रविवार, 8 मई 2022

काश्मीरी पंडितों के दर्द की पहली सिनेमाई आवाज़

ऐसा कहा जाता है कि यदि किसी झूठ को बार-बार दोहराया जाए तो लोग उसे सच मानने लगते हैं। कुछ ऐसा ही इस वर्ष प्रदर्शित हिंदी फ़िल्म 'द कश्मीर फ़ाइल्स' के साथ है जिसके निर्माता उसे जनवरी १९९० में काश्मीर घाटी में काश्मीरी पंडितों पर हुए ज़ुल्मों तथा उनके अपने वतन को छोड़ने की मजबूरी पर बनाई गई पहली फ़िल्म बता रहे हैं, बार-बार बता रहे हैं, ढोल बजा-बजाकर बता रहे हैं। उनके इस शोर का मक़सद अपने झूठ को जनता के गले उतारना और अपनी फ़िल्म से ज़्यादा-से-ज़्यादा मुनाफ़ा कमाना है जबकि सच्चाई यह है कि इस तल्ख़ हक़ीक़त पर बनाई गई पहली फ़िल्म थी - 'शीन' (२००४)।

'शीन' काश्मीरी पंडित समुदाय की व्यथा की कथा कहती है एक संवेदनशील एवं आदर्शवादी शिक्षक पंडित अमरनाथ (राज बब्बर) एवं उनके परिवार के कटु अनुभवों के माध्यम से जो उन्हें १९९० में तब हुए जब उन्हें अपना घर, अपनी मिट्टी, अपनी मातृभूमि से पलायन करना पड़ा। आरंभ में वहीं रहने पर कटिबद्ध पंडितजी और उनकी धर्मपत्नी जनक रानी (किरण जुनेजा) अपने लाड़ले बालक की अलगाववादियों के हाथों मृत्यु का कभी न भर सकने वाला घाव अपने हृदय पर लेकर अंततः अपनी पुत्री शीन (शीन) के साथ घाटी में अपना घर छोड़कर जम्मू स्थित विस्थापितों के शिविर में जाने पर विवश हो गए। पंडितजी का हृदय इस तथ्य से विदीर्ण हो गया कि उनका शिष्य शौकत (अनूप सोनी) जिसे वे अपना समझते थे, पाकिस्तान समर्थित अलगाववादियों के साथ हो गया तथा वही उनके पलायन का निमित्त बना। घर एक बार छूटा तो छूटा। लौटना तो एक सपना ही बनकर रह गया - ऐसा सपना जो कभी पूरा न हो सका, जिसके कभी पूरा हो सकने की उम्मीद भी वक़्त के साथ-साथ धुंधली पड़ती चली गई। उनकी पुत्री शीन जो अपने प्रेमी मानू (तरूण अरोड़ा) के साथ विवाह करके अपना एक सुखी संसार बसाने का सपना देख रही थी, शौकत की चलाई हुई गोलियों से घायल होकर उस समय जीवन और मृत्यु के मध्य झूल रही थी जब पंडितजी अपने उत्पीड़ित समाज की अंतहीन व्यथा को जेनेवा में हुए एक सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अभिव्यक्त कर रहे थे और विश्व समुदाय से साथ देने के लिए आह्वान कर रहे थे। गुमराह शौकत की भी आँखें तो खुलीं लेकिन तब जब बहुत देर हो चुकी थी।

'शीन' काश्मीरी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है - बर्फ़। फ़िल्म की नायिका के नाम पर ही फ़िल्म का शीर्षक रखा गया है तथा शीर्षक भूमिका निभाने वाली नवोदित अभिनेत्री को भी उसके वास्तविक नाम को परिवर्तित करके 'शीन' ही नाम दे दिया गया है। फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अशोक पंडित स्वयं मूल रूप से काश्मीरी पंडित ही हैं तथा उन्होंने यह फ़िल्म पूर्ण निष्ठा एवं संवेदनशीलता के साथ बनाई है। जो सत्य है, उसे बिना किसी लागलपेट के यथावत चित्रित किया गया है परंतु बात स्नेह, सहयोग एवं संवेदना की ही की गई है; घृणा की नहीं जबकि वे चाहते तो ऐसा भी कर सकते थे। अट्ठारह वर्ष पूर्व ७ मई, २००४ को प्रदर्शित 'शीन' कोई अत्यन्त श्रेष्ठ फ़िल्म चाहे न हो, एक प्रशंसनीय फ़िल्म निश्चय ही है - अपने ही देश में शरणार्थी बना दिए गए एक उत्पीड़ित समुदाय की असहनीय पीड़ा को स्वर देने वाली सत्यनिष्ठ कृति, काश्मीरी पंडितों के दर्द की पहली सिनेमाई आवाज़। 


