गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

यादों में बदले चाँदनी के लम्हे

२५ फ़रवरी, २०१८ की सुबह फैली इस ख़बर पर कानों ने यकीन करने से इनकार कर दिया कि निर्विवाद रूप से भारतीय रजतपट की सबसे अधिक लोकप्रिय नायिकाओं में से एक – श्रीदेवी नहीं रहीं । भारत में ही नहीं संसार भर में बिखरे उनके करोड़ों प्रशंसकों को एक ऐसा आघात लगा जिससे उबरना तो क्या, जिसे आत्मसात् करना भी अल्पकाल में संभव नहीं । बहुत समय लगेगा हम सभी को इस सत्य को स्वीकार करने में कि अपनी निश्छल-निर्मल  हँसी और मर्मस्पर्शी अभिनय का जादू चलाने वाली और कई भारतीय भाषाओं के दर्शकों के हृदय पर एकछत्र राज करने वाली यह अद्भुत तारिका अब दिगंत में विलीन हो चुकी है, स्मृति-शेष रह गई है । 

(संभवतः पारिवारिक परिस्थितियों के वशीभूत होकर) बाल्यावस्था से ही अभिनय के क्षेत्र में उतर पड़ने वाली श्रीदेवी ने अपने जीवन का अधिकांश भाग एक अभिनेत्री के रूप में कार्य करते हुए व्यतीत किया । तमिल, तेलुगू और मलयालम फ़िल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम करते-करते श्रीदेवी को हिन्दी फ़िल्मों में भी काम मिलने लगा ।  कन्नड़ अभिनेत्री लक्ष्मी को शीर्षक भूमिका में प्रस्तुत करती अविस्मरणीय हिन्दी फ़िल्म जूली (१९७५) में माई हार्ट इज़ बीटिंग गीत पर उस परिवार के सदस्यों की भूमिकाएं निभा रहे कलाकारों के साथ नृत्य करती बालिका श्रीदेवी की स्मृति संभवतः सभी सिने-प्रेमियों को होगी । कमल हासन और रजनीकान्त जैसे दक्षिण भारतीय सितारों के साथ ढेरों फ़िल्में करने वाली श्रीदेवी को किसी हिन्दी फ़िल्म की नायिका के रूप में पहली बार सोलवां साल (१९७९) में देखा गया लेकिन उन्हें पहचान हिम्मतवाला (१९८३) से मिली । उसकी सफलता के उपरांत श्रीदेवी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा । उन्होंने न केवल हेमा मालिनी तथा रेखा सरीखी शीर्षस्थ नायिकाओं के वर्चस्व को तोड़ा वरन जयाप्रदा, रति अग्निहोत्री, पद्मिनी कोल्हापुरे तथा पूनम ढिल्लों जैसी अपनी समकालीन नायिकाओं को लोकप्रियता के मापदंड पर बहुत पीछे छोड़ दिया । अभिनय के साथ ही विभिन्न प्रकार के नृत्यों में भी प्रवीण श्रीदेवी को नगीना (१९८६) और मिस्टर इंडिया (१९८७) ने व्यावसायिक सफलता के नए शिखरों तक पहुँचाया और अंततः वह दिन भी आया जब अपनी आगामी फ़िल्म के लिए नायिका खोज रहे हिन्दी फ़िल्मों के अत्यंत सम्मानित निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा की दृष्टि उन पर पड़ी । 

यश चोपड़ा की विगत तीन फ़िल्में – मशाल (१९८४), फ़ासले (१९८५) तथा विजय (१९८८) व्यावसायिक दृष्टि से असफल रही थीं । रूमानी फ़िल्में बनाने में सिद्धहस्त माने जाने वाले यश चोपड़ा की ये फ़िल्में भिन्न प्रकृति के विषयों पर आधारित थीं । अपनी इन असफलताओं से सबक ग्रहण करते हुए यश जी पुनः प्रेमकथाओं की ओर लौटे और योजना बनी चाँदनी नामक फ़िल्म की । कामना चंद्रा द्वारा लिखित चाँदनी (१९८९) एक त्रिकोणीय प्रेमकथा थी जिसके दो नायकों – ऋषि कपूर तथा विनोद खन्ना के मध्य में अटकी नायिका की शीर्षक भूमिका श्रीदेवी ने निभाई और ऐसी निभाई कि न केवल यह फ़िल्म यश जी को उनकी पुरानी प्रतिष्ठा दिलाने में सफल रही, वरन इसने श्वेत परिधान में लिपटी चाँदनी के रूप में श्रीदेवी को अमर कर दिया । महान संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा तथा महान बाँसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया ने इस फ़िल्म के लिए कालजयी संगीत रचा जिस पर लता मंगेशकर के सुरीले स्वर पर श्रीदेवी ने मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियाँ हैं गीत में कुछ इस तरह से नृत्य-प्रस्तुति दी जो संगीत-प्रेमियों एवं सिने-प्रेमियों दोनों ही के हृदय-पटल पर सदा के लिए अंकित होकर रह गई । इस गीत के अतिरिक्त अन्य गीतों पर भी श्रीदेवी ने संबंधित दृश्यों की आवश्यकताओं के अनुरूप अत्यंत प्रभावशाली प्रस्तुतियां दीं । चाँदनी मेरी चाँदनी गीत में तो उनकी शोख़ आवाज़ भी है जो कान में पड़ते ही सुनने वाले के दिल को गुदगुदा जाती है । केवल गीत-नृत्यों में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण फ़िल्म में श्रीदेवी ने नायिका की भावनाओं को कुछ ऐसी तीव्रता से प्रस्तुत किया कि वह प्रेम कृत्रिम अथवा प्रदर्शनी न रहकर वास्तविकता के निकट जा पहुँचा और ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को गहनता से स्पर्श कर गया जिसने अपने जीवन में किसी को निष्ठापूर्वक प्रेम किया हो । यश जी की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक मानी जाने वाली चाँदनी को आज मुख्यतः श्रीदेवी के कारण ही याद किया जाता है । 

चाँदनी की देशव्यापी सफलता के उपरांत उसी वर्ष चालबाज़ प्रदर्शित हुई जो कि सीता और गीता (१९७२) नामक पुरानी हिन्दी फ़िल्म का रीमेक थी । नायिका-प्रधान मूल फ़िल्म में हेमा मालिनी ने दो पूर्णतः विपरीत प्रकृति वाली जुड़वां बहनों की दोहरी भूमिका निभाई थी । श्रीदेवी ने भी चालबाज़ में वही कमाल कर दिखाया जो हेमा मालिनी ने सीता और गीता में कर दिखाया था । उनके दो भिन्न-भिन्न रूपों ने दर्शकों के दिल जीत लिए । 

इधर यश चोपड़ा ने अपनी नई फ़िल्म की रूपरेखा तैयार की जो पुनः एक प्रेमकथा ही थी लेकिन एक नए प्रकार की प्रेमकथा जिसको पारंपरिक भारतीय दर्शकों की मानसिकता को ध्यान में रखते हुए चित्रपट पर निरूपित करना एक बहुत बड़ा जोखिम था । इसकी कहानी एक युवती के अपने से आयु में बहुत बड़े एक ऐसे पुरुष से प्रेम करने की बात कहती थी जो कि अपनी युवावस्था में उसकी दिवंगत माता से एकपक्षीय प्रेम करता था । यश चोपड़ा ने इस साहसिक कथा को फ़िल्माने का जोखिम उठाया और लम्हे (१९९१) रूपहले परदे पर उतरी । पुरुष की भूमिका में अनिल कपूर को लिया गया लेकिन माता और पुत्री की दोहरी भूमिका के लिए एक बार पुनः यश जी की नज़र जाकर श्रीदेवी पर ही ठहरी । जैसी कि आशंका थी, यह अत्यंत सुंदर फ़िल्म पारंपरिक सोच वाले भारतीय समाज द्वारा स्वीकार नहीं की जा सकी और व्यावसायिक दृष्टि से असफल रही । किन्तु श्रीदेवी ने इस कठिन परीक्षा को उच्च श्रेणी से उत्तीर्ण किया और दर्शकों तथा समीक्षकों दोनों से ही अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवा लिया । राजस्थानी लोकगीत – मोरनी बागां मां बोले आधी रात मां पर श्रीदेवी का प्रदर्शन कौन भूल सकता है ? लम्हे चाहे व्यावसायिक दृष्टि से सफल न रही हो, आज उसेक्लासिक की श्रेणी में रखा जाता है । 

