शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

स्त्री-पुरुष के अतीत और वर्तमान में सामंजस्य दर्शाने वाली कथा

जीवन में प्रेम अधिकांश स्त्री-पुरुष करते हैं। लेकिन सभी अपने प्रेम को जीवन भर के लिए प्राप्त नहीं कर पाते। प्रेम किसी से हुआ होता है और विवाह किसी और से हो जाता है। ऐसे में अपने अतीत को पीछे छोड़कर वर्तमान को स्वीकार करना ही होता है। स्त्रियां इस कार्य को अधिक सुगमता से कर पाती हैं तथा विवाह की पवित्र अग्नि में अपने अतीत को भस्म करके एक नये जीवन का आरंभ कर लेती हैं क्योंकि उनकी मानसिकता परिवार तथा समाज के पारम्परिक परिवेश में विकसित हुई होती है। इसके अतिरिक्त विवाहोपरांत मातृत्व भी उनके जीवन का एक नया मोड़ होता है जिसके उपरांत वही उनके लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथ्य बन जाता है और अन्य सभी बातें पार्श्व में चली जाती हैं। ऐसे में विवाह-पूर्व का कोई संबंध उनके लिए अब कोई महत्व नहीं रखता।

किंतु अनेक पुरुष ऐसा नहीं कर पाते। वे अतीत में विचरते हैं तथा वर्तमान में जिस संबंध में वे बंधे हैं उसे उतना महत्व नहीं दे पाते जितना कि देना चाहिए। इसका उनके वैवाहिक जीवन पर अनुचित प्रभाव पड़ता है। होना तो यही चाहिए कि अतीत को पीछे छोड़कर वर्तमान में ही जिया जाए तथा अपने जीवन-साथी को उसके सम्पूर्ण रूप में स्वीकार किया जाए (बिना किसी से तुलना किए हुए)। चूंकि किसी भी प्रेम-संबंध में पुरुष एवं स्त्री दोनों ही सम्मिलित होते हैं, विवाहित पुरुष को यह समझना चाहिए कि उसकी तरह उसकी पत्नी का भी विवाह-पूर्व का कोई संबंध हो सकता है जिसका वर्तमान संदर्भ में कोई महत्व नहीं है। यद्यपि किसी को क्षमा करने वाली बात तर्कपूर्ण नहीं है क्योंकि प्रेम करना कोई अनुचित बात नहीं है, तथापि यदि पति चाहता है कि उसकी पत्नी उसके ऐसे किसी (पूर्व) संबंध हेतु उसे क्षमा कर दे तो ऐसा ही क्षमाशील उसे भी अपनी पत्नी के प्रति होना चाहिए।

निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा द्वारा निर्मित फ़िल्म कभी-कभी (१९७६) ऐसी ही एक कथा है जिसमें विवाह के भीतर एवं बाहर (विवाह-पूर्व) के संबंधों का प्रस्तुतीकरण है। यह फ़िल्म कहती है कि किसी को अपनी स्मृति में रखना एक बात है किंतु उस स्मृति को अपने वर्तमान संबंध को प्रभावित करने देना दूसरी बात जिससे कि बचा जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त अपनी जीवन-संगिनी के किसी विवाह-पूर्व के संबंध को भी खुले मन से स्वीकार करना चाहिए क्योंकि इसी से व्यक्ति अपने आप के साथ समन्वय स्थापित करके शांति से पारिवारिक जीवन जी सकता है। दोहरे मानदंड अपनाना – अपने लिए कुछ और तथा अपने जीवन-साथी के लिए कुछ और, पूर्णतः त्याज्य है। युवावस्था में प्रेम कभी भी और किसी से भी हो सकता है लेकिन किसी और से विवाह हो जाने पर विवाहोपरांत जीवन नये सिरे से आरंभ होता है। यह बात अपने लिए भी तथा अपने जीवन-साथी के लिए भी भलीभांति समझ ली जानी चाहिए।

कभी-कभी कॉलेज जीवन में अमित (अमिताभ बच्चन) एवं पूजा (राखी) के प्रेम को बताती है। अमित शायर है तथा वह पूजा के प्रेम से ही प्रेरित होकर शायरी करता है। परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि पूजा को विजय (शशि कपूर) से विवाह करना पड़ता है। वह अमित से वचन लेती है कि वह शायरी करना जारी रखेगा। अमित इस वचन को नहीं निभा पाता। वह अपने पिता के व्यवसाय में व्यस्त हो जाता है तथा अंजलि (वहीदा रहमान) से विवाह कर लेता है। जहाँ विजय एवं पूजा एक पुत्र विकी (ऋषि कपूर) के माता-पिता बनते हैं, वहीं अमित एवं अंजलि एक पुत्री स्वीटी (नसीम) के माता-पिता बनते हैं।

वर्षों बीत जाते हैं। बच्चे बड़े हो चुके हैं। विकी को पिंकी (नीतू सिंह) से प्रेम हो जाता है। पिंकी को अचानक पता चलता है कि उसे पालने वाले माता-पिता ने उसे गोद लिया था एवं उसके वास्तविक माता-पिता कोई और हैं। वह अपनी माता की तलाश में निकलती है और अंजलि तक जा पहुँचती है जो कि उसकी वास्तविक माता है जिसने उसे विवाह से पूर्व जन्म दिया था। उसे अपनी बच्ची को गोद इसलिए देना पड़ा था क्योंकि बच्ची के पिता की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी एवं उनका विवाह नहीं हो सका था। चूंकि उसने अपने पति अमित को इस विषय में कुछ नहीं बताया था, वह पिंकी को अपनी बहन की बेटी बताकर परिवार में परिचित करवाती है। विकी भी पिंकी के पीछे-पीछे वहीं जा पहुँचता है। अमित एवं अंजलि की पुत्री स्वीटी उससे प्रेम करने लगती है।

