पति और पत्नी का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता है जिसमें सबसे अधिक निकटता होती है। इससे अधिक निकटता माता और शिशु के रिश्ते में ही संभव है। यह दैहिक निकटता मानसिक निकटता में भी परिवर्तित हो, इसके लिए आवश्यक है विश्वास। इसीलिए पति और पत्नी का संबंध प्रेम के साथ-साथ विश्वास से भी जुड़ा होता है। यह विश्वास एक कच्चे धागे की भांति होता है जिसे टूटना हो तो एक झटके में टूट जाए और जो न टूटना हो तो हज़ार हाथियों के बल से भी न टूटे। यह विश्वास बना रहे, इसके लिए आवश्यक है दंपती का परस्पर संवाद। किसी भी रिश्ते में संवादहीनता की नौबत कभी नहीं आने देनी चाहिए, पति-पत्नी के रिश्ते में तो विशेष रूप से। संवादहीनता ही ग़लतफ़हमियों की जननी है और ग़लतफ़हमियों से ही रिश्ते दरकते हैं। अतः अच्छा यही है कि जो बात मन में हो, अपने जीवन साथी से साफ़-साफ़ कह दी जाए ताकि जो भी मुद्दा हो, वो बातचीत से सुलझ जाए।
शक़ और संवादहीनता के कारण पति-पत्नी के संबंध में दरार आने के विषय पर कई हिंदी फ़िल्में बनी हैं। मैं आज दो फ़िल्मों की बात करूंगा। एक फ़िल्म है 'गुमराह' (१९६३) जो एक श्वेत-श्याम फ़िल्म है। जिन लोगों ने 'हम आपके हैं कौन?' फ़िल्म देखी है, उन्हें याद होगा कि उसमें बड़ी बहन के अकस्मात् देहांत के उपरांत उसकी छोटी बहन का विवाह उसके विधुर जीजा से तय कर दिया जाता है जो होते-होते बच जाता है। 'गुमराह' में ऐसा विवाह हो भी जाता है तथा छोटी बहन को अपने जीजा की पत्नी बनने के साथ-साथ दिवंगत बड़ी बहन के बच्चों के लालन-पालन का दायित्व भी संभालना पड़ता है। यह कहानी है मीना (माला सिन्हा) की जिसे राजेन्द्र (सुनील दत्त) से प्रेम है किन्तु उसकी बड़ी बहन (निरूपा रॉय) के निधन के उपरांत उसके पिता उसका विवाह उसके विधुर जीजा अशोक (अशोक कुमार) से कर देते हैं। विवाह के कुछ समय बाद मीना का राजेन्द्र से फिर से मिलना होता है, प्रेम की चिंगारी पुनः उन दोनों के मन में भड़क उठती है और दोनों चुपके-चुपके मिलने लगते हैं। अचानक मीना को एक अजनबी औरत (शशिकला) इस बारे में अशोक को बता देने की धमकी देकर ब्लैकमेल करने लगती है। अंत में पता लगता है कि वह औरत अशोक की सचिव (सेक्रेटरी) है तथा उसके कहने पर ही वह मीना को ब्लैकमेल कर रही थी क्योंकि (उसकी राय में) मीना एक विवाहिता की लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन कर रही थी। अशोक मीना को बताता है कि उसे उसकी राजेन्द्र से मुलाक़ातों के बारे में पता था और वह चाहे तो राजेन्द्र के पास जा सकती है। लेकिन मीना राजेन्द्र से अपना संबंध-विच्छेद करके अशोक के साथ अपना वैवाहिक जीवन जारी रखने का निर्णय लेती है।
दूसरी फ़िल्म है 'आप की कसम' (१९७४) जो कमल (राजेश खन्ना) और सुनीता (मुमताज़) के वैवाहिक जीवन की कहानी है। कमल और सुनीता प्रेम विवाह करते हैं और अपने सुखी दाम्पत्य जीवन का आरंभ करते हैं। कमल के पड़ोसी मोहन (संजीव कुमार) का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं है और वह अपनी पत्नी की बेरूख़ी से परेशान रहता है। सुनीता से उसे हमदर्दी और सांत्वना मिलती है। सुनीता के मन में उसे लेकर कोई ग़लत भावना नहीं है लेकिन कमल को मोहन और सुनीता के संबंध पर संदेह हो जाता है। वह छुपकर सुनीता पर नज़र रखने लगता है। जब सुनीता को कमल के अपने पर संदेह का पता चलता है तो उसे गहरा धक्का लगता है। वह कमल के जीवन से निकल जाती है तथा अपने माता-पिता के पास चली जाती है। कमल को बाद में सच्चाई (अर्थात् सुनीता की निर्दोषिता) का पता लगता है तो उसे अपने किए पर पश्चाताप होता है लेकिन उसका और सुनीता का वैवाहिक जीवन समाप्त हो जाता है।
