलना बड़े साहस का कार्य है। असत्यवादियों एवं अन्याय के समर्थकों से घिरे रहकर सत्य का अनुसरण अत्यधिक कठिन होता है, यह बात देरसवेर सत्य का पथिक (मेरी तरह) समझ ही लेता है। चाणक्य शतकम् के एक श्लोक में उक्त है - चौराणाम् अनृतम बलम् अर्थात् चोरों का बल झूठ है। इसी बल से वे सत्य को असत्य तथा असत्य को सत्य प्रमाणित कर देते हैं तथा सच्चे व्यक्ति के मनोबल को तोड़ देते हैं। सम्भवतः इसीलिए यह चोरों का ही युग है। यह अपने आप में ही एक कटु सत्य है कि - 

यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है 
कई झूठे इकट्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है 

सत्य के सच्चे पथिक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जिन्होंने मूलतः तो गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की इन पंक्तियों को आत्मसात् करके चलना आरंभ किया था - यदि आपकी पुकार सुनकर कोई साथ न आए तो अकेले ही चलो - भी अंततः टूट गए थे। पूर्व में दीर्घायु होने के आकांक्षी बापू का अपने अंतिम वर्षों में जीवन से मोहभंग हो गया था। वे देख चुके थे कि लोग उनकी पूजा तो करते थे, उनके बताए हुए पथ पर नहीं चलना चाहते थे। किसी पर स्वार्थ हावी हो गया था तो किसी पर निजी दुख से भरी भावनाएं तो किसी पर उसकी कोई विवशता। यहाँ तक कि किसी-किसी का उनके विचारों से विश्वास ही उठ गया था (चाहे उसने कहा न हो)। बापू सब देख-सुन-समझ रहे थे पर अब वे जो हो रहा था, उसे रोकने हेतु कर कुछ नहीं सकते थे। सत्य सहित उनके सभी सिद्धांत घायल होकर कराह रहे थे जिनकी पीड़ा का स्वर भी अब बधिर कानों पर ही पड़ रहा था। वे तीस जनवरी उन्नीस सौ अड़तालीस को नहीं मरे, भीतर से वे बहुत पहले ही मर चुके थे। मेरी दिवंगत माताजी अपने पिता (मेरे नाना) के साथ उनकी अंतिम यात्रा में सम्मिलित हुई थीं। सम्भवतः इस तथ्य का भी कुछ प्रभाव मेरे अपने व्यक्तित्व पर पड़ा हो। पर जब हृदय के सत्य का साक्षात् संसार के सत्य से हुआ तो जो मैंने पाया उससे मैं हतप्रभ रह गया। अपने विद्यार्थी जीवन से लेकर अपने कार्यशील जीवन (करियर) तक विगत अनेक दशकों में मैंने सत्य को (लगभग) प्रत्येक चरण पर एवं प्रत्येक स्थिति में पराजित होते हुए देखा और ... और आज भी देखता हूँ। ऐसे में 'सत्यमेव जयते' की उक्ति पर मैं कैसे विश्वास करूं ?

न्याय सत्य का ही एक पक्ष है क्योंकि अन्याय होने का अर्थ ही है सत्य पर प्रहार होना। अतः सत्य की पुनर्प्रतिष्ठा ही न्याय है। यदि सचमुच कभी सतयुग रहा होगा तो उसमें अन्याय अनुपस्थित ही रहा होगा। न्यायालय की दीवार पर 'सत्यमेव जयते' लिखे जाने का अभिप्राय ही यही है कि न्याय सत्य में ही समाहित है। सत्य की जय होगी तो न्याय की जय स्वतः ही हो जाएगी। सत्य की पराजय ही अन्याय की विजय है तथा आदर्श स्थिति यही है कि ऐसा न होने पाए। आज तो सतयुग नहीं है, आज तो कलयुग है। अन्याय दिन-प्रतिदिन होते हैं तथा अन्याय-पीड़ित न्याय की गुहार लगाते रहते हैं। जिसकी गुहार सही स्थान पर सुन ली जाए, उसके लिए कोई आशा रहती है (कभी-न-कभी) न्याय मिलने की और जिसकी गुहार किसी सही स्थान पर न पहुँच सके, उसके लिए घुट-घुटकर मर जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रहता। बहुत-से अन्याय-पीड़ित (इसमें पीड़िताएं भी सम्मिलित हैं) सम्भवतः इसीलिए आत्मघात कर लेते हैं क्योंकि उन्हें न्याय मिलने की (झूठी ही सही) कोई आशा नहीं रहती। न्याय प्रदान करने की अति-विलम्बित प्रक्रिया भी वस्तुतः अन्यायियों के पक्ष में ही कार्य करती है। आततायी इसीलिए निर्भय होकर अत्याचार करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनका दुष्कार्य तो तुरंत पूर्ण हो जाएगा किन्तु पीड़ित (या पीड़िता) को न्याय पाने में (अत्यन्त कठिन प्रयास करने पर) वर्षों लगेंगे, हो सकता है कि सम्पूर्ण जीवन ही लग जाए और उस पर भी आवश्यक नहीं कि न्याय मिल ही जाए। अतः यह प्रक्रिया ही निर्दोष के साथ एक प्रकार का प्रच्छन्न अन्याय है जो आततायी को अनुचित बल प्रदान करता है, उसे और अधिक अन्याय एवं अत्याचार करने हेतु दुस्साहसी बनाता है। अति-विलम्ब से हुआ न्याय वस्तुतः न्याय होता भी नहीं क्योंकि दुर्बल हेतु तो देर ही अंधेर है। 

आज का युग बहुमत का युग है तथा जब बहुमत स्वार्थियों का हो तो सत्य एवं न्याय की परवाह कौन करे ? स्वार्थी प्रायः एकत्र होकर असत्य एवं अन्याय का प्रसार करते रहते हैं क्योंकि उनके निहित स्वार्थ उन्हें जोड़े रखते हैं जबकि सत्य के पथिक एवं न्याय की स्थापना हेतु प्रयासरत व्यक्ति प्रायः अकेले पड़ जाते हैं। व्यवस्थाएं क्रूर एवं संवेदनहीन होती हैं जिनमें हाड़-मांस के बने व्यक्तियों के दुख-दर्द से अधिक महत्वपूर्ण निर्जीव नियम एवं तर्कहीन प्रक्रियाएं होती हैं। अतः व्यवस्थाएं प्रायः अपने घोषित उद्देश्यों के विरूद्ध ही कार्य करती हैं। हमारे देश में न्याय बिकाऊ है और इसीलिए वह सामान्य व्यक्ति की पहुँच से बाहर होता हैं। नामी वकील बड़े महंगे होते हैं जिनकी सेवाएं साधन-सम्पन्न लोग ही क्रय कर सकते हैं। इसीलिए निर्धन व्यक्ति अन्यायियों के लिए सुलभ शिकार होते हैं जो न्याय की अंतहीन प्रतीक्षा में मर ही सकते हैं, न्याय प्राप्त नहीं कर सकते। 

ऐसा क्यों होता है ? ऐसा इसलिए होता है कि सृष्टि का व्यापार शक्ति-संतुलन पर आधारित होता है। किसी भी द्वंद्व में विजय उसी की होती है जिसका निर्णायक क्षण में पलड़ा भारी होता है। यही कारण है कि आदर्श भले ही 'सत्यमेव जयते' हो, यथार्थ तो 'शक्तिमेव जयते' ही है। सौ में से निन्यानवे अवसरों पर असत्य एवं अन्याय का ही पलड़ा भारी होता है, वे सत्य एवं न्याय से अधिक शक्तिशाली होते हैं; और इसीलिए जीतते हैं। अपवादस्वरूप किसी एक अवसर पर सत्य एवं न्याय का पलड़ा (अनुकूल परिस्थितियों के कारण) भारी हो जाता है तो उनकी विजय हो जाती है तथा हम उसी से अति-प्रसन्न होकर उत्सव मनाने लगते हैं। वस्तुस्थिति तो यही है कि सत्य की स्थापना तथा न्याय की प्राप्ति के निमित्त भी सामर्थ्य चाहिए। और अन्यायी प्रायः समर्थ ही होते हैं। तभी तो वे अन्याय कर पाते हैं। तथाकथित न्याय-व्यवस्था उन्हीं की पक्षधर होती है। गोस्वामी तुलसीदास तो शताब्दियों पूर्व ही कह गए हैं - समरथ को नहिं दोष गुसाईं। 

आज भारत में धनबल एवं सत्ताबल के अहंकार में चूर आततायी इस सीमा तक निर्मम (एवं परपीड़क) हो चुके हैं कि वे उत्पीड़ित से यह भी अपेक्षा करते हैं कि वह अपने साथ हुए अन्याय एवं अत्याचार को मौन रहकर सह जाए तथा न्याय प्राप्ति हेतु प्रयास ही न करे। अगर वह किसी से अपने साथ हुए ज़ुल्म की फ़रियाद भी लगा दे तो इसे भी उसकी एक और ग़लती मानकर उस पर और अधिक ज़ुल्म ढाया जाता है। यानी कि जबरा मारे और रोने भी न दे। और यदि कोई संवेदनशील व्यक्ति (या संस्था) ऐसे असहाय पीड़ित (या पीड़िता) को व्यवस्था द्वारा न्याय दिलाने का प्रयास करे तो उसे भी आततायी अपने शत्रु के रूप में ही देखते हैं तथा उसे भी ठिकाने लगा देने की जुगत करने लगते हैं (प्रायः इसमें सफल भी होते हैं) ताकि फिर से कोई किसी बेबस को इंसाफ़ दिलाने की जुर्रत करने के लिए न उठ खड़ा हो। तो ऐसे में अकेले पड़ चुके आहत का हाथ कौन थामे ? बेसहारा का सहारा बनने की हिम्मत कौन करे ?