इधर विजय को पता चलता है कि उसकी पत्नी पूजा का विवाह से पूर्व अमित से प्रेम-संबंध था। वह स्वयं अमित की शायरी का प्रशंसक रहा है एवं उसने अपनी सुहागरात को पूजा को अमित की ही शायरी की पुस्तक भेंट की थी। जब अतीत से जुड़ी बातें वर्तमान में सतह पर आती हैं एवं सभी को पता चलती हैं तो रिश्ते उलझ जाते हैं। अमित को पता चलता है कि पिंकी अंजलि की विवाह-पूर्व की संतान है तो वह अंजलि से दूर हो जाता है। अंततः इन सभी लोगों का विवेक जागृत होता है तथा वे अतीत को वर्तमान की वास्तविकता के साथ स्वीकार कर लेते हैं। फ़िल्म के क्लाईमेक्स में विकी एक दुर्घटना से स्वीटी की जान बचाता है तथा उसे अपने और पिंकी के प्रेम के विषय में बताता है तो उसके एवं पिंकी के संबंध में स्वीटी की ग़लतफ़हमी दूर हो जाती है तथा वह उनके प्रेम को स्वीकार कर लेती है। अमित भी पिंकी को अपनी पुत्री की तरह स्वीकार कर लेता है एवं अंजलि को स्वयं को छोड़कर नहीं जाने देता।

यश चोपड़ा रोमांटिक फ़िल्में बनाने में सिद्धहस्त माने जाते थे। इस फ़िल्म में भी उनकी इस प्रवीणता का पता चलता है। फ़िल्म की कहानी उनकी पत्नी पामेला चोपड़ा ने लिखी है जबकि पटकथा सागर सरहदी ने लिखी है जिसमें कई मोड़ हैं जो दर्शकों को बांधे रखते हैं । यश चोपड़ा ने फ़िल्म की कथा को कहीं पर भी पटरी से नहीं उतरने दिया है तथा दर्शकों को फ़िल्म के परदे पर उमड़ रहे भावनाओं के सागर में डूबने-उतराने का पूर्ण अवसर दिया है। चाहे युवा पीढ़ी का रोमांस हो हो या परिपक्व व्यक्तियों का प्रेम, वह वास्तविक लगता है, बनावटी नहीं। विवाहित स्त्री-पुरुषों द्वारा अपने अतीत एवं वर्तमान में सामंजस्य स्थापित करने को दर्शाने वाली इस फ़िल्म का प्रवाह स्वाभाविक है एवं दर्शकों को अपने साथ बहाए ले चलता है। आदि से अंत तक रोचक इस फ़िल्म की शूटिंग कश्मीर की ख़ूबसूरत वादियों में की गई है तथा साहिर के गीतों पर ख़य्याम ने मधुर संगीत दिया है। मुकेश का गाया हुआ गीत कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है हिंदी फ़िल्म संगीत के इतिहास के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रेमगीतों में सम्मिलित किया जाता है। अन्य गीत भी अच्छे बन पड़े हैं।

यश चोपड़ा ने नवोदित नसीम सहित सभी कलाकारों से अत्यन्त स्वाभाविक अभिनय करवाया है। वे सदा ही अमिताभ बच्चन, शशि कपूर तथा राखी जैसे कलाकारों से उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन निकलवाने में सफल रहे थे। कभी-कभी में भी इन सभी कलाकारों के साथ-साथ वहीदा रहमान, ऋषि कपूर एवं नीतू सिंह ने भी अपना सर्वश्रेष्ठ ही दिया है। जिस प्रकार की कथा है, उसमें अपनी आंतरिक भावनाओं का प्रदर्शन न्यूनतम प्रयास के साथ बिना किसी प्रकार की नाटकीयता के किया जाना था। सभी कलाकार ऐसा करने में सफल रहे हैं।

यश चोपड़ा के बैनर यश राज फ़िल्म्स की प्रतिष्ठा के अनुरूप यह एक भव्य फ़िल्म है। तकनीकी रूप से फ़िल्म उत्कृष्ट है। अनेक स्थलों पर यह फ़िल्म दर्शकों के मन पर एक अमिट छाप छोड़ देती है। आँखों को सुहाने वाली तथा कानों में माधुर्य घोलने वाली इस फ़िल्म को एक क्लासिक प्रेमकथा माना जाता है। वस्तुतः यह एक परिपक्व प्रेमकथा कही जा सकती है जिसमें नई एवं पुरानी दोनों ही पीढ़ियों के लिए कुछ-न-कुछ है। गुणवत्तापूर्ण सिनेमा के शौकीनों के लिए भी तथा अमिताभ, शशि, राखी, ऋषि, नीतू जैसे कलाकारों के प्रशंसकों के लिए भी यह फ़िल्म किसी तोहफ़े से कम नहीं।

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सोमवार, 13 अक्टूबर 2025

फ़िल्म में वास्तविक जीवन का प्रेम-त्रिकोण !

प्रसिद्ध फ़िल्मकार स्वर्गीय यश चोपड़ा प्रेमकथाओं के सुंदर चित्रण के लिए ही प्रमुखतः जाने जाते हैं यद्यपि उन्होंने दीवार’, त्रिशूल’, काला पत्थर जैसी फ़िल्मों का भी दिग्दर्शन किया जो प्रेमकथाओं से इतर विषयों पर आधारित थीं। १९८१ में उनके द्वारा निर्मित एवं निर्देशित फ़िल्म सिलसिला प्रदर्शित हुई जो कि एक प्रेम-त्रिकोण के कथानक पर आधारित थी। यह फ़िल्म न केवल व्यावसायिक रूप से असफल रही वरन फ़िल्म-समीक्षकों की भी आलोचना का पात्र बनी। किन्तु आने वाले समय में इसे एक क्लासिक माना गया। आज भी माना जाता है। आइ, देखें कि क्यों यह प्रदर्शन के समय दर्शकों एवं समीक्षकों की सराहना नहीं पा सकी एवं क्यों अब यह क्लासिक की श्रेणी में रखी जाती है। 

