मंगलवार, 7 जुलाई 2026

सच्चाई की कांटों भरी राह

मैंने अपने लेख 'सत्य और न्याय ! कितने असहाय !' में लिखा है कि सत्य का पथ पुष्पाच्छादित नहीं होता, कंटकाकीर्ण होता है जिस पर चलना बड़े साहस का कार्य है। अभी-अभी 'साझा संसार' में जेन्नी शबनम जी का बिहार के बिलौटी गाँव के भारत भूषण तिवारी के बलिदान पर लिखा गया लेख पढ़ा तो दिल भर आया। एक अट्ठाईस वर्षीय युवक जिसने विवाह तक न करके अपना जीवन समाज को समर्पित कर दिया था, गंगा के कटाव के कारण विस्थापित हुए जवइनिया नामक गाँव के लोगों की भलाई के लिए संघर्ष करते हुए पुलिस वालों के हाथों मारा गया। क्या उसका बलिदान देश की व्यवस्था और स्थिति को सुधारने में कोई योगदान देगा ? कुछ वर्ष पूर्व ऐसे ही देशभक्त युवाओं ने (शहीद भगत सिंह की भांति देश की अवस्था की ओर ध्यानाकर्षण के लिए) लोक सभा में धुएं के बम फेंके थे और देशप्रेम के नारे लगाते हुए अपनी गिरफ़्तारी दी थी। उनका क्या हुआ, पता नहीं। कोई न्यायिक कार्रवाई हुई या वे बिना किसी उचित कार्रवाई के ही कारागार में सड़ रहे हैं, पता नहीं। लेकिन देश की व्यवस्था में सुधार की उनकी आकांक्षा पूरी नहीं हुई। 

जेन्नी जी के लेख से पता चला कि भारत भूषण तिवारी ने अपना लाइव वीडियो बनाया था जिसके कारण उसकी पुलिस द्वारा की गई हत्या का सच सामने आ गया अन्यथा नक़ली मुठभेड़ों में जाने कितने ही निर्दोष मार दिए जाते हैं। उसके परिवार की पीड़ा और उसके गाँव के लोगों की पीड़ा को बाँटने वाला आज कौन है ? कम-से-कम पुलिस और सत्ताधारी राजनेता तो नहीं। वह हृदयहीन व्यवस्था से जवइनिया गाँव के विस्थापितों के पुनर्वास की लड़ाई लड़ रहा था। उन्हें न्याय न मिलने की सूरत में उसने आत्म-बलिदान की घोषणा की थी। पुलिस ने पहले तो उसकी माँग पूरी होने का आश्वासन उसे दिया लेकिन उसके हथियार फेंककर समर्पण कर देने के उपरांत उसे छलपूर्वक मार दिया। सत्य और न्याय के लिए जूझने वालों का हमारे देश में अंजाम शायद यही है। यही प्रार्थना है कि उसका बलिदान व्यर्थ न जाए तथा उसे न्याय मिले।

सुप्रसिद्ध निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने एक मर्मस्पर्शी फ़िल्म बनाई थी - सत्यकाम (१९६९) जो कहानी सुनाती थी एक सत्य के पथिक की। सुप्रसिद्ध बांग्ला उपन्यासकार नारायण सान्याल के एक उपन्यास पर आधारित है यह फ़िल्म। नायक जो सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प लेता है, आजीवन कष्ट ही उठाता रहता है और अन्त में मर्मभेदी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। देश की संवेदनहीन व्यवस्था में उसके लिए यही संभव था। भ्रष्ट व्यवस्था से जुड़े लोग शक्तिशाली होते हैं और इस संसार की वास्तविकता 'सत्यमेव जयते' नहीं,  'शक्तिमेव जयते' ही है। आततायी शक्तिशाली होते हैं जबकि उत्पीड़ित दुर्बल। ऐसे में किसी भी पीड़ित को न्याय कैसे मिले ? और सांसारिक जीवन में रहकर ही सत्य के लिए जूझना वास्तव में जूझना होता है। सांसारिक जीवन से दूर रहकर आदर्शों की बड़ी-बड़ी बातें करना और दूसरों को उपदेश देना तो बहुत सरल है। फ़िल्म में दिखाया गया है कि नायक के पिता इस तथ्य को उसके संसार से चले जाने के उपरांत ही समझ पाते हैं कि सच्चाई की राह पर वस्तुतः कैसे चला जाता है। दशकों पूर्व बनी इस फ़िल्म का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था।

आए दिन अन्याय होते हैं। आए दिन उत्पीड़न होते हैं। पी‌ड़ित न्याय की आस लगाए बैठे रहते हैं लेकिन उनमें से अधिकांश को न्याय नहीं मिलता क्योंकि अत्याचार करने वाले बहुत समर्थ होते हैं। गोस्वामी तुलसीदास तो बहुत पहले ही कह गए हैं-समरथ को नहिं दोष गुसाईं। यदि कोई संवेदनशील व्यक्ति या संस्था किसी असहाय पीड़ित या पीड़िता को व्यवस्था द्वारा न्याय दिलाने का प्रयास करे तो उसे भी शक्तिशाली उत्पीड़क अपने शत्रु के रूप में ही देखते हैं तथा उसे भी ठिकाने लगा देने की कोशिश में लग जाते हैं ताकि फिर कभी कोई किसी असहाय पीड़ित या पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए उठ खड़ा होने का साहस न करे। ऐसे में किसी बेसहारा का हाथ थामना ही बड़ी हिम्मत का काम होता है। यह हिम्मत भारत भूषण तिवारी ने जवइनिया गाँव के विस्थापितों के लिए दिखाई और परिणाम में उसे अपनी शहादत देनी पड़ी। बहुत आत्मबल चाहिए ऐसा कुछ करने के लिए। उसने अपने लाइव वीडियो में कहा है कि यदि वह मारा जाता है तो उसका शरीर दान कर दिया जाए। कितनी असाधारण बात है यह !

भारत भूषण तिवारी की शहादत सोशल मीडिया के कारण देश के सामने आ गई अन्यथा आज का बिक चुका भारतीय मीडिया सच को कभी सामने नहीं आने देता। वह या तो उसे छुपा देता या विकृत कर देता। आज तो ईमान की बात कहना तक मुश्किल है, कुछ ठोस करना तो बहुत दूर। हमारे न्यायालय तक आज न्याय का नहीं, सत्ता का साथ दे रहे हैं। जिसे भी देखो, वह सत्ता के आगे नतमस्तक हो रहा है और स्वार्थ-साधन में लिपटी सत्ता केवल जनसामान्य को (धर्म का अवलम्ब लेकर) भ्रमित करने में लगी है। ऐसे में सच्चाई की राह कांटों भरी ही हो सकती है जिस पर फूलों का मिलना दुर्लभ होता है। 'सत्यकाम' फ़िल्म के नायक सत्यप्रिय (धर्मेन्द्र) या बिलौटी गाँव के भारत भूषण तिवारी की तरह जो इस बात को समझ कर स्वीकार कर ले, वही उस पर चल सकता है। 

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

विश्वास के कच्चे धागे से जुड़ा रिश्ता

पति और पत्नी का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता है जिसमें सबसे अधिक निकटता होती है। इससे अधिक निकटता माता और शिशु के रिश्ते में ही संभव है। यह दैहिक निकटता मानसिक निकटता में भी परिवर्तित हो, इसके लिए आवश्यक है विश्वास। इसीलिए पति और पत्नी का संबंध प्रेम के साथ-साथ विश्वास से भी जुड़ा होता है। यह विश्वास एक कच्चे धागे की भांति होता है जिसे टूटना हो तो एक झटके में टूट जाए और जो न टूटना हो तो हज़ार हाथियों के बल से भी न टूटे। यह विश्वास बना रहे, इसके लिए आवश्यक है दंपती का परस्पर संवाद। किसी भी रिश्ते में संवादहीनता की नौबत कभी नहीं आने देनी चाहिए, पति-पत्नी के रिश्ते में तो विशेष रूप से। संवादहीनता ही ग़लतफ़हमियों की जननी है और ग़लतफ़हमियों से ही रिश्ते दरकते हैं। अतः अच्छा यही है कि जो बात मन में हो, अपने जीवन साथी से साफ़-साफ़ कह दी जाए ताकि जो भी मुद्दा हो, वो बातचीत से सुलझ जाए।

शक़ और संवादहीनता के कारण पति-पत्नी के संबंध में दरार आने के विषय पर कई हिंदी फ़िल्में बनी हैं। मैं आज दो फ़िल्मों की बात करूंगा। एक फ़िल्म है 'गुमराह' (१९६३) जो एक श्वेत-श्याम फ़िल्म है। जिन लोगों ने 'हम आपके हैं कौन?' फ़िल्म देखी है, उन्हें याद होगा कि उसमें बड़ी बहन के अकस्मात् देहांत के उपरांत उसकी छोटी बहन का विवाह उसके विधुर जीजा से तय कर दिया जाता है जो होते-होते बच जाता है। 'गुमराह' में ऐसा विवाह हो भी जाता है तथा छोटी बहन को अपने जीजा की पत्नी बनने के साथ-साथ दिवंगत बड़ी बहन के बच्चों के लालन-पालन का दायित्व भी संभालना पड़ता है। यह कहानी है मीना (माला सिन्हा) की जिसे राजेन्द्र (सुनील दत्त) से प्रेम है किन्तु उसकी बड़ी बहन (निरूपा रॉय) के निधन के उपरांत उसके पिता उसका विवाह उसके विधुर जीजा अशोक (अशोक कुमार) से कर देते हैं। विवाह के कुछ समय बाद मीना का राजेन्द्र से फिर से मिलना होता है, प्रेम की चिंगारी पुनः उन दोनों के मन में भड़क उठती है और दोनों चुपके-चुपके मिलने लगते हैं। अचानक मीना को एक अजनबी औरत (शशिकला) इस बारे में अशोक को बता देने की धमकी देकर ब्लैकमेल करने लगती है। अंत में पता लगता है कि वह औरत अशोक की सचिव (सेक्रेटरी) है तथा उसके कहने पर ही वह मीना को ब्लैकमेल कर रही थी क्योंकि (उसकी राय में) मीना एक विवाहिता की लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन कर रही थी। अशोक मीना को बताता है कि उसे उसकी राजेन्द्र से मुलाक़ातों के बारे में पता था और वह चाहे तो राजेन्द्र के पास जा सकती है। लेकिन मीना राजेन्द्र से अपना संबंध-विच्छेद करके अशोक के साथ अपना वैवाहिक जीवन जारी रखने का निर्णय लेती है।

