भारत में सत्ता चुनाव के माध्यम से प्राप्त होती है। चुनाव में मतदाता विभिन्न प्रत्याशियों अथवा दलों के लिए मतदान करते हैं। जिसे डाले गए मतों का बहुमत प्राप्त हो जाए, वह विजयी हो जाता है। अतः सत्ता के लिये चुनाव लड़ने वाले दलों हेतु वे महत्वपूर्ण होते हैं जो मत डालते हैं तथा जिनके मतों की संख्या इतनी होती है कि वह चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सके। जिस समूह के मतदाता इतनी संख्या में होते हैं कि वह चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सके, वह सत्ता पर दबाव डालकर अपनी बात मनवा सकता है। उसे प्रसन्न रखने के लिये सत्ताधारी भी अपनी ओर से पूरा-पूरा प्रयास करते हैं। उसके मनोनुकूल नीतियां बनाते हैं तथा निर्णय लेते हैं (कभी-कभी उसकी नाराज़गी के कारण लिये गए निर्णयों को वापस भी ले लेते हैं)। तो ऐसे में लोकतंत्र उन्हीं के लिए हुआ जिनके मत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सत्ता प्राप्ति के लिए उन्हीं के मतों का बहुमत काम आता है। इस व्यवस्था का एक अन्य महत्वपूर्ण घटक वे पूंजीपति भी होते हैं जो दलों को चुनाव लड़ने के लिए धन देते हैं। सत्ताधारियों द्वारा नीतियां एवं निर्णय उनके हिसाब से भी लिए जाते हैं।
लेकिन उनका क्या जिनके पास या तो मताधिकार ही नहीं है या उनके मत इतने नहीं हैं कि किसी चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सकें ? उनकी आवश्यकताओं और कष्टों का क्या ? उनका स्वर सत्ता के कानों तक कैसे पहुँचेगा तथा उसे उनके हितों के वास्ते काम करने के लिए कैसे प्रेरित किया जा सकेगा ? इसका एक उदाहरण एंग्लो-इंडियन समुदाय है जिसे संसद में प्रतिनिधित्व प्रदान करने हेतु हमारे संविधान-निर्माताओं ने उसके लिए लोक सभा में दो सदस्यों के मनोनयन का प्रावधान किया था जिसे सरकार ने कुछ वर्ष पूर्व समाप्त कर दिया क्योंकि उनके मत किसी भी चुनाव के परिणाम को प्रभावित नहीं करते (जबकि इस प्रावधान का मूल कारण ही यही था)। समुदाय के लोगों ने विरोध किया पर कौन सुनता ?
ऐसे समुदायों में बालक आते हैं क्योंकि मताधिकार वस्तुतः वयस्क मताधिकार है। बालक वोट नहीं डालते। ऐसे में उनके हिताहित की चिंता करने वाला कोई होना चाहिए। उनकी सुरक्षा तथा हितों की परवाह की जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए संगठन होने चाहिए जो सत्ता पर दबाव डालकर उनकी भलाई के निर्णय करवा सकें। इसीलिए बाल अधिकार समूह किसी भी लोकतंत्र में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
जब संसार में लोकतांत्रिक व्यवस्था आरंभ हुई थी तो मताधिकार केवल वयस्क पुरुषों को दिया गया था। महिलाओं को मताधिकार नहीं था। संसार की आधी जनसंख्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात रखने से वंचित थी। महिला समुदाय ने यह अधिकार लंबे संघर्ष के उपरांत प्राप्त किया। आज किसी भी लोकतंत्र में महिलाओं की बात और विचार पुरुषों की भांति ही महत्व रखते हैं। स्वतंत्र भारत में वयस्क मताधिकार में महिलाओं को आरंभ से ही सम्मिलित रखा गया। यह पृथक् बात है कि सदनों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है।
तृतीय लिंग तथा संबंधित वर्गों का समुदाय जिसे समेकित रूप से एलजीबीटीक्यू कहा जाता है, भी एक ऐसा ही समुदाय है जो कि सत्ता ही नहीं, समाज के द्वारा भी उपेक्षित ही रहा। मताधिकार होने के बावजूद इस समुदाय के मतों की संख्या अपर्याप्त होने के कारण इन लोगों की आवाज़ अनसुनी ही रही। अंततः इनके हितों का ख़याल रखने के लिए भी अधिकार समूह बने और धीरे-धीरे ही सही, इनकी बात भी सुनी गई और यह माना गया कि इनके भी बुनियादी अधिकार वही हैं जो सामान्य स्त्री-पुरुषों के।
