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शुक्रवार, 1 मई 2026
विभाजन के पहले और बाद
सोमवार, 27 अप्रैल 2026
कुछ बातें सीक्वल की
सीक्वल का अर्थ होता है अगली कड़ी। मुख्यतः यह शब्द किसी कहानी के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। कहानी किसी फ़िल्म की भी हो सकती है तथा उपन्यास की भी। यहाँ सीक्वल से आशय यह नहीं है कि किसी कहानी को अपने प्रथम भाग में अधूरा छोड़ दिया जाए तथा उस अधूरे भाग को आगामी कड़ी (या कड़ियों) में पूरा किया जाए। ऐसा पहले तो केवल उपन्यासों के लिए किया जाता था लेकिन अब विगत कुछ वर्षों से फ़िल्में भी इसी भांति बनने लगी हैं जिनमें पहली फ़िल्म में कथा का केवल एक भाग प्रस्तुत किया जाता है जबकि उसका समापन भाग दूसरी फ़िल्म में प्रस्तुत किया जाता है (यह दूसरी फ़िल्म कुछ दिनों या कुछ महीनों के उपरांत प्रदर्शित होती है)। इस लेख में मेरा प्रयोजन उस प्रकार के सीक्वल के बारे में बात करना है जिनमें उसका पूर्व भाग भी अपने आप में सम्पूर्ण होता है तथा उसे देखने के उपरांत दूसरे भाग को देखना अनिवार्य नहीं होता क्योंकि दोनों की कहानियां (कुछ) समान पात्रों को लिए हुए होने के बावजूद स्वतंत्र एवं अपने आप में पूर्ण होती हैं।
स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ने ऐसा प्रयोग भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष पर आधारित अपने उपन्यास 'वतन की कसम' में किया था जिसकी पाठक समुदाय में हुई लोकप्रियता के कारण उन्होंने उसका सीक्वल 'ख़ून दो आज़ादी लो' तथा 'बिच्छू' नामक उपन्यासों के रूप में लिखा। इन उपन्यासों में 'वतन की कसम' के अंतिम दृश्य से कहानी को आगे बढ़ाया गया था किंतु 'वतन की कसम' अपने आप में सम्पूर्ण उपन्यास था जबकि सीक्वल के रूप में लिखे गए दो उपन्यासों में उसके कुछ पात्रों को लिए जाने के बावजूद कहानी बिलकुल अलग थी।
बॉलीवुड फ़िल्मों में ऐसा कई बार किया गया है जब स्थायी पात्र तो सीक्वल में यथावत् रहे किंतु कुछ नए पात्रों के साथ एक नई कहानी दर्शकों के समक्ष रखी गई। देव आनंद की अत्यधिक सफल फ़िल्म 'ज्वेल थीफ़' (१९६७) का सीक्वल एक लंबे अंतराल के उपरांत 'रिटर्न ऑव ज्वेल थीफ़' (१९९६) के रूप में आया किंतु कमज़ोर कथानक एवं निर्देशन के कारण असफल रहा। ऐसा ही फ़िल्म 'हेरा फेरी' (२०००) का सीक्वल 'फिर हेरा फेरी' (२००६) बनाकर किया गया था जिसकी कहानी 'हेरा फेरी' के अंत से आगे बढ़ाई गई थी। वह फ़िल्म भी दर्शकों-समीक्षकों को विशेष प्रभावित नहीं कर सकी। और ऐसा ही अत्यन्त सफल एवं बहु-प्रशंसित फ़िल्म 'रॉक ऑन' (२००८) का सीक्वल 'रॉक ऑन2' (२०१६) बनाकर किया गया जिसमें कुछ प्रमुख पात्रों के साथ कहानी को मूल फ़िल्म के अंत से आगे बढ़ाते हुए एक नई कहानी को परोसा गया पर वह भी मूल फ़िल्म की भांति प्रभावशाली नहीं बन सकी।
वस्तुतः सीक्वल बनाया तो मूल फ़िल्म की सफलता को भुनाने के लिए जाता है क्योंकि उस फ़िल्म की अच्छी स्मृतियां दर्शकों के मन में होती हैं किंतु किसी भी सीक्वल की सफलता एक सुदृढ़ कथानक, कुशल निर्देशन तथा कलाकारों के अभिनय पर निर्भर करती है। ऊपर मैंने जिन फ़िल्मों का उल्लेख किया उनमें सीक्वल का कथानक, निर्देशन तथा अभिनय पक्ष पिछली फ़िल्म (प्रीक्वल) की भांति प्रभावी नहीं था, इसीलिए सीक्वल दर्शकों का साथ नहीं पा सके। लेकिन जब सीक्वल की कहानी, निर्देशन (चाहे वह प्रीक्वल के निर्देशक द्वारा किया जाए या किसी और के द्वारा),अभिनय एवं तकनीकी पक्ष अच्छे हों तो सीक्वल सफल हो जाता है जैसा कि 'तनु वेड्स मनु' (२०११) के सीक्वल 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' (२०१५) के मामले में हुआ जब सीक्वल भी प्रीक्वल की भांति ही सफल रहा। ऐसा ही 'कोई मिल गया' (२००३) के सीक्वल के रूप में बनाई गई फ़िल्मों - 'कृष' तथा 'कृष3' के मामलों में हुआ जब सीक्वलों ने प्रीक्वल की सफलता को दोहराया। 'दृश्यम' (२०१५) का सीक्वल 'दृश्यम2' (२०२२) भी सफल रहा। सनी देओल ने अपनी अत्यन्त सफल (राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित) फ़िल्म 'घायल (१९९०) का सीक्वल 'घायल वंस अगेन (२०१६) स्वयं ही निर्देशित किया और मुँह के बल गिरे लेकिन उनकी सुपरहिट फ़िल्म 'गदर-एक प्रेमकथा' (२००१) का सीक्वल 'गदर2 (२०२३) अपने प्रीक्वल की भांति ही सुपरहिट रहा।