दूसरी फ़िल्म है 'आप की कसम' (१९७४) जो कमल (राजेश खन्ना) और सुनीता (मुमताज़) के वैवाहिक जीवन की कहानी है। कमल और सुनीता प्रेम विवाह करते हैं और अपने सुखी दाम्पत्य जीवन का आरंभ करते हैं। कमल के पड़ोसी मोहन (संजीव कुमार) का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं है और वह अपनी पत्नी की बेरूख़ी से परेशान रहता है। सुनीता से उसे हमदर्दी और सांत्वना मिलती है। सुनीता के मन में उसे लेकर कोई ग़लत भावना नहीं है लेकिन कमल को मोहन और सुनीता के संबंध पर संदेह हो जाता है। वह छुपकर सुनीता पर नज़र रखने लगता है। जब सुनीता को कमल के अपने पर संदेह का पता चलता है तो उसे गहरा धक्का लगता है। वह कमल के जीवन से निकल जाती है तथा अपने माता-पिता के पास चली जाती है। कमल को बाद में सच्चाई (अर्थात् सुनीता की निर्दोषिता) का पता लगता है तो उसे अपने किए पर पश्चाताप होता है लेकिन उसका और सुनीता का वैवाहिक जीवन समाप्त हो जाता है।

इन दोनों ही फ़िल्मों में समस्या पति और पत्नी के बीच विश्वास की कमी की दिखाई गई है। 'आप की कसम' एक बेहतर फ़िल्म है और पितृसत्तात्मक समाज में नारी के आत्म-सम्मान की बात पुरज़ोर ढंग से कहती है। कमल यदि छुपकर अपनी पत्नी पर नज़र रखने के बजाय उससे स्पष्ट बात करता और अपने संदेह का निवारण कर लेता तो उसका और सुनीता का वैवाहिक जीवन नष्ट नहीं होता। सुनीता अंत में कमल के पास नहीं लौटती और कमल को अपनी ग़लती का बहुत बड़ा मूल्य चुकाना पड़ता है। कमल का घर छोड़ने से पहले सुनीता का कमल से यह कहना - 'मोहन जी से मेरा क्या संबंध है, मैं तुम्हें नहीं बताऊंगी लेकिन आज के बाद तुमसे मेरा कोई संबंध नहीं रहेगा' एक स्वाभिमानी नारी के अंतस से निकली आवाज़ है। वह यह सहन नहीं कर सकती कि उसका पति उस पर विश्वास न करे और उसके चरित्र पर निराधार संदेह करे। आख़िर उन दोनों ने प्रेम विवाह किया था और विश्वास ही प्रेम का आधार होता है।

इसके विपरीत 'गुमराह' में पितृसत्तात्मक सोच ही दिखाई गई है। यद्यपि 'गुमराह' को आज एक क्लासिक माना जाता है, मुझे यह फ़िल्म बड़ी दोषपूर्ण और प्रतिगामी लगी। सर्वप्रथम तो मीना का उसकी मर्ज़ी के बिना उसके विधुर जीजा अशोक से विवाह कर दिया जाना ही ग़लत था। न तो मीना के पिता ने उसकी इच्छा जाननी चाही और न ही अशोक ने। विवाह के उपरांत यदि मीना का राजेन्द्र से छुपकर मिलना ग़लत था तो अशोक का भी उसे अपनी सचिव के माध्यम से ब्लैकमेल करवाना ग़लत था। यदि अशोक को मीना और राजेन्द्र के इस तरह मिलने की बात पता थी (वैसे उनका संबंध भावनात्मक ही था, कुछ और नहीं) तो वह मीना से स्पष्ट बात कर सकता था। उसे अपनी ही पत्नी को ब्लैकमेल करवा कर और फिर शर्मिंदा करके क्या हासिल हुआ ? मीना ने ग़लत किया लेकिन उसने भी तो मीना पर न तो विश्वास किया, न ही उससे संवाद। इससे पति-पत्नी का रिश्ता मज़बूत नहीं हुआ, कमज़ोर ही हुआ। अंत में मीना को पत्नी के उत्तरदायित्व और मर्यादा पर भाषण देकर उसे अपने प्रेमी के पास चले जाने की छूट देना भी अशोक की पितृसत्तात्मक सोच का ही प्रतीक है। मीना उसकी संपत्ति नहीं, जीवन-संगिनी है, एक मनुष्य है जिसे अपने जीवन के संबंध में निर्णय लेने का पूरा अधिकार है। उसे पति की दी हुई ऐसी किसी छूट की कोई आवश्यकता नहीं। और उसके पति को उसे नीचा दिखाने का कोई अधिकार नहीं चाहे उसने भूल ही की थी। वैवाहिक संबंध में पति और पत्नी दोनों ही समान होते हैं। कोई किसी से बेहतर या कमतर नहीं होता। यह बात अशोक को समझनी चाहिए थी। ऐसी दोषपूर्ण फ़िल्म को क्लासिक माना जाता है, यह आश्चर्य की बात है। 

'गुमराह' का निर्माण और निर्देशन बी.आर. चोपड़ा ने किया है जबकि 'आप की कसम' का जे. ओम प्रकाश ने। गीत-संगीत दोनों का ही बहुत अच्छा है और कलाकारों के सुंदर अभिनय से सजी दोनों ही फ़िल्में मनोरंजक हैं। पर जहाँ 'आप की कसम' सार्थक है, वहीं 'गुमराह' में सार्थकता का अभाव है। अंत में मैं फिर से यही बात कहूंगा कि पति-पत्नी का संबंध विश्वास के कच्चे धागे से जुड़ा होता है जिसे दोनों में से किसी को भी टूटने नहीं देना चाहिए। पारस्परिक विश्वास की नींव पर ही सुखी वैवाहिक जीवन का भवन खड़ा होता है। और दोनों जीवन साथियों में संवाद तो बराबर रहना ही चाहिए। भूल किसी से भी हो सकती है क्योंकि सभी मनुष्य ही हैं। लेकिन यदि एक जीवन साथी भटक जाए तो दूसरे का दायित्व उसे नीचा दिखाना या शर्मिंदा करना नहीं, बल्कि उससे स्पष्ट रूप से (खुलकर) बात करके समस्या का समाधान निकालना होता है। यही परिपक्वता की निशानी है। पति-पत्नी मन एवं व्यवहार से परिपक्व होंगे तो ही दाम्पत्य जीवन सुदीर्घ, शांतिपूर्ण एवं सुखद होगा।

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मंगलवार, 23 जून 2026

वक़्त से आगे की फ़िल्म

मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ है कि किसी पुस्तक को दूसरी बार पढ़ते समय अथवा किसी फ़िल्म को दूसरी बार देखते समय उसके बारे में मेरे विचारों में परिवर्तन हुआ हो। इसका कारण यह है कि पुस्तक को दूसरी बार पढ़ते समय अथवा फ़िल्म को दूसरी बार देखते समय उसकी कुछ ऐसी ख़ूबियां या ख़ामियां मेरी नज़र में आईं जो कि पहली बार में नज़रअंदाज़ हो गई थीं। लेकिन आज मैं एक ऐसी फ़िल्म के बारे में बात कर रहा हूँ जो कि मैंने उसके प्रदर्शन के लंबे समय बाद देखी। देखने से पहले तक बरसों से मैं केवल उसकी प्रशंसा ही पढ़ता एवं सुनता आया था पर जब उसे देखा तो लगा कि वह प्रशंसा कुछ ज़रूरत से ज़्यादा थी। आलोचकों ने फ़िल्म के गुणों पर ही ध्यान दिया, उसकी कमियों पर नहीं। यह फ़िल्म है - निकाह (१९८२) जिसका निर्माण किया था भारत की प्रतिष्ठित फ़िल्म निर्माण संस्था बी.आर. फ़िल्म्स ने।

भारत में 'तीन तलाक़' अब अवैध घोषित हो चुका है। इस दृष्टि से इसी विषय को आधार बनाकर बनाई गई यह फ़िल्म अपने वक़्त से आगे की फ़िल्म कही जा सकती है। प्रायः वक़्त से आगे की फ़िल्में सफल नहीं होतीं लेकिन 'निकाह' को अद्भुत सफलता प्राप्त हुई। यह फ़िल्म स्त्री-जाति (औरत) के एकालाप से आरंभ होती है जो कि तनूजा के स्वर में है और बताती है कि 'औरत' ने संसार में क्या योगदान दिया है और बदले में उसे क्या मिला है। स्त्री के रेखाचित्रों के साथ दर्शाए गए फ़िल्म के मुश्किल से तीन मिनट लंबे इस प्रारंभिक दृश्य में पुरुष-प्रधान समाज में उसकी स्थिति (चाहे कोई भी धार्मिक समुदाय हो) एवं उसके जीवन की विडंबनाओं का आख्यान है। सच पूछिए तो मुझे फ़िल्म का सर्वश्रेष्ठ दृश्य यही लगा।

'निकाह' का अर्थ होता है विवाह (मुस्लिम समुदाय में विवाह को निकाह कहा जाता है)। वस्तुतः इस फ़िल्म का मूल नाम 'तलाक़ तलाक़ तलाक़' रखा गया था किन्तु प्रदर्शन से पूर्व उसे बदलकर 'निकाह' कर दिया गया। फ़िल्म कहानी कहती है नीलोफ़र (सलमा आग़ा) नामक युवती की जिससे उसके कॉलेज जीवन में हैदर (राज बब्बर) एकतरफ़ा प्रेम करता था किन्तु उसका निकाह हो जाता है वसीम (दीपक पाराशर) से। वसीम एक धनी व्यवसायी है। विवाह के कुछ समय के उपरांत ही नीलोफ़र को लगने लगता है कि उसका यह विवाह अर्थहीन है क्योंकि वसीम के पास उसके लिये समय ही नहीं है। जब उनके विवाह की पहली वर्षगांठ पर नीलोफ़र द्वारा आयोजित पार्टी में भी वसीम नहीं आता तो बाद में पति-पत्नी में तकरार होती है और वसीम क्रोध में आकर नीलोफ़र को 'तलाक़ तलाक़ तलाक़' कह देता है एवं मुस्लिम शरीयत के अनुसार उनका विवाह-विच्छेद हो जाता है।