इस फ़िल्म की कास्टिंग कुछ ऐसी थी जिसने इसे प्रदर्शन से पूर्व ही चर्चा का विषय बना दिया था। फ़िल्म में प्रमुख भूमिकाएं अमिताभ बच्चन, जया भादुड़ी (बच्चन) एवं रेखा की थीं (यद्यपि संजीव कुमार एवं मेहमान भूमिका में शशि कपूर भी इस फ़िल्म में थे)। अमिताभ एवं जया वास्तविक जीवन में पति-पत्नी थे तथा विगत आठ वर्षों से (१९७३ से) विवाहित थे जबकि अमिताभ एवं रेखा के रोमांस के चर्चे विगत चार-पाँच वर्षों से फ़िल्मी दुनिया में चल रहे थे। अमिताभ और रेखा की जोड़ी दर्शकों में भी अत्यन्त लोकप्रिय थी। ऐसे में फ़िल्मों से संन्यास ले चुकीं जया और उनके साथ रेखा को फ़िल्म में लेना ही एक अत्यन्त कठिन कार्य था जो यश चोपड़ा कैसे कर सके, आज तक एक रहस्य ही है।

फ़िल्म की कथा में बताया गया है कि अमिताभ एवं रेखा प्रेमी-युगल थे किन्तु अपने बड़े भाई शशि कपूर के आकस्मिक निधन के कारण अमिताभ को जया से विवाह करना पड़ा जबकि रेखा का विवाह संजीव कुमार से हो गया। विवाह के कुछ समय उपरांत अमिताभ एवं रेखा मिलते हैं तथा प्रेम की चिंगारी उनके मन में फिर से भड़क उठती है। ऐसे में अमिताभ, जया एवं रेखा का प्रेम-त्रिकोण बन जाता है (एक कोने पर संजीव कुमार भी विवश से इस विवाहेतर प्रेम को देख रहे होते हैं)। अमिताभ जया को छोड़कर रेखा के साथ जीवन बिताने चल देते हैं लेकिन समाज के बंधन उन्हें एवं रेखा को लौटने पर विवश कर देते हैं। अंत में अमिताभ एक विमान दुर्घटना से संजीव कुमार की जान बचाते हैं तथा वे और रेखा अपने-अपने परिवार में सीमित हो जाते हैं।


इस फ़िल्म के कथानक को अमिताभ तथा रेखा के वास्तविक प्रेम एवं उसके अमिताभ के (जया के साथ) वैवाहिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के चित्रण के रूप में देखा गया। यश चोपड़ा यूं तो साहसी फ़िल्मकार माने जाते थे पर सम्भवतः वे विवाहेतर संबंध को न्यायोचित ठहराने का साहस नहीं कर पाए। उस समय का भारतीय सामाजिक परिवेश एवं सामाजिक मान्यताएं विवाह बंधन से बाहर ऐसे किसी संबंध को स्वीकार भी नहीं करते थे। अतः ऐसा लगता है कि यश चोपड़ा ने एक साहसी फ़िल्म बनाते-बनाते अपने पैर पीछे खींच लिए तथा फ़िल्म का अंत वैसा ही रखा जैसा कि भारतीय समाज में स्वीकार्य था। वैसे भी फ़िल्म एक अच्छी एवं प्रभावशाली फ़िल्म के रूप में दर्शक समुदाय के समक्ष नहीं आ सकी। सुमधुर गीत-संगीत एवं सभी कलाकारों के अच्छे अभिनय के बावजूद फ़िल्म फीकी-फीकी-सी रही। फ़िल्म की व्यावसायिक असफलता का सम्भवतः यह भी एक कारण था। जिस अपेक्षा के साथ दर्शक फ़िल्म को देखने गए थे, वह पूर्ण नहीं हुई। न तो वास्तविक जीवन के प्रेम-त्रिकोण को ठीक ढंग से परदे पर उतारा जा सका, न ही एक मनोरंजक फ़िल्मी कथानक दर्शकों के सम्मुख रखा जा सका।

जया बच्चन वैसे भी विवाह के उपरांत फ़िल्मों से दूर हो गई थीं। इस फ़िल्म के उपरांत वे पुनः अपनी घर-गृहस्थी में रम गईं तथा अनेक वर्षों तक रजतपट पर दिखाई नहीं दीं। पर विशेष बात यह है कि अमिताभ ने रेखा के साथ अपनी जोड़ी की लोकप्रियता के बावजूद आगे उनके साथ कोई फ़िल्म नहीं की और यही फ़िल्म उनकी एवं रेखा की एक साथ आई हुई अंतिम फ़िल्म सिद्ध हुई। वास्तविक जीवन में भी उनके मध्य दूरियां आ गईं जो आज तक अनुभव की जाती हैं। जया ने संजीव कुमार के साथ बहुत-सी फ़िल्में की थीं जिन्हें उन दोनों के सामूहिक अभिनय ने जीवंत तथा प्रभावशाली बना दिया था लेकिन सिलसिला उन दोनों की भी एक साथ की गई अन्तिम फ़िल्म सिद्ध हुई।

फ़िल्म के गीत-संगीत के लिए यश चोपड़ा ने सुप्रसिद्ध संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा तथा सुप्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया को (शिव-हरि के नाम से) लिया था तथा इन दोनों ही असाधारण कलाकारों ने फ़िल्म का संगीत सृजित करने के अपने दायित्व का निर्वहन बहुत अच्छे ढंग से किया। ये कहाँ आ गए हम’, नीला आसमां सो गया’, देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए’, रंग बरसे आदि गीत तो अत्यन्त लोकप्रिय हुए ही, अन्य गीत भी बहुत अच्छे बन पड़े। आज यदि इस फ़िल्म को क्लासिक का दरज़ा मिला है तो इसमें इसके गीत-संगीत का भी बहुत बड़ा योगदान है।