वर्ष १९८७ में फ़िल्म मिस्टर इंडिया के निर्माण के साथ ही श्रीदेवी का संबंध फ़िल्म-निर्माता बोनी कपूर (वास्तविक नाम – अचल कपूर) से जुड़ा । निर्माता के रूप में स्थापित होने का प्रयास कर रहे बोनी कपूर तथा नायक के रूप में इस क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने हेतु संघर्षरत उनके छोटे भाई अनिल कपूर दोनों के ही लिए श्रीदेवी का इस फ़िल्म की नायिका की भूमिका स्वीकार करना मानो वरदान सिद्ध हुआ । साथ ही यह फ़िल्म निर्देशक शेखर कपूर के करियर में भी मील का पत्थर साबित हुई । काटे नहीं कटते ये दिन ये रात’, करते हैं हम प्यार मिस्टर इंडिया से और बिजली गिराने मैं हूँ आई जैसे गीतों पर श्रीदेवी के बिंदास नृत्यों और अभिनय ने धूम मचा दी । संभवतः इस फ़िल्म के बनने की प्रक्रिया के मध्य ही किसी पल बोनी और श्रीदेवी के हृदय के तार जुड़ गए और वह प्रेम आरंभ हुआ जिसकी परिणति एक दशक के उपरांत उनके विवाह में हुई । मुझे याद है कि अपने एक साक्षात्कार में अनिल कपूर ने स्पष्ट कहा था – बोनी ने मेरे लिए केवल एक फ़िल्म वो सात दिन (१९८३) बनाई थी; अपनी अन्य सभी फ़िल्मों का निर्माण उन्होंने केवल श्रीदेवी के लिए किया था ।  

श्रीदेवी से विवाह करने के इच्छुक पुरुषों की कभी कमी नहीं रही होगी । फिर भी उन्होंने किसी कुंवारे पुरुष के स्थान पर बोनी के रूप में एक दूजवर को क्यों चुना जिसने अपनी पहली पत्नी और अपने दो बच्चों की माता – (अब दिवंगत) मीना शौरी से विवाह-विच्छेद करके श्रीदेवी से विवाह किया ? इस प्रश्न का उत्तर संभवतः श्रीदेवी की उस संघर्षपूर्ण जीवन-गाथा में अंतर्निहित है जो बाल्यावस्था में ही आरंभ हो गई थी । किसी भी प्रेम को स्थायित्व वह विश्वास प्रदान करता है जो दूसरे व्यक्ति पर निस्संकोच किया जा सके । श्रीदेवी को संभवतः किसी अविवाहित पुरुष के स्थान पर यह विश्वास विवाहित बोनी से प्राप्त हुआ जिन्होंने उनकी माता की बीमारी तथा उसके उपरांत उनके देहावसान के समय में उन्हें वास्तविक एवं भावनात्मक संबल दिया । बेल करीबी दरख़्त का ही आसरा पकड़ती है । अमरलता रूपी श्रीदेवी को संभवतः बोनी जैसे दृढ़ एवं सबल वृक्ष का सहारा ही विश्वसनीय लगा । बोनी ने पहले से विवाहित होकर भी श्रीदेवी से विवाह करना क्यों चाहा, इसका उत्तर अब बोनी के अंतस में ही रहेगा । 

अस्सी के दशक के अंत में हिन्दी फ़िल्मों के आकाश पर धूमकेतु की तरह उभरीं माधुरी दीक्षित के आगमन के साथ ही श्रीदेवी का करियर ढलान की ओर बढ़ा । बोनी द्वारा बनाई गई रूप की रानी चोरों का राजा (१९९३) नामक महत्वाकांक्षी फ़िल्म घोर असफल रही । रूमानी नायिका के रूप में श्रीदेवी की अंतिम प्रदर्शित फ़िल्म मेरी बीवी का जवाब नहीं (२००४) थी जिसके दर्शकों के समक्ष आने में अत्यंत विलंब हुआ । वस्तुतः श्रीदेवी की अंतिम ऐसी फ़िल्म १९९७ में प्रदर्शित कौन सच्चा कौन झूठा थी जिसमें उनके नायक ऋषि कपूर थे । 

बोनी से विवाह के उपरांत दो पुत्रियों – जाह्नवी तथा खुशी की माता बनने वाली श्रीदेवी ने अपने जीवन के आगामी कई वर्ष अपनी घर-गृहस्थी को समर्पित किए । सहारा चैनल के धारावाहिक मालिनी अय्यर में शीर्षक भूमिका में आने के उपरांत दर्शकों के समक्ष वे इंगलिश विंगलिश (२०१२) में आईं और पुनः अपने असाधारण प्रदर्शन से सभी को चौंकाते हुए सिद्ध कर दिया कि कालचक्र ने उनकी अभिनय-प्रतिभा पर कोई प्रभाव नहीं डाला था । मॉम (२०१७) में उन्होंने पुनः अभिनय के शिखर को छुआ और यह नियति की विडम्बना ही है कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार अपनी इसी फ़िल्म की भूमिका के लिए मरणोपरांत मिला । अपने जीवन में उन्होंने एक अच्छी कलाकार ही नहीं, एक अच्छी पुत्री, एक अच्छी बहन, एक अच्छी जीवन-संगिनी तथा एक अच्छी माता भी बनकर दिखाया । अब वे हमारे दिलों में रहेंगी । उनकी फ़िल्मों ने उन्हें अमरत्व प्रदान कर दिया है । चाँदनी के लम्हे अब उसके चाहने वालों की यादों में सदा के लिए बस चुके हैं । उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी गई, यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि उन्होंने कला-प्रेमी भारतीय जनमानस पर कितनी गहरी छाप छोड़ी है ऐसी छाप जिसे समय की धूल भी धुंधला न सके ।

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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

राज़ी: कुछ अनसुलझे सवाल

मेघना गुलज़ार द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘राज़ी’ बहुचर्चित एवं बहुप्रशंसित रही तथा इसने पर्याप्त व्यावसायिक सफलता भी प्राप्त की । मैंने भी इस फ़िल्म को सिनेमाघर में देखा और इससे बहुत प्रभावित हुआ । फ़िल्म मनोरंजन की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है और एक सौ चालीस मिनट तक दर्शकों को बाँधे रखती है । केंद्रीय भूमिका में आलिया भट्ट सहित सभी कलाकारों ने सराहनीय अभिनय किया है । गीत-संगीत भी श्रोताओं के कानों तथा हृदय को भाने वाला है । एकबारगी देखने के उपरांत यह अपने आपमें थ्रिलर श्रेणी (तथा देशप्रेम श्रेणी) की एक ऐसी फ़िल्म प्रतीत होती है जिसे एक सम्पूर्ण फ़िल्म कहा जा सकता है । लेकिन क्या वस्तुतः भी ऐसा ही है ? 

