शुक्रवार, 15 मई 2026

ये किसका लहू है ? कौन मरा ?

अगस्त १९४७ में भारत का विभाजन एक ऐसी भयावह त्रासदी था जिसमें कुछ निहित स्वार्थों के अतिरिक्त सभी हारे। इन निहित स्वार्थों में एक बहुत बड़ी संख्या समाजकंटकों की थी जिनके लिये यह त्रासदी मानो एक अवसर बनकर आई थी आपराधिक कार्यों हेतु। मेरा सदा से यह मानना रहा है कि साम्प्रदायिक दंगों के लाभार्थी केवल समाजकंटक ही होते हैं जिन्हें भीड़ की ओट में अपराध करने का अवसर मिल जाता है। और उत्पीड़ित केवल निर्दोष होते हैं। दंगे करने वाले पुरुष होते हैं लेकिन भुगतना सबसे अधिक पड़ता है महिलाओं को। विभाजन से एक वर्ष पूर्व ही जिन्ना की तथाकथित 'सीधी कार्रवाई' के आह्वान पर देश का एक बड़ा भाग हिन्दू-मुस्लिम दंगों की चपेट में आ गया था। अरसे से चला आ रहा साम्प्रदायिक सद्भाव मिट्टी में मिल गया था और भाईचारा नफ़रत में बदल गया था। निर्दोषों का ख़ून बह रहा था, सम्पत्तियां नष्ट हो रही थीं, बहन-बहू-बेटियों को अपमानित किया जा रहा था। साम्प्रदायिकता की आंधी में अंधे हो गए लोग यह नहीं सोच पा रहे थे कि ख़ून तो ख़ून होता है चाहे हिन्दू का हो या मुसलमान का; माँ-बहनों की इज़्ज़त एक-सी होती है चाहे हिन्दू की हों या मुसलमान की।

विभाजन के बाद भी एक लम्बे समय तक स्थितियां सामान्य नहीं हो सकीं। पर फिर सुविख्यात हिंदी साहित्यकार आचार्य चतुरसेन ने साम्प्रदायिक सद्भाव पर एक उपन्यास लिखा - धर्मपुत्र। यह एक असाधारण उपन्यास है जिसे आधार बनाकर बलदेवराज चोपड़ा ने इसी नाम से एक हिंदी फ़िल्म बनाई जिसका निर्देशन यश चोपड़ा ने किया। फ़िल्म १९६१ में प्रदशित हुई। इस कहानी के केन्द्र में एक युवक है जो मुस्लिम माता-पिता की संतान है लेकिन जिसका लालन-पालन एक हिन्दू परिवार ने अपनी संतान की तरह किया है। यह उपन्यास एक कालजयी उपन्यास है और इस पर बनाई गई फ़िल्म भी बहुत अच्छी है। इसी फ़िल्म में साहिर की अमर नज़्म है - ये किसका लहू है ? कौन मरा ?

'धर्मपुत्र' की कहानी भारत की स्वतंत्रता एवं विभाजन से बहुत पहले एक वयोवृद्ध नवाब मुश्ताक़ अहमद के डॉक्टर अमृतराय के क्लीनिक पहुँचने से शुरू होती है। वे डॉक्टर के स्वर्गवासी पिता के मित्र रहे हैं तथा उन्होंने ही डॉक्टर की शिक्षा-दीक्षा का व्यय उठाया था। उनकी समस्या यह है कि उनकी इकलौती और बिना माँ-बाप की पोती हुस्नबानू विवाह के बिना ही गर्भवती हो चुकी है तथा वे उसका विवाह एक अन्य नवाब से तय कर चुके हैं। उस युग में गर्भपात अवैधानिक था। वे प्रस्ताव रखते हैं कि डॉक्टर जो विवाहित तो हैं किन्तु अभी तक संतान से रहित हैं, उनकी पोती के बच्चे को अपना बच्चा घोषित करके हिन्दू रीति-रिवाज़ों से ही पालें। अर्थात् वे बच्चे के धर्मपिता बनें किन्तु समाज की दृष्टि में वह बच्चा उनका और उनकी पत्नी का अपना बच्चा ही कहलाए।

नवाब मुश्ताक़ अहमद डॉक्टर की पत्नी अरुणा से भी बात करते हैं तथा उन्हें भी इस काम के लिये मना लेते हैं। नवाब के प्रस्ताव में प्रलोभन भी बहुत था क्योंकि वे बहुत-सी सम्पत्ति उस बालक के नाम करने वाले थे। नवाब की योजना के अनुरूप ही बालक का जन्म उनके दिल्ली स्थित निवास से दूर मसूरी में होता है तथा डॉक्टर व अरुणा हुस्नबानू के उस बच्चे को अपना बच्चा बताकर अपने घर ले आते हैं। फिर धूमधाम से उत्सव मनाकर अपने आत्मीय जनों के समक्ष उस बच्चे (लड़के) का नामकरण करते हैं - दिलीप। नवाब अपने वचन के अनुसार बहुत बड़ी जायदाद दिलीप के नाम कर देते हैं। हुस्नबानू का नवाब द्वारा तय किया हुआ विवाह हो जाता है। 

आने वाले वर्षों में डॉक्टर दंपती के अपने तीन बच्चे होते हैं - सुशील और शिशिर नामक पुत्र तथा करुणा नामक पुत्री। बच्चे बड़े होते हैं और अलग-अलग विचारधाराओं में ढलते हैं। दिलीप कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी बनता है तो सुशील साम्यवादी विचारों का समर्थक तो शिशिर कांग्रेसी। तीनों उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। उनकी छोटी और लाड़ली बहन करुणा लेडी हार्डिंग कॉलेज में चिकित्सा की पढ़ाई कर रही है। वह किसी विचारधारा को नहीं मानती, केवल मानवता से ओतप्रोत है। वह दिलीप को चिढ़ाती है - 'भैया, इस हिन्दू धर्म का तो बेड़ा ही ग़र्क़ होगा। और सब एक ओर रहें - केवल स्त्रियों के आँसुओं के समुद्र में ही वह डूब जाएगा'। ये भाईबहन नहीं जानते कि इनमें सबसे बड़ा भाई वस्तुतः मुस्लिम माता-पिता की संतान है।

दिलीप के लिये राय राधाकृष्ण की पुत्री माया का रिश्ता आता है। दिलीप माया को बिना देखे ही यह सोचकर मना कर देता है कि उच्च शिक्षा प्राप्त वह युवती निश्चय ही पश्चिमी संस्कारों में ढली होगी तथा भारतीय संस्कारों से रहित होगी। इसके अतिरिक्त राय साहब को उनकी विदेश-यात्रा के कारण उनके समुदाय ने जाति से बहिष्कृत किया हुआ है (एक सदी पहले बहुत-से हिंदू समाजों में समुद्र-पार जाने को अनुचित मानने एवं जाने वाले को जाति से बाहर कर देने की कुप्रथा थी)। अब डॉक्टर परेशान हो जाते हैं क्योंकि वे तो राय साहब को रिश्ते की स्वीकृति दे चुके हैं। राय साहब स्वयं माया को साथ लेकर डॉक्टर के यहाँ पहुँचते हैं। जब वे दिलीप से बात करते हैं तो दिलीप उन्हें भी इस रिश्ते के लिये मना कर देता है। पर जब माया दिलीप से मिलती है और उसे अपनी माता द्वारा उपहार स्वरूप भेजी गई घड़ी देती है तो स्थिति कुछ और ही हो जाती है।

होता यह है कि दिलीप और माया पर प्रथम दृष्टि का प्रेम वाली कहावत लागू हो जाती है। पहली नज़र में ही वे दोनों एकदूसरे को अपना दिल दे बैठते हैं। पर दिलीप तो रिश्ते के लिये मना कर चुका है। अब क्या किया जाए ? इधर माया के व्यक्तित्व से प्रभावित डॉक्टर एवं अरुणा राय साहब से उसका रिश्ता सुशील के लिये माँगते हैं तो राय साहब तुरंत उत्तर नहीं देते और लौट जाते हैं। वे माया की माता से इस संबंध में बात करते हैं तो वे स्पष्ट इनकार कर देती हैं - 'हमारी बेटी कोई बिक्री का सौदा नहीं है कि एक ग्राहक से सौदा न पटा तो दूसरे से पटा दिया। बड़े भाई को जूता ओछा पड़ा तो छोटे ने पहन लिया'। राय साहब डॉक्टर को इस संबंध में कोई उत्तर नहीं देते तथा सोच लेते हैं कि अब इस परिवार में रिश्ते की बात ही न की जाए। लेकिन जब उन्हें माया के मन की बात पता चलती है तो वे भी परेशान हो जाते हैं।

नौ अगस्त, १९४२ की अलस्सुबह। अगस्त क्रांति की शुरुआत। गांधीजी सहित सभी चोटी के नेता गिरफ़्तार कर लिये जाते हैं। देश भर में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध प्रदर्शन होने लगते हैं। शिशिर प्रदर्शनकारियों के समूह के समक्ष भाषण देता है और गिरफ़्तार हो जाता है। दिलीप वैसे तो कांग्रेस से घृणा करता है और गांधीजी को 'हिन्दू मुल्ला' कहता है लेकिन भाई के प्रेम की पुकार को वह अनसुना नहीं कर पाता। वह भी अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध एक ओजस्वी भाषण देता है। उस सभा पर अंग्रेज़ी पुलिस गोलीबारी करती है और दिलीप भी गिरफ़्तार कर लिया जाता है। 

वह दिन भी आता है जब दोनों भाई घर लौटते हैं। डॉक्टर दम्पती को अब अपने लड़कों के विवाह की चिंता है। राय साहब के घर में बात न बन पाने के बाद और किसी जगह उनके किसी लड़के के विवाह की बात चली ही न थी। कुछ समय बाद देश का हिंदू-मुस्लिम सद्भाव नष्ट होने लगता है और साम्प्रदायिक दंगे होने लगते हैं। अब हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए अंग्रेज़ शत्रु नहीं रहे हैं। अब वे एकदूसरे के शत्रु बन बैठे हैं। निर्दोषों का ख़ून बहने लगता है, माँ-बहन बहू-बेटियां बेइज़्ज़त होने लगती हैं। स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा देश दंगों की आँच में झुलसने लगता है। गुंडे-बदमाशों की बन आती है और निर्दोषों के लिए जीना मुश्किल होने लगता है।

हुस्नबानू अब विधवा हो चुकी है और अपने दो पुराने नौकरों के साथ अपने दादा के पुराने रंगमहल में आकर रहने लगी है। दंगाइयों की भीड़ रंगमहल में आग लगाने आती है। इस भीड़ का नेतृत्व कर रहा है दिलीप। हुस्नबानू को बचाने अरुणा को साथ लेकर डॉक्टर आते हैं और वे दिलीप पर बंदूक तान देते हैं। हुस्नबानू के मुख से शब्द फूटते हैं - 'दि...लीप'। 'हाँ बहन, यही है दिलीप। देख लो इसे आख़िरी बार और पहली बार', अरुणा कहती हैं और फिर अपने पति से संबोधित होती हैं, 'मार दो गोली'।

फिर क्या होता है ? जानने के लिये पढ़िए उपन्यास।

'धर्मपुत्र' कोई आम उपन्यास नहीं, हिंदी साहित्य की धरोहर है। इस बेहतरीन साहित्यिक कृति पर बलदेवराज चोपड़ा ने फ़िल्म बनाने का साहस किया और 'धर्मपुत्र (१९६१) दर्शकों के समक्ष आई। उस समय तक विभाजन के घाव सूखे नहीं थे। अतः कई स्थानों पर फ़िल्म को विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा और कई सिनेमाघरों से फ़िल्म को उतारना पड़ गया। लेकिन इसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 

