बुधवार, 24 मार्च 2021

फ़िल्म-निर्माण में सशक्त पटकथा एवम् कुशल निर्देशन का महत्व

मुझे साहित्य एवम् संगीत के अतिरिक्त सबसे अधिक रुचि यदि किसी वस्तु में है तो वह है भारतीय (या यूँ कहिए कि हिंदी) फ़िल्में । स्वांग, तमाशे और नौटंकी के दौर के अवसान के साथ-साथ लोकभाषा में बाइस्कोप के नाम से पदार्प करने वाली चलती-फिरती तस्वीरें यानी फ़िल्में ही भारतीय जनमानस के लिए मनोरंजन का सबसे सस्ता और कालांतर में सबसे लोकप्रिय साधन सिद्ध हुईं । मनोरंजन की दुनिया में इस माध्यम की यह हैसियत आज भी कायम है । पहले फ़िल्में मूक होती थीं । जब उनमें कलाकारों की वाणी तथा अन्य ध्वनियों का समावेश सम्भव हुआ तो इन्हें बोलती तस्वीरें अथवा टॉकी कहा गया तथा फ़िल्मों का निर्माण करने वाली कई संस्थाएं अपने नाम में टॉकीज़ शब्द लगाने लगीं । फ़िल्मों का प्रदर्शन करने वाले सिनेमाघरों में भी अपने नाम में टॉकीज़ शब्द को जोड़ने का चलन आरम्भ हो गया (अनेक सिनेमाघर तो आज भी अपने आपको टॉकीज़ ही कहते हैं) । बहरहाल टॉकी का ज़माना एक बार आया तो हमेशा के लिए आ गया और मनोरंजन की दुनिया में छा गया   

फ़िल्म-निर्माण की तकनीक और दर्शन-श्रवण सम्बन्धी गुणवत्ता निरंतर अद्यतन होती रही । श्वेत-श्याम फ़िल्मों का युग लम्बा चला लेकिन अंततः रंगीन फ़िल्मों का युग आना ही था, सो आया । संगीत, नृत्य तथा एक्शन संबंधी पक्षों में तो समय के साथ-साथ परिष्करण होता ही रहा लेकिन जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन आया, वह आया फ़िल्मों के पटकथा-लेखन एवम् प्रस्तुतीकरण में । जैसे-जैसे भारतीय फ़िल्मों में नाटकीयता का स्थान स्वाभाविकता लेती गईं, वैसे-वैसे लगा कि हमारी फ़िल्में अब वयस्क हो रही हैं । 

मैंने अपने विस्तृत लेख – सिनेमा - मनोरंजन का साधन, एक बहुत बड़ा उद्योगमें फ़िल्म-निर्माण की प्रक्रिया का आद्योपांत वर्णन किया है । इसमें मैंने कहा है कि फ़िल्म की कहानी एक पंक्ति का विचार भी हो सकता है और कोई पुस्तक (उपन्यास या कथा) भी लेकिन फ़िल्म बनाने के लिए विचार का विस्तार अथवा पुस्तक की सामग्री का उचित अनुकूलन (एडेप्टेशन) करना आवश्यक होता है । इसका कारण यह है कि फ़िल्म उचित क्रम में लगाए गए दृश्यों का संकलन होती है और उसकी एक उचित लम्बाई होती है । अब पहले की भांति लंबी फ़िल्में तो कम ही बनती हैं लेकिन दो घंटे लंबी फ़िल्म तो सामान्यतः अपेक्षित होती ही है और इतनी लंबी फ़िल्म बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के रोचक दृश्यों से युक्त पटकथा तो होनी ही चाहिए । इसे पटकथा इसलिए कहा जाता है क्योंकि यही वह कथा है जिसे दर्शक फ़िल्म के आरम्भ से उसके समापन तक चित्रपट पर देखता है । दो-तीन दशक पूर्व तक फ़िल्म को अपेक्षित समयावधि तक खींचने के लिए पटकथा में मूल कथा के समानांतर एक हास्य का ट्रैक डाला जाता था जिसका प्रयोजन फ़िल्म को अपेक्षित लंबाई तक बढ़ाने के साथ-साथ दर्शकों को हंसाना और फ़िल्म के गंभीर प्रवाह में उन्हें कुछ राहत प्रदान करना होता था । इस तरह यह ट्रैक फ़िल्म की गंभीरता के मध्य एक ब्रेक की भांति कार्य करता था । कभी-कभी ऐसा ट्रैक और उससे जुड़े हुए विशेषज्ञ हास्य कलाकार मूल कथा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थी लेकिन प्रायः यह मूल कथा के लिए अनावश्यक ही हुआ करता था । अब ज़माना बदल चुका है और ऐसे हास्य के ट्रैक भारतीय फ़िल्मों से ग़ायब हो चुके हैं । इसलिए फ़िल्म की पटकथा का सशक्त, प्रभावी एवम् दर्शक को बांधे रखने में समर्थ होना अब और भी अधिक आवश्यक है । 

फ़िल्म निर्देशक का माध्यम है । निर्देशक ही यह परिकल्पना करता है कि फ़िल्म रूपहले परदे पर किस प्रकार मूर्त रूप लेगी अर्थात् वास्तविकता में बनने से पहले फ़िल्म निर्देशक के मस्तिष्क में बनती है । निर्देशक फ़िल्म से संबंधित सभी पक्षों में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष हस्तक्षेप करता है क्योंकि फ़िल्म की सफलता अथवा असफलता के उत्तरदायित्व में सबसे अधिक भागीदारी भी उसी की होती है – फ़िल्म में काम करने वाले अत्यंत लोकप्रिय सितारों से भी अधिक । साफ़ शब्दों में कहा जाए तो जय-जय भी उसी की है और हाय-हाय भी उसी की । उसका दायित्व अधिक है, इसीलिए उसके अधिकार भी अधिक हैं । फ़िल्म-निर्माण में निर्देशक का महत्व इसी तथ्य से सिद्ध हो जाता है कि फ़िल्म की नामावली में उसका नाम सबसे अंत में दिया जाता है जो इस सत्य का प्रतीक है कि फ़िल्म-निर्मा की प्रक्रिया के प्रत्येक अंग में अंतिम निर्णय उसी का है (होना चाहिए) 