'साहब बीवी और गैंगस्टर' (२०११) के भी दो सीक्वल बनाए गए जिनमें से पहला सीक्वल 'साहब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स' (२०१३) तो चुस्त कथानक एवं कुशल निर्देशन के कारण सफल रहा पर जब उसकी भी अगली कड़ी 'साहब बीवी और गैंगस्टर3' (२०१८) के रूप में बनाकर दर्शकों को परोस दी गई तो वह कमज़ोर कथा के कारण असफल रही। इनकी विशेषता यह है कि प्रमुख पात्रों (साहब तथा बीवी) एवं उनके पारस्परिक संबंधों को समझने के लिए दर्शकों हेतु पहली कड़ी को देखना आवश्यक है अन्यथा किसी भी सीक्वल के कथानक को समझने में समस्या हो सकती है (यद्यपि सीक्वल अपने आप में संपूर्ण हैं)।
सीक्वल ऐसे भी बने हैं जिनमें कहानी को पिछली फ़िल्म या प्रीक्वल से आगे नहीं बढ़ाया गया है केवल प्रमुख पात्रों को लेकर एक नई कहानी बुनी गई है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' (२००३) का सीक्वल 'लगे रहो मुन्नाभाई (२००६) है जिसमें प्रीक्वल के दो प्रमुख पात्रों (मुन्ना तथा सर्किट) को लेकर एक पूरी तरह से नई कहानी कही गई है। चूंकि कहानी, निर्देशन, अभिनय, तकनीकी पक्ष, संगीत आदि सभी उत्तम रहे; स्वाभाविक रूप से सीक्वल भी अत्यन्त सफल रहा। 'इश्क़िया' (२०१०) की सीक्वल 'डेढ़ इश्क़िया' (२०१४) भी इसी प्रकार बनाई गई थी एवं वह भी सफल रही थी। इसी प्रारूप में 'गोलमाल-फ़न अनलिमिटेड' (२००६) के भी कई सीक्वल बनाए गए जो बॉक्स ऑफ़िस पर चल गए। लेकिन सफल फ़िल्म 'स्टाइल' (२००१) का सीक्वल 'एक्सक्यूज़ मी' (२००३) सफल नहीं रहा।
सीक्वल को फ़्रेंचाइज़ फ़िल्मों से अलग करके देखा जाना चाहिए। विदेशों की नक़ल करते हुए बॉलीवुड के भट्ट कैम्प ने अपनी 'राज़' (२००२) तथा 'मर्डर' (२००४) जैसी फ़िल्मों के नामों में 2, 3 आदि लगाकर बिलकुल भिन्न फ़िल्में बनाईं जिनमें मूल फ़िल्मों के पात्र तक नहीं थे एवं तथाकथित अगली कड़ियों का मूल फ़िल्म से किसी भी तरह का कोई लेनादेना नहीं था। लेकिन दर्शकों को मूल फ़िल्म का नाम काम में लेकर भ्रमित करने में फ़िल्मकार सफल नहीं रहे एवं वे फ़िल्में (जो कि सीक्वल न होकर फ़्रेंचाइज़ फ़िल्में थीं) दर्शकों द्वारा नकार दी गईं।
एक विशिष्ट सीक्वल की बात मैं विशेष रूप से करना चाहूंगा। प्रतिष्ठित राजश्री बैनर ने अपनी अत्यधिक सफल एवं लोकप्रिय फ़िल्म 'अँखियों के झरोखों से' (१९७८) का सीक्वल 'जाना पहचाना' (२०११) के रूप में बनाया। जब मैंने वह फ़िल्म देखी तो मैं यह देखकर दंग रह गया कि सीक्वल में कम-से-कम आधा हिस्सा प्रीक्वल के दृश्यों से भरा हुआ है। चूंकि दोनों ही फ़िल्में एक ही निर्माता की हैं, अतः ऐसा करने में कृतिस्वाम्य (कॉपीराइट) की तो समस्या नहीं थी किंतु फ़िल्म पसंद आने पर भी मैंने यह महसूस किया कि जब सीक्वल में आधा हिस्सा प्रीक्वल का ही है तो सीक्वल देखने से बेहतर क्या प्रीक्वल को ही पुनः देख लेना नहीं होता ? शायद ऐसा ही दर्शक समुदाय ने महसूस किया होगा जिसके कारण फ़िल्म सफल नहीं रही (समीक्षकों ने भी इसकी आलोचना ही की)।
बॉलीवुड में अब सीक्वल किसी भेड़चाल की तरह हो गया है। जब भी कोई फ़िल्म सफल हो जाती है, उसके नाम में 2 लगाकर उसके सीक्वल की घोषणा कर दी जाती है। ऐसे फ़िल्मकार यह मानने को तैयार नहीं होते कि आज का दर्शक मूढ़ नहीं है। वह अच्छी तरह समझता है कि सीक्वल वस्तुतः क्या होता है। वह उसी फ़िल्म को अपेक्षित प्रतिसाद देता है जो कि अच्छी कहानी के साथ अच्छे ढंग से बनाई गई हो, फिर चाहे वह सीक्वल हो या नहीं।
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सोमवार, 13 अप्रैल 2026
यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग
आशा भोसले नहीं रहीं। आशा ताई के नाम से मशहूर महान गायिका अपने करोड़ों प्रशंसकों से विदा लेकर दिगंत में विलीन हो गई। अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की ही भांति वे भी दीर्घायु हुईं। लेकिन सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ने से पूर्व उन्होंने अपने जीवन में जो संघर्ष किया, वह उनकी अग्रजा के संघर्ष से भी अधिक रहा। अपने पिता के निधन के उपरांत चारों बहनें (लता, आशा, उषा और मीना) तथा एक भाई (हृदयनाथ) बम्बई (मुम्बई) की फ़िल्मी दुनिया में अपना एक मुकाम बनाने के लिए उतर पड़े। लता को १९४९ में बीस वर्ष की आयु में ही 'महल' तथा 'बरसात' जैसी फ़िल्मों से जो सफलता मिली, उसके उपरांत उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लेकिन आशा के जीवन में वैसी सफलता को आने में एक लंबा समय लगा। इसके अतिरिक्त आशा ने अल्पायु में ही विवाह कर लिया तथा अल्पायु में ही वे माता भी बन गईं। अपने वैवाहिक जीवन में आशा ने दुख-ही-दुख सहे तथा एक दिन उन्हें अपने तीन बच्चों के दायित्व के साथ अकेले ही जीवन-समर में उतरना पड़ा। लता तो तब तक सफलता की चोटी पर जा बैठी थीं। अब हाल यह था कि एक तो आशा का स्वर लता से मिलता-जुलता था, दूसरी ओर जहाँ लता को नायिकाओं वाले गीत गाने के लिए मिलते थे, वहीं आशा को प्रायः नृत्यांगनाओं वाले गीत ही मिलते थे। उन्हें पारिश्रमिक भी लता से बहुत कम मिलता था जबकि उनके ऊपर अपनी तीन संतानों के भरण-पोषण का दायित्व था। लेकिन आशा ने हिम्मत नहीं हारी।
उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि वे अपनी बड़ी बहन की परछाईं से निकलकर ही रहेंगी। उन्होंने प्रयास करके अपने स्वर को लता के स्वर से भिन्न बनाया तथा जो भी गीत मिले, उन्हें गाते हुए अपने समय की प्रतीक्षा करती रहीं। विवाह-विच्छेद हो चुकने पर भी उन्होंने अपने प्रथम पति के उपनाम 'भोसले' को जीवन भर अपने नाम के साथ जोड़े रखा। वे 'आशा मंगेशकर' नहीं, 'आशा भोसले' ही बनी रहीं। धीरे-धीरे उनकी अपनी पहचान बनी जो कि लता से पूर्णरूपेण भिन्न थी।
संगीतकार ओ.पी.नैय्यर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना तथा उन्हें बहुत-से ऐसे गीत गाने को दिए जो कि अत्यंत लोकप्रिय हुए (ओ.पी.नैय्यर ने लता से कभी कोई गीत नहीं गवाया)। आगे चलकर पश्चिमी संगीत से प्रभावित राहुल देव बर्मन ने भी उनसे कुछ ऐसे गीत गवाए जो कि उनके अलावा शायद कोई गायिका नहीं गा सकती थी। अपनी समकालीन गायिकाओं में वे विलक्षण रहीं। जो मस्ती, जो पुलक आशा जी के स्वर में थी; वो किसी और के स्वर में नहीं थी। आज ढेरों ऐसे गीत हैं जो उन्हीं के नाम से पहचाने जाते हैं। अपनी विलक्षणता को पहचान कर उन्होंने कालांतर में पॉप गीत भी गाए तथा अपने ही पुराने गीतों के रीमिक्स भी निकाले। वैजयंतीमाला पर फ़िल्माए गए 'नया दौर' (१९५७) के यादगार गीत 'उड़ें जब-जब ज़ुल्फ़ें तेरी' से लेकर करिश्मा कपूर पर फ़िल्माए गए 'दिल तो पागल है' (१९९७) के गीत 'ले गई ले गई' तक आशा जी के स्वर का यौवन जस-का-तस बना रहा। अपने जीवन में सदा साहसिक निर्णय लेने वाली आशा जी ने नानी तक बन चुकने के उपरांत राहुल देव बर्मन से विवाह करके अपने साहस का फिर परिचय दिया।
उनके स्वर में शायरी को जादुई बना देने का जो गुण था, उसे संगीतकार ख़य्याम ने पहचानकर फ़िल्म 'उमराव जान' (१९८१) में रेखा पर फ़िल्माई गई ग़ज़लें उनसे गवाईं और उन ग़ज़लों ने इतिहास बना दिया। 'दिल चीज़ क्या है', 'इन आँखों की मस्ती के', 'ये क्या जगह है दोस्तों' और 'जुस्तजू जिसकी थी' जैसी ग़ज़लें आशा जी की दिलकश आवाज़ में अमर हो गईं।
लेकिन मैंने आशा जी की आवाज़ में ग़ज़लों और नज़्मों के जादू को सही मायनों में उनके ग़ज़ल एलबम 'मेराज-ए-ग़ज़ल' में महसूस किया। यह ग़ज़ल एलबम उन्होंने ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली के साथ मिलकर निकाला था। दो भागों में प्रस्तुत इस एलबम में एक भी ऐसा गीत या ग़ज़ल नहीं है जिसमें आशा जी का स्वर न हो। उनकी आवाज़ एकल में भी है और युगल में भी। मेराज-ए-ग़ज़ल का अर्थ है - ग़ज़ल का उत्कर्ष।
१९८३ में मूल रूप से कैसेट के रूप में निकले इस एलबम के पहले भाग की 'ए' साइड में 'रूदाद-ए-मोहब्बत क्या कहिए', 'दयार-ए-दिल की रात में' तथा 'यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग' हैं। इनमें से आशा जी की ग़ज़ल 'यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग' मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल है जिसमें उर्दू शायरी अपने पूरे जलाल पर है। 'बी' साइड में 'गए दिनों का सुराग लेकर', 'हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहां तक आ गए (आशा जी की एक बेहतरीन ग़ज़ल) तथा 'रात जो तूने दीप बुझाए (आशा जी की एक बेहतरीन नज़्म) हैं।
इस एलबम के दूसरे भाग की 'ए' साइड में 'फिर सावन रुत की पवन चली', 'दर्द जब तेरी अता है तो गिला किससे करें (आशा जी की दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल) और 'करूं न याद मगर किस तरह भुलाऊं उसे' (आशा जी की बेहतरीन ग़ज़ल) हैं। 'बी' साइड में आशा जी के दो बेहतरीन गीत हैं - पहले नम्बर पर 'सलोना-सा सजन है' और तीसरे नम्बर पर 'नैना तोसे लागे' जबकि इनके बीच में दोनों कलाकारों द्वारा गाई हुई ग़ज़ल है - 'दिल धड़कने का सबब याद आया'।
'मेराज-ए-ग़ज़ल' आशा जी के प्रशंसकों के लिए किसी अनमोल उपहार से कम नहीं। यह संगीत-प्रेमियों के लिए भी है तथा शायरी के रसिकों के लिए भी। आशा जी को उनके गीतों, ग़ज़लों, नज़्मों आदि ने अमरत्व प्रदान कर दिया है। वे हमारे दिलों में हमेशा रहेंगी।