इन दोनों ही फ़िल्मों में समस्या पति और पत्नी के बीच विश्वास की कमी की दिखाई गई है। 'आप की कसम' एक बेहतर फ़िल्म है और पितृसत्तात्मक समाज में नारी के आत्म-सम्मान की बात पुरज़ोर ढंग से कहती है। कमल यदि छुपकर अपनी पत्नी पर नज़र रखने के बजाय उससे स्पष्ट बात करता और अपने संदेह का निवारण कर लेता तो उसका और सुनीता का वैवाहिक जीवन नष्ट नहीं होता। सुनीता अंत में कमल के पास नहीं लौटती और कमल को अपनी ग़लती का बहुत बड़ा मूल्य चुकाना पड़ता है। कमल का घर छोड़ने से पहले सुनीता का कमल से यह कहना - 'मोहन जी से मेरा क्या संबंध है, मैं तुम्हें नहीं बताऊंगी लेकिन आज के बाद तुमसे मेरा कोई संबंध नहीं रहेगा' एक स्वाभिमानी नारी के अंतस से निकली आवाज़ है। वह यह सहन नहीं कर सकती कि उसका पति उस पर विश्वास न करे और उसके चरित्र पर निराधार संदेह करे। आख़िर उन दोनों ने प्रेम विवाह किया था और विश्वास ही प्रेम का आधार होता है।
इसके विपरीत 'गुमराह' में पितृसत्तात्मक सोच ही दिखाई गई है। यद्यपि 'गुमराह' को आज एक क्लासिक माना जाता है, मुझे यह फ़िल्म बड़ी दोषपूर्ण और प्रतिगामी लगी। सर्वप्रथम तो मीना का उसकी मर्ज़ी के बिना उसके विधुर जीजा अशोक से विवाह कर दिया जाना ही ग़लत था। न तो मीना के पिता ने उसकी इच्छा जाननी चाही और न ही अशोक ने। विवाह के उपरांत यदि मीना का राजेन्द्र से छुपकर मिलना ग़लत था तो अशोक का भी उसे अपनी सचिव के माध्यम से ब्लैकमेल करवाना ग़लत था। यदि अशोक को मीना और राजेन्द्र के इस तरह मिलने की बात पता थी (वैसे उनका संबंध भावनात्मक ही था, कुछ और नहीं) तो वह मीना से स्पष्ट बात कर सकता था। उसे अपनी ही पत्नी को ब्लैकमेल करवा कर और फिर शर्मिंदा करके क्या हासिल हुआ ? मीना ने ग़लत किया लेकिन उसने भी तो मीना पर न तो विश्वास किया, न ही उससे संवाद। इससे पति-पत्नी का रिश्ता मज़बूत नहीं हुआ, कमज़ोर ही हुआ। अंत में मीना को पत्नी के उत्तरदायित्व और मर्यादा पर भाषण देकर उसे अपने प्रेमी के पास चले जाने की छूट देना भी अशोक की पितृसत्तात्मक सोच का ही प्रतीक है। मीना उसकी संपत्ति नहीं, जीवन-संगिनी है, एक मनुष्य है जिसे अपने जीवन के संबंध में निर्णय लेने का पूरा अधिकार है। उसे पति की दी हुई ऐसी किसी छूट की कोई आवश्यकता नहीं। और उसके पति को उसे नीचा दिखाने का कोई अधिकार नहीं चाहे उसने भूल ही की थी। वैवाहिक संबंध में पति और पत्नी दोनों ही समान होते हैं। कोई किसी से बेहतर या कमतर नहीं होता। यह बात अशोक को समझनी चाहिए थी। ऐसी दोषपूर्ण फ़िल्म को क्लासिक माना जाता है, यह आश्चर्य की बात है।
'गुमराह' का निर्माण और निर्देशन बी.आर. चोपड़ा ने किया है जबकि 'आप की कसम' का जे. ओम प्रकाश ने। गीत-संगीत दोनों का ही बहुत अच्छा है और कलाकारों के सुंदर अभिनय से सजी दोनों ही फ़िल्में मनोरंजक हैं। पर जहाँ 'आप की कसम' सार्थक है, वहीं 'गुमराह' में सार्थकता का अभाव है। अंत में मैं फिर से यही बात कहूंगा कि पति-पत्नी का संबंध विश्वास के कच्चे धागे से जुड़ा होता है जिसे दोनों में से किसी को भी टूटने नहीं देना चाहिए। पारस्परिक विश्वास की नींव पर ही सुखी वैवाहिक जीवन का भवन खड़ा होता है। और दोनों जीवन साथियों में संवाद तो बराबर रहना ही चाहिए। भूल किसी से भी हो सकती है क्योंकि सभी मनुष्य ही हैं। लेकिन यदि एक जीवन साथी भटक जाए तो दूसरे का दायित्व उसे नीचा दिखाना या शर्मिंदा करना नहीं, बल्कि उससे स्पष्ट रूप से (खुलकर) बात करके समस्या का समाधान निकालना होता है। यही परिपक्वता की निशानी है। पति-पत्नी मन एवं व्यवहार से परिपक्व होंगे तो ही दाम्पत्य जीवन सुदीर्घ, शांतिपूर्ण एवं सुखद होगा।
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