लेकिन कुशल से कुशल निर्देशक भी बिना एक अच्छी पटकथा के प्रभावी फ़िल्म नहीं बना सकता । फ़िल्म की विषय-वस्तु (थीम) कोई भी विधा हो सकती है यथा स्त्री-पुरुष का प्रेम, सामाजिक एवम् पारिवारिक संबंधों के उतार-चढ़ाव, कोई हास्य-कथा, कोई सामाजिक समस्या, देशप्रेम, कोई धार्मिक आख्यान, कोई ऐतिहासिक घटना, अपराध एवम् पुलिस, यात्रा, प्रतिशोध, किसी हत्या अथवा अन्य घटना का रहस्य, राजनीति आदि लेकिन एक सुस्पष्ट दृष्टि के साथ सिरजी गई सशक्त एवम् रोचक पटकथा ही विषय-वस्तु को प्रभावी ढंग से परदे पर उतार सकती है । ऐसी अनेक फ़िल्में हैं जिनकी थीम अत्यंत प्रशंसनीय होने के उपरांत भी सशक्त पटकथा के अभाव के कारण वे सतही एवम् साधारण बनकर रह गईं जबकि ऐसी भी फ़िल्में हैं जिनकी थीम बार-बार दोहराई गई एवम् जानी-पहचानी होने पर भी अपनी सशक्त तथा रोचक पटकथा के कारण वे दर्शक-वर्ग को (एवम् समीक्षक वर्ग को भी) प्रभावित करने में सफल रहीं । पटकथा ऐसी होनी चाहिए जो देखने वाले की रुचि को दृश्य-दर-दृश्य बनाए रखे । उसमें कसावट होनी चाहिए अर्थात् अनावश्यक दृश्यों (एवम् नृत्यों तथा गीतों) से उसे बचाए रखना चाहिए । फ़िल्म  इस कदर ढीली और बोझिल न बन जाए कि सिनेमाघर में बैठे दर्शक को बार-बार अपनी घड़ी में वक़्त देखना पड़े  जो कुछ दिखाया जाए, वह स्वाभाविक एवम् वास्तविक भले ही न हो, उसके प्रस्तुतीकरण में स्वाभाविकता का कुछ पुट अवश्य होना चाहिए ताकि दर्शक स्वयं को परदे पर चल रही कहानी तथा पात्रों से मानसिक रूप से जोड़ सके (कनेक्ट कर सके) । पटकथा के अनुरूप ही प्रभावशाली संवाद भी होने चाहिए जो कि पात्रों के अभिनय में मूल्यवर्धन (वैल्यू-एडिशन) करें तथा दर्शकों (जो कि श्रोता भी होते हैं) के मनोमस्तिष्क पर छाप छोड़ जाएं । 

पटकथा-लेखन के उपरांत निर्देशक का कार्य आरम्भ होता है जो कि न केवल कला-निर्देशक (आर्ट-डायरेक्टर) से दृश्यों की आवश्यकता के अनुरूप साज-सज्जा करवाता है बल्कि सम्पूर्ण कथानक अथवा  दृश्यों की पृष्ठभूमि की आवश्यकतानुसार बाहरी स्थलों (आउटडोर लोकेशन) का भी समुचित चयन करता है । वही फ़िल्म के छायाकार (कैमरामैन) को फ़िल्मांकन के लिए उचित कोण सुझाता है तथा उसे बताता है कि कितने लॉंग शॉट लेने हैं और कितने क्लोज़-अप । पात्र के अनुरूप ही उचित कलाकार के चयन में भी वह भूमिका निभा सकता है यदि निर्माता इस संदर्भ में उसकी बात सुने । आजकल विशेषज्ञ कास्टिंग डायरेक्टर भी होने लगे हैं जो कि विभिन्न पात्रों के स्वरूप को भलीभांति समझकर उसमें पूरी तरह ठीक बैठ सकने वाले नये-पुराने कलाकारों को ढूंढने का तथा उन्हें फ़िल्म में संबंधित भूमिका करने हेतु मनाकर लाने का कार्य करते हैं । कलाकारों से कथा एवम् दृश्यों की आवश्यकता के अनुसार स्वाभाविक अभिनय करवाना तथा उनकी प्रतिभा का सर्वोत्तम दोहन करना भी निर्देशक का ही कार्य होता है । अच्छा निर्देशक वह होता है जिसके मानस-पटल पर फ़िल्म के भावी अंतिम रूप की कल्पना (विज़न) पूर्णरूपेण स्पष्ट हो । उसे ठीक-ठीक मालूम हो कि वह क्या बना रहा है और फ़िल्म के नाम पर दर्शकों को क्या परोसने जा रहा है । ऐसा अनेक बार हो चुका है जब अच्छी-भली फ़िल्मों की गुणवत्ता उनके निर्देशकों के भ्रम के कारण ही घट गई । निर्देशक फ़िल्म-रूपी वाहन के लिए चालक की भांति होता है । यदि चालक ही गंतव्य अथवा उस तक पहुँचाने वाले मार्ग के संदर्भ में भ्रमित हो तो वाहन अपने अभीष्ट तक कैसे पहुँचे ? जब निर्देशक अपना कार्य भलीभांति करता है तो फ़िल्म के संपादक का कार्य स्वतः ही सरल हो जाता है । इसके विपरीत निर्देशक का भ्रम और फिल्मांकन की गड़बड़ियां बेचारे संपादक के लिए सरदर्द पैदा कर देती हैं क्योंकि फ़िल्माई गई सामग्री को कथानक के अनुक्रम में सही-सही बैठाकर फ़िल्म को अंतिम रूप उसी को देना होता है । 