भारत में एक अरसे से लोग कानून को अपने हाथ में लेते आ रहे हैं क्योंकि वे न तो इंसाफ़ को ख़रीद सकते हैं और न ही उन्हें कानून और उसके नुमाइन्दे यह यकीन दिला पाते हैं कि उन्हें इंसाफ़ मिलेगा। एक शताब्दी से भी अधिक समय पूर्व प्रेमचंद ने अपनी अमर कथा 'पंच परमेश्वर' में एक पात्र के मुख से यह कालजयी संवाद कहलवाया था - 'क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?' लेकिन एक सदी गुज़र जाने के बाद भी हमारे सामने हालात यही हैं कि लोग बिगाड़ के डर (या किसी ख़ुदगर्ज़ी) से ईमान की बात नहीं कहते। जब कहने तक में गुरेज़ है तो इंसाफ़ करने के लिए क़दम कौन आगे बढ़ाएगा ? आज तो हमारे यहाँ हाल यह हो गया है कि उच्च-स्तरीय न्यायालय भी न्याय के मूलभूत सिद्धांतों को ताक पे रखकर लोकरुचि (एवं सत्ता) के अनुकूल निर्णय दे रहे हैं। ऐसे में विशुद्ध सत्य के लिए स्थान ही कहाँ ? विशुद्ध न्याय को कहाँ शरण मिले ? यहाँ तक कि इंसाफ़ के लिए बरसों तलक दर-दर की ठोकरें खाने वाली और अब एक बार फिर से ख़ौफ़ में जी रही बिलक़ीस बानो के लिए हमारे विद्वानों एवं विदुषियों के पास और कुछ तो छोड़िए, हमदर्दी के दो बोल भी नहीं हैं। हमारे देश में उत्पीड़ितों से भी कहीं अधिक असहाय हैं सत्य और न्याय। कुछ लोग मज़लूमों को तसल्ली देने की कोशिश ज़रूर करते हैं लेकिन जो लुट गया हो, बरबाद हो गया हो; उसका काम खोखली तसल्लियों से नहीं चलता। तसल्ली देने के मामले में भी मैं यही सच बयां करना चाहूंगा - 

तसल्ली देने वाले तो तसल्ली देते रहते हैं 
मगर वो क्या करे जिसका भरोसा टूट जाता है

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शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

राजू श्रीवास्तव और इन्द्रधनुष क़ातिल

राजू श्रीवास्तव नहीं रहे। एक गंभीर लेख लिखने की योजना थी मेरी लेकिन इस कार्य को स्थगित करके उस असाधारण कलाकार को श्रद्धांजलि देना मुझे उचित लगा जिसने हास्य के संसार में अपनी एक पृथक् पहचान बनाई। हंसी और मुस्कान बिखेरकर गजोधर भैया लाखों-करोड़ों के दिलों में बस गए। कानपुर से मुम्बई आए इस साधारण चेहरे-मोहरे के कलाकार में नक़ल उतारने (मिमिक्री करने) का नायाब हुनर था। शायद ही किसी को याद हो कि उन्होंने 'मैंने प्यार किया' (१९८९) फ़िल्म में एक छोटी-सी भूमिका निभाई थी। आगे चलकर उन्होंने कुछ फ़िल्मों में भी काम किया एवं 'बिग बॉस' सहित कई टीवी शो में भी आए; राजनीति में भी रुचि ली एवं उत्तर प्रदेश फ़िल्म विकास परिषद के अध्यक्ष भी बने लेकिन शोहरत तो उन्हें रंगमंच से ही मिली जहाँ उन्होंने दर्शकों को ख़ूब हंसाया, बरसोंबरस हंसाया। इसीलिए उनके आकस्मिक निधन ने उनके प्रशंसकों की आँखों में आँसू उमड़ा दिए।

मैंने रोनित रॉय तथा उनकी प्रमुख भूमिका वाले सोनी टीवी के धारावाहिक 'अदालत' पर पहले भी एक लेख लिखा है। आज राजू को श्रद्धांजलि देने के लिए मैं इसी धारावाहिक के एक (दो कड़ियों में प्रस्तुत) कथानक का वर्णन कर रहा हूँ जिसमें राजू की महत्वपूर्ण भूमिका है। 'अदालत' की १४६ वीं तथा १४७ वीं  कड़ियों में प्रस्तुत इस कथा का नाम है - 'इंद्रधनुष क़ातिल'। वस्तुतः यह नाम राजू के लिए ही है जिनका इस कथा में भी नाम 'राजू' ही रखा गया है। 

'इंद्रधनुष क़ातिल' स्वभावतः एक रहस्यकथा है जिसमें 'इन्द्रधनुष' नामक एक नाटक के प्रमुख पात्र राजू चौरसिया (राजू श्रीवास्तव) पर एक दूसरे कलाकार की हत्या का आरोप लगता है। इन्द्रधनुष में सात रंग होते हैं और राजू एक ऐसे पात्र की भूमिका निभा रहे हैं जिसमें सात पृथक्-पृथक् व्यक्तित्व समाहित हैं। कभी वह कोई बन जाता है तो कभी कोई और। भूमिका को पूर्ण समर्पण के साथ निभाते-निभाते यह कलाकार अपने पात्र का ही दूसरा संस्करण बन जाता है तथा जब वह किसी (नाटक वाले) एक व्यक्तित्व के रूप में होता है तो कुछ अंतराल के उपरांत जब वह किसी और रूप में (या अपने वास्तविक जीवन के रूप में) परिवर्तित होता है तो उसे पहले की अपनी कोई बात स्मरण नहीं रहती। चिकित्सकीय भाषा में इसे बहु व्यक्तित्व विकार (multiple personality disorder) कहते हैं। अब इस निर्दोष व्यक्ति की रक्षा का दायित्व कौन वहन कर सकता है सिवाय सत्य के पथिक वकील के.डी. पाठक (रोनित रॉय) के जिनके जीवन का ध्येय ही सत्य का साथ देते हुए निर्दोषों को दंड से बचाना है (संयोगवश राजू श्रीवास्तव का वास्तविक नाम भी सत्य प्रकाश श्रीवास्तव ही था)।

के.डी. पाठक अपने सहायक वरुण (रोमित राज) के साथ मामले की छानबीन में लग जाते हैं। वरुण पुलिस इंस्पेक्टर श्रीकांत दवे (अजय कुमार नैन) का भी अपने काम में सहयोग लेता है। अदालत में  के.डी. के सामने हैं उनके चितपरिचित प्रतिद्वंद्वी सरकारी वकील इंदर मोहन जायसवाल (आनंद गोराडिया) जबकि मामले की सुनवाई कर रहे हैं अनुभवी न्यायाधीश महोदय ऋषि धींगड़ा (प्रदीप शुक्ला)। संदेह के घेरे में कई व्यक्ति हैं। नाट्य संस्था के स्वामी हैं एक और राजू अर्थात् राजू श्रेष्ठ (जो कई दशक पूर्व हिन्दी फ़िल्मों में बाल कलाकार मास्टर राजू के रूप में अत्यंत लोकप्रिय हुआ करते थे)। उनके साथ-साथ नाटक की नायिका से लेकर सह-कलाकार, दिग्दर्शक, तकनीशियन, अन्य कर्मचारी आदि सभी इस हत्या हेतु संदिग्ध हैं। परंतु के.डी. पाठक के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है राजू को यह स्मरण करवाना कि वस्तुतः क्या हुआ था क्योंकि वे तो कभी किसी व्यक्तित्व में घुस जाते हैं तो कभी किसी में। अंततः अपेक्षानुसार सत्य की विजय होती है तथा राजू की निर्दोषिता प्रमाणित होती है। 

'इन्द्रधनुष क़ातिल' दोहरा मनोरंजन प्रदान करता है। यह न केवल रहस्यकथाओं एवं न्यायालय की कार्रवाइयों को देखने में रुचि रखने वालों को आरम्भ से अंत तक बाँधे रखता है वरन हास्य देखने में रुचि रखने वालों को भी वह देता है जो उन्हें चाहिए अर्थात् भरपूर हंसी जो कि राजू श्रीवास्तव की कला के माध्यम से जागृत होती है। राजू ने दर्शकों को हंसा-हंसाकर लोटपोट कर देने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। कथानक के अंत में राजू को न्यायालय द्वारा मुक्त कर दिए जाने के उपरांत के.डी. पाठक एवं राजू के मध्य हुआ वार्तालाप तथा उन दोनों के द्वारा बोले गए संवाद दर्शक के हृदय को स्पर्श कर लेते हैं। राजू के अतिरिक्त अन्य सभी कलाकारों ने भी अपने-अपने चरित्रों के साथ न्याय किया है। स्वस्थ एवं शालीन मनोरंजन प्रदान करने हेतु इस कथानक की पटकथा रचने वाले लेखक तथा इसके निर्देशक भी साधुवाद के पात्र हैं। मुश्किल से डेढ़ घंटे की अवधि (दोनों कड़ियाँ मिलाकर) वाली इस कथा को यूट्यूब पर देखा जा सकता है तथा सम्पूर्ण मनोरंजन प्राप्त किया जा सकता है। 

राजू श्रीवास्तव ने तेरह अगस्त, २०२२ को दिल का दौरा पड़ने के बाद इक्कीस सितम्बर, २०२२ को दुनिया छोड़ने से पहले चालीस दिन तक मौत से जंग लड़ी। सादगी से युक्त किन्तु इन्द्रधनुष की भांति उत्साहित करने वाले व्यक्तित्व के धनी इस असाधारण कलाकार में ऐसा जीवट होना अपेक्षित ही था। मुझे याद आता है कि स्वर्गीय राज कपूर भी जिन फ़िल्मों में एक सीधे-सादे मगर सोने जैसा दिल रखने वाले इंसान की भूमिका निभाते थे, उनमें अपने किरदार का नाम 'राजू' ही रखते थे। 

राजू श्रीवास्तव को मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। 

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'इन्द्रधनुष क़ातिल' के यूट्यूब लिंक:

https://www.youtube.com/watch?v=UqoVVo04ip0&vl=en

https://www.youtube.com/watch?v=_eU1L3N3udQ&vl=en

गुरुवार, 25 अगस्त 2022

हर मज़हब से ऊँची है क़ीमत इन्सानी जान की

दूरदर्शन पर प्रति वर्ष 'बाल दिवस' के अवसर पर 'चित्रहार' नामक लोकप्रिय कार्यक्रम में पुरानी फ़िल्म 'दो कलियाँ' (१९६८) का एक गीत प्रसारित हुआ करता था (सम्भव है, अब भी होता हो) - 'बच्चे, मन के सच्चे'। इस गीत में बाल कलाकार बेबी सोनिया (अपने बालपन में नीतू सिंह जो बड़ी होकर हिन्दी फ़िल्मों की लोकप्रिय नायिका बनीं) स्वर्गीया लता मंगेशकर के स्वर में गाती हुई बताती हैं: 'इंसां जब तक बच्चा है, तब तक समझो सच्चा है; ज्यों ज्यों उसकी उमर बढ़े, मन पर झूठ का मैल चढ़े; क्रोध बढ़े, नफ़रत घेरे; लालच की आदत घेरे, बचपन इन पापों से हटकर अपनी उमर गुज़ारे'। और इसी गीत के एक अंतरे में वे बताती हैं - 'इनमें छूत और छात नहीं, झूठी जात और पांत नहीं; भाषा की तक़रार नहीं, मज़हब की दीवार नहीं; इनकी नज़रों में एक हैं मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे।' अपने बचपन में जब मैंने साहिर द्वारा रचित एवं रवि द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को सुना था, तब मुझे इसका मर्म इस प्रकार समझ में नहीं आया था जिस प्रकार अब आ गया है। काश हम सब बच्चे ही होते ! साफ़ दिल के और इंसान को सिर्फ़ इंसान की तरह देखने वाले !

