बुधवार, 22 सितंबर 2021

ज़ुबां सब समझते हैं जज़्बात की

जीवन एवं संसार में सर्वोत्कृष्ट सौंदर्य दो ही हैं - एक सद्गुणी मनुष्य के मन का सौंदर्य तथा दूसरा प्रकृति का सौंदर्य । और प्रकृति से प्रेम करने वाले, उसके सौंदर्य को अपने मन में उतार लेने वाले का सौंदर्य-बोध निस्सीम हो जाता है। कवियों तथा कवयित्रियों की प्रतिभा के दोहन हेतु तो प्रकृति का सौंदर्य एक अक्षय कोष ही है। चाहे जितनी कविताएं एवं गीत हृदय से फूट पड़ें, अल्प ही रहेंगे। 

हिन्दी फ़िल्मों में प्रकृति के सौंदर्य को लेकर सहस्रों गीत रचे गए हैं। एक प्रकृति-प्रेमी होने के कारण मुझ जैसे फ़िल्मों तथा संगीत में रुचि रखने वाले के लिए ऐसे गीतों पर लिखना स्वाभाविक ही था। मैंने प्रकृति के सौंदर्य से जुड़े गीतों पर, वर्षा से संबंधित गीतों पर तथा रात्रि से संबद्ध गीतों पर (जी हाँ, रात्रि का भी अपना सौंदर्य होता है) अंग्रेज़ी में विस्तृत लेख लिखे हैं। वही कार्य हिंदी में भी करना दोहराव ही लगता है। अतः आज मैं हिंदी फ़िल्मों में प्रकृति के चित्रण की बात करते हुए गीत-संगीत के स्थान पर हिंदी फ़िल्मों में प्रकृति तथा पर्यावरण के संरक्षण पर हुए विमर्श की बात करना चाहूंगा।

इस सुंदर संसार का मूल सौंदर्य प्रकृति के कारण ही हैं क्योंकि मानव का उद्भव तो सृष्टि के विकास-क्रम के अंतिम  चरण के रूप में हुआ। उसके उपरांत जो कुछ भी परिवर्तन संसार में आए, वे मानव के कृत्यों के कारण आए। मानव का पुरुषार्थ तब तक सार्थक था जब तक उसने प्रकृति से अपना तादात्म्य बनाए रखा। प्रकृति को माता मानकर एवं अन्य प्राणियों तथा वनस्पति को भी अपने समान ही उसकी संतान मानकर उनके एवं अपने सह-अस्तित्व के महत्व को समझा। जब तक पर्यावरण संरक्षित था, पारिस्थितिकीय संतुलन अक्षुण्ण था; धरती पर भी समग्र रूप में सुख-शांति से परिपूर्ण जीवन के अनंतकाल तक स्थापित रहने की पूर्ण सम्भावना थी। किंतु जब अपने सीमाहीन स्वार्थ, लोभ-लालच तथा प्रकृति पर विजय पाने की दुराकांक्षा के कारण मानव ने प्रकृति को प्रदूषित करना एवं पारिस्थितिकीय संतुलन को विकृत करना आरंभ किया तो वह विकट समस्या खड़ी हुई जिस पर आज बातें तो बहुत की जाती हैं किंतु उसका समाधान बहुत दूर प्रतीत होता है। 

पर्यावरण के विनाश की इस समस्या का समाधान तथा संबंधित अभीष्ट एक ही है - वन-सम्पदा तथा वन्य-जीवन का संरक्षण एवं यही वह मार्ग भी है जिसके द्वारा मनुष्य प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट कर सकता है, उसके प्रति अपने कर्तव्य का पालन कर सकता है। हिंदी सिनेमा ने प्रकृति तथा पशुपक्षियों को लेकर बहुत-सी फ़िल्में बनाई हैं। स्वर्गीय चिन्नप्पा देवर इस कार्य में अग्रणी थे जिनकी फ़िल्में पशुपक्षियों को कहानी के महत्वपूर्ण पात्रों के रूप में लेकर बनाई जाती थीं एवं जो यह दर्शाया करते थे कि मानवों की भांति अन्य प्राणियों की भी भावनाएं होती हैं एवं उनके प्रति दयालुतापूर्ण व्यवहार किया जाना चाहिए (मैं भी इससे सहमत हूँ)। यह वह समय था जब भारत में (तथाकथित) पशु अधिकार संरक्षक सक्रिय नहीं थे एवं वास्तविक पशुपक्षियों को लेकर फ़िल्मांकन किया जाता था। परंतु वनों तथा वन्य प्राणियों के संरक्षण को ही विषय-वस्तु के रूप मे लेकर भारत में बहुत कम फ़िल्में बनीं हैं। ऐसी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म तो इसी वर्ष प्रदर्शित 'शेरनी' है जो पूर्णतः यथार्थपरक है किंतु भूतकाल में हमारे यहाँ यथार्थपरक फ़िल्मों के स्थान पर मनोरंजन प्रदान करने वाली फ़िल्में ही प्रायः बना करती थीं। 'जानवर और इंसान' (१९७२) तथा 'कर्तव्य' (१९७९) जैसी फ़िल्मों में वन्य-जीवन के संरक्षण के विषय को स्पर्श तो किया गया किंतु उस पर गहन विमर्श नहीं हुआ। मैं इस संदर्भ में केवल दो हिंदी फ़िल्मों की चर्चा करूंगा जो फ़ॉर्मूलाबद्ध सामान्य फ़िल्मों की तरह बनाई गईं लेकिन उनमें इस गंभीर विषय पर गंभीरता से बात भी की गई। ये हैं - 'हबारी' (१९७९) एवं 'सफ़ारी' (१९९९)।


हबारी  (१९७९)
'हबारी' सम्भवतः पहली ऐसी हिन्दी फ़िल्म थी जिसकी मूल विषय-वस्तु (थीम) ही वन्य-जीवन संरक्षण थी। पिक्स इंटरनेशनल द्वारा निर्मित इस अनूठी फ़िल्म में अनवरत अवैध शिकार द्वारा वन्य प्राणियों की प्रजातियों के विलोपन की समस्या को उठाया गया था। फ़िल्म की कथा को भारत में बताया गया था किंतु सम्पूर्ण फ़िल्म की शूटिंग वस्तुतः केन्या (कीनिया) के जंगलों में की गई थी। इसीलिए फ़िल्म का नाम 'हबारी' रखा गया जो कि केन्या की आधिकारिक भाषा 'स्वाहिली' का शब्द है जिसका अर्थ होता है - 'क्या हालचाल हैं' (अभिवादन के रूप में प्रयुक्त)। 

'हबारी' की कहानी पशुपक्षी-प्रेमी नायक (महेन्द्र संधू) एवं वन्य जीवों का अवैध आखेट तथा उनके अंगों की तस्करी करने वाले खलनायकों (डी.के. सप्रू व नरेन्द्र नाथ) के बीच के संघर्ष पर आधारित है। खलनायकों द्वारा मार डाले गए अपने बहन-बहनोई के इकलौते पुत्र अर्थात् अपने भांजे (राजू देसाई) को अपने साथ रख रहे कर्तव्यपरायण नायक को खलनायक की पुत्री (प्रीति सप्रू) से प्रेम भी होता है किन्तु वह अपने कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता है। 

इस दर्शनीय फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ूबी तो इसकी विषय-वस्तु ही है जो न केवल शिकारियों एवं लालची व्यापारियों की क्रूरता को दर्शाती है वरन वन्य जंतुओं के संरक्षण की आवश्यकता पर सार्थक एवं मनोरंजक ढंग से प्रकाश भी डालती है। प्रकृति के अंगों के रूप में वनस्पति तथा जीव-जंतुओं का सौंदर्य सम्पूर्ण फ़िल्म में बिखरा पड़ा है। इस सौंदर्य को रजतपट पर उतारने में छायाकार ने कमाल कर दिखाया है। ऐसा एक-एक दृश्य नयनों को शीतलता  प्रदान करता है। कई दृश्य मन को छू लेते हैं एवं दर्शकों को अन्य प्राणियों से प्रेम करने, उनकी परवाह करने तथा उनकी भावनाओं को समझने की शिक्षा देते हैं। तकनीकी रूप से अच्छी इस फ़िल्म का गीत-संगीत भी प्रभावी एवं कर्णप्रिय है। सभी प्रमुख कलाकारों ने अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। कहानी में घिसे-पिटे फ़ॉर्मूलों (रोमांस, मारधाड़ आदि) के प्रयोग के बावजूद यह फ़िल्म अपने उद्देश्य में सफल है। 

सफ़ारी  (१९९)
'हबारी' के बीस साल बाद संजय दत्त तथा जूही चावला जैसे बड़े सितारों को लेकर बनाई गई हिन्दी फ़िल्म 'सफ़ारी' प्रदर्शित हुई जिसकी कहानी का आधार भी वन्य-जीवन को ही बनाया गया। लेकिन यह फ़िल्म वस्तुतः एक प्रेमकथा है - एक व्यवसायी युवती (जूही चावला) के एक वनवासी (संजय दत्त) जो नगर से बहुत दूर समुद्र में स्थित एक टापू पर अपने जैसे लोगों के साथ रहता है, से प्रेम की। व्यवसायी युवती ने व्यवसाय के गुर अपनी माता (तनूजा) से सीखे हैं जो कि उसके पिता (सुरेश ओबराय) से पूर्णतः भिन्न स्वभाव की हैं। यह माता-पुत्री की व्यवसायी जोड़ी टापू की भूमि क्रय करके उस पर आच्छादित वन को काटकर वहाँ एक कारख़ाना लगाना चाहती है। लेकिन वहाँ के वासी इसका विरोध कर रहे हैं जिनके नेता से मिलने हेतु नायिका वहाँ जाती है तथा नायक के प्रेम में पड़ जाती है। सरल स्वभाव का नायक भी उससे उतना ही प्रेम करने लगता है तथा दोनों के संबंध को औपचारिक रूप देने हेतु मुम्बई आ पहुँचता है। इधर सरकार भी प्रस्तावित कारख़ाने के प्रति टापूवासियों के विरोध को देखते हुए उनके प्रमुख लोगों को इस विषय पर वार्ता हेतु मुम्बई आमंत्रित करती है। नायिका की माता उसका विवाह उसके प्रेमी नायक के स्थान पर अपनी पसंद के युवक (मोहनीश बहल) से करना चाहती हैं जबकि उसके पिता सब कुछ जानते हुए भी विवश हैं। कुछ ग़लतफ़हमियों के बाद नायक-नायिका के मिलन के साथ फ़िल्म का सुखद अंत होता है। 

'सफ़ारी' शब्द का अर्थ ही होता है 'वन में यात्रा'। अपने शीर्षक को यह अत्यंत रोचक फ़िल्म अपने पूर्वार्द्ध में सार्थक कर देती है जब नायक-नायिका टापू पर स्थित वन में विभिन्न वन्य जीवों की संगति में यात्रा करते हैं। जहाँ एक ओर इस यात्रा में नायक-नायिका के मध्य प्रेम के अंकुर फूटते हैं, वहीं यह यात्रा सदा नगरीय जीवन जीने वाली एवं एक व्यवसायी के ढंग से सोचने वाली नायिका को वन्य-जीवन से तथा वनवासियों की सरलता से परिचित करवाती है। फ़िल्मकार ने वन्य-जीवन को दर्शाने के साथ-साथ वनों की आवश्यकता पर भी एक दृश्य में प्रकाश डाला है जब नायक उदाहरण देकर नायिका के समक्ष यह स्पष्ट करता है कि किस प्रकार वन इस धरती के (एवं उसके वासी प्राणियों के) संरक्षक हैं तथा वे न रहें तो किस प्रकार पृथ्वी पर जलप्लावन हो जाएगा। नायिका भी अपना निर्णय इस बात को समझकर परिवर्तित कर देती है कि कारख़ाने के माध्यम से आने वाली भौतिक समृद्धि की तुलना में उस वन-सम्पदा का महत्व बहुत अधिक है जो कारख़ाने के लिए भूमि ले ली जाने पर नष्ट हो जाएगी। 