अत्यंत सम्मानित फ़िल्मकार स्वर्गीय यश चोपड़ा जोशीला’ (१९७३) तथा परम्परा’ (१९९३) को अपने द्वारा निर्देशित बुरी फ़िल्में मानते थे लेकिन मेरी नज़र में उनके द्वारा निर्देशित सबसे ख़राब फ़िल्म उन्हीं के बैनर तले बनी विजय’ (१९८८) थी क्योंकि वे उस फ़िल्म के दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत होने वाले रूप की ठीक से कल्पना नहीं कर पाए थे (ठीक से विज़ुअलाइज़ नहीं कर सके थे) । इसीलिए फ़िल्म की कथा ऊबड़-खाबड़ ढंग से परदे पर आई और चोटी के कलाकारों के होने के बावजूद जनता को प्रभावित नहीं कर सकी । उन्हीं के जैसे निष्णात निर्देशक राज खोसला ने भी प्रेम कहानी’ (१९७५) जैसी बनावटी पात्रों वाली और अपनी कहानी के परिवेश के साथ बिल्कुल भी न्याय न करने वाली असफल फ़िल्म बनाई थी । हाल ही में मैंने कशमकश’ (१९७३) नामक एक पुरानी फ़िल्म इंटरनेट पर देखी जो हत्या के रहस्य की एक अत्यंत रोचक सस्पेंस कथा होने पर भी बुरे निर्देशन की वजह से बेअसर हो गई । 

कभी-कभी जब फ़िल्म का निर्माता कोई और हो और निर्देशक कोई और तो निर्देशक के काम में निर्माता का अनावश्यक हस्तक्षेप भी अच्छी-भली फ़िल्म का सत्यानाश कर देता है । मधुर भंडारकर जैसे कुशल निर्देशक द्वारा दिग्दर्शित आन – मेन एट वर्क’ (२००४) सम्भवतः निर्माता फ़िरोज़ नडियाडवाला के अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण ही एक साधारण पुलिस बनाम अपराधी फ़िल्म बनकर रह गई थी । 

कभी-कभी कोई फ़िल्मकार अच्छा लेखक होता है लेकिन अच्छा निर्देशक नहीं । स्वर्गीय ख़्वाजा अहमद अब्बास के साथ यही बात थी वे एक महान साहित्यकार थे और इसीलिए उन्होंने अपनी ही रचित कहानियों पर फ़िल्में बनाईं और उन फ़िल्मों में कथाओं की आत्मा को ज्यों-का-त्यों रखा । लेकिन वे कुशल निर्देशक नहीं थे, इसीलिए उनकी बनाई फ़िल्मों में मनोरंजन के उस तत्व का अभाव होता था जो किसी भी फ़िल्म को दर्शकों के लिए स्वीकार्य बनाता है । मैंने उनकी बनाई हुई फ़िल्म 'बंबई रात की बाहों में' (१९६८) देखी जिसके लेखक-निर्माता-निर्देशक सब अब्बास साहब ही थे । कहानी अत्यंत प्रेरणास्पद थी लेकिन फ़िल्म ऊबाऊ और प्रभावहीन बनकर रह गई  

मैं कोई फ़िल्मकार नहीं यद्यपि बरसों पहले स्वर्गीय गुलशन नंदा द्वारा लिखित उपन्यास शगुनपढ़ने के बाद यूँ ही (ख़याली पुलाव पकाते हुए) मैंने उस पर फ़िल्म बनाने की रूपरेखा बनाई थी और विभिन्न पात्रों के लिए उचित कलाकारों के नाम भी तय किए थे । अब भी मुझे लगता है कि वकील बाबू’ (१९८२) और रक्त’ (२००४) जैसी फ़िल्में अगर मैंने निर्देशित की होतीं तो वे बेहतर बनी होतीं क्योंकि मेरी नज़र में वे अच्छी कहानियों के बावजूद निर्देशन की कमियों की वजह से ही अपना असर खो बैठीं और टिकट खिड़की पर औंधे मुँह गिरीं जबकि उनके निर्देशक भी असित सेन और महेश मांजरेकर जैसे अनुभवी और सम्मानित फ़िल्मकार थे । 

बहरहाल मैं यही कहना चाहता हूँ कि फ़िल्म की थीम के साथ न्याय करने का काम पटकथा (स्क्रीनप्ले) लिखने वाले का है और उस पटकथा के साथ न्याय करने का काम निर्देशक का । जब ये दोनों काम एक ही व्यक्ति (या व्यक्तियों) द्वारा किए जाएं तो अलग बात है अन्यथा दोनों की दृष्टि (विज़न), फ़िल्म संबंधी परिकल्पना तथा सोच में समन्वय होना चाहिए । तभी फ़िल्म के रोचक एवम् प्रभावी बन पाने की सम्भावना रहेगी । यदि दोनों ही अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग बजाएंगे तो फ़िल्म चूं-चूं का मुरब्बा ही बनेगी । प्रत्येक व्यक्ति स्वर्गीय किशोर कुमार जैसी बहुमुखी प्रतिभा का धनी नहीं होता कि बहुत-से काम अकेला ही कर ले । इसलिए ऐसे महत्वपूर्ण काम करने वालों में समन्वय की महती आवश्यकता होती है । और सौ बातों की एक बात यह कि लेखक तथा निर्देशक दोनों को ही दर्शक-समुदाय की नब्ज़ पहचानना आना चाहिए ताकि वे फ़िल्म देखने वालों के दिलों को छू लेने वाली बातें फ़िल्म में डाल सकें । कालजयी कृति वही होती है जो दिलों को छू जाए, देखने-सुनने वालों को भुलाए न भूले ।   

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सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