पंजाब सहित कई राज्यों में चुनाव हो गए, आज़ादी का अमृत महोत्सव भी मन ही गया। अब किसे याद है कि पिछले साल अट्ठारह दिसम्बर को अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में एक युवक की वहाँ उपस्थित सेवादारों एवं अन्य व्यक्तियों ने पीट-पीटकर (सीसीटीवी कैमरों के सामने, बेधड़क) हत्या कर दी थी ? इल्ज़ाम था कि उसने सिख समुदाय की पवित्र पुस्तक - गुरू ग्रंथ साहिब का अपमान करने एवं धार्मिक सेवाओं को बाधित करने का प्रयास किया था। पुलिस ने (भारत की फ़िल्मी पुलिस की तरह) बाद में वहाँ अपनी आमद दर्ज़ कराई और हत्या करने वालों (जिनके चेहरे टीवी फ़ुटेज में साफ़ नज़र आ रहे थे) के ख़िलाफ़ नहीं, उस बेचारे मार दिए गए शख़्स के ख़िलाफ़ ही हत्या की कोशिश का मामला दर्ज़ कर लिया। कितनी महान है मेरे देश की पुलिस ! धार्मिक ग्रंथ की बेअदबी की साज़िश की बात का जमकर शोर मचाया गया क्योंकि ढाई-तीन महीने में ही पंजाब में चुनाव होने थे और सभी राजनीतिक दलों को सिख समुदाय के थोक में वोट चाहिए थे (चुनाव जीतकर सत्ता पाने के लिए)। किसी ने उस अभागे अजनबी की जान की कोई क़ीमत नहीं समझी जो पता नहीं, उस वक़्त अपने आपे में भी था या नहीं। आज तक पता नहीं चला है कि वह कौन था, कहाँ से आया था, उसका धर्म क्या था और उसके आगे-पीछे कोई है या नहीं। अब किसे क्या करना है जानकर ? चुनाव तो हो गए।

उस वक़्त भी पंजाब के भूतपूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ही इस भीड़ द्वारा पीटकर की गई हत्या (मॉब लिंचिंग) की निंदा की थीबाक़ी किसी भारतीय राजनेता ने नहीं। क्रिकेटर से टीवी के विदूषक और उससे नेता बने एक महानुभाव (जो अब ख़ुद जेल में बैठे हैं) ने तो यहाँ तक कह दिया था कि ऐसे अपराध करने वालों को सार्वजनिक रूप से फाँसी दी जानी चाहिए। तथाकथित बेअदबी या ईशनिंदा (blasphemy) के ऐसे प्रकरण कट्टरपंथी एवं धर्मांध देशों में होते रहते हैं क्योंकि वहाँ की बहुसंख्यक  जनता के धर्म के आधार पर शासन करने वाले राजनेता ऐसे विधि-विधान बनाते हैं जिनका उपयोग प्रायः वहाँ के धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने के निमित्त ही होता है। पाकिस्तान ऐसे देशों (तथा उनमें लागू ऐसे कानूनों) का एक ज्वलंत उदाहरण है जहाँ इस दिशा में सुधार का प्रयास करने के कारण पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की एक धर्मांध व्यक्ति ने हत्या कर दी थी। कुछ समय पूर्व बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के पंडाल में क़ुरान शरीफ़ की प्रति रखने का आरोप लगाकर कट्टरपंथियों ने वहाँ के धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा आरंभ की थी जिस पर शीघ्र ही नियंत्रण पा लिया गया क्योंकि सौभाग्यवश वहाँ शासन एक मानवतावादी एवं उदार विचारों वाली महिला (बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख़ मुजीब-उर-रहमान की पुत्री) शेख़ हसीना वाजेद के हाथ में है। ऐसे झूठ एवं निहित स्वार्थ पर आधारित काम धर्म के नाम पर हमारे सनातन मानवीय मूल्यों पर आधारित राष्ट्र में भी हों तो हममें एवं धर्मांधता पर चलने वाले देशों में क्या अंतर रह जाएगा ?

अपने होश-ओ-हवास में कौन ऐसा है जो बहुसंख्यक भीड़ के हाथों मरना या उत्पीड़ित होना चाहेगा ? कौन ऐसा ग़ैर-मुस्लिम व्यक्ति होगा जो किसी मुस्लिम बहुल देश में क़ुरान या पैग़म्बर का अपमान करेगा ? कौन ऐसा ग़ैर-हिंदू व्यक्ति होगा जो कि भारत में किसी भीड़ भरे मंदिर या हिंदू धार्मिक आयोजन के मध्य में जाकर हिंदू देवताओं या आस्थाओं को अपमानित करने का दुस्साहस करेगा ? कौन ऐसा ग़ैर-सिख व्यक्ति होगा जो कि सिख श्रद्धालुओं की भीड़ से भरे हरमंदिर साहब में जाकर वाहेगुरू या ग्रंथ साहब का अपमान करने की गंभीर भूल करेगा ? मरना या देश के कानून के तहत गिरफ़्तार होकर लम्बी क़ैद की सज़ा पाना कौन चाहता है ? कोई समझदार और दुनियादार बालिग़ शख़्स ऐसा नहीं कर सकता। और करे भी तो उस पर कार्रवाई करने के लिए कानून-व्यवस्था है। ऐसे व्यक्ति की मानसिक स्थिति की जाँच भी होनी चाहिए जिससे यह पता लगे कि कहीं वह अर्द्ध-विक्षिप्त अथवा अल्पविकसित मानस वाला व्यक्ति तो नहीं है। क्या देश में भीड़ को अपनी मनमानी का इंसाफ़ करने की इजाज़त दे दी जाए और जंगल का कानून लागू कर दिया जाए ? जिस घटना को आधार बनाकर मैं यह लेख लिख रहा हूँ, वैसी ही घटना चौबीस घंटे के अंतराल के भीतर ही कपूरथला में भी हुई थी जिसमें गुरूद्वारे में एक युवक पर पवित्र 'निशान साहिब' के अपमान का आरोप लगाकर भीड़ ने उसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। बाद में पुलिस ने यह वक्तव्य दिया कि वह 'निशान साहिब' का अपमान नहीं कर रहा था बल्कि चोरी करने का प्रयास कर रहा था। यदि पुलिस के इस आधिकारिक वक्तव्य को मान भी लिया जाए तो भी क्या भीड़ को उसे जान से मार डालने का अनुज्ञापत्र प्राप्त हो गया था ? 

घटनाएं हुईं, भुला दी गईं। बस इतनी ही क़ीमत है अब हमारे मुल्क में इंसानी जान की । हत्यारे आज़ाद घूम रहे हैं। मरने वाले गुमनाम लोगों के ख़िलाफ़ बेमक़सद मामले दर्ज़ होकर पुलिस की फ़ाइलों में बंद हो गए हैं। मारने वाले बेख़ौफ़ हैं। साफ़ तौर पर टीवी कैमरों के सामने हत्या करने के बाद भी न उन्हें पकड़ा गया, न उनके विरूद्ध पुलिस ने कोई मामला दर्ज़ किया, न हमारे वोटों के भूखे नेताओं और उनके दलों ने इस बाबत कुछ कहा। अब यदि अवसर मिलने पर वे अपने इस कुकृत्य की पुनरावृत्ति कर दें तो क्या आश्चर्य क्योंकि यह बात तो उनके मन में स्थान बना चुकी है कि यदि अपराध धर्म के नाम पर करें तो उनका कुछ बिगड़ने वाला नहीं। एक ज़माने में महज़ अख़बार में छपी ऐसी ख़बरों को जनहित याचिका मानकर हमारे उच्च न्यायालयों के जज उनका संज्ञान लेते थे एवं समुचित जाँच और कार्रवाई का आदेश दे देते थे। अब तो ...। क्या कहूँ ? 

लेकिन क्या जनमानस भी तथा सुशिक्षित एवं संतुलित मस्तिष्क से विचार करने वाले जागरूक नागरिक भी धर्मांधता के साँचे में ऐसे ढल गए हैं कि किसी को ऐसी बातों से कोई अंतर नहीं पड़ता ? सम्भवतः (और दुर्भाग्यवश) ऐसा ही है। मरने वाले मर गए। उनके होते-सोते उनकी मौत के बारे में जानकर भी शायद इसलिए सामने नहीं आए कि कहीं उन्मादी भीड़ और अंधा कानून उन्हें भी अपना शिकार न बना ले। मैंने इस लेख को लिखने की प्रक्रिया अनेक दिवस पूर्व आरंभ की थी। देख रहा हूँ कि तब से अब तक ही दरिया में बहुत पानी बह गया है और ऐसे ही कुछ अलग मगर दिल को चीर देने वाले वाक़ये और हो गए हैं। 

महाकवि कालिदास द्वारा रचित महाकाव्य 'कुमारसम्भव' में एक श्लोक की एक पंक्ति है - 'शरीरमाद्यम् खलु धर्मसाधनम्' अर्थात् शरीर निश्चय ही धर्म के पालन का प्रथम साधन है। अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान का ध्येय वाक्य भी यही है। यह आदर्श-वाक्य शरीर को निरोग एवं स्वस्थ रखने पर बल देने हेतु उद्धृत किया जाता है किन्तु इसे एक अन्य कोण से देखने पर यही आदर्श-वाक्य हमारे समक्ष यह भी स्पष्ट करता है कि हमारी यह देह धर्म के पालन हेतु ही है (अधर्म के पालन हेतु नहीं)। अब धर्म किसे कहें ? मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं - धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह: धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्। किसी निर्दोष के प्राण ले लेना अथवा उस पर अत्याचार करना इन दस लक्षणों में कहाँ स्थित है ? कहीं नहीं। इनमें तो क्रोध के परित्याग को भी सम्मिलित किया गया है। 

अतः धर्म के नाम पर अधर्म ही करते हैं वे लोग जो या तो स्वयं अपनी विवेक-बुद्धि खो चुके हैं अथवा अपने किसी निहित स्वार्थ की सिद्धि करने में लगे हैं। भारत महान इसीलिए बना तथा सम्पूर्ण विश्व में उसने प्रतिष्ठा इसीलिए अर्जित की क्योंकि इसके अधिसंख्य नागरिक धर्मांध देशों के नागरिकों की भांति न बनकर उदार एवं विवेकशील बने। हमने धर्म को सदाचरण का ही पर्याय माना। अब जो हो रहा है, वह इस देश का दुर्भाग्य ही है। मेरे विचारों के निकट तो फ़िल्म 'राम तेरे कितने नाम' (१९८५) का यह गीत ही है - 'इंसानियत ही सबसे पहला धर्म है इंसान का'। कम-से-कम मेरा धर्म तो यही है। 

पुरानी श्वेत-श्याम फ़िल्म 'दीदी' (१९५) का गीत है - 'बच्चों तुम तक़दीर हो कल के हिन्दुस्तान की'। अपनी इस लम्बी हो चुकी बात को मैं इसी गीत की इन पंक्तियों के साथ विराम देता हूँ - 

दीन-धरम के नाम पे कोई बीज फूट का बोए ना 
जो सदियों के बाद मिली है, वो आज़ादी खोएं ना 
हर मज़हब से ऊँची है क़ीमत इन्सानी जान की 

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शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन

संसार का सबसे बड़ा एवं सबसे प्राचीन रहस्य (जब से मानव-प्रजाति अस्तित्व में आई है) है - स्त्रीपुरुष का पारस्परिक प्रेम। यह रहस्य सनातन है कि किसी को किसी से प्रेम क्यों होता है। मेरा मानना है कि इस मुक़म्मल कायनात में बिना वजह कोई बात नहीं होती। इसलिए किसी को किसी से प्यार होने के पीछे भी कोई वजह होनी ही चाहिए। मगर उस वजह को ढूंढा नहीं जा सकता। राज़-ए-मुहब्बत एक ऐसा राज़ है जिसका ख़ुलासा शायद रहती दुनिया तक न हो सके। किसी औरत को किसी मर्द से या किसी मर्द को किसी औरत से प्यार क्यों होता है, यह सवाल शायद हमेशा सवाल ही रहे - एक ऐसा सवाल जिसके जवाब तक किसी इंसान की पहुँच मुमकिन नहीं। चाहे इसे इश्क़ कहें या मुहब्बत या फिर कुछ और; प्यार एक ऐसी शय है जिसके मुताल्लिक जितना कहा जाए, कम ही लगता है। आज मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि मैंने अपने कितने ही लेखों में इस विषय को छुआ है, इस पर बहुत कुछ अभिव्यक्त किया है, यथा  'प्रेम की जटिल गुत्थी', 'फ़लसफ़ा प्यार का', 'प्यार ही नहीं काम भी पूजा है', 'गोपिकाओं का निश्छल प्रेम', 'सेल्यूलॉइड पर लिखी दर्दभरी कविता', 'शर्तों पर प्रेम?', 'काग़ज़ की नाव', 'प्रमोद' आदि। फिर भी लगता है कि अभी और भी लिखा जा सकता है, बहुत कुछ और कहा जा सकता है। आज भी कहना है - एक हिन्दी फ़िल्म की समीक्षा करने के बहाने। 

मुम्बई के बांद्रा (पश्चिम) उपनगर में एक स्थान है - जॉगर्स पार्क। यह एक रमणीक उपवन है जिसमें एक भ्रमण-पथ (जॉगिंग ट्रैक) भी है। यह न केवल एक पर्यटन स्थल है वरन यहाँ स्थानीय नागरिक भी प्रातः काल घूमने अथवा धीमे-धीमे दौड़ने (जॉगिंग करने) के निमित्त आते हैं। इसी स्थान को कथानक के प्रारम्भ का आधार बनाकर एवं इसी को शीर्षक के रूप में लेकर एक हिन्दी फ़िल्म बनाई गई थी - 'जॉगर्स पार्क' (२००३)। फ़िल्म के निर्माता सुभाष घई द्वारा लिखी गई इस कथा के दो प्रमुख पात्र जॉगर्स पार्क में ही एकदूसरे से परिचित होते हैं जिसके उपरांत आरम्भ होता है उनके मध्य एक आत्मीय संबंध जो कि कथानक का केन्द्र-बिन्दु है। 

जॉगर्स पार्क में अकस्मात् एकदूसरे के सम्पर्क में आने वाले ये दो व्यक्ति हैं - पैंसठ वर्षीय सेवानिवृत्त न्यायाधीश ज्योतिन प्रसाद चटर्जी (विक्टर बनर्जी) जिनका भरापूरा परिवार है एवं बत्तीस वर्षीया कामकाजी अविवाहित युवती जेनी सूरतवाला (पेरिज़ाद ज़ोराबियन)। जज साहब को इस बात का अभिमान है कि उन्होंने जीवन भर सम्पूर्ण सत्यनिष्ठा के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए न्याय का संरक्षण एवं पोषण किया तथा कभी अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया। लेकिन एक हक़ीक़त यह भी है कि वे ज़िन्दगी भर कानून की किताबों एवं मुक़दमों से बाहर निकले ही नहीं। घरवालों ने शादी कर दी तो बीवी (आभा धुलिया) के साथ निबाह लिया, बेटे-बेटी हुए तो एक आम बाप की तरह उनकी परवरिश कर दी, बेटे की भी शादी कर दी और एक मासूम पोती के दादा बन गए। ज़िन्दगी में कुछ ऐसा हुआ ही नहीं जिसकी कोई कहानी बन सकती हो। 

दूसरी ओर जेनी ने उनसे आधी उम्र की होने के बावजूद उनसे ज़्यादा दुनिया देख ली है, ज़माने भर की ठोकरें खा ली हैं और ज़िन्दगी की तल्ख़ हक़ीक़त से वह उनसे कहीं बेहतर वाक़िफ़ है। उसने ज़िन्दगी को भी और ज़िन्दगी में टकराने वाले लोगों को भी इतने रंग बदलते हुए देखा है कि अब वह किसी पर भी ऐतबार नहीं कर पाती। उसने कई नौकरियां बदली हैं, रोज़ीरोटी की ख़ातिर कई काम किए हैं और हालफ़िलहाल वह एक होटल से जुड़ी रहकर ईवेंट मैनेजमेंट करती है। वह जज साहब के एक भाषण को सुनकर उनसे बहुत प्रभावित हुई है तथा जॉगर्स पार्क में उनसे परिचय होने पर उसे लगने लगता है कि वे उसके सच्चे मित्र सिद्ध हो सकते हैं - ऐसे मित्र जिन पर वह नेत्र मूंदकर विश्वास कर सकती है। 

और दोस्ती हो जाती है उनकी। जज साहब जेनी की एक सम्पत्ति से सम्बंधित कानूनी विवाद में सहायता करते हैं। मित्रता प्रगाढ़ होती जाती है। जेनी के माध्यम से जज साहब युवा पीढ़ी के उस संसार को देखते हैं जिससे वे अब तक अपरिचित थे। एक ग़ज़ल गाने वाला युवक (ख़ालिद सिद्दीक़ी) जेनी को चाहता है लेकिन जेनी ने उसके प्रेम को स्वीकार नहीं किया है। वह तो उम्र के फ़ासले के बावजूद जज साहब की ओर खिंची चली जा रही है। उसे लग रहा है कि उनके रूप में उसे एक ऐसा इंसान मिल गया है जो उसे समझता है। उधर जज साहब को महसूस होने लगता है कि जिस प्यार के मुद्दे पर वे कभी नई पीढ़ी का मज़ाक़ उड़ाया करते थे, वह प्यार ख़ुद उन्हें हो गया है - जेनी से। वे एक मनोचिकित्सक से परामर्श करते हैं कि ढलती आयु में इस प्रकार का प्रेम हो जाना क्या अस्वाभाविक नहीं तो उन्हें वह विशेषज्ञ यही बताता है कि इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं। 

कहते हैं इश्क़ और मुश्क़ छुपाए नहीं छुपते। देरसवेर दुनिया को ख़बर लग ही जाती है। अब इस रिश्ते का क्या अंजाम हो सकता है ? कहते हैं; वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा। लेकिन क्या छोड़ देने से ऐसे अफ़साने दफ़न हो जाते हैं ? नहीं होते। नहीं हो सकते। समंदर की लहरें रेत पर बनाए गए घरों को बहाकर ले जाती हैं लेकिन उनके निशानात नहीं मिटा पातीं। सब कुछ ख़त्म हो जाने के बाद भी वो लम्हे ज़िन्दा रहते हैं जो एक साथ जी लिए गए हैं। यादें बाक़ी रह जाती हैं जिनके दरिया में प्यार करने वाले और प्यार पाने वाले ताज़िन्दगी डूबते-उतराते हैं। यादों के खंडहर हमेशा मौजूद रहते हैं जिनमें मन बरबस ही घूमने लगता है। यादों से बचकर कोई कहाँ जा सकता है ? अगर ज़िन्दगी से यादों को निकाल दिया जाए तो उसमें रहेगा ही क्या ? 

बहरहाल जज साहब के अहसानमंद एक पत्रकार (मनोज जोशी) के कारण जज साहब और जेनी का रिश्ता स्कैंडल की सूरत में तो लोगों के सामने नहीं आ पाता मगर उनकी बेटी (दिव्या दत्ता) पर यह भेद खुल जाता है। अब बेटी अपने बाप से साफ़ कहती है कि वे चाहें तो अपने इस रिश्ते को क़ायम रखें; जब इतनी ज़िन्दगी उनकी वजह से सर उठाकर जी है तो बाक़ी की ज़िन्दगी उनकी ख़्वाहिशों की ख़ातिर सर झुकाकर भी जी ली जाएगी। लेकिन क्या जज साहब ऐसा कर सकते हैं ? वे अपने बेटे को उसके एक अफ़ेयर के लिए बुरी तरह फटकार कर साफ़ कह चुके हैं कि परिवार की इज़्ज़त सबसे ऊपर होती है। अब जब वे जान गए हैं कि पचास साल में कमाई गई इज़्ज़त पचास सैकंड में धूल में मिल सकती है तो क्या वे मुहब्बत की इस बाज़ी को खेलने और इस इज़्ज़त को दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं ?

नतीजा वही निकलता है जो दुनियादारी के हिसाब से निकलना लाज़िमी होता है। जज साहब को जेनी से बिछुड़ना पड़ता है। और यही ठीक भी है क्योंकि लड़की चाहे ख़ुदमुख़्तार हो और प्यार किसी से भी कर ले, उसे शादी और अपना परिवार तो हर हाल में चाहिए। प्रेम अनमोल होता है पर समाज में जीने वाली नारी को सामाजिक सुरक्षा व सम्मान भी चाहिए, मातृत्व का सुख भी चाहिए। यह हर औरत का जायज़ हक़ है और जो उसे यह न दे सके, उसे उसकी ज़िन्दगी से निकल ही जाना चाहिए। 

कुछ साल बाद ! अचानक एक हवाई अड्डे पर जज साहब जेनी के रूबरू हो जाते हैं। लेकिन वह अकेली नहीं है। साथ में उसका पति है। उसका नन्हा बालक है। चंद पलों की यह मुलाक़ात बता देती है कि जेनी मोड़ काटकर ज़िन्दगी की राह में आगे बढ़ गई है। पर क्या जज साहब भी बढ़ पाए हैं ? या फिर प्यार का काँटा आज भी उनके दिल में धंसा है ? 

स्वर्गीय अनंत बालानी ने फ़िल्म का निर्देशन प्रशंसनीय ढंग से किया है (उनका फ़िल्म के प्रदर्शन से कुछ दिवस पूर्व ही निधन हो गया था)। कथा तो प्रत्यक्षतः छोटी-सी ही है लेकिन पटकथा इस ढंग से लिखी गई है कि एक के बाद एक घटनाएं घटती चली जाती हैं, भावनाओं से ओतप्रोत कथा में मोड़ और घुमाव आते चले जाते हैं और दर्शक आख़िर तक बंधे रहते हैं। किसी भी स्थान पर फ़िल्म ऊबने नहीं देती। एक छोटी-सी कहानी को इस क़दर दिलचस्प तरीक़े से पेश करना बहुत बड़ी बात है। 

फ़िल्म के पात्र फ़िल्मी नहीं लगते, हाड़-मांस के बने जीते-जागते इंसान लगते हैं। प्यार में बड़ी से बड़ी उम्र का इंसान बच्चे जैसा व्यवहार करने लगता है और जिसे वह चाहता है, उस पर हक़ जताने लगता है (पज़ेसिव होने लगता है)। यह तथ्य फ़िल्म में अत्यंत रोचक ढंग से रेखांकित किया गया है। फिर बात यह भी तो है कि वो इश्क़ ही क्या जिसमें जुनून न हो ?