लेकिन एक प्रेमकथा बनाने के चक्कर में फ़िल्मकार ने फ़िल्म का उत्तरार्द्ध पूर्णतः नगर में ही रखा है तथा फ़िल्म रोचक होते हुए भी अपने विषय से भटक जाती है। लेकिन मैं नि:स्वार्थ एवं पवित्र प्रेम को न केवल नायक-नायिका वरन नायिका के माता-पिता के संदर्भ में भी मर्मस्पर्शी ढंग से दर्शाने के लिए फ़िल्म के लेखक तथा निर्देशक को पूरे अंक दूंगा। संभवतः फ़िल्म के बनकर प्रदर्शित होने में विलम्ब हुआ जिसका विपरीत प्रभाव फ़िल्म के व्यवसाय पर पड़ा, अन्यथा मधुर गीत-संगीत से सजी यह रोचक फ़िल्म दर्शकों का मनोरंजन करने में पूर्णतया सफल है। सभी प्रमुख कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है एवं तकनीकी रूप से भी फ़िल्म उच्च है। विभिन्न जीव-जंतुओं के साथ-साथ प्रकृति की छटा एवं वन-सम्पदा के मध्य फ़िल्माए गए दृश्य नयनों को ही नहीं, मन को भी शीतल कर देते हैं। यह फ़िल्म भी पुराने फ़ॉर्मूलों को प्रयुक्त करके ही बनाई गई है लेकिन निश्चय ही प्रभावी है।

'हबारी' (कुछ कटे-फटे रूप में) तथा 'सफ़ारी' (सम्पूर्ण रूप में) इंटरनेट पर उपलब्ध हैं तथा प्रकृति व प्राकृतिक धरोहर से प्रेम करने वालों के लिए किसी उपहार से कम नहीं हैं। ये दोनों ही फ़िल्में अंडर-रेटेड कही जा सकती हैं क्योंकि इन्हें न तो समीक्षकों की सराहना मिली, न ही व्यावसायिक सफलता। लेकिन व्यावसायिक असफलता का जोखिम लेकर भी इन्हें बनाने वाले लोग साधुवाद के पात्र हैं। 

'हबारी', 'सफ़ारी', पशुपक्षियों को लेकर बनाई गई अन्य कई फ़िल्में तथा इस विषय पर बनी अब तक की सर्वोत्कृष्ट फ़िल्म 'शेरनी' भी इसी तथ्य को प्रतिपादित करती हैं कि अन्य प्राणियों को भी उसी प्रकार जीने का अधिकार है जिस प्रकार मनुष्य-जाति को। हिंसक स्वभाव के एवं मांसाहारी प्राणी भी तब तक मनुष्य के प्रति आक्रामक नहीं होते जब तक मनुष्य अपनी ओर से उन्हें हानि पहुँचाने का प्रयास न करे। साथ ही यदि मनुष्य उनके प्रति प्रेम एवं करूणा से युक्त व्यवहार करता है तो मूक होते हुए भी अन्य प्राणी उसकी बातों को समझ लेते हैं तथा उसके उदात्त भावों का उसी रूप में प्रतिदान देते हैं। और यह तथ्य वास्तविक है, मेरा अनुभवजन्य सत्य है। क्यों न हो? आख़िर ज़ुबां सब समझते हैं जज़्बात की। 

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रविवार, 19 सितंबर 2021

वतन पे जो फ़िदा होगा, अमर वो नौजवां होगा

बचपन में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में मुग़ल काल के बारे में पढ़ते समय अफ़ग़ान शासक शेर शाह के विषय में भी जाना था जिसका मूल नाम फ़रीद ख़ां सूर था एवं जो कालांतर में मुग़ल बादशाह हुमायूँ को पहले चौसा व तदोपरांत कन्नौज के युद्धों में पराजित करके दिल्ली के राजसिंहासन पर जा बैठा था। १५४० से १५४५ तक भारत के मुग़ल राज्य को अपने अधिकार में रखने वाले शेर शाह सूरी के नाम से प्रसिद्ध इस व्यक्ति को प्रमुखतः उसके प्रशासनिक सुधारों के लिए जाना एवं प्रशंसित किया जाता है। 

१९९८ में अनुजा चौहान ने पेप्सी के पेय पदार्थ को भारत में लोकप्रिय बनाने के लिए एक सूत्रवाक्य (नारा) दिया - ये दिल मांगे मोर। हिंदी एवं अंग्रेज़ी के शब्दों के संयोजन से निर्मित यह सूत्रवाक्य अतिशीघ्र ही अत्यंत लोकप्रिय होकर विज्ञापन जगत पर छा गया। इसकी लोकप्रियता यहाँ तक जा पहुँची कि निर्देशक अनंत महादेवन ने शाहिद कपूर को नायक की भूमिका में लेकर 'दिल मांगे मोर' नामक हिंदी फ़िल्म ही बना डाली जो वर्ष २००४ के अंतिम दिन प्रदर्शित हुई। इस वाक्य का अभिप्राय है कि जो मिला है, उससे मेरा मन नहीं भरा है, मुझे और अधिक (मोर) चाहिए।

लेकिन आज जब 'शेरशाह' शब्द का उल्लेख होता है तो हमें सोलहवीं शताब्दी के अफ़ग़ान शासक का स्मरण नहीं होता, न ही 'ये दिल मांगे मोर' वाक्य को सुनने से पेप्सी के पेय पदार्थ का विचार मन में आता है। इन दोनों को ही अमरत्व प्रदान कर दिया एक चौबीस-पच्चीस वर्ष के युवा भारतीय सैनिक के बलिदान ने जिसका नाम है विक्रम बतरा। सात जुलाई, १९९९ को कारगिल की पहाड़ियों में मातृभूमि की रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग करने वाले उस वीर युवक को कभी नहीं सूझा होगा कि उसके संसार से चले जाने के उपरांत 'शेरशाह' एवं 'ये दिल मांगे मोर' शब्द भारतवासियों के हृदय में सदा के लिए बस जाएंगे। 

भारत एवं पाकिस्तान के बीच हुए चार युद्धों में से सबसे लम्बा चलने वाला यह कारगिल युद्ध ही था जो पचास दिनों तक चला एवं जिसने ५२७ भारतीय सैनिकों की बलि ली। यही सबसे कठिन युद्ध था जिसकी कभी औपचारिक घोषणा भी नहीं की गई लेकिन जिसने भारतीय सेना को अपनी उस भूमि को शत्रु से मुक्त कराने का का लक्ष्य दिया था जो हज़ारों फ़ुट की ऊंचाई पर स्थित थी एवं जहाँ घुसपैठिए बनकर आए शत्रु सुविधाजनक स्थिति में घात लगाए बैठे थे। ऐसी स्थिति में भारतीय वीरों के लिए मरना सरल था, मारना एवं अपनी भूमि पर पुनः अधिकार करना अत्यन्त दुष्कर। लेकिन यह लगभग असंभव-सा कार्य कर दिखाया भारतीय वीरों ने जिनमें से एक था हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मा लेफ़्टिनेंट विक्रम बतरा जिसे युद्धभूमि में ही पदोन्नत करके कैप्टन बनाया गया। 

रणभूमि में अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन करते हुए अपने वतन पर मर-मिटने वाले विक्रम बतरा का व्यक्तित्व कुछ ऐसा नाटकीय एवं फ़िल्मी रंग लिए हुए था कि उनके जीवन पर फ़िल्म तो बननी ही थी। मस्तमौला मिज़ाज वाले, बात-बात पर नाटकीय संवाद बोलने वाले तथा फ़िल्मी अंदाज़ में अपनी प्रेयसी की मांग अपने ख़ून से भरकर उसे अपनी दुलहन बना लेने वाले इस स्टाइलिश युवक की जीवन-कथा रूमानी ढंग से ही चली और रूमानी ढंग से ही अपने चरम पर पहुँच कर पूरी हुई। 

१९७१ के भारत-पाक युद्ध पर 'बॉर्डर' (१९९७) जैसी सफल फ़िल्म बना चुके फ़िल्मकार जे.पी. दत्ता ने कारगिल युद्ध पर अपनी व्यावसायिक रूप से असफल लेकिन अत्यन्त प्रामाणिक फ़िल्म 'एल.ओ.सी.-कारगिल' (२००३) में विक्रम बतरा की भूमिका अभिषेक बच्चन को सौंपी जिन्होंने निश्चय ही उसे प्रभावशाली ढंग से निभाया। उनकी प्रेयसी डिम्पल चीमा की भूमिका एशा देओल ने की। लेकिन अत्यन्त विस्तृत कैनवास पर बनी चार घंटे से भी अधिक लम्बी उस फ़िल्म में विक्रम बतरा के ट्रैक को आख़िर कितना फ़ुटेज मिल सकता था ? उनकी जीवन गाथा तो एक स्वतंत्र फ़िल्म की अधिकारिणी थी। यह आवश्यकता अंततः २०२१ में निर्माता धर्मा प्रोडक्शंस तथा निर्देशक विष्णुवर्धन ने संदीप श्रीवास्तव की पटकथा पर फ़िल्म बनाकर पूरी की जिसका नाम स्वाभाविक रूप से 'शेरशाह' ही होना था।

'शेरशाह' फ़िल्म युद्धभूमि में विक्रम बतरा द्वारा लड़ी गई अंतिम लड़ाई से आरम्भ होती है  एवं तदोपरांत फ़्लैश बैक में चलती हुई विक्रम के जीवन के विषय में बताती है। फ़िल्म प्रामाणिक है क्योंकि विक्रम के बचपन से लेकर युवावस्था तक के विभिन्न घटनाक्रम उनके साथ जुड़े लोगों के माध्यम से ज्ञात हैं। विक्रम बचपन से ही जुझारू एवं कभी हार न मानने वाले थे एवं भाग्यशाली भी थे कि जिसे उन्होंने चाहा, उसका भी सच्चा प्रेम उन्हें प्रतिदान में मिला। डिम्पल का प्रेम तो विक्रम के देशप्रेम के समकक्ष रखा जा सकता है क्योंकि उन्होंने विक्रम की स्मृति को ही अपने मन में बसाकर जीवन बिता दिया एवं किसी अन्य व्यक्ति से विवाह नहीं किया। फ़िल्म रोचक ढंग से चलती है एवं दर्शक विक्रम से जुड़ी एक-एक घटना को ध्यान से देखते हुए धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व को समझते चले जाते हैं। स्वाभाविक ही है कि फ़िल्म का अंतिम भाग जिसमें विक्रम की विजय एवं बलिदान हैं, सर्वाधिक प्रभावशाली है। तकनीकी पक्ष, गीत-संगीत अच्छे हैं एवं सभी सहायक कलाकारों का अभिनय सहज-स्वाभाविक है। संवाद लेखक के लिए अधिक कार्य नहीं था क्योंकि कभी न भुलाए जा सकने वाले संवाद तो स्वयं स्वर्गीय विक्रम ही अपने मुख से दे गए थे। 

