साठ के दशक से नब्बे के दशक तक जब भारत में लुगदी साहित्य का दौर था और ढेरों उपन्यास पॉकेट बुक की सूरत में पाठकों के समक्ष आया करते थे, उस समय सामाजिक उपन्यास लिखने वाले लेखकों के सिरमौर थे गुलशन नन्दा। गुलशन नंदा को पाठकों की नब्ज़ पहचानने में महारत हासिल थी तथा दिल को छू लेने वाली भाषा में भावनाओं से ओतप्रोत जो कहानियां वे अपने उपन्यासों के माध्यम से प्रस्तुत करते थे, वे स्वाभाविक रूप से पाठकों में अत्यन्त लोकप्रिय हो जाया करती थीं। उन्होंने कम उपन्यास लिखे लेकिन जो लिखे, वे लोकप्रियता के चरम पर जा पहुँचे। चूंकि वे फ़िल्मी ढंग की कहानियां लिखा करते थे, उनके बहुत-से उपन्यासों पर फ़िल्में भी बनीं जैसे 'शर्मीली', 'कटी पतंग', 'नील कमल', 'नया ज़माना', 'दाग़', 'अजनबी', 'झील के उस पार', 'खिलौना', 'काजल', 'महबूबा' आदि। लेकिन उनका एक उपन्यास ऐसा है जिस पर फ़िल्म तो नहीं बनी लेकिन अगर बनती तो संभवतः बहुत अच्छी बनती क्योंकि उपन्यास की कहानी बहुत अच्छी है। यह उपन्यास है 'शगुन'।
शगुन शब्द का अर्थ होता है किसी मंगल कार्य या संबंध (मुख्यतः वैवाहिक संबंध) का आरंभ करने के प्रतीक स्वरूप किसी वस्तु का दिया जाना। यह उपन्यास एक प्रेम-त्रिकोण या त्रिकोणीय पारिवारिक ड्रामा है जिसके तीन कोण हैं पति, पत्नी तथा पति की भूतपूर्व पत्नी। इन लोगों के साथ जुड़ी हुई है पति के प्रथम विवाह से उत्पन्न पुत्री। अजय का मुम्बई में रह रही रूबी से तलाक़ हो चुका है तथा न्यायालय ने रूबी को ही उनकी पुत्री रश्मि का संरक्षण प्रदान किया है, अतः रश्मि अपनी माता रूबी के साथ रहती है। दूसरी ओर शारदा है और वह भी एक टूटे हुए विवाह का भार अपने मन पर लिये दिल्ली में रहती है। अजय का मित्र अशोक बहुत अच्छा इंसान है तथा वह शारदा से भी परिचित है जिसे उसने अपनी मुँहबोली बहन बना रखा है। अशोक पैरों से अपाहिज है एवं कृत्रिम पैरों का उपयोग करता है। उसे लगता है कि अजय एवं शारदा एकदूसरे के साथ अच्छी तरह निभा सकते हैं एवं एक सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत कर सकते हैं। वह दोनों को मिलवाता है और दोनों की सहमति हो जाने के उपरांत उनका विवाह हो जाता है। दोनों को ही लगता है कि वे एकदूसरे को समझ सकते हैं और एक बेहतर जीवन जी सकते हैं। शारदा को विश्वास है कि वह अजय की पुत्री रश्मि का भी दिल जीत सकेगी एवं उसे अपने बच्चे जैसा ही प्यार दे सकेगी।
विवाह के उपरांत अजय अपने करियर की ख़ातिर मुम्बई चला जाता है। पहले तो वह अपने पुराने दोस्त अनवर के गेस्ट हाउस में रहता है जिसने मूल रूप से उसे रूबी से मिलवाया था। लेकिन शीघ्र ही वह नई नौकरी के साथ-साथ एक नये आवास का भी इंतज़ाम कर लेता है जिसके बाद शारदा भी उसके साथ रहने के लिये मुम्बई चली आती है। लेकिन अब होता यह है कि अजय की यह नई ख़ुशियों भरी ज़िन्दगी रूबी को डाह से भर देती है। वह अजय का शारदा के साथ-साथ ख़ुशी से रहना सहन नहीं कर पाती। अब वह अजय पर फिर से डोरे डालने लगती है। इसके अतिरिक्त वह उन दोनों की बच्ची रश्मि का भी अजय को अपने नज़दीक लाने के लिये इस्तेमाल करती है। अजय उसके जाल में फंस जाता है और नतीजा यह निकलता है कि शारदा के साथ उसके सुखी वैवाहिक जीवन में भूचाल आ जाता है। इन दो स्त्रियों तथा अपनी पुत्री के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े इनके बीच फंसे पुरुष के मध्य की कशमकश उपन्यास को उसके क्लाईमेक्स की ओर ले जाती है।
गुलशन नन्दा साधारण कहानियों को भी कविता, शायरी तथा मर्मस्पर्शी संवादों के साथ अत्यन्त मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करने में निष्णात थे। चूंकि वे उपन्यासकार होने के साथ-साथ फ़िल्मों के पटकथा लेखक भी थे, अतः वे कहानी के प्रवाह में पाठकों (और दर्शकों) की उत्सुकता बढ़ाने वाले मोड़ डालने में अत्यंत कुशल थे जिससे पाठक उपन्यास को उसके अंतिम शब्द तक पढ़ने पर विवश हो जाता था। 'शगुन' भी उनके इस कुशल लेखन का उदाहरण है। इसे पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि गुलशन नन्दा लगभग तीस वर्षों तक हिन्दी उपन्यास लेखन के शीर्ष पर क्यों रहे।