समय के साथ-साथ समाज की सोच भी बदली। और इसीलिए शायद कुछ वर्षों बाद सिलसिला को एक क्लासिक माना गया। पर सच यही है कि चाहे कोई भी समाज हो, विवाह की संस्था अपना जो महत्व रखती है, उसे हलके में नहीं लिया जा सकता। इस संस्था के बाहर किसी अन्य के साथ प्रेम-संबंध रखना न तो पति के लिए वांछनीय है, न ही पत्नी के लिए। इसीलिए सिलसिला का कथ्य न तो उस ज़माने में गले उतरने वाला था, न ही आज है। आज यह फ़िल्म पसंद भी की जाती है एवं सराही भी जाती है पर इसका संदेश आज भी स्वीकार्य नहीं है। सार रूप में यही कहा जा सकता है कि यह एक सुंदर किंतु त्रुटिपूर्ण फ़िल्म है।

सिलसिला के असफल होने के उपरांत यश चोपड़ा ने आने वाले कुछ वर्षों तक प्रेमकथाएं नहीं रचीं। पर न तो वे सिलसिला को भूल पाए और न ही उसकी असफलता को पचा पाए। आठ वर्षों के उपरांत १९८९ में वे चांदनी के रूप में एक और प्रेमकथा लेकर आए (वह भी प्रेम-त्रिकोण ही है) जिसमें उन्होंने शिव-हरि को ही संगीतकार के रूप में लिया। फ़िल्म की नायिका का नाम उन्होंने चांदनी ही रखा जो कि सिलसिला में रेखा के चरित्र का नाम था। सिलसिला तो असफल रही थी किंतु श्रीदेवी अभिनीत चांदनी ने अभूतपूर्व व्यावसायिक सफलता अर्जित की।

सिलसिला में जो प्रेम-त्रिकोण दिखाया गया था उसने फ़िल्म के प्रदर्शन के उपरांत वास्तविक जीवन में उसी प्रेम-त्रिकोण का पटाक्षेप कर दिया। फ़िल्म पर बहुत कुछ कहा गया था और आज भी कहा जाता है। मैं तो यही कहूंगा कि इसे देखा जा सकता है और विचार किया जा सकता है कि वैवाहिक जीवन में प्रवेश कर लेने के उपरांत उससे बाहर का प्रेम-संबंध कितना उचित है। अमिताभ और रेखा तो इसे समझ गए। हम भी समझ लें तो क्या हर्ज़ है ?

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मंगलवार, 23 मार्च 2021

आत्मकथाओं के संसार में बच्चन की आत्मकथा

आत्मकथा लेखन को साहित्य की एक विशिष्ट विधा माना जाता है । आत्मकथा प्रायः वे ही व्यक्ति लिखते हैं जो अपने जीवन में सफलता के किसी लक्ष्य को स्पर्श कर चुके हों तथा जिनके जीवन का अधिकांश भाग व्यतीत हो चुका हो । किसी भी युवा के आत्मकथा लिखने की अधिक सार्थकता नहीं होती क्योंकि उसके जीवन का एक बहुत बड़ा भाग अभी शेष होता है जिसमें उसे कई नवीन एवं अब तक के जीवन से भिन्न अनुभव हो सकते हैं जो उसके व्यक्तित्व एवं विचारदोनों पर ही गहन प्रभाव डाल सकते हैं । मेरा मानना है कि मनुष्य अपने अनुभवों का ही उत्पाद होता है क्योंकि उसके विचारधारणाएं एवं दृष्टिकोण उसके खट्टे-मीठे-कड़वे अनुभवों पर ही आधारित होते हैं । अपने जीवन का अधिकांश भाग व्यतीत कर चुका व्यक्ति जब अपने उस अतीत का स्मृतियों में अवलोकन करता है तो अपने अनुभवों की दीर्घ शृंखला में उसे समानताओं की वे लड़ियां (कॉमन थ्रेड्स) मिलती हैं जो उसकी अपनी मानसिकता तथा उसमें अंतर्निहित अवधारणाओं की आधारशिला रखती हैं । जब वह आत्मकथा लिखता है तो अपनी उन्हीं अवधारणाओं को अपने विचारों (जो कि उसके पूर्वाग्रह भी हो सकते हैं) के रूप में प्रस्तुत करता है । यदि वह एक सुलझा हुआ एवं परिपक्व व्यक्ति है तो उसकी वह आत्मकथा पाठकों के लिए तथ्योंराष्ट्र के इतिहाससमय के प्रवाह के साथ-साथ सामाजिक परिवेश में आए परिवर्तनों तथा ठोस विचारों रूपी रत्नों का भंडार सिद्ध हो सकती है । महात्मा गाँधी की आत्मकथा – ‘सत्य के साथ प्रयोग’ एक ऐसी ही आत्मकथा है यद्यपि वह उनके जीवन की संध्या में नहीं लिखी गई होने के कारण ऊपर वर्णित कसौटी पर खरी नहीं उतरती क्योंकि वह (संभवतः व्यस्तता के कारण) उनके द्वारा १९२१ के बाद आगे नहीं लिखी जा सकी और इस प्रकार से उनके जीवन की अंतिम चौथाई सदी से अधिक के बहुमूल्य अनुभव उसमें समाहित नहीं हो सके । तथापि यह स्वीकार करना ही होगा कि अपूर्ण होकर भी वह एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिकसामाजिक एवं आध्यात्मिक प्रलेख है जिसमें उनके जीवन के रूप में उनके व्यक्तित्व तथा विचारों की झलक है । वैसे भी वे कहा करते थे – ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’ 