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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026
वेद प्रकाश शर्मा की क़लम से निकला एक धर्मयुद्ध
इस समय मध्य-पूर्व में जो अवांछित युद्ध चल रहा है, उसके लिए अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एवं इज़राइल के राष्ट्र-प्रमुख बेंजामिन नेतन्याहू की खुली आलोचना सुनने में नहीं आ रही है जबकि ईरान की आलोचना हुई है। निश्चय ही ईरान ने भी ग़लत क़दम उठाया है किंतु किसी राष्ट्र की सार्वभौमिकता पर आक्रमण करके अमरीका एवं इज़राइल ने बहुत बड़ी ग़लती की थी। न तो संयुक्त राष्ट्र में इसकी आलोचना हुई एवं न ही भारत ने इसकी आलोचना की। यदि कोई अन्य राष्ट्र ऐसा ही भारत के साथ करता तो क्या हम उसका सामरिक प्रत्युत्तर नहीं देते एवं अन्य राष्ट्रों से उस आक्रमणकारी राष्ट्र के कुकृत्य की आलोचना की अपेक्षा नहीं करते ? अमरीका ने वही किया है जो कि तथाकथित बड़े देश छोटे देशों के साथ करते आए हैं। यह केवल साम्राज्यवाद है, और कुछ नहीं। केवल डोनाल्ड ट्रम्प की सनक के चलते यह युद्ध बिना किसी चेतावनी के ईरान एवं उसके नागरिकों पर थोपा गया है। यहाँ तक कि अमरीका की संसद ने भी अब तक इसका अनुमोदन नहीं किया है।
स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा आज जीवित होते तो निश्चय ही इस विषय को आधार बनाकर कोई उपन्यास लिखते क्योंकि वे सदा समसामयिक विषयों पर अपनी लेखनी चलाने में विश्वास रखते थे। अफ़ग़ानिस्तान में तत्कालीन सोवियत संघ के हस्तक्षेप को आधार बनाकर उन्होंने अपनी विजय-विकास सीरीज़ के अंतर्गत एक यादगार उपन्यास लिखा था। इस उपन्यास का नाम है - धर्मयुद्ध।
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रविवार, 29 मार्च 2026
आनंद बनाम कल हो ना हो
सुप्रतिष्ठित फ़िल्मकार हृषिकेश मुखर्जी ने दो फ़िल्में ऐसी बनाईं जिनमें नायक या नायिका को असाध्य रोग से पीड़ित दिखाया गया है – १. आनंद (१९७१), २. मिली (१९७५)। इनमें से ‘आनंद’ को एक कालजयी फ़िल्म माना जाता है। ‘आनंद’ का नायक आनंद (राजेश खन्ना) कैंसर का रोगी है तथा उसके जीवन का कुछ ही समय शेष रह गया है जब वह मुम्बई आता है एवं कई लोगों से मिलता है। वह जानता है कि वह शीघ्र ही मरने वाला है लेकिन वह ज़िंदादिली से भरपूर है तथा मिलने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर अपने सकारात्मक दृष्टिकोण का प्रभाव छोड़ता है। वह अपनी चिकित्सा करने वाले डॉक्टर भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) का उनकी प्रेयसी (सुमिता सान्याल) से मिलन भी करवाता है। इस संसार को छोड़कर जाते-जाते भी वह बहुत-से लोगों को जीने की नव-प्रेरणा दे जाता है। जीवन के प्रति सकारात्मक ऊर्जा से भरी हुई यह फ़िल्म बहुत सराही गई तथा इसे एक क्लासिक फ़िल्म ही नहीं, भारत में बनी हुई सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक माना जाता है। इस फ़िल्म में राजेश खन्ना का अभिनय संभवतः उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय है।
तीन दशक से अधिक समय के उपरांत निर्माता करण
जौहर ने ‘आनंद’ की कहानी से प्रेरणा लेकर अपनी नई फ़िल्म की कहानी लिखी
जिसका नाम है ‘कल हो ना हो’ जिसका
निर्देशन करण ने स्वयं न करके निखिल अडवाणी से करवाया। ‘कल
हो ना हो’ (२००३) का नायक अमन माथुर (शाह रुख़ ख़ान) भी एक
असाध्य रोग से पीड़ित है तथा उसका जीवनकाल अधिक नहीं बचा है। इस तथ्य के साथ वह
न्यू यॉर्क आता है एवं अपने रोग की बात सभी से छुपाते हुए कई लोगों से मिलता है
जिनमें प्रमुख है उसका पड़ोसी परिवार जिसे एक दोषपूर्ण परिवार कहा जा सकता है
क्योंकि परिवार की प्रमुख जेनिफ़र (जया बच्चन) एवं उनकी सास लाजवंती (सुषमा सेठ)
एक-दूसरी से घृणा करती हैं। वह इस परिवार की कन्या नैना (प्रीति ज़िंटा) से
मन-ही-मन प्रेम करने लगता है किंतु अपने जीवन की अल्पकालिकता को जानते हुए उससे
अपने मन की बात नहीं कहता एवं उसे उसके सच्चे मित्र रोहित (सैफ़ अली ख़ान) के निकट
ले आता है। इस प्रक्रिया में वह अपने चहुँओर सकारात्मक ऊर्जा को प्रसारित करता है तथा अपने संपर्क में आने वाले
लोगों को जीने की नई प्रेरणा देता है।
‘आनंद’ में कोई प्रेम-त्रिकोण नहीं है जबकि ‘कल हो ना हो’ में प्रेम-त्रिकोण है। ‘आनंद’ में आनंद अपने मित्र एवं चिकित्सक भास्कर बनर्जी को उनकी
प्रेयसी से मिलाने में निमित्त बनता है तो ‘कल हो ना हो’ में अमन अपनी प्रेयसी नैना को
अपने से दूर करके उसके मित्र रोहित से उसका जीवन भर का साथ बना देने में निमित्त