प्रायः किसी भी अच्छी फ़िल्म को देखने के उपरांत उसके विषय में विचार व्यक्त करते समय सामान्य दर्शकों एवं समीक्षकों दोनों ही के साथ समस्या यह होती है कि वे उसकी अच्छाइयों की रौ में बह जाते हैं और इसीलिए उसके दोषों पर ध्यान नहीं दे पाते । इसलिए फ़िल्म की कमियां अनदेखी (और अनकही) रह जाती हैं । यदि समीक्षक या विश्लेषक ईमानदार एवं निष्पक्ष है तो ऐसा जान-बूझकर तो नहीं होता लेकिन अनचाहे ही सहीहो अवश्य जाता है । वर्षों पूर्व राजकुमार हिरानी निर्देशित एवं आमिर ख़ान अभिनीत ‘थ्री ईडियट्स’ के मामले में अनेक स्थापित समीक्षकों के और स्वयं मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था । फ़िल्म के मनोरंजक एवं प्रेरक पक्षों ने कुछ ऐसा मन मोह लिया था कि उसके अनेक दोषों पर तत्काल नज़र गई ही नहीं । फ़िल्म को पुनः देखने तथा उसके गुण-दोषों पर वस्तुपरक भाव से पुनर्विचार करने पर ही यह तथ्य उजागर हुआ कि फ़िल्म में अनेक दोष थे जिनके कारण वह केवल प्रशंसा की ही नहीं वरन आलोचना की भी पात्र थी । ‘राज़ी’ के साथ भी यही हुआ है ।


फ़िल्म भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ़्टीनेंट कमांडर हरिंदर सिक्का के उपन्यास ‘कॉलिंग सहमत’ पर आधारित है और ऐसा बारंबार कहा गया है कि यह एक वास्तविक महिला के जीवन की उन वास्तविक घटनाओं की गाथा है जो १९७१ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समयकाल में घटित हुई थीं । उपन्यास में (और फ़िल्म में भी) एक पाकिस्तानी सैनिक परिवार में विवाह करके भारत के लिए गुप्तचरी करने वाली उस युवती का नाम ‘सहमत ख़ान’ है जिसे कि उपन्यास के लेखक परिवर्तित नाम बताते हैं (अर्थात् वास्तविक नाम कुछ और था) और लेखक का यह भी कथन है कि उस वास्तविक महिला का २०१ में निधन हो गया था । मैं लेखक महोदय के कथन की सत्यता पर उंगली नहीं उठाना चाहता लेकिन चाहे उसके जीवनकाल में उसके नाम को गोपनीय रखना आवश्यक थाअब तो भारत की उस पुत्री का नाम बताया जा सकता है जिसने अपने देश के लिए बहुत कुछ कियाबहुत कुछ सहा और बहुत कुछ त्यागा । उसके नाम को अब भी गोपनीय रखा जाना तर्कहीन है विशेष रूप से तब जब फ़िल्म के (और उपन्यास के भी) अंत में उसके पुत्र को भारतीय सेना में कार्यरत बताया गया है । यह अनावश्यक गोपनीयता और कथा में उस विवाहिता का सैनिक अधिकारियों से भरे अपने ससुराल में इतनी सरलता से जासूसी करना जो कहीं से भी सहज संभव नहीं लगतायह संदेह उत्पन्न करता है कि सच्ची बताई जाने वाली कथाएं वास्तव में भी सच्ची ही होंयह आवश्यक नहीं ।

मेरा उर्दू भाषा का ज्ञान इस मामले में अपर्याप्त सिद्ध हो रहा है कि 'सहमतजो कि एक स्त्रीलिंग शब्द हैका अर्थ क्या होता है लेकिन हिन्दी में ‘सहमत’ शब्द का वही अर्थ होता है जो कि फ़िल्म के शीर्षक ‘राज़ी’ का है अर्थात् वह व्यक्ति जो किसी बात या विचार के लिए अथवा किसी कार्य को करने (या न करने) के लिए रज़ामंद होउसके लिए अपनी स्वीकृति प्रदान करे । यह स्वीकृति या रज़ामंदी स्वेच्छा से भी हो सकती है और किसी दबाव में भी । इस कथा की नायिका पाकिस्तान में गुप्तचरी करने और इसके निमित्त एक प्रतिष्ठित पाकिस्तानी परिवार की पुत्रवधू बनने का कार्य अपनी स्वेच्छा से करती है और इसके लिए उसका तर्क है अपने देश की सेवा । लेकिन गहराई से देखने पर यह उद्देश्य उथला-सा प्रतीत होता है और जो कुछ भी नैतिक-अनैतिक उसके द्वारा किया जाता हैउसे न्यायोचित ठहराने की एक खोखली चेष्टा ही लगता है । यदि देशसेवा के नाम पर दूसरे देश में जाकर स्वयं पर विश्वास करने वाले भले लोगों को धोखा देना और निर्दोषों की हत्याएं करना न्यायोचित है तो जो लोग धर्म या अपने देश के हित के नाम पर हमारे देश में यही सब करते हैंउन्हें हम कैसे ग़लत ठहरा सकते हैं ? नायिका को पाकिस्तान द्वारा ग़ाज़ी नामक पनडुब्बी से भारतीय जहाज़ आईएनएस विक्रांत पर किए जाने वाले हमले की योजना की सूचना एवं दस्तावेज़ भारत में खुफिया एजेंसी के संबन्धित लोगों तक पहुँचाते हुए दिखाया गया है और इसी आधार पर उसके कार्यकलापों को जायज़ ठहराया गया है लेकिन ये तथ्य न तो प्रामाणिक हैं और न ही ऐसी गोपनीय बातें इस तरह से खुलेआम की जाती हैं जिस तरह से फ़िल्म में नायिका के ससुराल वालों को करते हुए दिखाया गया है । यह सब कुछ सतही-सा लगता है जिसे केवल इसीलिए दिखाया गया है कि येन-केन-प्रकारेण नायिका के किरदारनज़रिये और करतूतों पर देशप्रेम का ठप्पा लगाकर उन्हें सही क़रार दिया जा सके ।


कर्नल सिक्का ने अपने उपन्यास में गुप्तचरी नायिका के चरित्र को संवेदनहीन बताया है जो बिना किसी अपराध-बोध के निस्संकोच उन लोगों की हत्याएं करती है जो न केवल उस पर पूरा भरोसा करते हैं बल्कि उसे अत्यंत स्नेह भी करते हैं जबकि फ़िल्म में नायिका को संवेदनशील बताते हुए और अपने अन्तर्मन में अपने किए के अपराध-बोध से जनित पीड़ा को अनुभव करते हुए दिखाया गया है लेकिन वस्तुतः ज़रा ग़ौर करने पर ही उसकी यह संवेदनशीलता उसके चरित्र पर थोपी हुई लगने लगती है और उसका वास्तविक रूप वही दिखाई देने लगता है जो लेखक ने अपने उपन्यास की नायिका का रखा है कठोरबेरहम और किसी भी किस्म की नैतिकता या ज़मीर नामक शै को अपने भीतर जगह न देने वाली । फ़िल्म में दिखाई गई घटनाओं की रू में नायिका के किरदार पर चढ़ाए गए वतनपरस्ती के मुलम्मे को ज़रा-सा खरोंचते ही उसके किरदार की असलियत दिखाई देने लगती है जो ख़ुद को छोटी बहन की तरह चाहने वाली अपनी जेठानी को बेहिचक विधवा बना देती हैउस पति को मार डालने को तैयार हो जाती है जो उसे प्यार ही नहीं करता बल्कि उसकी इबादत करता हैउसके समूचे जज़्बात को समझता है और उसे हल्की-सी ठेस तक लगने देना जिसे गवारा नहीं और अपनी जान बचाने के लिए उस बच्चे को अपनी ढाल बनाकर भागती है जो उसे अपनी शिक्षिका के रूप में देखते हुए उस पर पूरी तरह विश्वास करता है । यह सब न तो किसी भी प्रकार का त्याग है और न ही देशसेवायह केवल स्वार्थपरता है और कुछ नहीं । 