लेकिन यदि आत्मकथा-लेखक कोई पक्षपातीआत्मकेंद्रित या अपरिपक्व व्यक्ति हो अथवा ऐसा तिकड़मी हो जो कि उस आत्मकथा को भी अपने किसी स्वार्थ या छवि-मंजन का साधन बनाना चाहता हो तो ऐसी आत्मकथा तथ्यों को विकृत करके पाठकों को भ्रमित करने वाली भी हो सकती है । ऐसी तथाकथित आत्मकथाओं से दूरी ही भली क्योंकि ये अनुपयोगी ही नहींहानिकारक भी होती हैं । अपने जीवन में तिकड़मबाज़ी से आगे बढ़ने वाले कई भारतीय राजनेताओं की ऐसी ही आत्मकथाएं विगत कुछ वर्षों में प्रस्तुत हुई हैं जिसमें उन्होंने अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन के समयकाल से सम्बद्ध तथ्यों को कुछ इस प्रकार तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया है जिससे उनके अनुचित कृत्य या तो छुपे रहें या उनका भी औचित्य स्थापित हो जाए । ऐसी आत्मकथाओं में उन्होंने अपनी छवि को दुग्ध-धवल बनाकर प्रस्तुत किया है जबकि दूसरों पर दोषारोपण किए हैं । आख़िर अपनी कमीज़ को सफ़ेद बताने के लिए दूसरे की कमीज़ पर काला रंग तो डालना ही पड़ता है । पढ़ने वाले तो पुस्तक में वर्णित तथ्यों के सत्यापन के लिए जाने से रहे । और जिनके बारे में उल्टा-सीधा लिखा गया हैयदि वे जीवित ही नहीं हैं या कानूनी लड़ाई की सामर्थ्य नहीं रखते हैं तो लेखक महोदय के लिए किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने की संभावना ही नहीं है । अर्थात् जोखिम कोई नहीं और विवादास्पद कथ्य के कारण चर्चित हो जाने से पुस्तक के बिकने की संभावना भरपूर । यही तो चाहिए होता है ऐसे लेखकों को पैसा और चर्चा । पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की आत्मकथा पर मैं अपने एक अन्य लेख में विस्तार से विमर्श कर चुका हूँ और उसमें उनके द्वारा उद्धृत झूठों को रेखांकित कर चुका हूँ । अब राष्ट्रपति के स्तर के व्यक्ति द्वारा लिखी गई पुस्तक का सत्यान्वेषण कौन करे ? रही बात विक्रय की तो जनता नहीं ख़रीदेगी तो देशभर में (और विदेशों में भी) हज़ारों पुस्तकालय हैं जो उसकी प्रति अवश्य लेंगे – उसकी गुणवत्ता के कारण नहीं वरन उसके लेखक की हैसियत (सलेब्रिटी स्टेटस) के कारण ।

 

राजनेताओं के अतिरिक्त खिलाड़ीअभिनेता और व्यवसायी भी आत्मकथाएं लिखते रते हैं । जो भी जीवन में (भौतिक रूप से) सफल हो जाता है (या अपने आपको सफल समझने लगता है)अपनी दृष्टि में आत्मकथा-लेखन का (या यूँ कहिए कि पढ़ने वालों को अपने अमूल्य ज्ञान और उपदेशों से कृतकृत्य करने का) अधिकारी मान बैठता है । सदाबहार अभिनेता देव आनंद ने अपने देहावसान से कुछ वर्षों पूर्व अपनी आत्मकथा लिखी थी जिसमें उन्होंने अपने विभिन्न प्रेम-प्रसंगों पर (अनावश्यक) चर्चा की थी । वह रोचक एवं तथ्याधारित होकर भी एक आत्ममुग्ध व्यक्ति का एकालाप ही थी । एडम गिलक्रिस्ट तथा शोएब अख़्तर जैसे प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ियों ने भी विषय-सामग्री में विवादास्पद टिप्पणियों का तड़का लगाते हुए अपनी आत्मकथाएं प्रस्तुत की हैं । हाल ही में हिन्दी के अत्यंत लोकप्रिय उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक की आत्मकथा भी कई खंडों में आ चुकी है और उसे पढ़ने के उपरांत मैं कह सकता हूँ कि वह उनके उपन्यासों की भाँति ही रोचक है । इसे उन्होंने लिखा भी उसी शैली में है ।

लेकिन हिन्दी भाषा में लिखी गई जिस आत्मकथा ने सर्वाधिक प्रसिद्धि और साहित्यिक जगत में सम्मान अर्जित किया हैवह है हिन्दी के मूर्धन्य कवि स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन की चार खंडों में प्रसृत आत्मकथा जिसे ‘सरस्वती सम्मान’ से पुरस्कृत किया गया है । बीसवीं शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक में अपनी ‘मधुशाला’ के माध्यम से हिन्दी कविता के परिदृश्य पर छा जाने वाले एवं अन्य अनेक काव्य-संकलनों के माध्यम से हिन्दी कविता के प्रेमियों के हृदय जीत लेने वाले बच्चन जी की आत्मकथा को उनकी कालजयी कृति माना गया है और उसकी उत्कृष्टता को उनकी कविताओं से भी अधिक आँका गया है । इस आत्मकथा के चार खंड हैं १. क्या भूलूँ क्या याद करूँ२. नीड़ का निर्माण फिर३. बसेरे से दूर४. दशद्वार से सोपान तक । मैंने चारों खंड पढ़े लेकिन स्वर्गीय बच्चन जी से क्षमा-याचना के साथ कह रहा हूँ कि कालजयी कहलाने की अर्हता मुझे केवल इसके प्रथम खंड  - ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ में ही दृष्टिगोचर हुई । मैंने असाधारण सत्यनिष्ठा एवं साहस से ओतप्रोत आत्माभिव्यक्ति को समाहित करती इस अद्भुत कृति को एक बार नहींअनेक बार पढ़ा और इसकी विस्तृत समीक्षा (अंगरेज़ी में) लिखी । उस समय तक मैंने इसके परवर्ती तीनों खंड नहीं पढ़े थे । जब मैंने चार खंडों में आबद्ध इस आत्मकथा को सम्पूर्ण पढ़ लिया तो मुझे यही लगा कि खंड-दर-खंड इसकी गुणवत्ता में ह्रास ही हुआ अर्थात् प्रत्येक नया खंड अपने पूर्ववर्ती खंड (या खंडों) से कमतर ही निकला । इसका कारण सभवतः यह है कि बच्चन जी की जो बेबाकी ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ में उपस्थित हैवह अन्य खंडों में क्रमशः घटती चली गई है यद्यपि उन्होंने आरंभ में ही महान फ्रांसीसी साहित्यकार मानतेन की आत्मकथा का संदर्भ देते हुए इसे स्वांतः सुखाय अथवा अपने मन की शांति के निमित्त लिखा हुआ बताया है और यह भी कहा है कि सार्वजनिक शालीनता के आग्रह ने उनकी स्पष्टवादिता पर अंकुश लगाया है अन्यथा वे स्वयं को पाठकों के सम्मुख आपादमस्तक नग्न उपस्थित कर देते । मानतेन द्वारा अपनी आत्मकथा में पाठकों से मांगी गई विदा की ही भांति बच्चन जी ने भी अपने पाठकों से अपनी विदा को स्वीकार करने का आग्रह किया है और यह भी कहा है कि अपनी पुस्तक का विषय वे स्वयं हैं और पाठकों के लिए कोई कारण नहीं कि वे अपना समय ऐसे निरर्थक और नगण्य विषय पर व्यय करें । लेकिन कम-से-कम उनकी आत्मकथा का पहला खंड तो एक अद्वितीय रचना ही है जो उनके पूर्वजों केउनके वंशवृक्ष के तथा उनके अपने जीवन के इतिहास को ही नहीं वरन भारत देशभारतीय समाज एवं हिन्दी कविता के भी समकालीन इतिहास को पाठकों के समक्ष जीवंत कर देता है ।