विवाह-विच्छेद के बाद नीलोफ़र को एक पत्रिका में नौकरी मिलती है जिसका संपादक है हैदर जो आज भी नीलोफ़र से प्रेम करता है। वह नीलोफ़र के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखता है जिसे नीलोफ़र स्वीकार कर लेती है एवं उनका विवाह (अर्थात् निकाह) हो जाता है। दूसरी ओर वसीम को अपनी भूल का अहसास होता है एवं वह नीलोफ़र से पुनः विवाह करना चाहता है। उसे पता चलता है कि शरीयत के अनुसार यह तभी संभव है जब नीलोफ़र किसी और से विवाह करे तथा उससे उसका तलाक़ हो जाए। जब नीलोफ़र हैदर से विवाह कर लेती है तो उसे लगता है कि हैदर से तलाक़ लेकर नीलोफ़र उससे पुनः विवाह कर सकती है। वह इस बाबत नीलोफ़र को सूचित करता है जो कि हैदर को पता लग जाता है। अब हैदर नीलोफ़र की ख़ुशी के लिए उसे तलाक़ देने को तैयार हो जाता है। पर नीलोफ़र क्या चाहती है ? आख़िर नीलोफ़र एक औरत के रूप में अपने जीवन पर अपना अधिकार होने की घोषणा इन दोनों ही पुरुषों के सामने करती है और अपनी ज़िन्दगी का फ़ैसला ख़ुद करती है।

'निकाह' का विषय बहुत अच्छा है और जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी तो नवीन भी था क्योंकि पहले कभी इस तरह के विषय पर कोई फ़िल्म नहीं बनी थी। निर्माता-निर्देशक बी.आर. चोपड़ा ने इस फ़िल्म के माध्यम से एक प्रगतिशील विचार को दर्शक समुदाय के सामने रखा। उन्होंने फ़िल्म के अंत में नीलोफ़र के चरित्र के अपने जीवन के संबंध में लिये गए निर्णय के द्वारा यह स्पष्ट किया कि स्त्री पुरुष की जीवन-संगिनी है, उसकी संपत्ति नहीं जिसे जब चाहे छोड़ दिया जाए या किसी को उपहार की तरह दे दिया जाए। इसीलिए मैंने इस फ़िल्म को अपने समय से आगे की फ़िल्म बताया क्योंकि उस समय मुस्लिम समाज में पुरुष द्वारा पत्नी को तीन बार तलाक़ कहकर विवाह-विच्छेद करने, मुस्लिम स्त्री के अपने पूर्व-पति से पुनर्विवाह की प्रक्रिया तथा सबसे बढ़कर मुस्लिम स्त्री के अपने जीवन पर अपना अधिकार होने संबंधी बातें करना ही सार्वजनिक रूप से वर्जित-सा था। फ़िल्म के अत्यन्त लोकप्रिय होने तथा भारी व्यावसायिक सफलता प्राप्त करने का प्रमुख कारण इसकी विषय-वस्तु ही थी। इसकी सफलता का दूसरा कारण था इसका उत्तम संगीत।

लेकिन फ़िल्म की जो कमी मैंने पकड़ी, वह यह है कि इसके चरित्र वास्तविक नहीं लगते, नक़ली लगते हैं। मैं यहाँ मुख्य चरित्रों की बात कर रहा हूँ। विशेष रूप से हैदर का जिस प्रकार से चरित्र-चित्रण किया गया है, वह कहीं से भी यथार्थ के निकट का नहीं लगता। डॉ० अचला नागर की कहानी को चित्रपट पर उतारते समय निर्देशक बलदेव राज चोपड़ा यह चूक कर गए कि न तो कहानी वास्तविकता के निकट की बन पाई और न ही उसके किरदार वास्तविकता के निकट के बन पड़े। फ़िल्म के विचारोत्तेजक होने के बावजूद सम्पूर्ण फ़िल्म देखते समय मुझे यही लगा कि मैं काल्पनिक पात्रों की कोई काल्पनिक कहानी देख रहा हूँ जिसका वास्तविकता से दूर-दूर तक का संबंध नहीं है। हम जानते हैं कि (बॉलीवुड की) फ़िल्मी कहानियां वास्तविक नहीं हो सकतीं, फिर भी एक अच्छी फ़िल्म में कुछ सीमा तक वास्तविकता का पुट अपेक्षित होता है जिससे दर्शक उस कहानी तथा उसके पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर सकें। 'निकाह' इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती। कहानी अच्छी लगती है (विशेष रूप से इसका क्लाईमेक्स) और इसका मुस्लिम परिवेश भी पर इसके पात्र अपने आसपास के जीते-जागते लोगों जैसे नहीं लगते।

ख़ैर, जैसा कि मैंने ऊपर कहा, इस विषय-वस्तु को लेकर फ़िल्म बनाना ही बहुत बड़ी बात थी। इसके बाद फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ूबी रही इसके सुमधुर एवं सार्थक गीत। संगीतकार रवि ने गीतकार हसन कमाल द्वारा लिखे गए गीतों पर अत्यन्त मधुर संगीत दिया है। फ़िल्म में हसरत मोहानी की बहुत पुरानी ग़ज़ल 'चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है' भी डाली गई है जिसे मशहूर ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली ने गाया है। इसके अतिरिक्त 'दिल के अरमां आँसुओं में बह गए', 'बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी', 'दिल की ये आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले', फ़िज़ा भी है जवां जवां', 'चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में' आदि गीत भी लाजवाब हैं। सलमा आग़ा जितनी ख़ूबसूरत ख़ुद थीं, उनकी आवाज़ भी उतनी ही ख़ूबसूरत रही क्योंकि अपने पर फ़िल्माए गए गीत उन्होंने ख़ुद ही गाये हैं। पुरुष के गीतों पर आवाज़ महेन्द्र कपूर की है। 

तकनीकी दृष्टि से फ़िल्म उच्च स्तर की है। जहाँ तक अभिनय का प्रश्न है, सलमा आग़ा ने तो अच्छा अभिनय किया है लेकिन बाक़ी दोनों प्रमुख पात्रों से निर्देशक स्वाभाविक अभिनय नहीं करवा सके और वे अति-नाटकीयता से प्रभावित रहे। फ़िल्म अधिक लंबी नहीं है एवं आरंभ से अंत तक दर्शक को बाँधे रखती है। अगर फ़िल्मकार ने गरारे-दुपट्टों एवं मुस्लिम तहज़ीब से अधिक ध्यान कहानी की रूह पर दिया होता तो यह एक उत्कृष्ट फ़िल्म बन सकती थी। फिर भी इसे इसकी ख़ूबियों के कारण क्लासिक माना जाता है। मुझे स्वर्गीय के.पी. सक्सेना जी द्वारा की गई इस फ़िल्म की समीक्षा (जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी) का अंतिम वाक्य याद आता है - (फ़िल्म की कमियों के बावजूद) 'निकाह' ने मुझे निराश नहीं किया, तहज़ीब के बुझते हुए चिराग़ों का धुआँ भी महकदार होता है।

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शनिवार, 13 जून 2026

वेद प्रकाश शर्मा का अद्भुत सृजन - विभा जिंदल

जब हिंदी में लुगदी साहित्य की श्रेणी के अंतर्गत विविध उपन्यास नियमित रूप से रचे जाते थे, तब कई उपन्यासकार कुछ ऐसे पात्रों का भी सृजन करते थे जो कि उनके उपन्यासों में दोहराए जाते थे। ऐसे पात्र स्टॉक कैरेक्टर अथवा स्थायी पात्र कहलाते थे। स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की विजय-विकास सीरीज़ के अंतर्गत बहुत-से पात्र ऐसे ही हैं। लेकिन इस सीरीज़ से हटकर भी उन्होंने कुछ ऐसे अद्भुत पात्रों का सृजन किया जो पाठकों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ गये। ऐसे एक पात्र का नाम है - विभा जिंदल।

विभा जिंदल को वेद प्रकाश शर्मा ने सबसे पहले अपने थ्रिलर उपन्यास 'साढ़े तीन घंटे' में प्रस्तुत किया था। वेद प्रकाश शर्मा ने उस उपन्यास में स्वयं को (तथा अपनी पत्नी मधु को) भी प्रस्तुत किया था। यद्यपि विभा का पात्र काल्पनिक ही है, वेद जी ने उन्हें अपने कॉलेज की सहपाठिनी बताया एवं यह बताया कि वे उनसे प्रेम करने लगे थे किन्तु उन्हें यह बात बताने से झिझकते थे। कॉलेज के अंतिम दिन विभा ने उनसे बातचीत की एवं बताया कि वे उनकी भावनाओं से परिचित हैं लेकिन उन्हें इन बातों से परे हटकर अपने लेखन पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि उनमें एक उच्च श्रेणी का जासूसी उपन्यासकार बनने के गुण हैं। वेद जी ने लिखा है (उपन्यास में अपनी पत्नी मधु को बताते हुए) कि विभा की बात को गांठ बाँधकर वे अन्य बातों से ध्यान हटाकर केवल लेखन में ध्यान लगाने लगे। विभा का विवाह एक उद्योगपति परिवार में अनूप जिंदल से हुआ तथा इस प्रकार वे जिन्दल परिवार की बहू बनीं और विभा जिन्दल कहलाने लगीं। वेद जी ने 'साढ़े तीन घंटे' में लिखा है कि वे सपत्नीक विभा से मिलने उनके नगर जिंदलपुरम गये। जिन्दल परिवार के भव्य आवास का नाम 'मंदिर' है क्योंकि उसकी दीवारों पर सम्पूर्ण रामायण अंकित की गई है। वेद जी की इसी यात्रा के दौरान विभा के पति अनूप जिंदल साढ़े तीन घंटे के लिए अपने कमरे में बंद हो जाते हैं तथा उस अवधि के पूर्ण होने पर स्वयं को गोली मारकर आत्महत्या कर लेते हैं। इस उपन्यास का कथानक यही है कि विभा अपने पति को खोने के ग़म को भूलकर किसी कुशल जासूस की भांति उनकी मृत्यु की छानबीन करने लगती हैं तथा अंत में वास्तविक अपराधी को पकड़ने के साथ-साथ सम्पूर्ण रहस्य को भी स्पष्ट कर देती हैं।