सिनेमा : मनोरंजन का साधन, एक बहुत बड़ा उद्योग

सिनेमा देखने का शौक़ लगभग सभी को होता है  । हर वर्ग और समुदाय के लोग सिनेमा देखते हैं। यूँ तो समूचे विश्व में यह लोकप्रिय है लेकिन हमारे देश में तो यह विशेष रूप से प्रचलित इसलिए भी है कि एक ओर तो यह कई दशक तक मनोरंजन का सबसे सस्ता साधन रहा है, दूसरी ओर कथाओं के प्रति लगाव हमारे यहाँ पुरातन काल से चला आ रहा है । अतः स्वाभाविक ही था कि जब पुस्तकों में वर्णित कथाएं चलती-फिरती तसवीरों के रूप में पर्दे पर आईं तो भारतीय जनता ने उन्हें हाथोंहाथ लिया । आज हमारे यहाँ सिनेमा ही नहीं, सिनेमा का संगीत तथा उसके कलाकार भी इस स्थिति में हैं कि उनकी लोकप्रियता को कोई भी चुनौती नहीं दे सकता है ।  

हज़ारों लोगों को रोज़गार देने वाला उद्योग होने के बावजूद यह भारतीय सिनेमा का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इसे औपचारिक रूप से उद्योग का दर्जा मिलने में दशकों लग गए । यह एक परियोजना आधारित उद्योग है क्योंकि प्रत्येक चलचित्र (फ़िल्म) अपने आप में एक पृथक परियोजना (प्रोजेक्ट) होता है । फ़िल्म-निर्माण में योगदान दे रहे सभी व्यक्ति प्रायः कई परियोजनाओं (फ़िल्मों) पर एक साथ काम कर रहे होते हैं । फ़िल्म का निर्माता ही उसके नफ़े-नुकसान का भागी होता है । अन्य सभी लोग अपना-अपना पारिश्रमिक लेकर अलग हो जाते हैं ।  

फ़िल्म-निर्माण की प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में बांटकर समझा जा सकता है :  

. कथानक एवं फ़िल्मांकन :

चूंकि हमारे यहाँ ढाई-तीन घंटे लंबी फ़िल्में बनती हैं जिन्हें फ़ीचर फिल्में कहा जाता है, इसलिए उनकी रूपरेखा एक कथानक पर आधारित होती है जिसका एक प्रारम्भ, विकास तथा चरम (क्लाइमेक्स) होता है । कथानक का आधार कोई पुस्तक भी हो सकती है और कोई संक्षिप्त विचार (आइडिया) भी । लेकिन पूरी लंबाई की फ़िल्म बनाने के लिए मूल विचार का विस्तार अथवा पुस्तक की कहानी का यथेष्ट अनुकूलन (एडेप्टेशन) आवश्यक होता है। इस उद्देश्य से कहानी का दृश्यों में बांटकर पुनर्लेखन किया जाता है । ऐसी कहानी को तकनीकी शब्दावली में पटकथा (स्क्रीनप्ले) कहते हैं । पटकथा के विभिन्न दृश्यों को भी फ़िल्मांकन हेतु बहुत-से भागों (शॉट्स) में विभाजित कर दिया जाता है तथा प्रत्येक दृश्य तथा प्रत्येक शॉट को एक विशिष्ट क्रम संख्या दी जाती है ।  

फ़िल्मांकन को बोलचाल की भाषा में शूटिंग कहते हैं जिसमें फ़िल्म का कला-निर्देशक (आर्ट डायरेक्टर), अभिनय करने वाले कलाकार, छायाकार (कैमरामैन अथवा सिनेमेटोग्राफ़र) तथा इन सबके ऊपर फ़िल्म का मुख्य निर्देशक सम्मिलित होते हैं ।  

फ़िल्म का निर्देशक उसके निर्माण-दल (यूनिट) का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग होता है जो पर्दे पर प्रस्तुत होने जा रही फ़िल्म के प्रत्येक भाग तथा पहलू की अग्रिम कल्पना (विज़ुअलाइज़) कर लेता है तथा अपनी इस कल्पना के आधार पर ही फ़िल्म के एक-एक दृश्य को मूर्तरूप देता है । फ़िल्म की रचना से जुड़ी हर बात में उसका प्रत्यक्ष या परोक्ष हस्तक्षेप होता है । पटकथा के आधार पर कलाकार कथानक के पात्रों का अभिनय करते हैं जिसका छायांकन फ़िल्म का छायाकार अपने मूवी-कैमरे से निर्देशक के आदेशों के अनुरूप करता है । प्रायः दृश्य की पृष्ठभूमि के अनुरूप स्टूडियो में सैट लगाकर शूटिंग की जाती है । यह कार्य फ़िल्म के कला-निर्देशक द्वारा किया जाता है । भारत में फ़िल्म-निर्माण के दो प्रमुख केंद्र मुंबई तथा चेन्नई हैं जहाँ अनेक स्टूडियो बने हुए हैं । कई बार फ़िल्म के बहुत-से भाग की शूटिंग बाहरी स्थलों (आउटडोर लोकेशन्स) पर भी होती है ।    

शूटिंग हर शॉट की अलग की जाती है तथा वह किस शॉट की है, इसका ध्यान रखने के लिए दृश्य संख्या तथा शॉट संख्या को एक पट्टी पर लिखकर पहले उसे शूट किया जाता है जिसे तकनीकी शब्दावली में क्लैप देना कहते हैं । जब तक निर्देशक कलाकारों के हाव-भावों तथा दृश्य के फ़िल्मांकन से संतुष्ट नहीं हो जाता, उसे बार-बार शूट किया जाता है । अपनी तसल्ली के लिए निर्देशक शूट किए गए हिस्सों को बाद में मॉनीटर पर देखता है । इन हिस्सों को तकनीकी शब्दावली में रशेज़ कहते हैं । कितने दृश्यों की शूटिंग हो चुकी है तथा कितनों की बाकी है, इसका हिसाब रखने के लिए पटकथा को चिह्नित (मार्क) करके एक चार्ट बनाकर रखा जाता है जिसे कंटीन्यूटी चार्ट कहते हैं । 