राज़ी’ एक ओवर-रेटेड फ़िल्म है जिसे एक अच्छी फ़िल्म कहा जा सकता हैकोई महान फ़िल्म नहीं । जो महानता इस पर अनेक समीक्षक आरोपित कर रहे हैंउसका कोई लक्षण इसमें नहीं है क्योंकि किसी भी पुस्तक या फ़िल्म या काव्य की महानता का संबंध उसके आंतरिक मूल्य से होता है जो किसी महान आदर्श को स्थापित करता हो । ‘राज़ी’ में ऐसा कुछ भी नहीं है । मानवीय मूल्यों के क्रूर हनन पर देशप्रेम का बिल्ला लगा देने से कोई फ़िल्म महान नहीं हो जाती । दूसरा देश चाहे हमसे युद्धरत ही क्यों न होउसे और उसके निवासियों को शत्रु कहकर उनके विरूद्ध किए जाने वाले किसी भी कार्य को देशप्रेम के नाम पर उचित नहीं माना जा सकता । अपने पर सच्चे दिल से ऐतबार करने वाले स्नेही लोगों की पीठ में छुरा भोंकने का काम देशप्रेम की चाशनी में डुबोकर करने के बाद भी गुनाह ही रहेगा, सवाब नहीं बन जाएगा । ‘हम’ और ‘वे’ पर आधारित यह देशप्रेम अब एक कालातीत संकल्पना है जो आधुनिक मानवीय मूल्यों तथा व्यवहार के निकष पर स्वीकार्य नहीं है । ‘जंग में सब जायज़ है’ कहकर हर ग़लत को सही ठहराने का काम गुज़रे ज़माने की बात है ।


राज़ी’ को जो चौतरफ़ा वाहवाही मिल रही हैवह इसलिए है कि पाकिस्तान में जाकर और अपने पति तथा ससुराल वालों के प्राणों को कथित देशप्रेम की वेदी पर बलि चढ़ाकर भारत के लिए जासूसी करने का काम एक मुस्लिम लड़की करती है । और तुर्रा यह है कि उस मुस्लिम लड़की को कश्मीरी बताया गया है जिसके पिता भी पाकिस्तान में एक सैनिक उच्चाधिकारी के साथ दोस्ती की आड़ में भारत के लिए जासूसी ही करते थे । आज दुर्भाग्यवश हम उस दौर में हैं जब भारतीय मुस्लिमों पर पाकिस्तान-परस्त होने का ठप्पा बड़ी सहजता से लगाया जा रहा है और वे इस दबाव में रहते हैं कि चाहे जैसे भी होयह साबित करके दिखाएं कि वे भारत के साथ हैं । और भारत के साथ होने को साबित करने का साफ़ मतलब यह साबित करना है कि वे पाकिस्तान के खिलाफ़ हैं । ऐसे में एक मुस्लिम लड़की के अपने पाकिस्तानी पतिजेठ और जेठानी की (और उनके नज़दीकी बहुत-से लोगों की) आँखों में धूल झोंककर भारत के लिए जासूसी करने की कहानी को हाथोंहाथ लिया जाना कोई हैरानी की बात नहीं है । वह लड़की यानी सहमत बार-बार भारत को अपना मुल्क बताती है जिसके आगे उसे और कुछ भी वक़त या तवज्जो दिए जाने के काबिल नहीं लगता । लेकिन सच्चाई तो यह है कि कश्मीरी न केवल आज बल्कि जिस ज़माने की यह कहानी हैउस ज़माने में भी अपने आपको हिंदुस्तानी कहने से परहेज़ ही करते थे । एक कश्मीरी मुस्लिम का हिंदुस्तान को अपना मुल्कअपना वतन बताना और उसी बुनियाद पर पाकिस्तान में जाकर हिंदुस्तान के लिए जासूसी करना इस बात का सबूत है कि इस फ़िल्म में हक़ीक़त का नहींहमारे देश के मौजूदा हालात और हुकूमत के मौजूदा मिज़ाज के मद्देनज़र पॉलिटिकल करेक्टनेस का ख़याल रखा गया है । यह इस तथ्य से और भी पुष्ट होता है कि फ़िल्म में सहमत को प्रशिक्षण देने वाले तथा पाकिस्तान में उसकी सहायता करने वाले भी मुस्लिम पात्र ही हैं । ग़ैर-मुस्लिम पात्र तो फ़िल्म में रखे ही नहीं गए हैं । ‘तलवार’ जैसी साहसी और यथार्थपरक फ़िल्म बनाने वाली मेघना गुलज़ार से ऐसी उम्मीद नहीं थी । उन्होंने ज़मीरजज़्बात और इंसानियत को ताक पर रखकर चलने वाली गुप्तचर महिला को महिमामंडित किया है और ऐसा करने में कोई महानता नहीं है क्योंकिजैसा मैंने पहले भी कहा हैयह महिमामंडन केवल एक मुलम्मा है जो बड़ी आसानी से उतर जाता है । 


मेघना गुलज़ार द्वारा निरूपित सहमत ख़ान का चरित्र विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता क्योंकि उसे फ़िल्म के आरंभ में ही अपनी जान पर खेलकर एक गिलहरी को बचाते हुए दिखाया गया है । ऐसी संवेदनशील और दयालु कन्या कुछ ही समय में ऐसी पाषाण-हृदय हो जाए कि निस्संकोच निर्दोषों की जान लेने लगे (चाहे अपना भेद खुलने से रोकने हेतु ही सही)यह किसी भी दृष्टि से विश्वास के योग्य तथ्य नहीं लगता । ऐसा दिखाकर अनजाने में ही मेघना ने सहमत को एक काल्पनिक चरित्र के रूप में दर्शा दिया है जो कपोलकल्पित कथा में भी गले नहीं उतरता । उसका अपने पिता (और कथित पारिवारिक परंपरा) की ख़ातिर इस विश्वासघाती कार्य के लिए मान जाना भी स्वाभाविक नहीं लगता (हालांकि इसके लिए भी वह ‘मुल्क’ के नाम का ही आसरा लेती है जब इस बाबत उससे सवाल होता है) । वह घर के नौकर की हत्या करने के बाद तो रोती हैअपने जेठ की हत्या करने के बाद नहीं (क्या इसलिए कि अब किसी की भी हत्या कर देना उसके लिए सामान्य कार्य हो गया है और क्या इसी वजह से वह अपने पति पर भी पिस्तौल तान देती है) । ये सारी बातें उसके चरित्र को अत्यंत विरोधाभासी बना देती हैं जिसमें कुछ भी आदर्श या सराहनीय नहीं लगता । इसके विपरीत मेघना ने जिस पाकिस्तानी परिवार को दिखाया है उसके (पुराने नौकर को छोड़कर) सदस्य इतने भलेस्नेही और विश्वासी हैं कि उनके इन गुणों के आगे सूरज बड़जात्या के फ़िल्मी परिवार भी कहीं नहीं ठहरते । सहमत के पति इक़बाल को इतना अधिक संवेदनशील और अपनी पत्नी को समझने वाला दिखाया गया है कि जिस किसी भी लड़की को ऐसा देवता-स्वरूप पति मिल जाए, उसे अपने पति के चरण धो-धोकर पीने चाहिए क्योंकि प्रेम तो कोई भी कर सकता हैसमझने वाले विरले ही मिलते हैं । वह सहमत को भावनात्मक रूप से अपने से जोड़े बिना शारीरिक रूप से भी उसके निकट नहीं जाता है । और मुझे इंतहा तो तब नज़र आई जब सहमत का भेद खुल जाने और यह पता लग जाने कि उसने ही परिवार के नौकर और बड़े बेटे की हत्याएं की थींपर भी वह उसे ग़लत नहीं समझता बल्कि अपने पिता (पाकिस्तानी सेना के ब्रिगेडियर) के समक्ष उसके दृष्टिकोण को रखते हुए कहता है कि उसने वही किया है जो हम भी अपने मुल्क के लिए करते हैं । इस सबसे उसका किरदार सहमत के किरदार से बहुत ऊपर उठ जाता है । ऐसे विवेकशीलक्षमाशील तथा दूसरों के दृष्टिकोण एवं स्थिति को समझने वाले लोगों का बहुमत यदि भारत और पाकिस्तान में हो जाए तो दोनों देशों की शत्रुता सदा के लिए समाप्त हो जाए ।