एक समीक्षक के रूप में मैं फ़िल्म में कमियां निकाल सकता हूँ - जैसे कि कुछ प्रसंगों को आधे-अधूरे ढंग से चित्रित किया जाना, यह न बताया जाना कि खलनायक शौकत किस प्रकार एक अच्छे युवक से जिहादियों के रंग में रंग जाने वाला मज़हबी अलगाववादी बना, निर्देशक का युवा कलाकारों से उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय न करवा पाना, युवा नायक-नायिका की प्रेमकथा को अधिक महत्व दिया जाना आदि लेकिन एक सार्थक प्रयास की सराहना ही होनी चाहिए, आलोचना नहीं। अनुभवी फ़िल्म निर्देशक महेश भट्ट को इस फ़िल्म के निर्माण हेतु प्रेरणा देने का श्रेय देने वाले अशोक पंडित यदि डॉ० अग्निशेखर द्वारा रचित इस कथा के निर्देशन का कार्यभार किसी अनुभवी एवं निष्णात फ़िल्म दिग्दर्शक को सौंप देते तो सम्भवतः एक अधिक प्रभावी फ़िल्म बनती। पर जैसा कि मैंने पहले ही कहा, अशोक पंडित ने जिस भावना के साथ यह फ़िल्म बनाई है, वह स्तुत्य है तथा सराहना के योग्य है। 

युवा कलाकारों की तुलना में अनुभवी कलाकारों ने बेहतर अभिनय किया है। अनुभवी फ़िल्म तथा धारावाहिक लेखक रमन कुमार ने पटकथा लेखन में भी योगदान दिया है एवं फ़िल्म के संवाद भी लिखे हैं पर उनका काम कुल मिलाकर औसत से ऊपर नहीं उठ सका। तौसीफ़ अख़्तर का पार्श्व संगीत फ़िल्म के भाव को सही ढंग से उभारता है, वहीं बिजोन दासगुप्ता का कला-निर्देशन एवं नदीम ख़ान का छायांकन फ़िल्म को नयनाभिराम रूप प्रदान करते हैं। आँखों को ठंडक पहुँचाने वाले सुंदर दृश्यों से भरी हुई है यह फ़िल्म। और फ़िल्म के गीत-संगीत का तो कहना ही क्या ! जिन संगीत-प्रेमियों ने 'शीन' के गीत सुने हैं, वे मेरी इस बात की पुष्टि करेंगे कि जहाँ समीर ने सुंदर एवं सार्थक गीत रचे हैं, वहीं नदीम-श्रवण ने उन्हें अत्यन्त मधुर धुनों में ढाला है। फ़िल्म के गीतों को सुनना (तथा पटल पर देखना) एक अवर्णनीय अनुभव प्रदान करता है। 

फ़िल्म में कलेजे को चीर देने वाली यह सच्चाई भी दिखाई गई है कि अपने ही देश में शरणार्थी कहलाने का अपमान सहने वाले काश्मीरी पंडितों के साथ सरकारी तंत्र द्वारा उनके लिए लगाए गए शिविरों में कैसा दुर्व्यवहार किया जाता था जो प्रशासन द्वारा उनके जले पर नमक छिड़कना ही था। अपनी इज़्ज़त की ख़ातिर अपना घर छोड़कर आईं पंडित बहूबहनबेटियों की इज़्ज़त इन कैम्पों में भी महफ़ूज़ नहीं थी। भेड़िए यहाँ भी थे । बस उनके चेहरे अलग थे और जिस्मों पर सरकारी वर्दी थी।