विक्रम (तथा उनके हमशक़्ल भाई विशाल) की भूमिका में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने प्रभावशाली अभिनय किया है। यदि वे 'एल.ओ.सी.-कारगिल' के अभिषेक बच्चन से बेहतर नहीं रहे तो कमतर भी नहीं रहे। पर एक समीक्षक के रूप में मुझे लगता है कि वे सैन्य जीवन से बाहर एक अपने सपनों को जीने वाले युवा तथा एक प्रेमी की भूमिका में अधिक प्रभावी रहे बजाय अपने सैनिक रूप में। फिर भी अपने करियर की इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका को निभाने के लिए वे पूरे अंकों के अधिकारी हैं। डिम्पल की भूमिका में कियारा आडवाणी ने प्राण फूंक दिए हैं। सिद्धार्थ के साथ उनकी जोड़ी ख़ूब जमी है। फ़िल्म के अंत में वास्तविक विक्रम के साथ-साथ उनसे जुड़े सभी वास्तविक व्यक्तियों के चित्र दिखाए गए हैं लेकिन वास्तविक डिम्पल का चित्र नहीं दिखाया गया है जो कि पूर्णतः उचित है। उस साहसी स्त्री की निजता का सम्मान होना ही चाहिए। 

फ़िल्म में सैन्य जीवन के भीतर की वास्तविकताओं को यथार्थपरक ढंग से ही प्रदर्शित किया गया है जिनमें वरिष्ठों का अहम् भी सम्मिलित है जो कि उनके अपने कनिष्ठों के साथ व्यवहार में परिलक्षित होता है। विक्रम के हृदय की विशालता तथा काश्मीरी लोगों के कष्ट एवं स्थिति को समझकर उन्हें अपना बनाने की विवेकशीलता को भी अच्छे-से दिखाया गया है। इससे फ़िल्म देखने वालों के मन में विक्रम का मान एक बलिदानी सैनिक के रूप में ही नहीं वरन एक सरलचित्त एवं उदार मानव के रूप में भी बढ़ जाता है। 

फिर भी मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि 'शेरशाह' फ़िल्म जितनी अच्छी बनी है, उससे भी अधिक अच्छी बन सकती थी एवं बननी चाहिए थी। विक्रम के महान बलिदान को देखकर मन में भावनाओं का वह ज्वार नहीं उठता जो कि ऐसी फ़िल्म को देखते समय किसी भी संवेदनशील एवं देशप्रेमी दर्शक के मन में उठना चाहिए। इसके लिए सम्पादन, दृश्य-संयोजन एवं पटकथा का प्रवाह बेहतर होना चाहिए था। दाल अच्छी बनी पर नमक कुछ कम रह गया। 

फ़िल्म की एक अन्य कमी अत्यंत अभद्र अपशब्दों (भद्दी गालियों) का प्रयोग भी है जिन्हें विक्रम के मुख से भी कहलवाया गया है। रणभूमि में युद्धरत सैनिकों का अपने प्रतिपक्षियों के प्रति अपशब्दों का प्रयोग एक तथ्य होगा लेकिन उन्हें फ़िल्म में ऐसा करते हुए प्रदर्शित करना सम्पूर्ण परिवार एवं बालकों के साथ फ़िल्म देखने वालों के प्रति फ़िल्मकार का अन्याय ही है। यही ग़लती 'एल.ओ.सी.-कारगिल' में जे.पी. दत्ता ने भी की थी। और यही वह कमी है जो 'लम्हा' (२०१०) तथा 'नो वन किल्ड जेसिका' (२०११) जैसी अच्छी फ़िल्मों पर दाग़ लगा देती है। भारतीय दर्शक सीमा पर अपने प्राणों को संकट में डालकर देश की रक्षा करने वाले सैनिकों की वीरता से भलीभांति परिचित हैं, इसके लिए उन्हें गालियां देते हुए दिखाना आवश्यक नहीं। इससे ऐसी फ़िल्मों का प्रभाव घटता है, बढ़ता नहीं। 

लेकिन 'शेरशाह' निश्चय ही देखने लायक फ़िल्म है - देशभक्तों के लिए भी तथा मनोरंजन के आकांक्षियों के लिए भी। इस फ़िल्म की सफलता का श्रेय इसे बनाने वालों से अधिक उस अमर शहीद को है जिस पर यह बनी है। हिंदी फ़िल्म 'फूल बने अंगारे' (१९६३) का गीत है - 'वतन पे जो फ़िदा होगा, अमर वो नौजवां होगा'। वतन पे फ़िदा होकर विक्रम अमर हो गए, युद्ध में उनको दिया गया कूट नाम 'शेरशाह' अमर हो गया, उनका विजय-घोष 'ये दिल मांगे मोर' अमर हो गया, उनके द्वारा विभिन्न अवसरों पर कही गईं विभिन्न बातें अमर हो गईं। विक्रम ने कैफ़ी आज़मी साहब की इन पंक्तियों को अपने जीवन में उतारकर सार्थक कर दिया - 'ज़िन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर जान देने की रुत रोज़ आती नहीं, हुस्न और इश्क़ दोनों को रुसवा करे वो जवानी जो ख़ूं में नहाती नहीं'। इसी गीत की यह पंक्ति भी विक्रम पर शब्दशः लागू होती है - 'मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो'। ज़िन्दगी जीने के अपने बाँकपन को 'शेरशाह' विक्रम ने अपनी शहादत के लम्हे में भी यकीनन क़ायम रखा।

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बुधवार, 1 सितंबर 2021

गोपिकाओं का निश्छल प्रेम

जन्माष्टमी आई और चली गई । प्रत्येक वर्ष आती है । हम धर्मप्राण हिंदू भगवान कृष्ण को स्मरण करते हैं, उनकी लीलाओं को विशेषतः उनकी गोकुल-वृंदावन में रचाई गई बाल-लीलाओं को याद करके और उनका नाट्य रूपांतर करके प्रफुल्लित होते हैं । गाँव-खेड़ों में रासलीलाओं के आयोजन होते हैं और कल्पनाएं की जाती हैं कि राधारानी और अन्य गोपिकाओं के साथ कृष्ण ने कैसे-कैसे रास रचाए होंगे, कैसे वे स्वयं आनंदित हुए होंगे और कैसे उन्होंने सर्वत्र आनंद-रस बरसाया होगा । इस सबके दौरान हम सहज ही यह मानकर चलते हैं कि उन रासलीलाओं तथा कृष्ण की बालसुलभ लीलाओं से ब्रज और गोकुल की गोपिकाएं भी आनंदित ही हुई होंगी । उन बालाओं को कृष्ण से हार्दिक प्रेम हो गया था, इस तथ्य से कोई इनकार नहीं करता । भक्त कवि सूरदास का तो संपूर्ण काव्य-सृजन ही इन्हीं सब कार्यकलाप तथा सुकोमल संबंधों पर आधारित है । लेकिन कृष्ण ने तो ग्यारह वर्ष की आयु में वृन्दावन छोड़ दिया था और मथुरा चले गए थे । इस तरह उनका गोकुल-वृंदावन की भूमि, अपने पालक माता-पिता अर्थात् नंदबाबा तथा यशोदा मैया एवं समस्त गोप-बालाओं तथा गोप-वधुओं से विछोह हो गया था । उस विछोह के उपरांत क्या हुआ ?

 

किवदंतियों की बात जाने दीजिए जिनसे आज इंटरनेट भरा पड़ा है और जिनमें से अधिकांश की कोई प्रामाणिकता नहीं है । कृष्ण की प्रामाणिक जीवन-कथा को आद्योपांत पढ़ा जाए तो यही पता लगता है कि एक बार गोकुल-वृंदावन छोड़ जाने के उपरांत वे पुनः वहाँ कभी नहीं लौटे । क्यों ? वे ही बेहतर जानते होंगे । क्या उन्हें कभी अपने उस बाल्यकाल की मधुर स्मृतियों ने, वृंदावन की कुंज-गलियों ने, नंदबाबा और यशोदा मैया के दुलार ने एवं उन पर प्राणप्रण से न्यौछावर हो जाने वाली गोपिकाओं के पावन प्रेम ने नहीं पुकारा ? यह भी वे ही बेहतर जानते होंगे । वे योगेश्वर कहलाए, महाभारत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, गीतोपदेश दिया तथा आजीवन पांडवों के सम्पर्क में रहे । उन्होंने अनेक लोगों से संबंध जोड़े, अनेक विवाह किए, द्वारिका नगरी बसाई और द्वापर के युगपुरुष के रूप में स्थापित हुए । भारतीय जनमानस में उनकी महानता आज भी निर्विवाद है । अत्यंत सफल रहे वे अपने जीवन में । लेकिन सफलता के आभामंडल में सरल प्रेम यदि कहीं खो जाए तो सफलता और स्वार्थपरता में भिन्नता करना कठिन हो जाता है । वे दीर्घजीवी रहे और अपने पड़पोतों तक का मुख देख सके ।  क्या अपने सुदीर्घ जीवन में उन्हें इतना भी समय नहीं मिला कि कभी गोकुल-वृंदावन जाकर अपने वियोग में तड़पने वालों की विरहाग्नि को शीतल कर देते ? सम्भवतः उनकी कभी ऐसी इच्छा ही नहीं हुई ।

 

प्रेम क्या है ? प्रेम हृदयों को जोड़ने वाला वह कच्चा धागा है जिसे कोई तोड़ना चाहे तो एक झटके में तोड़ दे और जो उसे न टूटना हो तो हज़ार हाथियों के बल से भी न टूटे ।  कृष्ण ने उस बाल्यकालीन निर्दोष प्रेम को किस रूप में देखा, वे ही जानें किंतु राधा सहित गोप-बालाओं के लिए तो वह ऐसा शक्तिशाली और चिरस्थायी धागा था जो किसी भांति नहीं टूट सकता था, कभी नहीं टूट सकता था । अजर-अमर और सनातन था (और है) उनका प्रेम । और इसी प्रेम ने सृष्टि में अपनी चिरकालिक परिभाषा रची, वह परिभाषा जिसे शब्दों से नहीं, अनुभूति से समझा जा सकता है और उसी से समझा जाता है ।

 

एक फ़िल्मी गीत में कहा गया है - 'न जाने क्यूँ होता है ये ज़िन्दगी के साथ, अचानक ये मन किसी के जाने के बाद, करे फिर उसकी याद छोटी-छोटी-सी बात' । प्रिय के विछोह में त्रस्त विरही या विरहणी को उससे जुड़ी प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक व्यक्ति से गहरा लगाव हो जाता है क्योंकि वह वस्तु या व्यक्ति उसके लिए अपने प्रिय का ही प्रतीक बन जाता है । कई वर्षों के उपरांत जब बलराम वृंदावन आए तो उन्हें देखकर गोपियाँ भाव-विह्वल हो उठीं । क्यों ? गोपियों का लगाव तो कृष्ण से था, बलराम से नहीं । किंतु बलराम के आगमन एवं दर्शन ने भी उन्हें अतीव आनंदित किया क्योंकि वे कृष्ण के भाई थे और इसीलिए उनका आना भी गोपियों के आनंद का स्रोत बन गया था । बे बार-बार बलराम से पूछती रहीं कि कान्हा कैसे हैं, वे कभी उन्हें स्मरण करते हैं या नहीं । बलराम क्या उत्तर देते ?

