Saturday, June 16, 2018

राज़ी: कुछ अनसुलझे सवाल


मेघना गुलज़ार द्वारा निर्देशित फ़िल्म राज़ी बहुचर्चित एवं बहुप्रशंसित रही है तथा इसने पर्याप्त व्यावसायिक सफलता भी प्राप्त कर ली है । मैंने भी इस फ़िल्म को सिनेमाघर में देखा और इससे बहुत प्रभावित हुआ । फ़िल्म मनोरंजन की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है और एक सौ चालीस मिनट तक दर्शकों को बाँधे रखती है । केंद्रीय भूमिका में आलिया भट्ट सहित सभी कलाकारों ने सराहनीय अभिनय किया है । गीत-संगीत भी श्रोताओं के कानों तथा हृदय को भाने वाला है । एकबारगी देखने के उपरांत यह अपने आपमें थ्रिलर श्रेणी (तथा देशप्रेम श्रेणी) की एक ऐसी फ़िल्म प्रतीत होती है जिसे एक सम्पूर्ण फ़िल्म कहा जा सकता है । लेकिन क्या वस्तुतः भी ऐसा ही है ?

प्रायः किसी भी अच्छी फ़िल्म को देखने के उपरांत उसके विषय में विचार व्यक्त करते समय सामान्य दर्शकों एवं समीक्षकों दोनों ही के साथ समस्या यह होती है कि वे उसकी अच्छाइयों की रौ में बह जाते हैं और इसीलिए उसके दोषों पर ध्यान नहीं दे पाते । इसलिए फ़िल्म की कमियां अनदेखी (और अनकही) रह जाती हैं । यदि समीक्षक या विश्लेषक ईमानदार एवं निष्पक्ष है तो ऐसा जान-बूझकर तो नहीं होता लेकिन अनचाहे ही सही, हो अवश्य जाता है । वर्षों पूर्व राजकुमार हिरानी निर्देशित एवं आमिर ख़ान अभिनीत थ्री ईडियट्स के मामले में अनेक स्थापित समीक्षकों के और स्वयं मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था । फ़िल्म के मनोरंजक एवं प्रेरक पक्षों ने कुछ ऐसा मन मोह लिया था कि उसके अनेक दोषों पर तत्काल नज़र गई ही नहीं । फ़िल्म को पुनः देखने तथा उसके गुण-दोषों पर वस्तुपरक भाव से पुनर्विचार करने पर ही यह तथ्य उजागर हुआ कि फ़िल्म में अनेक दोष थे जिनके कारण वह केवल प्रशंसा की ही नहीं वरन आलोचना की भी पात्र थी । राज़ी के साथ भी यही हुआ है ।   

फ़िल्म भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ़्टीनेंट कमांडर हरिंदर सिक्का के उपन्यास कॉलिंग सहमत पर आधारित है और ऐसा बारंबार कहा गया है कि यह एक वास्तविक महिला के जीवन की उन वास्तविक घटनाओं की गाथा है जो १९७१ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समयकाल में घटित हुई थीं । उपन्यास में (और फ़िल्म में भी) एक पाकिस्तानी सैनिक परिवार में विवाह करके भारत के लिए गुप्तचरी करने वाली उस युवती का नाम सहमत ख़ान है जिसे कि उपन्यास के लेखक परिवर्तित नाम बताते हैं (अर्थात् वास्तविक नाम कुछ और था) और लेखक का यह भी कथन है कि उस वास्तविक महिला का पिछले साल निधन हो गया था । मैं लेखक महोदय के कथन की सत्यता पर उंगली नहीं उठाना चाहता लेकिन चाहे उसके जीवनकाल में उसके नाम को गोपनीय रखना आवश्यक था, अब तो भारत की उस पुत्री का नाम बताया जा सकता है जिसने अपने देश के लिए बहुत कुछ किया, बहुत कुछ सहा और बहुत कुछ त्यागा । उसके नाम को अब भी गोपनीय रखा जाना तर्कहीन है विशेष रूप से तब जब फ़िल्म के (और उपन्यास के भी) अंत में उसके पुत्र को भारतीय सेना में कार्यरत बताया गया है । यह अनावश्यक गोपनीयता और कथा में उस विवाहिता का सैनिक अधिकारियों से भरे अपने ससुराल में इतनी सरलता से जासूसी करना जो कहीं से भी सहज संभव नहीं लगता, यह संदेह उत्पन्न करता है कि सच्ची बताई जाने वाली कथाएं वास्तव में भी सच्ची ही हों, यह आवश्यक नहीं ।

मेरा उर्दू भाषा का ज्ञान इस मामले में अपर्याप्त सिद्ध हो रहा है कि 'सहमत' जो कि एक स्त्रीलिंग शब्द है, का अर्थ क्या होता है लेकिन हिन्दी में सहमत शब्द का वही अर्थ होता है जो कि फ़िल्म के शीर्षक राज़ी का है अर्थात् वह व्यक्ति जो किसी बात या विचार के लिए अथवा किसी कार्य को करने (या न करने) के लिए रज़ामंद हो, उसके लिए अपनी स्वीकृति प्रदान करे । यह स्वीकृति या रज़ामंदी स्वेच्छा से भी हो सकती है और किसी दबाव में भी । इस कथा की नायिका पाकिस्तान में गुप्तचरी करने और इसके निमित्त एक प्रतिष्ठित पाकिस्तानी परिवार की पुत्रवधू बनने का कार्य अपनी स्वेच्छा से करती है और इसके लिए उसका तर्क है अपने देश की सेवा । लेकिन गहराई से देखने पर यह उद्देश्य उथला-सा प्रतीत होता है और जो कुछ भी नैतिक-अनैतिक उसके द्वारा किया जाता है, उसे न्यायोचित ठहराने की एक खोखली चेष्टा ही लगता है । यदि देशसेवा के नाम पर दूसरे देश में जाकर स्वयं पर विश्वास करने वाले भले लोगों को धोखा देना और निर्दोषों की हत्याएं करना न्यायोचित है तो जो लोग धर्म या अपने देश के हित के नाम पर हमारे देश में यही सब करते हैं, उन्हें हम कैसे ग़लत ठहरा सकते हैं ? नायिका को पाकिस्तान द्वारा ग़ाज़ी नामक पनडुब्बी से भारतीय जहाज़ आईएनएस विक्रांत पर किए जाने वाले हमले की योजना की सूचना एवं दस्तावेज़ भारत में खुफिया एजेंसी के संबन्धित लोगों तक पहुँचाते हुए दिखाया गया है और इसी आधार पर उसके कार्यकलापों को जायज़ ठहराया गया है लेकिन ये तथ्य न तो प्रामाणिक हैं और न ही ऐसी गोपनीय बातें इस तरह से खुलेआम की जाती हैं जिस तरह से फ़िल्म में नायिका के ससुराल वालों को करते हुए दिखाया गया है । यह सब कुछ सतही-सा लगता है जिसे केवल इसीलिए दिखाया गया है कि येन-केन-प्रकारेण नायिका के किरदार, नज़रिये और करतूतों पर देशप्रेम का ठप्पा लगाकर उन्हें सही करार दिया जा सके ।

कर्नल सिक्का ने अपने उपन्यास में गुप्तचरी नायिका के चरित्र को संवेदनहीन बताया है जो बिना किसी अपराध-बोध के निस्संकोच उन लोगों की हत्याएं करती है जो न केवल उस पर पूरा भरोसा करते हैं बल्कि उसे अत्यंत स्नेह भी करते हैं जबकि फ़िल्म में नायिका को संवेदनशील बताते हुए और अपने अन्तर्मन में अपने किए के अपराध-बोध से जनित पीड़ा को अनुभव करते हुए दिखाया गया है लेकिन वस्तुतः ज़रा ग़ौर करने पर ही उसकी यह संवेदनशीलता उसके चरित्र पर थोपी हुई लगने लगती है और उसका वास्तविक रूप वही दिखाई देने लगता है जो लेखक ने अपने उपन्यास की नायिका का रखा है – कठोर, बेरहम और किसी भी किस्म की नैतिकता या ज़मीर नामक शै को अपने भीतर जगह न देने वाली । फ़िल्म में दिखाई गई घटनाओं की रू में नायिका के किरदार पर चढ़ाए गए वतनपरस्ती के मुलम्मे को ज़रा-सा खरोंचते ही उसके किरदार की असलियत दिखाई देने लगती है जो ख़ुद को छोटी बहन की तरह चाहने वाली अपनी जेठानी को बेहिचक विधवा बना देती है; उस पति को मार डालने को तैयार हो जाती है जो उसे प्यार ही नहीं करता बल्कि उसकी इबादत करता है, उसके समूचे जज़्बात को समझता है और उसे हल्की-सी ठेस तक लगने देना जिसे गवारा नहीं और अपनी जान बचाने के लिए उस बच्चे को अपनी ढाल बनाकर भागती है जो उसे अपनी शिक्षिका के रूप में देखते हुए उस पर पूरी तरह विश्वास करता है । यह सब न तो किसी भी प्रकार का त्याग है और न ही देशसेवा, यह केवल स्वार्थपरता है और कुछ नहीं ।  

राज़ी एक ओवर-रेटेड फ़िल्म है जिसे एक अच्छी फ़िल्म कहा जा सकता है, कोई महान फ़िल्म नहीं । जो महानता इस पर अनेक समीक्षक आरोपित कर रहे हैं, उसका कोई लक्षण इसमें नहीं है क्योंकि किसी भी पुस्तक या फ़िल्म या काव्य की महानता का संबंध उसके आंतरिक मूल्य से होता है जो किसी महान आदर्श को स्थापित करता हो । राज़ी में ऐसा कुछ भी नहीं है । मानवीय मूल्यों के क्रूर हनन पर देशप्रेम का बिल्ला लगा देने से कोई फ़िल्म महान नहीं हो जाती । दूसरा देश चाहे हमसे युद्धरत ही क्यों न हो, उसे और उसके निवासियों को शत्रु कहकर उनके विरूद्ध किए जाने वाले किसी भी कार्य को देशप्रेम के नाम पर उचित नहीं माना जा सकता । अपने पर सच्चे दिल से ऐतबार करने वाले स्नेही लोगों की पीठ में छुरा भोंकने का काम देशप्रेम की चाशनी में डुबोकर करने के बाद भी गुनाह ही रहेगा, सवाब नहीं बन जाएगा । हम और वे पर आधारित यह देशप्रेम अब एक कालातीत संकल्पना है जो आधुनिक मानवीय मूल्यों तथा व्यवहार के निकष पर स्वीकार्य नहीं है । जंग में सब जायज़ है कहकर हर ग़लत को सही ठहराने का काम गुज़रे जमाने की बात है ।