फ़िल्म में उपन्यास से थीम ली गई है लेकिन इसकी पटकथा जो कि बी.आर. फ़िल्म्स के कहानी विभाग द्वारा रची गई है, उपन्यास से काफ़ी भिन्न है। बहुत-से परिवर्तन किए गए हैं जिसके कारण फ़िल्म उपन्यास जैसी प्रभावशाली नहीं बन सकी है। फिर भी निश्चय ही यह फ़िल्म देखने लायक है और इसका गीत-संगीत तो बहुत ही अच्छा है। हुस्नबानू की भूमिका में माला सिन्हा, दिलीप की भूमिका में शशि कपूर, डॉक्टर की भूमिका में मनमोहन कृष्ण तथा उनकी पत्नी की भूमिका में निरुपा रॉय ने बेहतरीन अभिनय किया है। साहिर के गीतों पर एन. दत्ता ने सुमधुर संगीत रचा है। फ़िल्म में 'मैं जब भी अकेली होती हूँ', 'आज की रात', 'तुम्हारी आंखें', 'नैना क्यूं भर आये', 'जो ये दिल दीवाना मचल गया', 'ये किसका लहू है, कौन मरा' आदि बेहतरीन गीत हैं। आरंभ में 'सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' भी है। 

'धर्मपुत्र' उपन्यास दो संस्करणों में उपलब्ध है। एक बड़ा संस्करण है, दूसरा संक्षिप्त संस्करण। मैंने दोनों पढ़े हैं। संक्षिप्त संस्करण अपने बड़े (बड़ी कहानी कहने वाले) संस्करण से बेहतर है क्योंकि इसमें लेखक ने अनेक अनावश्यक प्रसंग (एवं अनावश्यक पात्र) हटा दिए हैं तथा कथ्य को मूल विषय-वस्तु पर ही केन्द्रित रखा है। इससे कथ्य की गति एवं मनोरंजन प्रदान करने की क्षमता बढ़ गई हैं। इस उपन्यास में आचार्यजी ने संस्कृतनिष्ठ हिंदी का प्रयोग न करके बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है। उर्दू के शब्दों की भी इसमें प्रचुरता है। ऐसा करने से कथ्य अधिक प्रभावी बन पड़ा है। 

आचार्यजी ने अनायास ही एकदूसरे से प्रेम कर बैठे दिलीप और माया की रूमानी भावनाओं का कुशलता से चित्रण किया है जो पाठकों के मन को छू लेता है। भाईबहनों का स्नेह भी कथानक में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और स्त्रीपुरुष का पारस्परिक आकर्षण भी। विवाह करने जा रही कन्या के आत्मसम्मान को भी इसमें रेखांकित किया गया है। उपन्यास के विभिन्न पात्रों की बातें तथा विभिन्न विवरण मानवतावादी लेखक आचार्य चतुरसेन के अपने विचारों एवं भावनाओं का ही प्रतिबिम्ब हैं। कुछ पात्रों को छोड़कर आचार्यजी ने कथानक के सभी प्रमुख पात्रों को अपने आप उभरने एवं भलीभांति विकसित होने का अवसर दिया है। एक स्थान पर लेखक के अम्बेडकर-विरोधी होने का संकेत भी मिलता है।

आज आचार्य चतुरसेन जैसे साहित्यकार उपलब्ध नहीं हैं जो ऐसी असाधारण कृति रचकर पाठक समुदाय को प्रस्तुत करें और न ही बलदेवराज चोपड़ा और यश चोपड़ा जैसे साहसी फ़िल्मकार अब हैं। भारत के वर्तमान राजनीतिक वातावरण में तो ऐसी फ़िल्म बन ही नहीं सकती। कोई बना दे तो भारतीय सेंसर बोर्ड ही उसे पास नहीं करेगा। लेकिन उस युग का यह क्लासिक उपन्यास तथा उस युग की यह क्लासिक फ़िल्म अवलोकन हेतु उपलब्ध हैं। उपन्यास तथा फ़िल्म दोनों ही सभी मानवतावादियों को पसंद आएंगे। 

मेरा तो यही मानना है कि इंसानियत ही सबसे पहला धर्म है इंसान का। क्या व्यक्ति को किसी विशिष्ट धर्म का अनुयायी होने के स्थान पर केवल मनुष्य होकर जीने का अधिकार नहीं है ? देश और मानवता को साम्प्रदायिक सद्भाव चाहिए, न कि साम्प्रदायिक विद्वेष। 'धर्मपुत्र' यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित दूसरी ही फ़िल्म है। उनकी पहली निर्देशित फ़िल्म 'धूल का फूल' (१९५९) का एक गीत है - 'तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा; इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा'। मेरी नज़र में तो जो ईश्वर मस्जिद में है, वही मंदिर में है। 'धर्मपुत्र' फ़िल्म का एक गीत (कव्वाली) भी है - 'ये मस्जिद है, वो बुतख़ाना (मंदिर); चाहे ये मानो, चाहे वो मानो'।  

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मंगलवार, 12 मई 2026

नई 'साजन' पसंद है आपको ! पुरानी भी आयेगी !

'साजन' शीर्षक से तीन बार हिंदी फ़िल्में बनी हैं - १९४७ में, १९६९ में और १९९१ में। इनमें से १९९१ में बनी 'साजन' सर्वाधिक सफल रही है जिसमें संजय दत्त, माधुरी दीक्षित तथा सलमान ख़ान ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं। इस फ़िल्म का गीत-संगीत तो आज भी लोकप्रिय है। यह एक सम्पूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली फ़िल्म थी जो आज भी यदि पुनः प्रदर्शित हो जाए तो दर्शकों का प्रतिसाद अवश्य ही पायेगी। 

लेकिन इस फ़िल्म के आने से बाईस वर्ष पूर्व अर्थात् १९६९ में 'साजन' शीर्षक से जो फ़िल्म आई थी, वह भी कम मनोरंजक नहीं है। इस 'साजन' के प्रमुख कलाकार हैं मनोज कुमार एवं आशा पारेख। इस फ़िल्म की विशेषता यह है कि अपने प्रथम भाग में तो यह एक रोमांटिक कॉमेडी की तरह मनोरंजन प्रदान करती है जबकि द्वितीय भाग में यह एक हत्या के रहस्य पर केंद्रित हो जाती है तथा अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है।


फ़िल्म आरंभ होती है एक युवती रजनी (आशा पारेख) से जो कि एक नाटक कंपनी में काम करती है। इस संसार में उसका अपनी माँ के अलावा कोई और नहीं है। वह एक दिन एक कार से लिफ़्ट मांगकर अपने कार्यस्थल पर पहुँचती है। उसे पता नहीं है कि यह कार एक बहुत बड़े व्यवसायी अशोक (मनोज कुमार) की है। चूंकि कार्यस्थल पर कुछ लोग इस कार को पहचान लेते हैं, यह अफ़वाह उड़ जाती है कि रजनी का अशोक से प्रेम-संबंध (अफ़ेयर) है। कम्पनी के हित में रजनी भी इसका खण्डन नहीं करती। लेकिन जब यह बात समाचार-पत्रों में छप जाती है तो उसे पढ़कर अशोक रजनी से मिलने पहुँचता है। अब होता यह है कि रजनी से मिलकर वह रजनी के प्रेम में पड़ जाता है। पहले तो वह अपनी वास्तविकता रजनी से छुपाता है लेकिन अंततः रजनी सब कुछ जान ही जाती है। वह भी अशोक से प्रेम करने लगती है। रजनी की माँ और अशोक के पिता इस रिश्ते को स्वीकार कर लेते हैं।

लेकिन अचानक धरमदास नामक एक व्यक्ति जो कि रजनी की माँ से पूर्व-परिचित है, उसे ब्लैकमेल करने लगता है क्योंकि वह जानता है कि रजनी के पिता एक हत्या के आरोप में जेल में बंद हैं। यह आरोप और किसी की नहीं धरमदास की ही हत्या का है जिसका कि वास्तविक नाम शेरू है और जो एक मुजरिम है। धरमदास रजनी की माँ को ये बातें अशोक के पिता को बता देने की धमकी देता है। अब स्थितियां कुछ ऐसी बनती हैं कि रजनी, अशोक और अशोक का वफ़ादार वाहन-चालक बालम (जिसने आरंभ में रजनी को लिफ़्ट दी थी) अलग-अलग समय पर धरमदास से मिलने पहुँचते हैं। अगले दिन सुबह धरमदास मरा पड़ा पाया जाता है। किसी ने उसे गोली मार दी थी। पुलिस की पूछताछ में अशोक, रजनी और बालम तीनों ही इस अपराध को स्वीकार कर लेते हैं। अब पुलिस इस दुविधा में पड़ जाती है कि इनमें से वास्तविक हत्यारा कौन है। सच्चाई का पता फ़िल्म के क्लाईमेक्स में चलता है।

फ़िल्म का प्रथम भाग एक बहुत पुरानी विदेशी फ़िल्म 'हैप्पी गो लवली' (१९५१) से प्रेरित है। यह भाग दर्शकों को गुदगुदाने में पूरी तरह सफल है। इस भाग की कहानी लेकर बासु चटर्जी ने 'पसंद अपनी अपनी' (१९८३) नामक फ़िल्म बनाई थी जिसमें मिथुन चक्रवर्ती तथा रति अग्निहोत्री ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं। इसके अतिरिक्त आमिर ख़ान एवं असिन अभिनीत 'गजनी' (२००८) का प्रारंभिक भाग भी इसी से प्रेरित था। इस भाग में गीत भी हैं तथा नायक-नायिका का रोमांस भी। और कॉमेडी तो है ही। 'साजन' का यह भाग (उस ज़माने की) हिंदी फ़िल्मों के पारम्परिक दर्शकों के लिये है जिन्हें भरपूर मनोरंजन प्राप्त होता है।

'साजन' का आगे का भाग रहस्यकथाएं पसंद करने वालों के लिये है। हत्या का रहस्य बहुत पेचीदा है तथा वास्तविक हत्यारे का अनुमान लगाना दर्शकों के लिये बहुत कठिन है। फ़िल्म का प्रारंभिक भाग जहाँ मंद गति से चलता है, वहीं यह भाग बहुत तीव्र गति से बढ़ता है एवं दर्शकों को सोचने का समय नहीं देता। जब क्लाईमेक्स में अदालत के दृश्य में रहस्य खुलता है, तब ही दर्शक जान पाते हैं कि वास्तविकता क्या थी। यह भाग भी बहुत रोचक है एवं दर्शकों को स्क्रीन के सामने से हटने नहीं देता।

'साजन' एक आदि से अंत तक रोचक फ़िल्म है जिसकी कहानी कहीं पर भी ढीली नहीं पड़ती। प्रथम दृश्य से ही जो मनोरंजक दृश्यों का सिलसिला आरंभ होता है, वह अंत तक चलता रहता है। फ़िल्म के लेखक एवं निर्देशक दोनों ने ही सराहनीय कार्य किया है। फ़िल्म के सभी तकनीकी पक्ष अच्छे हैं। एक पल के लिये भी यह फ़िल्म दर्शक को बोर नहीं करती। मनोज कुमार एवं आशा पारेख सहित सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। अत्यन्त युवा शत्रुघन सिन्हा की यह पहली फ़िल्म है।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने आनंद बक्शी के गीतों पर सुमधुर संगीत दिया है। शीर्षक गीत 'साजन साजन पुकारूं गलियों में' तो बहुत अच्छा है ही, अन्य गीत भी सुरीले एवं मनभावन हैं (यथा 'रेशम की डोरी', 'बाँसुरी तिहारी नंदलाल' आदि)।

कुल मिलाकर यह पुरानी 'साजन' यदि नई 'साजन' के समकक्ष नहीं है तो मनोरंजन प्रदान करने के मामले में उससे पीछे भी नहीं है। यह संगीतमय रोमांटिक फ़िल्में पसंद करने वालों के लिये भी है तो कॉमेडी देखने वालों के लिये भी तथा रहस्य-प्रधान फ़िल्मों के शौकीनों के लिये भी। पारम्परिक हिंदी सिनेमा देखने वाले प्रत्येक वर्ग को यह फ़िल्म पसंद आयेगी, इसमें संदेह नहीं।