 

कृष्ण ने विरहणी गोपियों के विकल मन को धीरज बंधाने के लिए तथा उन्हें मोह की निस्सारता समझाने के लिए उद्धव को गोकुल भेजा । उद्धव गए तो थे अपने ज्ञान से गोपियों के मन को शांत करने तथा उनकी मानसिकता एवं कृष्ण के प्रति दृष्टिकोण को मोड़ने लेकिन गोपिकाओं की विरह-वेदना देखकर संभवतः उन्हें अपने ज्ञान की निस्सारता का आभास हो गया और वे भाँप गए कि गोपिकाओं के असीम कृष्ण-प्रेम के समक्ष उनका तथाकथित  तत्व-ज्ञान तृणभर भी नहीं था और इसीलिए उनका विरह-व्यथित गोपिकाओं को समझाने का प्रयास निरर्थक ही था । सूरदास के शब्दों में गोपियों ने उद्धव से कहा - 'ऊधो मन न भए दस-बीस, एक हुतो सो गयो स्याम संग को अवराधै ईस' अर्थात् हमारे पास कोई दस-बीस मन तो थे नहीं, एक ही था जो कृष्ण के संग गया, अब कुछ है ही नहीं जिसे कहीं और लगाया जाए' । अब उद्धव क्या बोल सकते थे और क्या उपदेश दे सकते थे उन्हें ? मेरे अंतर्मन में यही प्रश्न उठता है कि जब कृष्ण उद्धव को भेज सकते थे तो क्या स्वयं नहीं जा सकते थे ? सूरदास के ही शब्दों में उन्होंने स्वयं उद्धव से (जो कि उनके सखा थे) कहा था - 'ऊधो, मोहि ब्रज बिसरत नाहीं' । जब वे ब्रज को भूल नहीं सकते थे तो जाने में क्या बाधा थी ?

 

एक हिंदी फ़िल्म की समीक्षा में मैंने इस बात को रेखांकित किया है कि 'अपनों की क़ीमत सपनों से ज़्यादा होती है' । लेकिन संसार में निरंतर दृष्टिगोचर यथार्थ तो यही बताता है कि सपनों का पीछा करने वाले और सफलता को मुट्ठी में कर लेने वाले अपनों की परवाह करना भूल ही जाते हैं । उनकी संवेदनशीलता, भावनाएं और स्नेह: सब कुछ वास्तविक से प्रदर्शनी कब बन जाता है, सम्भवतः वे स्वयं भी नहीं जान पाते । मैंने अपने लेख 'सफलता बनाम गुण' में कहा है - सफलता के लिए बहुत कुछ त्यागा जा सकता है लेकिन सफलता को किसी के भी लिए दांव पर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि (सफल व्यक्तियों के लिए) वह सबसे अधिक मूल्यवान होती है। गोपियों को तो किसी भौतिक सफलता की अभिलाषा नहीं थी । वे तो कृष्ण के दरस से, उनके सान्निध्य से और उनकी लीलाओं से हो रही आनंद-प्राप्ति से ही अपने जीवन को धन्य मान चुकी थीं । वही उनके संपूर्ण जीवन के लिए पर्याप्त था । सफलता का महत्व तो कृष्ण के लिए रहा । सफल बनकर वे कूटनीतिज्ञ बन गए (प्राय: सभी सफल व्यक्त्ति बन ही जाते हैं), संवेदनशील नहीं रहे । उनके जीवन में आई सफलता की आँधी उनके भीतर निहित संवेदनाओं से युक्त एवं कोमल भावनाओं से ओतप्रोत प्रेमी को कहीं बाहर उड़ा ले गई । देवत्व प्राप्त करके वे मानव न रहे ।   

 

गोपियों ने अपने मन पर पत्थर रखकर कृष्ण को विदा देने समय यह तो नहीं सोचा था कि वे उनसे और ब्रज-गोकुल से ऐसा मुँह फेरेंगे कि कभी पलटकर न आएंगे । वे भोली बालाएं तो यही समझती रहीं और सदा उनकी बाट जोहती रहीं कि वे कभी तो आएंगे । दिन महीनों में बदले और महीने बरसों में । उनका संपूर्ण जीवन कृष्ण का पंथ निहारते बीत गया, आँखें पथरा गईं होंगी उनकी, पलकों को भिगोते-भिगोते किसी दिन अश्रु भी सूख गए होंगे उनके । पर कान्हा न आए । केवल उनकी वर्षों पुरानी स्मृतियां ही साथ रहीं उनके । और अपने लाल पर दिन-रात स्नेह बरसाने वाली यशोदा मैया पर अपने पुत्र के वियोग में क्या बीती होगी, इसका केवल एक पीड़ादायी अनुमान ही लगाया जा सकता है ।

 

मैं नहीं जानता कि जयदेव रचित 'गीतगोविंद' में तथा रीतिकालीन कवियों की रचनाओं में वर्णित कृष्ण की राधा तथा अन्य गोप-बालाओं एवं गोप-वधुओं के साथ की गई क्रीड़ाओं में सत्य का अंश कितना है लेकिन इन सभी वर्णनों में दैहिकता ही प्रमुखता रखती है तथा ऐसा प्रतीत होता है कि कृष्ण ने अपनी रासलीलाओं द्वारा उन सरल एवं निष्पाप नारियों की कमनीय देहों का सुख लिया । किंतु गोप-बालाओं तथा गोप-वधुओं का उनके लिए प्रेम आत्मिक ही था जिसमें दैहिकता लेशमात्र भी नहीं थी । इसीलिए वह प्रेम कृष्ण की महानता से भी कहीं अधिक महान है क्योंकि वह निस्वार्थ था, निष्कलंक था, किसी भी प्रकार की अपेक्षा से मुक्त था । वह प्रेम कोई साधन नहीं, अपने आप में ही साध्य था ।

 

और इन्हीं गोपिकाओं में थीं - वृषभानुजा राधारानी जो कृष्ण से आयु में कई वर्ष बड़ी थीं लेकिन कृष्ण के लिए उनका प्रेम आयु और देह की सीमाओं से परे था । कृष्ण से विछोह हो जाने के उपरांत उन्होंने अपने माता-पिता की इच्छानुसार विवाह भी किया लेकिन अपने हृदय में अपने बंसीवाले कान्हा की छवि को अक्षुण्ण बनाए रखा । कौन जाने, वे ही कलियुग में मीरा बनकर अवतरित हुई हों । सत्य और तथ्य यही है कि कृष्ण ने चाहे जितने विवाह किए और चाहे जितनी उनकी पटरानियां (कुल आठ बताई जाती हैं) रही हों, उनके नाम के साथ सदा-सदा-सर्वदा के लिए यदि किसी का नाम संयुक्त हो गया तो राधा का । कृष्ण के किसी भी मंदिर में उनके साथ उनकी किसी पटरानी की प्रतिमा नहीं लगती, राधा की लगती है । उस राधा की जिसका कृष्ण के साथ संबंध सामाजिक नहीं; हार्दिक था, आत्मिक था, ऐसा था जिसमें वह पृथक् न रही, कृष्ण के अस्तित्व के साथ एकाकार हो गई । ऐसे निश्छल और पावन प्रेम को विवाह जैसी किसी औपचारिकता की आवश्यकता थी भी नहीं । उसे अमरत्व तो प्राप्त होना ही था । 

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शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

स्वप्नद्रष्टा को नमन

आज राजीव गाँधी का ७ वां जन्मदिवस है । वे इक्कीसवीं शताब्दी में अवतरित होने जा रहे उन्नत प्रौद्योगिकी सम्पन्न आधुनिक भारत के स्वप्नद्रष्टा थे । इस अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मैं उनके जीवन एवं व्यक्तित्व का आकलन अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

गाँधीवादी सांसद फ़िरोज़ तथा लौह-महिला इन्दिरा के इस ज्येष्ठ पुत्र ने माता और पिता दोनों ही के सद्गुण अपने व्यक्तित्व में पाए किन्तु राजनीति में कभी रुचि नहीं ली और विमान-चालक बनकर ही प्रसन्न रहे । राजनीति का क्षेत्र अपने अनुज संजय के लिए छोड़कर वे प्रेमिका से अर्द्धांगिनी बन चुकीं सोनिया तथा दोनों के उत्कट और पवित्र प्रेम के प्रतीक दो नौनिहालों के साथ एक शांत और सुखी गृहस्थ जीवन बिताते रहे । लेकिन जैसा कि कहते हैं - मेरे मन कछु और है, विधना के कछु और; विधि के विधान ने उनके जीवन को एक अप्रत्याशित मोड़ दे दिया जब संजय की अकाल-मृत्यु हो गई एवं तदोपरांत राष्ट्रीय राजनीति में एकाकी अनुभव कर रहीं अपनी माता का संबल बनने के लिए उन्हें अनिच्छा से राजनीति में प्रवेश करना पड़ा । अपने भ्राता संजय के संसदीय क्षेत्र अमेठी को ही उन्होंने भी अपनी राजनीतिक कर्मभूमि चुना पर तीन वर्ष से अधिक समय तक वे सुर्खियों से दूर ही रहते हुए भारतीय राजनीति की बारीकियाँ समझते रहे । लेकिन ३१ अक्टूबर, १९८४ को  उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक क्षण आ पहुँचा, फ़ैसले की घड़ी आ गई । उनकी माता और भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्या ने उनकी नियति को सुनिश्चित कर दिया । तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की आपत्तियों एवं चालों को अनदेखा करते हुए उनके परिवार के प्रति निष्ठावान ज्ञानी ज़ैल सिंह ने भारत के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में अपने आपातकालीन संवैधानिक अधिकार का उपयोग करते हुए उन्हें उसी दिन प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी । इस तरह चालीस वर्ष की आयु में वे भारत के ही नहीं वरन विश्व के सर्वाधिक युवा शासन-प्रमुख बने ।

अनुभवहीन एवं राजनीतिक दृष्टि से अपरिपक्व राजीव गाँधी ने पूर्ववर्ती मंत्रिपरिषद् को ही यथावत् रखा एवं इन्दिरा गाँधी की मृत्यु से उत्पन्न समुदाय-विशेष को लक्ष्य करती हुई हिंसा की लहर से निपटने का दायित्व तत्कालीन गृह मंत्री पी॰वी॰ नरसिंह राव पर डाल दिया जिसके निर्वहन में वे सर्वथा असफल रहे क्योंकि हिंसक दंगे सहस्रों निर्दोष जीवनों को लील गए । ऐसे में उनकी अपरिपक्व प्रतिक्रिया -'जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है' मैंने दूरदर्शन पर उनके मुख से सुनी और आज सैंतीस वर्षों के अंतराल के उपरांत भी मैं पाता हूँ कि अंजाने में मुखर हुई उनकी उस अपरिपक्व वाणी को अब भी उनके राजनीतिक विरोधी उनके विरुद्ध उद्धृत करते हैं । उन्हें और उनके राजनीतिक दल को देश का एक प्रमुख समुदाय कभी क्षमा नहीं कर सका किन्तु उनकी माता की लोकप्रियता से उद्भूत सहानुभूति लहर ने उन्हें अभूतपूर्व चुनावी सफलता दिलाई । तीन चौथाई से अधिक बहुमत पाकर वे पुनः भारत के प्रधानमंत्री बने एवं नव-संकल्प, नव-उत्साह, नव-दृष्टिकोण के साथ देश की बागडोर संभाली । इस अवसर पर हिन्दी के मूर्धन्य कवि डॉ॰ हरिराम आचार्य जी ने उनका मार्गदर्शन करने वाली एक प्रेरक कविता लिखी जिसकी कतिपय पंक्तियाँ थीं :

ये हार इसलिए तुझको पिन्हाये हैं हमने

कि तुझे ध्यान रहे रास्ते के शूलों का

नये सिरे से तेरा इसलिए है अभिनंदन

तुझे ख़याल रहे अब तलक की भूलों का

राजीव गाँधी ने अपनी भूलों से कुछ सबक सीखे, कुछ नहीं सीखे लेकिन उनके हृदय में राष्ट्र को प्रगति-पथ पर ले जाने की जो उदात्त एवं निश्छल भावना थी, वही उनकी पथ-प्रदर्शक बनी । दंगों के दौरान अपने कर्तव्य-निर्वहन में विफल रहे पी॰वी॰ नरसिंह राव के स्थान पर शंकरराव चव्हाण को गृह मंत्री बनाकर उन्होंने नरसिंह राव को मानव-संसाधन विभाग में भेज दिया जबकि अति-महत्वाकांक्षी प्रणब मुखर्जी को सीधे मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाकर स्वच्छ छवि वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह को वित्त मंत्री बनाया । अब राजीव गाँधी जनता और नौकरशाही दोनों के समक्ष एक स्वप्नद्रष्टा के रूप में आए एवं यह सिद्ध करने में लग गए कि युवा नेता के व्यक्तित्व ही नहीं, विचारों एवं कार्यशैली में भी यौवन का उत्साह और सुगंध थी ।