राज़ी को जो चौतरफ़ा वाहवाही मिल रही है, वह इसलिए है कि पाकिस्तान में जाकर और अपने पति तथा ससुराल वालों के प्राणों को कथित देशप्रेम की वेदी पर बलि चढ़ाकर भारत के लिए जासूसी करने का काम एक मुस्लिम लड़की करती है । और तुर्रा यह है कि उस मुस्लिम लड़की को कश्मीरी बताया गया है जिसके पिता भी पाकिस्तान में एक सैनिक उच्चाधिकारी के साथ दोस्ती की आड़ में भारत के लिए जासूसी ही करते थे । आज दुर्भाग्यवश हम उस दौर में हैं जब भारतीय मुस्लिमों पर पाकिस्तान-परस्त होने का ठप्पा बड़ी सहजता से लगाया जा रहा है और वे इस दबाव में रहते हैं कि चाहे जैसे भी हो, यह साबित करके दिखाएं कि वे भारत के साथ हैं । और भारत के साथ होने को साबित करने का साफ़ मतलब यह साबित करना है कि वे पाकिस्तान के खिलाफ़ हैं । ऐसे में एक मुस्लिम लड़की के अपने पाकिस्तानी पति, जेठ और जेठानी की (और उनके नज़दीकी बहुत-से लोगों की) आँखों में धूल झोंककर भारत के लिए जासूसी करने की कहानी को हाथोंहाथ लिया जाना कोई हैरानी की बात नहीं है । वह लड़की यानी सहमत बार-बार भारत को अपना मुल्क बताती है जिसके आगे उसे और कुछ भी वक़त या तवज्जो दिए जाने के काबिल नहीं लगता । लेकिन सच्चाई तो यह है कि कश्मीरी न केवल आज बल्कि जिस ज़माने की यह कहानी है, उस ज़माने में भी अपने आपको हिंदुस्तानी कहने से परहेज़ ही करते थे । एक कश्मीरी मुस्लिम का हिंदुस्तान को अपना मुल्क, अपना वतन बताना और उसी बुनियाद पर पाकिस्तान में जाकर हिंदुस्तान के लिए जासूसी करना इस बात का सबूत है कि इस फ़िल्म में हक़ीक़त का नहीं, हमारे देश के मौजूदा हालात और हुकूमत के मौजूदा मिज़ाज के मद्देनज़र पॉलिटिकल करेक्टनेस का ख़याल रखा गया है । यह इस तथ्य से और भी पुष्ट होता है कि फ़िल्म में सहमत को प्रशिक्षण देने वाले तथा पाकिस्तान में उसकी सहायता करने वाले भी मुस्लिम पात्र ही हैं । ग़ैर-मुस्लिम पात्र तो फ़िल्म में रखे ही नहीं गए हैं । तलवार जैसी साहसी और यथार्थपरक फ़िल्म बनाने वाली मेघना गुलज़ार से ऐसी उम्मीद नहीं थी । उन्होंने ज़मीर, जज़्बात और इंसानियत को ताक पर रखकर चलने वाली गुप्तचर महिला को महिमामंडित किया है और ऐसा करने में कोई महानता नहीं है क्योंकि, जैसा मैंने पहले भी कहा है, यह महिमामंडन केवल एक मुलम्मा है जो बड़ी आसानी से उतर जाता है ।

मेघना गुलज़ार द्वारा निरूपित सहमत ख़ान का चरित्र विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता क्योंकि उसे फ़िल्म के आरंभ में ही अपनी जान पर खेलकर एक गिलहरी को बचाते हुए दिखाया गया है । ऐसी संवेदनशील और दयालु कन्या कुछ ही समय में ऐसी पाषाण-हृदय हो जाए कि निस्संकोच निर्दोषों की जान लेने लगे (चाहे अपना भेद खुलने से रोकने हेतु ही सही),  किसी भी दृष्टि से विश्वास के योग्य तथ्य नहीं लगता । ऐसा दिखाकर अनजाने में ही मेघना ने सहमत को एक काल्पनिक चरित्र के रूप में दर्शा दिया है जो कपोलकल्पित कथा में भी गले नहीं उतरता । उसका अपने पिता (और कथित पारिवारिक परंपरा) की ख़ातिर इस विश्वासघाती कार्य के लिए मान जाना भी स्वाभाविक नहीं लगता (हालांकि इसके लिए भी वह मुल्क के नाम का ही आसरा लेती है जब इस बाबत उससे सवाल होता है) । वह घर के नौकर की हत्या करने के बाद तो रोती है, अपने जेठ की हत्या करने के बाद नहीं (क्या इसलिए कि अब किसी की भी हत्या कर देना उसके लिए सामान्य कार्य हो गया है और क्या इसी वजह से वह अपने पति पर भी पिस्तौल तान देती है) । ये सारी बातें उसके चरित्र को अत्यंत विरोधाभासी बना देती हैं जिसमें कुछ भी आदर्श या सराहनीय नहीं लगता । इसके विपरीत मेघना ने जिस पाकिस्तानी परिवार को दिखाया है उसके (पुराने नौकर को छोड़कर) सदस्य इतने भले, स्नेही और विश्वासी हैं कि उनके इन गुणों के आगे सूरज बड़जात्या के फ़िल्मी परिवार भी कहीं नहीं ठहरते । सहमत के पति इक़बाल को इतना अधिक संवेदनशील और अपनी पत्नी को समझने वाला दिखाया गया है कि जिस किसी भी लड़की को ऐसा देवता-स्वरूप पति मिल जाए उसे अपने पति के चरण धो-धोकर पीने चाहिए क्योंकि प्रेम तो कोई भी कर सकता है, समझने वाले विरले ही मिलते हैं । वह सहमत को भावनात्मक रूप से अपने से जोड़े बिना शारीरिक रूप से भी उसके निकट नहीं जाता है । और मुझे इंतहा तो तब नज़र आई जब सहमत का भेद खुल जाने और यह पता लग जाने कि उसने ही परिवार के नौकर और बड़े बेटे की हत्याएं की थीं, र भी वह उसे ग़लत नहीं समझता बल्कि अपने पिता (पाकिस्तानी सेना के ब्रिगेडियर) के समक्ष उसके दृष्टिकोण को रखते हुए कहता है कि उसने वही किया है जो हम भी अपने मुल्क के लिए करते हैं । इस सबसे उसका किरदार सहमत के किरदार से बहुत ऊपर उठ जाता है । ऐसे विवेकशील, क्षमाशील था दूसरों के दृष्टिकोण एवं स्थिति को समझने वाले लोगों का बहुमत यदि भारत और पाकिस्तान में हो जाए तो दोनों देशों की शत्रुता सदा के लिए समाप्त हो जाए ।

राज़ी फ़िल्म ही नहीं, उसमें आलिया भट्ट का अभिनय भी ओवर-रेटेड ही है । उन्होंने अच्छा अभिनय किया है लेकिन उसे असाधारण या महान अभिनय की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता । वस्तुतः फ़िल्म के अन्य पात्रों ने (विशेषतः इक़बाल की भूमिका में विकी कौशल ने तथा खालिद मीर की भूमिका में जयदीप अहलावत ने) उनसे बेहतर अभिनय किया है । मैं कभी राजा सेन की फ़िल्म समीक्षाओं का कायल नहीं रहा लेकिन पहली बा मैं उनकी समीक्षा में किए गए आलिया के अभिनय के मूल्यांकन से सहमत हुआ हूँ । उन्होंने बिलकुल ठीक कहा है कि आलिया (और इस फ़िल्म में उनके अभिनय के कसीदे पढ़ने वाले भी) मोस्ट एक्टिंग को बेस्ट एक्टिंग समझकर भ्रमित हो गए हैं । सहमत की भूमिका में आलिया इतना अधिक प्रयास करती हैं कि उनके हाव-भावों की स्वाभाविकता नष्ट नहीं तो बहुत कम अवश्य हो जाती है । इस फ़िल्म में उन्होंने पात्र को प्रस्तुत किया है, उसे जिया नहीं ।

सहमत ख़ान जैसी कोई महिला यदि वास्तव में थीं तो उनकी प्रशंसा तथा वंदन अवश्य ही होना चाहिए । लेकिन राज़ी फ़िल्म (तथा कॉलिंग सहमत उपन्यास) की नायिका को आधुनिक युवतियों के लिए आदर्श अथवा रोल मॉडल नहीं माना जा सकता (चाहे ऐसी युवतियां भारतीय हों या पाकिस्तानी) । विश्वासघात और निर्दोषों का रक्तपात कोई सत्कर्म नहीं जिन्हें न्यायसंगत माना जाए और ऐसा करने वाले का महिमामंडन एक अपराध ही है जो धर्म एवं देश सरीखी अवधारणाओं की संकीर्ण व्याख्या करते हुए उनके नाम पर कुमार्ग पर चलने को ही प्रेरित कर सकता है, सुमार्ग पर चलने को नहीं । आज आवश्यकता हम के विस्तार की है जिसमें वे को विलीन  देने का प्रयास सभी समुदायों, सभी धर्मों तथा सभी देशों को करना चाहिए ताकि अंतिम विजय गुप्तचरों एवं सेनाओं की नहीं, मानवता की हो । राज़ी फ़िल्म जो अनसुलझे सवाल पीछे छोड़ती है, उन्हें सुलझाया जाना चाहिए ताकि फिर किसी को सहमत बनने के लिए राज़ी न होना पड़े ।
*****
पुनश्च : यह लेख मैंने २१ मई, २०१८ के हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित नन्दिता पटेल जी के अंग्रेज़ी भाषा में लिखे गए लेख – ‘A spy without a conscience shouldn’t be glorified, even by Bollywood’ से प्रेरणा लेकर लिखा है जिसमें मुझे अपने विचारों एवं भावनाओं का प्रतिबिंब दिखाई दिया । मैं नन्दिता जी के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ । 

© Copyrights reserved 









Wednesday, May 9, 2018

आत्मकथाओं के संसार में बच्चन की आत्मकथा

आत्मकथा लेखन को साहित्य की एक विशिष्ट विधा माना जाता है । आत्मकथा प्रायः वे ही व्यक्ति लिखते हैं जो अपने जीवन में सफलता के किसी लक्ष्य को स्पर्श कर चुके हों तथा जिनके जीवन का अधिकांश भाग व्यतीत हो चुका हो । किसी भी युवा के आत्मकथा लिखने की अधिक सार्थकता नहीं होती क्योंकि उसके जीवन का एक बहुत बड़ा भाग अभी शेष होता है जिसमें उसे कई नवीन एवं अब तक के जीवन से भिन्न अनुभव हो सकते हैं जो उसके व्यक्तित्व एवं विचार, दोनों पर ही गहन प्रभाव डाल सकते हैं । मेरा मानना है कि मनुष्य अपने अनुभवों का ही उत्पाद होता है क्योंकि उसके विचार, धारणाएं एवं दृष्टिकोण उसके खट्टे-मीठे-कड़वे अनुभवों पर ही आधारित होते हैं । अपने जीवन का अधिकांश भाग व्यतीत कर चुका व्यक्ति जब अपने उस अतीत का स्मृतियों में अवलोकन करता है तो अपने अनुभवों की दीर्घ शृंखला में उसे समानताओं की वे लड़ियां (कॉमन थ्रेड्स) मिलती हैं जो उसकी अपनी मानसिकता तथा उसमें अंतर्निहित अवधारणाओं की आधारशिला रखती हैं । जब वह आत्मकथा लिखता है तो अपनी उन्हीं अवधारणाओं को अपने विचारों (जो कि उसके पूर्वाग्रह भी हो सकते हैं) के रूप में प्रस्तुत करता है । यदि वह एक सुलझा हुआ एवं परिपक्व व्यक्ति है तो उसकी वह आत्मकथा पाठकों के लिए तथ्यों, राष्ट्र के इतिहास, समय के प्रवाह के साथ-साथ सामाजिक परिवेश में आए परिवर्तनों तथा ठोस विचारों रूपी रत्नों का भंडार सिद्ध हो सकती है । महात्मा गाँधी की आत्मकथा – सत्य के साथ प्रयोग एक ऐसी ही आत्मकथा है यद्यपि वह उनके जीवन की संध्या में नहीं लिखी गई होने के कारण ऊपर वर्णित कसौटी पर खरी नहीं उतरती क्योंकि वह (संभवतः व्यस्तता के कारण) उनके द्वारा १९२१ के बाद आगे नहीं लिखी जा सकी और इस प्रकार से उनके जीवन की अंतिम चौथाई सदी से अधिक के बहुमूल्य अनुभव उसमें समाहित नहीं हो सके । तथापि यह स्वीकार करना ही होगा कि अपूर्ण होकर भी वह एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक प्रलेख है जिसमें उनके जीवन के रूप में उनके व्यक्तित्व तथा विचारों की झलक है । वैसे भी वे कहा करते थे – मेरा जीवन ही मेरा संदेश है