बनता है। ‘आनंद’ में कोई दोषपूर्ण परिवार नहीं है जबकि ‘कल हो ना हो’ में अमन का पड़ोसी कपूर परिवार एक
दोषपूर्ण परिवार है जिसके दो महत्वपूर्ण सदस्यों के बीच अच्छे संबंध नहीं हैं तथा
उसका एक पीड़ादायी अतीत है। ‘आनंद’ के ‘मुरारीलाल’ वाले दृश्य से प्रेरणा लेकर ही करण जौहर ने ‘कल हो ना हो’ में ‘रामदयाल’ वाला प्रसंग रचा है। ‘आनंद’ एक गुदगुदाने वाली फ़िल्म होते हुए
भी मूलत: एक गंभीर फ़िल्म है जबकि ‘कल हो ना हो’ का काफ़ी सारा भाग एक हास्य फ़िल्म होने का आभास देता है एवं गंभीर पक्ष को
इसमें कम समय दिया गया है।
‘आनंद’ एक साफ़सुथरी फ़िल्म है जबकि ‘कल हो ना हो’ में रोहित की नौकरानी कांताबेन (सुलभा आर्य) के चरित्र को लेकर करण जौहर ने
अभद्र हास्य ठूंसने की मूर्खता की है जिससे फ़िल्म की गुणवत्ता कम ही हुई है। आनंद
दर्शकों को अपने आसपास का ही व्यक्ति लगता है जबकि अमन का चरित्र ‘लार्जर दैन लाइफ़’ है जो प्रभावित तो करता है लेकिन
किसी दूसरी ही दुनिया से आया हुआ लगता है। स्वाभाविक रूप से दोनों ही फ़िल्में
दुखांत हैं किंतु इनके केंद्रीय चरित्र दर्शकों के मन में अमिट छाप छोड़ जाते हैं। ‘आनंद’ एक छोटी-सी फ़िल्म है जबकि ‘कल हो ना हो’ एक अनावश्यक रूप से लम्बी फ़िल्म है। ‘आनंद’ में स्त्री पात्रों की भूमिकाएं छोटी हैं जबकि ‘कल हो ना हो’ में नायिका नैना की भूमिका नायक
अमन से भी अधिक लम्बी एवं प्रभावपूर्ण है। वस्तुतः ‘कल हो ना हो’ को नैना के आत्मकथ्य के रूप में ही प्रस्तुत किया
गया है।
दोनों ही फ़िल्मों
में मुख्य पात्रों सहित सभी कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय किया है। जहाँ राजेश
खन्ना ने आनंद के चरित्र को अमर कर दिया है वहीं शाह रुख़ ख़ान ने भी अमन के चरित्र
को अत्यन्त प्रभावी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है जो अपने दर्द को अपने ही भीतर
रखकर बाहर ख़ुशियां बिखेरते हैं। ‘कल हो ना हो’ के कई पात्र केवल हास्य पैदा करने हेतु रखे गए लगते हैं एवं इसी कारण बनावटी
लगते हैं। ‘कल हो ना हो’ में सास लाजवंती तथा बहू जेनिफ़र
के मध्य की दूरी एक फ़िल्मी संयोग द्वारा दूर करवाई गई है जिसके उपरांत वह परिवार
एक होता है। ऐसा कुछ ‘आनंद’ में नहीं है। ‘आनंद’ में गीत तो अवश्य हैं लेकिन ‘कल हो ना हो’ की भांति फ़िल्मी अंदाज़ का
नाच-गाना नहीं है। वैसे संगीत दोनों ही फ़िल्मों का सुमधुर है। ‘आनंद’ के गीत तो जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करने वाली
साहित्यिक कविताओं की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। ‘आनंद’ में नायक के साथ कोई नायिका नहीं है जबकि ‘कल हो ना हो’ में नायिका को हम नायक के साथ की ही नायिका मान सकते
हैं क्योंकि दोनों मन-ही-मन एक दूसरे से प्रेम करते हैं। ‘कल हो ना हो’ में अमन नैना को अपने से दूर करने के लिए अपने
विवाहित होने का झूठ बोलता है। इस संदर्भ में नायिका का अपनी मां जेनिफ़र से यह
कहना मुझे तर्कपूर्ण नहीं लगा कि यदि उसे अमन के विवाहित होने की बात पता होती तो
वह उससे प्रेम नहीं करती क्योंकि प्रेम जान-बूझकर नहीं किया जाता, बस हो जाता है।
‘कल हो ना हो’ में मनोरंजन तत्व प्रधान है जबकि ‘आनंद’ में भावनात्मक तत्व प्रधान है। इसीलिए ‘कल हो ना हो’ तुलनात्मक दृष्टि से अधिक मनोरंजन
प्रदान करती है। ‘आनंद’ एक क्लासिक है और सदा रहेगी जबकि ‘कल हो ना हो’ प्रमुखतः करण जौहर द्वारा प्रवासी
भारतीय दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई फ़िल्मों की श्रेणी में आने वाली फ़िल्म
लगती है। लेकिन यदि जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को विकसित करना हो तो इन
दोनों ही फ़िल्मों को देखा जा सकता है। अलग-अलग ढंग की फ़िल्में होने पर भी उनका
संदेश एक ही है जिसे ‘आनंद’ के इस संवाद द्वारा समझा जा सकता
है – ‘ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं’।
शनिवार, 14 फ़रवरी 2026
अंधविश्वासी मत बनिए लेकिन फ़िल्म देख लीजिए
इस रोचक फ़िल्म के विषय में कुछ भी कहने से पूर्व मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मेरा उद्देश्य न तो किसी अंधविश्वास को प्रसारित करना है और न ही समाज में व्याप्त किसी अंधविश्वास को पुष्ट करना है। चूंकि फ़िल्म अत्यन्त रोचक है तथा इसे देखकर भरपूर मनोरंजन होता है, इसीलिए मैं इस पर यह लेख लिख रहा हूँ यद्यपि यह कई अंधविश्वासों को अपने में समाहित किए हुए है। यह फ़िल्म है ‘नागिन’ (१९७६)।
फ़िल्म में ढेर सारे कलाकार भरे हुए हैं जिनको