कुछ वर्षों के उपरांत वेद प्रकाश शर्मा ने विभा जिंदल को लेकर दूसरा उपन्यास लिखा - 'बीवी का नशा' जिसमें उन्होंने एक बार फिर स्वयं को एक पात्र के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने लिखा कि उनके एक मित्र संजय ने अपनी पत्नी की सहेली की हत्या कर दी थी जिसके आरोप में उसी की पत्नी किरन फंस गई थी और उसके पास कोई ऐसा सबूत नहीं था जिससे वह यह प्रमाणित कर सके कि हत्या उसकी पत्नी ने नहीं, ख़ुद उसी ने की थी। अब वेद जी उसे साथ लेकर चल देते हैं जिन्दलपुरम विभा जिंदल से मिलने और इस मामले में उनकी मदद माँगने। विभा संजय की मदद करती हैं एवं एक कुशल अण्वेषक (इनवेस्टिगेटर) की भांति न केवल सारे रहस्य की परतें खोल देती हैं बल्कि संजय को भी निर्दोष सिद्ध करके वास्तविक हत्यारे को बेनक़ाब कर देती हैं। वेद जी यह भी बताते हैं कि 'साढ़े तीन घंटे' में अपने पति की मृत्यु के समय विभा गर्भवती थीं तथा कुछ समय के उपरांत उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम बाद में वेद जी ने 'विराट' बताया।

एक दशक से अधिक के उपरांत वेद जी ने 'मि० चैलेंज' नामक एक उपन्यास लिखा जिसमें उन्होंने बताया कि उन्हीं के शहर मेरठ के एक कॉलेज में पहले एक महिला व्याख्याता का क़त्ल होता है एवं उसके बाद तो एक के बाद एक क़त्लों का सिलसिला ही चल पड़ता है। अब वे पुनः विभा को जिन्दलपुरम से बुलवाते हैं जिसके लिये वे स्वयं अपना ही अपहरण हो गया दर्शाते हैं। विभा जिंदलपुरम से आती हैं और पहले तो वेद जी को ही ढूंढ़ती हैं तथा उसके बाद सारे मामले की इनवेस्टिगेशन करके हत्यारे के चेहरे को अनावृत कर देती हैं। इस उपन्यास में वेद जी ने समय काल को ध्यान में रखते हुए (अपनी पत्नी मधु के साथ-साथ) अपने चार बच्चों का उल्लेख किया है तथा अपने नन्हे पुत्र शगुन को विभा के साथ-साथ रहकर उनकी इनवेस्टिगेशन में शामिल होते हुए बताया है। चूंकि इस उपन्यास की पृष्ठभूमि वेद जी ने अपने गृहनगर मेरठ को बनाया है, उपन्यास में मेरठ के विभिन्न स्थानों का भी उल्लेख है एवं पाठक उपन्यास के पृष्ठों के माध्यम से मेरठ की सैर करता है।

एक लंबे समय के अंतराल के बाद वेद जी ने विभा को लेकर पुनः एक उपन्यास लिखा - 'क्योंकि वो बीवियां बदलते थे'। इस उपन्यास की ख़ासियत यह है कि उपन्यास में हो रही विभिन्न हत्याओं का कारण उपन्यास के शीर्षक में ही स्पष्ट कर दिया गया है। फिर भी यह उपन्यास अत्यन्त रोचक बन पड़ा है। इस बार विभा को विभिन्न उद्योगपति घरानों के पुरुषों एवं महिलाओं की एक के बाद एक हो रही हत्याओं के रहस्य को सुलझाना है। इस काम में उनकी मदद वेद जी तथा उनका बेटा शगुन भी करते हैं। यह सुदीर्घ उपन्यास पाठकों के दिमाग़ को चकरा कर रख देता है। हत्यारे की वास्तविकता अंतिम पृष्ठ पर अंतिम पंक्तियों में ही पता चलती है। इस उपन्यास में वेद जी ने विभा के व्यक्तित्व पर भी आयु का प्रभाव पड़ा दिखाया है और साथ ही बताया है कि उनका पुत्र विराट अब बड़ा हो चुका है।

विभा जिंदल के ये चारों उपन्यास वेद जी की श्रेष्ठ कृतियों में सम्मिलित हैं। जिस प्रकार विश्वप्रसिद्ध रहस्यकथा लेखिका अगाथा क्रिस्टी ने मिस मार्पल नामक एक उम्रदराज़ महिला जासूस का अत्यन्त लोकप्रिय पात्र रचा है, कुछ-कुछ वैसा ही यह वेद जी द्वारा रचा गया पात्र है। विभा के साथ-साथ स्वयं को एवं अपने परिवार के सदस्यों को भी इन उपन्यासों में प्रस्तुत करके वेद जी ने न केवल इस काल्पनिक चरित्र पर वास्तविकता का रंग चढ़ाया है वरन उपन्यासों की रोचकता को भी बढ़ा दिया है। इन उपन्यासों में वेद जी ने स्वयं को एक सामान्य बुद्धि वाले व्यक्ति के रूप में ही चित्रित किया है। और जहाँ तक विभा के चित्रण की बात है, वेद जी ने अपने शब्दों से विभा के व्यक्तित्व का ऐसा जीवंत चित्र ख़ींचा है कि इन उपन्यासों को पढ़ते समय हमें लगता है मानो हम किसी काल्पनिक पात्र के बारे में नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि अपने सामने जीती-जागती विभा जिंदल को उपस्थित देख रहे हैं। यूँ तो वेद जी ने विकास, वतन, केशव पंडित आदि कई पात्रों का सृजन किया है लेकिन विभा जिन्दल की बात ही कुछ और है। जिन्हें हिंदी उपन्यास पढ़ने में रुचि है, उन्हें मैं सलाह दूंगा कि इन उपन्यासों को पढ़ें एवं जिन्दलपुरम के औद्योगिक साम्राज्य की मालकिन होते हुए भी सादगी से परिपूर्ण इस असाधारण नारी से मिलें।

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शुक्रवार, 5 जून 2026

पूनम की रात

पूनम या पूर्णिमा या पूर्णमासी। इन सभी शब्दों का एक ही अर्थ है वह दिवस जिसकी रात पूरे चाँद की रात होती है अर्थात् चंद्रमा अपनी सम्पूर्ण सोलह कलाओं के साथ पूर्णतः गोलाकार स्वरूप में आकाश पर अवतरित होता है और वह रात चाँदनी रात कहलाती है। चूंकि इस रात का सौंदर्य अद्भुत होता है, ये नाम सौंदर्य के प्रतीक माने जाते हैं। इसीलिए कन्याओं के नाम चाँदनी, पूनम, पूर्णिमा आदि रखे जाते हैं। 

पर साथ ही इस रात का और इस रात को निकलने वाले पूर्ण गोलाई के चाँद का अन्य महत्व भी है। भौगोलिक दृष्टि से बात करें तो इस रात को समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटा प्रभावित होते हैं। ज्वार के रूप में समुद्र का जल बहुत ऊंचाई तक जाता है तथा भाटा के रूप में बहुत गहराई तक। कारण यह है कि इस रात को पृथ्वी सूर्य एवं चंद्रमा के मध्य में होती है जिसके कारण दोनों का ही गुरुत्वाकर्षण बल एक ही दिशा में काम करता है।

लेकिन इस लेख में मेरा विषय पूनम के चाँद का मनोवैज्ञानिक प्रभाव है। ऐसा माना जाता है कि जो मनुष्य कुछ असामान्य मानसिकता वाले हों, उन पर पूरे चाँद का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि उनकी असामान्यता बढ़ जाती है। यदि ऐसे व्यक्ति को नींद में चलने की बीमारी है तो पूनम की रात को ऐसा अवश्य होता है अर्थात् वह व्यक्ति नींद में चलता है (या चलती है) तथा ऐसी अवस्था में उसे अपने द्वारा किए गए किसी भी काम का आभास नहीं होता। इस विषय को आधार बनाकर उपन्यास भी लिखे गए हैं तथा फ़िल्म भी बनाई गई है। अर्ल स्टेनले गार्डनर ने इसी तथ्य को आधार बनाकर अपना पेरी मेसन सीरीज़ का उपन्यास 'The case of the sleepwalker's niece' लिखा तो हिंदी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक ने भी अपनी सुनील सीरीज़ के अंतर्गत 'पूरे चाँद की रात' नामक उपन्यास लिखा। 

निर्माता-निर्देशक-अभिनेता किशोर साहू ने इसी विषय को आधार बनाकर हिन्दी फ़िल्म 'पूनम की रात' (१९६५) बनाई। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं - मनोज कुमार, कुमुद छुगानी, शिव कुमार, नंदिनी, डी.के. सप्रू, लीला मिश्रा, रबीन्द्र बनर्जी, परवीन चौधरी, बेला बोस, प्रेम चोपड़ा एवं स्वयं किशोर साहू। किशोर साहू ने स्वयं ही इस फ़िल्म की कहानी लिखी है एवं इसे निर्देशित किया है। यह एक रहस्यकथा है।

फ़िल्म रानी नामक एक स्त्री के सीढ़ियों से गिरकर मर जाने से आरंभ होती है। बहुत बाद में जब शहर में रहकर अध्ययन कर रहा फ़िल्म का नायक मनोज कुमार एवं उसका मित्र शिव कुमार अपने कॉलेज के साथियों के साथ एक भ्रमण पर हैं तो शिव कुमार को अपने पिता (डी.के. सप्रू) के गंभीर रूप से अस्वस्थ होने का पता चलता है। वह मनोज कुमार के साथ अपने गृहनगर आता है तो मार्ग में एक दुकान पर मनोज कुमार को वर्षों पूर्व हुई रानी की रहस्यमय मृत्यु के विषय में सुनने का अवसर मिलता है जो कि शिव कुमार के पिता की रखैल बताई जाती थी। उसकी मृत्यु पूनम की रात को हुई थी। घर पहुँचने के बाद जहाँ उन्हें पता चलता है कि शिव कुमार के पिता लकवाग्रस्त हो गए हैं, वहीं मनोज कुमार को शिव कुमार के पूरे परिवार से मिलने का अवसर मिलता है। उसे संकेत मिलता है कि इस संयुक्त परिवार के विभिन्न सदस्यों में सद्भाव एवं स्नेह से युक्त संबंध नहीं हैं तथा कई सदस्य पारिवारिक संपत्ति पर नज़र गड़ाए हुए हैं। शिव कुमार की एक बहन कुमुद छुगानी मनोज कुमार से प्रेम करने लगती है तो दूसरी बहन नंदिनी भी उसकी ओर आकर्षित हो जाती है। 

