मंगलवार, 7 जुलाई 2026

सच्चाई की कांटों भरी राह

मैंने अपने लेख 'सत्य और न्याय ! कितने असहाय !' में लिखा है कि सत्य का पथ पुष्पाच्छादित नहीं होता, कंटकाकीर्ण होता है जिस पर चलना बड़े साहस का कार्य है। अभी-अभी जेन्नी शबनम जी का बिहार के बिलौटी गाँव के भारत भूषण तिवारी के बलिदान पर लिखा गया लेख पढ़ा तो दिल भर आया। एक अट्ठाईस वर्षीय युवक जिसने विवाह तक न करके अपना जीवन समाज को समर्पित कर दिया था, गंगा के कटाव के कारण विस्थापित हुए जवइनिया नामक गाँव के लोगों की भलाई के लिए संघर्ष करते हुए पुलिस वालों के हाथों मारा गया। क्या उसका बलिदान देश की व्यवस्था और स्थिति को सुधारने में कोई योगदान देगा ? कुछ वर्ष पूर्व ऐसे ही देशभक्त युवक-युवतियों ने लोक सभा में धुएं के बम फेंके थे और देशप्रेम के नारे लगाते हुए अपनी गिरफ़्तारी दी थी। उनका क्या हुआ, पता नहीं। कोई न्यायिक कार्रवाई हुई या वे बिना किसी उचित कार्रवाई के ही कारागार में सड़ रहे हैं, पता नहीं। लेकिन देश की व्यवस्था में सुधार की उनकी आकांक्षा पूरी नहीं हुई। 

जेन्नी जी के लेख से पता चला कि भारत भूषण तिवारी ने अपना लाइव वीडियो बनाया था जिसके कारण उसकी पुलिस द्वारा की गई हत्या का सच सामने आ गया अन्यथा नक़ली मुठभेड़ों में जाने कितने ही निर्दोष मार दिए जाते हैं। उसके परिवार की पीड़ा और उसके गाँव के लोगों की पीड़ा को साझा करने वाला आज कौन है ? कम-से-कम पुलिस और सत्ताधारी राजनेता तो नहीं। वह हृदयहीन व्यवस्था से जवइनिया गाँव के विस्थापितों के पुनर्वास की लड़ाई लड़ रहा था। उन्हें न्याय न मिलने की सूरत में उसने आत्म-बलिदान की घोषणा की थी। पुलिस ने पहले तो उसकी माँग पूरी होने का आश्वासन उसे दिया लेकिन उसके हथियार फेंककर समर्पण कर देने के उपरांत उसे छलपूर्वक मार दिया। सत्य और न्याय के लिए जूझने वालों का हमारे देश में अंजाम शायद यही है। यही प्रार्थना है कि उसका बलिदान व्यर्थ न जाए तथा उसे न्याय मिले।

सुप्रसिद्ध निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने एक मर्मस्पर्शी फ़िल्म बनाई थी - सत्यकाम (१९६९) जो कहानी सुनाती थी एक सत्य के पथिक की। सुप्रसिद्ध बांग्ला उपन्यासकार नारायण सान्याल के एक उपन्यास पर आधारित है यह फ़िल्म। नायक जो सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प लेता है, आजीवन कष्ट ही उठाता रहता है और अन्त में मर्मभेदी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। देश की संवेदनहीन व्यवस्था में उसके लिए यही संभव था। भ्रष्ट व्यवस्था से जुड़े लोग शक्तिशाली होते हैं और इस संसार की वास्तविकता 'सत्यमेव जयते' नहीं,  'शक्तिमेव जयते' ही है। आततायी शक्तिशाली होते हैं जबकि उत्पीड़ित दुर्बल। ऐसे में किसी भी पीड़ित को न्याय कैसे मिले ? और सांसारिक जीवन में रहकर ही सत्य के लिए जूझना वास्तव में जूझना होता है। सांसारिक जीवन से दूर रहकर आदर्शों की बड़ी-बड़ी बातें करना और दूसरों को उपदेश देना तो बहुत सरल है। फ़िल्म में दिखाया गया है कि नायक के पिता इस तथ्य को उसके संसार से चले जाने के उपरांत ही समझ पाते हैं कि सच्चाई की राह पर वस्तुतः कैसे चला जाता है। दशकों पूर्व बनी इस फ़िल्म का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था।

आए दिन अन्याय होते हैं। आए दिन उत्पीड़न होते हैं। यदि कोई संवेदनशील व्यक्ति या संस्था किसी असहाय पीड़ित या पीड़िता को व्यवस्था द्वारा न्याय दिलाने का प्रयास करे तो उसे भी शक्तिशाली उत्पीड़क अपने शत्रु के रूप में ही देखते हैं तथा उसे भी ठिकाने लगा देने की कोशिश में लग जाते हैं ताकि फिर कभी कोई किसी असहाय पीड़ित या पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए उठ खड़ा होने का साहस न करे। ऐसे में किसी बेसहारा का हाथ थामना ही बड़ी हिम्मत का काम होता है। यह हिम्मत भारत भूषण तिवारी ने जवइनिया गाँव के विस्थापितों के लिए दिखाई और परिणाम में उसे अपनी शहादत देनी पड़ी। बहुत आत्मबल चाहिए ऐसा कुछ करने के लिए। उसने अपने लाइव वीडियो में कहा है कि यदि वह मारा जाता है तो उसका शरीर दान कर दिया जाए। कितनी असाधारण बात है यह !

भारत भूषण तिवारी की शहादत सोशल मीडिया के कारण देश के सामने आ गई अन्यथा आज का बिक चुका भारतीय मीडिया सच को कभी सामने नहीं आने देता। वह या तो उसे छुपा देता या विकृत कर देता। आज तो ईमान की बात कहना तक मुश्किल है, कुछ ठोस करना तो बहुत दूर। हमारे न्यायालय तक आज न्याय का नहीं, सत्ता का साथ दे रहे हैं। जिसे भी देखो, वह सत्ता के आगे नतमस्तक हो रहा है और स्वार्थ-साधन में लिपटी सत्ता केवल जनसामान्य को (धर्म का अवलम्ब लेकर) भ्रमित करने में लगी है। ऐसे में सच्चाई की राह कांटों भरी ही हो सकती है जिस पर फूल नहीं मिल सकते। 'सत्यकाम' फ़िल्म के नायक सत्यप्रिय (धर्मेन्द्र) या बिलौटी गाँव के भारत भूषण तिवारी की तरह जो इस बात को समझ कर स्वीकार कर ले, वही उस पर चल सकता है। 

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