राज़ी’ फ़िल्म ही नहींउसमें आलिया भट्ट का अभिनय भी ओवर-रेटेड ही है । उन्होंने अच्छा अभिनय किया है लेकिन उसे असाधारण या महान अभिनय की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता । वस्तुतः फ़िल्म के अन्य पात्रों ने (विशेषतः इक़बाल की भूमिका में विकी कौशल ने तथा ख़ालिद मीर की भूमिका में जयदीप अहलावत ने) उनसे बेहतर अभिनय किया है । मैं कभी राजा सेन की फ़िल्म समीक्षाओं का क़ायल नहीं रहा लेकिन पहली बार मैं उनकी समीक्षा में किए गए आलिया के अभिनय के मूल्यांकन से सहमत हुआ हूँ । उन्होंने बिलकुल ठीक कहा है कि आलिया (और इस फ़िल्म में उनके अभिनय के कसीदे पढ़ने वाले भी) ‘मोस्ट एक्टिंग’ को ‘बेस्ट एक्टिंग’ समझकर भ्रमित हो गए हैं । सहमत की भूमिका में आलिया इतना अधिक प्रयास करती हैं कि उनके हाव-भावों की स्वाभाविकता नष्ट नहीं तो बहुत कम अवश्य हो जाती है । इस फ़िल्म में उन्होंने पात्र को प्रस्तुत किया हैउसे जिया नहीं ।


सहमत ख़ान जैसी कोई महिला यदि वास्तव में थीं तो उनकी प्रशंसा तथा वंदन अवश्य ही होना चाहिए । लेकिन ‘राज़ी’ फ़िल्म (तथा ‘कॉलिंग सहमत’ उपन्यास) की नायिका को आधुनिक युवतियों के लिए आदर्श अथवा रोल मॉडल नहीं माना जा सकता (चाहे ऐसी युवतियां भारतीय हों या पाकिस्तानी) । विश्वासघात और निर्दोषों का रक्तपात कोई सत्कर्म नहीं जिन्हें न्यायसंगत माना जाए और ऐसा करने वाले का महिमामंडन एक अपराध ही है जो धर्म एवं देश सरीखी अवधारणाओं की संकीर्ण व्याख्या करते हुए उनके नाम पर कुमार्ग पर चलने को ही प्रेरित कर सकता हैसुमार्ग पर चलने को नहीं । आज आवश्यकता ‘हम’ के विस्तार की है जिसमें ‘वे’ को विलीन कर देने का प्रयास सभी समुदायोंसभी धर्मों तथा सभी देशों को करना चाहिए ताकि अंतिम विजय गुप्तचरों एवं सेनाओं की नहींमानवता की हो । ‘राज़ी’ फ़िल्म जो अनसुलझे सवाल पीछे छोड़ती हैउन्हें सुलझाया जाना चाहिए ताकि फिर कभी किसी को सहमत बनने के लिए राज़ी न होना पड़े ।

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पुनश्च : यह लेख मैंने २१ मई२०१८ के हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित नन्दिता पटेल जी के अंग्रेज़ी भाषा में लिखे गए लेख – ‘A spy without a conscience shouldn’t be glorified, even by Bollywood’ से प्रेरणा लेकर लिखा है जिसमें मुझे अपने विचारों एवं भावनाओं का प्रतिबिंब दिखाई दिया । मैं नन्दिता जी के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ । 

 

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गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

पाठक साहब का भूला-बिसरा मानस-पुत्र - प्रमोद

सुरेन्द्र मोहन पाठक ने बहुत से नायकों और उनकी सीरीज़ का सृजन किया है । हम सुनील, विमल, सुधीर और जीत सिंह की सीरीज़ नियमित रूप से पढ़ते रहते हैं । विवेक आगाशे, विकास गुप्ता और मुकेश माथुर भी अब थ्रिलर के पात्रों की श्रेणी से बाहर से निकलकर हमारे जाने-पहचाने किरदार बन चुके हैं । मुझसे पूछा जाए तो मैं तो सब-इंस्पेक्टर महेश्वरी को भी पाठक साहब का रचा हुआ नायक ही कहूंगा जिसने थ्रिलर श्रेणी के कई उपन्यासों में अपनी ज़ोरदार हाज़िरी लगाई है । लेकिन पाठक साहब के दो सीरीज़ नायक ऐसे भी हैं जिनकी सीरीज़ अरसा पहले बंद हो चुकी हैं । उनमें से एक है जेम्स बॉन्ड जिसके पाठक साहब ने हंगरी में हंगामा से लेकर जान्सी तक कुल दस उपन्यास लिखे हैं और दूसरा है प्रमोद जिसके पाठक साहब ने कुल जमा चार उपन्यास लिखे हैं । प्रमोद का पहला उपन्यास मौत का सफ़र 1966 में छ्पा था जबकि चौथा और आख़िरी उपन्यास एक रात एक लाश 1976 में प्रकाशित हुआ था । इस तरह पाठक साहब द्वारा रचित सीरीज़ के उपन्यासों में सबसे कम उपन्यास प्रमोद सीरीज़ के ही हैं । केवल चार उपन्यासों का यह नायक वर्तमान पीढ़ी के पाठकों के लिए अनजाना-सा ही है । 

प्रमोद का सृजन पाठक साहब ने तब किया था जब वे सुनील सीरीज़ ही लिखते थे और कुछ नहीं लिखते थे । इसलिए प्रमोद के किरदार पर ही सुनील की छाप नहीं बल्कि उसका शहर भी पाठक साहब ने वही रखा है जो कि सुनील का शहर है – यानी कि राजनगर – बैंक स्ट्रीट, मुग़ल बाग़, हर्नबी रोड, मेहता रोड, शंकर रोड, कूपर रोड, मैजेस्टिक सर्कल, जॉर्जटाउन, नेपियन हिल, शेख सराय, नॉर्थ शोर और धोबी नाका क्रीक वाला राजनगर । जहाँ सुनील बैंक स्ट्रीट की इमारत नंबर तीन के एक फ्लैट में रहता है, वहीं प्रमोद कमर्शियल स्ट्रीट में मार्शल हाउस नाम की इमारत के एक फ्लैट में रहता है । कत्ल के मामलों में सुनील का पाला इंस्पेक्टर प्रभु दयाल से पड़ता है तो प्रमोद का पाला इंस्पेक्टर आत्माराम से पड़ता है ।  आयु में प्रमोद सुनील से थोड़ा बड़ा है । सुनील की आयु स्थायी रूप से लगभग तीस वर्ष है जबकि प्रमोद की आयु उसके अंतिम उपन्यास के काल में लगभग पैंतीस वर्ष है । 

प्रमोद के पहले तीन उपन्यास जल्दी-जल्दी प्रकाशित हुए थे जबकि उसके तीसरे कारनामे जान की बाज़ी और चौथे – अंतिम – कारनामे  एक रात एक लाश में सात साल का अंतराल रहा । और फिर यह सीरीज़ बंद हो गई । 