रात को मनोज कुमार को एक रहस्यपूर्ण गीत सुनाई देता है (साथी रे, तुझ बिन जिया उदास रे) जिसे कोई महिला गा रही है। पर ढूंढ़ने पर उसे कोई नहीं मिलता। इस घर में हो रही केवल यही एक रहस्यमय बात नहीं है, ऐसी कई बातें हो रही हैं (विशेषतः रात को) जो उसके दिमाग़ को परेशान करती हैं। अचानक एक रात को शिव कुमार के लकवाग्रस्त पिता कोई भयावह बात देखते हैं और पलंग से नीचे गिर जाते हैं। इससे उनकी हालत और बिगड़ जाती है तथा वे अपने बोलने की शक्ति भी खो बैठते हैं। उनकी देखभाल के लिए उनके चिकित्सक किशोर साहू द्वारा रखी गई नर्स ग़ायब हो जाती है। बाद में उसकी लाश घर के अंदर ही बने हुए एक कुएं में मिलती है। ये घटनाएं पूनम की रात को होती हैं। चूंकि वहाँ के वातावरण का प्रभाव मनोज कुमार पर पड़ रहा है, उसकी असामान्य स्थिति को देखकर शिव कुमार को उसी पर नर्स की हत्या का संदेह होता है। वह किशोर साहू से इस विषय में बात करता है तो वे उसे पूनम की रात के असामान्य व्यक्तियों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बताते हैं। रहस्य का ख़ुलासा तब होता है जब अगली पूनम की रात आती है। 

फ़िल्म रहस्य से भरी है किन्तु निर्देशक ने कहानी के रहस्य को धीरे-धीरे फैलाया है। फ़िल्म मद्धम गति से आगे बढ़ती है लेकिन इसमें रोचकता की कोई कमी नहीं है। दर्शक फ़िल्म देखते समय अनुभव करता है जैसे उसके सामने कोई धुंध-सी छाई हुई है जो फ़िल्म के अंतिम दृश्य में ही हटती है तथा सब कुछ स्पष्ट होता है। नाच-गाने, रोमांस, कॉमेडी आदि के बावजूद यह रहस्य ही है जो फ़िल्म में व्याप्त है। इस दृष्टि से 'पूनम की रात' को एक विशुद्ध रहस्य फ़िल्म कहा जा सकता है। फ़िल्म के क्लाईमेक्स में कोई एक्शन नहीं है। केवल रहस्य को स्पष्ट किया गया है। सम्भवतः इसी कारण यह फ़िल्म विशेष सफल नहीं रही थी क्योंकि भारतीय दर्शक एक्शन से भरा क्लाईमेक्स देखने के आदी थे। राज खोसला या विजय आनंद जैसे रहस्यकथाओं को प्रस्तुत करने में निष्णात निर्देशक शायद इस कहानी को बेहतर ढंग से बना सकते थे लेकिन किशोर साहू ने भी विषय-वस्तु के साथ पूरा न्याय किया है और फ़िल्म के अंतिम दृश्य में सभी बातों को तार्किक ढंग से समझाया है।

यह श्वेत-श्याम फ़िल्म लगभग पूरी तरह से घर के भीतर ही फ़िल्माई गई है। कला-निर्देशक ने ठीक काम किया है जबकि छायाकार ने अपना कैमरा कुछ इस कुशलता से काम में लिया है कि आरंभ से अंत तक फ़िल्म में एक रहस्य का वातावरण बना रहता है। तकनीकी रूप से फ़िल्म अच्छी है। इसकी लंबाई भी अधिक नहीं है। शैलेंद्र के गीतों पर सलिल चौधरी ने मधुर संगीत दिया है। 'साथी रे, तुझ बिन जिया उदास रे' तो लता मंगेशकर का एक लोकप्रिय गीत है ही, अन्य गीत भी अच्छे बन पड़े हैं। पार्श्व संगीत फ़िल्म की विषय-वस्तु के अनुकूल है।

फ़िल्म की नायिका कुमुद छुगानी सहित अनेक कलाकारों (नंदिनी, शिव कुमार, रबीन्द्र बनर्जी आदि) की यह पहली ही फ़िल्म है। मनोज कुमार सहित सभी ने ठीक-ठाक काम किया है। मनोज कुमार के साथ कुमुद की जोड़ी अच्छी बन पड़ी है (इन दोनों की पहली मुलाक़ात बड़ी रोमांटिक और गुदगुदाने वाली है)। यदि मुझे सर्वश्रेष्ठ कलाकार को चुनना हो तो मैं लीला मिश्रा को चुनूंगा जिन्होंने शिव कुमार की बुआ की भूमिका निभाई है।

अब पूरे चाँद के साथ आने वाली पूनम या पूर्णिमा या पूर्णमासी की रात का मनुष्यों पर वस्तुतः कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं ‌‌(विशेषतः असामान्य व्यक्तियों के व्यवहार पर) यह तो मनोवैज्ञानिक ही जानें। पर यह भूली-बिसरी फ़िल्म निश्चय ही एक मनोरंजक फ़िल्म है जो सस्पेंस फ़िल्में देखने वालों को अवश्य पसंद आयेगी। 

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बुधवार, 20 मई 2026

पाठक साहब का मानस-पुत्र सुनील

हिंदी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक ने कई सीरीज़ के उपन्यास लिखे हैं लेकिन उनकी सबसे अधिक लोकप्रिय सीरीज़ सुनील सीरीज़ है जिसके वे सौ से भी अधिक उपन्यास लिख चुके हैं। इस सीरीज़ का नायक है एक बंगाली युवक सुनील कुमार चक्रवर्ती जो राजनगर नामक एक काल्पनिक नगर में रहता है तथा 'ब्लास्ट' नामक एक राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र में नौकरी करता है। राजनगर में उसका आवास बैंक स्ट्रीट की तीन नम्बर इमारत की पहली मंज़िल के एक फ़्लैट में है। वह एक आदर्शवादी पत्रकार है तथा 'सत्यमेव जयते' में उसकी अटूट आस्था है। वह प्रायः क़त्ल के मामलों की छानबीन करता है तथा वास्तविक अपराधी के चेहरे से नक़ाब हटाता है। इस सीरीज़ का पहला उपन्यास 1963 में प्रकाशित हुआ था एवं तब से ही यह बाँका-सजीला युवक पाठकों के दिलों पर राज कर रहा है। 

पाठक साहब ने सुनील के अनेक कारनामे ऐसे भी लिखे हैं जिनमें उसे एक पत्रकार की जगह एक गुप्तचर के रूप में कार्य करते हुए दिखाया गया है जो कि भारत सरकार की एक विशेष संस्था 'स्पेशल इंटेलीजेंस' के लिये काम करता है। इस संस्था के प्रमुख हैं कर्नल मुखर्जी। ऐसे उपन्यासों में सुनील कर्नल मुखर्जी के निर्देशानुसार अकेले अथवा गोपाल एवं विंग कमांडर रामू जैसे अन्य गुप्तचरों के साथ भारत अथवा विदेशों में अपने देश के लिये काम करता है। ऐसे दो उपन्यास 'अमन के दुश्मन' एवं 'हाईजैक' हैं जो कि बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम पर आधारित हैं। इनमें पाठक साहब ने बताया है कि सुनील का जन्म अविभाजित बंगाल के गोपालगंज नामक स्थान पर हुआ था। सुनील का ऐसा अंतिम उपन्यास 'ऑपरेशन सिंगापुर' था जिसके बाद पाठक साहब ने सुनील को एक पत्रकार की भूमिका तक ही सीमित कर दिया।

बहरहाल पत्रकार सुनील तब से आज तक केवल पत्रकार ही है जो अपने अख़बार के लिये भागदौड़ करता है एवं सनसनीख़ेज़ कहानियां जुटाता है। वह अकसर कहता रहता है-'मैं किसी युवती को मुसीबत में नहीं देख सकता'। इसीलिए यदि कोई युवती उसके पास सहायता माँगने आती है तो वह उसे निराश नहीं करता एवं यथासंभव उसकी सहायता अवश्य करता है। इस चक्कर में वह स्वयं कई बार मुसीबत में पड़ जाता है लेकिन उसका यह स्वभाव नहीं बदलता। वह एक विदेशी मोटरसाइकिल एम.वी. आगस्ता अमेरिका पर राजनगर में विचरता है। कई बार वह अपने मित्र रमाकांत की कार भी उधार लेता है। 

सुनील सीरीज़ के कई स्थायी पात्र अथवा स्टॉक कैरेक्टर हैं (या रहे हैं) जो इस प्रकार हैं:

1. प्रमिला: प्रमिला केवल सुनील सीरीज़ के शुरुआती उपन्यासों में आई। वह सुनील के बॉस मलिक साहब की निजी सहायक तथा सुनील की पड़ोसन थी। उसके लिये इस सीरीज़ के आरंभ के एक उपन्यास में लिखा गया था कि सुनील को उससे प्रेम था। प्रमिला का एक छोटा भाई भी बताया गया था। जिन उपन्यासों में प्रमिला आई, उनमें उसकी तथा सुनील की अच्छी-ख़ासी नोक-झोंक हुई। लेकिन सुनील सीरीज़ के कुछ ही उपन्यासों के बाद पाठक साहब ने प्रमिला को दिखाना बंद कर दिया।

2. रेणु: रेणु 'ब्लास्ट' की रिसैप्शनिस्ट है जिससे सुनील की नोक-झोंक और चुहलबाज़ी आज तक चली आ रही है। उसने कई बार सुनील की गतिविधियों में उसकी सहायता भी की है।