फ़िल्म के लेखक एवं दिग्दर्शक ने दोनों प्रमुख पात्रों को पूरी गरिमा एवं आदर के साथ प्रस्तुत किया है एवं उनके व्यक्तित्व में कहीं पर भी हल्कापन नहीं दर्शाया है। केवल अल्हड़ व्यक्ति ही तो प्रेम नहीं करते, परिपक्व व्यक्ति भी तो कर सकते हैं और करते हैं। मुझे इस तथ्य ने बहुत प्रभावित किया कि एक अनजाने-से रिश्ते में बंध गए दोनों ही व्यक्ति (पुरुष भी, स्त्री भी) एकदूसरे का बहुत सम्मान करते हैं। मेरे अपने विचार में भी पारस्परिक सम्मान का स्थान प्रेम से पूर्व आता है। आप उसी को प्रेम कर सकते हैं जिसका सम्मान भी करते हों। 

संगीत पक्ष में क़ाबिल-ए-तारीफ़ सिर्फ़ स्वर्गीय जगजीत सिंह जी की गाई हुई ग़ज़ल है - 'बड़ी नाज़ुक है ये मंज़िल,  मोहब्बत का सफ़र है; धड़क आहिस्ता से ऐ दिल, मोहब्बत का सफ़र है'। इस ग़ज़ल का यह शेर फ़िल्म की कहानी पर एकदम सटीक बैठता है‌ - 'कोई सुन ले न ये किस्सा, बहुत डर लगता है; मगर डरने से क्या हासिल, मोहब्बत का सफ़र है'। तकनीकी रूप से भी फ़िल्म ठीक ही है। शोर कुछ कम होता तो बेहतर रहता। अभिनय पक्ष अत्यंत सबल है। जज साहब की पोती के रूप में (बाल कलाकार) भावना रूपारेल ने शानदार काम किया है। अन्य सहायक पात्रों में विशेष उल्लेख जज साहब की पुत्री की भूमिका में दिव्या दत्ता का किया जा सकता है। वैसे सभी कलाकारों ने अपने चरित्रों के साथ न्याय किया है। परंतु यह फ़िल्म वस्तुतः इसके दोनों मुख्य पात्रों के कंधों पर ही टिकी है तथा दोनों ने ही अपनी-अपनी भूमिकाओं में प्राण फूंक दिए हैं। आयु का बहुत अंतर होने पर भी विक्टर बनर्जी तथा पेरिज़ाद ज़ोराबियन ने रजतपट पर प्रशंसनीय संगति प्रस्तुत की है। दोनों ने ही अपने-अपने किरदारों के जज़्बात को बाख़ूबी उभारा है। कुल मिलाकर यह एक साफ़-सुथरी और देखने लायक़ फ़िल्म है। 

फ़िल्म की बात तो हो गई। दुनियावी सवाल यह है कि क्या ऐसे रिश्ते जो शादी या हमेशा के साथ में न बदल सकें, बनाए जाने चाहिए। जवाब यह है कि जज़्बाती रिश्ते बनाए नहीं जाते, अपने आप बन जाते हैं। जब कोई अच्छा लगने लगता (या लगती) है तो उससे कन्नी नहीं काटी जा सकती। उमेश अपराधी जी द्वारा रचित एक गीत की एक पंक्ति है - कैसे ठुकरा दूं कि किसी ने जब अपना माना है मुझको ? प्यार सोच-समझकर नहीं किया जा सकता और बार-बार दोहराया गया यह सच वाक़ई एक सच ही है कि प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है। स्वर्गीय जगजीत सिंह जी का गाया हुआ तथा उन्हीं के द्वारा संगीतबद्ध एक गीत है - 'होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो'। इंदीवर जी के लिखे हुए इस अति सुंदर एवं मर्मस्पर्शी गीत की दो पंक्तियां इस प्रकार हैं - न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन। जॉगर्स पार्क के ये प्रेमी (यदि इनके अपरिभाषित संबंध को हम 'प्रेम' का नाम दे दें) भी बस इकदूजे का मन ही देखते हैं, और कुछ नहीं। मैंने ऊपर ही लिखा है कि यह फ़िल्म साफ़सुथरी है। पुरुष और स्त्री में संबंध मन का है, तन की ओर तो कोई संकेत तक नहीं है। संभवतः आत्मिक संबंध (जिन्हें प्लेटोनिक संबंध कहा जाता है) ऐसे ही होते हैं। आजकल 'सोलमेट' शब्द भी बहुत सुनने में आता है जिसका अर्थ ही है - रूह का साथी (जिस्म का नहीं)। 

मगर न तो समाज प्रेमियों के हिसाब से चलता है, न ही दुनिया। अगर दोनों ही अकेले हैं तो वे अपने प्यार के दम पर यकीनन निबाह लेंगे और दुनिया का भी सामना कर लेंगे लेकिन अगर दोनों में से किसी एक का या फिर दोनों ही का पहले से परिवार है तो फिर बिछोह ही उनका मुक़द्दर है। क़ुरबानी देनी ही होगी - अपने प्यार की न सही (क्योंकि वह तो दिलों में हमेशा रहेगा) तो अपने साथ की। और प्यार का दूसरा नाम क़ुरबानी ही तो है। जब तक समाज है, तब तक मर्यादा है और मर्यादा की ख़ातिर प्यार को सदा बलिवेदी पर झुकना ही पड़ा है - चाहे सोलहवीं सदी रही हो या इक्कीसवीं। 

भावनाओं का सागर है यह फ़िल्म जो भावुक व्यक्तियों के लिए ही बनी है पर जिसे वे भी पसंद करेंगे जो भावुक कम हैं, व्यावहारिक अधिक। आदम और हव्वा के ज़माने से ही हम जानते हैं कि विपरीत लिंगी के आकर्षण के मामले में औरत का दिल किसी और तरीक़े से काम करता है, मर्द का किसी और तरीक़े से। मैं तो पुरुष हूँ, स्त्री के मन की थाह लेना मेरे वश की बात नहीं। पर हाँ, पुरुष को स्त्री से क्या चाहिए; इसे मैं 'होठों से छू लो तुम' गीत के ही इस अंतरे के माध्यम से स्पष्ट कर सकता हूँ:

जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा
सब जीता किए मुझसे, मैं हरदम ही हारा 
तुम हार के दिल अपना मेरी जीत अमर कर दो

youtube video link:
https://www.youtube.com/watch?v=v5gIjY_G2-s

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बुधवार, 20 जुलाई 2022

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

भूपिंदर नहीं रहे। न जाने क्यों अट्ठारह जुलाई के दिन का कोमल भावनाओं एवं संगीत से संबंध रखने वाले कलाकारों से एक विचित्र-सा संबंध मुझे दृष्टिगोचर हुआ ? ठीक एक दशक पूर्व इसी दिन अपने समय में प्रेमिल चलचित्रों के पर्याय बन चुके राजेश खन्ना दिवंगत हुए थे। उस घटना के परिणामस्वरूप मेरी लेखनी से उनकी कालजयी फ़िल्म 'अमर प्रेम' (१९७२) पर एक लेख फूट पड़ा था। आज भूपिंदर के देहावसान के दुखद समाचार ने मुझे 'हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा' गीत की याद दिला दी। मैंने 'परिचय' में रेखांकित किया है कि हिन्दी फ़िल्मी गीतों में मेरा सर्वप्रिय गीत यही है। 

६ फ़रवरी, १९४० को अमृतसर में एक संगीत शिक्षक के पुत्र के रूप में जन्मे भूपिंदर के हृदय में संगीत के प्रति प्रेम विलम्ब से जागृत हुआ किन्तु एक बार जागृत हो गया तो उसके उपरान्त संगीत से उनका संबंध जीवनपर्यन्त रहा। उन्होंने गिटार तथा वायलिन बजाना सीखा एवं ग़ज़ल गायकी में रूचि लेना आरंभ किया। अंततः तो वे ग़ज़ल गायक के रूप में ही सुविख्यात हुए किन्तु उनके गायन की यात्रा तब आरंभ हुई जब १९६२ में (जिन दिनों वे आकाशवाणी में सेवारत थे), प्रारब्ध ने उनकी भेंट हिन्दी फ़िल्मों के महान संगीतकार मदन मोहन जी से करवा दी। मदन मोहन जी की प्रेरणा से वे दिल्ली से मुम्बई (बम्बई) चले आए। प्रसिद्ध फ़िल्मकार चेतन आनंद जी ने जब भारत-चीन युद्ध पर आधारित अपनी अमर कृति 'हक़ीक़त' (१९६४) का निर्माण किया तो उसका संगीत मदन मोहन जी ने दिया। और कैफ़ी आज़मी साहब के रचे हुए हृदयस्पर्शी गीतों पर मदन मोहन जी ने कालजयी संगीत का सृजन किया। इन दोनों विभूतियों ने सात मिनट की अवधि तथा चार अंतरों वाला एक असाधारण गीत सिरजा जिसकी आरंभिक पंक्ति है - हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा। इसके द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ अंतरों को गाने हेतु मदन मोहन जी ने तीन वरिष्ठ एवं दिग्गज गायकों - क्रमशः मोहम्मद रफ़ी, तलत महमूद एवं मन्ना डे का चयन किया किन्तु गीत की स्थायी एवं प्रथम अंतरे के गायन हेतु उन्होंने अत्यंत युवा भूपिंदर को चुना। और भूपिंदर का गाया हुआ वह प्रथम गीत ही हिंदी फ़िल्म संगीत के इतिहास की अनमोल धरोहर बन गया। इस गीत को पटल पर देखते समय संगीत, साहित्य तथा सिनेमा के प्रेमी इस प्रकार मंत्रमुग्ध हो जाते हैं कि किसी को सूझता ही नहीं कि गीत को गाते हुए जो अभिनेता फ़िल्म के दृश्य में दिखाई दे रहे हैं; वे भी कोई अन्य नहीं, स्वयं भूपिंदर ही हैं। 