लेकिन यदि आत्मकथा-लेखक कोई पक्षपाती, आत्मकेंद्रित या अपरिपक्व व्यक्ति हो अथवा ऐसा तिकड़मी हो जो कि उस आत्मकथा को भी अपने किसी स्वार्थ या छवि-मंजन का साधन बनाना चाहता हो तो ऐसी आत्मकथा तथ्यों को विकृत करके पाठकों को भ्रमित करने वाली भी हो सकती है । ऐसी तथाकथित आत्मकथाओं से दूरी ही भली क्योंकि ये अनुपयोगी ही नहीं, हानिकारक भी होती हैं । अपने जीवन में तिकड़मबाज़ी से आगे बढ़ने वाले कई भारतीय राजनेताओं की ऐसी ही आत्मकथाएं विगत कुछ वर्षों में प्रस्तुत हुई हैं जिसमें उन्होंने अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन के समयकाल से सम्बद्ध तथ्यों को कुछ इस प्रकार तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया है जिससे उनके अनुचित कृत्य या तो छुपे रहें या उनका भी औचित्य स्थापित हो जाए । ऐसी आत्मकथाओं में उन्होंने अपनी छवि को दुग्ध-धवल बनाकर प्रस्तुत किया है जबकि दूसरों पर दोषारोपण किए हैं । आख़िर अपनी कमीज़ को सफ़ेद बताने के लिए दूसरे की कमीज़ पर काला रंग तो डालना ही पड़ता है । पढ़ने वाले तो पुस्तक में वर्णित तथ्यों के सत्यापन के लिए जाने से रहे । और जिनके बारे में उल्टा-सीधा लिखा गया है, यदि वे जीवित ही नहीं हैं या कानूनी लड़ाई की सामर्थ्य नहीं रखते हैं तो लेखक महोदय के लिए किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने की संभावना ही नहीं है । अर्थात् जोखिम कोई नहीं और विवादास्पद कथ्य के कारण चर्चित हो जाने से पुस्तक के बिकने की संभावना भरपूर । यही तो चाहिए होता है ऐसे लेखकों को – पैसा और चर्चा । पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की आत्मकथा पर मैं अपने एक अन्य लेख में विस्तार से विमर्श कर चुका हूँ और उसमें उनके द्वारा उद्धृत झूठों को रेखांकित कर चुका हूँ । अब राष्ट्रपति के स्तर के व्यक्ति द्वारा लिखी गई पुस्तक का सत्यान्वेषण कौन करे ? रही बात विक्रय की तो जनता नहीं ख़रीदेगी तो देशभर में (और विदेशों में भी) हज़ारों पुस्तकालय हैं जो उसकी प्रति अवश्य लेंगे उसकी गुणवत्ता के कारण नहीं वरन उसके लेखक की हैसियत (सेलीब्रिटी स्टेटस) के कारण ।

राजनेताओं के अतिरिक्त खिलाड़ी, अभिनेता और व्यवसायी भी आत्मकथाएं लिखते आते हैं । जो भी जीवन में (भौतिक रूप से) सफल हो जाता है (या अपने आपको सफल समझने लगता है), अपनी दृष्टि में आत्मकथा-लेखन का (या यूँ कहिए कि पढ़ने वालों को अपने अमूल्य ज्ञान और उपदेशों से कृतकृत्य करने का) अधिकारी मान बैठता है । सदाबहार अभिनेता देव आनंद ने अपने देहावसान से कुछ वर्षों पूर्व अपनी आत्मकथा लिखी थी जिसमें उन्होंने अपने विभिन्न प्रेम-प्रसंगों पर (अनावश्यक) चर्चा की थी । वह रोचक एवं तथ्याधारित होकर भी एक आत्ममुग्ध व्यक्ति का एकालाप ही थी । एडम गिलक्रिस्ट तथा शोएब अख़्तर जैसे प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ियों ने भी विषय-सामग्री में विवादास्पद टिप्पणियों का तड़का लगाते हुए अपनी आत्मकथाएं प्रस्तुत की हैं । हाल ही में हिन्दी के अत्यंत लोकप्रिय उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक की आत्मकथा का पहला भाग भी न बैरी न कोई बेगाना के शीर्षक से आ गया है और उसे पढ़ने के उपरांत मैं कह सकता हूँ कि वह उनके उपन्यासों की भाँति ही रोचक है । इसे उन्होंने लिखा भी उसी शैली में है ।

लेकिन हिन्दी भाषा में लिखी गई जिस आत्मकथा ने सर्वाधिक प्रसिद्धि और साहित्यिक जगत में सम्मान अर्जित किया है, वह है हिन्दी के मूर्धन्य कवि स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन की चार खंडों में प्रसृत आत्मकथा जिसे सरस्वती सम्मान से पुरस्कृत किया गया है । बीसवीं शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक में अपनी मधुशाला के माध्यम से हिन्दी कविता के परिदृश्य पर छा जाने वाले एवं अन्य अनेक काव्य-संकलनों के माध्यम से हिन्दी कविता के प्रेमियों के हृदय जीत लेने वाले बच्चन जी की आत्मकथा को उनकी कालजयी कृति माना गया है और उसकी उत्कृष्टता को उनकी कविताओं से भी अधिक आँका गया है । इस आत्मकथा के चार खंड हैं – १. क्या भूलूँ क्या याद करूँ, २. नीड़ का निर्माण फिर, ३. बसेरे से दूर, ४. दशद्वार से सोपान तक । मैंने चारों खंड पढ़े लेकिन स्वर्गीय बच्चन जी से क्षमा-याचना के साथ कह रहा हूँ कि कालजयी कहलाने की अर्हता मुझे केवल इसके प्रथम खंड  - क्या भूलूँ क्या याद करूँ में ही दृष्टिगोचर हुई । मैंने असाधारण सत्यनिष्ठा एवं साहस से ओतप्रोत आत्माभिव्यक्ति को समाहित करती इस अद्भुत कृति को एक बार नहीं, अनेक बार पढ़ा और इसकी विस्तृत समीक्षा (अंगरेज़ी में) लिखी । उस समय तक मैंने इसके परवर्ती तीनों खंड नहीं पढ़े थे । जब मैंने चार खंडों में आबद्ध इस आत्मकथा को सम्पूर्ण पढ़ लिया तो मुझे यही लगा कि खंड-दर-खंड इसकी गुणवत्ता में ह्रास ही हुआ अर्थात् प्रत्येक नया खंड अपने पूर्ववर्ती खंड (या खंडों) से कमतर ही निकला । इसका कारण सभवतः यह है कि बच्चन जी की जो बेबाकी क्या भूलूँ क्या याद करूँ में उपस्थित है, वह अन्य खंडों में क्रमशः घटती चली गई है यद्यपि उन्होंने आरंभ में ही महान फ्रांसीसी साहित्यकार मानतेन की आत्मकथा का संदर्भ देते हुए इसे स्वांतः सुखाय अथवा अपने मन की शांति के निमित्त लिखा हुआ बताया है और यह भी कहा है कि सार्वजनिक शालीनता के आग्रह ने उनकी स्पष्टवादिता पर अंकुश लगाया है अन्यथा वे स्वयं को पाठकों के सम्मुख आपादमस्तक नग्न उपस्थित कर देते । मानतेन द्वारा अपनी आत्मकथा में पाठकों से मांगी गई विदा की ही भांति बच्चन जी ने भी अपने पाठकों से अपनी विदा को स्वीकार करने का आग्रह किया है और यह भी कहा है कि अपनी पुस्तक का विषय वे स्वयं हैं और पाठकों के लिए कोई कारण नहीं कि वे अपना समय ऐसे निरर्थक और नगण्य विषय पर व्यय करें । लेकिन कम-से-कम उनकी आत्मकथा का पहला खंड तो एक अद्वितीय रचना ही है जो उनके पूर्वजों के, उनके वंशवृक्ष के तथा उनके अपने जीवन के इतिहास को ही नहीं वरन भारत देश, भारतीय समाज एवं हिन्दी कविता के भी समकालीन इतिहास को पाठकों के समक्ष जीवंत कर देता है ।

बच्चन जी ने दो विवाह किये । उनकी पहली पत्नी श्यामा के जो अपने जीवन के अधिकांश भाग में रूग्णावस्था में ही रहीं तथा उनके आगमन से भी पूर्व उनके अभिन्न मित्र कर्कल की पत्नी चम्पा के सान्निध्य ने ही वस्तुतः उनके भीतर के कवि को जागृत एवं विकसित किया । उन दोनों ही नारियों का असामयिक निधन उन्हें कभी न भरने वाले घाव और जीवनभर की पीड़ा दे गया लेकिन व्यक्ति के आहत अंतःस्थल से उठने वाली ऐसी पीड़ा ही तो कविता की जननी होती है । सुमित्रानंदन पंत जी के शब्दों में – वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान; निकलकर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान । चम्पा और श्यामा दोनों ही अपने जीवन से भी कहीं अधिक अपनी मृत्यु के माध्यम से हरिवंशराय बच्चन के भीतर के कवि को निखार गईं, संवार गईं । अपने वंश के वटवृक्ष तथा अपने संबंधियों से जुड़े विविध तथ्यों एवं गाथाओं के प्रकीर्णन के मध्य अपने जीवन की ऐसी अनुभूतियों एवं भावनाओं को बच्चन जी ने क्या भूलूँ क्या याद करूँ में कुछ इस प्रकार से अंकित किया है कि इस कृति के एक-एक हर्फ़ से उनकी ईमानदारी झाँकती है । पुस्तक के पृष्ठों से गुज़रते हुए पाठक को सब कुछ चित्रपट की भाँति अपने नेत्रों के समक्ष घटित होता-सा प्रतीत होता है और ऐसा आभास होता है मानो वह बच्चन जी के जीवन के अनुभवों की नदी में उनके साथ-साथ बह रहा हो । अपनी आत्मकथा के इस प्रथम भाग में अपने अनुभवों को बाँटते हुए बच्चन जी ने कहीं भी आत्मश्लाघा या स्वयं को दुग्ध-धवल सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया है तथा स्वयं को मानवीय दुर्बलताओं से युक्त एक साधारण व्यक्ति के रूप में ही चित्रित किया है । यह ईमानदारी एवं स्पष्टवादिता ही इस कृति का सबसे बड़ा गुण है जो इसे आत्मकथाओं के संसार में ऐसी उच्चता प्रदान करता है जिसे स्पर्श करना ऐसी किसी अन्य कृति के लिए असंभव नहीं तो अत्यंत कठिन अवश्य है ।