प्रमोद सीरीज़ का पहला उपन्यास मौत का सफ़र और तीसरा उपन्यास जान की बाज़ी थ्रिलर कहे जा सकते हैं जबकि क्रम संख्या में दूसरा उपन्यास आधी रात के बाद और चौथा उपन्यास एक रात एक लाश निश्चित रूप से पारंपरिक रहस्यकथाएं या मर्डर मिस्ट्री ही हैं जिनमें प्रमोद क़त्ल या क़त्लों के रहस्य का पर्दाफ़ाश करता है ।


इस सीरीज़ के उपन्यासों को पढ़कर मैं यह नहीं समझ सका कि प्रमोद का कारोबार या शगल क्या है । बहरहाल इतना स्पष्ट है कि प्रमोद को रुपये-पैसे की कोई समस्या नहीं है । वह एक सम्पन्न व्यक्ति है । 

पाठक साहब की इस सीरीज़ की मुख्य ख़ासियत इसके नायक यानी प्रमोद के दो युवतियों से निकट संबंध और उनके कारण उसका दो बार भारत छोड़कर विदेश चला जाना है । पहली बार प्रमोद सात साल के लिए मुल्कबदर होता है तो दूसरी बार तीन साल के लिए । पहली बार वह चीन चला जाता है तो दूसरी बार अमरीका । 

ये दो युवा लड़कियां जो कि प्रमोद की ज़िंदगी में पैबस्त हैं,  हैं – कविता ओबराय और सुषमा ओबराय । पाठक साहब ने बताया है कि प्रमोद जब केवल बाईस साल का था तो अपने दोस्त की बीवी कविता से दिल-ही-दिल में मुहब्बत कर बैठा था । कविता न केवल शादीशुदा थी बल्कि वह प्रमोद से तीन-चार साल बड़ी भी थी । लेकिन जैसा कि जगजीत सिंह साहब के गाए हुए और इंदीवर साहब के लिखे हुए अजर-अमर गीत होठों से छू लो तुम के एक अंतरे के बोल हैं – ना उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन’; प्रमोद के दिल में जाग उठी सच्ची मुहब्बत को न कविता की बड़ी उम्र से कोई सरोकार है और न ही उसकी शादीशुदा हैसियत से । लेकिन चूंकि वह उसके दोस्त की बीवी है, इसलिए कहीं उससे ऐसी कोई नादानी न हो जाए जो कि कविता के लिए समस्या बन जाए, वह हिंदुस्तान छोड़कर चीन चला जाता है । और चीन में ही घटित होता है उसका पहला कारनामा – मौत का सफ़र जो कि मेरी निगाह में इस सीरीज़ का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है । पृष्ठ संख्या में बेहद कम लेकिन बड़े कैनवास पर लिखा गया यह रोमांचक उपन्यास रोलरकोस्टर राइड की तरह जिस्म और दिल में सनसनी दौड़ा देता है । 

चीन में रहकर ही प्रमोद मन को एकाग्र करने की कला (कंसंट्रेशन आर्ट) सीखता है । बरसों के अभ्यास के बाद भी प्रमोद केवल चार सैकंड ही अपने आप को किसी बिन्दु पर स्थिर रख पाता है । पर यह चार सैकंड की एकाग्रता भी उसे किसी भी मामले की तह तक पहुँचने और किसी भी गुत्थी को सुलझाने में बड़ी मदद करती है । वह या तो किसी कागज पर कई दायरों में एक बिन्दु को बनाकर उस पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है या फिर माचिस की तीली जलाकर उसकी लौ पर अपनी मानसिक शक्तियों को स्थिर करता है, लेकिन अधिक-से-अधिक चार सैकंड के ही लिए, उससे अधिक नहीं । 

सात साल चीन में गुज़ार देने के बाद प्रमोद अपने वतन लौटता है और इस सीरीज़ का दूसरा उपन्यास आधी रात के बादवजूद में आता  है जो कि एक हत्या के रहस्य पर आधारित है । राजनगर लौटने के बाद प्रमोद पाता है कि गुज़श्ता सात सालों में ज़िंदगी कई करवटें बदल चुकी है । उसकी महबूबा कविता अब सुहागिन नहीं रही । उसके दोस्त और अपने शौहर की मौत के बाद अब वह बेवा हो चुकी है । प्रमोद अपनी मुहब्बत का वास्ता देकर कविता से उसकी ज़िंदगी को खुशियों से भर देने की इजाज़त मांगता है मगर कविता उसकी मुहब्बत को तसलीम करने के बावजूद दो वजूहात का हवाला देकर उसकी बन जाने से इनकार करती है – एक तो वह तीस साल से ऊपर की अपनी उम्र और बेवा हो जाने के मद्देनज़र ख़ुद को प्रमोद के काबिल नहीं मानती, दूसरे उसे पता चल जाता है कि उसकी छोटी कुंवारी बहन सुषमा भी प्रमोद पर फ़िदा है । वह प्रमोद से इल्तज़ा करती है कि वो सुषमा से शादी कर ले । लेकिन प्रमोद ने सुषमा को हमेशा अपनी छोटी बहन की निगाह से देखा है और वह कविता की इस बात को मानने के लिए किसी भी हालत में तैयार नहीं हो सकता । फिर वह यह भी महसूस करता है कि सुषमा में अभी बचपना है और वह किसी भी बात को गंभीरता से नहीं लेती । 

आधी रात के बाद की मर्डर मिस्ट्री में उलझने के साथ ही प्रमोद का साबिक पड़ता है पुलिस इंस्पेक्टर आत्माराम से जो कि उसके राजनगर के हवाई अड्डे पर कदम रखते ही उससे टकरा जाता है । यहाँ सुनील सीरीज़ और प्रमोद सीरीज़ की यह समानता सामने आती है कि जिस तरह सुनील सीरीज़ का इंस्पेक्टर प्रभु दयाल एक ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और कार्यकुशल पुलिस अधिकारी है, उसी तरह प्रमोद सीरीज़ का इंस्पेक्टर आत्माराम भी है । जिस तरह सुनील और प्रभु दयाल एक दूसरे के बरख़िलाफ़ रहने के बावजूद एक दूसरे की ख़ूबियों को महसूस करते हैं, उसी तरह प्रमोद और आत्माराम भी एक दूसरे की लाइन काटने और आपस में शह-मात का शतरंजी खेल खेलने के बावजूद एक दूसरे की ख़ूबियों की इज़्ज़त ही करते हैं । जहाँ इंस्पेक्टर प्रभु दयाल का तकिया कलाम है – मुझे मेरा धंधा सिखाने की कोशिश मत करो’, वहीं इंस्पेक्टर आत्माराम का तकिया कलाम है – आपसे मिलने की बात उठते ही मेरे मन में जो पहला ख़याल आता है वो यह है कि एक पुलिस अधिकारी की ड्यूटी भी कितनी अप्रिय होती है, उसे कैसे-कैसे अप्रिय काम करने पड़ते हैं . . . 