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बुधवार, 6 मई 2026

वेद प्रकाश शर्मा और सुभाष चंद्र बोस

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के विभिन्न नायकों (एवं नायिकाओं) में से किसी ने मेरे हृदय पर स्थायी रूप से आधिपत्य जमाया है तो वे हैं नेताजी सुभाष चंद्र बोस। सुभाष बाबू ने अपने जीवन को ऐसे जिया कि आज उसका सिंहावलोकन करने पर एक रूमानियत का अहसास होता है। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने जो कर दिखाया, वह आज एक स्वप्न सरीखा लगता है। वे मेरे प्रेरणा-स्रोत रहे हैं और रहेंगे। उनके प्रशंसकों की संख्या वैसे तो करोड़ों में है लेकिन मैं एक व्यक्ति को निश्चय ही जानता हूँ जिसके मन में सुभाष बाबू का वही स्थान रहा जो मेरे मन में है। वह व्यक्ति है - हिंदी उपन्यासकार स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा।

वेद प्रकाश शर्मा ने यूँ तो भारत के स्वाधीनता संग्राम को आधार बनाकर कई उपन्यास लिखे किंतु वे सुभाष बाबू के व्यक्तित्व की दृढ़ता एवं अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठा से बहुत अधिक प्रभावित रहे और उन्होंने कुछ उपन्यास ऐसे लिखे जिनमें सुभाष बाबू स्वयं एक पात्र के रूप में उपस्थित हैं। प्रमुखतः दो ऐसे कथानक उन्होंने रचे - पहला 'ख़ून दो आज़ादी लो' व 'बिच्छू' नामक दो भागों में विभाजित कथानक तथा दूसरा 'जय हिंद' व 'वंदे मातरम' नामक दो भागों में विभाजित कथानक। पहला कथानक पराधीन भारत में अंग्रेज़ों से लोहा ले रहे क्रांतिकारियों की गतिविधियों का वर्णन करता है जबकि दूसरा कथानक स्वाधीन भारत में सुभाष बाबू के जीवन से प्रेरित भारतीय युवकों के एक विदेशी षड्यंत्र द्वारा गुमराह हो जाने का वर्णन करता है। मैं अपने इस लेख में इन्हीं दोनों कथानकों की जानकारी दे रहा हूँ।

'ख़ून दो आज़ादी लो' व 'बिच्छू': वेद प्रकाश शर्मा ने भारत की स्वतंत्रता हेतु अंग्रेज़ों से जूझने वाले एक क्रांतिकारी दल की गतिविधियों को आधार बनाते हुए 'वतन की कसम' नामक थ्रिलर उपन्यास लिखा था जो अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। उसकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर वेद जी ने उसका सीक्वल लिखने का निर्णय लिया जो कि इन उपन्यासों के रूप में सामने आया। 'वतन की कसम' के अंतिम दृश्य से आरंभ हुए इस कथानक में बताया गया है कि 'वतन की कसम' में जिस क्रांति दल का उल्लेख था, वास्तविक क्रांति दल उससे बहुत अधिक बड़ा है जिसके सरदार की वास्तविकता कोई नहीं जानता है। सरदार नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अपना आदर्श एवं प्रेरणा-स्रोत मानता है तथा समय-समय पर उनसे मार्गदर्शन लेता है। नेताजी उसे मार्गदर्शन देने के अतिरिक्त दल की गतिविधियों में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाते हैं। वह अपनी वास्तविकता केवल नेताजी पर ही प्रकट करता है। 

क्रांति दल की गतिविधियों के साथ-साथ एक समानांतर कहानी गगन, धरा एवं नीला नामक तीन व्यक्तियों की भी चलती है। विद्यार्थी जीवन में वे साथ-साथ पढ़ते थे। नीला एवं धरा सहेलियां थीं। गगन को धरा से प्रेम था जबकि नीला को गगन से। धरा गगन को उसे अपनी बहन स्वीकार करने हेतु मना लेती है और वह नीला से विवाह कर लेता है। अब इन घटनाओं को बारह वर्ष बीत चुके हैं तथा गगन एवं नीला का एक दस वर्षीय पुत्र भी है - टिंकू। गगन के पिता एक उद्योगपति हैं तथा अंग्रेज़ सरकार के पिट्ठू बने हुए हैं जबकि नीला के पिता अंग्रेज़ सरकार के वफ़ादार पुलिस अधिकारी हैं। गगन ने अपने कॉलेज जीवन की सारी बातें (धरा एवं नीला से संबंधित बातों सहित) एक डायरी में लिख रखी हैं जिन्हें वह समय-समय पर पढ़ता रहता है। लंबे समय से उसे धरा की कोई ख़बर नहीं है।

क्रांति दल अंग्रेज़ सरकार के पिट्ठू बने हुए लोगों के पीछे पड़ा रहता है। स्वभावतः वह गगन के पिता के भी पीछे पड़ता है। इधर एक अनजान व्यक्ति जो स्वयं को बिच्छू के नाम से संबोधित करता है, भी गगन के पिता के पीछे पड़ जाता है। गगन स्वयं क्रांति दल में सम्मिलित है। एक दिन अचानक उसकी मुलाक़ात धरा से भी हो जाती है। इधर अंग्रेज़ सरकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस को नज़रबंद कर लेती है तथा वे देश से भागकर विदेश जाने की योजना बनाते हैं जिसमें क्रांति दल का सरदार उन्हें सहयोग देता है। देश से बाहर निकलते समय सरदार के कहने से वे गगन और धरा को भी साथ ले जाते हैं। कथानक के अंत में एक ओर तो गगन एवं धरा सुभाष बाबू के साथ-साथ ही विमान-दुर्घटना में फंसकर (सुभाष बाबू को बचाते हुए) शहीद हो जाते हैं जबकि दूसरी ओर संपूर्ण क्रांति दल अंग्रेज़ों के साथ हुई मुठभेड़ में समाप्त हो जाता है। 

इस कथानक में दर्शाई गई कई बातें विश्वसनीय नहीं हैं लेकिन कथानक अत्यन्त रोचक भी है एवं प्रेरक भी। क्रांति दल का सरदार तथा बिच्छू नामक व्यक्ति वास्तव में कौन हैं, यह उपन्यास के अंत में ही पता लगता है। इस वृहत् कथानक में प्रारम्भ से अंत तक देशप्रेम के साथ-साथ एक रहस्य का वातावरण बना रहता है जो कि पाठक को अंतिम दृश्य तक बांधे रखता है। अंतिम पंक्तियों में भी एक रहस्य का ख़ुलासा होता है जो पाठक को चौंका देता है। उपन्यास में भावनाओं का भी भरपूर सम्प्रेषण है। गगन, धरा एवं नीला के पात्रों के माध्यम से मानवीय संबंधों का बड़ा ही सजीव एवं भावुकतापूर्ण चित्रण किया गया है। कुछ कमियों के बावजूद यह एक श्रेष्ठ उपन्यास है जिसमें मानवीय प्रेम भी है तो देश प्रेम भी, एक्शन भी है तो रहस्य भी और सबसे बढ़कर एक पात्र के रूप में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की उपस्थिति भी जो कि उपन्यास के क्रांति दल के लिये ही नहीं, पाठकों के लिये भी प्रेरणा-स्रोत हैं। वैसे तो 'वतन की कसम' अपने आप में संपूर्ण एवं पृथक् उपन्यास है, फिर भी यदि इस कथानक को पढ़ने से पूर्व 'वतन की कसम' को पढ़ लिया जाए तो इसका अधिक आनंद उठाया जा सकता है। 

'जय हिंद' व 'वंदे मातरम': दो भागों में प्रस्तुत यह कथानक वेद प्रकाश शर्मा की विजय-विकास सीरीज़ के अंतर्गत लिखा गया है। इसमें बताया गया है कि देश के युवकों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रति जो सम्मान की भावना है, उसका लाभ उठाकर एक विदेशी षड्यंत्र भारत को अस्थिर करने हेतु रचा जाता है एवं एक नक़ली सुभाष चंद्र बोस प्रस्तुत कर दिये जाते हैं जो कि एक तथाकथित 'अखंड हिंद फ़ौज' की स्थापना कर रहे हैं। बहुत-से देशभक्त युवक उस कथित नेताजी के प्रभाव में आकर उसके दल से जुड़ जाते हैं जिनमें विकास के पिता रघुनाथ भी हैं।  उपन्यास के घटनाक्रम का स्थान राजनगर नामक एक कल्पित नगर है (विजय-विकास सीरीज़ के उपन्यास प्रायः इसी नगर में घटित होते हैं)। जब भारतीय सीक्रेट सर्विस को इन बातों का पता चलता है तो भारतीय गुप्तचर विजय और विकास इस षड्यंत्र को विफल करके निर्दोष भारतीय युवकों को वास्तविकता से अवगत करवाने की ज़िम्मेदारी लेते हैं। इधर वे अपना काम शुरु करते हैं, उधर नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्वयं विजय के यहाँ पहुँच जाते हैं। अब वे असली सुभाष हैं या नक़ली, यह जानना विजय के लिये ज़रूरी हो जाता है। अंत में वास्तविक नेताजी पुनः परिदृश्य से बाहर हो जाते हैं जबकि नक़ली नेताजी बने बैठे विदेशी एजेंट की योजना को विफल करके उसके चंगुल में फंस गये निर्दोष भारतीय युवकों को उसकी वास्तविकता बताकर उसके षड्यंत्र से बाहर निकाल लिया जाता है। 

दो भागों में फैला हुआ यह कथानक बहुत रोचक है किंतु इसमें थ्रिल ही अधिक है, सस्पेंस नहीं। नेताजी बना बैठा व्यक्ति किसी विदेशी षड्यंत्र का हिस्सा है, यह बात बहुत पहले ही स्पष्ट कर दी जाती है, अतः यह कोई रहस्य उत्पन्न नहीं करती। रहस्य वास्तव में कथानक के प्रथम भाग के अंतिम दृश्य में आता है जबकि विजय स्वयं से मिलने आये नेताजी पर संदेह करता है तथा वे वास्तविक हैं या नहीं, यह जानने के लिये अपना दिमाग़ लगाता है। उपन्यास इस बात को रेखांकित करता है कि सुभाष बाबू के प्रशंसक तथा उनके जीवन से प्रेरणा लेने वाले असंख्य लोग भारत में हैं तथा कोई भी व्यक्ति (अथवा भारत का शत्रु देश) इस तथ्य का अनुचित लाभ उठा सकता है। अपने नाम पर की गई विदेशी साज़िश को नाकाम करने के लिए स्वयं नेताजी भारतीय जासूसों को किस प्रकार सहयोग देते हैं, यह भी बड़े रोचक ढंग से चित्रित किया गया है। कुल मिलाकर कथानक आरंभ से अंत तक पाठक को बांधे रखने वाला एवं प्रभावी है। यह उपन्यास लेखक की विजय-विकास सीरीज़ के संसार (परिवेश एवं विभिन्न पात्रों) से भी पाठकों का परिचय करवाता है। 

सुभाष बाबू हमारे स्वतंत्रता संग्राम के एक विलक्षण नायक रहे हैं जिन्होंने अपनी अत्यन्त विषम परिस्थितियों में भी अंग्रेज़ सरकार को चकमा देकर देश से निकलने एवं विदेश में आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन करके भारत में शासन कर रही गोरी सरकार को चुनौती देने का ऐसा साहसिक कार्य कर दिखाया जिसके विषय में दूसरा कोई तो सोच तक नहीं सकता। वेद प्रकाश शर्मा ने उनके जीवन को अपने लेखन की प्रेरणा बनाया तथा उन्हीं को एक पात्र के रूप में लेकर रोचक एवं प्रेरक उपन्यास अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किये। ये ऐसे उपन्यास हैं जिन्हें एक बार पढ़ना आरंभ कर देने के उपरांत पूरा पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता। मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि वेद जी द्वारा वर्षों पूर्व रचित ये उपन्यास आज भी यदि कोई पढ़ेगा तो उसे मनोरंजन के साथ-साथ अपने देश के लिये कुछ करने तथा अपने जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा प्राप्त होगी।