फ़िल्म का अंत पीड़ित काश्मीरी पंडित समुदाय के लिए कोई (झूठी) आशाएं तो नहीं जगाता क्योंकि गिरगिट एवं लोमड़ी के मिलेजुले स्वभाव वाले राजनेताओं का वास्तविक रूप कुछ पहले ही दर्शा दिया गया है परन्तु खलनायक के साथ जो बीतती है एवं उसके उपरांत फ़िल्मकार जो संदेश देता है, वह शाश्वत जीवन मूल्यों में आस्था को ही पुनर्स्थापित करता है। उन्हें चाहे कितने ही आघात लगें एवं वे चाहे कितने ही अव्यावहारिक लगने लगें, जीवन के आदर्श अपने मूल स्वरूप में सदैव वांछनीय ही रहते हैं तथा उनसे भटककर कुमार्ग पर चलने वाले देरसवेर जान ही जाते हैं कि वे कहाँ मार्ग भटके थे और क्या पाप कर बैठे थे - यह अलग बात है कि तब उनके पास पश्चाताप करने का भी अवसर न रहे। 

'शीन' गाथा है उन नेकदिल लोगों की जो ज़ुल्म सहकर भी ख़ुद ज़ालिम नहीं बनते। फ़िल्म में स्पष्ट दिखाया गया है कि सीमापार से समर्थन पाए आतंकवादियों तथा उनके साथ जा मिले पथभ्रष्ट मुस्लिम युवकों के घातक लक्ष्य पर काश्मीरी पंडित तथा अन्य हिंदू ही नहीं, सिख तथा वे मुस्लिम भी थे जो उनके विरूद्ध थे एवं ग़ैर-मुस्लिमों की रक्षा करना चाहते थे। अपने पंडित एवं अन्य ग़ैर-मुस्लिम साथियों के हक़ में अपनी जान तक गंवा देने वाले वे मुस्लिम भाई उन दोगले नेताओं, अफ़सरों और पुलिस वालों से बहुत बेहतर थे जिन्होंने पंडितों की मुसीबतों की आँच पर अपनी ख़ुदगर्ज़ी की रोटियां सेकीं और अपने उन फ़रायज़ को अंजाम नहीं दिया जिनको अंजाम देकर वे हालात को बिगड़ने से बचा भी सकते थे और बिगड़ी को बना भी सकते थे। फ़िल्म नफ़रत का पैग़ाम नहीं देती, भाईचारे का ही देती है। 

फ़िल्म के निर्माण हेतु संसाधन लगाए हैं - सुब्रत रॉय की कंपनी सहारा इंडिया ने। सुब्रत रॉय ने अपने जीवन में अगर कुछ ग़लत भी किया तो बहुत-से अच्छे काम भी किए और अच्छे कामों में अपना निस्वार्थ सहयोग भी दिया। 'शीन' फ़िल्म के निर्माण हेतु अशोक पंडित की सहायता करना उनके इसी उदात्त चरित्र का प्रमाण है। 'शीन' को धनार्जन के निमित्त नहीं बनाया गया था, उसके निर्माण का आधार एक पवित्र भाव था। यही कारण है कि जहाँ 'द कश्मीर फ़ाइल्स' इस त्रासदी पर बनाई गई पहली फ़िल्म होने का झूठा प्रचार कर-करके अकूत धन कमा रही है, वहीं 'शीन' वस्तुतः ऐसी प्रथम फ़िल्म होकर भी बिसराई जा चुकी है। इसे यूट्यूब पर घर बैठे ही देखा जा सकता है। मैं सहारा-प्रमुख के उदार हृदय के समक्ष नतमस्तक हूँ एवं नियति के समक्ष उनकी निरूपायता को भी काश्मीरी पंडितों की निरूपायता के समान ही देखता एवं अनुभव करता हूँ। 

मैंने 'शीन' की अंग्रेज़ी में  समीक्षा  सन २०११ में की थी। आज 'द कश्मीर फ़ाइल्स' का अनर्गल प्रचार देखकर रहा नहीं गया तो हिन्दी में भी इस पर लिख दिया। बत्तीस वर्ष पहले जो काश्मीरी पंडितों पर बीती थी, उसका निराकरण न अट्ठारह वर्ष पूर्व 'शीन' के निर्माण तक हो पाया था, न ही ग्यारह वर्ष पूर्व मेरे समीक्षा लिखने तक हो पाया था, न ही आज तक हो पाया है। काश्मीरी पंडितों की आपदा को अवसर बनाकर दूसरों ने बहुत कुछ प्राप्त कर लिया किन्तु उन अभागों को अब तक न्याय नहीं मिला है, अपने घरबार वापस नहीं मिले हैं, अपनी मातृभूमि में पुनः जा बसने का सौभाग्य नहीं मिल सका है। सलमान रुश्दी की एक उक्ति याद आती है - निर्वासन (देशनिकाला) एक अंतहीन मिथ्याभास है जिसमें व्यक्ति सदैव पीछे देखते हुए ही अपने लिए आगे कुछ देख पाता है। कितनी पीड़ादायी अनुभूति होती है यह ! सदा एक मृगमरीचिका का स्वप्न देखते हुए जीना ! और उस स्वप्न को देखते-देखते ही मर जाना !