शूटिंग कार्य में ड्रैस डिज़ाइनर का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है जो कथानक की आवश्यकतानुसार पात्रों की पोशाकें तैयार करता है । कलाकारों के चेहरों पर चमक उभारने के लिए तथा उन्हें स्वाभाविक से अधिक सुंदर दिखाने के लिए या कई बार पात्र की आवश्यकता के अनुरूप शूटिंग से पूर्व उनका मेकअप अनिवार्य रूप से किया जाता है । 

यदि दृश्य में पात्रों से नृत्य करवाया जाता है तो नृत्य-निर्देशक (कोरियोग्राफ़र) की सेवाएं ली जाती हैं जो इस क्षेत्र का विशेषज्ञ होता है । एक्शन दृश्यों के लिए एक दूसरे विशेषज्ञ की सेवाएं ली जाती हैं जिसे एक्शन डायरेक्टर कहते हैं । यदि एक्शन दृश्यों में जान का जोखिम हो तो मुख्य कलाकारों के स्थान पर उनसे मिलती-जुलती शक्ल वाले कलाकारों (डुप्लीकेट्स) से वे दृश्य करवाए जाते हैं । मारधाड़ के दृश्यों के फ़िल्मांकन हेतु कई कैमरे एक साथ लगाकर दृश्यों को विभिन्न कोणों से शूट किया जाता है जिनमें से बाद में छांटकर उत्तम भाग फ़िल्म में सम्मिलित करने हेतु रख लिए जाते हैं तथा बाकी सम्पादन में बाहर निकाल दिए जाते हैं । 

कलाकार की  दोहरी भूमिका वाले दृश्यों तथा इसी प्रकार के अन्य विशेष प्रभाव वाले दृश्यों में विशेष तकनीकों का प्रयोग किया जाता है । फिल्म-निर्माण की प्रक्रिया में कंप्यूटर के आगमन के बाद कंप्यूटर-ग्राफ़िक्स की सहायता से विविध प्रकार के दृश्यों का संयोजन अत्यंत सुगम हो गया है जिनमें शूटिंग हेतु वास्तविक वस्तुओं तथा प्राणियों की भी आवश्यकता नहीं पड़ती । 

बहुत-से ऐसे कलाकारों की भी सेवाएं ली जाती हैं जिनकी भूमिका महत्वहीन होती है यथा जो केवल भीड़ अथवा समूह के रूप में प्रयुक्त होते हैं । ऐसे कलाकार पहले एक्स्ट्रा कहलाते थे किन्तु अब कनिष्ठ कलाकार (जूनियर आर्टिस्ट) कहलाते हैं । ये संबन्धित एजेंसियों के द्वारा निर्माता को भेजे जाते हैं जो भुगतान भी उनकी आपूर्ति करने वाली एजेंसी को ही करता है । 

शूटिंग के लिए विभिन्न कलाकारों की समान तारीखें (डेट्स) बुक करके शूटिंग का कार्यक्रम (शूटिंग-शेड्यूल) बनाया जाता है जिसमें पूरी फ़िल्म या उसके एक भाग को पूरा करने का लक्ष्य रखा जाता है । यदि शूटिंग मुंबई या चेन्नई में स्टूडियो में होती है तो यह सामान्यतः शिफ़्ट प्रणाली से होती है जिसमें नौ घंटे की एक शिफ़्ट होती है । लेकिन यदि शूटिंग आउटडोर लोकेशन पर होती है तो निर्धारित शेड्यूल में उसे पूरा करने के लिए बिना समय की परवाह किए रात-दिन भी काम किया जाता है ।   

. गीत-संगीत :

दृश्यों में समुचित प्रभाव उत्पन्न करने के लिए पृष्ठभूमि के संगीत (बैकग्राउण्ड म्यूज़िक) का प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है । हमारे देश में संगीत के प्रति जनता के लगाव के कारण प्रायः फ़िल्मों में संगीतबद्ध गीत भी रखे जाते हैं । संगीत फ़िल्म के मूड तथा निर्देशक की सोच के अनुसार रखा जाता है । यह कार्य विशेषज्ञ संगीत-निर्देशक करते हैं जो धुन तैयार करके (कम्पोज़ करके) गीतकार से दृश्य की स्थिति (सिचुएशन) के अनुरूप गीत लिखवाते हैं तथा अपने सहायक संगीतकार (जिसे अरेंजर कहा जाता है) से वाद्य-यंत्रों का संयोजन करवाते हैं । जब गीत अपनी संपूर्णता के साथ तैयार हो जाते हैं तो विशेषज्ञ पार्श्व गायकों तथा गायिकाओं से उन्हें गवाकर रिकॉर्डिंग कर ली जाती है तथा शूटिंग के समय अभिनय कर रहे कलाकार गीतों के स्वरों के अनुकूल अपने होठ हिला देते हैं ।   

. तकनीकी पक्ष एवं अंतिम चरण के कार्य :

शूटिंग का मुख्य कार्य एक बार पूर्ण हो जाने के बाद फ़िल्म को उसके अंतिम रूप में लाने के लिए जो आवश्यक कदम उठाए जाते हैं उन्हें फ़िल्म का पोस्ट-प्रॉडक्शन कार्य कहते हैं । इनमें प्रमुख होते हैं – डबिंग एवं री-रिकॉर्डिंग तथा सम्पादन (एडीटिंग)। 