फ़िल्म की पटकथा में यथास्थान बैठाया गया है। विजय (सुनील दत्त) अपने पाँच दोस्तों – किरण (अनिल धवन), राजेश (विनोद मेहरा), उदय (कबीर बेदी), सूरज (संजय ख़ान) तथा राज (फ़िरोज़ ख़ान) के साथ जंगल में
भ्रमण हेतु जाता है। वह इच्छाधारी नागों पर एक पुस्तक लिख रहा है। इसी संदर्भ में
उसकी भेंट एक इच्छाधारी नाग (जीतेंद्र) से ही हो जाती है जब वह उसे एक बाज़ से
बचाता है। जब वह अपने दोस्तों को उस इच्छाधारी नाग को मानव रूप में बदलते हुए
दिखाने के लिए लाता है तो किरण गोली मारकर उस नाग की हत्या कर देता है। नाग की आँख
में सभी दोस्तों की तस्वीरें आ जाती हैं जिन्हें देखने के बाद नाग की प्रेयसी
अर्थात् नागिन (रीना रॉय) उनसे प्रतिशोध लेती है अर्थात् एक-एक करके उन्हें मार
डालती है। अंत में केवल विजय ही बाक़ी बचता है जब उसे मारने के प्रयास में नागिन
स्वयं मारी जाती है।
फ़िल्म की शुरुआत ही एक बहुत रोचक दृश्य से होती
है जब मनुष्य के रूप में नाग पर एक बाज़ आक्रमण करता है जिसे गोली मारकर विजय नाग
की जान बचाता है। उसके उपरांत नाग की हत्या से जो तेज़ रफ़्तार कहानी शुरु होती है, वह दर्शक को सोचने हेतु एक पल की भी फ़ुरसत नहीं देती तथा
उसे सांस रोके हुए फ़िल्म को टकटकी लगाकर देखते चले जाने पर विवश कर देती है।
मंत्रमुग्ध-सा दर्शक कथा के प्रवाह के साथ-साथ बहते हुए फ़िल्म को तब तक देखता चला जाता है जब तक वह समाप्त नहीं हो
जाती। फ़िल्म दर्शकों को भरपूर मनोरंजन प्रदान करने के अपने उद्देश्य को सौ फ़ी सदी
पूरा करती है। किसी प्रबल जलधारा की मानिंद प्रवाहित होती हुई सम्पूर्ण फ़िल्म में ऊबाऊ पल न के बराबर हैं और यही
निर्माता-निर्देशक राजकुमार कोहली की सफलता है।
पुरुष कलाकारों का उल्लेख मैं फ़िल्म की कहानी
बताते समय ऊपर कर चुका हूँ। फ़िल्म में महिला कलाकारों की भी भरमार है। नागिन की
केंद्रीय भूमिका में रीना रॉय हैं जिनके साथ फ़िल्म में रेखा, मुमताज़, योगिता बाली, नीलम मेहरा, प्रेमा नारायण
आदि भी उपस्थित हैं। इतने सारे कलाकारों के साथ न्याय करना भी निर्देशक हेतु किसी
चुनौती से कम नहीं रहा होगा। लेकिन प्रशंसा करनी होगी निर्देशक की कि उसने पटकथा
को प्रस्तुत करते समय सभी कलाकारों के साथ उचित न्याय किया। यद्यपि विजय के रूप
में सुनील दत्त तथा नागिन के रूप में रीना रॉय को सबसे अधिक दृश्य एवं समय मिला है
किन्तु अन्य कलाकारों को भी उचित समय तथा अपनी अभिनय क्षमता दर्शाने का उचित अवसर
दिया गया है। निर्देशक सभी कलाकारों से अच्छा अभिनय करवाने में सफल रहा है। रीना
रॉय के अभिनय जीवन की तो यह सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा सकती है जिसमें
उन्होंने प्रभावी अभिनय किया है। प्रमुख कलाकारों के साथ-साथ एक चमत्कारी फ़कीर
बाबा के रूप में प्रेमनाथ, एक मवाली के
रूप में रंजीत, एक सपेरे के रूप में जगदीप
आदि ने भी अच्छा अभिनय किया है। मुमताज़ की रूमानी नायिका के रूप में यह अंतिम
फ़िल्म है जिसमें वे आकर्षक लगी हैं। बाल कलाकार मास्टर बिट्टू का अभिनय भी अच्छा
है।
फ़िल्म तकनीकी रूप से उच्च गुणवत्ता वाली है। दो
नागों की लड़ाई का दृश्य तथा नाग के मनुष्य रूप में एवं मनुष्य से पुनः नाग रूप में
बदलने के दृश्य अद्भुत हैं क्योंकि उस युग में कम्प्यूटर ग्राफ़िक नहीं थे। अतः यह
सोचने वाली बात है कि निर्देशक इन दृश्यों (तथा नाग एवं नागिन के अन्य विभिन्न
दृश्यों) को कैसे फ़िल्मा पाया। फ़िल्म का कला-निर्देशन भी अच्छा है और पार्श्व
संगीत एवं संवाद भी। छायाकार ने नाग तथा नागिन से संबंधित दृश्यों को फ़िल्माने में
कमाल कर दिखाया है। सम्पादक ने भी बहुत अच्छा काम किया है और अपनी कैंची कुछ इस
तेज़ी से चलाई है कि फ़िल्म अधिक लम्बी नहीं हो, केवल आवश्यक दृश्य सिलसिलेवार उसमें रहें जिन्हें दर्शक अपना दिल थामे देखता
चला जाए एक पल को भी नज़रें परदे से हटाए बिना।
लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने फ़िल्म में मधुर संगीत
दिया है। नाग-नागिन पर फ़िल्माया गया गीत ‘तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना’ कई बार फ़िल्म
में आता है और प्रभावित करता है। उसके अतिरिक्त अन्य गीत यथा ‘तेरा मेरा मेरा तेरा मेरा तेरा तेरा मेरा मिल गया दिल दिल से’, ‘हफ़्तों महीनों बरसों नहीं सदियों से हैं पुराने’ और ‘तेरे इश्क़ का मुझ पे हुआ ये असर है’ भी अच्छे बन पड़े
हैं। फ़िल्म के सुंदर गीत वर्मा मलिक ने लिखे हैं।
सार रूप में मुझे बस यही कहना है कि आप
अंधविश्वास पर आधारित इस कथा तथा इसमें समाहित अन्य अवधारणाओं पर विश्वास मत कीजिए