हे प्रभु, कभी किसी का घर न छूटे। और छूटे तो फिर से मिले। कभी किसी के दिल पर ज़ख़्म न लगें। और लगें तो उन पर मरहम भी लगे। वरना पुराने पड़ते-पड़ते ज़ख़्म लाइलाज नासूर बन जाते हैं। आज जब काश्मीरी पंडितों के लिए आई उस सियह रात के बाद इतना अरसा गुज़र जाने पर भी सियासतदां उनके लिए घड़ियाली आँसू बहाने और गाल बजाने के अलावा कुछ नहीं कर रहे हैं तो ये मज़लूम और बेबस लोग सिर्फ़ यही कह सकते हैं:

                                                    लिखा परदेस किस्मत में 
                                                    वतन को याद क्या करना 
                                                    जहाँ बेदर्द हो हाकिम 
                                                    वहाँ फ़रियाद क्या करना

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बुधवार, 3 नवंबर 2021

पिता-पुत्र संबंध पर बनीं श्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्में

आज (तीन नवम्बर को) मेरे पुत्र सौरव का जन्मदिन है । सामान्यतः माता एवं पुत्र के तथा पिता एवं पुत्री के भावनात्मक जुड़ाव ही विमर्श का विषय बनते हैं क्योंकि प्रायः ऐसा देखा गया है कि भारतीय परिवारों में पुत्री अपने पिता की लाड़ली होती है जबकि पुत्र अपनी माता का लाड़ला होता है । लेकिन पिता एवं पुत्र के मध्य का संबंध भी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं । कई बार पिता अपने पुत्र के प्रति अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त नहीं करते (या बहुत कम करते हैं) लेकिन योग्य पुत्र अपने पिता का गौरव होता है, इसमें कोई संदेह नहीं । पिता के अपनी भावनाओं को मन में दबा लेने तथा पुत्र के साथ संवादहीनता के कारण कभी-कभी पुत्र अपने पिता को ग़लत भी समझने लगते हैं लेकिन अधिकांश उदाहरणों में सत्य यही होता है कि जहाँ एक सफल एवं समर्थ पिता अपने पुत्र को अपने उत्तराधिकारी के रूप में देखना चाहता है, वहीं एक असफल एवं विवश पिता अपने पुत्र को जीवन की प्रत्येक अवस्था में अपने से बेहतर देखना चाहता है तथा यही कामना करता है कि जो कुछ उसने अपने जीवन में भुगता है, उसके पुत्र को न भुगतना पड़े; वह सबल एवं सक्षम बने, अपनी योग्यतानुसार भौतिक जीवन में सब कुछ प्राप्त करे, कभी किसी अभाव का मुख न देखे और सदा सर उठाकर ही जिये, ज़िन्दगी में कभी न हारे । ऐसा हर बाप यही चाहता है कि मेरे ख़्वाब तो पूरे न हुए लेकिन मेरे बेटे के ज़रूर पूरे हों । 

बॉलीवुड ने इस जज़्बाती रिश्ते पर कई फ़िल्में बनाई हैं जिनमें से कुछ बेहतरीन फ़िल्मों की चर्चा मैं इस आलेख में करूंगा । यूँ तो फ़ॉर्मूलाबद्ध फ़िल्में बनाने वाले इस उद्योग ने ऐसी असंख्य पारिवारिक फ़िल्में बनाई हैं जिनमें पिता-पुत्र के मध्य कहीं प्रेम का बाहुल्य तो कहीं तनाव दिखाया गया है । ऐसी स्थापित ढर्रे की फ़िल्मों में पिता-पुत्र तनाव का कारण प्राय: पिता अथवा पुत्र का अपराधी या दुराचारी होना दिखाया गया है । दुनिया (१९६८) तथा त्रिशूल (१९७८) जैसी फ़िल्मों में यह भी दिखाया गया है कि पिता या पुत्र या दोनों को ही एक-दूसरे के साथ अपना संबंध ज्ञात नहीं है । स्कूल मास्टर (१९५९), ज़िन्दगी (१९७६), अवतार (१९८३) तथा बाग़बां (२००३) जैसी फ़िल्मों में स्वार्थी एवं कृतघ्न पुत्र दिखाए गए हैं जो अपने निहित स्वार्थ के लिए पिता को (तथा माता को भी) कष्ट देते हैं तथा आगे चलकर कर्मठ पिता अपने जीवट एवं परिश्रम से पुनः अपना भाग्योदय करते हैं जो कि परजीवी पुत्रों के मुख पर तमाचे सरीखा सिद्ध होता है । लेकिन ऐसी फ़िल्में बहुत कम बनी हैं जिनमें कथावस्तु को पिता-पुत्र के भावात्मक संबंध पर ही  केन्द्रित रखा गया हो (फ़ोकस किया गया हो) । ऐसी कुछ उत्कृष्ट हिन्दी फ़िल्में हैं :