डबिंग में एक ध्वनिरोधक (साउंडप्रूफ़) कक्ष में कलाकारों के संवाद पुनः बुलवाकर उन्हें फ़िल्म में यथास्थान लगाया जाता है । ऐसा इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि शूटिंग के समय कई अनावश्यक स्वर यथा पंखों तथा जनरेटर की ध्वनियां, शूटिंग देख रहे दर्शकों का शोर आदि उपस्थित होते हैं जिन्हें फ़िल्म में नहीं होना चाहिए । इसके अतिरिक्त कई बार फ़िल्म के मुख्य पात्र की भूमिका निभा रहे कलाकार को संबन्धित भाषा का सम्यक ज्ञान न होने के कारण भी निर्माता यह ठीक समझता है कि उसके संवाद किसी और व्यक्ति की आवाज़ में डब करवा लिए जाएं ताकि उच्चारण दोष फ़िल्म के प्रभाव को कम न कर दे । तत्पश्चात सम्पूर्ण संवादों एवं संगीत की फ़िल्म के दृश्यों के साथ तालमेल बैठाकर री-रिकॉर्डिंग की जाती है । पिछले कुछ समय से फ़िल्में सिंक-साउंड में बनाई जाने लगी हैं जिसमें शूटिंग के समय अवांछित बाहरी ध्वनियां फ़िल्म में सम्मिलित नहीं होने पातीं, इसलिए बाद में डबिंग की आवश्यकता भी नहीं पड़ती ।   

एडीटिंग अथवा सम्पादन फ़िल्म-निर्माण का सबसे अंतिम किन्तु संभवतः सबसे महत्वपूर्ण कार्य है । संपादक फ़िल्म के विभिन्न दृश्यों को पटकथा के अनुसार सिलसिलेवार लगाकर क्लैप के दृश्यों को (जिनमें आने वाले दृश्य तथा शॉट की क्रम संख्या दर्ज़ होती है) हटा देता है । यदि कहीं कहानी के प्रवाह में बाधा या किसी दृश्य की कमी अनुभव होती है (जिसे तकनीकी भाषा में कंटीन्यूटी गैप या कंटीन्यूटी जर्क कहते हैं) तो उसे दूर करने हेतु आवश्यक दृश्य फ़िल्माकर फ़िल्म में सम्मिलित किए जाते हैं । यह अतिरिक्त फ़िल्मांकन का कार्य तथा ऐसे ही अन्य फुटकर कार्य सामूहिक रूप से फ़िल्म का पैचवर्क कहलाते हैं । निर्देशक एवं संपादक मिलकर कथानक के प्रस्तुतीकरण का ढंग निर्धारित करते हैं । वे ही तय करते हैं कि कहानी को सीधे रूप में दिखाया जाए या अतीतावलोकन (फ़्लैश बैक) के द्वारा प्रस्तुत किया जाए । फ़िल्म का मध्यांतर (इंटरवल) कहानी के किस बिन्दु पर किया जाए, यह निर्णय भी उन्हीं का होता है । तदोपरांत निर्देशक की सलाह से ही संपादक यह तय करता है कि फ़िल्म की लंबाई कितनी रखी जाए । शूट की गई फ़िल्म की लंबाई सामान्यतः फ़िल्म के अंतिम रूप की लंबाई से बहुत अधिक होती है । अतः जिन दृश्यों के साथ जितनी लंबाई की फ़िल्म रखनी है, उतनी रखकर बाकी हिस्सा संपादक की कैंची से काटकर निकाल दिया जाता है । यही फ़िल्म का अंतिम रूप होता है जिसे डेवलप करके निगेटिव बनाया जाता है और फिर उससे प्रदर्शन हेतु प्रिंट बनाए जाते हैं । इसीलिए कहा जाता है कि वास्तविक फ़िल्म तो संपादक की मेज़ पर ही बनती है । सम्पादन-कार्य को भलीभाँति जान लेने वाले व्यक्ति को फ़िल्म-निर्माण की विभिन्न बारीकियों का ज्ञान स्वाभाविक रूप से हो जाता है । यही कारण है कि अनेक संपादक आगे चलकर फ़िल्म-निर्देशक बनते हैं । 

एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य फ़िल्म की नामावली (टाइटल्स) तैयार करके उसे फ़िल्म में सम्मिलित करना होता है । विभिन्न संगठनों के दबाव के कारण अब फ़िल्म की निर्माण-प्रक्रिया से छोटे-से-छोटे रूप में जुड़े व्यक्तियों तक का नाम देकर उन्हें श्रेय (क्रेडिट) देना आवश्यक हो गया है । कुछ अपवादस्वरूप निर्माताओं को छोड़कर प्रायः सभी निर्माता फ़िल्म की नामावली अंगरेज़ी में ही देते हैं । यह कार्य भी इस क्षेत्र के विशेषज्ञों से ही करवाया जाता है । निर्देशक का नाम सबसे अंत में देकर फ़िल्म-निर्माण की प्रक्रिया में उसकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया जाता है । कुछ वर्षों पूर्व तक सम्पूर्ण नामावली फ़िल्म के आरंभ में ही दे दी जाती थी किन्तु अब आरंभ में फ़िल्म में धन लगाने वाले साझेदारों एवं अन्य प्रायोजकों के नाम देने में बहुत समय लग जाने के कारण फ़िल्म के मुख्य कलाकारों एवं अन्य प्रमुख योगदान करने वालों (संगीतकार, निर्देशक आदि) के नाम ही आरंभ में दिए जाते हैं जबकि यूनिट के अन्य सभी सदस्यों के नाम फ़िल्म के अंत में एक लंबी सूची के रूप में दिखाए जाते हैं ।  

फ़िल्म का शीर्षक प्रायः निर्माता फ़िल्म-निर्माण से पहले ही निर्धारित संस्था से पंजीकृत करवा लेता है ताकि उसे कोई अन्य निर्माता अपनी फ़िल्म के लिए प्रयुक्त न कर सके । फ़िल्म के प्रदर्शन के कुछ वर्षों बाद तक दोबारा उस शीर्षक की फ़िल्म नहीं बन सकती तथा बाद में भी निर्माता उस शीर्षक को समय-समय पर नवीनीकृत करवा कर उसे किसी और को काम में लेने देने या न लेने देने का अधिकार अपने पास रख सकता है । 