लेकिन कवि या शायर या कथाकार बनना एक बात है, जीवन में भौतिक सफलता प्राप्त करना दूसरी । प्रायः जो भावुकता एवं संवेदनशीलता किसी को सृजन की शक्ति एवं प्रेरणा देती है, वही प्रायः स्वार्थाधारित संसार में उसकी भौतिक सफलता के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा भी बन जाती है । बच्चन जी परम सौभाग्यशाली रहे जो श्यामा जी के निधन के उपरांत जब वे अवसाद रूपी सरिता में डोल रही अपनी जीवन-नैया को संभालने का यत्न कर रहे थे, तब उनके जीवन में तेजी सूरी नामक एक पंजाबी युवती ने प्रवेश किया और लगभग किसी फ़िल्म की पटकथा की भाँति ही सम्पन्न हुए उनके इस द्वितीय विवाह ने ही उनके भौतिक रूप से सफल और समृद्ध जीवन की आधारशिला रखी । तेजी जी भीतर से अत्यंत दृढ़ एवं व्यावहारिक महिला थीं एवं उनका बच्चन जी के प्रति प्रेमासक्त होना एवं उनकी जीवन-संगिनी बनना बच्चन जी के लिए वरदान सिद्ध हुआ । जैसे कवि हृदय बच्चन में कुछ स्त्रियोचित गुण थे, वैसे ही तेजी में कुछ पुरुषोचित गुण थे और इन दोनों का संगम कुछ ऐसा रहा कि वे सम्पूर्ण जीवन एक दूसरे के पूरक बने रहे । तेजी के साथ बच्चन ने अपने भग्न नीड़ का फिर से निर्माण किया और उनके जीवन के इस भाग का विवरण उनकी आत्मकथा के दूसरे खंड नीड़ का निर्माण फिर में है । एक सद्गृहस्थ बनकर बच्चन अपने दो पुत्रों अमिताभ एवं अजिताभ को जीवन में सफलता एवं समृद्धि की असाधारण ऊंचाइयों तक पहुँचने के योग्य बना सके एवं स्वयं भी विदेश जाकर शोधकार्य करने से लेकर केंद्रीय सरकार की सेवा में नियुक्त होने तथा राज्यसभा के मानद सदस्य बनने तक की उपलब्धियां प्राप्त कर सके तो इसमें उनकी हमसफ़र तेजी के साथ ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई । बच्चन एवं तेजी का प्रेम कैसे उद्भूत हुआ एवं कैसे उसने आनन-फानन परिणय का गंतव्य प्राप्त कर लिया, यह पुस्तक को पढ़कर स्पष्ट नहीं होता ।

बच्चन अपनी आत्मकथा के तीसरे खंड का नाम हंस का पश्चिम प्रवास रखना चाहते थे क्योंकि इसमें उनके अपनी विश्वविद्यालय की नौकरी से दो वर्षों का अवैतनिक अवकाश लेकर इंग्लैंड में रहकर आंग्ल कवि विलियम बटलर ईट्स के साहित्य पर शोधकार्य करके केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त करने से जुड़े अनुभवों का विवरण आना था लेकिन लेखन के उपरांत उन्होंने इस खंड को बसेरे से दूर शीर्षक प्रदान किया । इसमें बच्चन ने अपने व्यावहारिक (मूलतः आर्थिक) कठिनाइयों से युक्त अनुभवों के साथ-साथ अपनी अनुपस्थिति में अपनी धर्मपत्नी तेजी पर आई एक विशिष्ट विपत्ति का भी उल्लेख किया है । लेकिन इस खंड में बच्चन के कवि-हृदय की स्वाभाविक संवेदनशीलता के दर्शन कम ही स्थानों पर होते हैं एवं अधिकांश भाग एक रूखे विवरण की भाँति प्रतीत होता है । बच्चन ने इस भाग में और अपनी आत्मकथा के अंतिम खंड दशद्वार से सोपान तक में अपने द्वारा घूमे गए विभिन्न विदेशी स्थलों का वर्णन किया है जो कई स्थानों पर इतना विस्तृत एवं विशिष्ट हो गया है कि पाठक को ऊबा देता है । इसके अतिरिक्त अपनी अनुपस्थिति में अपनी अर्द्धांगिनी पर आई विपत्ति के वर्णन में वे उस स्पष्टता से काम नहीं ले सके जिसका परिचय उन्होंने आत्मकथा के प्रथम खंड में दिया है । सच्चाई के बयान में उनकी इस झिझक का कोई कारण दिखाई नहीं देता । अपनी पत्नी पर कुदृष्टि डालने वाले जिस दुष्ट व्यक्ति की ओर वे संकेत करते हैं, उसका नामोल्लेख करने में कैसा संकोच ? या फिर वे स्वयं ही अपने मन में उस घटनाक्रम को लेकर स्पष्ट नहीं थे जिसके वे साक्षी नहीं थे और जिसके बारे में उन्हें केवल दूसरों से ही जानकारी मिली । बहरहाल इस प्रसंग के विषय में बच्चन ने जो भी कहा, वह कुछ अधूरा-सा (और नाटकीय भी) लगा । इसके अतिरिक्त यह खंड बच्चन की अपने विश्वविद्यालय से मिली उपेक्षा तथा अपनी उपलब्धि को समुचित सम्मान न दिये जाने से उपजी कुंठा को चित्रित करता है । अपनी उस मनोदशा का उनका वर्णन स्वाभाविक तो लगता है, प्रेरक नहीं । अपनी ओर से बच्चन ने इसी खंड के अंत में अपनी आत्मकथा का समापन कर दिया है । संभवतः उन्हें नहीं लगता था कि वे ऐसी एक पुस्तक और लिखेंगे जो उनकी आत्मकथा का चौथा खंड होगी । यह अंतिम खंड एक लंबे अंतराल के उपरांत लिखा गया । 

आख़िर बच्चन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की प्रेरणा से विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़कर पहले आकाशवाणी में लगे और तदोपरांत दिल्ली चले आए । इलाहाबाद भी उनसे छूट गया और अध्यापन का उनका प्रिय कार्य भी । विदेश मंत्रालय में हिन्दी के संवर्द्धन से जुड़ी नौकरी, राज्यसभा की सदस्यता, दिल्ली में रहने के अनुभव, पुत्रों के करियर एवं विवाह, दिल्ली एवं मुंबई के बीच की आवाजाही, देह को घेरने वाले रोग एवं उनका उपचार तथा समय-समय पर की गई विदेश-यात्राओं का लेखा-जोखा है उनकी आत्मकथा के अंतिम खंड –दशद्वार से सोपान तक में । इलाहाबाद में अपने क्लाइव रोड के आवास को उन्होंने दशद्वार नाम दिया था क्योंकि उसमें रोशनी एवं हवा के आगमन हेतु दस खुले स्थान थे जबकि सोपान नामकरण उन्होंने दिल्ली में गुलमोहर पार्क क्षेत्र में बनवाए गए अपने नवीन आवास का किया । दशद्वार से प्रस्थान तथा सोपान में प्रवेश के मध्य सत्ताईस वर्षों की समयावधि में उनके जीवन में क्या-क्या हुआ, यही उनकी आत्मकथा के अंतिम खंड की विषय-वस्तु है । चूंकि उनकी मूल आत्मकथा अपने तृतीय खंड – बसेरे से दूर में ही समाप्त हो गई थी, दीर्घावधि के उपरांत रचा गया यह अंतिम खंड अपनी शैली में प्रथन तीन खंडों से भिन्न है । संभवतः इस प्रक्षिप्त खंड पर बच्चन की उत्तरोत्तर बढ़ती आयु का भी कुछ प्रभाव पड़ा हो क्योंकि वार्धक्य में मनुष्य की बढ़ती हुई वय प्रायः उसके मनोभावों तथा मस्तिष्क की गतिविधियों पर अपना स्नायविक प्रभाव डालती है ।

इस खंड में बच्चन ने ओशो अथवा रजनीश के साथ के अपने संबंध का भी वर्णन किया है और अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिपादित किया है कि ऐसे कथित भगवान भी मानव मन की संकीर्णताओं से मुक्त नहीं हो पाते । बाकी इसमें उन्होंने अपने पुत्र अमिताभ की उपलब्धियों का बखान एक अभिमानी पिता के स्वर में किया है और अमिताभ के प्रति उनका सम्बोधन भी स्नेहयुक्त न होकर आदरयुक्त है जो विचित्र एवं अप्रभावी है । अमिताभ और जया की मैत्री, प्रेम और परिणय का संदर्भ मात्र दिया गया है और १९८२ में फ़िल्म कुली की शूटिंग के दौरान अमिताभ के साथ हुई दुर्घटना और उसके परवर्ती घटनाक्रम को भी पर्याप्त स्थान दिया गया है । लेकिन अमिताभ के जीवन से जुड़ी कतिपय महत्वपूर्ण घटनाओं और तथ्यों को वे छुपा गए (या संभवतः वे उनके बारे में जानते ही नहीं थे) । आत्मश्लाघा तथा दूसरों पर दोषारोपण करके स्वयं को निष्कलंक सिद्ध करने से अपनी आत्मकथा के प्रथम खंड में जो परहेज़ बच्चन ने रखा था, वह परहेज़ बाद के तीन खंडों में दिखाई नहीं देता । इसलिए मुझे ऐसा लगा मानो जिस ईमानदारी के आवरण ने उनके वास्तविक व्यक्तित्व को क्या भूलूँ क्या याद करूँ में ढक लिया था, बाद के खंडों में उसके हट जाने से उनका सच्चा व्यक्तित्व अनायास ही (और उनके अनचाहे ही) पाठकों के सम्मुख अपने वास्तविक रूप में प्रस्तुत हो गया । दशद्वार से सोपान तक में उन्होंने न केवल सुख-सुविधाओं की प्राप्ति (अथवा असुविधाओं से बचने) के निमित्त अपने घोषित आदर्शों के साथ किए गए विभिन्न समझौतों का उल्लेख बिना किसी अपराध-बोध के किया है, वरन कुछ पत्रों के प्रकाशन को लेकर सुमित्रानंदन पंत के साथ हुए अपने विवाद को भी अपने ही दृष्टिकोण से पाठकों के समक्ष रखा है । श्रीमती इन्दिरा गाँधी के सत्ताच्युत होने के उपरांत उनके विरोधियों द्वारा नियंत्रित व्यवस्था ने उन्हें किस प्रकार प्रताड़ित किया, इसका विवरण भी उन्होंने सापेक्ष भाव से ही किया है । उन्होंने सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की अव्यावहारिकता की अप्रत्यक्ष रूप से आलोचना की है लेकिन ऐसा करते समय वे यह विस्मृत कर गए कि निराला जी ने निर्धनता एवं कष्टों भरे जीवन (एवं कारुणिक मृत्यु) को स्वीकार किया, उनकी तरह कभी अपने आदर्शों एवं जीवन-मूल्यों से समझौता नहीं किया । इन्हीं सब कारणों से यह खंड विशेष प्रभावित नहीं करता और बच्चन की मानवीय दुर्बलताओं का आख्यान ही अधिक लगता है । विभिन्न विदेशी स्थलों एवं उनसे सम्बद्ध शुष्क तथ्यों का अनावश्यक और ऊबाऊ विवरण पुस्तक की उपादेयता को सीमित करता है । 

