हिंदी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक ने कई सीरीज़ के उपन्यास लिखे हैं। लेकिन उनकी सबसे अधिक लोकप्रिय सीरीज़ सुनील सीरीज़ है जिसके वे सौ से भी अधिक उपन्यास लिख चुके हैं। इस सीरीज़ का नायक है एक बंगाली युवक सुनील कुमार चक्रवर्ती जो राजनगर नामक एक काल्पनिक नगर में रहता है तथा 'ब्लास्ट' नामक एक राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र में नौकरी करता है। राजनगर में उसका आवास बैंक स्ट्रीट की तीन नम्बर इमारत की पहली मंज़िल के एक फ़्लैट में है। वह एक आदर्शवादी पत्रकार है तथा 'सत्यमेव जयते' में उसकी अटूट आस्था है। वह प्रायः क़त्ल के मामलों की छानबीन करता है तथा वास्तविक अपराधी के चेहरे से नक़ाब हटाता है। इस सीरीज़ का पहला उपन्यास १९६३ में प्रकाशित हुआ था एवं तब से ही यह बाँका-सजीला युवक पाठकों के दिलों पर राज कर रहा है।
पाठक साहब ने सुनील के अनेक कारनामे ऐसे भी लिखे हैं जिसमें उसे एक पत्रकार की जगह एक गुप्तचर के रूप में कार्य करते हुए दिखाया गया है जो कि भारत सरकार की एक विशेष संस्था 'स्पेशल इंटेलीजेंस' के लिये काम करता है। इस संस्था के प्रमुख हैं कर्नल मुखर्जी। ऐसे उपन्यासों में सुनील कर्नल मुखर्जी के निर्देशानुसार अकेले अथवा गोपाल एवं विंग कमांडर रामू जैसे अन्य गुप्तचरों के साथ भारत अथवा विदेशों में अपने देश के लिये काम करता है। ऐसे दो उपन्यास 'अमन के दुश्मन' एवं 'हाईजैक' हैं जो कि बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम पर आधारित हैं। इनमें पाठक साहब ने बताया है कि सुनील का जन्म अविभाजित बंगाल के गोपालगंज नामक स्थान पर हुआ था। सुनील का ऐसा अंतिम उपन्यास 'ऑपरेशन सिंगापुर' था जिसके बाद पाठक साहब ने सुनील को एक पत्रकार की भूमिका तक ही सीमित कर दिया।
बहरहाल पत्रकार सुनील तब से आज तक केवल पत्रकार ही है जो अपने अख़बार के लिये भागदौड़ करता है एवं सनसनीख़ेज़ कहानियां जुटाता है। वह अकसर कहता रहता है-'मैं किसी युवती को मुसीबत में नहीं देख सकता'। इसीलिए यदि कोई युवती उसके पास सहायता माँगने आती है तो वह उसे निराश नहीं करता एवं यथासंभव उसकी सहायता अवश्य करता है। इस चक्कर में वह स्वयं कई बार मुसीबत में पड़ जाता है लेकिन उसका यह स्वभाव नहीं बदलता। वह एक विदेशी मोटरसाइकिल एम.वी. आगस्ता अमेरिका पर राजनगर में विचरता है। कई बार वह अपने मित्र रमाकांत की कार भी उधार लेता है।
सुनील सीरीज़ के कई स्थायी पात्र अथवा स्टॉक कैरेक्टर हैं (या रहे हैं) जो इस प्रकार हैं:
1. प्रमिला: प्रमिला केवल सुनील सीरीज़ के शुरुआती उपन्यासों में आई। वह सुनील के बॉस मलिक साहब की निजी सहायक तथा सुनील की पड़ोसन थी। उसके लिये इस सीरीज़ के आरंभ के एक उपन्यास में लिखा गया था कि सुनील को उससे प्रेम था। प्रमिला का एक छोटा भाई भी बताया गया था। जिन उपन्यासों में प्रमिला आई, उनमें उसकी तथा सुनील की अच्छी-ख़ासी नोक-झोंक है। लेकिन सुनील सीरीज़ के कुछ ही उपन्यासों के बाद पाठक साहब ने प्रमिला को दिखाना बंद कर दिया।
2. रेणु: रेणु 'ब्लास्ट' की रिसैप्शनिस्ट है जिससे सुनील की नोक-झोंक और चुहलबाज़ी आज तक चली आ रही है। उसने कई बार सुनील की गतिविधियों में उसकी सहायता भी की है।
3. जुगल किशोर उर्फ़ बंदर: यह किरदार भी सुनील सीरीज़ के कुछ ही उपन्यासों में आया जो इस सीरीज़ के आरंभिक उपन्यास ही माने जा सकते हैं। वैसे पाठक साहब ने उसे नायक बनाकर भी एक उपन्यास लिखा है। सब उसे उसके वास्तविक नाम के स्थान पर 'बंदर' के नाम से ही पुकारते हैं। वह डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा एक युवक है जो सुनील का मित्र है। वह एक धनी परिवार से आता है एवं युवा लड़कियों में रुचि लेता है। नज़र कमज़ोर होने के बावजूद वह चश्मा लगाना पसंद नहीं करता क्योंकि उसकी राय में वह चश्मे के बिना ज़्यादा ख़ूबसूरत लगता है। वह भी पाठकों को जमकर हँसाता है। पाठक साहब ने इस सीरीज़ के बाद के उपन्यासों में उसे भी दिखाना बंद कर दिया।