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शुक्रवार, 1 मई 2026

विभाजन के पहले और बाद

मेरी ही नहीं, अनेक समालोचकों की राय में भी यशपाल कृत उपन्यास 'झूठा-सच' न केवल हिंदी साहित्य वरन विश्व साहित्य की सर्वोत्कृष्ट कृतियों में से एक है तथा हिंदी भाषा में लिखा गया सर्वश्रेष्ठ यथार्थपरक उपन्यास है। यह उपन्यास केवल मनोरंजन के निमित्त नहीं है वरन भारत की स्वतंत्रता तथा विभाजन के पूर्व की परिस्थितियों एवं उसके उपरांत देश में आये परिवर्तनों को भलीभांति जानने-समझने के लिये भी है।

यह उपन्यास उस ऐतिहासिक कालखंड का एक वास्तविक लेखा-जोखा है क्योंकि इसके लेखक यशपाल चंद्रशेखर आज़ाद द्वारा स्थापित एवं संचालित हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकेशन एसोशियेशन के सदस्य तथा सरदार भगतसिंह के सहयोगी थे। इन क्रांतिकारियों के बलिदान के उपरांत उन्होंने हिंसा का मार्ग छोड़कर स्वयं को साहित्य की सेवा हेतु समर्पित कर दिया। उन्होंने बहुत-सी कथाएं एवं उपन्यास लिखे तथा उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया किन्तु उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना यही है जिसे कोई पुरस्कार नहीं मिला। इस वृहत् उपन्यास में उन्होंने भारत के विभाजन के लिये उत्तरदायी परिस्थितियों, विभाजन के पूर्व एवं उस समय की घटनाओं तथा उसके उपरांत (स्वतंत्र भारत) में राष्ट्रीय चरित्र के पतन का विस्तृत वर्णन किया है।

यह किसी महाकाव्य सरीखी वृहत् कृति दो भागों में विभाजित है - 1. वतन और देश, 2. देश का भविष्य। प्रथम भाग लगभग सन १९४३ ('भारत छोड़ो' आंदोलन के उपरांत) से लेकर १५ अगस्त, १९४७ तक के घटनाक्रम का वर्णन करता है जिसका कि स्थान लाहौर है। द्वितीय भाग १५ अगस्त, १९४७ से आरंभ करके जनवरी १९५७ तक की घटनाओं को दर्शाता है जब देश के दूसरे आम चुनाव के परिणाम घोषित हुए थे। यह पाठकों को एक ओर तो  विभाजन के पूर्व भारत में  (विशेषतः पंजाब में) रह रहे लोगों की मानसिकता से पूरी तरह से परिचित करवाता है, दूसरी ओर विभाजन के पश्चात् भारतीयों के व्यक्तित्व एवं सोच में आये परिवर्तनों की भी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। यह बड़े ही स्वाभाविक ढंग से बताता है कि पराधीन भारत के तथाकथित देशभक्त एवं आदर्शवादी किस प्रकार स्वाधीन भारत में ऐसे बन गये थे कि उन्हें अपने निहित स्वार्थ के आगे और कुछ दिखाई ही नहीं देता था।


'झूठा-सच' की कहानी दो प्रमुख पात्रों के जीवन के साथ-साथ चलती है। ये दो प्रमुख पात्र हैं - जयदेव पुरी एवं तारा जो कि भाईबहन हैं तथा एक शिक्षक की संतानें हैं। लाहौर में रहने वाला यह परिवार निम्न-मध्यमवर्गीय है जिसमें दो भाई हैं - एक तो तारा एवं जयदेव के पिता तथा दूसरे उनके बड़े भाई। कहानी जयदेव के कारागृह से छूटने के उपरांत आरंभ होती है जो कि 'भारत छोड़ो' आंदोलन में भाग लेकर गिरफ़्तार हुआ था। प्रथम दृश्य जयदेव एवं तारा की दादी के देहावसान का है जिसके उपरांत कथानक कुछ इस प्रकार तीव्र गति से भागता है कि पाठक को पीछे मुड़कर देखने का कोई अवसर नहीं देता (लेखक भी बिना पीछे मुड़े लगातार अपनी लेखनी चलाता गया होगा)। तारा एवं जयदेव दोनों ही आदर्शवादी हैं। कहानी शुरु होने के समय तारा किशोरावस्था में है तथा उसे अपने बड़े भाई जयदेव पर गर्व है कि उसने देश की स्वतंत्रता के लिये कारावास सहा। देश की राजनीति तथा समाज में हो रहे परिवर्तनों का प्रभाव इन भाईबहन पर भी पड़ता है। जहाँ तारा को अपने सहपाठी असद से प्रेम हो जाता है, वहीं जयदेव कनक नाम की एक संपन्न परिवार की युवती से प्रेम करने लगता है जिसे वह ट्यूशन पढ़ाने जाया करता है। कनक के पिता लाहौर की एक प्रतिष्ठित राजनीतिक हस्ती हैं। 

तारा का विवाह उसकी इच्छा के विरुद्ध एक आवारा एवं कम पढ़े-लिखे युवक सोमराज से तय कर दिया जाता है। और तब तारा को यह अहसास होता है कि उसका तथाकथित आदर्शवादी भाई वस्तुतः एक पाखंडी है जो न केवल दोहरे मानदंड अपनाता है बल्कि किसी भी अन्य व्यक्ति के लिये या किसी भी सिद्धांत अथवा आदर्श के लिये कोई भी ठोस क़दम उठाने से कतराता है। तारा के विवाह के उपरांत की प्रथम रात्रि को ही उसके ससुराल के घर पर मुस्लिम दंगाइयों का आक्रमण होता है तथा अपनी जान बचाकर भागती तारा को अनेक बुरे अनुभवों से गुज़रना पड़ता है। अंततः वह बचाकर अमृतसर ले आई जाती है। जयदेव रेलगाड़ी में यात्रा करते समय एक दंगाई आक्रमण में फंस जाता है एवं उसकी परिस्थितियां उसे जालंधर ले आती हैं जहाँ संयोग से ही वह कारागार में अपने साथी रहे वरिष्ठ नेता सूद जी से मिलता है। यहाँ प्रथम भाग समाप्त होता है।

द्वितीय भाग में भारतीयों का बलिदानी देशभक्तों से केवल अपने निहित स्वार्थों में रुचि लेने वाले लोगों में रूपांतरण दिखाया गया है। यहाँ आकर भाई और बहन के व्यक्तित्वों का अंतर पूरी तरह स्पष्ट होता है। जयदेव एक छद्म राष्ट्रवादी सिद्ध होता है तथा सूद जी के साथ मिलकर एक भ्रष्ट प्रकाशक एवं व्यवसायी बन जाता है। वह अपने कार्यकलापों से अपने आदर्शों के खोखलेपन को उजागर कर देता है। इस प्रकार वह न केवल अपने माता-पिता बल्कि कनक (जो अब उसकी पत्नी बन चुकी है) की दृष्टि में भी गिर जाता है क्योंकि वे अब उसके पाखंड को जान गये हैं। तारा के विषय में पहले तो सबको यही पता चला था कि जब दंगाइयों ने उसके ससुराल के घर को आग लगा दी थी तो वह जलकर मर गई थी लेकिन बाद में उसके बच जाने की बात (जयदेव सहित) सभी जान जाते हैं। अपने भाई के विपरीत वह अपने आदर्शों पर टिकी रहकर अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए तथा विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों से मिलते हुए अपनी मेहनत, लगन एवं दृढ़ निश्चय से इस स्वार्थी संसार में अपना एक मुकाम बनाने में सफल हो जाती है। वह सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण करके भारत सरकार में अवर सचिव का पद प्राप्त कर लेती है। जीवन में बहुत कुछ देख चुकने के कारण अब वह शीघ्रता में किसी से भी विवाह करने को तैयार नहीं है। तभी उसकी सुखद भेंट डॉक्टर प्राण नाथ से होती है जो लाहौर में उसके शिक्षक थे एवं अब भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार हैं। आयु के अंतर के बावजूद वे विवाह करने का निश्चय करते हैं लेकिन उनके विवाह के उपरांत जयदेव अपनी बहन पर दो बार विवाह करने का आरोप लगा देता है (जो कि एक सिविल सेवक होने के नाते तारा के लिये एक आपराधिक कृत्य है)। उपन्यास के अंत में तारा तथा उसके पति इस आरोप से बरी हो जाते हैं जबकि जयदेव के साझेदार सूद जी दूसरे आम चुनाव में अपनी सीट से हार जाते हैं।

इस मुख्य कथा में अनेक उप-कथाएं जुड़ी हैं एवं अनेक पात्र हैं जो प्रारंभ से लेकर अंत तक पाठकों के समक्ष आते हैं। यह वृहत् उपन्यास किसी प्रबल जलधारा की भांति पाठकों को अपने साथ बहाए ले चलता है। ऐतिहासिक घटनाएं तथा ऐतिहासिक पात्र उपन्यास में ऐसी कुशलता से पिरोए गये हैं कि वे कथानक का ही अभिन्न अंग बन गये हैं। लेखक ने अपने स्वतंत्रता-सेनानी होने के अनुभव का उपन्यास के लेखन में पूरा-पूरा उपयोग किया है। उपन्यास में सांप्रदायिक दंगों एवं हिंदू-मुस्लिम मानसिकता को विस्तार से दर्शाया गया है लेकिन लेखक ने कहीं पर भी किसी भी समुदाय के प्रति पक्षपात नहीं किया है। उसने न तो किसी भी समुदाय का अंधा समर्थन किया है, न ही अंधा विरोध। उसने तथ्यों को जस-का-तस पाठकों के समक्ष रख दिया है। दोनों ही समुदायों के एकदूसरे के प्रति पूर्वाग्रहों को भी उसने ज्यों-का-त्यों दर्शाया है। चाहे प्रमुख पात्र हों या अन्य पात्र, लेखक ने सभी को मनुष्य के रूप में ही दिखाया है जिसमें अच्छाइयां व दुर्बलताएं दोनों ही होती हैं। लेखक यह स्थापित करने में सफल रहा है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी समय और स्थान पर अवस्थित परिस्थितियों का ही उत्पाद होता है और वह उनके अनुरूप ही सोचता एवं व्यवहार करता है। यह उपन्यास भीड़ के व्यवहार को भी स्पष्ट करता है तथा सुशिक्षित व्यक्तियों की सामाजिक-राजनीतिक समझ को भी चाहे वे किसी भी समुदाय के हों।

उपन्यास की भाषा हिंदी है किन्तु इसमें पंजाबी संस्कृति का विशद वर्णन है - विशेषकर इसके प्रथम भाग में। इसीलिए संवादों में अनेक स्थानों पर पंजाबी भाषा का प्रयोग है। कहीं-कहीं शिक्षित पात्रों के संवादों में अंग्रेज़ी का भी प्रयोग है। लेकिन लेखक ने पंजाबी एवं अंग्रेज़ी संवादों के साथ वहीं पर (कोष्ठक में) उनका हिंदी अनुवाद भी दे दिया है। अतः पाठक हेतु उन्हें समझने की कोई कठिनाई नहीं है। उपन्यास के माध्यम से पंजाबी रीति-रिवाज़ों एवं लोक-संगीत का भरपूर परिचय पाठकों को प्राप्त होता है। साथ ही तत्कालीन लाहौर के भूगोल एवं विभिन्न स्थानों की भी सटीक जानकारी मिलती है और पाठक को लगता है मानो उपन्यास के पृष्ठों के माध्यम से वह उस युग के लाहौर का भ्रमण कर रहा है।