जो एक बात बच्चन की किसी महागाथा सरीखी आत्मकथा को आद्योपांत पढ़ने के उपरांत मुझे खटकी, वह यह थी कि यद्यपि बच्चन का जीवन भारत के स्वाधीनता आंदोलन एवं राष्ट्र के विभाजन के ऐतिहासिक कालखंड का साक्षी रहा, उन्होंने अपनी आत्मकथा में उन घटनाओं तथा उनके कारण राष्ट्र एवं नागरिकों के जीवन में हुई हलचल का कोई विशेष विवरण नहीं दिया । क्या भूलूँ क्या याद करूँ में क्रांतिकारी यशपाल (जो बाद में हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक बने’, उनकी वाग्दत्ता सरीखी प्रकाशो तथा अपने एक अन्य मित्र श्रीकांत के साथ जुड़ी कुछ घटनाओं का विवरण अवश्य है लेकिन ऐसा लगता है कि बच्चन सम्पूर्ण राष्ट्र को उद्वेलित करने वाली विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं से निर्लिप्त अथवा अप्रभावित-से रहे ।

बहरहाल आत्मकथाओं के संसार में बच्चन की आत्मकथा अपना एक विशिष्ट स्थान तो रखती ही है, इसका वस्तुपरक एवं निष्पक्ष दृष्टिकोण से किया गया पारायण भावी आत्मकथा-लेखकों को यह भी बताता है कि एक आत्मकथा में क्या होना चाहिए एवं क्या नहीं होना चाहिए । मेरा अपना यह मानना है कि आत्मकथा में चूंकि व्यक्ति अपने साथ-साथ अनेक अन्य व्यक्तियों का भी उल्लेख करता है, अतः उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि जो कुछ भी वह कहे, वह न केवल प्रामाणिक हो, वरन अन्य व्यक्तियों पर अनावश्यक लांछन लगाने वाला न हो क्योंकि ऐसे अनेक व्यक्ति यदि दिवंगत हो चुके हैं अथवा जीवित तो हैं लेकिन शारीरिक-मानसिक रूप से सक्षम अथवा साधन-सम्पन्न नहीं हैं तो यह निश्चय ही उनके प्रति अन्यायपूर्ण है । आत्मकथा-लेखक जिस तरह अपनी छवि को महत्व देता है, उसी तरह उसे दूसरों की छवि एवं सामाजिक सम्मान का भी महत्व समझना चाहिए एवं यह न भूलना चाहिए कि जब आप अपनी एक उंगली किसी की तरफ़ उठाते हैं तो आपकी उस हथेली की तीन उंगलियाँ ख़ुद आप ही की ओर उठ जाती हैं । 
© Copyrights reserved

Wednesday, May 2, 2018

सुनील और कर्नल मुखर्जी की जुगलबंदी

हम सभी इस बात से वाक़िफ़ हैं कि सुरेन्द्र मोहन पाठक का अगला उपन्यास पिछले पचपन सालों से हमारा मनोरंजन कर रहे सुनील कुमार चक्रवर्ती का एक सौ बाईसवां कारनामा होगा । राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र 'ब्लास्ट' में पत्रकार की नौकरी कर रहे इस लगभग तीस वर्षीय नौजवान से हम उतने ही परिचित हैं जितने कि इसके प्रणेता पाठक साहब से । यह जीवन के ऊंचे मूल्यों को लेकर चलने वाला, हाज़िर-जवाब, शानदार खान-पान का शौकीन, शानदार कपड़े पहनने और ठाठ से रहने का रसिया, एम. वी. आगस्ता अमेरिका बाइक पर शाही ढंग से विचरने वाला और हर किसी की दुख-तकलीफ़ से पिघल कर उसकी मदद करने को तैयार हो जाने वाला चिर-कुंवारा शख़्स १९६३ से पाठकों के दिलों पर राज कर रहा है । 

पाठक साहब ने ऐसे अनेक उपन्यास लिखे हैं जिनमें सुनील एक पत्रकार से इतर एक गुप्तचर की भूमिका में हमारे समक्ष आता है और 'ब्लास्ट' के लिए नहीं बल्कि भारत के लिए, हमारे राष्ट्र के लिए काम करता है । देश के हितों की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों पर खेल जाने वाला यह युवक 'ब्लास्ट' के मालिक और मुख्य संपादक बलदेव कृष्ण मलिक साहब का कर्मचारी ही नहीं बल्कि भारत सरकार के केंद्रीय जाँच ब्यूरो के एक अत्यंत विशिष्ट विभाग स्पेशल इंटेलिजेंस का सदस्य भी है जिसके प्रमुख हैं कर्नल मुखर्जी ।

सुनील की ही तरह कई विश्वासपात्र और योग्य गुप्तचर हैं जो कर्नल साहब के निर्देशों पर देश के हित के लिए काम करते हैं । यहाँ तक कि कई विदेशी मुल्कों में भी स्पेशल इंटेलिजेंस के एजेंट मौजूद हैं । राजनगर में कर्नल मुखर्जी के सुनील के अलावा दो अन्य अत्यंत कार्यकुशल एजेंट हैं – १. विंग कमांडर रामू, २. गोपाल । जैसा कि प्रत्यक्ष है,  विंग कमांडर रामू कर्नल मुखर्जी की ही तरह सेना से जुड़ा रहा  है जबकि गोपाल राजनगर के होटल 'नीलकमल' में वेटर की नौकरी करता है । जिस तरह सुनील की 'ब्लास्ट' की नौकरी उसके जासूसी कारोबार के लिए ओट है, वैसे ही गोपाल की वेटरगिरी उसके लिए है । गोपाल कई भाषाएं जानता है और होटल की नौकरी के दौरान अपने कान खुले रखते हुए लोगों की बातें ग़ौर से सुनता है । फिर जो जानकारी काम की लगे, उसे कर्नल साहब को हस्तांतरित कर देता है ।

कर्नल साहब का एक नौकर है – धर्म सिंह । जब भी सुनील विदेश जाता है, उसका पासपोर्ट, वीज़ा, टिकट तथा अन्य कागज़ात धर्म सिंह ही हवाई अड्डे पर जाकर उस तक पहुँचाता है । सुनील धर्म सिंह पर हमेशा संदेह करता है । उसे लगता है कि धर्म सिंह महत्वपूर्ण सूचनाएं दुश्मनों को लीक कर देता है । लेकिन उसका संदेह सदा ही निराधार सिद्ध होता है जबकि कर्नल मुखर्जी का धर्म सिंह पर विश्वास सही सिद्ध होता है ।

पाठक साहब ने 'ब्लास्ट' के संवाददाता के रूप में अभी सुनील के कुल जमा पाँच ही उपन्यास लिखे थे कि उन्हें इस सीरीज़ में विविधता पैदा करने की ज़रूरत महसूस होने लगी और सुनील का छठा कारनामा – हांगकांग में हंगामा ही ऐसा आ गया जो कि उसे एक जासूस के रूप में पेश करता था । फिर तो सुनील और कर्नल मुखर्जी की जुगलबंदी बराबर चली और क्या खूब चली !

सुनील के कई ऐसे उपन्यास पढ़ते समय हम उसके साथ विदेशों की सैर करते हैं । उनमें हमें विदेशों का ऐसा सजीव और प्रामाणिक चित्रण देखने को मिलता है जिसे करना केवल पाठक साहब के बस की ही बात है और किसी भारतीय लेखक के बस की नहीं । इनमें सुनील जमकर ख़ूनख़राबा करता है, जेल जाता है, जेल तोड़कर भागता है और ऐसे-ऐसे साहसिक काम करता है जिनकी कल्पना उसे एक पत्रकार के रूप में देखते हुए नहीं की जा सकती ।

लेकिन सुनील द्वारा किए जा रहे रक्तपात के बीच भी पाठक साहब ने एक संवेदनशील मनुष्य होने का उसका मूल रूप बनाए रखा है क्योंकि वह, जहाँ तक संभव हो, बिना किसी की हत्या किए अपना काम बना लेने का प्रयास करता है । योरोप में हंगामा में लुईसा पेकाटी उसे एस्पियानेज के खेल का कच्चा खिलाड़ी बताती है क्योंकि वह उसके और उसके साथी के प्राण लेने की जगह केवल उन्हें रस्सियों से बाँधकर छोड़ गया था ।

बसरा में हंगामा और स्पाई चक्र उपन्यासों में हमारी मुलाक़ात त्रिवेणी प्रसाद शास्त्री से होती है जो कि काहिरा में स्पेशल इंटेलिजेंस का कर्ताधर्ता है । कई उपन्यासों में सुनील की टक्कर अंतर्राष्ट्रीय अपराधी कार्ल प्लूमर से होती है तो कई उपन्यासों में सुनील को पाकिस्तान की गुप्तचर सेवा के अधिकारी अब्दुल वहीद कुरैशी को मात देते हुए दिखाया जाता है । कभी सुनील पीकिंग (बीजिंग) जा पहुँचता है तो कभी सिंगापुर तो कभी हांगकांग तो कभी ओस्लो (नार्वे) तो कभी पेरिस तो कभी रोम तो कभी तेहरान लंदन में हंगामा में सुनील 'ब्लास्ट' के लंदन स्थित संवाददाता सरदार जगतार सिंह का सहयोग हासिल करता है जो कि अपनी बातों से पाठकों को हँसा-हँसाकर लोटपोट कर देने में कसर नहीं छोड़ता ।

अमन के दुश्मन और हाईजैक (संयुक्त संस्करण – लहू पुकारेगा आस्तीं का’) बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम पर आधारित हैं । ये पाठक साहब ने इतने भावुक ढंग से लिखे हैं कि इन्हें पढ़कर किसी भी वतनपरस्त की आँखें भर आएं । पाठक साहब हमें यह भी बताते हैं कि सुनील का जन्म भी अविभाजित बंगाल के गोपालगंज नामक स्थान पर हुआ था जो कि अब बांग्लादेश में है ।  
सवाल यह है कि इन सब कारनामों के बीच सुनील की नौकरी कैसे चलती है ? स्पाई चक्र में तो सुनील को डकैती डालकर जानबूझकर गिरफ़्तारी देने के बाद और अदालत से सज़ायाफ़्ता होकर काहिरा की जेल में भी बंद होना पड़ता है । तो फिर वह 'ब्लास्ट' की नौकरी कैसे करता है ? बसरा में हंगामा के अंत में पाठक साहब ने इस सवाल का जवाब दिया है कि जब वह मिशन से लौटकर 'ब्लास्ट' में जॉइन करता है तो तुरंत ही उसे मलिक साहब की लिखित चेतावनी मिल जाती है कि अगर फिर कभी वह इस तरह से बिना सूचना दिए गायब हो तो अपने आपको नौकरी से बर्खास्त समझे ।