भूपिंदर कभी काम पाने के निमित्त किसी के पीछे नहीं भागे। इसीलिए उन्होंने फ़िल्मी गीत कम ही गाए लेकिन जो गाए, उनमें से अधिकांश ऐसे रहे जो संगीत के शैदाइयों के लिए हीरे-जवाहरात से भी ज़्यादा क़ीमती साबित हुए। इसी वर्ष सुर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर भी दिवंगत हुई हैं। भूपिंदर ने लता जी के साथ शास्त्रीय राग 'यमन कल्याण' पर आधारित 'बीती ना बिताई रैना' (परिचय-१९७२) तथा 'नाम गुम जाएगा' (किनारा-१९७७) जैसे अविस्मरणीय गीत गाए। 'घरौंदा' (१९७७) फ़िल्म के लिए रूना लैला जी के साथ मिलकर 'दो दीवाने शहर में' मस्ती के साथ गाया तो उसी गीत का एकाकी संस्करण 'एक अकेला इस शहर में' उदास स्वर में भी गाया। फ़िल्मी गायन के क्षेत्र में उन्हें ब्रेक देने वाले मदन मोहन जी ने ही उनसे गुलज़ार साहब द्वारा फ़िल्म 'मौसम' (१९७५) हेतु रचित असाधारण गीत 'दिल ढूंढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन' गवाया - लता जी के साथ भी (द्रुत गति में) एवं अकेले भी (मद्धम गति में)। इनके अलावा 'रुत जवां जवां' (आख़िरी ख़त-१९६६), 'आने से उसके आए बहार' (जीने की राह-१९६९), 'ज़िंदगी मेरे घर आना' (दूरियाँ-१९७९), 'थोड़ी सी जमीन थोड़ा आसमान' (सितारा-१९८०), 'हुज़ूर इस क़दर भी न इतरा के चलिए' (मासूम-१९८३) और 'आवाज़ दी है आशिक़ नज़र ने' (ऐतबार-१९८५) जैसे कई यादगार गीतों में भूपिंदर ने अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा।

उन्होंने कई फ़िल्मी गीतों के लिए अपना स्वर देने के स्थान पर गिटार ही बजाया। क्या 'चिंगारी कोई भड़के' (अमर प्रेम-१९७२), 'तुम जो मिल गए हो' (हंसते ज़ख़्म-१९७३), 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' (यादों की बारात-१९७३) और 'चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना' (चलते चलते-१९७६) जैसे सुमधुर गीतों को सुनते हम कल्पना कर सकते हैं कि उस गीत के संगीत में जो गिटार बज रहा है, उसे भूपिंदर बजा रहे हैं ? 

लेकिन उनका मन ग़ज़ल गाने में ज़्यादा रमता था। उन्होंने निदा फ़ाज़ली साहब की कालजयी ग़ज़ल 'कभी किसी को मुक़म्मल जहाँ नहीं मिलता' को अपने स्वर में भी अजरअमर कर दिया। यह ग़ज़ल फ़िल्म 'आहिस्ता आहिस्ता' (१९८१) में सम्मिलित की गई जिसे ख़य्याम साहब ने संगीतबद्ध किया। और 'ऐतबार' (१९८५) फ़िल्म के लिए भूपिंदर द्वारा आशा भोसले जी के साथ गाई हुई ग़ज़ल 'किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है' निस्संदेह हिन्दी सिने-संगीत की सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लों में सम्मिलित की जा सकती है (इसे हसन कमाल जी ने लिखा था एवं बप्पी लहरी जी ने संगीतबद्ध किया था)। अंततः जब सत्तर के दशक के अंत में टेप पर बजाई जाने वाली कैसेटों के युग के सूत्रपात के साथ ग़ैर-फ़िल्मी ग़ज़लों का दौर आरम्भ हुआ तो भूपिंदर की गाई हुई ग़ज़लों ने शायरी और मौसीक़ी दोनों ही के शैदाइयों के दिल लूट लिए। 

१९७८ में भूपिंदर की मुलाक़ात बांग्लादेश की निवासिनी मिताली मुखर्जी से हुई जो ख़ुद भी एक गायिका थीं (और हैं)। सरहदें दिलों को मिलने से भला कब रोक पाई हैं ? प्यार हुआ और फिर भूपिंदर-मिताली शादी के बंधन में भी बंधे। दोनों मिलकर गाने लगे और फिर भूपिंदर-मिताली के 'आरज़ू', 'अर्ज़ किया है', 'गुलमोहर', 'तू साथ चल', 'दर्द'-ए-दिल', 'आपस की बात', 'अक्सर', 'जज़्बात', 'मोहब्बत', 'एक आरज़ू', 'शमा जलाए रखना', 'एक हसीन शाम', 'चाँदनी रात', 'आपके नाम' और 'दिल की ज़ुबां' जैसे सुरीले एलबम लोगों के दिलों पर छा गए। मिताली ने अपने एकल एलबम भी निकाले और इन दोनों ने बांग्ला भाषा में भी अपने गीतों के एलबम संगीत-प्रेमियों को प्रस्तुत किए। उन्हें गुलज़ार साहब का भी भरपूर साथ मिला जिसके परिणामस्वरूप संगीत तथा साहित्य दोनों ही के रसिकों को अनमोल उपहार मिले। भूपिंदर-मिताली द्वारा मिलकर गाई गई ग़ज़ल 'राहों पे नज़र रखना, होठों पे दुआ रखना, आ जाए कोई शायद, दरवाज़ा खुला रखना' एक ऐसा नायाब शाहकार है जिसे एक बार सुन लेने के बाद भूलना शायद ही मुमकिन हो।  

मैं इस महान गायक और संगीतज्ञ के साथ न्याय करने योग्य लेख लिखने में स्वयं को असमर्थ पा रहा हूँ। संगीत के संसार में भूपिंदर के योगदान पर तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है एवं लिखा जाना चाहिए। इस वक़्त मैं अपनी बात को भूपिंदर द्वारा फ़िल्म 'बाज़ार' (१९८२) के लिए गाई गई (बशर नवाज़ जी की लिखी हुई एवं ख़य्याम साहब द्वारा संगीतबद्ध) नज़्म की इन पंक्तियों के साथ विराम देता हूँ -  

करोगे याद तो हर बात याद आएगी 
गुज़रते वक़्त की हर मौज ठहर जाएगी

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शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

औरों के ग़म कैसे बाँटें ?

स्वर्गीय जगजीत सिंह जी की गाई हुई और रियाज़ ख़ैराबादी साहब की रची हुई एक ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद है जिसके बोल हैं - वो कौन है दुनिया में जिसे ग़म नहीं होता; किस घर में ख़ुशी होती है, मातम नहीं होता ? सच ही तो है। कोई विरला ही होता है जिसे जीवन में कभी दुख न मिला हो। ग़मगीन इंसान ख़ुद को इस गीत के बोलों से भी तसल्ली दे सकता है - दुनिया में कितना ग़म है, मेरा ग़म कितना कम है (जिसे हिन्दी फ़िल्म 'अमृत' के लिए आनंद बक्षी जी ने रचा तथा अनुराधा पौडवाल जी व मोहम्मद अज़ीज़ जी ने गाया)। लेकिन दुखते दिल को तसल्ली इतनी आसानी से कहाँ मिलती है ?

पुरातन काल में सुखभोगों में पले कपिलवस्तु राज्य के राजकुमार सिद्धार्थ ने नगर-भ्रमण करते हुए जब सर्वत्र दुख-ही-दुख देखा तो वे असहज होकर रात्रि के गहन अंधकार में गृह एवं परिवार (पत्नी यशोधरा एवं पुत्र राहुल) को त्याग कर सत्य के अण्वेषण हेतु निकल पड़े। और एक दिन उन्हें यह ज्ञान हुआ कि संसार में दुख है तथा दुख का कारण भी है। उन्होंने इस कारण के निवारण के उपाय भी विचारे तथा शेष जीवन गौतम बुद्ध बनकर संसार को अपने उपदेशों से आलोकित करने में व्यतीत किया।

मैंने इस बाबत जब भी सोचा, मुझे यही लगा कि ज्ञान हासिल करके बुद्ध ख़ुद तो तर गए मगर उनके बाद दुनिया में क्या वाक़ई कोई बेहतरी आई ? उन्होंने ठीक समझा कि संसार में दुख है और दुख का कारण भी है पर ... पर किसी के दुख के कारण का समाधान करके उसके दुख को दूर किया जाए अथवा उनकी भांति प्रत्येक व्यक्ति प्रयास करके जैसा ज्ञान उन्हें प्राप्त हुआ, वैसा ज्ञान प्राप्त करके दुखमुक्त हो जाए ? क्या प्रत्येक दुखी व्यक्ति हेतु ऐसा संभव है ? निश्चय ही नहीं है। उन्हीं की भांति संसार के भिन्न-भिन्न भागों में अनेक महापुरुष हुए जिन्होंने अपने उपदेशों द्वारा ज्ञान का प्रकाश विकीर्ण किया किन्तु उनके अवसान के उपरांत संसार में कोई विशेष गुणात्मक परिवर्तन नहीं आया। क्यों ?

इस प्रश्न का उत्तर मुझे रजनीश (ओशो) के एक कथन में मिला जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे महापुरुषों का व्यक्तित्व एक मशाल की भांति होता है लेकिन उस मशाल की ज्योति वस्तुतः वे स्वयं ही होते हैं; अतः जब तक वे जीवित रहते हैं, मशाल का प्रकाश विद्यमान रहता है एवं उनके देहावसान के साथ ही उस मशाल की ज्योति भी लुप्त हो जाती है; तदोपरांत उनके (वास्तविक भी, तथाकथित भी) अनुयायी केवल मशाल के बुझे हुए डंडे को लेकर उनके नाम की माला जपते रहते हैं। परिणाम ? संसार एवं मानवजाति मन एवं व्यवहार से वैसी ही बनी रहती है जैसी उनके आगमन से पूर्व थी।

विगत वर्ष हमने सुप्रसिद्ध शायर कुँअर बेचैन जी को खोया जिन्होंने अपनी एक ग़ज़ल के एक शेर के द्वारा दुख के निवारण (अथवा उसे न्यून करने) का उपाय बताया है -  तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी, किसी के पाँव का काँटा निकालकर देखो। मैंने इस बात पर एक अरसे तक यकीन किया। अब नहीं करता हूँ क्योंकि अपने पिता की ज़िन्दगी को देखकर और अपनी ज़िन्दगी को गुज़ारते हुए मैंने इस हक़ीक़त को जान लिया है कि औरों के ग़म बाँटने से अपने ज़ख़्म नहीं भरते हैं।

फिर भी कुँअर बेचैन जी ने जो कहा, उसकी महत्ता किसी भी दृष्टिकोण से कम नही आँकी जा सकती। समग्रता में दुख को घटाने का इससे उत्तम उपाय कोई अन्य नहीं है कि प्राणी परस्पर दुख बांटें। यह वह भावनात्मक बीमा है जिसकी अवधि (अर्थात् दुख बाँटने वाले की आयु) पूर्ण हो जाने पर आत्मिक संतोष के अतिरिक्त सम्भवतः कुछ भी प्राप्त नहीं होता किन्तु समाज को, मानवता को एवं सम्पूर्ण सृष्टि को इस अवधि में बहुत कुछ प्राप्त होता है। 

दुखी व्यक्ति किसी पर विश्वास करने का इच्छुक तो होता है किन्तु उसके लिए यह कोई सरल निर्णय नहीं होता क्योंकि जैसा कि कविवर रहीम ने सैकड़ों वर्ष पूर्व ही परामर्श दिया था -  

रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय 
सुनि अठिलैहें लोग सब, बाँटि न लैहें कोय

अपना दुख अन्य व्यक्तियों के मनोरंजन का साधन बन जाए, यह किसी दुखी व्यक्ति को भला कैसे स्वीकार्य होगा ? ग़मज़दा इंसान क्या किसी को अपनी दास्तान-ए-ग़म इसलिए सुनाए कि वह सुनकर उसी का मज़ाक़ उड़ाने लगे ? क्या अपने दिल का ज़ख़्म किसी के सामने इसलिए उघाड़ा जाए कि वह उस पर नमक बुरकने लगे ? किसे गवारा हो सकता है यह ? लेकिन अफ़सोस की बात यही है कि अक्सर ऐसे ही लोग मिलते हैं ज़माने में जो दूसरों की हालत को समझने की तक़लीफ़ उठाने की जगह उन्हीं पर फ़तवे देने लगते हैं (अंग्रेज़ी में इसे जजमेंटल होना कहते हैं)।

दूसरों के दुख बाँटने का अभिलाषी अनिवार्य रूप से एक संवेदनशील व्यक्ति होता है (या होती है) - वास्तविक अर्थों में संवेदनशील जिसकी संवेदना 'मुँह देखकर तिलक करने' वाली न हो, प्रदर्शनी न हो, संवेदना प्रकट करने का अभिनय न हो। ऐसा व्यक्ति दूसरों पर बात-बेबात टीका-टिप्पणी करने वाला (जजमेंटल) नहीं हो सकता (या सकती। क्या विशेषताएं होनी चाहिए उस व्यक्ति में जो दूसरों के दुख बाँटना चाहे ? 

यदि दुखी व्यक्ति के दुख का कारण उसके साथ हुआ कोई अन्याय अथवा उस पर हुआ कोई अत्याचार है तो उसका दुख तो न्याय मिलने से ही कम हो सकता है। जो व्यक्ति इस संदर्भ में उसकी सहायता करने में सक्षम हैं, वे इस प्रकार उसका दुख बाँट सकते हैं किन्तु प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति ऐसा सक्षम नहीं होता (यद्यपि सौभाग्य से अनेक व्यक्तियों ने अपने सीमित संसाधनों के साथ भी इस दिशा में सार्थक कार्य किया है एवं उनमें से अधिकांश ने इसका व्यक्तिगत स्तर पर भारी मूल्य भी चुकाया है)। ऐसे में दुख बाँटने का कार्य कहे-अनकहे शब्दों द्वारा किया जा सकता है। मैं इसी संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य एवं अपने विचार रखने जा रहा हूँ।

यदि आप किसी दुखी (अथवा परेशान) व्यक्ति की भौतिक रूप से सहायता करते हैं तो इतना ध्यान रहे कि ऐसा करते समय आपकी किसी बात अथवा भाव-भंगिमा से उसके आत्म-सम्मान को ठेस न लगे। हमारी संस्कृति में दान एवं उसके द्वारा दीन-दुखियों-निर्धनों की सहायता करने की बड़ी महिमा है किन्तु दान केवल दाता पर ही नहीं, प्राप्तकर्ता भी निर्भर करता है। ख़ुद्दार इंसान को ज़रूरतमंद होते हुए भी किसी के सामने हाथ पसारना या अपनी ग़रीबी और बेबसी को बे-पर्दा करना मंज़ूर नहीं होता। श्रीकृष्ण-कथा में सुदामा का चरित्र इसका अनुपम उदाहरण है। अगर कोई मददगार उसकी ख़ुद्दारी को चोट पहुँचाकर उसकी मदद भी करे तो ऐसी मदद उसके लिए ज़हर जैसी ही होती है जिसे वह अपनी मजबूरी की वजह से क़ुबूल भी कर ले तो ताज़िन्दगी उसे चैन नहीं मिलता (मेरे अपने साथ जीवन में ऐसा एक से अधिक बार हो चुका है)। इसलिए मेरा दूसरों की सहायता करने वालों से निवेदन है कि सहायता करते समय ध्यान रखें कि उनके किसी भी कथन अथवा कृत्य से सहायता लेने वाले का स्वाभिमान आहत न हो, अन्यथा वह सहायता उस दुखी के दुख को घटाने के स्थान पर बढ़ा सकती है। एक अन्य महत्वपूर्ण बात जो मैं रेखांकित करना चाहता हूँ, वह यह है कि यदि आप किसी की सहायता न कर सकें तो कम-से-कम उसे कोई बिन मांगी सलाह (या उपदेश) भी न दें।

और ग़मगीन इंसान का ग़म उसे बिना कुछ दिये या उसके लिए बिना कुछ किये भी बाँटा जा सकता है। अगर हक़ीक़तन हम किसी का ग़म बाँटना चाहते हैं तो उस पर अपने दिल का हाल कहने के लिए दबाव नहीं डालना चाहिए। अगर हमारी छवि उसकी नज़र में अच्छी है और ऐसी है कि वह हम पर अपना ऐतबार ला सके तो वह ख़ुद ही कहेगा (या कहेगी)। ऐसे में केवल चुप रहना और अपनी मौजूदगी से उसे अपनेपन का एहसास दिलाना ही काफ़ी है। यदि वह एकांत की इच्छा प्रकट करे तो कुछ समय के लिए उसे एकांत अवश्य देना चाहिए (बीच-बीच में छुपकर उस पर दृष्टि रखकर इस बात का ध्यान रखते हुए कि कहीं उसका दुख अवसाद का रूप लेकर उसे आत्मघात अथवा ऐसा ही कोई अन्य नकारात्मक कार्य करने के पथ पर न ढकेल दे)।

मैंने कई बार ऐसा देखा (और भुगता भी) है कि दुखी व्यक्ति से संबद्ध लोग (उसके दुख को जाने बिना ही) उस पर कुछ-न-कुछ खाने-पीने का दबाव डालने लगते हैं। माना कि जीवन के लिए आहार अनिवार्य है लेकिन जिसका मन दुखी हो, उसे इस प्रकार का दबाव और अधिक मानसिक कष्ट देता है। जब वह व्यक्ति दुख से कुछ उबरकर सामान्य अवस्था की ओर लौटेगा (या लौटेगी) तो स्वतः ही उसकी देह की आवश्यकता उसे आहार ग्रहण करने के लिए प्रेरित करेगी। उससे पहले उसके चाहे बिना उसे बलपूर्वक कुछ खिलाना (या पिलाना) या इसके लिए उसे बार-बार कहना उस दुखी व्यक्ति के दुख की अग्नि में घी का ही काम करता है और उसका दुख चिड़चिड़ेपन में परिवर्तित हो जाता है। दुख घटने में अपना समय लेता है एवं दुखी मन को कुछ भी नहीं सुहाता, इस तथ्य को समझा जाना चाहिए विशेष रूप से तब जब दुखी के दुख का कारण भी भलीभांति ज्ञात न हो।

और अगर वह इंसान अपने दिल का दर्द बाँटना चाहे तो उसकी बात बिना उसे रोके‌-टोके बेहद सब्र के साथ सुनी जानी चाहिए। धीरज के साथ किसी दुखी व्यक्ति की दुखभरी बात को बिना व्यवधान डाले सुन लेना उसके घाव पर शीतल लेप लगाने के समान है जिससे कुछ समय के लिए तो उसे हलकापन तथा विश्रांति का अनुभव होता ही है। उसके वक्तव्य के बीच-बीच में हुंकारा भरना एवं यदि वह बोलते-बोलते एकाएक मौन हो जाए तो उसे आगे बोलने हेतु (एक-दो शब्दों के द्वारा) तनिक प्रोत्साहन दे देना ही पर्याप्त होता है। अगर वह रोने लगे तो उसे ज़बरदस्ती चुप कराने की जगह थोड़ा-सा ढाढ़स बंधाना और उसके आँसुओं को निकल जाने देना ही ठीक होता है। मेरे नज़रिये में ऐसे शख़्स को रोने से कभी रोका नहीं जाना चाहिए जिसके दिल के फफोले आपके सामने फूटे हों। आँसुओं के साथ पूरा दर्द चाहे न निकले, उसका एक हिस्सा तो निकल ही जाता है। और उसके बाद जो ऐतबार उसने सुनने वाले पर जताया है, उसे क़ायम रखते हुए जब तक हो सके (और जहाँ तक मुनासिब हो), उसकी बताई हुई बात को राज़ ही रखा जाना चाहिए। यदि दुखी व्यक्ति को यह ज्ञात हो कि उसने जिस पर विश्वास करके उसके समक्ष अपने हृदय की पीड़ा को प्रकट किया था, उसने उसकी गोपनीयता भंग कर दी तो उसकी पीड़ा तो बढ़ेगी ही, उसके लिए  अपने जीवन में पुनः किसी अन्य पर विश्वास करना भी अत्यंत कठिन हो जाएगा। 

जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, किसी का दुख बाँटने की प्रक्रिया में स्वयं उस पर अथवा उसके साथ जो बीती है, उस पर अनावश्यक टीका‌-टिप्पणी करना सर्वथा वर्जनीय है। पहली बात तो यह है कि आप सर्वज्ञ नहीं हैं एवं बिना यथेष्ट जानकारी एवं अनुभव के अपना ज्ञान (नि:शुल्क) वितरित करना कोई बुद्धिमत्ता अथवा परिपक्वता नहीं है। दूसरे, ज़िन्दगी सबके साथ जुदा-जुदा ढंग से पेश आती है, इसीलिए लोगों के तजुर्बात और दर्द भी जुदा-जुदा होते हैं। अपनी तक़लीफ़ को मुक़म्मल तौर से वही जानता (या जानती) है जिस पर गुज़री है। जूता कहाँ काटता है, यह जूता पहनने वाले को ही पता चल सकता है, न पहनने वाले को नहीं। अतः किसी का ग़म बाँटने के लिए उसके हालात को उसकी नज़र से देखने की कोशिश करनी चाहिए। यह काम मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं। ग़मज़दा इंसान की जगह पर ख़ुद को रखकर देखने पर हम उसके ग़म और उसके दिल की हालत को बेहतर समझ सकते हैं, उसके दर्द को बाँटने की ज़िम्मेदारी बेहतर ढंग से निबाह सकते हैं। हमें इस बात को भी गाँठ बाँध लेना चाहिए कि दूसरे का दर्द बाँटकर हम उस पर कोई एहसान नहीं कर रहे हैं। अगर हम अच्छे हैं तो हमारी अच्छाई अपना इनाम ख़ुद है, हमें बदले में कुछ मिलने की उम्मीद कभी नहीं करनी चाहिए (हमदर्दी के बदले हमदर्दी की भी नहीं)।