अंततोगत्वा फ़िल्म को प्रयोगशाला में डेवलप करके निगेटिव बनाया जाता है जिसके कि वितरण की आवश्यकतानुसार प्रिंट तैयार किए जाते हैं । लेकिन यह कार्य करने से पहले निर्माता को सभी संबन्धित कलाकारों एवं तकनीशियनों को उनके पारिश्रमिक का पूर्ण भुगतान कर देना आवश्यक होता है जिसके बाद प्रत्येक संबन्धित व्यक्ति उसे एक पत्र देता है जो उसके पारिश्रमिक की कोई राशि बकाया न होने का प्रमाण होता है । इस पत्र को लैब लेटर कहते हैं । ऐसे सभी व्यक्तियों से लैब लेटर मिल जाने के बाद ही फ़िल्म प्रयोगशाला में डेवलप हो पाती है तथा निगेटिव एवं प्रिंट बन पाते हैं । 

. सेंसर प्रमाण-पत्र :

फ़िल्म का पहला प्रिंट भारत के केंद्रीय फ़िल्म सेन्सर बोर्ड को दिखाकर फ़िल्म के प्रदर्शन योग्य होने का प्रमाण-पत्र लिया जाता है । सेंसर बोर्ड निर्धारित मानकों के अनुरूप फ़िल्म का मूल्यांकन करके उसे सभी के देखने योग्य (यू) अथवा केवल वयस्कों के देखने योग्य (ए) अथवा अवयस्कों हेतु केवल अभिभावकों के साथ देखने योग्य (यू / ए) प्रमाण-पत्र देता है । आवश्यकता होने पर सेंसर बोर्ड फ़िल्म के कुछ हिस्सों को काटने का आदेश भी दे सकता है अथवा सम्पूर्ण फ़िल्म को ही प्रदर्शन के अयोग्य मानकर प्रमाण-पत्र देने से मना कर सकता है । सेंसर बोर्ड के निर्णय से असंतुष्ट होने पर निर्माता के पास संशोधन समिति (रिवाइज़िंग कमिटी) के पास जाने एवं सेंसर बोर्ड के निर्णय के विरुद्ध न्यायालय में अपील करने का विकल्प होता है । 

. विपणन एवं वित्त-प्रबंधन :

फ़िल्म एक उत्पाद (प्रॉडक्ट) होता है जो पूर्ण होने के बाद प्रदर्शन द्वारा आय अर्जित करने हेतु निर्माता को उपलब्ध होता है । निर्माता के लिए फ़िल्म के माध्यम से आय-अर्जन निम्नलिखित तरीकों से हो सकता है : 

1. फ़िल्म के सिनेमाघरों में प्रदर्शन संबंधी अधिकारों का विक्रय

2. फ़िल्म के वीडियो पर प्रदर्शन संबंधी अधिकारों का विक्रय

3. फ़िल्म के टेलीविज़न पर प्रदर्शन संबंधी अधिकारों का विक्रय

4. फ़िल्म के संगीत अधिकारों का विक्रय  

इनमें सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म के सिनेमाघरों में प्रदर्शन संबंधी अधिकारों का विक्रय है जिससे कि निर्माता को मुख्यतः आय होती है । वह अपने उत्पाद यानी अपनी फ़िल्म को सिनेमाघरों में प्रदर्शन हेतु वितरकों को बेचता है । इस उद्देश्य से सम्पूर्ण भारत को अनेक वितरण-क्षेत्रों (डिस्ट्रीब्यूशन टेरीटरीज़) में बांटा हुआ है तथा विक्रय की दर प्रति वितरण-क्षेत्र तय होती है । प्रायः वितरकों का प्रभाव-क्षेत्र कुछ वितरण-क्षेत्रों तक ही सीमित होता है तथा वे उन्हीं के वितरण अधिकार ख़रीदते हैं । आजकल भारत के अलावा विदेशों में भी भारतीय फिल्में प्रदर्शित होती हैं । विदेशों में प्रदर्शन हेतु फ़िल्म के  वितरण अधिकारों को ओवरसीज़ राइट्स कहा जाता है । वितरण अधिकार ख़रीदने के बाद वितरकों के द्वारा फ़िल्म के प्रिंट प्रदर्शकों (एक्ज़ीबिटर्स) तक पहुँचते हैं जो सिनेमाघरों के मालिक होते हैं तथा फ़िल्मों को अपने सिनेमाघरों में प्रदर्शित करते हैं । इस प्रदर्शन को थियेटर रिलीज़ कहते हैं । यह सारे भारत में एक ही दिन होता है जो परंपरानुसार शुक्रवार का दिन होता है । 