स्त्री-पुरुष समानता एवं साथ ही प्रजातांत्रिक व्यवस्था के विकेन्द्रीकरण एवं स्थानीय प्रशासन में जनसहभागिता में अटूट विश्वास करने वाले राजीव गाँधी ने पंचायती राज की अवधारणा को प्रस्तुत किया जिसके आधार पर कुछ वर्षों के उपरांत (उनके देहावसान के उपरांत) संविधान का ७३ वां संशोधन पारित हुआ एवं पंचायती राज की अवधारणा को प्रसृत किए जाने के साथ-साथ उसमें आधी जनसंख्या के यथेष्ट प्रतिनिधित्व के निमित्त महिला प्रतिनिधियों हेतु ३३ प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया । उनके अपने ही दल द्वारा पोषित दलबदल के नासूर को मिटाने हेतु उन्होंने दलबदल विरोधी विधान पारित करवाकर उसे संविधान की १०वीं अनुसूची में सम्मिलित करवाया । वे स्वच्छ राजनीति में विश्वास रखते थे एवं सत्ता के कारण अपने दल में आई विकृतियों को दूर करना चाहते थे । इसलिए दिसंबर १९८५ में बंबई में आयोजित कांग्रेस के शताब्दी अधिवेशन में उन्होंने दल एवं सरकार को सत्ता के दलालों से मुक्त करने का आह्वान किया तथा प्रशासनिक भ्रष्टाचार को साहसिक रूप से स्वीकार करते हुए कहा कि सरकार द्वारा जनकल्याण हेतु भेजे गए एक रुपये में से केवल पंद्रह पैसे ही वास्तविक लाभार्थियों तक पहुँच पाते हैं (बाकी पिच्चासी पैसे भ्रष्टाचारियों की जेबों में चले जाते हैं) । उन्होंने उद्योगपतियों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रष्टाचार तथा निर्भय होकर कर-वंचन करने वालों पर अंकुश लगाने के लिए अपने वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को किसी भी प्रकार की कार्रवाई करने की खुली छूट दी जिसका लाभ उठाकर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने न केवल व्यवसाय एवं उद्योग जगत की बड़ी मछलियों पर जाल फेंका वरन अपनी निजी छवि को भी चमकाया और अंततः सार्वजनिक जीवन में शुचिता के प्रबल पक्षधर राजीव गाँधी को ही भ्रष्टाचार के आरोप में लपेटकर जनता-जनार्दन की दृष्टि से पतित कर दिया । यह राजीव गाँधी की सरलता तथा विश्वासी स्वभाव (जो कि उन्हें अपनी माता से मिला था) का ही परिणाम था जो विश्वनाथ प्रताप सिंह इस भाँति उनकी पीठ में छुरा भोंक सके ।

राजीव गाँधी जब प्रधानमंत्री बने तो पंजाब, असम एवं मिज़ोरम जैसे राज्य हिंसक आंदोलन की अग्नि में झुलस रहे थे । राजीव गाँधी ने इन राज्यों में शांति-स्थापना को सत्ता पर प्राथमिकता देते हुए आंदोलनकारी समूहों के साथ समझौते किए एवं उन्हें चुनाव लड़कर मुख्यधारा में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया । मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की वार्ता करने की प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें पंजाब का राज्यपाल बनाकर राजीव गाँधी ने भारतीय राजनीति के सभी विशेषज्ञों को चौंका दिया । अर्जुन सिंह ने स्वयं को सौंपे गए अत्यंत महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील दायित्व का भलीभाँति निर्वहन करते हुए अकाली दल के वरिष्ठ नेता सरदार हरचरण सिंह लोंगोवाल के साथ केंद्रीय सरकार का समझौता करवाया जिसमें पंजाब में दीर्घकाल से चल रहे आंदोलन से जुड़े सभी महत्वपूर्ण विवादों का समाधान निकालने का प्रयास किया गया । इसी ढंग से असम के आंदोलनकारी छात्र-नेताओं के साथ असम समझौता एवं मिज़ोरम में हिंसक आंदोलन कर रहे मिज़ो नेशनल फ्रंट के साथ मिज़ो समझौता किया गया । ये समझौते राजीव गाँधी द्वारा जनहित में उठाया गया ऐसा कदम था जिसमें उनके दल के सत्ता गंवा देने का पूरा-पूरा जोखिम था । लेकिन राजीव गाँधी ने जानते-बूझते राष्ट्र और इन राज्यों के जनसमुदाय के हित में यह राजनीतिक जोखिम लिया और सिद्ध किया कि वे सत्तालोभी नहीं थे वरन जनहित को सर्वोपरि मानने वाले राष्ट्र के सच्चे सेवक थे । समझौतों के उपरांत हुए विधानसभा चुनावों में तीनों ही राज्यों में कांग्रेस सत्ताच्युत हो गई । पंजाब में अकाली दल ने सरकार बनाई तथा सुरजीत सिंह बरनाला मुख्यमंत्री बने । असम में असम गण परिषद ने सरकार बनाई एवं बत्तीस वर्षीय प्रफुल्ल कुमार महंत देश के सर्वाधिक युवा मुख्यमंत्री बने । मिज़ोरम में मिज़ो नेशनल फ्रंट ने सरकार बनाई एवं उसके नेता लालदेंगा मुख्यमंत्री बने । लेकिन सत्ता गंवाकर भी राजीव गाँधी को अशांत राज्यों में शांति-स्थापना करने एवं सामान्य स्थिति को लौटाने का सार्थक प्रयास करने का आत्मिक संतोष प्राप्त हुआ । आज लोकप्रिय-से लोकप्रिय-राजनेता से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह सत्ता गंवाने का जोखिम लेकर जनहित में कोई कार्य करेगा । ऐसा साहस एवं नैतिक बल अब किसी भारतीय राजनेता में नहीं है । लेकिन राजीव गाँधी ने ऐसा किया और इसीलिए वे असाधारण थे । उनके मन में राजनीतिक दावपेंचों के स्थान पर मूलभूत ईमानदारी और निश्छलता थी जो कि भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ वस्तु ही है ।

लेकिन देश के साथ-साथ पड़ोसी देश की भी शांति-स्थापना में सहायता करने के चक्कर में अपनी अनुभवहीनता और अति-सरलता के चलते राजीव गाँधी से गंभीर राजनीतिक भूल हुई । वे श्रीलंका के प्रजातीय समीकरणों को बिसरा कर वहाँ के तत्कालीन राष्ट्रपति जेआर जयवर्धने के कूटनीतिक जाल में फंस गए तथा अपने सम्मान के लिए संघर्षरत तमिल विद्रोहियों के संगठन लिट्टे (लिबरेशन टाइगर्स ऑव तमिल ईलम) से लड़ने के लिए भारतीय शांति सेना को वहाँ भेज बैठे । उनकी इस भूल के कारण न केवल राष्ट्र को भारी धनराशि तथा अनेक सैनिकों की आहुति उस व्यर्थ के हवन में देनी पड़ी वरन वे स्वयं भी लिट्टे की दृष्टि में खलनायक बन गए जिसके कारण लिट्टे द्वारा रचे गए एक वृहत् षड्यंत्र का शिकार होकर उन्हें अपनी इस भूल का मूल्य २१ मई, १९९१ को श्रीपेरुम्बुदूर में अपने प्राणों के रूप में चुकाना पड़ा ।

अपने मन में सत्तामोह से रहित तथा निस्वार्थ होते हुए भी संभवतः अपने इर्द-गिर्द उपस्थित गुट की ग़लत सलाहों के असर में राजीव गाँधी ने और भी कई ग़लतियां कीं जिसने आगे चलकर उनके दल को सत्ता की सियासत में भारी नुक़सान पहुँचाया । ऐसा कहा जाता है कि माखनलाल फ़ोतेदार, कैप्टन सतीश शर्मा, गोपी अरोड़ा, अर्जुन सिंह आदि उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता तथा अनुभवहीनता का लाभ उठाकर उन्हें अनुचित परामर्श देते थे । बहरहाल चाहे जिस कारण से भी सही, राजीव गाँधी ने कई ग़लत कदम उठाए । उन्होंने एक ओर तो रामजन्मभूमि मंदिर का ताला खुलवा दिया और दूसरी ओर चर्चित शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को उलटने वाला मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियमपारित करवा दिया । इससे न केवल उत्तर प्रदेश और बिहार में हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों ही समुदाय कांग्रेस दल से दूर हो गए वरन आरिफ़ मोहम्मद ख़ान जैसे प्रगतिशील विचारों वाले युवा मुस्लिम नेता का साथ भी उनसे छूट गया । दलित समुदाय को तो पहले ही कांशीराम बरगला कर अपने साथ ले जा चुके थे जिसका राजीव गाँधी को समय रहते भान तक नहीं हुआ था । परिणाम यह हुआ कि देश के दो सबसे बड़े एवं राष्ट्रीय राजनीति के दृष्टिकोण से सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्यों में उनका दल अपनी राजनीतिक भूमि खो बैठा ।

राजीव गाँधी ने एक ओर तो मुफ़्ती मोहम्मद सईद जैसे ज़मीन से जुड़े काश्मीरी नेता को अपने मंत्रिमंडल में लेकर काश्मीर से दूर कर दिया, दूसरी ओर फ़ारूक अब्दुल्ला जैसे मौकापरस्त और ग़ैर-जिम्मेदार नेता के नेतृत्व में कांग्रेस को काश्मीर की सत्ता में साझीदार बना दिया । इससे मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने रुष्ट होकर पहले मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दिया और अंततः कांग्रेस पार्टी ही छोड़ दी जिससे कांग्रेस के अपने बलबूते पर जम्मू-काश्मीर की सत्ता में आने की संभावनाएं लगभग समाप्त हो गईं । दूसरी ओर फ़ारूक अब्दुल्ला की नाकामियों का ठीकरा कांग्रेस के सर पर भी फूटा ।

राजीव गाँधी ने देश के संवैधानिक प्रमुख ज्ञानी ज़ैल सिंह के साथ मधुर संबंध बनाकर नहीं रखे और कमलकान्त तिवारी जैसे विवेकहीन मंत्री को उनके विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करने की खुली छूट दे दी जबकि उनके प्रधानमंत्री बनने का मुख्य श्रेय ज्ञानी जी को ही जाता था । आख़िर ज्ञानी जी ने अपनी ताक़त दिखाते हुए सेवानिवृत्त होने से केवल एक दिन पहले राष्ट्राध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने की धमकी देकर राजीव गाँधी को कमलकांत तिवारी को मंत्रिपरिषद से बाहर करने पर मजबूर कर दिया । इससे राजीव गाँधी की सार्वजनिक छवि पर विपरीत प्रभाव ही पड़ा ।