यदि आप हमारे देश के उस कठिन समय तथा विभाजन के पूर्व एवं पश्चात् के समयकाल को ठीक से जानना चाहते हैं तो यह काल्पनिक कहानी कहने वाली पुस्तक किसी भी इतिहास की पुस्तक से अधिक उपयोगी हो सकती है क्योंकि यह एक स्वतंत्रता-सेनानी द्वारा अपने भोगे हुए यथार्थ के आधार पर लिखी गई है जिसका दृष्टिकोण पूर्णरूपेण निष्पक्ष एवं वस्तुपरक है। सच पूछिये तो यह एक कालजयी कृति है। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी 'This  is  not  that  dawn' के नाम से प्रकाशित हो चुका है। किसी ऐतिहासिक दस्तावेज़ के समकक्ष होने के बावजूद यह केवल शुष्क इतिहास नहीं है वरन एक मनोरंजक पुस्तक है जिसमें साहित्य के सभी रसों को समाहित करती हुई पूरी तरह से मानवीय कहानी कही गई है।

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सोमवार, 27 अप्रैल 2026

कुछ बातें सीक्वल की

सीक्वल का अर्थ होता है अगली कड़ी। मुख्यतः यह शब्द किसी कहानी के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। कहानी किसी फ़िल्म की भी हो सकती है तथा उपन्यास की भी। यहाँ सीक्वल से आशय यह नहीं है कि किसी कहानी को अपने प्रथम भाग में अधूरा छोड़ दिया जाए तथा उस अधूरे भाग को आगामी कड़ी (या कड़ियों) में पूरा किया जाए। ऐसा पहले तो केवल उपन्यासों के लिए किया जाता था लेकिन अब विगत कुछ वर्षों से फ़िल्में भी इसी भांति बनने लगी हैं जिनमें पहली फ़िल्म में कथा का केवल एक भाग प्रस्तुत किया जाता है जबकि उसका समापन भाग दूसरी फ़िल्म में प्रस्तुत किया जाता है (यह दूसरी फ़िल्म कुछ दिनों या कुछ महीनों के उपरांत प्रदर्शित होती है)। इस लेख में मेरा प्रयोजन उस प्रकार के सीक्वल के बारे में बात करना है जिनमें उसका पूर्व भाग भी अपने आप में सम्पूर्ण होता है तथा उसे देखने के उपरांत दूसरे भाग को देखना अनिवार्य नहीं होता क्योंकि दोनों की कहानियां (कुछ) समान पात्रों को लिए हुए होने के बावजूद स्वतंत्र एवं अपने आप में पूर्ण होती हैं।

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ने ऐसा प्रयोग भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष पर आधारित अपने उपन्यास 'वतन की कसम' में किया था जिसकी पाठक समुदाय में हुई लोकप्रियता के कारण उन्होंने उसका सीक्वल 'ख़ून दो आज़ादी लो' तथा 'बिच्छू' नामक उपन्यासों के रूप में लिखा। इन उपन्यासों में 'वतन की कसम' के अंतिम दृश्य से कहानी को आगे बढ़ाया गया था किंतु 'वतन की कसम' अपने आप में सम्पूर्ण उपन्यास था जबकि सीक्वल के रूप में लिखे गए दो उपन्यासों में उसके कुछ पात्रों को लिए जाने के बावजूद कहानी बिलकुल अलग थी। 

बॉलीवुड फ़िल्मों में ऐसा कई बार किया गया है जब स्थायी पात्र तो सीक्वल में यथावत् रहे किंतु कुछ नए पात्रों के साथ एक नई कहानी दर्शकों के समक्ष रखी गई। देव आनंद की अत्यधिक सफल फ़िल्म 'ज्वेल थीफ़' (१९६७) का सीक्वल एक लंबे अंतराल के उपरांत 'रिटर्न ऑव ज्वेल थीफ़' (१९९६) के रूप में आया किंतु कमज़ोर कथानक एवं निर्देशन के कारण असफल रहा। ऐसा ही फ़िल्म 'हेरा फेरी' (२०००) का सीक्वल 'फिर हेरा फेरी' (२००६) बनाकर किया गया था जिसकी कहानी 'हेरा फेरी' के अंत से आगे बढ़ाई गई थी। वह फ़िल्म भी दर्शकों-समीक्षकों को विशेष प्रभावित नहीं कर सकी। और ऐसा ही अत्यन्त सफल एवं बहु-प्रशंसित फ़िल्म 'रॉक ऑन' (२००८) का सीक्वल 'रॉक ऑन2' (२०१६) बनाकर किया गया जिसमें कुछ प्रमुख पात्रों के साथ कहानी को मूल फ़िल्म के अंत से आगे बढ़ाते हुए एक नई कहानी को परोसा गया पर वह भी मूल फ़िल्म की भांति प्रभावशाली नहीं बन सकी। 

वस्तुतः सीक्वल बनाया तो मूल फ़िल्म की सफलता को भुनाने के लिए जाता है क्योंकि उस फ़िल्म की अच्छी स्मृतियां दर्शकों के मन में होती हैं किंतु किसी भी सीक्वल की सफलता एक सुदृढ़ कथानक, कुशल निर्देशन तथा कलाकारों के अभिनय पर निर्भर करती है। ऊपर मैंने जिन फ़िल्मों का उल्लेख किया उनमें सीक्वल का कथानक, निर्देशन तथा अभिनय पक्ष पिछली फ़िल्म (प्रीक्वल) की भांति प्रभावी नहीं था, इसीलिए सीक्वल दर्शकों का साथ नहीं पा सके। लेकिन जब सीक्वल की कहानी, निर्देशन (चाहे वह प्रीक्वल के निर्देशक द्वारा किया जाए या किसी और के द्वारा),अभिनय एवं तकनीकी पक्ष अच्छे हों तो सीक्वल सफल हो जाता है जैसा कि 'तनु वेड्स मनु' (२०११) के सीक्वल 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' (२०१५) के मामले में हुआ जब सीक्वल भी प्रीक्वल की भांति ही सफल रहा। ऐसा ही 'कोई मिल गया' (२००३) के सीक्वल के रूप में बनाई गई फ़िल्मों - 'कृष' तथा 'कृष3' के मामलों में हुआ जब सीक्वलों ने प्रीक्वल की सफलता को दोहराया। 'दृश्यम' (२०१५) का सीक्वल 'दृश्यम2' (२०२२) भी सफल रहा। सन्नी देओल ने अपनी अत्यन्त सफल (राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित) फ़िल्म 'घायल (१९९०) का सीक्वल 'घायल वंस अगेन (२०१६) स्वयं ही निर्देशित किया और मुँह के बल गिरे लेकिन उनकी सुपरहिट फ़िल्म 'गदर-एक प्रेमकथा' (२००१) का सीक्वल 'गदर2 (२०२३) अपने प्रीक्वल की भांति ही सुपरहिट रहा।

'साहब बीवी और गैंगस्टर' (२०११) के भी दो सीक्वल बनाए गए जिनमें से पहला सीक्वल 'साहब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स' (२०१३) तो चुस्त कथानक एवं कुशल निर्देशन के कारण सफल रहा पर जब उसकी भी अगली कड़ी 'साहब बीवी और गैंगस्टर3' (२०१८) के रूप में बनाकर दर्शकों को परोस दी गई तो वह कमज़ोर कथा के कारण असफल रही। इनकी विशेषता यह है कि प्रमुख पात्रों (साहब तथा बीवी) एवं उनके पारस्परिक संबंधों को समझने के लिए दर्शकों हेतु पहली कड़ी को देखना आवश्यक है अन्यथा किसी भी सीक्वल के कथानक को समझने में समस्या हो सकती  है (यद्यपि सीक्वल अपने आप में संपूर्ण हैं)।

सीक्वल ऐसे भी बने हैं जिनमें कहानी को पिछली फ़िल्म या प्रीक्वल से आगे नहीं बढ़ाया गया है केवल प्रमुख पात्रों को लेकर एक नई कहानी बुनी गई है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' (२००३) का सीक्वल 'लगे रहो मुन्नाभाई (२००६) है जिसमें प्रीक्वल के दो प्रमुख पात्रों (मुन्ना तथा सर्किट) को लेकर एक पूरी तरह से नई कहानी कही गई है। चूंकि कहानी, निर्देशन, अभिनय, तकनीकी पक्ष, संगीत आदि सभी उत्तम रहे; स्वाभाविक रूप से सीक्वल भी अत्यन्त सफल रहा। 'इश्क़िया' (२०१०) की सीक्वल 'डेढ़ इश्क़िया' (२०१४) भी इसी प्रकार बनाई गई थी एवं वह भी सफल रही थी। इसी प्रारूप में 'गोलमाल-फ़न अनलिमिटेड' (२००६) के भी कई सीक्वल बनाए गए जो बॉक्स ऑफ़िस पर चल गए। लेकिन सफल फ़िल्म 'स्टाइल' (२००१) का सीक्वल 'एक्सक्यूज़ मी' (२००३) सफल नहीं रहा।

सीक्वल को फ़्रेंचाइज़ फ़िल्मों से अलग करके देखा जाना चाहिए। विदेशों की नक़ल करते हुए बॉलीवुड के भट्ट कैम्प ने अपनी 'राज़' (२००२) तथा 'मर्डर' (२००४) जैसी फ़िल्मों के नामों में 2, 3 आदि लगाकर बिलकुल भिन्न फ़िल्में बनाईं जिनमें मूल फ़िल्मों के पात्र तक नहीं थे एवं तथाकथित अगली कड़ियों का मूल फ़िल्म से किसी भी तरह का कोई लेनादेना नहीं था। लेकिन दर्शकों को मूल फ़िल्म का नाम काम में लेकर भ्रमित करने में फ़िल्मकार सफल नहीं रहे एवं वे फ़िल्में (जो कि सीक्वल न होकर फ़्रेंचाइज़ फ़िल्में थीं) दर्शकों द्वारा नकार दी गईं।

एक विशिष्ट सीक्वल की बात मैं विशेष रूप से करना चाहूंगा। प्रतिष्ठित राजश्री बैनर ने अपनी अत्यधिक सफल एवं लोकप्रिय फ़िल्म 'अँखियों के झरोखों से' (१९७८) का सीक्वल 'जाना पहचाना' (२०११) के रूप में बनाया। जब मैंने वह फ़िल्म देखी तो मैं यह देखकर दंग रह गया कि सीक्वल में कम-से-कम आधा हिस्सा प्रीक्वल के दृश्यों से भरा हुआ है। चूंकि दोनों ही फ़िल्में एक ही निर्माता की हैं, अतः ऐसा करने में कृतिस्वाम्य (कॉपीराइट) की तो समस्या नहीं थी किंतु फ़िल्म पसंद आने पर भी मैंने यह महसूस किया कि जब सीक्वल में आधा हिस्सा प्रीक्वल का ही है तो सीक्वल देखने से बेहतर क्या प्रीक्वल को ही पुनः देख लेना नहीं होता ? शायद ऐसा ही दर्शक समुदाय ने महसूस किया होगा जिसके कारण फ़िल्म सफल नहीं रही (समीक्षकों ने भी इसकी आलोचना ही की)।

बॉलीवुड में अब सीक्वल किसी भेड़चाल की तरह हो गया है। जब भी कोई फ़िल्म सफल हो जाती है, उसके नाम में 2 लगाकर उसके सीक्वल की घोषणा कर दी जाती है। ऐसे फ़िल्मकार यह मानने को तैयार नहीं होते कि आज का दर्शक मूढ़ नहीं है। वह अच्छी तरह समझता है कि सीक्वल वस्तुतः क्या होता है। वह उसी फ़िल्म को अपेक्षित प्रतिसाद देता है जो कि अच्छी कहानी के साथ अच्छे ढंग से बनाई गई हो, फिर चाहे वह सीक्वल हो या नहीं।