एक गुप्तचर के रूप में सुनील का अंतिम उपन्यास ऑपरेशन सिंगापुर  है जो कि इस सीरीज़ का उनसठवां उपन्यास है लेकिन सुनील और कर्नल मुखर्जी की जुगलबंदी सुनील के बासठवें उपन्यास ख़ून का खेल में भी कायम रहती है जिसमें उपन्यास के पूर्वार्द्ध में तो सुनील एक पत्रकार के रूप में ही सक्रिय रहता  है लेकिन उत्तरार्द्ध में वह कर्नल मुखर्जी के सहयोग और मार्गदर्शन से वतन के दुश्मनों को थाम लेता है ।

कर्नल मुखर्जी को आख़िरी बार पाठक साहब ने सुनील के तिरेसठवें उपन्यास नया दिन नई लाश में पलक झपकने जैसी अपीयरेंस में दिखाया है । जिस एकमात्र दृश्य में वे हाज़िरी भरते हैं उसमें सुनील के मौजूद होते हुए भी उनकी आपस में कोई बातचीत या अन्य संपर्क नहीं होता है ।

नया दिन नई लाश के बाद कर्नल साहब सुनील सीरीज़ से विदा हो गए, ख़ून का खेल के बाद सुनील ब्लास्ट के कर्मचारी और पत्रकार के अतिरिक्त किसी अन्य रूप में दिखाई देना बंद हो गया और ऑपरेशन सिंगापुर के बाद पाठक साहब ने सुनील के जासूसी कारनामे लिखने पूरी तरह छोड़ दिए । लेकिन सुनील सीरीज़ के ये उपन्यास जितने भी हैं, काबिल-ए-दाद हैं । रोलरकोस्टर राइड जैसी उत्तेजना और रोमांच देने वाले ये उपन्यास न केवल पाठकों का मनोरंजन करते हैं बल्कि उन्हें अनमोल जानकारियों से नवाज़ते हैं और दिल में वतनपरस्ती का जज़्बा जगाते हैं ।

© Copyrights reserved


Tuesday, April 24, 2018

सेल्यूलॉइड पर लिखी दर्दभरी कविता : अक्टूबर


अक्टूबर फ़िल्म के बारे में विभिन्न समीक्षकों के विचार पढ़ चुकने के उपरांत मैं इस फ़िल्म को सिनेमा हॉल में देखने गया । और जब फ़िल्म के पूरी हो चुकने पर निकास द्वार की ओर बढ़ा तो मेरा दिलोदिमाग मेरे साथ नहीं था । वह इस फ़िल्म के किरदारों के साथ था, उनके जज़्बात को महसूस करता हुआ, सच पूछिए तो उन्हें ख़ुद जीता हुआ । अक्टूबर को एक फ़िल्म या एक कहानी कहना ग़लत होगा । कहानी तो यह है ही नहीं । यह तो एक कविता है – सेल्यूलॉइड पर लिखी एक दर्दभरी कविता । एक ऐसी कविता जिसे रचने के लिए ही नहीं, समझने और महसूस करने के लिए भी एक कवि का दिल चाहिए, संवेदनाओं से ओतप्रोत अंतस चाहिए ।

दशकों पूर्व स्वर्गीय सुनील दत्त ने एक फ़िल्म बनाई थी – दर्द का रिश्ता जिसमें एक पिता के अपनी पुत्री के मरणासन्न होते जा रहे जीवन से जुड़े रिश्ते का दर्द प्रस्तुत किया गया था । फ़िल्म अत्यंत वास्तविक थी क्योंकि उसका कथानक एक दर्दभरे दिल से ही उभरा था । सुनील दत्त ने अपनी दिवंगत जीवन-संगिनी नरगिस के कैंसर के कारण हुए निधन से जागे अपने दिल के दर्द को ही फ़िल्म में उतार दिया था । इसीलिए इस फ़िल्म में वे अभिनय करते हुए दिखाई नहीं देते, पात्र को जीते हुए दिखाई देते हैं ।

और इसके भी दशकों पूर्व अमर हिन्दी कथाकार पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने एक कालजयी हिन्दी कथा का सृजन किया था – उसने कहा था । इस कहानी में नायिका से (लगभग) एकपक्षीय प्रेम करने वाला नायक नायिका द्वारा कहे गए केवल एक वाक्य को हृदयंगम करके उसके पति की जीवन-रक्षा के निमित्त अपना प्राणोत्सर्ग कर देता है । अक्टूबर में मुझे साढ़े तीन दशक पूर्व पुरानी दर्द का रिश्ता और एक सदी पुरानी उसने कहा था का अद्भुत संगम देखने को मिला ।
फ़िल्म का नायक एक अपरिपक्व-सा, अव्यावहारिक-सा युवक है जो अपने ही जैसे युवा सहकर्मियों के साथ होटल प्रबंधन के पाठ्यक्रम के अंतर्गत एक होटल में प्रशिक्षु के रूप में काम कर रहा है । प्रत्येक जगह नुक्स निकालने वाला और ऐसे प्रत्येक नुक्स को अपने ही ढंग से ठीक करने में रुचि रखने वाला यह पात्र व्यावहारिक संसार के लिए अनुपयुक्त-सा (अनफ़िट) ही प्रतीत होता है । उसके पात्र से मैं स्वयं को जोड़ पाया क्योंकि मैं स्वयं भी वैसा ही हूँ । लेकिन ऐसे अनफ़िट लोग ही तो पराये दर्द को अपने दर्द की भाँति अंगीकार कर पाते हैं, अनुभव कर पाते हैं और इसीलिए उसे बाँट पाते हैं ।

नायक की महिला सहकर्मी जिससे न उसकी मित्रता थी, न ही कोई उल्लेखनीय मेलजोल (प्रेम-संबंध की तो बात ही छोड़िए), जब दुर्घटनाग्रस्त होकर कोमा में चली जाती है तो नायक का जीवन ही बदल जाता है जब उसे पता चलता है कि दुर्घटनाग्रस्त होने से पूर्व नायिका ने उसके विषय में पूछा था । नायिका ने जो बात संभवतः सहजभाव से उसे अपना एक सामान्य सहकर्मी समझकर पूछी थी, वह उसके अन्तर्मन में एक ऐसा प्रश्न बनकर पैठ जाती है जिसका उत्तर उसे लगता है कि उसे मालूम है लेकिन वह चाहता है कि नायिका अपनी कोमा की अवस्था से उठकर बैठे और उस संभावित उत्तर की पुष्टि करे । और इसके लिए वह अपने जीवन को केवल नायिका के कोमाग्रस्त जीवन, उसकी चिकित्सा एवं सेवा-सुश्रूषा तथा उसके परिजनों (उसकी माता,भाई एवं बहन) तक सीमित कर देता है । उसके अन्य सहकर्मी (जो नायिका के भी सहकर्मी थे) जीवन में आगे बढ़ जाते हैं लेकिन उसका जीवन उसी एक बिन्दु पर ठहर जाता है । क्यों ? शायद वह जानता है । शायद हम भी जानते हैं । नायिका के मन में क्या था, विश्वासपूर्वक कोई नहीं कह सकता लेकिन नायक तो वही समझता है, जो वह समझना चाहता है । क्या हम सभी कहीं-न-कहीं ऐसे ही नहीं ?

और अपने जीवन के इस दौर में; जब नायिका और उसके परिजनों के साथ वह दैनिक आधार पर जुड़ गया है और उसकी अपनी प्राथमिकताएं समाप्त होकर नायिका के जीवन पर आधारित हो चुकी उनकी दिनचर्या में समा गई हैं, ग़ालिब के शब्दों में वह काम का आदमी न रहकर इश्क़ में निकम्मा बन चुका है; तब वह देखता है कि कथित प्रैक्टीकल जीवन में भावनाओं की नहीं, धन और संसाधनों की महत्ता ही अधिक है । नायिका कभी सामान्य जीवन जी सकेगी या नहीं, यह पूर्णतः अनिश्चित है जिसके कारण उसका चाचा उसे दया-मृत्यु दे दिए जाने के पक्ष में है (ताकि उसकी चिकित्सा पर हो रहे व्यय के कारण होने वाली आर्थिक हानि को न्यूनतम किया जा सके) लेकिन चिकित्सा कर रहे विशेषज्ञ नायिका के परिवार को झूठी आशा बंधा रहे हैं (क्योंकि उनका व्यावसायिक हित नर्सिंग होम में नायिका की लंबी उपस्थिति और चिकित्सा के लंबे समय तक चलने में ही निहित है) । नायिका की माता एक सिंगल मदर है जो कि अपनी शिक्षिका की नौकरी की आय से ही दोनों बच्चों का पालन-पोषण कर रही है । नायिका के इलाज पर हो रहा भारी-भरकम ख़र्च उसकी आमदनी पर बहुत बड़ा बोझ है जिसे सहने के अलावा कोई चारा नहीं है । जननी है, परिस्थितियों के आगे नत होकर अपनी बच्ची को मृत्यु के हवाले कैसे कर दे ? नायक सब कुछ देखता, सुनता, समझता है और बिना किसी के बनाए स्वतः ही इस असहनीय पीड़ा को सह रहे परिवार का अंग बन जाता है । वह इस परिवार के सदस्यों के साथ उदास होता है तो मुसकराता भी है । लेकिन . . .