वितरकों तथा निर्माता के बीच निर्धारित प्रति क्षेत्र वितरण-मूल्य निर्माता की प्रतिष्ठा (जो कि उसके द्वारा पूर्व में निर्मित फ़िल्मों की सफलता पर निर्भर करती है) के आधार पर तय होता है । यदि निर्माता फ़िल्म की सफलता के संबंध में वितरकों को आश्वस्त करके अपने द्वारा वांछित मूल्य पर फ़िल्म के प्रदर्शन के अधिकार बेच देने में सफल हो जाता है तो उसके लिए प्रदर्शन से पूर्व ही फ़िल्म लाभ का सौदा सिद्ध हो जाती है तथा फ़िल्म के न चलने का जोखिम पूरी तरह वितरक पर आ जाता है । इसे निर्माता के दृष्टिकोण से मेज़ पर मुनाफ़ा (प्रॉफ़िट ऑन टेबल) कहते हैं । इसके विपरीत यदि फ़िल्म की सफलता के प्रति वितरक आश्वस्त नहीं है तो वह निर्माता को कोई तय रकम देकर वितरण अधिकार ख़रीदने के स्थान पर उसके साथ ऐसा अनुबंध कर सकता है कि वह एक निर्धारित समय सीमा में फ़िल्म के टिकट बेचकर हुई आमदनी (मनोरंजन कर घटाकर जो निर्धारित दर से संबंधित राज्य की सरकार को देना पड़ता है) का एक निश्चित भाग निर्माता को देगा । इससे जोखिम निर्माता एवं वितरक दोनों में बंट जाता है । इसके विपरीत दीर्घकाल से प्रतिष्ठित निर्माता जिनकी पूर्व में निर्मित फ़िल्में सफलता के झंडे गाड़ चुकी हों, न केवल अपनी मुँहमाँगी दर पर वितरण अधिकार बेचते हैं बल्कि फ़िल्म के बनने से पूर्व ही वितरकों से अग्रिम-राशि तक वसूल कर लेते हैं जिसका कि उपयोग वे फ़िल्म बनाने में करते हैं । अगर निर्माता नया है तथा वितरक फ़िल्म के मौजूदा स्वरूप से उसकी सफलता के प्रति आश्वस्त नहीं हो पाते हैं तो उनके दबाव में निर्माता को फ़िल्म में कतिपय परिवर्तन करने पड़ सकते हैं । ऐसे में फ़िल्म में जोड़े जाने वाले दृश्यों (दर्शकों को लुभाने वाले नृत्य-गीत आदि) की शूटिंग की व्यवस्था उसे करनी पड़ती है । 

फ़िल्म के प्रदर्शन से पूर्व एवं प्रायः उसके बनते-बनते ही उसका समुचित प्रचार शुरू हो जाता है । पहले यह प्रचार पोस्टरों, होर्डिंग्स, पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञापन तथा फ़िल्म के प्रमुख दृश्यों को लेकर बनाए गए ट्रेलरों से ही किया जाता था लेकिन टेलीविज़न चैनलों का युग आ जाने के बाद इन माध्यमों के साथ-साथ टेलीविज़न पर फ़िल्म के दृश्यों एवं गीतों को कुछ सैकंडों के विज्ञापनों में दिखाए जाने का सर्वाधिक प्रभावशाली एवं लोकप्रिय साधन विकसित हो गया है । ये चंद सैकंडों के विज्ञापन प्रोमो कहलाते हैं । टेलीविज़न चैनलों पर इन प्रोमोज़ को दिखने के विशिष्ट कार्यक्रम होते हैं जिनमें दर्शक घर बैठे-बैठे आने वाली या चल रही अनेक फ़िल्मों के विज्ञापन एक साथ देख लेता है । 

फ़िल्म बनाने हेतु वित्त की व्यवस्था पहले इस धंधे में लगे साहूकारों (फ़ाइनेंसर्स) के माध्यम से की जाती थी । अपराध-जगत (अंडरवर्ल्ड) के धन से बनने का आरोप भी कतिपय फ़िल्मों पर लग जाया करता था । पर अब फ़िल्म-निर्माण को उद्योग का दर्ज़ा मिल जाने के बाद निर्माता को न केवल विभिन्न साझेदारों एवं प्रायोजकों का वित्तीय सहयोग मिल जाता है बल्कि उसके समक्ष बैंक आदि संस्थाओं से ऋण लेने तथा अपनी फ़िल्म निर्माण संस्था को पब्लिक लिमिटेड कंपनी में परिणत करके आम जनता से धन एकत्र करने  के विकल्प भी खुल गए हैं । 

मुख्य कलाकारों, निर्देशक, संगीतकार आदि को अनुबंधित करते समय उन्हें निर्धारित पारिश्रमिक का एक भाग अग्रिम दे दिया जाता है जिसे बोलचाल की भाषा में साइनिंग एमाउंट कहा जाता है । बाकी रकम निर्माता धीरे-धीरे फ़िल्म-निर्माण की प्रक्रिया चलने के साथ-साथ उन्हें देता जाता है । छोटे कलाकारों, तकनीशियनों, सहायकों आदि को तो, यदि वे निर्माता के वेतनभोगी कर्मचारी नहीं हैं, काम के साथ-साथ तुरंत ही (प्रायः शिफ़्ट ख़त्म होते ही या आउटडोर लोकेशन पर शूटिंग शेड्यूल पूरा होने से पहले) भुगतान करना पड़ता है । सभी प्रमुख व्यक्तियों से निर्माता को लैब लेटर लेना पड़ता है जो वे अपनी सारी बकाया राशि मिल जाने पर देते हैं जिसके बाद ही फ़िल्म का निगेटिव प्रयोगशाला में बन पता है । छोटे कर्मचारियों, कनिष्ठ कलाकारों, तकनीशियनों, डुप्लिकेट्स आदि को पूरा पारिश्रमिक, दुर्घटना होने पर क्षतिपूर्ति, सेवानिवृत्त होने पर एकमुश्त धनराशि आदि दिलवाने हेतु आजकल कई संगठन सक्रिय हैं । अतः भारतीय सिनेमा के प्रारम्भिक वर्षों की भांति भारी पैमाने पर श्रम-शोषण अब सहज नहीं है । 

अंततोगत्वा पूर्ण निर्मित फ़िल्म वितरकों के माध्यम से प्रदर्शकों द्वारा सिनेमाघरों (थियेटरों) में प्रदर्शित होती है । विभिन्न शहरों में उसके व्यवसाय (कलैक्शन) के आँकड़े पत्र-पत्रिकाओं में दिए जाते हैं तथा दर्शकों के रुख़ को भांपने का प्रयास किया जाता है । फ़िल्म सफल (हिट) है या असफल (फ़्लॉप), इसका सटीक और अंतिम निर्णय केवल जनता जनार्दन करती है ।  

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