लेकिन इस फ़िल्म को (यदि अब तक आपने नहीं देखा है तो) देख लीजिए। आपको लगभग सवा दो घंटे का सम्पूर्ण मनोरंजन प्राप्त होगा तथा
फ़िल्म देखने के उपरांत कोई निराशा नहीं होगी, यह मेरी गारंटी है।
गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026
रहस्य की धुंध
निर्माता-निर्देशक बलदेवराज चोपड़ा ने बहुत-सी अच्छी फ़िल्में बनाई हैं जिनमें ‘कानून’ (१९६०) तथा ‘हमराज़’ (१९६७) जैसी उत्तम रहस्य फ़िल्में भी सम्मिलित हैं। उन्होंने ऐसी ही एक अच्छी रहस्य फ़िल्म ‘धुंध’ भी बनाई थी जो सन १९७३ में प्रदर्शित हुई थी। फ़िल्म की कथा के लिए उनकी फ़िल्म निर्माण संस्था ‘बी.आर. फ़िल्म्स’ के कथा-विभाग को श्रेय दिया गया किंतु वस्तुतः फ़िल्म की कहानी सुप्रसिद्ध रहस्य कथा लेखिका अगाथा क्रिस्टी के नाटक ‘द अनएक्सपेक्टिड गेस्ट’ (अप्रत्याशित अतिथि) पर आधारित है।
अब रानी चंद्रशेखर को पुलिस को बुलाने के लिए
कहती है तो चंद्रशेखर उससे कहता है कि पुलिस तो उसे हत्या के आरोप में गिरफ़्तार कर
लेगी जबकि उसने तो जान-बूझकर हत्या की नहीं है, साथ ही उसका अत्याचारी पति रंजीत तो इसी योग्य था। ऐसे में अपने आप को कानून
के हवाले करना समझदारी नहीं होगी। तब रानी उससे पूछती है कि उसे क्या करना चाहिए
तो चंद्रशेखर उसे बताता है कि पुलिस को ऐसी कहानी परोसी जानी चाहिए जिससे हत्या का
आरोप किसी बाहर से आए हुए अज्ञात व्यक्ति पर लगे, न कि उस पर। अब चंद्रशेखर की सलाह के अनुरूप तथा उसके सहयोग से रानी ऐसी
स्थिति बनाती है जिससे लाश पर घर की नौकरानी की दृष्टि पड़ती है तथा उसके शोर मचाने
के उपरांत ही पुलिस को बुलाया जाता है और बताया जाता है कि संभवतः कोई व्यक्ति
बाहर से आया और हत्या करके चला गया। पुलिस अपने ढंग से मामले की छानबीन में लग
जाती है और चंद्रशेखर को निर्देश देती है कि पुलिस को सूचना दिए बिना तथा उसकी
अनुमति लिए बिना वह शहर छोड़कर न जाए।
पुलिस मामले की गहराई में जाती है तो सुरेश एवं
रानी का प्रेम-संबंध उससे छुपा नहीं रहता। पुलिस को कुछ सूत्र ऐसे मिलते हैं जिनसे
हत्या का संदेह सुरेश पर जाता है। पुलिस सुरेश को गिरफ़्तार कर लेती है तथा उस पर
न्यायालय में रंजीत की हत्या का मुक़द्दमा चलता है। रानी सुरेश को बचाने के लिए
न्यायालय में स्वयं यह अपराध स्वीकार कर लेती है। पर क्या सुरेश हत्यारा है ? क्या रानी सच बोल रही है ? वास्तविकता का पता फ़िल्म के अंत में चलता है।
‘धुंध’ शब्द अपने आप में ही रहस्य
को समाहित किए हुए है। रहस्य के लिए अंग्रेज़ी में ‘मिस्ट्री’ शब्द का प्रयोग किया जाता
है जो ‘मिस्ट’ से बना है जिसका अर्थ ही है – धुंध। अपने नाम के अनुरूप ही
यह एक रहस्य में लिपटी कथा है जिसमें पति-पत्नी का संबंध भी समाविष्ट है तथा एक
प्रेमकथा भी। अपने प्रारंभिक दृश्य से लेकर अंतिम दृश्य तक रोचक यह फ़िल्म दर्शक को
बांधे रखती है। कहानी तो अच्छी है ही, बलदेवराज
चोपड़ा का निर्देशन भी कुशल है।
फ़िल्म तकनीकी दृष्टि से भी उत्कृष्ट है। संवादों से
लेकर सम्पादन, पार्श्व संगीत, कला-निर्देशन एवं
छायांकन तक सभी उत्तम हैं। हिल स्टेशन के नयनाभिराम दृश्य दर्शक के नयनों को
शीतलता प्रदान करते हैं। फ़िल्म की लंबाई भी कम है (मुश्किल से दो घंटे)। निर्देशक
ने दर्शकों को सोचने का समय नहीं दिया है। साहिर लुधियानवी के गीतों को संगीतकार
रवि ने मधुर धुनों से सजाया है। ‘संसार की हर शय का इतना ही
फ़साना है’ तथा ‘उलझन सुलझे ना’ गीत विशेष रूप से अच्छे बन पड़े हैं। पद्मा खन्ना तथा जयश्री तलपदे के
नृत्य वाला गीत ‘जो यहाँ था, वो वहाँ
क्यूंकर हुआ’ भी सुनने और देखने में अच्छा लगता है। सभी
कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। डैनी का अभिनय विशेष रूप से सराहना योग्य है।
कुल मिलाकर ‘धुंध’ एक छोटी-सी मगर दिलचस्प
फ़िल्म है जिसे बॉलीवुड में बनी
सर्वश्रेष्ठ रहस्य फ़िल्मों में शुमार किया जाता है। फ़िल्म में फ़ालतू बातें
बिलकुल नहीं हैं। प्रत्येक बात, प्रत्येक
दृश्य एवं प्रत्येक चरित्र फ़िल्म के कथानक से पूरी तरह संबद्ध है। फ़िल्म के
प्रदर्शन को आधी सदी से अधिक बीत जाने पर भी इसके रंग फीके नहीं पड़े हैं तथा किसी
नई फ़िल्म को देखने जैसा ही आनंद प्रदान करते हैं। यह फ़िल्म न केवल रहस्यकथाओं के
शौक़ीनों को बल्कि सामान्य फ़िल्में देखने वालों को भी पसंद आएगी। साथ ही यह फ़िल्म
उन लोगों को भी पसंद आएगी जिन्होंने अगाथा क्रिस्टी का नाटक ‘द अनएक्स्पेक्टिड गेस्ट’ पढ़ा है।
शुक्रवार, 30 जनवरी 2026
फ़िल्म में पुनर्जन्म की गाथा