१. सम्बंध (१९६९): प्रदीप कुमार तथा देब मुखर्जी को पिता एवं पुत्र के रूप में प्रस्तुत करती इस फ़िल्म को जिन भावुक लोगों ने देखा है, उनके नेत्र अवश्य ही आर्द्र हो उठे होंगे । भाग्य के झंझावात पिता, माता (अनिता गुहा) एवं पुत्र को पृथक् कर देते हैं जिसके उपरान्त पुत्र अपने एकाकी जीवन में बहुत कुछ सह जाता है । लेकिन उसके पिता कोई बुरे व्यक्ति नहीं हैं । किस्मत की आँधी ही ऐसी चलती है कि सब कुछ बिखर जाता है जिस पर किसी का भी कोई बस नहीं चलता । लेकिन आख़िर पिता और पुत्र मिलते हैं । कुछ समय उन्हें एकदूसरे को पहचानने में लगता है लेकिन भावनाओं से भरा पिता अपने पुत्र को बिना पहचाने भी उसके दुख को जान लेता है, अनुभव कर लेता है एवं बांटने का प्रयास करता है । फ़िल्म का अंत कोई अधिक प्रभावी नहीं लेकिन बिछोह के उपरांत जो कुछ घटता है, वह फ़िल्म देखने वालों को कथा के पात्रों से अभिन्न रूप से जोड़ देता है । प्रदीप कुमार एवं देब मुखर्जी दोनों ने ही हृदयस्पर्शी अभिनय किया है । फ़िल्म में 'अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पे भी कुछ डालो, अरे ओ रोशनी वालों' तथा 'चल अकेला चल अकेला चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला' जैसे कालजयी गीत हैं ।

२. ज़िंदा दिल (१९७५): प्राण तथा ऋषि कपूर की प्रमुख भूमिकाओं वाली यह फ़िल्म व्यावसायिक रूप से बुरी तरह से असफल रही थी लेकिन इसकी विषय-वस्तु बहुत अच्छी है । पटकथा एवं निर्देशन भी यदि अच्छे होते तो कमाल की फ़िल्म बनती क्योंकि बाप-बेटे की भूमिकाओं में प्राण और ऋषि कपूर ने पटकथा से ऊपर उठकर शानदार अभिनय किया है और फ़िल्म को एक बार देखने लायक तो बना ही दिया है । पिता अपने दो पुत्रों में भेदभाव करता है क्योंकि वह जानता है कि जिस पुत्र के प्रति वह पक्षपातपूर्ण ढंग से अन्याय करता है, वह ज़िंदा दिल है जबकि दूसरा पुत्र मानसिक रूप से दुर्बल है जिसके कारण उसकी अतिरिक्त देखभाल करनी होती है । इस फ़िल्म में कठोर बाप और ज़िंदा दिल बेटे के बीच के कुछ दृश्य तो ऐसे हैं कि बरबस ही मुँह से 'वाह' निकल पड़ती है ।