लेकिन मृत्यु से तो विरले ही जीत पाए हैं । सच्ची-झूठी आशा-निराशा-दुराशा के बीच झूलते इस परिवार को आख़िर अपने प्रिय की मृत्यु के सत्य से साक्षात् करना ही पड़ता है । और जीवन तो फिर भी चलता है जब तक आप स्वयं ही दिगंत में लीन न हो जाएं । अब नायक को भी जीवन में आगे बढ़ना होगा । लेकिन क्या वह बढ़ पाएगा ? क्या वह नायिका की स्मृतियों से स्वयं को विलग करके जीवन जी सकता है ? नहीं ! कदापि नहीं ! विशेष रूप से तब जबकि वह हरसिंगार (पारिजात) का वह वृक्ष अपने साथ ले आया है जिसके अक्टूबर मास में झरने वाले फूल नायिका को बहुत पसंद थे जिसका नामकरण ही उनके नाम पर शिवली किया गया था । जीवन चलेगा । लेकिन यादें भी चलेंगी । जीवन-मृत्यु के बीच डूबती-उतराती नायिका की वह अवस्था नायक को बहुत कुछ सिखा गई है । अब वह अपरिपक्व युवक नहीं रहा । अचानक ही बड़ा हो गया है । 

फ़िल्म का शीर्षक अपने आप में ही बहुत कुछ समेटे हुए है । बहुत कुछ ऐसा जो अनकहा है जिसे बिना सुने ही समझना होता है । हरसिंगार के फूलों को शेफ़ाली भी कहा जाता है (शिवली के सदृश) । फ़िल्म देखते-ही-देखते वर्षों पूर्व कहीं पढ़ी गई एक सुकोमल भावों से भरी कविता की पंक्तियां मेरी स्मृतियों के आकाश में कौंध गईं – सजने और सँवरने के दिन, इक-दूजे पर मरने के दिन, बहती नदिया मन के भीतर, शेफ़ाली के झरने के दिन । हाँ, अक्टूबर ऐसा ही होता है – न शीतल, न उष्ण, कुछ-कुछ सुहाना-सा जिसमें भावनाएँ उमड़ती हैं । कुछ फूल-पत्ते झरते हैं और संसार में अपनी सुगंध बिखेरकर नए फूल-पत्तों के आगमन के लिए स्थान रिक्त कर  देते हैं ।

निर्देशक शुजीत सरकार और लेखिका जूही चतुर्वेदी ने वरुण धवन, बनिता संधू और गीतांजलि राव जैसे कलाकारों के साथ मिलकर इस अनूठी, अलबेली कविता को सिरजा है । शांतनु मोइत्रा द्वारा संगीतबद्ध गीतों को मैंने फ़िल्म में सुना या नहीं, याद नहीं पड़ता । मेरे लिए तो छायाकार अविक मुखोपाध्याय द्वारा किसी सुंदर चित्र की भाँति परदे पर उतारी गई इस फ़िल्म का प्रत्येक दृश्य, प्रत्येक पल ही एक दर्दीले लेकिन सुरीले संगीत में डूबा हुआ गुज़रा । ऐसा संगीत जिसे मैंने कानों से नहीं, आँखों से सुना । यह दर्दभरी कविता अधूरी होकर भी पूरी है, ठीक वैसे ही जैसे जीवन अधूरा होकर भी पूरा होता है ।

© Copyrights reserved



Saturday, March 24, 2018

सुरेन्द्र मोहन पाठक और करेंट अफ़ेयर्स


मुझे सुरेन्द्र मोहन पाठक का थ्रिलर उपन्यास – दहशतगर्दी बहुत पसंद है । मैंने अंग्रेज़ी में इसकी समीक्षा भी लिखी है । मैं इसे उनके बेहतरीन उपन्यासों में शुमार करता हूँ जिनमें न केवल सांसें रोक देने वाला थ्रिल है बल्कि जो समसामयिक तथ्यों को भी बड़े सहज ढंग से प्रस्तुत करते हैं । कश्मीर के आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर लिखे गए इस उपन्यास में वहाँ के हालात को बड़ी बारीकी से परखा और कथानक में उकेरा गया है ।

इस उपन्यास के लेखकीय में पाठक साहब फ़रमाते हैं कि करेंट अफ़ेयर्स की बाबत न केवल उनका ज्ञान कमज़ोर है बल्कि उनमें उनकी कोई स्थाई रुचि भी नहीं है । रुचि की बात सही हो सकती है क्योंकि पाठक साहब का मन तो हूडनिट अर्थात् रहस्यकथा लिखने में ही अधिक लगता है लेकिन जहाँ तक उनके ज्ञान का सवाल है, मैं इस बात से सहमत नहीं कि समसामयिक मुद्दों या ज्वलंत समस्याओं की बाबत उनके ज्ञान में कोई कमी है । अपनी बात को साबित करने के लिए मैं उनके चालीस साल से भी ज़्यादा पुराने उस कथानक का हवाला देना चाहता हूँ जो कि बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम की पृष्ठभूमि पर लिखा गया था । सुनील सीरीज़ का यह कथानक मूल रूप से दो भागों में प्रकाशित हुआ था – 1. अमन के दुश्मन, 2. हाईजैक । बाद में इसका सामूहिक संस्करण लहू पुकारेगा आस्तीं का के नाम से प्रकाशित हुआ ।
मैंने वर्षों पहले लहू पुकारेगा आस्तीं का पढ़ा था और उससे बहुत मुतास्सिर हुआ था । अरसे बाद इस कथानक का मूल संस्करण – अमन के दुश्मन और हाईजैक की सूरत में पढ़ा । पढ़ते-पढ़ते न जाने कितनी बार मैं पाठक साहब के ज्ञान पर चमत्कृत रह गया और न जाने कितनी बार मेरी आँखें भर आईं । पूर्वी पाकिस्तान में पश्चिमी पाकिस्तान की फ़ौजी हुकूमत द्वारा किए गए ज़ुल्मोसितम का दिल दहला देने वाला ख़ाका खींचा है पाठक साहब ने । मुक्तिवाहिनी द्वारा लड़ी गई आज़ादी की लड़ाई की लोमहर्षक और प्रेरणादायक दास्तां है इसमें । पाठक साहब ने इतने सारे आँकड़े दिए हैं और इतने सारे तथ्य प्रस्तुत किए हैं कि अगर किसी को उस दौर के बारे में प्रामाणिक जानकारी चाहिए हो तो इतिहास की पुस्तकों से बेहतर सामग्री उसे सुनील सीरीज़ का यह उपन्यास मुहैया करा सकता है ।

पाठक साहब के ज्ञान की तो बात ही छोड़िए, उनकी दूरदर्शिता का भी आलम यह है कि कश्मीर के जो हालात अस्सी के दशक में बने, उनकी कल्पना उन्होंने बीस साल पहले ही कर ली थी जब यह उपन्यास लिखा गया था क्योंकि आज दानवाकार रूप ले चुकी इस समस्या के पैदा होने का हवाला इस उपन्यास में है । अमन के दुश्मन और हाईजैक को पढ़ने के बाद मैंने पाठक साहब को फ़ोन करके बात की और पूछा कि कश्मीर में जो हालात अस्सी के दशक के आख़िर में जाकर बने और जिनकी बिना पर सन 2000 में उन्होंने ‘दहशतगर्दी’ लिखा, उनको उन्होंने उस ज़माने में कैसे विज़ुअलाइज़ कर लिया था जब अमन के दुश्मन लिखा था । पाठक साहब ने कहा कि भाई, समस्या का बीज तो उस ज़माने में ही पड़ चुका था, बाद में तो वही बीज सियासत का खाद-पानी पाकर पेड़ बन गया ।  
पाठक साहब की दूरदर्शिता का सबूत यह भी है कि हाईजैक मार्च 1971 में प्रकाशित हो गया था और इसमें बांग्लादेश के आज़ाद होने की उम्मीद ज़ाहिर की गई थी जबकि वास्तव में बांग्लादेश दिसंबर 1971 में जाकर आज़ाद हुआ ।

रहस्यकथाएँ और थ्रिलर उपन्यास लिखने में उस्तादी हासिल कर चुके पाठक साहब भावनाओं के भी कुशल चितेरे हैं । यह बात उन्होंने अपने कई उपन्यासों में साबित की है । लहू पुकारेगा आस्तीं का एक ऐसा उपन्यास है जो पत्थर को भी पिघला सकता है । जो इंसान अपने वतन से प्यार करता है, इंसानी रिश्तों की कीमत समझता है और इंसानियत से लबरेज है, वो लहू पुकारेगा आस्तीं का को पढ़कर अश्क बहाए बिना रह ही नहीं सकता ।

लहू पुकारेगा आस्तीं का में मनोरंजन कम है । कई जगह यह किसी दिलचस्प थ्रिलर से ज़्यादा तथ्यों की ख़ुश्कबयानी लगता है । मगर जितेन्द्र माथुर का सवाल यह है कि क्या हम पाठक साहब के उपन्यास कोरे मनोरंजन के लिए ही पढ़ते हैं । अगर पाठक साहब हमारे लिए एक अदीब का दर्ज़ा रखते हैं तो मनोरंजन देने के साथ-साथ उनके उपन्यासों का महत्व इस बात में भी है कि वे हमारे ज्ञान में बढ़ोतरी करते हैं और हमें जीवन में कुछ सार्थक करने के लिए प्रेरित करते हैं ।

पाठक साहब के जिन शैदाइयों ने उनके इस बेहतरीन शाहकार को नहीं पढ़ा है, उनसे मैं इसे पढ़ने की अपील करता हूँ । इन्हें पढ़िए और वतनपरस्ती और इंसानियत के सबक़ को अपने ज़ेहन में फिर से तरोताज़ा कीजिए । 

© Copyrights reserved

Sunday, March 4, 2018

यादों में बदले चाँदनी के लम्हे


२५ फ़रवरी, २०१८ की सुबह फैली इस ख़बर पर कानों ने यकीन करने से इनकार कर दिया कि निर्विवाद रूप से भारतीय रजतपट की सबसे अधिक लोकप्रिय नायिकाओं में से एक – श्रीदेवी नहीं रहीं । भारत में ही नहीं संसार भर में बिखरे उनके करोड़ों प्रशंसकों को एक ऐसा आघात लगा जिससे उबरना तो क्या, जिसे आत्मसात् करना भी अल्पकाल में संभव नहीं । बहुत समय लगेगा हम सभी को इस सत्य को स्वीकार करने में कि अपनी निश्छल-निर्मल  हँसी और मर्मस्पर्शी अभिनय का जादू चलाने वाली और कई भारतीय भाषाओं के दर्शकों के हृदय पर एकछत्र राज करने वाली यह अद्भुत तारिका अब दिगंत में विलीन हो चुकी है, स्मृति-शेष रह गई है ।
(संभवतः पारिवारिक परिस्थितियों के वशीभूत होकर) बाल्यावस्था से ही अभिनय के क्षेत्र में उतर पड़ने वाली श्रीदेवी ने अपने जीवन का अधिकांश भाग एक अभिनेत्री के रूप में कार्य करते हुए व्यतीत किया । तमिल, तेलुगू और मलयालम फ़िल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम करते-करते श्रीदेवी को हिन्दी फ़िल्मों में भी काम मिलने लगा ।  कन्नड़ अभिनेत्री लक्ष्मी को शीर्षक भूमिका में प्रस्तुत करती अविस्मरणीय हिन्दी फ़िल्म जूली(१९७५) में माई हार्ट इज़ बीटिंग गीत पर उस परिवार के सदस्यों की भूमिकाएं निभा रहे कलाकारों के साथ नृत्य करती बालिका श्रीदेवी की स्मृति संभवतः सभी सिने-प्रेमियों को होगी । कमल हासन और रजनीकान्त जैसे दक्षिण भारतीय सितारों के साथ ढेरों फ़िल्में करने वाली श्रीदेवी को किसी हिन्दी फ़िल्म की नायिका के रूप में पहली बार सोलवां साल (१९७९) में देखा गया लेकिन उन्हें पहचान हिम्मतवाला (१९८३) से मिली । उसकी सफलता के उपरांत श्रीदेवी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा । उन्होंने न केवल हेमा मालिनी तथा रेखा सरीखी शीर्षस्थ नायिकाओं के वर्चस्व को तोड़ा वरन जयाप्रदा, रति अग्निहोत्री, पद्मिनी कोल्हापुरे तथा पूनम ढिल्लों जैसी अपनी समकालीन नायिकाओं को लोकप्रियता के मापदंड पर बहुत पीछे छोड़ दिया । अभिनय के साथ ही विभिन्न प्रकार के नृत्यों में भी प्रवीण श्रीदेवी को नगीना (१९८६) और मिस्टर इंडिया (१९८७) ने व्यावसायिक सफलता के नए शिखरों तक पहुँचाया और अंततः वह दिन भी आया जब अपनी आगामी फ़िल्म के लिए नायिका खोज रहे हिन्दी फ़िल्मों के अत्यंत सम्मानित निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा की दृष्टि उन पर पड़ी । 