इसी उपन्यास में हमारा परिचय होता है दो और दिलचस्प किरदारों से । ये दो दिलचस्प किरदार हैं – एक चीनी वृद्ध चू की और उसकी नौजवान बेटी सो हा । ये लोग चायना टाउन में रहते हैं जो कि उसी तरह राजनगर में स्थित एक चीनियों की बस्ती है जिस तरह जार्जटाउन ईसाइयों की बस्ती है । चायना टाउन का हवाला सुनील सीरीज़ के उपन्यासों में कभी नहीं आता मगर प्रमोद सीरीज़ के तो दो स्टॉक कैरेक्टर यानी कि चू की और सो हा चायना टाउन में ही रहते हैं तो ऐसे में स्वाभाविक रूप से हम चायना टाउन का भी परिचय प्राप्त करते हैं । चायना टाउन से अपरिचित लोग केवल उसके प्रवेश द्वार तक ही पहुँच सकते हैं क्योंकि एक बार भीतर घुस जाने के बाद वह आगंतुकों के लिए किसी भूल-भुलैया से कम साबित नहीं होता । जहाँ चू की प्रमोद को बेहद पसंद करता है और सदा उसकी मदद करने के लिए तैयार रहता है, वहीं सो हा दिल-ही-दिल-में प्रमोद को चाहती है और उसके लिए कुछ भी कर गुजरने को आमादा हो जाती है हालांकि उसे मालूम है कि प्रमोद कविता ओबराय से मुहब्बत करता है । 

चीन से अपने वतन लौटने पर प्रमोद के साथ उसका चीनी नौकर भी आता है जो इस सीरीज़ का स्टॉक कैरेक्टर है । इस नौकर का नाम है – याट टो । याट टो एक अत्यंत स्वामिभक्त सेवक है जो अपने मालिक के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहता है । चूंकि कविता ओबराय एक चित्रकार है और अपनी चित्रकला के लिए ही बेहतर जानी जाती है, याट टो और प्रमोद की बातचीत में उसका ज़िक्र पेंटर महिला कहकर किया जाता है । वैसे कविता की छोटी बहन सुषमा भी एक चित्रकार ही है लेकिन उसकी चित्रकला अभी शुरुआती दौर में है । 

कविता के उससे शादी करने से इनकार कर देने से प्रमोद का दिल टूट जाता है । चूंकि वह उसकी यह ज़िद तो कुबूल कर नहीं सकता कि वह सुषमा से शादी कर ले, इसलिए आधी रात के बाद वाले केस के बाद प्रमोद एक बार फिर मुल्कबदर हो जाता है । इस बार वह याट टो को साथ लेकर अमरीका चला जाता है जहाँ उसकी ज़िंदगी में वो बातें घटित होती हैं जो इस सीरीज़ के तीसरे उपन्यास जान की बाज़ी की शक्ल अख़्तियार करती है । पाठक साहब बताते हैं कि आगे चलकर भारत लौटने से पहले प्रमोद अमरीका में तीन साल व्यतीत करता है । 

ओबराय बहनों का छोटा भाई युगल ओबराय अमरीका में रहता है । वह वहाँ इसलिए रहता है क्योंकि वह हिंदुस्तान की धीमी ज़िंदगी की जगह अमरीका की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी को पसंद करता है । वह प्रमोद को अपने पारिवारिक मित्र के रूप में जानता है । प्रमोद उसी राज्य और उसी शहर में रहता है जिसमें कि युगल रहता है । कविता प्रमोद को एक ख़त लिखकर उससे गुज़ारिश करती है कि वह युगल का  ख़याल रखे जो कि नादान है, नातजुर्बेकार है । 

अपनी नादानी की वजह से ही युगल अपनी अमरीकी प्रेमिका के अपहरण और क़त्ल के मामले में फँस जाता है । ऐसे में वह प्रमोद से मदद मांगता है । यहाँ पाठक साहब की यह विचारधारा एक बार फिर सामने आती है कि वे स्वामिभक्ति को बहुत बड़ा गुण मानते हैं । प्रमोद जब अपनी महबूबा के भाई को बचाने के लिए क़त्ल का इल्ज़ाम अपने सर पर लेने को तैयार हो जाता है तो वफ़ादार और नमकख़्वार ख़ादिम याट टो भी पीछे नहीं रहता । वह उस इल्ज़ाम को अपने सर पर लेने की पेशकश करता है । लेकिन प्रमोद उसे समझाता है कि वह ऐसी योजना के तहत काम कर रहा है जिसमें उसकी जान को कोई ख़तरा नहीं है । वह अपने लिए अत्यंत चिंतित याट टो को समझा-बुझाकर भारत भेज देता है और उसे हिदायत देता है कि वह उसके राजनगर स्थित फ़्लैट को ठीकठाक करके रिहाइश के काबिल बनाए क्योंकि थोड़े दिनों के बाद वह भी राजनगर आ आएगा । 

याट टो को भारत भेज देने के बाद प्रमोद एक बेहद पेचीदा योजना बनाकर अमरीका के दो अलग-अलग राज्यों की कानून-व्यवस्था को धोखा देता है और क़त्ल के जुर्म का (झूठा) इक़बाल करके भी अपने आप को सज़ा नहीं होने देता । वह उसी की सलाह पर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करके गिरफ़्तार हो चुके युगल को रिहा करवा देता है और वास्तविक षड्यंत्रकारियों को कानून के चक्रव्यूह में फँसा देता है । यहाँ पाठक साहब ने प्रमोद के माध्यम से अमरीका में लागू प्रत्यर्पण संबंधी विधि-विधान का बड़ा रोचक उपयोग किया है । मैं नहीं जानता कि पाठक साहब को ऐसी गहरी जानकारी कैसे हुई मगर दिमाग को घुमा देने वाली प्रमोद की योजना को अमली जामा पहनते देखना अत्यंत आनंददायी है । जिस तरह प्रमोद दो बैंकों में खाते खोलकर कार बेचने वाली कंपनी को अपने चैक के माध्यम से भ्रम में डालकर कायदे-कानून की मशीनरी को इस्तेमाल करता है, वह विकास गुप्ता के पहले उपन्यास धोखाधड़ी की याद दिला देता है । लेकिन इन दोनों उपन्यासों के संबंधित प्रसंगों की तुलना करते समय ध्यान रहे कि जान की बाज़ी’ ‘धोखाधड़ी के दस साल से भी ज़्यादा पहले लिख दिया गया था । 

अब अपने चौथे और आख़िरी उपन्यास एक रात एक लाश में प्रमोद तीन साल के अंतराल के बाद फिर से अपने देश भारत लौट आता है जहाँ उसका इंतज़ार कर रहा है एक हत्या का मामला जिसमें सुषमा का वर्तमान प्रेमी जोगेन्द्रपाल फँसा हुआ है । उस पर अदालत में इल्ज़ाम साबित हो चुका है और सज़ा भी सुनाई जा चुकी है । पर कानून, इंसाफ़ और सच्चाई में ही नहीं बल्कि ज़िंदगी और सुषमा के प्यार में भी अपना ऐतबार खो चुका जोगेन्द्रपाल जेल से भाग चुका है और पुलिस उसकी तलाश में है । प्रमोद के राजनगर आते ही एक क़त्ल और हो जाता है । अब एक बार फिर इंस्पेक्टर आत्माराम के साथ लुका-छुपी का खेल खेलते हुए प्रमोद असली खूनी को बेनक़ाब करके जोगेन्द्रपाल की बेगुनाही साबित करता है । प्रमोद की गतिविधियों में चू की, सो हा और याट टो की भी पूरी-पूरी भागीदारी रहती है । इस उपन्यास के आख़िर में इंस्पेक्टर आत्माराम के मुँह से प्रमोद की ज़हनियत की तारीफ़ बेसाख़्ता निकल पड़ती है । 

क़त्ल का राज़ फ़ाश हो जाने और जोगेन्द्रपाल की रिहाई तय हो जाने के बाद प्रमोद सुषमा से कहता है कि वह जोगेन्द्रपाल को उसकी बेगुनाही साबित होने की ख़बर ख़ुद सुनाए ताकि उसका ज़िंदगी और मुहब्बत से उठ चुका भरोसा फिर से लौटे । इससे एक बार फिर पाठक साहब के नायकों के अत्यंत संवेदनशील होने की बात साबित हो जाती है । सुनील और प्रमोद जैसे नायक संवेदनशील इसलिए हैं क्योंकि उनके रचयिता सुरेन्द्र मोहन पाठक स्वयं एक संवेदनशील मनुष्य हैं जो कि मानवता को सर्वोपरि रखते हैं । 