३. शक्ति (१९८२): दिलीप कुमार को पिता तथा अमिताभ बच्चन को पुत्र के रूप में दर्शाती रमेश सिप्पी की यह फ़िल्म चाहे व्यावसायिक रूप से कम चली लेकिन पिता-पुत्र की भूमिकाओं में इन दोनों ही असाधारण कलाकारों ने जान डाल दी । अपने कर्तव्य के प्रति अति-सजग पिता अपने पुत्र से प्रेम तो बहुत करता है लेकिन अभिव्यक्त नहीं करता जिसका परिणाम यह निकलता है कि पुत्र अपने पिता को ग़लत समझने लगता है एवं अनायास ही भावनात्मक रूप से एक अपराधी के निकट आ जाता है जबकि पिता से दूर होता चला जाता है । यह दुखांत फ़िल्म भावनाओं की अभिव्यक्ति के महत्व को रेखांकित करती है एवं दिलीप कुमार तथा अमिताभ बच्चन, दोनों की ही श्रेष्ठ फ़िल्मों में गिनी जाती है । इससे कुछ-कुछ मिलती-जुलती फ़िल्म 'स्वर्ग यहाँ नरक यहाँ' (१९९१) थी जिसमें मिथुन चक्रवर्ती ने पिता और पुत्र की दोहरी भूमिका निभाई थी लेकिन वह फ़िल्म ख़राब पटकथा एवं कमज़ोर निर्देशन के कारण बोझिल बन गई तथा दर्शकों को अधिक प्रभावित नहीं कर सकी । 

४. शराबी (१९८४): अमिताभ बच्चन को ही बेटे के रूप में पेश करती प्रकाश मेहरा की यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर अत्यधिक सफल रही थी । व्यवसाय में डूबे पिता की भूमिका प्राण ने निभाई थी ।  मातृहीन पुत्र अपने पिता की उपेक्षा के कारण शराबी बन जाता है जिसे स्नेह केवल अपने पिता के एक कर्मचारी मुंशी जी (ओम प्रकाश) से मिलता है । इस कथा में पिता अपने पुत्र की भावनाओं से अनभिज्ञ रहता है एवं उसे ग़लत समझता है । मुंशी जी का निधन शराबी पुत्र को और भी एकाकी बना देता है किन्तु अंत में पिता को अपनी भूल अनुभव होती है तथा फ़िल्म 'शक्ति' के विपरीत सुखद ढंग से समाप्त होती है । बेहद मनोरंजक यह फ़िल्म यकीनन देखने लायक है जिस में प्राण और अमिताभ बच्चन, दोनों का अभिनय कमाल का है ।

५. नाजायज़ (१९)महेश भट्ट द्वारा दिग्दर्शित यह फ़िल्म एक ऐसे पिता की कहानी है जो एक सीधा-सादा व्यक्ति होते हुए भी परिस्थितियों के कारण अपराधी बनने पर विवश हो गया । उसका अपनी विधिवत् विवाहित पत्नी से एक जायज़ पुत्र है तथा असाधारण परिस्थितियों में एक स्त्री के निकट आ जाने से उत्पन्न एक नाजायज़ पुत्र है । नाजायज़ पुत्र की माता को उसके पिता से सच्चा प्रेम है तथा उसे अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं है । पिता अपने दोनों ही पुत्रों तथा उन दोनों ही की माताओं से सच्चा प्रेम करता है एवं यही चाहता है कि उसके दोनों ही पुत्र अपराध-जगत से दूर रहकर सद्गुणी मनुष्य बनें । इसीलिए वह अपने नाजायज़ पुत्र के पुलिस अधिकारी बनने से बहुत प्रसन्न है एवं अपने जायज़ पुत्र को अपराधी बनने से रोकने हेतु भरसक प्रयास करता है । नाजायज़ पुत्र को जब ज्ञात होता है कि उसका पिता कौन है तो जैसे उस पर वज्रपात होता है और फिर उठता है भावनाओं का ज्वार । यह दुखांत फ़िल्म पिता के  दोनों पुत्रों के एक ही परिवार का अंग बन जाने के साथ समाप्त होती है । पिता की भूमिका में नसीरूद्दीन शाह तथा नाजायज़ पुत्र की भूमिका में अजय देवगन ने तो मर्मस्पर्शी अभिनय किया ही है, पिता के जायज़ पुत्र की भूमिका में दीपक तिजोरी तथा दोनों माताओं की भूमिकाओं में आभा धुलिया एवं रीमा लागू ने भी दर्शकों के मन को छू लिया है ।