बरसों पहले मेरे एक दोस्त ने एक बार बातचीत के दौरान मुझसे कहा था - जो सबकी परवाह करता है, उसकी परवाह कोई नहीं करता है। मैंने इस सत्य को अपने स्वर्गीय पिता के जीवन में प्रत्यक्ष देखा एवं धीरे-धीरे अनुभव से यह जाना कि निस्वार्थ भाव से अन्य व्यक्तियों के दुख बाँटने वाले सभी लोगों के साथ ऐसा चाहे न होता हो, अधिकांश के साथ तो होता ही है कि उनके अपने दुख को समझने वाला उन्हें कोई नहीं मिलता (बाँटने वाले की तो बात ही छोड़िए)। लेकिन ऐसे सोने का दिल रखने वाले लोगों को इस कड़वी सच्चाई का सामना करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। अगर औरों के ग़म बाँटते रहने पर भी ख़ुद उन्हें सारी ज़िन्दगी घुट-घुटकर जीना पड़े तो उन्हें कोई शिकवा नहीं करना चाहिए और अपने लिए यही मान लेना चाहिए कि - 

ज़ख़्म-ए-दिल-ओ-जिगर की नुमाइश फ़िज़ूल है 
हर एक से इलाज की ख़्वाहिश फ़िज़ूल है

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बुधवार, 29 जून 2022

चालीस मिनट की ज़िन्दगी

कहते हैं ज़िन्दगी बरसों की नहीं, पलों की होती है। जीना तो बस उन पलों का ही होता है जो जी भरकर जी लिए जाएं और उन्हीं की यादों में बाक़ी की ज़िन्दगी गुज़ार दी जाए। वरना तो सुबह होती है, शाम होती है; उम्र यूँ ही तमाम होती है। बरसोंबरस गीली लकड़ी की तरह धुआँ छोड़ते रहने से कहीं बेहतर है एक बार भभक कर तेज़ी से जल उठना और फिर हमेशा के लिए बुझ जाना। मैदान चाहे जंग का हो या फिर खेल का या फिर कोई और, हर जगह यही मिसाल मौजूं होती है। बरसोंबरस भेड़ की तरह जीने की जगह एक दिन शेर की तरह जियो तो जानो कि ज़िन्दगी क्या होती है।

क्रिकेट का खेल आज बहुत लोकप्रिय हो चुका है और इसके कई छोटे प्रारूप सामने आ चुके हैं जो लंबे और धीमे समझे जाने वाले प्रारूप को लोकप्रियता के संदर्भ में पश्चगामी बनाते जा रहे हैं। लेकिन खेल का दो पारियों वाला लम्बा क्लासिक प्रारूप भी सदा धीमी गति का ही नहीं रहा। विस्फोटक बल्लेबाज़ जो चौके-छक्के मारकर तीव्र गति से रन बनाया करते थे, भी इस खेल के जन्म के उपरांत प्रत्येक युग में अवतरित हुए हैं जिन्होंने दर्शकों के लिए अविस्मरणीय बन जाने वाली पारियां खेलीं। एक शताब्दी से भी अधिक समय पूर्व घटित हुए एक ऐसे ही प्रसंग को आज मैं स्मरण कर रहा हूँ जिसे इस आलेख के प्रथम अनुच्छेद में वर्णित जीवन-दर्शन से संयुक्त करके देखा जा सकता है।

यदि किसी व्यक्ति की बाहें उसकी शेष देह के अनुपात में अधिक लम्बी हों तो उसे संस्कृत में आजानुबाहु कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि ऐसे व्यक्ति को तो किसी देश का राजा होना चाहिए। ६ मार्च१८८४ को इंग्लैंड के वेल्बेक नामक ग्राम में जन्मे एडविन बोअलर एलेटसन की बाहें तो ऐसी ही थीं लेकिन राजाओं वाली उसमें कोई बात नहीं थी। उसने क्रिकेट खेलना शुरु किया तथा युवा होते-होते नॉटिंघमशायर क्रिकेट क्लब से जुड़ गया। काउंटी क्रिकेट प्रतियोगिता प्रथम श्रेणी क्रिकेट की सर्वाधिक लोकप्रिय प्रतियोगिता आज भी है, उस युग में तो थी ही। १९११ में इसी प्रतियोगिता के एक मैच में एक दिन ऐसा आया जिसने एलेटसन को क्रिकेट के इतिहास में अमर बना दिया।


१८ मई १९११ के दिन इंग्लैंड के होव नगर में नॉटिंघमशायर का क्रिकेट दल ससेक्स के दल के विरूद्ध काउंटी प्रतियोगिता के अंतर्गत तीन दिवसीय मैच खेलने के लिए उतरा। एलेटसन वैसे तो बल्लेबाज़ी तथा गेंदबाज़ी दोनों ही किया करता था किन्तु स्थापित सत्य यही था कि उसने तब तक इन दोनों ही कार्यों में कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त नहीं की थी। उसे एकादश में प्रायः एक उपयोगी खिलाड़ी के रूप में सम्मिलित किया जाता था जो अपनी बलिष्ठ देह एवं चुस्ती-फुरती के कारण एक अच्छा क्षेत्ररक्षक था। उसका कुछ रन बना लेना या इक्का-दुक्का विकेट ले लेना ही उसके दल के लिए पर्याप्त होता था।

नॉटिंघमशायर ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए अपनी पहली पारी में २३८ रन बनाए जिसमें एलेटसन का योगदान केवल सात रनों का था। प्रत्युत्तर में ससेक्स ने शानदार प्रदर्शन करते हुए ४१४ रन बनाए तथा इस भांति पहली पारी में १७६ रनों की बड़ी बढ़त ले ली। एलेटसन ने गेंदबाज़ के रूप में केवल एक ओवर फेंका जिसमें उसे कोई विकेट नहीं मिला। 

पहली पारी में १७६ रनों से पिछड़ी नॉटिंघमशायर के दूसरी पारी में सात विकेट केवल १८५ रनों पर तब गिर चुके थे जब तीसरे और अंतिम दिन अर्थात्  मई १९११ को भोजनावकाश (लंच) से पूर्व एलेटसन नौवें नम्बर पर बल्लेबाज़ी करने के लिए मैदान में उतरा। एक नकारात्मक तथ्य यह भी था कि उस समय एलेटसन की कलाई में चोट लगी हुई थी। दूसरे छोर पर ली नामक बल्लेबाज़ था। सत्र में लगभग पचास मिनट का खेल बाक़ी था जिसमें एलेटसन ने अपेक्षा से बेहतर बल्लेबाज़ी करते हुए सैंतालीस रन बनाए लेकिन उसके दल के दो विकेट और गिर गए तथा स्कोर नौ विकेट पर २६० रन तक पहुँचा। हार का ख़तरा अभी भी नॉटिंघमशायर के ऊपर मंडरा रहा था। 

भोजनावकाश के उपरांत दूसरे सत्र में ४७ रनों पर खेल रहा एलेटसन अंतिम बल्लेबाज़ राइली के साथ अपने दल की दूसरी पारी को आगे बढ़ाने के लिए मैदान में वापस आया। दर्शकों, प्रतिपक्षी दल के खिलाड़ियों तथा खेल के विशेषज्ञों में से सम्भवतः किसी को भी इस पारी के कुछ और मिनटों एवं कुछ और रनों से अधिक चल पाने की आशा नहीं थी। लेकिन जो हुआ, वह किसी की भी कल्पनाओं से परे था। 

अगले चालीस मिनटों में होव के उस सेंट्रल काउंटी मैदान में जैसे कोई भयानक तूफ़ान आया जो ससेक्स के गेंदबाज़ों तथा क्षेत्ररक्षकों पर क़हर बनकर टूटा। आज के टी-20 क्रिकेट के दौर में भी ऐसी असाधारण बल्लेबाज़ी की कल्पना नहीं की जा सकती जैसी उन चालीस मिनटों में एलेटसन ने की। उसने अंतिम बल्लेबाज़ राइली के साथ अंतिम विकेट पर १५२ रन जोड़े जिनमें से १४२ रन उसने अकेले ही बना डाले। उसने ऐसेऐसे शॉट लगाए कि पाँच बार तो गेंदें ही स्टेडियम से बाहर जाकर खो गईं। आख़िर मैच के अम्पायरों ने गेंदों का नया डिब्बा ही खोल दिया। उसके दो शॉटों ने स्टेडियम के दो स्थानों पर शीशे तोड़ दिए। पहली पारी में पाँच विकेट लेने वाले ससेक्स के गेंदबाज़ किलिक के एक ही ओवर में एलेटसन ने चौंतीस रन बना डाले जो कि प्रथम श्रेणी क्रिकेट में एक ओवर में किसी बल्लेबाज़ द्वारा सर्वाधिक रन बनाए जाने का विश्व कीर्तिमान बन गया एवं कई दशक तक बना रहा। दर्शक ही नहीं, प्रतिपक्षी दल के खिलाड़ी भी बदहवास से उस मंत्रमुग्ध कर देने वाले बल्लेबाज़ी प्रदर्शन को देख रहे थे जो अविश्वसनीय था पर उनकी आँखों के सामने हो रहा था। ऐसी बल्लेबाज़ी हो रही थी जो उच्च श्रेणी के क्रिकेट में न पहले कभी देखी गई थी, न सुनी गई थी। मुश्किल से नब्बे मिनटों में खेली गई १८९ की अपनी उस पारी में एलेटसन ने तेईस चौके और आठ छक्के लगाए। उसकी यह कभी न भुलाई जा सकने वाली पारी तब समाप्त हुई जब कॉक्स नामक गेंदबाज़ द्वारा डाली गई गेंद पर सीमा रेखा पर खड़े स्मिथ नामक क्षेत्ररक्षक ने उसका कैच पकड़ लिया। ख़ास बात यह थी कि एलेटसन फिर भी आउट नहीं था क्योंकि कैच लेते समय स्मिथ का एक पैर सीमा रेखा (बाउंड्री वॉल) के बाहर था, अतः खेल के नियमों के अनुसार वह एक और छक्का था। एलेटसन चाहता तो अभी और खेलता रह सकता था और शायद वह प्रथम श्रेणी क्रिकेट के सबसे तेज़ दोहरे शतक का ऐसा कीर्तिमान भी बना सकता था जो एक सदी में भी न टूट पाता। लेकिन उसका मन भर गया था। शायद चालीस मिनट में वह एक पूरी ज़िन्दगी जी चुका था। वह बिना कुछ कहे या अम्पायर की ओर देखे पैविलियन लौट गया।

एलेटसन की इस ऐतिहासिक पारी की बदौलत नॉटिंघमशायर ने अपनी दूसरी पारी में ४१२ रन बनाए और हारने की हालत से जीतने की हालत में जा पहुँची लेकिन समय समाप्त हो जाने के कारण वह मैच ड्रॉ (अनिर्णीत) रहा।

एलेटसन ने उसके बाद कभी शतक नहीं बनाया और तीन साल बाद उसका क्रिकेट करियर भी समाप्त हो गया लेकिन उसे क्रिकेट के इतिहास में अमर बना देने के लिए उसकी वह एक पारी और उस पारी के भी अंतिम चालीस मिनट ही काफ़ी रहे।

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