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सोमवार, 13 अप्रैल 2026

यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग

आशा भोसले नहीं रहीं। आशा ताई के नाम से मशहूर महान गायिका अपने करोड़ों प्रशंसकों से विदा लेकर दिगंत में विलीन हो गई। अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की ही भांति वे भी दीर्घायु हुईं। लेकिन सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ने से पूर्व उन्होंने अपने जीवन में जो संघर्ष किया, वह उनकी अग्रजा के संघर्ष से भी अधिक रहा। अपने पिता के निधन के उपरांत चारों बहनें (लता, आशा, उषा और मीना) तथा एक भाई (हृदयनाथ) बम्बई (मुम्बई) की फ़िल्मी दुनिया में अपना एक मुकाम बनाने के लिए उतर पड़े। लता को १९४९ में बीस वर्ष की आयु में ही 'महल' तथा 'बरसात' जैसी फ़िल्मों से जो सफलता मिली, उसके उपरांत उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लेकिन आशा के जीवन में वैसी सफलता को आने में एक लंबा समय लगा। इसके अतिरिक्त आशा ने अल्पायु में ही विवाह कर लिया तथा अल्पायु में ही वे माता भी बन गईं। अपने वैवाहिक जीवन में आशा ने दुख-ही-दुख सहे तथा एक दिन उन्हें अपने तीन बच्चों के दायित्व के साथ अकेले ही जीवन-समर में उतरना पड़ा। लता तो तब तक सफलता की चोटी पर जा बैठी थीं। अब हाल यह था कि एक तो आशा का स्वर लता से मिलता-जुलता था, दूसरी ओर जहाँ लता को नायिकाओं वाले गीत गाने के लिए मिलते थे, वहीं आशा को प्रायः नृत्यांगनाओं वाले गीत ही मिलते थे। उन्हें पारिश्रमिक भी लता से बहुत कम मिलता था जबकि उनके ऊपर अपनी तीन संतानों के भरण-पोषण का दायित्व था। लेकिन आशा ने हिम्मत नहीं हारी।

उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि वे अपनी बड़ी बहन की परछाईं से निकलकर ही रहेंगी। उन्होंने प्रयास करके अपने स्वर को लता के स्वर से भिन्न बनाया तथा जो भी गीत मिले, उन्हें गाते हुए अपने समय की प्रतीक्षा करती रहीं। विवाह-विच्छेद हो चुकने पर भी उन्होंने अपने प्रथम पति के उपनाम 'भोसले' को जीवन भर अपने नाम के साथ जोड़े रखा। वे 'आशा मंगेशकर' नहीं, 'आशा भोसले' ही बनी रहीं। धीरे-धीरे उनकी अपनी पहचान बनी जो कि लता से पूर्णरूपेण भिन्न थी। 

संगीतकार ओ.पी.नैय्यर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना तथा उन्हें बहुत-से ऐसे गीत गाने को दिए जो कि अत्यंत लोकप्रिय हुए (ओ.पी.नैय्यर ने लता से कभी कोई गीत नहीं गवाया)। आगे चलकर पश्चिमी संगीत से प्रभावित राहुल देव बर्मन ने भी उनसे कुछ ऐसे गीत गवाए जो कि उनके अलावा शायद कोई गायिका नहीं गा सकती थी। अपनी समकालीन गायिकाओं में वे विलक्षण रहीं। जो मस्ती,  जो पुलक आशा जी के स्वर में थी; वो किसी और के स्वर में नहीं थी। आज ढेरों ऐसे गीत हैं जो उन्हीं के नाम से पहचाने जाते हैं। अपनी विलक्षणता को पहचान कर उन्होंने कालांतर में पॉप गीत भी गाए तथा अपने ही पुराने गीतों के रीमिक्स भी निकाले। वैजयंतीमाला पर फ़िल्माए गए 'नया दौर' (१९५७) के यादगार गीत 'उड़ें जब-जब ज़ुल्फ़ें तेरी' से लेकर करिश्मा कपूर पर फ़िल्माए गए 'दिल तो पागल है' (१९९७) के गीत 'ले गई ले गई' तक आशा जी के स्वर का यौवन जस-का-तस बना रहा। अपने जीवन में सदा साहसिक निर्णय लेने वाली आशा जी ने नानी तक बन चुकने के उपरांत राहुल देव बर्मन से विवाह करके अपने साहस का फिर परिचय दिया।

उनके स्वर में शायरी को जादुई बना देने का जो गुण था, उसे संगीतकार ख़य्याम ने पहचानकर फ़िल्म 'उमराव जान' (१९८१) में रेखा पर फ़िल्माई गई ग़ज़लें उनसे गवाईं और उन ग़ज़लों ने इतिहास बना दिया। 'दिल चीज़ क्या है', 'इन आँखों की मस्ती के', 'ये क्या जगह है दोस्तों' और 'जुस्तजू जिसकी थी' जैसी ग़ज़लें आशा जी की दिलकश आवाज़ में अमर हो गईं।

लेकिन मैंने आशा जी की आवाज़ में ग़ज़लों और नज़्मों के जादू को सही मायनों में उनके ग़ज़ल एलबम 'मेराज-ए-ग़ज़ल' में महसूस किया। यह ग़ज़ल एलबम उन्होंने ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली के साथ मिलकर निकाला था। दो भागों में प्रस्तुत इस एलबम में एक भी ऐसा गीत या ग़ज़ल नहीं है जिसमें आशा जी का स्वर न हो। उनकी आवाज़ एकल में भी है और युगल में भी। मेराज-ए-ग़ज़ल का अर्थ है - ग़ज़ल का उत्कर्ष।

१९८३ में मूल रूप से कैसेट के रूप में निकले इस एलबम के पहले भाग की 'ए' साइड में 'रूदाद-ए-मोहब्बत क्या कहिए', 'दयार-ए-दिल की रात में' तथा 'यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग' हैं। इनमें से आशा जी की ग़ज़ल 'यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग' मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल है जिसमें उर्दू शायरी अपने पूरे जलाल पर है। 'बी' साइड में 'गए दिनों का सुराग लेकर', 'हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहां तक आ गए (आशा जी की एक बेहतरीन ग़ज़ल) तथा 'रात जो तूने दीप बुझाए (आशा जी की एक बेहतरीन नज़्म) हैं।

इस एलबम के दूसरे भाग की 'ए' साइड में 'फिर सावन रुत की पवन चली', 'दर्द जब तेरी अता है तो गिला किससे करें (आशा जी की दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल) और 'करूं न याद मगर किस तरह भुलाऊं उसे' (आशा जी की बेहतरीन ग़ज़ल) हैं। 'बी' साइड में आशा जी के दो बेहतरीन गीत हैं - पहले नम्बर पर 'सलोना-सा सजन है' और तीसरे नम्बर पर 'नैना तोसे लागे' जबकि इनके बीच में दोनों कलाकारों द्वारा गाई हुई ग़ज़ल है - 'दिल धड़कने का सबब याद आया'।

'मेराज-ए-ग़ज़ल' आशा जी के प्रशंसकों के लिए किसी अनमोल उपहार से कम नहीं। यह संगीत-प्रेमियों के लिए भी है तथा शायरी के रसिकों के लिए भी। आशा जी को उनके गीतों, ग़ज़लों, नज़्मों आदि ने अमरत्व प्रदान कर दिया है। वे हमारे दिलों में हमेशा रहेंगी।

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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

वेद प्रकाश शर्मा की क़लम से निकला एक धर्मयुद्ध

इस समय मध्य-पूर्व में जो अवांछित युद्ध चल रहा है, उसके लिए अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एवं इज़राइल के राष्ट्र-प्रमुख बेंजामिन नेतन्याहू की खुली आलोचना सुनने में नहीं आ रही है जबकि ईरान की आलोचना हुई है। निश्चय ही ईरान ने भी ग़लत क़दम उठाया है किंतु किसी राष्ट्र की सार्वभौमिकता पर आक्रमण करके अमरीका एवं इज़राइल ने बहुत बड़ी ग़लती की थी। न तो संयुक्त राष्ट्र में इसकी आलोचना हुई एवं न ही भारत ने इसकी आलोचना की। यदि कोई अन्य राष्ट्र ऐसा ही भारत के साथ करता तो क्या हम उसका सामरिक प्रत्युत्तर नहीं देते एवं अन्य राष्ट्रों से उस आक्रमणकारी राष्ट्र के कुकृत्य की आलोचना की अपेक्षा नहीं करते ? अमरीका ने वही किया है जो कि तथाकथित बड़े देश छोटे देशों के साथ करते आए हैं। यह केवल साम्राज्यवाद है, और कुछ नहीं। केवल डोनाल्ड ट्रम्प की सनक के चलते यह युद्ध बिना किसी चेतावनी के ईरान एवं उसके नागरिकों पर थोपा गया है। यहाँ तक कि अमरीका की संसद ने भी अब तक इसका अनुमोदन नहीं किया है।

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा आज जीवित होते तो निश्चय ही इस विषय को आधार बनाकर कोई उपन्यास लिखते क्योंकि वे सदा समसामयिक विषयों पर अपनी लेखनी चलाने में विश्वास रखते थे। अफ़ग़ानिस्तान में तत्कालीन सोवियत संघ के हस्तक्षेप को आधार बनाकर उन्होंने अपनी विजय-विकास सीरीज़ के अंतर्गत एक यादगार उपन्यास लिखा था। इस उपन्यास का नाम है - धर्मयुद्ध।

'धर्मयुद्ध' कहानी सुनाता है एक काल्पनिक राष्ट्र 'मजलिस्तान' (जिसे हम अफ़ग़ानिस्तान मान सकते हैं) की जिसमें एक विदेशी महाशक्ति 'सेमिनार' (जिसे हम सोवियत संघ मान सकते हैं) के हस्तक्षेप से सत्ता परिवर्तन हो जाता है। वहाँ के शासक सादात को मार डाला जाता है एवं एक कठपुतली शासक इबलीस को गद्दी पर बैठा दिया जाता है। सेमिनार की सेनाएं मजलिस्तान में डेरा डाल देती हैं एवं सामान्य नागरिकों पर अत्याचार होते हैं। सादात की पुत्री मुमताज़ कुछ पुराने वफ़ादारों के साथ मिलकर एक विद्रोहियों का दल बनाती है एवं  इबलीस की सेना तथा विदेशी ताक़तों (जिनके उच्चाधिकारी मजलिस्तान में इबलीस के सिर पर सवार रहते हैं) से लोहा लेती है। प्रेस पर सेंसरशिप लागू होने के कारण बाहरी दुनिया को ये सारी बातें पता नहीं होतीं। बाहरी दुनिया को सिर्फ़ वही बताया जाता है जो इबलीस तथा उसके विदेशी आका बताना चाहते हैं।

विद्रोही दल के लोग डॉक्टर भसीन नामक एक भारतीय वैज्ञानिक का अपहरण कर लेते हैं जिसे छुड़ाने का कार्य भारत सरकार अपनी सीक्रेट सर्विस को सौंपती है। भारत के प्रमुख सीक्रेट एजेंट हैं विजय और विकास। जहाँ विजय एक ठंडे दिमाग़ वाला तथा सोच-समझकर कोई भी क़दम उठाने वाला व्यक्ति है, वहीं मुश्किल से इक्कीस वर्ष का विकास एक जल्दी उत्तेजित हो जाने वाला एवं भावनाओं में बह जाने वाला युवक है। विकास विजय की चचेरी बहन रैना तथा उसके मित्र पुलिस सुपरिंटेंडेंट रघुनाथ का पुत्र है। अपने व्यक्तित्व की कुछ कमियों के बावजूद विकास की विशेषता यह है कि वह चरम सीमा तक देशभक्त है। इस सीरीज़ के अन्य कुछ प्रमुख चरित्र हैं - विजय के पिता ठाकुर निर्भयसिंह जो कि राजनगर (इस सीरीज़ के उपन्यासों हेतु सिरजा गया एक कल्पित शहर) के इंस्पेक्टर जनरल ऑव पुलिस हैं, उसकी मां उर्मिलादेवी, भारतीय सीक्रेट सर्विस का मुखिया अजय उर्फ़ ब्लैक ब्वॉय (जो रैना का सगा भाई है), एक अंतर्राष्ट्रीय अपराधी अलफ़ांसे आदि। 