लेकिन भूलें अपनी जगह हैं तथा योगदान अपनी जगह । सर्वगुणसंपन्न तो कोई भी नहीं होता । राजीव गाँधी भी मानव ही थे और मानव से भूलें होती ही हैं । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि राष्ट्र के उन्नयन में उनके योगदान को अनदेखा कर दिया जाए । उनका सबसे बड़ा योगदान राष्ट्र के विकास में आधुनिक प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के रूप में रहा । वे सैम पित्रोदा के रूप में एक विशेषज्ञ को आगे लेकर आए और देश में दूरसंचार तथा सूचना प्रौद्योगिकी क्रान्ति का सूत्रपात किया । यह उनका स्वप्न था कि इक्कीसवीं शताब्दी का भारत कंप्यूटर से काम करने वाले, दूरसंचार के अत्याधुनिक साधनों से युक्त तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व का मार्गदर्शन करने वाले नागरिकों का भारत हो । उनके इस स्वप्न का उनके राजनीतिक विरोधी उपहास करते थे लेकिन आज हम देख सकते हैं कि उस स्वप्नद्रष्टा का स्वप्न साकार हो चुका है । हर हाथ में मोबाइल है, कंप्यूटर पर काम करना रोज़मर्रा की बात हो चुकी है, इंटरनेट के माध्यम से हम सारे संसार से जुड़ चुके हैं एवं सभी महत्वपूर्ण घटनाओं की अद्यतन जानकारी अविलंब हम तक पहुँचती हैं ।

अपनी स्वच्छ छवि तथा राजनीतिक ईमानदारी के चलते १९८५ में राजीव गाँधी को 'मिस्टर क्लीन' के नाम से पुकारा जाने लगा था । लेकिन इस 'मिस्टर क्लीन' पर बोफ़ोर्स तोप सौदे में दी गई कथित ६४ करोड़ रुपयों की दलाली की कालिख पोतने का काम उन्हीं विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया जिन्हें राजीव गाँधी ने बड़े विश्वास एवं आशाओं के साथ वित्त एवं रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपे थे । आज जब हजारों करोड़ के घोटाले सामने आ चुके हैं और उनके आरोपी न्यायालय से दंड पा चुकने के उपरांत भी सीना तानकर चलते हैं तो ६४ करोड़ रुपये की मामूली राशि के लिए राजीव गाँधी के नाम को निराधार कलंकित किया जाना उनके प्रति घोर अन्याय ही है । विश्वनाथ प्रताप सिंह तो उन पर यह झूठा आरोप लगाकर एवं उन्हें बदनाम करके प्रधानमंत्री की कुर्सी पाने में सफल रहे (कुर्सी को पाने के लिए राजीव गाँधी की पीठ में छुरा भोंकने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कुर्सी मिल जाने के उपरांत अपने पर अंधा विश्वास करने वाले देश के करोड़ों युवाओं के साथ भी विश्वासघात ही किया) लेकिन अपने देहावसान के तीन दशक बाद भी राजीव गाँधी के माथे पर बिना किसी प्रमाण के यह झूठा कलंक आज तक लगाया जाता है । यह बात भी ग़ौरतलब है कि जिन बोफ़ोर्स तोपों की ख़रीद को मुद्दा बनाकर यह सारा नाटक किया गया, उन्हीं बोफ़ोर्स तोपों ने १९९९ में कारगिल के युद्ध में गरज-गरज कर दुश्मनों को मुँहतोड़ जवाब दिया ।

राजीव गाँधी के आकस्मिक निधन से उनके राजनीतिक दल को ही नहीं, भारतीय राजनीति तथा राष्ट्र को भी अपूरणीय क्षति पहुँची । उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस को अपना खोया हुआ जनाधार पाने में कभी सफलता नहीं मिली क्योंकि उसके पुनरुत्थान के लिए कोई मार्गदर्शक एवं प्रेरक नेता ही नहीं रहा । इन दोनों ही राज्यों की राजनीति सम्पूर्ण जनता के स्थान पर जाति विशेष एवं वर्ग विशेष पर केन्द्रित होकर रह गई क्योंकि विभाजक दृष्टिकोण वाले नेताओं की बन आई । दलित राजनीति का झण्डा कांशीराम-मायावती तथा रामविलास पासवान ने उठा लिया तो मण्डल आयोग के प्रतिवेदन पर आधारित पिछड़े वर्गों की राजनीति पर यादवी कब्ज़ा हो गया । जात-पांत तथा वर्ग-भेद के टुकड़ों में बंट चुकी इन दो वृहत् राज्यों की राजनीति से राष्ट्रीय दृष्टिकोण तथा समष्टि के हित-साधन की भावना तिरोहित हो गई । यह हानि केवल दल-विशेष की न होकर, सम्पूर्ण समाज एवं राष्ट्र की रही ।

आज जब हम स्मार्ट फ़ोन और इंटरनेट के माध्यम से संसार से प्रतिपल जुड़े रहते हैं, ज्ञानार्जन करते हैं तथा व्यवसाय के माध्यम से धनार्जन भी करते हैं तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी इस प्रगति का स्वप्न साढ़े तीन दशक पूर्व हमारे युवा प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने देखा था जो देश को कर्म और विचार दोनों ही से आधुनिक बनाना चाहते थे एवं बिना किसी भेदभाव के सभी वर्गों व समुदायों के भारतीय नागरिकों के जीवन में गुणात्मक सुधार लाना चाहते थे । उस कर्मशील स्वप्नद्रष्टा के योगदान को विस्मृत करना कृतघ्नता ही होगी । और हम भारतीयों के संस्कार तथा हमारे शास्त्र हमें कृतज्ञता ही सिखाते हैं, कृतघ्नता नहीं ।

आज सद्भावना दिवस पर सर्वत्र सद्भावना के प्रसार में विश्वास रखने वाले उस विशाल हृदयी स्वप्नदृष्टा को मेरा नमन ।

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मंगलवार, 17 अगस्त 2021

तुम्हें गीतों में ढालूंगा, सावन को आने दो

हाल ही में आदरणीय संदीप शर्मा जी ने मेरे समक्ष 'फ़िल्मों में प्रकृति' विषय पर लिखने का विचार प्रस्तुत किया। चूंकि मैं (कुछ अपवादों को छोड़कर) हिंदी फ़िल्मों पर ही लिखता हूँ, इसलिए मेरे लिए इस विषय को 'हिंदी फ़िल्मों में प्रकृति' कहा जा सकता है। मैंने शर्मा जी को वचन नहीं दिया क्योंकि विगत कुछ मास से मेरा ब्लॉग जगत से मन उचाट-सा हो गया है और यह विषय तो गहन शोध एवं श्रम की मांग करता है, अतः झूठा वचन देना अनुचित ही होता (वैसे भी मेरी नज़र में झूठा वादा करना एक गुनाह है)। लेकिन . . .

लेकिन श्रावण मास चल रहा है जिसमें जब मेघ बरस रहे हों तो प्रकृति की छटा देखते ही बनती है। और मेघमय आकाश तथा वर्षा की बूंदों के साथ ही भावुक मन में उमड़ती हैं कोमल भावनाएं - किसी विशिष्ट के लिए। बारिश के साथ, ठंडी हवाओं और काली घटाओं के साथ, चहुँओर फैल रही हरियाली के साथ दिल पुकारता है उसे जिस पर वो निसार हो चुका है। श्रावण मास को हम लोग बोलचाल की भाषा में सावन कहते हैं जो भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं में मधुर पारिवारिक संबंधों से भी जुड़ा हुआ है एवं नर-नारी के सनातन प्रेम से भी।

हिंदी फ़िल्मों में प्रकृति से संबंधित हज़ारों गीत हैं जिनमें से बहुत-से सावन पर ही हैं। ऐसी बहुत-सी हिंदी फ़िल्में भी बनीं हैं जिनमें सावन माह उनके कथानक का अंग है और अधिक न हो तो शीर्षक में ही सम्मिलित है, यथा - सावन आया रे (१९४९), सावन भादों (१९४९), सावन (१९५९), सावन की घटा (१९६६), आया सावन झूम के (१९६९), सावन भादों (१९७०), प्यासा सावन (१९८१), प्यार का सावन (१९९१), सावन (२००६) आदि। लेकिन जिस फ़िल्म ने मेरे मन को गहराई से छुआ और जो मेरी नज़र में प्रेम और संगीत का रूपहले परदे पर चलता-फिरता दस्तावेज़ है, उसका नाम है - सावन को आने दो। 
सावन को आने दो (१९७९) स्वर्गीय ताराचंद बड़जात्या की संस्था राजश्री की प्रस्तुति है जिसने अपने प्रदर्शन के समय सम्पूर्ण भारत में धूम मचा दी थी। इसके गीतों ने सुगम संगीत तथा शास्त्रीय संगीत दोनों ही के चाहने वालों के मन जीत लिए थे और आज भी इसके गीतों को सुनकर किसी भी संगीत-प्रेमी का हृदय आह्लादित हो उठता है। यह अत्यंत लोकप्रिय एवं व्यावसायिक दृष्टि से सफल फ़िल्म केवल मनोरंजन ही प्रदान नहीं करती, मानवीय मूल्यों तथा सात्विक प्रेम में आस्था को भी दृढ़ करती है। कथा के प्रमुख पात्रों के साथ-साथ दर्शक भी भावनाओं में डूबते-उतराते हैं एवं अंतिम दृश्य तो नयनों को भिगो देता है, मन में एक ऐसा भाव जगाता है जिसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

'सावन को आने दो' ग्रामीण परिवेश में पनपी प्रेमकथा है चंद्रमुखी (ज़रीना वहाब) तथा बिरजू (अरूण गोविल) की। बिरजू निर्धन है जबकि चंद्रमुखी ज़मींदार की पुत्री है अर्थात् धनी परिवार से है। समाज में वर्ग-भेद एवं ऊंच-नीच की दीवारें भी उतनी ही प्राचीन हैं जितना कि स्त्री-पुरुष का प्रेम। किन्तु प्रेम तो यह सब नहीं देखता, वह तो किसी बाधा के रोके नहीं रूकता और जब हो जाता है तो न मिट सकता है, न भुलाया जा सकता है। चंद्रमुखी के पिता ज़मींदार साहब (अमरीश पुरी) बिरजू के गायन से प्रभावित तो होते हैं, उनका आशीर्वाद भी बिरजू के साथ है लेकिन बिरजू जानता है कि चंद्रमुखी को जीवन-संगिनी बनाने हेतु उसे अपनी आर्थिक-सामाजिक स्थिति को ऊंचा उठाना होगा। इसके लिए वह क्या करे? उसे एक ही काम तो आता है - अपनी सुरीली आवाज़ में गाना। 

धन कमाने के निमित्त बिरजू महानगर जा पहुँचता है तथा जीवन-यापन हेतु श्रमिक बन जाता है। एक दिन श्रम करते हुए सड़क पर चलते-चलते जब वह अपनी मस्ती में गा भी रहा है, तब गीतांजलि (रीटा भादुड़ी) नामक युवती उसका गीत सुनती है तथा उस मधुर स्वर पर मुग्ध होकर तय करती है कि इस प्रतिभाशाली युवक की गायन-प्रतिभा संसार के समक्ष आनी चाहिए। संयोगवश वह चंद्रमुखी की सहेली भी है। गीतांजलि के सौजन्य से बिरजू को अवसर मिलता है - अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का, नाम और दाम कमाने का। और फिर वह लौटता है अपने गाँव - ज़मींदार साहब से अपने मनमंदिर की देवी चंद्रमुखी का हाथ मांगने। लेकिन . . .