६. एहसास (२००१): ज़िन्दगी को बहुत नज़दीक से देखने वाले निर्देशक महेश मांजरेकर ने यह उत्कृष्ट फ़िल्म बनाई थी जिसके साथ न तो दर्शकों ने न्याय किया, न ही समीक्षकों ने । अपनी ज़िन्दगी में हारने वाला पिता (सुनील शेट्टी) अपने पुत्र (मयंक टंडन) को अपने जैसा नहीं बनते देखना चाहता तथा उसे उसके जीवन में विजेता बनाने के लिए वह उसे इतने कठोर अनुशासन में रखता है कि वह बालक अपने पिता को ग़लत समझने लगता है । उसके पिता उसे कितना प्यार करते हैं, यह बात वह बालक फ़िल्म के अंत में जाकर समझ पाता है । फ़िल्म को पूर्ण रूप से यथार्थपरक रखा गया है, यहाँ तक कि क्लाईमेक्स में भी फ़िल्मी फ़ॉर्मूला न अपनाकर वही दिखाया गया है जो उन परिस्थितियों में संभव था । दिल की गहराई में उतर जाने वाली यह फ़िल्म जिन माता-पिताओं ने नहीं देखी है, मैं उनसे यही कहूंगा कि इसे ज़रूर देखें । सुनील शेट्टी और मयंक टंडन, दोनों ही अपने काम से फ़िल्म देखने वालों का दिल जीत लेते हैं । एक ऐसी ही अच्छी फ़िल्म गोविंद निहलानी द्वारा निर्देशित 'विजेता' (१९८२) थी जिसमें पिता की भूमिका शशि कपूर ने तथा पुत्र की भूमिका उनके वास्तविक पुत्र कुणाल कपूर ने निभाई थी लेकिन पिता-पुत्र संबंध उसकी कथा का केवल एक अंश ही था । 

७. अपने (२०७): धर्मेन्द्र तथा उनके दोनों वास्तविक पुत्रों सन्नी देओल एवं बॉबी देओल को लेकर बनाई गई इस फ़िल्म का निर्देशन अनिल शर्मा ने किया है एवं यदि वे फ़िल्म के अंतिम भाग को खींचने के प्रलोभन से बच पाते तो यह एक अत्यन्त श्रेष्ठ फ़िल्म बनती । फिर भी एक जीवन से हारे हुए पिता द्वारा अपने व्यावहारिक कर्तव्य को प्राथमिकता देने वाले अपने ज्येष्ठ पुत्र को ग़लत समझने की कथा पर बनाई गई यह फ़िल्म अपने अधिकांश भाग में प्रभावी है । यद्यपि बॉबी देओल भी फ़िल्म में हैं एवं वास्तविक जीवन के अनुरूप ही वे धर्मेंद्र के कनिष्ठ पुत्र बने हैं, तथापि यह फ़िल्म वस्तुतः धर्मेंद्र एवं सन्नी देओल की ही है । पिता का दर्द कुछ और है, पुत्र का कुछ और । इन दोनों के बीच पिस रही माता (किरण खेर) किससे शिकायत करे और क्या शिकायत करे ? सभी कलाकारों के प्रभावशाली अभिनय से सजी यह फ़िल्म व्यावसायिक रूप से सफल तो नहीं रही थी लेकिन कुछ ख़ामियों को अनदेखा किया जाए तो कुल मिलाकर अच्छी ही है । 

८. उड़ान (२०१०): 'उड़ान' एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें पिता का चरित्र विशुद्ध नकारात्मक है । मन को झकझोर देने वाली यह फ़िल्म किशोर पुत्र के अपने क्रूर पिता की बेड़ियों से मुक्त होकर जीवन में स्वतंत्र उड़ान भरने की स्थिति में पहुँचने की गाथा है जिसमें पुत्र के यौवन एवं साहस के समक्ष अंततः पिता को पराजय स्वीकार करनी पड़ती है । समीक्षकों द्वारा मुक्त-कंठ से सराही गई एवं अनेक पुरस्कार जीतने वाली इस फ़िल्म में पुत्र की प्रेरक भूमिका रजत बारमेचा ने एवं पाषाण-हृदय पिता की भूमिका रोनित रॉय ने निभाई है और दोनों ने ही अविस्मरणीय अभिनय किया है । मनोज बाजपेयी के सुन्दर अभिनय से सजी 'गली गुलियां' (२०१८) में पिता-पुत्र (नीरज काबी-ओम सिंह) का ट्रैक भी कुछ-कुछ ऐसा ही है लेकिन 'गली गुलियां' अपनी एक अलग श्रेणी की फ़िल्म है और यह बात उसे देखे बिना नहीं समझी जा सकती । 