प्रमोद के इन उपन्यासों में  औरत-मर्द की मुहब्बत और जज़्बात को बाख़ूबी उकेरा गया है । एक रात एक लाश में पाठक साहब प्रमोद के मुँह से कविता के चित्रों में आई गहराई का ज़िक्र करवाते हैं और इस पर कविता के मुँह से कहलवाते हैं कि जब दिल में दर्द पैदा होता है तो कला में गहराई भी आ जाती है । कितनी बड़ी, कितनी सच्ची बात है यह ! दिल में लहर और टीस जगाने वाला यह सोज़ ही तो है जो फ़नकार के फ़न में जान डाल देता है, उसके शाहकार को मामूली से ग़ैर-मामूली बना देता है । 

मैंने बरसों पहले एक कहानी में पढ़ा था कि कोई नहीं समझ सकता कि औरत जब किसी से प्यार करती है तो वो उसमें क्या देखती है । ज़ाती तजुरबे से मैं जानता हूँ कि यह बात एकदम सच है । यह औरत पर ही नहीं, मर्द पर भी लागू है । लोग किसी से प्यार हो जाने की चाहे जितनी वजहें बयां कर दें, किसी को किसी से प्यार क्यों होता है यह कोई नहीं जानता, कोई नहीं बता सकता । औरत की ख़ूबसूरती भी मर्द के प्यार की बुनियाद नहीं होती है क्योंकि सही मायनों में ख़ूबसूरती देखने वाले की आँखों में होती है । प्रमोद का उम्र में अपने से तीन-चार साल बड़ी और एक शादीशुदा औरत कविता को दिल दे बैठना पाठक साहब द्वारा बहुत बाद में लिखे गए यादगार उपन्यास क़ागज़ की नाव को भी ज़हन में ताज़ा कर देता है जिसमें लालचंद उर्फ़ लल्लू अपने से तीन साल बड़ी और जिस्मफ़रोशी के दलदल में धँसी खुर्शीद से मुहब्बत करने लगता है ।  

कई बार लोग यह सवाल करते हैं कि किसी के शादीशुदा होने के बावजूद उससे मुहब्बत कैसे की जा सकती है । मेरा कहना है कि शादी एक समाजी रस्म है जिसके होने या न होने की बात दिमाग तो समझ सकता है, दिल नहीं । महबूब या महबूबा की शादी हो जाने या जगह की दूरी के कारण प्रत्यक्ष संपर्क समाप्त हो जाने से सच्ची मुहब्बत पर कोई असर नहीं पड़ता है क्योंकि दिल में उसकी याद तो हमेशा ही रहती है और खलील जिब्रान ने कहा है – याद करना भी मिलन का ही स्वरूप है । प्रमोद के दिल में कविता के लिए परवान चढ़ चुकी मुहब्बत को इसी बुनियाद पर समझा जा सकता है । मैं तो समझता हूँ कि महबूब या महबूबा के इस दुनिया में न रहने पर भी उसके लिए मुहब्बत क़ायम रहती है क्योंकि दिलों की वाबस्तगी ज़िंदगी से भी परे जाती है । 

पाठक साहब इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि सच्चा प्रेम निस्वार्थ होता है जो केवल देना, समर्पित करना और त्याग करना जानता है, अपने लिए कुछ मांगना नहीं जानता । कविता के लिए प्रमोद के प्रेम के अतिरिक्त चीनी लड़की सो हा का प्रमोद के लिए प्रेम भी कुछ ऐसा ही है । वह प्रमोद की कविता के लिए भावनाएं जानने के उपरांत भी उससे प्रेम करती है और इस प्रेम के कारण प्रमोद के लिए कुछ भी करने को उद्यत हो जाती है । प्रमोद उसकी इन भावनाओं से परिचित है लेकिन वह उनका प्रत्युत्तर नहीं दे सकता क्योंकि उसे कविता से प्रेम है । दूसरी ओर प्रमोद सुषमा को छोटी, बचपने से ग्रस्त और खिलंदड़ी समझता है लेकिन वह यह नहीं जानता कि उसका प्रेम भी वास्तविक ही है । जोगेन्द्रपाल की प्रेमिका बनने के बाद भी उसका प्रथम प्रेम प्रमोद ही है जिसे वह भूल नहीं सकती । प्रमोद को खरगोश कहकर पुकारने वाली सुषमा जानती है कि प्रमोद उसकी बड़ी बहन कविता को चाहता है और इसीलिए वह उससे चुहलबाज़ी चाहे जितनी कर ले, उसके और अपनी बड़ी बहन के मिलन के रास्ते में रुकावट बनना कभी नहीं चाहेगी । 

पाठक साहब यह भी चिह्नित करते हैं कि सच्ची मुहब्बत अगर एकतरफ़ा भी हो तो भी कभी-न-कभी अपना असर ज़रूर दिखाती है । ग़ालिब ने कहा है – आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक। बिलकुल ठीक । लेकिन इसमें एक उम्र चाहे गुज़र जाए, आह का असर होता ज़रूर है । प्रमोद का एकतरफ़ा प्यार बरसों बाद ही सही, रंग लाता है और कविता भी उससे प्यार करने लगती है चाहे अपनी छोटी बहन सुषमा के जज़्बात का ख़याल करके वह उससे शादी करने में हिचक रही हो । 

इस सीरीज़ में पाठक साहब ने खच्चर पर पूंछ की ओर मुँह करके बैठे हुए चीनी दार्शनिक चाउ कोह कोह के हवाले से इस अनमोल जीवन-दर्शन को पाठकों के समक्ष रखा है कि अहमियत सफ़र की है, मंज़िल की नहीं । अगर ज़िंदगी का सफ़र सही ढंग से, सही दिशा में और हर पल का भरपूर लुत्फ़ लेते हुए तय किया जा रहा है तो फिर मंज़िल के बारे में सोचने या फ़िक्रमंद होने की ज़रूरत नहीं है । 

एक रात एक लाश वाले केस के हल हो जाने के बाद प्रमोद की ज़िंदगी में नया क्या हुआ ? वह हिंदुस्तान में ही रहा या एक बार फिर से मुल्कबदर हो गया ? क्या कविता प्रमोद की सच्ची मुहब्बत को क़ुबूल करके उसकी बन जाने को तैयार हुई ? जोगेन्द्रपाल के रिहा हो जाने के बाद सुषमा ने अपनी ज़िंदगी की बाबत क्या फ़ैसला लिया ? हमें इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलेंगे क्योंकि प्रमोद सीरीज़ बंद हो चुकी है । जनवरी 1998 में मुझे लिखे अपने पहले ही ख़त में पाठक साहब ने यह स्पष्ट कर दिया था कि प्रमोद सीरीज़ को आगे बढ़ाना संभव नहीं । 

आज सुनील, विमल, सुधीर और जीत सिंह की वाहवाही के दौर में पाठक साहब की इस भूली-बिसरी सीरीज़ और इसके भूले-बिसरे नायक का कहीं ज़िक्र तक नहीं होता है । लेकिन मैं प्रमोद से बहुत प्रभावित हूँ । पाठक साहब का यह भूला-बिसरा मानस-पुत्र मेरे हृदय के अत्यंत निकट है और सदा रहेगा ।  

(उन्नीस फ़रवरी को सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब का जन्मदिवस है, उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए मैं यह लेख प्रस्तुत कर रहा हूँ) 

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