लेकिन बिरजू भूल जाता है कि केवल धन कमाने से ऊंच-नीच की दीवारें (जो दिखावटी सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी होती हैं) नहीं गिराई जा सकतीं। क्रोधित ज़मींदार साहब उससे प्रश्न करते हैं - इतना बड़ा सपना तेरी आँखों में समाया कैसे? बिरजू क्या उत्तर दे? चंद्रमुखी मातृहीन है। अपने मन का दर्द केवल अपनी सहेली से बांट सकती है। उसकी सहेली गीतांजलि भी मन-ही-मन बिरजू को चाहने लगी है लेकिन उसे पता है कि बिरजू केवल चंद्रमुखी का है, किसी और का नहीं। इधर ठुकराए गए बिरजू के मन में तूफ़ान उठता है। वह अपने दर्द को केवल अपनी आवाज़ में ही ढाल सकता है। अब वह बिरजू नहीं, पंडित बृजमोहन कहलाता है, एक-एक गीत गाने के हज़ारों रूपये लेता है लेकिन उसकी सबसे बड़ी पूंजी वह एक रूपया ही है जो कभी उसका गाना सुनकर चंद्रमुखी के पिता ने उसे दिया था। उस एक रूपये को उसने बड़े जतन से अपने पास संभालकर रखा है। लेकिन अपनी प्रेयसी को कैसे पाए? विरह की अग्नि में दोनों जल रहे हैं, भाग्य के आगे विवश हैं, दुखी हैं लेकिन भाग्य के अतिरिक्त किसी से उन्हें शिकायत नहीं है (ज़मींदार साहब से भी नहीं)। 

यह भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक ताराचंद बड़जात्या जी की फ़िल्म है जिसके विरहाग्नि में जल रहे नायक-नायिका रो तो सकते हैं किन्तु अपने प्रेम को पाने के निमित्त अपने बुज़ुर्गों को अपमानित करने अथवा उनकी अवहेलना करने वाला कोई काम नहीं कर सकते। घर से भागकर विवाह करने जैसे किसी कृत्य के विषय में तो वे सोच तक नहीं सकते। ऐसे ही संस्कार मिले हैं उन्हें। वे बस प्रतीक्षा करते हैं कि उनके विवाह हेतु सहमत न हो रहे उनके वृद्ध अभिभावक की मानसिकता उनके पक्ष में परिवर्तित हो और उनका शुभ-विवाह उनके आशीष से ही सम्पन्न हो। 

समय का चक्र चलता भी है और वक़्त बदलता भी है। ज़मींदार साहब की ज़मींदारी चली गई है, अब वे धनी नहीं हैं; चंद्रमुखी का विवाह करना तो दूर, अब स्थिति यहाँ तक आ गई है कि चंद्रमुखी को घर चलाने हेतु ग्राम के विद्यालय में नौकरी करनी पड़ रही है। विद्यालय की आर्थिक स्थिति भी शोचनीय है। सब जान गए हैं कि इसी ग्राम से निकला बिरजू आज महानगर में पंडित बृजमोहन बनकर बहुत धन कमा रहा है तथा यदि वह विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रम में अतिथि बनकर आ जाए तो विद्यालय को बहुत बड़ा सहारा मिल जाएगा। पर उसे आमंत्रण देने कौन जाए कि वह आने से मना न कर सके? चंद्रमुखी? क्या वह आएगा? और आएगा तो क्या होगा? इस कथा का सुखद अंत कैसे हो सकता है? 
राही मासूम रज़ा द्वारा लिखित इस मनभावन एवं हृदयस्पर्शी कथा को कनक मिश्रा के सुघड़ निर्देशन तथा राजकमल के कालजयी संगीत ने ऐसा रूप प्रदान किया है कि इसे चाहे जितनी बार देखा जाए, जी नहीं भरता। यह वह फ़िल्म है जिसने अरूण गोविल नामक युवक को हिंदी फ़िल्म संसार के आकाश में सितारा बनाया। नायक-नायिका के रूप में अरूण गोविल तथा ज़रीना वहाब का चयन सर्वोपयुक्त था क्योंकि ये दोनों ही इस फ़िल्म में पारम्परिक सौंदर्य की कसौटी पर नहीं कसे जा सकते लेकिन अपने-से लगते हैं मानो गाँव या कस्बे में अपने पासपड़ोस या गलीमोहल्ले के कोई लड़के-लड़की हों। इनकी जोड़ी ऐसी लगती है जैसे ये एकदूसरे के लिए ही बने हों। दोनों ने ही अपनी स्वाभाविक अभिनय प्रतिभा का प्रमाण दिया है। हिंदी फ़िल्मों के कुछ रूमानी दृश्य ऐसे हैं जो भुलाए नहीं भूलते तथा जिन्हें बार-बार देखने का मन करता है। इस फ़िल्म में भी शीर्षक गीत (तुम्हें गीतों में ढालूंगा, सावन को आने दो) से ठीक पूर्व बिरजू तथा चंद्रमुखी का एकदूसरे को निहारना एवं ख़यालों में खो जाना ऐसा ही एक दृश्य है।

जिन लोगों ने भारतीय फ़िल्मों के इतिहास की सफलतम फ़िल्मों में से एक 'दिलवाले दुलहनिया ले जायेंगे' (१९९५) देखी है, वे उस फ़िल्म में नायिका के पिता के रूप में अमरीश पुरी के चरित्र की तुलना 'सावन को आने दो' में अमरीश पुरी द्वारा निभाए गए नायिका के पिता के चरित्र से कर सकते हैं। अमरीश ने जैसा उत्कृष्ट अभिनय 'दिलवाले दुलहनिया ले जायेंगे' में किया, वैसा ही उत्कृष्ट अभिनय वे उसके सोलह वर्ष पूर्व आई फ़िल्म 'सावन को आने दो' में कर चुके थे। न केवल इन दोनों फ़िल्मों में उनकी भूमिकाओं में समानता है वरन इन दोनों ही फ़िल्मों की भावनात्मक अंतर्धारा में भी समानता है (यद्यपि कथाएं भिन्न हैं)। दोनों ही फ़िल्मों के अंतिम दृश्य में नायिका के पिता जो पूर्व में उसके नायक को अपना जीवन साथी बनाने के विरूद्ध थे, उसके नायक के साथ संबंध को स्वीकार कर लेते हैं किन्तु जो नयनों में अश्रु ला देने वाली बात 'सावन को आने दो' के अन्तिम दृश्य में है, वह 'दिलवाले दुलहनिया ले जायेंगे' के क्लाईमेक्स में नहीं है। 'सावन को आने दो' के अंतिम दृश्य में इस फ़िल्म का अंतिम गीत भी है - तेरी तसवीर को सीने से लगा रक्खा है, हमने दुनिया से अलग गाँव बसा रक्खा है। इस गीत के चलते-चलते ही फ़िल्म समाप्त होती है, किसी भी पात्र का कोई संवाद नहीं है, बिना कुछ कहे ही नायक, नायिका तथा नायिका के पिता के मध्य सब कुछ कह दिया जाता है।
फ़िल्म के अधिकांश दृश्य राजश्री की परम्परा के अनुरूप सादगी से परिपूर्ण हैं तथा ग्रामीण परिवेश को छायाकार रामचंद्र ने अत्यंत सुंदरता से पटल पर उतारा है। प्रकृति का सौंदर्य फ़िल्म के कई दृश्यों में बिखरा हुआ है विशेषतः शीर्षक गीत वाले दृश्य में जिसमें एक मोर को भी नृत्य करते हुए दिखाया गया है। एच वी महारूद्र शेट्टी का कला-निर्देशन तथा अन्य तकनीकी पक्ष भी उत्कृष्ट हैं। गीतांजलि के रूप में रीटा भादुड़ी तथा छोटी-छोटी भूमिकाओं में विभिन्न सहायक कलाकारों ने भी अपने-अपने चरित्रों के साथ पूर्ण न्याय किया है।

फ़िल्म के प्राण इसके गीतसंगीत में बसे हैं। जैसे सुंदर गीत गौहर कानपुरी, फ़ौक जामी, माया गोविंद, इंदीवर, पूर्ण कुमार होश, मदन भारती, अभिलाष तथा पुरुषोत्तम पंकज ने रचे हैं, वैसे गीत तो अब हिंदी फ़िल्मों में मिलना दुर्लभ ही हो गया है। ये गीत वस्तुतः फ़िल्मी गीत न होकर उत्कृष्ट काव्य के उदाहरण हैं। संगीत-निर्देशक राजकमल ने बहुत कम फ़िल्मों में संगीत दिया लेकिन वे कितने प्रतिभाशाली थे, 'सावन को आने दो' की सुमधुर धुनें इसका प्रमाण हैं। येसुदास, हेमलता, आनंद कुमार, जसपाल सिंह, कल्याणी मित्र तथा सुलक्षणा पंडित के स्वरों में गूंजते गीत ऐसे हैं जो किसी भी सच्चे संगीत-प्रेमी के हृदय में जीवन भर के लिए बस जाएं। कुल दस गीतों के अवलम्ब से फ़िल्म की कथा आगे बढ़ती है तथा ये दस-के-दस गीत भारतीय फ़िल्म संगीत के कोष के अनमोल रत्न हैं। मैं पूर्ण सूची दे रहा हूँ:

१. चाँद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा
२. जानम, तेरा मेरा प्यार नया है, गीत पुराना साज़ नया है
३. तुम्हें गीतों में ढालूंगा, सावन को आने दो
४. तुझे देखकर जग वाले पर यकीं नहीं क्यूं कर होगा, जिसकी रचना इतनी सुंदर वो कितना सुंदर होगा
५. गगन ये समझे चाँद सुखी है, चंदा कहे सितारे
६. तेरे बिन सूना मेरे मन का मंदिर, आ रे आ रे आ
७. बोले तो बाँसुरी कहीं बजती सुनाई दे, ऐसा बदन कि कृष्ण का मंदिर दिखाई दे 
८. कजरे की बाती अँसुअन के तेल में,आली मैं हार गई अँखियन के खेल में
९. पत्थर से शीशा टकरा के वो कहते हैं दिल टूटे न
१०. तेरी तसवीर को सीने से लगा रक्खा है, हमने दुनिया से अलग गाँव बसा रक्खा है
      
फ़िल्म के कण-कण में भारतीयता व्याप्त है। एक साफ़-सुथरी पारिवारिक फ़िल्म कैसी होती है, जो जानना चाहे, इस फ़िल्म को देख ले। फ़िल्म में धन-वैभव का व्यर्थ प्रदर्शन नहीं है तथा भारतीय जीवन मूल्यों एवं आदर्शों को स्थान-स्थान पर दर्शाया गया है। नायक-नायिका का प्रेम कोई फ़िल्मी रोमांस नहीं, वह सच्चा प्रेम है जो एक बार किसी को किसी से हो जाए तो फिर किसी और से नहीं हो सकता। यह प्रेम केवल विरह में ही नहीं; मिलन में भी सात्विक है, पावन है। सावन मास की प्रेम-वर्षा में भिगो देने वाली फ़िल्म है यह। यदि आपने जीवन में किसी से सचमुच प्रेम किया है तो फ़िल्म के समापन दृश्य में आपके अश्रु न उमड़ आएं, यह संभव नहीं। 
कुछ वर्ष पूर्व आई एक फ़िल्म में कहा गया था - कुछ कहानियां सच्ची लगती हैं मगर अच्छी नहीं लगतीं जबकि कुछ कहानियां सच्ची तो नहीं लगतीं मगर बड़ी अच्छी लगती हैं। हम जानते हैं कि न तो ऐसे गाँव आज भारत में देखने को मिलते हैं तथा न ही ऐसी प्रेमकथाएं वास्तविक जीवन में घटित होती हैं। लेकिन क्या हमारा मन नहीं चाहता कि ऐसे स्थान, ऐसे लोग, ऐसी कथाएं वास्तविक जीवन में भी हों? यदि वास्तव में ऐसा हो तो यह संसार कितना सुंदर बन जाए !

है न ?