अब मूक पशु-पक्षियों की बात करें जो न बोल सकते हैं, न मनुष्यों जैसा मस्तिष्क रखते हैं। भारत में पशु अधिकार संगठन एवं पशु-प्रेमी समूह धीरे-धीरे अस्तित्व में आए और उन्होंने इनकी रक्षा के लिए तथा इन्हें यातनाओं से बचाने के लिए आवाज़ उठाई। ऐसा होने पर भी इनकी सुरक्षा एवं देखभाल का लक्ष्य ठीक से प्राप्त नहीं किया जा सका है। सत्ता को तो इनसे कोई सरोकार नहीं (गाय जैसे धार्मिक आस्था से जुड़े पशुओं को छोड़कर)। जो पशु पालतू होते हैं, उनका जीवन तो चल जाता है लेकिन जो पालतू न हों, उन्हें आवारा कहकर उनकी पूर्णतः उपेक्षा करना किसी भी दृष्टि से मानवीय नहीं। वे भी ईश्वरीय व्यवस्था में अपना स्थान रखते हैं एवं उचित पालन के अधिकारी हैं। शाकाहार का महत्व भी मूलतः उसमें प्राणियों की रक्षा का तत्व अंतर्निहित होने के कारण ही है।
ऐसे में न्यायालयों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। जिनकी बात सत्ता न सुने, समाज का बहुमत न सुने; उनकी बात चाहे कहीं से भी उठाई जाए, उसे सुनना और समझना न्यायालयों का कर्तव्य है। जैसा कि मैंने कहा, सत्ताधारी तो उन्हीं वर्गों की बात सुनेंगे जो चुनाव के माध्यम से सत्ता दिलाने में सहायक हों या दूसरे शब्दों में कहें तो वोट बैंक माने जाते हों। लेकिन जो वोट न दें या जिनके वोटों की सत्ता के लिए ज़रूरत न हो, उनके हिताहित का ध्यान रखने का काम भी किसी को तो करना है। यह बात न्यायालयों को समझनी चाहिए। चाहे आवारा पशु हों, पक्षी हों, एलजीबीटीक्यू समुदाय हो, बालक हों या फिर ऐसे समुदाय हों जिनके वोट किसी चुनाव परिणाम को प्रभावित न कर सकते हों; उनके हितों की बात चाहे जो भी संगठन करे, न्यायालयों को मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए न केवल वह बात सुननी चाहिए वरन किसी भी संबंधित मामले में निर्णय देते समय भी उसे ध्यान में रखना चाहिए। आख़िर देश केवल वोट बैंकों एवं पूंजीपतियों का ही तो नहीं। सनद रहे कि हमें अपनी अगली पीढ़ी को सभी प्राणियों के प्रति संवेदनशील बनाना है। इसलिए हमें अपने आचरण से उसे यही संदेश देना है कि हम किसी भी वर्ग या समुदाय के प्रति संवेदनहीन नहीं हैं।
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विचारणीय बिंदुओं के साथ सारगर्भित विचाराभिव्यक्ति प्रस्तुत करता सुन्दर आलेख । नमस्कार जितेन्द्र जी !
जवाब देंहटाएंहृदयतल से आपका आभार माननीया मीना जी
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 20 जुलाई 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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बहुत-बहुत आभार आपका रवीन्द्र जी
हटाएंसार्थक आलेख
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार आदरणीय सुशील जी
हटाएंसार्थक अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार आदरणीय हरीश जी
हटाएंसही कहा है आपने, सरकार को हर समूह के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, सभी इस देश के नागरिक हैं और सभी का यहाँ समान अधिकार है
जवाब देंहटाएंमैं सहमत हूँ आपकी बात से अनिता जी। हार्दिक आभार आपका।
हटाएंसुंदर आलेख !
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार माननीया शुभा जी
हटाएंवोट बैंक से परे उपेक्षित वर्गों के अधिकारों पर सार्थक और विचारोत्तेजक विमर्श ।
जवाब देंहटाएंबहुत ही प्रभावशाली एवं लाजवाब आलेख ।
हृदयतल से आपका बहुत-बहुत आभार माननीया सुधा जी
हटाएंबहुत ही चिंतनपरक ,सारगर्भित अभिव्यक्ति !
जवाब देंहटाएंआपके आगमन एवं टिप्पणी हेतु हृदयतल से आपका आभार आदरणीया ज्योत्सना जी
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