 

बच्चन जी ने दो विवाह किये । उनकी पहली पत्नी श्यामा के जो अपने जीवन के अधिकांश भाग में रूग्णावस्था में ही रहीं तथा उनके आगमन से भी पूर्व उनके अभिन्न मित्र कर्कल की पत्नी चम्पा के सान्निध्य ने ही वस्तुतः उनके भीतर के कवि को जागृत एवं विकसित किया । उन दोनों ही नारियों का असामयिक निधन उन्हें कभी न भरने वाले घाव और जीवनभर की पीड़ा दे गया लेकिन व्यक्ति के आहत अंतःस्थल से उठने वाली ऐसी पीड़ा ही तो कविता की जननी होती है । सुमित्रानंदन पंत जी के शब्दों में – ‘वियोगी होगा पहला कविआह से उपजा होगा गाननिकलकर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान’ । चम्पा और श्यामा दोनों ही अपने जीवन से भी कहीं अधिक अपनी मृत्यु के माध्यम से हरिवंशराय बच्चन के भीतर के कवि को निखार गईंसंवार गईं । अपने वंश के वटवृक्ष तथा अपने संबंधियों से जुड़े विविध तथ्यों एवं गाथाओं के प्रकीर्णन के मध्य अपने जीवन की ऐसी अनुभूतियों एवं भावनाओं को बच्चन जी ने ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ में कुछ इस प्रकार से अंकित किया है कि इस कृति के एक-एक हर्फ़ से उनकी ईमानदारी झाँकती है । पुस्तक के पृष्ठों से गुज़रते हुए पाठक को सब कुछ चित्रपट की भाँति अपने नेत्रों के समक्ष घटित होता-सा प्रतीत होता है और ऐसा आभास होता है मानो वह बच्चन जी के जीवन के अनुभवों की नदी में उनके साथ-साथ बह रहा हो । अपनी आत्मकथा के इस प्रथम भाग में अपने अनुभवों को बाँटते हुए बच्चन जी ने कहीं भी आत्मश्लाघा या स्वयं को दुग्ध-धवल सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया है तथा स्वयं को मानवीय दुर्बलताओं से युक्त एक साधारण व्यक्ति के रूप में ही चित्रित किया है । यह ईमानदारी एवं स्पष्टवादिता ही इस कृति का सबसे बड़ा गुण है जो इसे आत्मकथाओं के संसार में ऐसी उच्चता प्रदान करता है जिसे स्पर्श करना ऐसी किसी अन्य कृति के लिए असंभव नहीं तो अत्यंत कठिन अवश्य है ।

 

लेकिन कवि या शायर या कथाकार बनना एक बात हैजीवन में भौतिक सफलता प्राप्त करना दूसरी । प्रायः जो भावुकता एवं संवेदनशीलता किसी को सृजन की शक्ति एवं प्रेरणा देती हैवही प्रायः स्वार्थाधारित संसार में उसकी भौतिक सफलता के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा भी बन जाती है । बच्चन जी परम सौभाग्यशाली रहे जो श्यामा जी के निधन के उपरांत जब वे अवसाद रूपी सरिता में डोल रही अपनी जीवन-नैया को संभालने का यत्न कर रहे थेतब उनके जीवन में तेजी सूरी नामक एक पंजाबी युवती ने प्रवेश किया और लगभग किसी फ़िल्म की पटकथा की भाँति ही सम्पन्न हुए उनके इस द्वितीय विवाह ने ही उनके भौतिक रूप से सफल और समृद्ध जीवन की आधारशिला रखी । तेजी जी भीतर से अत्यंत दृढ़ एवं व्यावहारिक महिला थीं एवं उनका बच्चन जी के प्रति प्रेमासक्त होना एवं उनकी जीवन-संगिनी बनना बच्चन जी के लिए वरदान सिद्ध हुआ । जैसे कवि हृदय बच्चन में कुछ स्त्रियोचित गुण थेवैसे ही तेजी में कुछ पुरुषोचित गुण थे और इन दोनों का संगम कुछ ऐसा रहा कि वे सम्पूर्ण जीवन एक दूसरे के पूरक बने रहे । तेजी के साथ बच्चन ने अपने भग्न नीड़ का फिर से निर्माण किया और उनके जीवन के इस भाग का विवरण उनकी आत्मकथा के दूसरे खंड ‘नीड़ का निर्माण फिर’ में है । एक सद्गृहस्थ बनकर बच्चन अपने दो पुत्रों अमिताभ एवं अजिताभ को जीवन में सफलता एवं समृद्धि की असाधारण ऊंचाइयों तक पहुँचने के योग्य बना सके एवं स्वयं भी विदेश जाकर शोधकार्य करने से लेकर केंद्रीय सरकार की सेवा में नियुक्त होने तथा राज्यसभा के मानद सदस्य बनने तक की उपलब्धियां प्राप्त कर सके तो इसमें उनकी हमसफ़र तेजी के साथ ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई । बच्चन एवं तेजी का प्रेम कैसे उद्भूत हुआ एवं कैसे उसने आनन-फानन परिणय का गंतव्य प्राप्त कर लियायह पुस्तक को पढ़कर स्पष्ट नहीं होता ।