4. रमाकांत: सुनील सीरीज़ का एक अत्यंत महत्वपूर्ण किरदार है सुनील का हमउम्र पंजाबी युवक रमाकांत जो कि 'यूथ क्लब' नाम का एक मनोरंजन प्रदान करने वाला क्लब चलाता है। वह एक विनोदी स्वभाव का मस्तमौला युवक है जो कि अपनी बातों से पाठकों को ख़ूब हँसाता है। वह सुनील के बहुत-से काम भी अपने आदमियों के माध्यम से करवाता है। अपनी खोजी गतिविधियों के संदर्भ में बहुत-सी सूचनाएं सुनील को उसी से मिलती हैं।
5. जौहरी और दिनकर: जौहरी और दिनकर रमाकांत के कर्मचारी हैं तथा सुनील के लिये (रमाकांत के प्रत्यक्ष या परोक्ष निर्देश पर) बहुत-से काम करते हैं।
6. अर्जुन: अर्जुन सुनील से उम्र में कुछ छोटा उसका कनिष्ठ पत्रकार है जो उसके निर्देश पर काम करता है। वह सुनील का मुँहलगा है और अपने सीनियर से ख़ूब हँसी-मज़ाक़ करता है।
7. रूपा गुप्ता: रूपा गुप्ता सुनील सीरीज़ के केवल तीन उपन्यासों में आई और सुनील के साथ उसकी नोक-झोंक ख़ूब चली जिससे इन उपन्यासों के पाठकों का ख़ूब मनोरंजन हुआ। वह 'क्रानिकल' नाम के समाचार-पत्र में एक पत्रकार के रूप में काम करती है।
8. इंस्पेक्टर प्रभुदयाल: सुनील की खोजी गतिविधियों में उसका पाला इंस्पेक्टर प्रभुदयाल से पड़ता है जो कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी है एवं क़त्ल के मामलों की जाँच करता है। उसका तकिया कलाम है - 'मुझे मेरा धंधा सिखाने की कोशिश मत करो'। किसी भी मामले की पड़ताल के दौरान प्रायः वह और सुनील एकदूसरे के आमने-सामने हो जाते हैं। लेकिन प्रभुदयाल न केवल एक कार्यकुशल एवं कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी है वरन अत्यन्त संवेदनशील मनुष्य भी है। उसे भी नायक के रूप में लेकर पाठक साहब ने एक उपन्यास लिखा है।
9. सुपरिंटेंडेंट रामसिंह: प्रभुदयाल के उच्चाधिकारी पुलिस सुपरिंटेंडेंट रामसिंह अब डीसीपी के पदनाम से जाने जाते हैं। वे सुनील के मित्र हैं।
10. राय: राय 'ब्लास्ट' का न्यूज़ एडीटर है तथा सुनील का उच्चाधिकारी है। लेकिन जब भी वह सुनील पर अपने बॉस होने का रोब जमाना चाहता है, सुनील उसकी चलने नहीं देता। उसकी और सुनील की नोक-झोंक भी कई बार बड़ी मनोरंजक बन पड़ी है।
11. मलिक साहब: बलदेव कृष्ण मलिक साहब 'ब्लास्ट' के मालिक और मुख्य संपादक (चीफ़ एडीटर) हैं। वे भी सत्य में अटूट आस्था रखते हैं। उनके लिये सुनील केवल उनके अख़बार का एक कर्मचारी ही नहीं है बल्कि उनकी अपनी संतान के समान है। वे सुनील से पुत्रवत् स्नेह करते हैं और अपने हर काम में सुनील को उनका पूरा समर्थन प्राप्त होता है।
सुनील पहले केवल एक सामान्य पत्रकार था लेकिन 'टॉप सीक्रेट' नामक उपन्यास के बाद पाठक साहब ने दिखाया कि उसकी तरक़्क़ी हो गई है एवं अब वह 'ब्लास्ट' का मुख्य पत्रकार (चीफ़ रिपोर्टर) बन गया है। जैसे कभी सर आर्थर कोनन डॉयल द्वारा रचित पात्र शरलॉक होम्स इतना लोकप्रिय हो गया था कि उसके बेकर स्ट्रीट, लंदन के पते पर उसके लिये पत्र आया करते थे, वैसा ही कुछ-कुछ सुनील के साथ भी हुआ था जब पाठक साहब के पास उसके संबंध में पूछताछ करते हुए पाठकों (एवं पाठिकाओं) के पत्र आया करते थे (अस्सी के दशक में)। पाठक समुदाय उसकी आदतों, पसंद-नापसंद आदि के बारे में जानना चाहता था। साथ ही पाठक यह भी जानना चाहते थे कि वह शादी करेगा तो रेणु से करेगा या किसी और से।
भविष्य की चिंता किए बिना केवल वर्तमान में जीने वाला यह युवक शानदार खान-पान का शौकीन है, शानदार कपड़े पहनने का रसिया है और किसी की भी दुख-तक़लीफ़ से द्रवित होकर उसकी सहायता करने को तत्पर हो जाता है। पाठक साहब का यह मानस-पुत्र सदा अंडरडॉग अथवा कमज़ोर का साथ देता है जिस पर कोई ताक़तवर ज़ुल्म कर रहा हो। यह हाज़िर-जवाब युवक मन से दयालु तथा स्वभाव से उदार है। यह जीवन के ऊंचे मूल्यों को लेकर चलता है जिनसे यह कभी समझौता नहीं करता। यदि अब तक आप सुनील से नहीं मिले हैं तो कभी अवश्य मिलिए और देखिए कि फ़िल्म अभिनेताओं जैसा ख़ूबसूरत यह आदर्शवादी युवक कैसा लगता है।
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