तीनों मुख्य पात्रों - अजय, रूबी और शारदा के चरित्रों को भलीभांति विकसित होने का अवसर दिया गया है। अजय एक स्वाभिमानी व्यक्ति है लेकिन वह स्त्री के आकर्षण के समक्ष टिक नहीं पाता। इसके अतिरिक्त उसकी पुत्री रश्मि उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। वह शारदा के प्रति बेवफ़ा नहीं है लेकिन जो रूबी उसे जीवन में पहले एक बार ठुकरा चुकी है, वह उसी के जाल में फंस जाता है। किसी पुरुष के स्वयं को ठुकराने वाली स्त्री के पुनः निकट जाने एवं उसके प्रेमजाल में फंस जाने का यह एक अच्छा उदाहरण है। लेकिन लेखक ने उसके चरित्र को इस प्रकार चित्रित किया है कि यह सब कुछ स्वाभाविक लगता है एवं उसके आचरण तथा उसके साथ घटने वाली घटनाओं में कहीं पर भी नक़लीपन नहीं झलकता।
रूबी एक अपूर्व सुंदरी तो है ही, साथ ही वह एक अत्यन्त चालाक आधुनिक महिला है जो जानती है कि अपने आकर्षण को अपने फ़ायदे के लिए कैसे काम में लेना है। वह अजय को पसंद करती है लेकिन उसे सम्मान नहीं देती एवं चाहती है कि वह उसके सामने झुका रहे। तलाक़ हो जाने के बाद भी वह अपने और अजय की पुत्री के माध्यम से अजय को अपने वश में रखने की कोशिश करती रहती है। वह हार मानने वाली स्त्री नहीं है। जब अजय शारदा से विवाह कर लेता है तो उसका हार का अहसास और सौतिया डाह उसे चैन नहीं लेने देते।
शारदा एक अच्छे दिल वाली संवेदनशील महिला है जो अपने जीवन में एक झटका पहले ही सह चुकी है। अजय के अपनी भूतपूर्व पत्नी रूबी के निकट जाने के रूप में यह दूसरा झटका उसके लिये सहनीय नहीं है। वह स्वाभिमानी है तथा उसे स्वयं पर इतना विश्वास है कि वह अपनी सौतेली बेटी रश्मि के लिये एक अच्छी माँ बन सकेगी। उसका दूसरी स्त्री की संतान के लिये स्नेह दिल को छू लेने वाला है। वह अजय से कहती रहती है कि रूबी से दूरी रखे एवं उसकी मुलाक़ात रश्मि से करवा दे।
इन मुख्य पात्रों के अतिरिक्त सहायक पात्र भी कहानी में अपनी छाप छोड़ने में सफल हैं यथा अजय का मित्र एवं शारदा का मुँहबोला भाई अशोक जो उन दोनों की भलाई के लिये चिंतित रहता है, अजय का पुराना मित्र अनवर, रूबी के व्यावसायिक साझेदार राहुजी, रूबी की पुरानी अधेड़ नौकरानी जानकी और सबसे बढ़कर अजय एवं रूबी की पुत्री रश्मि जो अपनी 'नई मम्मी' से मिलने को उत्सुक है। गुलशन नंदा के उपन्यासों की लोकप्रियता का एक कारण यह भी था कि उनके उपन्यासों के चरित्र स्वाभाविक लगते थे। 'शगुन' के पात्र भी हमें अपने आसपास के लोग ही लगते हैं हैं जिनकी बातों और गतिविधियों में कोई अस्वाभाविकता नहीं है।
मैंने 'शगुन' को अस्सी के दशक में पढ़ा था। पढ़ने के बाद मेरे मन में यह ख़याल आया था कि इस उपन्यास पर एक अच्छी सामाजिक फ़िल्म बन सकती है। मैंने अपने मन में उस फ़िल्म के लिये कलाकारों का चयन भी किया। मैंने कलाकार चुने - अजय की भूमिका हेतु विनोद खन्ना, रूबी की भूमिका हेतु रेखा, शारदा की भूमिका हेतु रंजीता, अशोक की भूमिका हेतु विनोद मेहरा, अनवर की भूमिका हेतु परीक्षित साहनी, जानकी की भूमिका हेतु सुलभा देशपांडे आदि। ख़ैर ...।
उपन्यास का नाम 'शगुन' इसलिए रखा गया है क्योंकि अजय रिश्ता तय हो जाने के बाद शारदा को शगुन के रूप में एक अंगूठी देता है। बहरहाल यह हिंदी उपन्यास बहुत रोचक है तथा पाठक को प्रथम दृश्य से अंतिम दृश्य तक बाँधे रखता है। यह पाठक की उत्सुकता को कहीं पर भी कम नहीं होने देता एवं उसे क्लाईमेक्स तक बनाए रखता है। कथानक का प्रवाह बहुत अच्छा है एवं विभिन्न पात्रों द्वारा बोले गए संवाद अत्यन्त प्रभावशाली हैं। भाषा भी अच्छी है। कुल मिलाकर 'शगुन' हिंदी के पाठकों हेतु किसी उपहार से कम नहीं।
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