 

बच्चन अपनी आत्मकथा के तीसरे खंड का नाम ‘हंस का पश्चिम प्रवास’ रखना चाहते थे क्योंकि इसमें उनके अपनी विश्वविद्यालय की नौकरी से दो वर्षों का अवैतनिक अवकाश लेकर इंग्लैंड में रहकर आंग्ल कवि विलियम बटलर ईट्स के साहित्य पर शोधकार्य करके केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त करने से जुड़े अनुभवों का विवरण आना था लेकिन लेखन के उपरांत उन्होंने इस खंड को ‘बसेरे से दूर’ शीर्षक प्रदान किया । इसमें बच्चन ने अपने व्यावहारिक (मूलतः आर्थिक) कठिनाइयों से युक्त अनुभवों के साथ-साथ अपनी अनुपस्थिति में अपनी धर्मपत्नी तेजी पर आई एक विशिष्ट विपत्ति का भी उल्लेख किया है । लेकिन इस खंड में बच्चन के कवि-हृदय की स्वाभाविक संवेदनशीलता के दर्शन कम ही स्थानों पर होते हैं एवं अधिकांश भाग एक रूखे विवरण की भाँति प्रतीत होता है । बच्चन ने इस भाग में और अपनी आत्मकथा के अंतिम खंड ‘दशद्वार से सोपान तक’ में अपने द्वारा घूमे गए विभिन्न विदेशी स्थलों का वर्णन किया है जो कई स्थानों पर इतना विस्तृत एवं विशिष्ट हो गया है कि पाठक को ऊबा देता है । इसके अतिरिक्त अपनी अनुपस्थिति में अपनी अर्द्धांगिनी पर आई विपत्ति के वर्णन में वे उस स्पष्टता से काम नहीं ले सके जिसका परिचय उन्होंने आत्मकथा के प्रथम खंड में दिया है । सच्चाई के बयान में उनकी इस झिझक का कोई कारण दिखाई नहीं देता । अपनी पत्नी पर कुदृष्टि डालने वाले जिस दुष्ट व्यक्ति की ओर वे संकेत करते हैंउसका नामोल्लेख करने में कैसा संकोच ? या फिर वे स्वयं ही अपने मन में उस घटनाक्रम को लेकर स्पष्ट नहीं थे जिसके वे साक्षी नहीं थे और जिसके बारे में उन्हें केवल दूसरों से ही जानकारी मिली । बहरहाल इस प्रसंग के विषय में बच्चन ने जो भी कहावह कुछ अधूरा-सा (और नाटकीय भी) लगा । इसके अतिरिक्त यह खंड बच्चन की अपने विश्वविद्यालय से मिली उपेक्षा तथा अपनी उपलब्धि को समुचित सम्मान न दिये जाने से उपजी कुंठा को चित्रित करता है । अपनी उस मनोदशा का उनका वर्णन स्वाभाविक तो लगता हैप्रेरक नहीं । अपनी ओर से बच्चन ने इसी खंड के अंत में अपनी आत्मकथा का समापन कर दिया है । संभवतः उन्हें नहीं लगता था कि वे ऐसी एक पुस्तक और लिखेंगे जो उनकी आत्मकथा का चौथा खंड होगी । यह अंतिम खंड एक लंबे अंतराल के उपरांत लिखा गया । 

 

आख़िर बच्चन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की प्रेरणा से विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़कर पहले आकाशवाणी में लगे और तदोपरांत दिल्ली चले आए । इलाहाबाद भी उनसे छूट गया और अध्यापन का उनका प्रिय कार्य भी । विदेश मंत्रालय में हिन्दी के संवर्द्धन से जुड़ी नौकरीराज्यसभा की सदस्यतादिल्ली में रहने के अनुभवपुत्रों के करियर एवं विवाहदिल्ली एवं मुंबई के बीच की आवाजाहीदेह को घेरने वाले रोग एवं उनका उपचार तथा समय-समय पर की गई विदेश-यात्राओं का लेखा-जोखा है उनकी आत्मकथा के अंतिम खंड – ‘दशद्वार से सोपान तक’ में । इलाहाबाद में अपने क्लाइव रोड के आवास को उन्होंने ‘दशद्वार’ नाम दिया था क्योंकि उसमें रोशनी एवं हवा के आगमन हेतु दस खुले स्थान थे जबकि ‘सोपान’ नामकरण उन्होंने दिल्ली में गुलमोहर पार्क क्षेत्र में बनवाए गए अपने नवीन आवास का किया । ‘दशद्वार’ से प्रस्थान तथा ‘सोपान’ में प्रवेश के मध्य सत्ताईस वर्षों की समयावधि में उनके जीवन में क्या-क्या हुआयही उनकी आत्मकथा के अंतिम खंड की विषय-वस्तु है । चूंकि उनकी मूल आत्मकथा अपने तृतीय खंड – ‘बसेरे से दूर’ में ही समाप्त हो गई थीदीर्घावधि के उपरांत रचा गया यह अंतिम खंड अपनी शैली में प्रथम तीन खंडों से भिन्न है । संभवतः इस प्रक्षिप्त खंड पर बच्चन की उत्तरोत्तर बढ़ती आयु का भी कुछ प्रभाव पड़ा हो क्योंकि वार्धक्य में मनुष्य की बढ़ती हुई वय प्रायः उसके मनोभावों तथा मस्तिष्क की गतिविधियों पर अपना स्नायविक प्रभाव डालती है ।

 