3. जुगल किशोर उर्फ़ बंदर: यह किरदार भी सुनील सीरीज़ के कुछ ही उपन्यासों में आया जो इस सीरीज़ के आरंभिक उपन्यास ही माने जा सकते हैं। वैसे पाठक साहब ने उसे नायक बनाकर भी एक उपन्यास लिखा है। सब उसे उसके वास्तविक नाम के स्थान पर 'बंदर' के नाम से ही पुकारते हैं। वह डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा एक युवक है जो सुनील का मित्र है। वह एक धनी परिवार से आता है एवं युवा लड़कियों में रुचि लेता है। नज़र कमज़ोर होने के बावजूद वह चश्मा लगाना पसंद नहीं करता क्योंकि उसकी राय में वह चश्मे के बिना ज़्यादा ख़ूबसूरत लगता है। वह भी पाठकों को जमकर हँसाता है। पाठक साहब ने इस सीरीज़ के बाद के उपन्यासों में उसे भी दिखाना बंद कर दिया।

4. रमाकांत: सुनील सीरीज़ का एक अत्यंत महत्वपूर्ण किरदार है सुनील का हमउम्र पंजाबी युवक रमाकांत जो कि 'यूथ क्लब' नाम का एक मनोरंजन प्रदान करने वाला क्लब चलाता है। वह एक विनोदी स्वभाव का मस्तमौला युवक है जो कि अपनी बातों से पाठकों को ख़ूब हँसाता है। वह सुनील के बहुत-से काम भी अपने आदमियों के माध्यम से करवाता है। अपनी खोजी गतिविधियों के संदर्भ में बहुत-सी सूचनाएं सुनील को उसी से मिलती हैं।

5. जौहरी और दिनकर: जौहरी और दिनकर रमाकांत के कर्मचारी हैं तथा सुनील के लिये (रमाकांत के प्रत्यक्ष या परोक्ष निर्देश पर) बहुत-से काम करते हैं।

6. अर्जुन: अर्जुन सुनील से उम्र में कुछ छोटा उसका कनिष्ठ पत्रकार है जो उसके निर्देश पर काम करता है। वह सुनील का मुँहलगा है और अपने सीनियर से ख़ूब हँसी-मज़ाक़ करता है। 

7. रूपा गुप्ता: रूपा गुप्ता सुनील सीरीज़ के केवल तीन उपन्यासों में आई और सुनील के साथ उसकी नोक-झोंक ख़ूब चली जिससे उन उपन्यासों के पाठकों का ख़ूब मनोरंजन हुआ। वह 'क्रानिकल' नाम के समाचार-पत्र में एक पत्रकार के रूप में काम करती है।

8. फ़्लोरेंफ़्लोरें एक युवती है जो 'सपना' नामक एक नाइट क्लब की संचालिका है। कभी वह इसी क्लब में होस्टेस के रूप में काम करती थी। वह सुनील को पसंद करती है तथा उसकी मदद करने को सदा तत्पर रहती है। वह भी इस सीरीज़ के कुछ ही उपन्यासों में आई है। 

9. इंस्पेक्टर प्रभु दयाल: सुनील की खोजी गतिविधियों में उसका पाला इंस्पेक्टर प्रभु दयाल से पड़ता है जो कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी है एवं क़त्ल के मामलों की जाँच करता है। उसका तकिया कलाम है - 'मुझे मेरा धंधा सिखाने की कोशिश मत करो'। किसी भी मामले की पड़ताल के दौरान प्रायः वह और सुनील एकदूसरे के आमने-सामने हो जाते हैं। लेकिन प्रभु दयाल न केवल एक कार्यकुशल एवं कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी है वरन अत्यन्त संवेदनशील मनुष्य भी है। उसे भी नायक के रूप में लेकर पाठक साहब ने एक उपन्यास लिखा है।

10. सुपरिंटेंडेंट रामसिंह: प्रभु दयाल के उच्चाधिकारी पुलिस सुपरिंटेंडेंट रामसिंह अब डीसीपी के पदनाम से जाने जाते हैं। वे सुनील के मित्र हैं।

11. एडवोकेट चटर्जी: चटर्जी साहब भी सुनील सीरीज़ के कुछ ही उपन्यासों में आए हैं लेकिन वे इस सीरीज़ के एक महत्वपूर्ण किरदार हैं। वे अनुभवी वकील हैं तथा जब भी सुनील को आवश्यकता पड़ती है, वे उसकी सहायता करते हैं।

12. राय: राय 'ब्लास्ट' का न्यूज़ एडीटर है तथा सुनील का उच्चाधिकारी है। लेकिन जब भी वह सुनील पर अपने बॉस होने का रोब जमाना चाहता है, सुनील उसकी चलने नहीं देता। उसकी और सुनील की नोक-झोंक भी कई बार बड़ी मनोरंजक बन पड़ी है।

13. मलिक साहब: बलदेव कृष्ण मलिक साहब 'ब्लास्ट' के मालिक और मुख्य संपादक (चीफ़ एडीटर) हैं। वे भी सत्य में अटूट आस्था रखते हैं। उनके लिये सुनील केवल उनके अख़बार का एक कर्मचारी ही नहीं है बल्कि उनकी अपनी संतान के समान है। वे सुनील से पुत्रवत् स्नेह करते हैं और अपने हर काम में सुनील को उनका पूरा समर्थन प्राप्त होता है।

सुनील पहले केवल एक सामान्य पत्रकार था लेकिन 'टॉप सीक्रेट' नामक उपन्यास के बाद पाठक साहब ने दिखाया कि उसकी तरक्की हो गई है एवं अब वह 'ब्लास्ट' का मुख्य पत्रकार (चीफ़ रिपोर्टर) बन गया है। जैसे कभी सर आर्थर कोनन डॉयल द्वारा रचित पात्र शरलॉक होम्स इतना लोकप्रिय हो गया था कि उसके 221  बी, बेकर स्ट्रीट, लंदन के पते पर उसके लिये पत्र आया करते थे, वैसा ही कुछ-कुछ सुनील के साथ भी हुआ था जब पाठक साहब के पास उसके संबंध में पूछताछ करते हुए पाठकों (एवं पाठिकाओं) के पत्र आया करते थे (अस्सी के दशक में)। पाठक समुदाय उसकी आदतों, पसंद-नापसंद आदि के बारे में जानना चाहता था। साथ ही पाठक यह भी जानना चाहते थे कि वह शादी करेगा तो रेणु से करेगा या किसी और से। 

भविष्य की चिंता किए बिना केवल वर्तमान में जीने वाला यह युवक शानदार खान-पान का शौकीन है, शानदार कपड़े पहनने का रसिया है और किसी की भी दुख-तक़लीफ़ से द्रवित होकर उसकी सहायता करने को तत्पर हो जाता है। पाठक साहब का यह मानस-पुत्र सदा अंडरडॉग अथवा कमज़ोर का साथ देता है जिस पर कोई ताक़तवर ज़ुल्म कर रहा हो। यह हाज़िर-जवाब युवक मन से दयालु तथा स्वभाव से उदार है। यह जीवन के ऊंचे मूल्यों को लेकर चलता है जिनसे यह कभी समझौता नहीं करता। यदि अब तक आप सुनील से नहीं मिले हैं तो कभी अवश्य मिलिए और देखिए कि फ़िल्म अभिनेताओं जैसा ख़ूबसूरत यह आदर्शवादी युवक कैसा लगता है।

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सोमवार, 18 मई 2026

गुलशन नंदा और शगुन

साठ के दशक से नब्बे के दशक तक जब भारत में लुगदी साहित्य का दौर था और ढेरों उपन्यास पॉकेट बुक की सूरत में पाठकों के समक्ष आया करते थे, उस समय सामाजिक उपन्यास लिखने वाले लेखकों के सिरमौर थे गुलशन नन्दा। गुलशन नंदा को पाठकों की नब्ज़ पहचानने में महारत हासिल थी तथा दिल को छू लेने वाली भाषा में भावनाओं से ओतप्रोत जो कहानियां वे अपने उपन्यासों के माध्यम से प्रस्तुत करते थे, वे स्वाभाविक रूप से पाठकों में अत्यन्त लोकप्रिय हो जाया करती थीं। उन्होंने कम उपन्यास लिखे लेकिन जो लिखे, वे लोकप्रियता के चरम पर जा पहुँचे। चूंकि वे फ़िल्मी ढंग की कहानियां लिखा करते थे, उनके बहुत-से उपन्यासों पर फ़िल्में भी बनीं जैसे 'शर्मीली', 'कटी पतंग', 'नील कमल', 'नया ज़माना', 'दाग़', 'अजनबी', 'झील के उस पार', 'खिलौना', 'काजल', 'महबूबा' आदि। लेकिन उनका एक उपन्यास ऐसा है जिस पर फ़िल्म तो नहीं बनी लेकिन अगर बनती तो संभवतः बहुत अच्छी बनती क्योंकि उपन्यास की कहानी बहुत अच्छी है। यह उपन्यास है 'शगुन'।

शगुन शब्द का अर्थ होता है किसी मंगल कार्य या संबंध (मुख्यतः वैवाहिक संबंध) का आरंभ करने के प्रतीक स्वरूप किसी वस्तु का दिया जाना। यह उपन्यास एक प्रेम-त्रिकोण या त्रिकोणीय पारिवारिक ड्रामा है जिसके तीन कोण हैं पति, पत्नी तथा पति की भूतपूर्व पत्नी। इन लोगों के साथ जुड़ी हुई है पति के प्रथम विवाह से उत्पन्न पुत्री। अजय का मुम्बई में रह रही रूबी से तलाक़ हो चुका है तथा न्यायालय ने रूबी को ही उनकी पुत्री रश्मि का संरक्षण प्रदान किया है, अतः रश्मि अपनी माता रूबी के साथ रहती है। दूसरी ओर शारदा है और वह भी एक टूटे हुए विवाह का भार अपने मन पर लिये दिल्ली में रहती है। अजय का मित्र अशोक बहुत अच्छा इंसान है तथा वह शारदा से भी परिचित है जिसे उसने अपनी मुँहबोली बहन बना रखा है। अशोक पैरों से अपाहिज है एवं कृत्रिम पैरों का उपयोग करता है। उसे लगता है कि अजय एवं शारदा एकदूसरे के साथ अच्छी तरह निभा सकते हैं एवं एक सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत कर सकते हैं। वह दोनों को मिलवाता है और दोनों की सहमति हो जाने के उपरांत उनका विवाह हो जाता है। दोनों को ही लगता है कि वे एकदूसरे को समझ सकते हैं और एक बेहतर जीवन जी सकते हैं। शारदा को विश्वास है कि वह अजय की पुत्री रश्मि का भी दिल जीत सकेगी एवं उसे अपने बच्चे जैसा ही प्यार दे सकेगी।