यश चोपड़ा की विगत तीन फ़िल्में – मशाल (१९८४), ‘फ़ासले (१९८५) तथा विजय (१९८८) व्यावसायिक दृष्टि से असफल रही थीं । रूमानी फ़िल्में बनाने में सिद्धहस्त माने जाने वाले यश चोपड़ा की ये फ़िल्में भिन्न प्रकृति के विषयों पर आधारित थीं । अपनी इन असफलताओं से सबक ग्रहण करते हुए यश जी पुनः प्रेमकथाओं की ओर लौटे और योजना बनी चाँदनी नामक फ़िल्म की । कामना चंद्रा द्वारा लिखित चाँदनी (१९८९) एक त्रिकोणीय प्रेमकथा थी जिसके दो नायकों – ऋषि कपूर तथा विनोद खन्ना (जो पिछले वर्ष ही दिवंगत हुए हैं) के मध्य में अटकी नायिका की शीर्षक भूमिका श्रीदेवी ने निभाई और ऐसी निभाई कि न केवल यह फ़िल्म यश जी को उनकी पुरानी प्रतिष्ठा दिलाने में सफल रही, वरन इसने श्वेत परिधान में लिपटी चाँदनी के रूप में श्रीदेवी को अमर कर दिया । महान संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा तथा महान बाँसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया ने इस फ़िल्म के लिए कालजयी संगीत रचा जिस पर लता मंगेशकर के सुरीले स्वर पर श्रीदेवी ने मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियाँ हैं गीत में कुछ इस तरह से नृत्य-प्रस्तुति दी जो संगीत-प्रेमियों एवं सिने-प्रेमियों दोनों ही के हृदय-पटल पर सदा के लिए अंकित होकर रह गई । इस गीत के अतिरिक्त अन्य गीतों पर भी श्रीदेवी ने संबंधित दृश्यों की आवश्यकताओं के अनुरूप अत्यंत प्रभावशाली प्रस्तुतियां दीं । चाँदनी मेरी चाँदनी गीत में तो उनकी शोख़ आवाज़ भी है जो कान में पड़ते ही सुनने वाले के दिल को गुदगुदा जाती है । केवल गीत-नृत्यों में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण फ़िल्म में श्रीदेवी ने नायिका की भावनाओं को कुछ ऐसी तीव्रता से प्रस्तुत किया कि वह प्रेम कृत्रिम अथवा प्रदर्शनी न रहकर वास्तविकता के निकट जा पहुँचा और ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को गहनता से स्पर्श कर गया जिसने अपने जीवन में किसी को निष्ठापूर्वक प्रेम किया हो । यश जी की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक मानी जाने वाली चाँदनी को आज मुख्यतः श्रीदेवी के कारण ही याद किया जाता है ।

चाँदनी की देशव्यापी सफलता के उपरांत उसी वर्ष चालबाज़ प्रदर्शित हुई जो कि सीता और गीता (१९७२) नामक पुरानी हिन्दी फ़िल्म का रीमेक थी । नायिका-प्रधान मूल फ़िल्म में हेमा मालिनी ने दो पूर्णतः विपरीत प्रकृति वाली जुड़वां बहनों की दोहरी भूमिका निभाई थी । श्रीदेवी ने भी चालबाज़ में वही कमाल कर दिखाया जो हेमा मालिनी ने सीता और गीता में कर दिखाया था । उनके दो भिन्न-भिन्न रूपों ने दर्शकों के दिल जीत लिए ।

इधर यश चोपड़ा ने अपनी नई फ़िल्म की रूपरेखा तैयार की जो पुनः एक प्रेमकथा ही थी लेकिन एक नए प्रकार की प्रेमकथा जिसको पारंपरिक भारतीय दर्शकों की मानसिकता को ध्यान में रखते हुए चित्रपट पर निरूपित करना एक बहुत बड़ा जोखिम था । इसकी कहानी एक युवती के अपने से आयु में बहुत बड़े एक ऐसे पुरुष से प्रेम करने की बात कहती थी जो कि अपनी युवावस्था में उसकी दिवंगत माता से एकपक्षीय प्रेम करता था । यश चोपड़ा ने इस साहसिक कथा को फ़िल्माने का जोखिम उठाया और लम्हे (१९९१) रूपहले परदे पर उतरी । पुरुष की भूमिका में अनिल कपूर को लिया गया लेकिन माता और पुत्री की दोहरी भूमिका के लिए एक बार पुनः यश जी की नज़र जाकर श्रीदेवी पर ही ठहरी । जैसी कि आशंका थी, यह अत्यंत सुंदर फ़िल्म पारंपरिक सोच वाले भारतीय समाज द्वारा स्वीकार नहीं की जा सकी और व्यावसायिक दृष्टि से असफल रही । किन्तु श्रीदेवी ने इस कठिन परीक्षा को उच्च श्रेणी से उत्तीर्ण किया और दर्शकों तथा समीक्षकों दोनों से ही अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवा लिया । राजस्थानी लोकगीत – मोरनी बागां मां बोले आधी रात मां पर श्रीदेवी का प्रदर्शन कौन भूल सकता है ? ‘लम्हे चाहे व्यावसायिक दृष्टि से सफल न रही हो, आज उसेक्लासिक की श्रेणी में रखा जाता है ।

वर्ष १९८७ में फ़िल्म मिस्टर इंडिया के निर्माण के साथ ही श्रीदेवी का संबंध फ़िल्म-निर्माता बोनी कपूर (वास्तविक नाम – अचल कपूर) से जुड़ा । निर्माता के रूप में स्थापित होने का प्रयास कर रहे बोनी कपूर तथा नायक के रूप में इस क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने हेतु संघर्षरत उनके छोटे भाई अनिल कपूर दोनों के ही लिए श्रीदेवी का इस फ़िल्म की नायिका की भूमिका स्वीकार करना मानो वरदान सिद्ध हुआ । साथ ही यह फ़िल्म निर्देशक शेखर कपूर के करियर में भी मील का पत्थर साबित हुई । काटे नहीं कटते ये दिन ये रात’, ‘करते हैं हम प्यार मिस्टर इंडिया से और बिजली गिराने मैं हूँ आई जैसे गीतों पर श्रीदेवी के बिंदास नृत्यों और अभिनय ने धूम मचा दी । संभवतः इस फ़िल्म के बनने की प्रक्रिया के मध्य ही किसी पल बोनी और श्रीदेवी के हृदय के तार जुड़ गए और वह प्रेम आरंभ हुआ जिसकी परिणति एक दशक के उपरांत उनके विवाह में हुई । मुझे याद है कि अपने एक साक्षात्कार में अनिल कपूर ने स्पष्ट कहा था – बोनी ने मेरे लिए केवल एक फ़िल्म वो सात दिन (१९८३) बनाई थी; अपनी अन्य सभी फ़िल्मों का निर्माण उन्होंने केवल श्रीदेवी के लिए किया था । 
श्रीदेवी से विवाह करने के इच्छुक पुरुषों की कभी कमी नहीं रही होगी । फिर भी उन्होंने किसी कुंवारे पुरुष के स्थान पर बोनी के रूप में एक दूजवर को क्यों चुना जिसने अपनी पहली पत्नी और अपने दो बच्चों की माता – (अब दिवंगत) मीना शौरी से विवाह-विच्छेद करके श्रीदेवी से विवाह किया ? इस प्रश्न का उत्तर संभवतः श्रीदेवी की उस संघर्षपूर्ण जीवन-गाथा में अंतर्निहित है जो बाल्यावस्था में ही आरंभ हो गई थी । किसी भी प्रेम को स्थायित्व वह विश्वास प्रदान करता है जो दूसरे व्यक्ति पर निस्संकोच किया जा सके । श्रीदेवी को संभवतः किसी अविवाहित पुरुष के स्थान पर यह विश्वास विवाहित बोनी से प्राप्त हुआ जिन्होंने उनकी माता की बीमारी तथा उसके उपरांत उनके देहावसान के समय में उन्हें वास्तविक एवं भावनात्मक संबल दिया । बेल करीबी दरख़्त का ही आसरा पकड़ती है । अमरलता रूपी श्रीदेवी को संभवतः बोनी जैसे दृढ़ एवं सबल वृक्ष का सहारा ही विश्वसनीय लगा । बोनी ने पहले से विवाहित होकर भी श्रीदेवी से विवाह करना क्यों चाहा, इसका उत्तर अब बोनी के अंतस में ही रहेगा ।

अस्सी के दशक के अंत में हिन्दी फ़िल्मों के आकाश पर धूमकेतु की तरह उभरीं माधुरी दीक्षित के आगमन के साथ ही श्रीदेवी का करियर ढलान की ओर बढ़ा । बोनी द्वारा बनाई गई रूप की रानी चोरों का राजा (१९९३) नामक महत्वाकांक्षी फ़िल्म घोर असफल रही । रूमानी नायिका के रूप में श्रीदेवी की अंतिम प्रदर्शित फ़िल्म मेरी बीवी का जवाब नहीं (२००४) थी जिसके दर्शकों के समक्ष आने में अत्यंत विलंब हुआ । वस्तुतः श्रीदेवी की अंतिम ऐसी फ़िल्म १९९७ में प्रदर्शित कौन सच्चा कौन झूठाथी जिसमें उनके नायक ऋषि कपूर थे ।
बोनी से विवाह के उपरांत दो पुत्रियों – जाह्नवी तथा खुशी की माता बनने वाली श्रीदेवी ने अपने जीवन के आगामी कई वर्ष अपनी घर-गृहस्थी को समर्पित किए । सहारा चैनल के धारावाहिक मालिनी अय्यर में शीर्षक भूमिका में आने के उपरांत दर्शकों के समक्ष वे इंगलिश विंगलिश (२०१२) में आईं और पुनः अपने असाधारण प्रदर्शन से सभी को चौंकाते हुए सिद्ध कर दिया कि कालचक्र ने उनकी अभिनय-प्रतिभा पर कोई प्रभाव नहीं डाला था । मॉम (२०१७) में उन्होंने पुनः अभिनय के शिखर को छुआ । अपने जीवन में उन्होंने एक अच्छी कलाकार ही नहीं, एक अच्छी पुत्री, एक अच्छी बहन, एक अच्छी जीवन-संगिनी तथा एक अच्छी माता भी बनकर दिखाया । अब वे हमारे दिलों में रहेंगी । उनकी फ़िल्मों ने उन्हें अमरत्व प्रदान कर दिया है । चाँदनी के लम्हे अब उसके चाहने वालों की यादों में सदा के लिए बस चुके हैं । उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी गई, यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि उन्होंने कला-प्रेमी भारतीय जनमानस पर कितनी गहरी छाप छोड़ी है ऐसी छाप जिसे समय की धूल भी धुंधला न सके ।

© Copyrights reserved