हम हिंदू पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। पुनर्जन्म होता है, यह बात गीता में भी उद्धृत है। पर न इसे विज्ञान मानता है न देश का विधि-विधान। लेकिन पुनर्जन्म की अनेक कथाएं सुनाई जाती हैं और अनेक फ़िल्में भी इस विषय पर बनी हैं। ऐसी ही एक फ़िल्म है ‘ कुदरत’ (१९८१)। अनेक बड़े सितारों से युक्त इस फ़िल्म को व्यावसायिक सफलता तो नहीं मिली थी किंतु विषय के निर्वहन हेतु इसे सराहा गया था। फ़िल्म के लेखक-निर्देशक थे चेतन आनंद।
‘कुदरत’ की वास्तविक कहानी शुरु
होती है चंद्रमुखी के एक विचित्र स्वप्न देखकर डर जाने तथा एक अपरिचित व्यक्ति
मोहन (राजेश खन्ना) को माधो कहकर पुकारने से। मोहन सरकारी वकील है तथा उसे शिमला
के एक धनी व्यक्ति चौधरी जनक सिंह (राज कुमार) ने पाल-पोसकर बड़ा किया है। मोहन के
माता-पिता नहीं हैं तथा वह चौधरी जनक सिंह का अपने पर बहुत उपकार मानता है एवं उसकी पुत्री करुणा (प्रिया राजवंश) से विवाह करने को तैयार है। करुणा भी वकील है।
पर जब वह चंद्रमुखी के संपर्क में आता है तो
चंद्रमुखी उसे माधो तथा स्वयं को पारो कहकर पुकारने लगती है। चंद्रमुखी के
स्वप्नावस्था में डर जाने एवं अस्वस्थ हो जाने की स्थिति का उपचार करने के लिए
नरेश उसे सम्मोहित (हिप्नोटाइज़) करता है। सम्मोहनावस्था में चंद्रमुखी अपने पूर्व जन्म की
स्थिति में पहुँच जाती है। उस
स्थिति में वह स्वयं को पारो बताती है एवं यह भी बताती है कि उसे माधो से प्रेम
था। वह यह भी बताती है कि ‘छोटे सरकार’ द्वारा उसके साथ दुराचार किए जाने के उपरांत वे दोनों ही
मारे गए थे। ये ‘छोटे सरकार’ कोई और नहीं चौधरी जनक सिंह ही हैं। ये घटनाएं बीस वर्ष
पूर्व की हैं।
मोहन को यह सब पता चलता है तो उसे भी विश्वास हो जाता है कि माधो ने उसके रूप में तथा पारो ने चंद्रमुखी के रूप में पुनर्जन्म लिया है। साथ ही उसे चंद्रमुखी से प्रेम हो जाता है। वे सब अर्थात् मोहन, चंद्रमुखी एवं नरेश माधो की बुज़ुर्ग हो चुकी बहन सत्तो (अरुणा ईरानी) से भी मिलते हैं तथा माधो-पारो से संबंधित बहुत-सी बातें मालूम करते हैं। अब नरेश और मोहन दोनों को लगता है कि
चंद्रमुखी की अस्वस्थ मानसिक स्थिति एवं भयावह स्वप्नों का उपचार यही है कि दिवंगत पारो
और माधो को न्याय मिले। विभिन्न प्रकार के प्रमाणों को एकत्र करके मोहन चौधरी जनक
सिंह पर पारो की हत्या का मुकद्दमा दायर कर देता है। करुणा अपने पिता के लिए बचाव
पक्ष की वकील बन जाती है। विभिन्न अदालती दृश्यों के साथ-साथ कथानक में कई मोड़ आने
के बाद फ़िल्म अपने क्लाईमेक्स तक पहुँचती है।
किसी भी अनाड़ी फ़िल्मकार के हाथों से यह कहानी
ठीक ढंग से चित्रपट पर नहीं उतारी जा सकती थी किंतु चेतन आनंद भारत के अत्यन्त
सम्मानित फ़िल्मकार रहे हैं। उन्होंने अपनी ही इस कथा को अत्यन्त कुशलतापूर्वक
रजतपट पर उतारा है। फ़िल्म की पुनर्जन्म की कथा (तथा उससे जुड़ी कुछ अन्य बातें भी)
चाहे विश्वसनीय न लगे, यह आदि से अंत
तक रोचक है एवं दर्शकों को बांधे रखती है। फ़िल्म में राज कुमार, राजेश खन्ना, हेमा मालिनी, विनोद खन्ना एवं प्रिया राजवंश जैसे सितारे हैं एवं फ़िल्म
की पटकथा इन सभी सितारों के चरित्रों के साथ न्याय करती है। चेतन आनंद ने सभी से
अत्यन्त स्वाभाविक अभिनय करवाया है। सम्पूर्ण कथानक सहज रूप से प्रवाहित होता है
जिसमें एक-के-बाद-एक आते मोड़ दर्शक को एक मिनट के लिए भी इधर-उधर होने का अवसर
नहीं देते हैं।
तकनीकी दृष्टि से भी फ़िल्म की गुणवत्ता उत्कृष्ट
है। शिमला की नयनाभिराम दृश्यावली आँखों को शीतलता पहुँचाती है। कला-निर्देशक तथा छायाकार दोनों
ने ही अपना-अपना काम बाख़ूबी किया है। फ़िल्म का पार्श्व संगीत कथानक के अनुरूप ही
है। विभिन्न चरित्रों के संवाद भी अच्छे हैं। फ़िल्म की लंबाई कथानक को ध्यान में
रखते हुए ठीक ही है विशेषकर यह देखते हुए कि फ़िल्म में अनावश्यक बातें बिलकुल नहीं
हैं। प्रत्येक बात, प्रत्येक घटना एवं
प्रत्येक दृश्य मुख्य कथा से संबद्ध है।
मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों पर राहुल देव बर्मन
ने मधुर संगीत दिया है। ‘तूने ओ रंगीले
कैसा जादू किया’, ‘हमें तुमसे प्यार कितना’, ‘छोड़ो सनम काहे का ग़म’ आदि गीत तो फ़िल्म के
प्रदर्शन के समय लोगों की ज़ुबान पर चढ़ ही गए थे, अन्य
गीत भी बहुत अच्छे बन पड़े। ये गीत आज भी सुने जाने पर मन को एक सुखद अनुभूति से भर
देते हैं।
कुल मिलाकर ‘कुदरत’ एक अत्यन्त मनोरंजक एवं
प्रभावशाली फ़िल्म है। आप पुनर्जन्म में विश्वास करते हों या नहीं; यह फ़िल्म आपको पसंद आएगी, इसमें संदेह नहीं।