९. पटियाला हाउस (२०११): क्रिकेट के साथ-साथ इंग्लैंड में नस्लभेद की समस्या की पृष्ठभूमि में बनाई गई निखिल आडवाणी की यह फ़िल्म यदि रटे-रटाये फ़ॉर्मूलों का लोभ संवरण कर पाती तो इसकी गुणवत्ता बहुत उच्च होती । तथापि पिता ऋषि कपूर एवं आज्ञाकारी पुत्र अक्षय कुमार के बीच के उलझे हुए संबंंध को यह फ़िल्म बहुत प्रभावी ढंग से प्रदर्शित करती है जिसमें दोनों ही कलाकारों का अभिनय अत्यन्त प्रशंसनीय रहा है । पिता की भावनाएं आहत न हों, इसके लिए पुत्र अपनी उमंगों का दम घोट देता है एवं अपनी युवावस्था के स्वप्नों का बलिदान कर देता है । लेकिन वर्षों के अंतराल के उपरांत जब उसे अपनी प्रतिभा के साथ न्याय करने का अवसर मिलता है तो वह दुविधा में पड़ जाता है - एक ओर उसका अपना जीवन है, दूसरी ओर पिता की भावनाएं । जब वह पिता की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाता है तो पहले तो पिता उसे ग़लत ही समझता है लेकिन फिर उसके अंदर आया बदलाव फ़िल्म को ख़ुशनुमा ढंग से ख़त्म करता है । 

. फ़रारी की सवारी (२०१२): आज आदर्शवादी लोग ढूंढे नहीं मिलते । ऐसे में एक आदर्शवादी पिता एवं उसके वैसे ही आदर्शवादी पुत्र की यह कथा न केवल भरपूर मनोरंजन करती है वरन मर्म को स्पर्श करती है तथा एक फ़ीलगुड अनुभूति करवाती है, यह आशा बंधाती है कि इस स्वार्थाधारित समाज तथा मूल्यों के क्षरण के युग में भी अभी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है । आदर्शवादी लोग सदा तथाकथित व्यावहारिक लोगों से हारें, यह आवश्यक नहीं । एक निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के बालक के स्वप्न भी साकार हो सकते हैं जिसके लिए उसके पिता (तथा दादा क्योंकि फ़िल्म में तीन पीढ़ियों वाला परिवार है जिसमें सभी पुरुष हैं) का अपने आदर्शों से समझौता करना आवश्यक नही । बड़े पहले स्वयं आदर्शों पर चलें, तभी वे बालकों को आदर्शों पर चलने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, इस सत्य को यह फ़िल्म स्पष्ट रूप से उद्घाटित करती है । सभी कलाकारों के सजीव अभिनय से ओतप्रोत यह फ़िल्म एक पारसी परिवार में पिता रुस्तम (शर्मन जोशी), पुत्र कायो (ऋत्विक साहोर) तथा पिता के पिता बहराम देबू (बोमन ईरानी) के भावनात्मक संबंधों को दिल को छू लेने वाले ढंग से चित्रित करती है । नन्हा पुत्र ऐसा आदर्शवादी बन चुका है कि अपने सपने को पूरा करने के लिए भी उसे अपने पिता का कोई अनुचित कार्य करना स्वीकार नहीं है । यह फ़िल्म मनोरंजन तथा संदेश, दोनों ही की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है ।

बाप-बेटे के रिश्ते को समझना आसान नहीं लेकिन यह रिश्ता बहुत अहम होता है दोनों ही की ज़िन्दगी में । ऊपर वर्णित फ़िल्में इसका प्रमाण हैं । अपने पुत्र का हित चाहने वाला स्नेहपूर्ण पिता नारियल की भांति भी हो सकता है जिसकी अनुशासनप्रियता के कठोर आवरण में ही उसका अपने पुत्र के प्रति निश्छल प्रेम एवं शुभचिंतन अन्तर्निहित हो । बेटे को सोने का निवाला खिलाने वाले लेकिन शेर की नज़र से देखने वाले बाप ऐसे ही होते हैं । शेष सत्य यही है कि बालक से बड़े होते हुए अपने पुत्र को निहारते समय पिता के मन में यही पंक्तियां चलती रहती हैं - 'तुझे सूरज कहूं या चंदा, तुझे दीप कहूं या तारा, मेरा नाम करेगा रौशन जग में मेरा राजदुलारा'

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