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मंगलवार, 3 अगस्त 2021

उन्हें भी जीने का हक़ है

अपने लेख 'मैं शाकाहारी क्यों हूँ' में मैंने कहा है कि जीवन का जितना अधिकार मनुष्यों को है, अन्य प्राणियों को किसी भी प्रकार उससे कम नहीं है। और क्यों हो कम ? जिस प्रकृति, जिस सबसे बड़ी शक्ति ने संपूर्ण सृष्टि को बनाया है, मानवों को बनाया है; उसी ने अन्य प्राणियों को भी बनाया है। जीवन लेने का अधिकार उसी को है जो जीवन दे सकता है। जब हम किसी को ज़िन्दगी दे नहीं सकते तो अपने स्वार्थ के लिए किसी की ज़िन्दगी लेने का भी हमें कोई हक़ नहीं है। क्या इंसान को दिमाग़ इसलिए मिला है कि वह निरीह जानवरों को ग़ुलाम बनाकर उन पर ज़ुल्म करता रहे और जब अपनी सहूलियत नज़र आए, उनकी जान ले ले ? हरगिज़ नहीं ! लेकिन इंसान की इसी ख़ुदगर्ज़ी ने आज समूची क़ायनात के लिए ख़तरा पैदा कर दिया है, इसी ख़ुदगर्ज़ी ने कुदरत को वक़्त-वक़्त पर अपना क़हर ढाने पर मजबूर कर दिया है, यह याद दिलाने पर मजबूर कर दिया है कि दुनिया आख़िरकार फ़ानी ही है। न जाने कब इंसान की आँखें खुलेंगी, कब वह अपनी ख़ुदगर्ज़ी से निजात पाएगा, कब वह समझेगा कि कुदरत के तवाज़न को बिगाड़कर और मासूम जानवरों का क़त्ल करके वह अपनी ही कब्र खोद रहा है ? कम-से-कम हमारे मुल्क के बेहिस और बेईमान निज़ाम में तो ज़्यादातर लोग आँखों वाले अंधे ही साबित हो रहे हैं। वन-सम्पदा, वन्य जीवन तथा वन्य प्राणियों के संरक्षण की बातें ही होती हैं, वास्तविक धरातल पर तो इसके विपरीत ही होता है। 

बॉलीवुड में इस विषय पर 'माँ' (१९७६), 'सफ़ेद हाथी' (१९७) 'हबारी' (१९७) तथा 'सफ़ारी' (१९) जैसी कई अच्छी एवं सार्थक फ़िल्में बनीं हैं। दक्षिण भारत के निर्माता-निर्देशक एम.एम.ए. चिन्नप्पा देवर तो ऐसे पशु-प्रेमी थे कि प्रायः पशुओं से संबंधित कथाओं पर ही फ़िल्में बनाया करते थे (राजेश खन्ना अभिनीत सुपर हिट फ़िल्म 'हाथी मेरे साथी' उन्हीं का सृजन थी)। लेकिन आज सरकारी पाखंड का हाल यह है कि क़त्लख़ाने तो बेरोकटोक चल रहे हैं लेकिन मदारियों और सर्कस चलाने वालों की रोज़ी-रोटी बंद हो गई है, असली जानवरों को लेकर फ़िल्में नहीं बनाई जा सकतीं (यह काम कम्प्यूटर ग्राफ़िक्स से करना पड़ता है) और फ़िल्म में किसी जानवर को दिखाया जाए तो शुरु में बताना पड़ता है कि फ़िल्म बनाते समय किसी जानवर को नुकसान नहीं पहुँचाया गया था (वैसे चाहे अनगिनत जानवर रोज़ मार डाले जाते हैं पर उसकी छूट है)। बाघ संरक्षण की सरकारी परियोजना पर अब तक करोड़ों फूंके जा चुके हैं लेकिन देश में बाघों की संख्या घटती ही जा रही है। कैसे न घटे जब भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से पेशेवर शिकारी कानून से डरे बिना उन्हें मारते जा रहे हों ? इस विषय पर एक सार्थक फ़िल्म की प्रतीक्षा दीर्घकाल से थी। अमेज़न प्राइम प्लेटफ़ॉर्म पर प्रदर्शित हिन्दी फ़िल्म 'शेरनी' ने इस आवश्यकता को पूरा किया है। इसके निर्देशक हैं अमित मसुरकर तथा इसमें प्रमुख भूमिका निभाई है विद्या बालन ने।

'शेरनी' वस्तुतः एक शेरनी अथवा मादा बाघ की ही फ़िल्म है जिसके लिए कहा जा रहा है कि वह नरभक्षी (आदमख़ोर) बन गई है। वन विभाग के अभिलेखों में इस बाघिन का नाम है - 'टी-12'  सरकारी वन विभाग अपने ढर्रे से कार्य कर रहा है जबकि निकट के ग्रामवासी आये दिन हो रही मृत्युओं से त्रस्त हैं। सरकारी महकमा ग़रीब गाँव वालों को गाहे-ब-गाहे अपने जानवरों को चराने के लिए उस इलाके में आने से मना कर देता है जो उनके लिए एक दूसरी ही दुश्वारी है क्योंकि वे उन्हें चराने के लिए और कहाँ जाएं ? यह सब दो स्थानीय प्रतिद्वंद्वी राजनेताओं के लिए चुनाव में भुनाने का भी विषय बन गया है। ऐसे में एक संवेदनशील स्त्री मंडलीय वन अधिकारी (DFO) के पद पर वहाँ पहुँचती है तथा सभी परिस्थितियों को निष्ठापूर्वक समझती है। वह स्वयं अपने विभाग द्वारा प्रताड़ित है एवं प्रेम-विवाह करने पर भी पारिवारिक सुख से वंचित है क्योंकि नौकरी करने के निमित्त वह अपने पति से दूर रहती है। नौकरी छोड़ना चाहती है पर पति ही नहीं छोड़ने देता क्योंकि उसका वेतन ही परिवार की आय का मुख्य स्रोत है (पति ठीक से नहीं कमा रहा)। अपने कार्यशील एवं निजी जीवन में नितांत एकाकी यह महिला भी उस शेरनी की ही भांति है जिसे स्वार्थी राजनेताओं से लेकर चापलूस एवं भ्रष्ट सरकारी अधिकारी तथा एक संवेदनहीन शिकारी तक सभी मार डालना चाहते हैं। एक स्थानीय ग्राम पंचायत समिति की सदस्या तथा उस क्षेत्र के वन संबंधी मामलों का विशेषज्ञ एक जीव-विज्ञान का प्राध्यापक वस्तुस्थिति को भलीभांति समझते हैं एवं इस नई वन अधिकारी की सहायता करते हैं। सब कुछ समझ-बूझकर यह संवेदना से ओतप्रोत कर्तव्यनिष्ठ महिला न केवल ग्रामवासियों की समस्याओं को सुलझाने का वरन उस शेरनी एवं उसके दो नन्हे शावकों की प्राण-रक्षा का भी संकल्प लेती है। क्या वह सफल हो पाती है ? इस प्रश्न का उत्तर फ़िल्म के अंत में ही मिलता है।
'शेरनी' फ़िल्म में वास्तविक शेरनी अथवा बाघिन को केवल एक ही दृश्य में दिखाया गया है। पर इस फ़िल्म की नायिका भी वस्तुतः एक शेरनी ही है। लेकिन व्यवस्था में जब चहुँओर सभी स्तरों पर स्वार्थी लोग बैठे हों जो अपनी-अपनी रोटियां सेकने के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हों तो चाहे कोई सद्गुणी एवं कर्तव्यपरायण मनुष्य हो अथवा कोई निर्दोष पशु; कहाँ तक संघर्ष करे, कहाँ तक लड़े ? हमारे देश में अधिकतर स्थानों पर व्यवस्था का हाल यही है कि उच्च पदों पर स्वार्थी एवं संवेदनहीन व्यक्ति ही बैठे होते हैं। उचित मानसिकता वाले, योग्य, परिश्रमी, कर्तव्यनिष्ठ एवं संवेदनशील व्यक्ति (यदि वे चापलूसी एवं सेटिंग करने में निपुण न हों तो) उच्च पदों पर पहुँच ही नहीं पाते। उनकी पदोन्नतियां पहले ही रोक दी जाती हैं तथा वे अपने से कम योग्य (कभी-कभी तो सर्वथा अयोग्य) व्यक्तियों के अधीन कार्य करने पर विवश कर दिए जाते हैं। चूंकि उनके अधिकार सीमित होते हैं, अनेक बार वे चाहकर भी उचित कार्य नहीं कर पाते। व्यवस्था उनके हाथ बाँध देती है, उन्हें बेड़ियों में जकड़ देती है। चापलूसों एवं स्वार्थियों की भीड़ में उनकी बात नक़्क़ारख़ाने में तूती की आवाज़ ही साबित होती है। फिर सरकारी नौकरी हो तो उन्हें रास्ते से हटाने का बहुत ही आसान तरीका हमेशा मौजूद होता है - तबादला। 
लेखिका आस्था टिक्कू की यथार्थपरक एवं संवेदनशील कथा को दिग्दर्शक अमित मसुरकर ने बहुत ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। फ़िल्म वन्य जीवन के संरक्षण के संदर्भ में दोनों आयाम प्रस्तुत करती है - यथार्थ अर्थात् जो विद्यमान है एवं आदर्श अर्थात् जो होना चाहिए। प्रमुख भूमिका के लिए विद्या बालन का चयन फ़िल्म के निर्माताओं का सर्वोत्तम निर्णय था क्योंकि विद्या ने प्रमुख पात्र को पटल पर जीवंत कर दिया है। स्वर्गीय संजीव कुमार के देहावसान के उपरांत विद्या ही मुझे एक ऐसी कलाकार लगती हैं जो प्रत्येक भूमिका हेतु उपयुक्त हैं। वे कच्ची मिट्टी के लौंदे की तरह हैं जो हर साँचे में ढल जाता है। अन्य सभी कलाकारों ने भी अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा-पूरा न्याय किया है। मैंने विजय राज़ को प्रथम बार एक गंभीर भूमिका में (एक संवेदनशील प्राध्यापक एवं वन-विज्ञानी के रूप में) देखा। उनके साथ-साथ स्थानीय पंचायत समिति की सदस्या (जो कि एक आदिवासी महिला है) के रूप में सम्पा मंडल का कार्य भी उल्लेखनीय है। संगीत भी अच्छा है एवं फ़िल्म में रखे गए गीत उसकी कथा के अनुरूप ही हैं। सभी तकनीकी पक्ष अत्यंत उच्च कोटि की गुणवत्ता वाले हैं एवं संबंधित लोग भूरि-भूरि प्रशंसा के अधिकारी हैं। इस फ़िल्म को बनाने हेतु इसके निर्माता (टी सीरीज़) भी साधुवाद के पात्र हैं क्योंकि यह फ़िल्म मनोरंजन के निमित्त है ही नहीं। इसका एक-एक दृश्य सच्चाई और सिर्फ़ सच्चाई को उजागर करता है। 

पर्यावरण तथा वन्य जीवन का संरक्षण भाषणों एवं पाखंड से सम्भव ही नहीं है। यह केवल तभी सम्भव है जब इस कार्य से जुड़े व्यक्तियों, विभागों एवं संस्थाओं की नीयत में सत्य उपस्थित हो। कहा कुछ और जाए, किया कुछ और जाए; ऐसे पाखंड के चलते पर्यावरण, पारिस्थितिकीय संतुलन, वन-सम्पदा, वन्य जीवन, पशु-पक्षी आदि सभी उसी प्रकार विनाश की दिशा में अग्रसर होते जाएंगे जिस प्रकार विगत अनेक दशकों से हो रहे हैं। जहाँ तक जीव-जंतुओं का सवाल है, मैं एक बार फिर दोहराता हूँ, उन्हें सिर्फ़ तभी मारा जाना चाहिए जब ऐसा करना अपनी जान बचाने के लिए ज़रूरी हो जाए। अपनी ख़ुदगर्ज़ी के लिए उनकी जान लेना एक ऐसा गुनाह है जिसके लिए कोई माफ़ी नहीं हो सकती। उन्हें भी जीने का हक़ है, सिर्फ़ हमें नहीं। 

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