बहरहाल भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा डॉक्टर भसीन को छुड़ाने का दायित्व भारतीय सीक्रेट सर्विस को सौंपा जाता है और उसका मुखिया ब्लैक ब्वॉय यह काम विकास को सौंप देता है। विकास मजलिस्तान पहुँचता है और काम पे लग जाता है। उसकी मुलाक़ात इबलीस तथा सेमिनार के उच्चाधिकारियों तोम्बो एवं गार्जियन से होती है तो उसका माथा ठनकता है तथा उसे महसूस होता है कि जो कुछ भी बाहरी दुनिया को समाचार-माध्यमों से बताया जा रहा है, वस्तुस्थिति उससे भिन्न है और मजलिस्तान के हालात बहुत ख़राब हैं। डॉक्टर भसीन को छुड़ाने के प्रयास मे उसका सामना मुमताज़ एवं उसके दल से होता है। शीघ्र ही वह सब कुछ समझ लेता है। डॉक्टर भसीन को सुरक्षित भारत वापस भेज देने के उपरांत वह मुमताज़ एवं उसके दल से मिल जाता है तथा उनकी सहायता करने लगता है।

जब यह सूचना भारत पहुँचती है तो विजय एवं ब्लैक ब्वॉय असमंजस में पड़ जाते हैं क्योंकि सेमिनार भारत का मित्र देश है तथा विकास के इस कार्य से यह मित्रता संकट में पड़ सकती है। यद्यपि विकास यह कार्य अपनी निजी हैसियत से कर रहा है किंतु है तो वह भारतीय एजेंट ही। विकास अपने ही देश तथा अपने उच्चाधिकारियों के विरुद्ध जाकर मजलिस्तान की घायल मानवता के पक्ष में कार्य करने को एक धर्मयुद्ध कहता है। उसे रोकने हेतु अब उसके गुरु विजय को मजलिस्तान जाना पड़ता है तथा वह अंततः अपने शिष्य विकास को वापस ले ही आता है। किंतु विजय के अपने इस कार्य में सफल होने से पूर्व ही विकास एक पैम्फ़्लैट बनाकर मुमताज़ को दे चुका होता है जिसमें मजलिस्तान के जनसामान्य से देशद्रोहियों तथा उनसे जुड़ी विदेशी ताक़तों के विरुद्ध उठ खड़े होने का आह्वान होता है। इस पैम्फ़्लैट के सम्पूर्ण मजलिस्तान में वितरण का परिणाम यह होता है कि मजलिस्तान में बड़े पैमाने पर जनक्रांति हो जाती है, विदेशी ताक़तों को देश छोड़ना पड़ता है तथा मुमताज़ मजलिस्तान की नई राष्ट्रपति बनती है।

मैंने उपन्यास का सार-संक्षेप दे दिया है लेकिन इस अत्यंत रोचक उपन्यास का वास्तविक आनंद इसे पूर्ण रूप से पढ़कर ही लिया जा सकता है। यह उपन्यास आद्योपांत मनोरंजक है। मजलिस्तान की धरती पर विजय और विकास के टकराव का तो कहना ही क्या ? यह उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ हमें वैश्विक राजनीति से भी परिचित करवाता है एवं स्पष्ट करता है कि महाशक्तियों की राजनीति में छोटे देशों की निर्दोष जनता किस तरह पिस जाती है। यह इस बात को भी स्पष्ट करता है कि कोई भी जनक्रांति विदेशी सहायता से सफल नहीं हो सकती तथा किसी भी देश द्वारा विदेशी सैन्य सहायता ली भी नहीं जानी चाहिए क्योंकि सहायता करने वाला देश फिर अपनी सहायता की क़ीमत वसूल करने में लग जाता है और पीड़ित (छोटे) देश के लिए एक ग़ुलामी से बाहर निकलकर दूसरी ग़ुलामी में फंस जाने का ख़तरा पैदा हो जाता है। लेखक ने हृदयविदारक ढंग से दर्शाया है कि जब किसी देश में विदेशी हस्तक्षेप से सत्ता-परिवर्तन होता है तो निरीह जनता पर किस प्रकार अमानुषिक अत्याचार किए जाते हैं। विकास के माध्यम से लेखक ने भारतीय विदेश नीति के पाखंड की भी आलोचना की है जिसके अंतर्गत भारत तत्कालीन सोवियत संघ से अपनी मित्रता के चलते उसके अफ़ग़ानिस्तान में घुसपैठ करने का विरोध नहीं करता था। 

उपन्यास विजय एवं विकास के चरित्रों को भी विस्तार से दर्शाता है। जहाँ विकास का दृष्टिकोण मानवीय है वहीं विजय यह मानता है कि एक गुप्तचर को भावनाओं से ऊपर उठ जाना चाहिए तथा उसका एकमात्र लक्ष्य वही करना होना चाहिए जो कि उसके देश के हितों के अनुकूल हो। लेकिन लेखक यह भी (इस उपन्यास में तथा इस सीरीज़ के कई अन्य उपन्यासों में) दर्शाते हैं कि किसी को भी प्यार न करने वाला विजय भी अपने शिष्य विकास से बहुत प्यार करता है। 

इस उपन्यास की गुणवत्ता इतनी उच्च है कि इसे उत्कृष्ट साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। कई दशक पूर्व लिखा गया यह उपन्यास आज भी ताज़गी से भरा एवं सामयिक लगता है। सरल हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास वेद प्रकाश शर्मा के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में से एक है। जो भी इसे पढ़ेगा, उसका न केवल मनोरंजन होगा वरन उसके विश्व राजनीति संबंधी ज्ञान में भी संवर्धन होगा। 

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रविवार, 29 मार्च 2026

आनंद बनाम कल हो ना हो

सुप्रतिष्ठित फ़िल्मकार हृषिकेश मुखर्जी ने दो फ़िल्में ऐसी बनाईं जिनमें नायक या नायिका को असाध्य रोग से पीड़ित दिखाया गया है – १. आनंद (१९७१), . मिली (१९७५)। इनमें से आनंद को एक कालजयी फ़िल्म माना जाता है। आनंद का नायक आनंद (राजेश खन्ना) कैंसर का रोगी है तथा उसके जीवन का कुछ ही समय शेष रह गया है जब वह मुम्बई आता है एवं कई लोगों से मिलता है। वह जानता है कि वह शीघ्र ही मरने वाला है लेकिन वह ज़िंदादिली से भरपूर है तथा मिलने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर अपने सकारात्मक दृष्टिकोण का प्रभाव छोड़ता है। वह अपनी चिकित्सा करने वाले डॉक्टर भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) का उनकी प्रेयसी (सुमिता सान्याल) से मिलन भी करवाता है। इस संसार को छोड़कर जाते-जाते भी वह बहुत-से लोगों को जीने की नव-प्रेरणा दे जाता है। जीवन के प्रति सकारात्मक ऊर्जा से भरी हुई यह फ़िल्म बहुत सराही गई तथा इसे एक क्लासिक फ़िल्म ही नहीं, भारत में बनी हुई सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक माना जाता है। इस फ़िल्म में राजेश खन्ना का अभिनय संभवतः उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय है।

तीन दशक से अधिक समय के उपरांत निर्माता करण जौहर ने आनंद की कहानी से प्रेरणा लेकर अपनी नई फ़िल्म की कहानी लिखी जिसका नाम है कल हो ना हो जिसका निर्देशन करण ने स्वयं न करके निखिल अडवाणी से करवाया। कल हो ना हो (२००३) का नायक अमन माथुर (शाह रुख़ ख़ान) भी एक असाध्य रोग से पीड़ित है तथा उसका जीवनकाल अधिक नहीं बचा है। इस तथ्य के साथ वह न्यू यॉर्क आता है एवं अपने रोग की बात सभी से छुपाते हुए कई लोगों से मिलता है जिनमें प्रमुख है उसका पड़ोसी परिवार जिसे एक दोषपूर्ण परिवार कहा जा सकता है क्योंकि परिवार की प्रमुख जेनिफ़र (जया बच्चन) एवं उनकी सास लाजवंती (सुषमा सेठ) एक-दूसरी से घृणा करती हैं। वह इस परिवार की कन्या नैना (प्रीति ज़िंटा) से मन-ही-मन प्रेम करने लगता है किंतु अपने जीवन की अल्पकालिकता को जानते हुए उससे अपने मन की बात नहीं कहता एवं उसे उसके सच्चे मित्र रोहित (सैफ़ अली ख़ान) के निकट ले आता है। इस प्रक्रिया में वह अपने चहुँओर सकारात्मक ऊर्जा को प्रसारित करता है तथा अपने संपर्क में आने वाले लोगों को जीने की नई प्रेरणा देता है।


मेरी दृष्टि में ये दोनों ही फ़िल्में बहुत अच्छी हैं तथा जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने एवं ज़िंदादिल रहकर जीवन बिताने की प्रेरणा देती हैं। सादगी से परिपूर्ण आनंद तथा भव्यता के साथ बनाई गई कल हो ना हो कथानक की समानता के बावजूद कई रूपों में भिन्न हैं। आनंद के रोग तथा अल्पजीवी होने के बारे में उसके आसपास के लोगों को जानकारी है। वह अच्छा इंसान है लेकिन उसके आसपास के लोग भी अच्छे इंसान ही हैं। उसकी सकारात्मकता को उसके संपर्क में आने वाले अच्छे लोगों की सकारात्मकता का संबल मिलता है। यदि आपके आसपास के लोग नकारात्मक हों तो आपका सकारात्मक बने रहना अत्यन्त कठिन हो जाता है। आनंद के विपरीत कल हो ना हो का नायक अमन माथुर अपने रोग के विषय में अपने आसपास के लोगों को जानकारी नहीं होने देता। उसके आसपास के माहौल (पड़ोस) में नकारात्मकता है जिसे वह अपने प्रयासों से सकारात्मकता में बदल देता है। मुझे आनंद का अपने रोग का संदर्भ देकर दूसरों को भावुक कर देना पसंद नहीं आया (विशेषकर वह दृश्य जब वह गुजराती भाषा सीखने की कई पुस्तकें ख़रीद लाता है)। अमन भी आनंद की ही भांति दूसरों को ख़ुशियां बांटने में ही प्रयासरत रहता है किंतु वह अपने रोग की बात किसी को भी बताकर उसे दुखी नहीं करना चाहता। दूसरे लोगों पर उसकी सकारात्मकता का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है विशेष रूप से फ़िल्म की नायिका पर जो कि उससे मिलने से पहले हीनभावना से ग्रसित रहती थी। उससे मिलने के उपरांत ही उसमें आत्मविश्वास का संचार होता है।

आनंद में कोई प्रेम-त्रिकोण नहीं है जबकि कल हो ना हो में प्रेम-त्रिकोण है। आनंद में आनंद अपने मित्र एवं चिकित्सक भास्कर बनर्जी को उनकी प्रेयसी से मिलाने में निमित्त बनता है तो कल हो ना हो में अमन अपनी प्रेयसी नैना को अपने से दूर करके उसके मित्र रोहित से उसका जीवन भर का साथ बना देने में निमित्त बनता है। आनंद में कोई दोषपूर्ण परिवार नहीं है जबकि कल हो ना हो में अमन का पड़ोसी कपूर परिवार एक दोषपूर्ण परिवार है जिसके दो महत्वपूर्ण सदस्यों के बीच अच्छे संबंध नहीं हैं तथा उसका एक पीड़ादायी अतीत है। आनंद के मुरारीलाल वाले दृश्य से प्रेरणा लेकर ही करण जौहर ने कल हो ना हो में रामदयाल वाला प्रसंग रचा है। आनंद एक गुदगुदाने वाली फ़िल्म होते हुए भी मूलत: एक गंभीर फ़िल्म है जबकि कल हो ना हो का काफ़ी सारा भाग एक हास्य फ़िल्म होने का आभास देता है एवं गंभीर पक्ष को इसमें कम समय दिया गया है।