विवाह के उपरांत अजय अपने करियर की ख़ातिर मुम्बई चला जाता है। पहले तो वह अपने पुराने दोस्त अनवर के गेस्ट हाउस में रहता है जिसने मूल रूप से उसे रूबी से मिलवाया था। लेकिन शीघ्र ही वह नई नौकरी के साथ-साथ एक नये आवास का भी इंतज़ाम कर लेता है जिसके बाद शारदा भी उसके साथ रहने के लिये मुम्बई चली आती है। लेकिन अब होता यह है कि अजय की यह नई ख़ुशियों भरी ज़िन्दगी रूबी को डाह से भर देती है। वह अजय का शारदा के साथ ख़ुशी से रहना सहन नहीं कर पाती। अब वह अजय पर फिर से डोरे डालने लगती है। इसके अतिरिक्त वह उन दोनों की बच्ची रश्मि का भी अजय को अपने नज़दीक लाने के लिये इस्तेमाल करती है। अजय उसके जाल में फंस जाता है और नतीजा यह निकलता है कि शारदा के साथ उसके सुखी वैवाहिक जीवन में भूचाल आ जाता है। इन दो स्त्रियों तथा अपनी पुत्री के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े इनके बीच फंसे पुरुष के मध्य की कशमकश उपन्यास को उसके क्लाईमेक्स की ओर ले जाती है।

गुलशन नन्दा साधारण कहानियों को भी कविता, शायरी तथा मर्मस्पर्शी संवादों के साथ अत्यन्त मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करने में निष्णात थे। चूंकि वे उपन्यासकार होने के साथ-साथ फ़िल्मों के पटकथा लेखक भी थे, अतः वे कहानी के प्रवाह में पाठकों (और दर्शकों) की उत्सुकता बढ़ाने वाले मोड़ डालने में अत्यंत कुशल थे जिससे पाठक उपन्यास को उसके अंतिम शब्द तक पढ़ने पर विवश हो जाता था। 'शगुन' भी उनके इस कुशल लेखन का उदाहरण है। इसे पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि गुलशन नन्दा लगभग तीस वर्षों तक हिन्दी उपन्यास लेखन के शीर्ष पर क्यों रहे।

तीनों मुख्य पात्रों - अजय, रूबी और शारदा के चरित्रों को भलीभांति विकसित होने का अवसर दिया गया है। अजय एक स्वाभिमानी व्यक्ति है लेकिन वह स्त्री के आकर्षण के समक्ष टिक नहीं पाता। इसके अतिरिक्त उसकी पुत्री रश्मि उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। वह शारदा के प्रति बेवफ़ा नहीं है लेकिन जो रूबी उसे जीवन में पहले एक बार ठुकरा चुकी है, वह उसी के जाल में फंस जाता है। किसी पुरुष के स्वयं को ठुकराने वाली स्त्री के पुनः निकट जाने एवं उसके प्रेमजाल में फंस जाने का यह एक अच्छा उदाहरण है। लेकिन लेखक ने उसके चरित्र को इस प्रकार चित्रित किया है कि यह सब कुछ स्वाभाविक लगता है एवं उसके आचरण तथा उसके साथ घटने वाली घटनाओं में कहीं पर भी नक़लीपन नहीं झलकता। 

रूबी एक अपूर्व सुंदरी तो है ही, साथ ही वह एक अत्यन्त चालाक आधुनिक महिला है जो जानती है कि अपने आकर्षण को अपने फ़ायदे के लिए कैसे काम में लेना है। वह अजय को पसंद करती है लेकिन उसे सम्मान नहीं देती एवं चाहती है कि वह उसके सामने झुका रहे। तलाक़ हो जाने के बाद भी वह अपने और अजय की पुत्री के माध्यम से अजय को अपने वश में रखने की कोशिश करती रहती है। वह हार मानने वाली स्त्री नहीं है। जब अजय शारदा से विवाह कर लेता है तो उसका हार का अहसास और सौतिया डाह उसे चैन नहीं लेने देते।

शारदा एक अच्छे दिल वाली संवेदनशील महिला है जो अपने जीवन में एक झटका पहले ही सह चुकी है। अजय के अपनी भूतपूर्व पत्नी रूबी के निकट जाने के रूप में यह दूसरा झटका उसके लिये सहनीय नहीं है। वह स्वाभिमानी है तथा उसे स्वयं पर इतना विश्वास है कि वह अपनी सौतेली बेटी रश्मि के लिये एक अच्छी माँ बन सकेगी। उसका दूसरी स्त्री की संतान के लिये स्नेह दिल को छू लेने वाला है। वह अजय से कहती रहती है कि रूबी से दूरी रखे एवं उसकी मुलाक़ात रश्मि से करवा दे। 

इन मुख्य पात्रों के अतिरिक्त सहायक पात्र भी कहानी में अपनी छाप छोड़ने में सफल हैं यथा अजय का मित्र एवं शारदा का मुँहबोला भाई अशोक जो उन दोनों की भलाई के लिये चिंतित रहता है, अजय का पुराना मित्र अनवर, रूबी के व्यावसायिक साझेदार राहुजी, रूबी की पुरानी अधेड़ नौकरानी जानकी और सबसे बढ़कर अजय एवं रूबी की पुत्री रश्मि जो अपनी 'नई मम्मी' से मिलने को उत्सुक है। गुलशन नंदा के उपन्यासों की लोकप्रियता का एक कारण यह भी था कि उनके उपन्यासों के चरित्र स्वाभाविक लगते थे। 'शगुन' के पात्र भी हमें अपने आसपास के लोग ही लगते हैं हैं जिनकी बातों और गतिविधियों में कोई अस्वाभाविकता नहीं है।

मैंने 'शगुन' को अस्सी के दशक में पढ़ा था। पढ़ने के बाद मेरे मन में यह ख़याल आया था कि इस उपन्यास पर एक अच्छी सामाजिक फ़िल्म बन सकती है। मैंने अपने मन में उस फ़िल्म के लिये कलाकारों का चयन भी किया। मैंने कलाकार चुने - अजय की भूमिका हेतु विनोद खन्ना, रूबी की भूमिका हेतु रेखा, शारदा की भूमिका हेतु रंजीता, अशोक की भूमिका हेतु विनोद मेहरा, अनवर की भूमिका हेतु परीक्षित साहनी, जानकी की भूमिका हेतु सुलभा देशपांडे आदि। ख़ैर ...। 

उपन्यास का नाम 'शगुन' इसलिए रखा गया है क्योंकि अजय रिश्ता तय हो जाने के बाद शारदा को शगुन के रूप में एक अंगूठी देता है। बहरहाल यह हिंदी उपन्यास बहुत रोचक है तथा पाठक को प्रथम दृश्य से अंतिम दृश्य तक बाँधे रखता है। यह पाठक की उत्सुकता को कहीं पर भी कम नहीं होने देता एवं उसे क्लाईमेक्स तक बनाए रखता है। कथानक का प्रवाह बहुत अच्छा है एवं विभिन्न पात्रों द्वारा बोले गए संवाद अत्यन्त प्रभावशाली हैं। भाषा भी अच्छी है। कुल मिलाकर 'शगुन' हिंदी के पाठकों हेतु किसी उपहार से कम नहीं।

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शुक्रवार, 15 मई 2026

ये किसका लहू है ? कौन मरा ?

अगस्त १९४७ में भारत का विभाजन एक ऐसी भयावह त्रासदी था जिसमें कुछ निहित स्वार्थों के अतिरिक्त सभी हारे। इन निहित स्वार्थों में एक बहुत बड़ी संख्या समाजकंटकों की थी जिनके लिये यह त्रासदी मानो एक अवसर बनकर आई थी आपराधिक कार्यों हेतु। मेरा सदा से यह मानना रहा है कि साम्प्रदायिक दंगों के लाभार्थी केवल समाजकंटक ही होते हैं जिन्हें भीड़ की ओट में अपराध करने का अवसर मिल जाता है। और उत्पीड़ित केवल निर्दोष होते हैं। दंगे करने वाले पुरुष होते हैं लेकिन भुगतना सबसे अधिक पड़ता है महिलाओं को। विभाजन से एक वर्ष पूर्व ही जिन्ना की तथाकथित 'सीधी कार्रवाई' के आह्वान पर देश का एक बड़ा भाग हिन्दू-मुस्लिम दंगों की चपेट में आ गया था। अरसे से चला आ रहा साम्प्रदायिक सद्भाव मिट्टी में मिल गया था और भाईचारा नफ़रत में बदल गया था। निर्दोषों का ख़ून बह रहा था, सम्पत्तियां नष्ट हो रही थीं, बहन-बहू-बेटियों को अपमानित किया जा रहा था। साम्प्रदायिकता की आंधी में अंधे हो गए लोग यह नहीं सोच पा रहे थे कि ख़ून तो ख़ून होता है चाहे हिन्दू का हो या मुसलमान का; माँ-बहनों की इज़्ज़त एक-सी होती है चाहे हिन्दू की हों या मुसलमान की।

विभाजन के बाद भी एक लम्बे समय तक स्थितियां सामान्य नहीं हो सकीं। पर फिर सुविख्यात हिंदी साहित्यकार आचार्य चतुरसेन ने साम्प्रदायिक सद्भाव पर एक उपन्यास लिखा - धर्मपुत्र। यह एक असाधारण उपन्यास है जिसे आधार बनाकर बलदेवराज चोपड़ा ने इसी नाम से एक हिंदी फ़िल्म बनाई जिसका निर्देशन यश चोपड़ा ने किया। फ़िल्म १९६१ में प्रदशित हुई। इस कहानी के केन्द्र में एक युवक है जो मुस्लिम माता-पिता की संतान है लेकिन जिसका लालन-पालन एक हिन्दू परिवार ने अपनी संतान की तरह किया है। यह उपन्यास एक कालजयी उपन्यास है और इस पर बनाई गई फ़िल्म भी बहुत अच्छी है। इसी फ़िल्म में साहिर की अमर नज़्म है - ये किसका लहू है ? कौन मरा ?