इस खंड में बच्चन ने ओशो अथवा रजनीश के साथ के अपने संबंध का भी वर्णन किया है और अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिपादित किया है कि ऐसे कथित भगवान भी मानव मन की संकीर्णताओं से मुक्त नहीं हो पाते । बाकी इसमें उन्होंने अपने पुत्र अमिताभ की उपलब्धियों का बखान एक अभिमानी पिता के स्वर में किया है और अमिताभ के प्रति उनका सम्बोधन भी स्नेहयुक्त न होकर आदरयुक्त है जो विचित्र एवं अप्रभावी है । अमिताभ और जया की मैत्रीप्रेम और परिणय का संदर्भ मात्र दिया गया है और १९८२ में फ़िल्म ‘कुली’ की शूटिंग के दौरान अमिताभ के साथ हुई दुर्घटना और उसके परवर्ती घटनाक्रम को भी पर्याप्त स्थान दिया गया है । लेकिन अमिताभ के जीवन से जुड़ी कतिपय महत्वपूर्ण घटनाओं और तथ्यों को वे छुपा गए (या संभवतः वे उनके बारे में जानते ही नहीं थे) । आत्मश्लाघा तथा दूसरों पर दोषारोपण करके स्वयं को निष्कलंक सिद्ध करने से अपनी आत्मकथा के प्रथम खंड में जो परहेज़ बच्चन ने रखा थावह परहेज़ बाद के तीन खंडों में दिखाई नहीं देता । इसलिए मुझे ऐसा लगा मानो जिस ईमानदारी के आवरण ने उनके वास्तविक व्यक्तित्व को ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ में ढक लिया थाबाद के खंडों में उसके हट जाने से उनका सच्चा व्यक्तित्व अनायास ही (और उनके अनचाहे ही) पाठकों के सम्मुख अपने वास्तविक रूप में प्रस्तुत हो गया । ‘दशद्वार से सोपान तक’ में उन्होंने न केवल सुख-सुविधाओं की प्राप्ति (अथवा असुविधाओं से बचने) के निमित्त अपने घोषित आदर्शों के साथ किए गए विभिन्न समझौतों का उल्लेख बिना किसी अपराध-बोध के किया हैवरन कुछ पत्रों के प्रकाशन को लेकर सुमित्रानंदन पंत के साथ हुए अपने विवाद को भी अपने ही दृष्टिकोण से पाठकों के समक्ष रखा है । श्रीमती इन्दिरा गाँधी के सत्ताच्युत होने के उपरांत उनके विरोधियों द्वारा नियंत्रित व्यवस्था ने उन्हें किस प्रकार प्रताड़ित कियाइसका विवरण भी उन्होंने सापेक्ष भाव से ही किया है । उन्होंने सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की अव्यावहारिकता की अप्रत्यक्ष रूप से आलोचना की है लेकिन ऐसा करते समय वे यह विस्मृत कर गए कि निराला जी ने निर्धनता एवं कष्टों भरे जीवन (एवं कारुणिक मृत्युको स्वीकार कियाउनकी तरह कभी अपने आदर्शों एवं जीवन-मूल्यों से समझौता नहीं किया । इन्हीं सब कारणों से यह खंड विशेष प्रभावित नहीं करता और बच्चन की मानवीय दुर्बलताओं का आख्यान ही अधिक लगता है । विभिन्न विदेशी स्थलों एवं उनसे सम्बद्ध शुष्क तथ्यों का अनावश्यक और ऊबाऊ विवरण पुस्तक की उपादेयता को सीमित करता है । 

 

जो एक बात बच्चन की किसी महागाथा सरीखी आत्मकथा को आद्योपांत पढ़ने के उपरांत मुझे खटकीवह यह थी कि यद्यपि बच्चन का जीवन भारत के स्वाधीनता आंदोलन एवं राष्ट्र के विभाजन के ऐतिहासिक कालखंड का साक्षी रहाउन्होंने अपनी आत्मकथा में उन घटनाओं तथा उनके कारण राष्ट्र एवं नागरिकों के जीवन में हुई हलचल का कोई विशेष विवरण नहीं दिया । ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ में क्रांतिकारी यशपाल (जो बाद में हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक बने)उनकी वाग्दत्ता सरीखी प्रकाशो तथा अपने एक अन्य मित्र श्रीकांत के साथ जुड़ी कुछ घटनाओं का विवरण अवश्य है लेकिन ऐसा लगता है कि बच्चन सम्पूर्ण राष्ट्र को उद्वेलित करने वाली विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं से निर्लिप्त अथवा अप्रभावित-से रहे ।

 

बहरहाल आत्मकथाओं के संसार में ‘बच्चन की आत्मकथा’ अपना एक विशिष्ट स्थान तो रखती ही हैइसका वस्तुपरक एवं निष्पक्ष दृष्टिकोण से किया गया पारायण भावी आत्मकथा-लेखकों को यह भी बताता है कि एक आत्मकथा में क्या होना चाहिए एवं क्या नहीं होना चाहिए । मेरा अपना यह मानना है कि आत्मकथा में चूंकि व्यक्ति अपने साथ-साथ अनेक अन्य व्यक्तियों का भी उल्लेख करता हैअतः उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि जो कुछ भी वह कहेवह न केवल प्रामाणिक होवरन अन्य व्यक्तियों पर अनावश्यक लांछन लगाने वाला न हो क्योंकि ऐसे अनेक व्यक्ति यदि दिवंगत हो चुके हैं अथवा जीवित तो हैं लेकिन शारीरिक-मानसिक रूप से सक्षम अथवा साधन-सम्पन्न नहीं हैं तो यह निश्चय ही उनके प्रति अन्यायपूर्ण है । आत्मकथा-लेखक जिस तरह अपनी छवि को महत्व देता हैउसी तरह उसे दूसरों की छवि एवं सामाजिक सम्मान का भी महत्व समझना चाहिए और यह न भूलना चाहिए कि जब आप अपनी एक उंगली किसी की तरफ़ उठाते हैं तो आपकी उस हथेली की तीन उंगलियाँ ख़ुद आप ही की ओर उठ जाती हैं । 

 

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