आनंद एक साफ़सुथरी फ़िल्म है जबकि कल हो ना हो में रोहित की नौकरानी कांताबेन (सुलभा आर्य) के चरित्र को लेकर करण जौहर ने अभद्र हास्य ठूंसने की मूर्खता की है जिससे फ़िल्म की गुणवत्ता कम ही हुई है। आनंद दर्शकों को अपने आसपास का ही व्यक्ति लगता है जबकि अमन का चरित्र लार्जर दैन लाइफ़ है जो प्रभावित तो करता है लेकिन किसी दूसरी ही दुनिया से आया हुआ लगता है। स्वाभाविक रूप से दोनों ही फ़िल्में दुखांत हैं किंतु इनके केंद्रीय चरित्र दर्शकों के मन में अमिट छाप छोड़ जाते हैं। आनंद एक छोटी-सी फ़िल्म है जबकि कल हो ना होएक अनावश्यक रूप से लम्बी फ़िल्म है। आनंद में स्त्री पात्रों की भूमिकाएं छोटी हैं जबकि कल हो ना हो में नायिका नैना की भूमिका नायक अमन से भी अधिक लम्बी एवं प्रभावपूर्ण है। वस्तुतः कल हो ना हो को नैना के आत्मकथ्य के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है।

दोनों ही फ़िल्मों में मुख्य पात्रों सहित सभी कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय किया है। जहाँ राजेश खन्ना ने आनंद के चरित्र को अमर कर दिया है वहीं शाह रुख़ ख़ान ने भी अमन के चरित्र को अत्यन्त प्रभावी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है जो अपने दर्द को अपने ही भीतर रखकर बाहर ख़ुशियां बिखेरते हैं। कल हो ना हो के कई पात्र केवल हास्य पैदा करने हेतु रखे गए लगते हैं एवं इसी कारण बनावटी लगते हैं। कल हो ना हो में सास लाजवंती तथा बहू जेनिफ़र के मध्य की दूरी एक फ़िल्मी संयोग द्वारा दूर करवाई गई है जिसके उपरांत वह परिवार एक होता है। ऐसा कुछ आनंद में नहीं है। आनंद में गीत तो अवश्य हैं लेकिन कल हो ना हो की भांति फ़िल्मी अंदाज़ का नाच-गाना नहीं है। वैसे संगीत दोनों ही फ़िल्मों का सुमधुर है। आनंद के गीत तो जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करने वाली साहित्यिक कविताओं की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। आनंद में नायक के साथ कोई नायिका नहीं है जबकि कल हो ना हो में नायिका को हम नायक के साथ की ही नायिका मान सकते हैं क्योंकि दोनों मन-ही-मन एक दूसरे से प्रेम करते हैं। कल हो ना हो में अमन नैना को अपने से दूर करने के लिए अपने विवाहित होने का झूठ बोलता है। इस संदर्भ में नायिका का अपनी मां जेनिफ़र से यह कहना मुझे तर्कपूर्ण नहीं लगा कि यदि उसे अमन के विवाहित होने की बात पता होती तो वह उससे प्रेम नहीं करती क्योंकि प्रेम जान-बूझकर नहीं किया जाता, बस हो जाता है।

कल हो ना हो में मनोरंजन तत्व प्रधान है जबकि आनंद में भावनात्मक तत्व प्रधान है। इसीलिए कल हो ना हो तुलनात्मक दृष्टि से अधिक मनोरंजन प्रदान करती है। आनंद एक क्लासिक है और सदा रहेगी जबकि कल हो ना हो प्रमुखतः करण जौहर द्वारा प्रवासी भारतीय दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई फ़िल्मों की श्रेणी में आने वाली फ़िल्म लगती है। लेकिन यदि जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को विकसित करना हो तो इन दोनों ही फ़िल्मों को देखा जा सकता है। अलग-अलग ढंग की फ़िल्में होने पर भी उनका संदेश एक ही है जिसे आनंद के इस संवाद द्वारा समझा जा सकता है – ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं

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शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

अंधविश्वासी मत बनिए लेकिन फ़िल्म देख लीजिए

इस रोचक फ़िल्म के विषय में कुछ भी कहने से पूर्व मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मेरा उद्देश्य न तो किसी अंधविश्वास को प्रसारित करना है और न ही समाज में व्याप्त किसी अंधविश्वास को पुष्ट करना है। चूंकि फ़िल्म अत्यन्त रोचक है तथा इसे देखकर भरपूर मनोरंजन होता है, इसीलिए मैं इस पर यह लेख लिख रहा हूँ यद्यपि यह कई अंधविश्वासों को अपने में समाहित किए हुए है। यह फ़िल्म है नागिन (१९७६)।

फ़िल्म की कथा जिन प्रमुख दो अंधविश्वासों पर आधारित है, वे हैं – १. जब कोई नाग सौ वर्ष की आयु पूर्ण कर लेता है तो वह इच्छाधारी नाग बन जाता है अर्थात् उसमें यह क्षमता आ जाते है कि वह अपनी इच्छा से मानव रूप धारण कर सकता है (तथा पुनः नाग के रूप में भी आ सकता है), २. यदि कोई किसी नाग को मार डाले तो उसकी प्रेयसी अर्थात् नागिन मारने वाले (या वालों) से उसका प्रतिशोध लेती है। ये तो हुए प्रमुख अंधविश्वास जिन पर यह फ़िल्म टिकी है। इनके अतिरिक्त कुछ और भी अंधविश्वास इस फ़िल्म के कथानक में पिरोए हुए हैं यथा – मरने वाले नाग की आँख में उसे मारने वाले का चित्र आ जाता है, जब कोई इच्छाधारी नाग (या नागिन) अपने मनुष्य रूप में किसी दर्पण के समक्ष आ जाता है तो उस दर्पण में उसका वास्तविक नाग वाला रूप दिखाई देने लगता है आदि।

फ़िल्म में ढेर सारे कलाकार भरे हुए हैं जिनको फ़िल्म की पटकथा में यथास्थान बैठाया गया है। विजय (सुनील दत्त) अपने पाँच दोस्तों – किरण (अनिल धवन), राजेश (विनोद मेहरा), उदय (कबीर बेदी), सूरज (संजय ख़ान) तथा राज (फ़िरोज़ ख़ान) के साथ जंगल में भ्रमण हेतु जाता है। वह इच्छाधारी नागों पर एक पुस्तक लिख रहा है। इसी संदर्भ में उसकी भेंट एक इच्छाधारी नाग (जीतेंद्र) से ही हो जाती है जब वह उसे एक बाज़ से बचाता है। जब वह अपने दोस्तों को उस इच्छाधारी नाग को मानव रूप में बदलते हुए दिखाने के लिए लाता है तो किरण गोली मारकर उस नाग की हत्या कर देता है। नाग की आँख में सभी दोस्तों की तस्वीरें आ जाती हैं जिन्हें देखने के बाद नाग की प्रेयसी अर्थात् नागिन (रीना रॉय) उनसे प्रतिशोध लेती है अर्थात् एक-एक करके उन्हें मार डालती है। अंत में केवल विजय ही बाक़ी बचता है जब उसे मारने के प्रयास में नागिन स्वयं मारी जाती है।

फ़िल्म की शुरुआत ही एक बहुत रोचक दृश्य से होती है जब मनुष्य के रूप में नाग पर एक बाज़ आक्रमण करता है जिसे गोली मारकर विजय नाग की जान बचाता है। उसके उपरांत नाग की हत्या से जो तेज़ रफ़्तार कहानी शुरु होती है, वह दर्शक को सोचने हेतु एक पल की भी फ़ुरसत नहीं देती तथा उसे सांस रोके हुए फ़िल्म को टकटकी लगाकर देखते चले जाने पर विवश कर देती है। मंत्रमुग्ध-सा दर्शक कथा के प्रवाह के साथ-साथ बहते हुए फ़िल्म को तब तक देखता चला जाता है जब तक वह समाप्त नहीं हो जाती। फ़िल्म दर्शकों को भरपूर मनोरंजन प्रदान करने के अपने उद्देश्य को सौ फ़ी सदी पूरा करती है। किसी प्रबल जलधारा की मानिंद प्रवाहित होती हुई सम्पूर्ण फ़िल्म में ऊबाऊ पल न के बराबर हैं और यही निर्माता-निर्देशक राजकुमार कोहली की सफलता है।

पुरुष कलाकारों का उल्लेख मैं फ़िल्म की कहानी बताते समय ऊपर कर चुका हूँ। फ़िल्म में महिला कलाकारों की भी भरमार है। नागिन की केंद्रीय भूमिका में रीना रॉय हैं जिनके साथ फ़िल्म में रेखा, मुमताज़, योगिता बाली, नीलम मेहरा, प्रेमा नारायण आदि भी उपस्थित हैं। इतने सारे कलाकारों के साथ न्याय करना भी निर्देशक हेतु किसी चुनौती से कम नहीं रहा होगा। लेकिन प्रशंसा करनी होगी निर्देशक की कि उसने पटकथा को प्रस्तुत करते समय सभी कलाकारों के साथ उचित न्याय किया। यद्यपि विजय के रूप में सुनील दत्त तथा नागिन के रूप में रीना रॉय को सबसे अधिक दृश्य एवं समय मिला है किन्तु अन्य कलाकारों को भी उचित समय तथा अपनी अभिनय क्षमता दर्शाने का उचित अवसर दिया गया है। निर्देशक सभी कलाकारों से अच्छा अभिनय करवाने में सफल रहा है। रीना रॉय के अभिनय जीवन की तो यह सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा सकती है जिसमें उन्होंने प्रभावी अभिनय किया है। प्रमुख कलाकारों के साथ-साथ एक चमत्कारी फ़कीर बाबा के रूप में प्रेमनाथ, एक मवाली के रूप में रंजीत, एक सपेरे के रूप में जगदीप आदि ने भी अच्छा अभिनय किया है। मुमताज़ की रूमानी नायिका के रूप में यह अंतिम फ़िल्म है जिसमें वे आकर्षक लगी हैं। बाल कलाकार मास्टर बिट्टू का अभिनय भी अच्छा है।

फ़िल्म तकनीकी रूप से उच्च गुणवत्ता वाली है। दो नागों की लड़ाई का दृश्य तथा नाग के मनुष्य रूप में एवं मनुष्य से पुनः नाग रूप में बदलने के दृश्य अद्भुत हैं क्योंकि उस युग में कम्प्यूटर ग्राफ़िक नहीं थे। अतः यह सोचने वाली बात है कि निर्देशक इन दृश्यों (तथा नाग एवं नागिन के अन्य विभिन्न दृश्यों) को कैसे फ़िल्मा पाया। फ़िल्म का कला-निर्देशन भी अच्छा है और पार्श्व संगीत एवं संवाद भी। छायाकार ने नाग तथा नागिन से संबंधित दृश्यों को फ़िल्माने में कमाल कर दिखाया है। सम्पादक ने भी बहुत अच्छा काम किया है और अपनी कैंची कुछ इस तेज़ी से चलाई है कि फ़िल्म अधिक लम्बी नहीं हो, केवल आवश्यक दृश्य सिलसिलेवार उसमें रहें जिन्हें दर्शक अपना दिल थामे देखता चला जाए एक पल को भी नज़रें परदे से हटाए बिना।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने फ़िल्म में मधुर संगीत दिया है। नाग-नागिन पर फ़िल्माया गया गीत तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना कई बार फ़िल्म में आता है और प्रभावित करता है। उसके अतिरिक्त अन्य गीत यथा तेरा मेरा मेरा तेरा मेरा तेरा तेरा मेरा मिल गया दिल दिल से’, हफ़्तों महीनों बरसों नहीं सदियों से हैं पुराने और तेरे इश्क़ का मुझ पे हुआ ये असर है भी अच्छे बन पड़े हैं। फ़िल्म के सुंदर गीत वर्मा मलिक ने लिखे हैं।

सार रूप में मुझे बस यही कहना है कि आप अंधविश्वास पर आधारित इस कथा तथा इसमें समाहित अन्य अवधारणाओं पर विश्वास मत कीजिए लेकिन इस फ़िल्म को (यदि अब तक आपने नहीं देखा है तो) देख लीजिए। आपको लगभग सवा दो घंटे का सम्पूर्ण मनोरंजन प्राप्त होगा तथा फ़िल्म देखने के उपरांत कोई निराशा नहीं होगी, यह मेरी गारंटी है।

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