'धर्मपुत्र' की कहानी भारत की स्वतंत्रता एवं विभाजन से बहुत पहले एक वयोवृद्ध नवाब मुश्ताक़ अहमद के डॉक्टर अमृतराय के क्लीनिक पहुँचने से शुरू होती है। वे डॉक्टर के स्वर्गवासी पिता के मित्र रहे हैं तथा उन्होंने ही डॉक्टर की शिक्षा-दीक्षा का व्यय उठाया था। उनकी समस्या यह है कि उनकी इकलौती और बिना माँ-बाप की पोती हुस्नबानू विवाह के बिना ही गर्भवती हो चुकी है तथा वे उसका विवाह एक अन्य नवाब से तय कर चुके हैं। उस युग में गर्भपात अवैधानिक था। वे प्रस्ताव रखते हैं कि डॉक्टर जो विवाहित तो हैं किन्तु अभी तक संतान से रहित हैं, उनकी पोती के बच्चे को अपना बच्चा घोषित करके हिन्दू रीति-रिवाज़ों से ही पालें। अर्थात् वे बच्चे के धर्मपिता बनें किन्तु समाज की दृष्टि में वह बच्चा उनका और उनकी पत्नी का अपना बच्चा ही कहलाए।

नवाब मुश्ताक़ अहमद डॉक्टर की पत्नी अरुणा से भी बात करते हैं तथा उनके पति के साथ-साथ उन्हें भी इस काम के लिये मना लेते हैं। नवाब के प्रस्ताव में प्रलोभन भी बहुत है क्योंकि वे बहुत-सी सम्पत्ति उस (जन्म लेने वाले) बालक के नाम करने जा रहे हैं। नवाब की योजना के अनुरूप ही बालक का जन्म उनके दिल्ली स्थित निवास से दूर मसूरी में होता है तथा डॉक्टर व अरुणा हुस्नबानू के उस बच्चे को अपना बच्चा बताकर अपने घर ले आते हैं। फिर धूमधाम से उत्सव मनाकर अपने आत्मीय जनों के समक्ष उस बच्चे (लड़के) का नामकरण करते हैं - दिलीप। नवाब अपने वचन के अनुसार बहुत बड़ी जायदाद दिलीप के नाम कर देते हैं। हुस्नबानू का नवाब द्वारा तय किया हुआ विवाह हो जाता है। 

आने वाले वर्षों में डॉक्टर दंपती के अपने तीन बच्चे होते हैं - सुशील और शिशिर नामक पुत्र तथा करुणा नामक पुत्री। बच्चे बड़े होते हैं और अलग-अलग विचारधाराओं में ढलते हैं। दिलीप कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी बनता है तो सुशील साम्यवादी विचारों का समर्थक तो शिशिर कांग्रेसी। तीनों उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। उनकी छोटी और लाड़ली बहन करुणा लेडी हार्डिंग कॉलेज में चिकित्सा की पढ़ाई कर रही है। वह किसी विचारधारा को नहीं मानती, केवल मानवता से ओतप्रोत है। वह दिलीप को चिढ़ाती है - 'भैया, इस हिन्दू धर्म का तो बेड़ा ही ग़र्क़ होगा। और सब एक ओर रहें - केवल स्त्रियों के आँसुओं के समुद्र में ही वह डूब जाएगा'। ये भाईबहन नहीं जानते कि इनमें सबसे बड़ा भाई वस्तुतः मुस्लिम माता-पिता की संतान है।

दिलीप के लिये राय राधाकृष्ण की पुत्री माया का रिश्ता आता है। दिलीप माया को बिना देखे ही यह सोचकर मना कर देता है कि उच्च शिक्षा प्राप्त वह युवती निश्चय ही पश्चिमी संस्कारों में ढली होगी तथा भारतीय संस्कारों से रहित होगी। इसके अतिरिक्त राय साहब को उनकी विदेश-यात्रा के कारण उनके समुदाय ने जाति से बहिष्कृत किया हुआ है (एक सदी पहले बहुत-से हिंदू समाजों में समुद्र-पार जाने को अनुचित मानने एवं जाने वाले को जाति से बाहर कर देने की कुप्रथा थी)। अब डॉक्टर परेशान हो जाते हैं क्योंकि वे तो राय साहब को रिश्ते की स्वीकृति दे चुके हैं। राय साहब स्वयं माया को साथ लेकर डॉक्टर के यहाँ पहुँचते हैं। जब वे दिलीप से बात करते हैं तो दिलीप उन्हें भी इस रिश्ते के लिये मना कर देता है। पर जब माया दिलीप से मिलती है और उसे अपनी माता द्वारा उपहार स्वरूप भेजी गई घड़ी देती है तो स्थिति कुछ और ही हो जाती है।

होता यह है कि दिलीप और माया पर प्रथम दृष्टि का प्रेम वाली कहावत लागू हो जाती है। पहली नज़र में ही वे दोनों एकदूसरे को अपना दिल दे बैठते हैं। पर दिलीप तो रिश्ते के लिये मना कर चुका है। अब ये दोनों क्या करें ? इधर माया के व्यक्तित्व से प्रभावित डॉक्टर एवं अरुणा राय साहब से उसका रिश्ता सुशील के लिये माँगते हैं तो राय साहब तुरंत उत्तर नहीं देते और लौट जाते हैं। वे माया की माता से इस संबंध में बात करते हैं तो वे स्पष्ट इनकार कर देती हैं - 'हमारी बेटी कोई बिक्री का सौदा नहीं है कि एक ग्राहक से सौदा न पटा तो दूसरे से पटा दिया। बड़े भाई को जूता ओछा पड़ा तो छोटे ने पहन लिया'। राय साहब डॉक्टर को इस संबंध में कोई उत्तर नहीं देते तथा सोच लेते हैं कि अब इस परिवार में रिश्ते की बात ही न की जाए। लेकिन जब उन्हें माया के मन की बात पता चलती है तो वे भी परेशान हो जाते हैं।

नौ अगस्त, १९४२ की अलस्सुबह। अगस्त क्रांति की शुरुआत। गांधीजी सहित सभी चोटी के नेता गिरफ़्तार कर लिये जाते हैं। देश भर में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध प्रदर्शन होने लगते हैं। शिशिर प्रदर्शनकारियों के समूह के समक्ष भाषण देता है और गिरफ़्तार हो जाता है। दिलीप वैसे तो कांग्रेस से घृणा करता है और गांधीजी को 'हिन्दू मुल्ला' कहता है लेकिन भाई के प्रेम की पुकार को वह अनसुना नहीं कर पाता। वह भी अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध एक ओजस्वी भाषण देता है। उस सभा पर अंग्रेज़ी पुलिस गोलीबारी करती है और दिलीप भी गिरफ़्तार कर लिया जाता है। 

वह दिन भी आता है जब दोनों भाई रिहा होकर घर लौटते हैं। डॉक्टर दम्पती को अब अपने लड़कों के विवाह की चिंता है। राय साहब के घर में बात न बन पाने के बाद और किसी जगह उनके किसी लड़के के विवाह की बात चली ही न थी। कुछ समय बाद देश का हिंदू-मुस्लिम सद्भाव नष्ट होने लगता है और साम्प्रदायिक दंगे होने लगते हैं। अब हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए अंग्रेज़ शत्रु नहीं रहे हैं। अब वे एकदूसरे के शत्रु बन बैठे हैं। निर्दोषों का ख़ून बहने लगता है, माँ-बहन बहू-बेटियां बेइज़्ज़त होने लगती हैं। स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा देश दंगों की आँच में झुलसने लगता है। गुंडे-बदमाशों की बन आती है और निर्दोषों के लिए जीना मुश्किल होने लगता है।

हुस्नबानू अब विधवा हो चुकी है और अपने दो पुराने नौकरों के साथ अपने दादा के पुराने रंगमहल में आकर रहने लगी है। दंगाइयों की भीड़ रंगमहल में आग लगाने आती है। इस भीड़ का नेतृत्व कर रहा है दिलीप। हुस्नबानू को बचाने अरुणा को साथ लेकर डॉक्टर आते हैं और वे दिलीप पर बंदूक तान देते हैं। हुस्नबानू के मुख से शब्द फूटते हैं - 'दि...ली...प'। 'दिलीप ही है बहिन, देख लो इसे आख़िरी बार, और पहली बार', अरुणा कहती हैं और फिर अपने पति को संकेत करती हैं, 'मार दो गोली'।

फिर क्या होता है ? जानने के लिये पढ़िए उपन्यास।

'धर्मपुत्र' कोई आम उपन्यास नहीं, हिंदी साहित्य की धरोहर है। इस बेहतरीन साहित्यिक कृति पर बलदेवराज चोपड़ा ने फ़िल्म बनाने का साहस किया और 'धर्मपुत्र (१९६१) दर्शकों के समक्ष आई। उस समय तक विभाजन के घाव सूखे नहीं थे। अतः कई स्थानों पर फ़िल्म को विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा और कई सिनेमाघरों से फ़िल्म को उतारना पड़ गया। लेकिन इसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 

फ़िल्म में उपन्यास से थीम ली गई है लेकिन इसकी पटकथा जो कि बी.आर. फ़िल्म्स के कहानी विभाग द्वारा रची गई है, उपन्यास से काफ़ी भिन्न है। बहुत-से परिवर्तन किए गए हैं जिसके कारण फ़िल्म उपन्यास जैसी प्रभावशाली नहीं बन सकी है। फिर भी निश्चय ही यह फ़िल्म देखने लायक है और इसका गीत-संगीत तो बहुत ही अच्छा है। हुस्नबानू की भूमिका में माला सिन्हा, दिलीप की भूमिका में शशि कपूर, डॉक्टर की भूमिका में मनमोहन कृष्ण तथा उनकी पत्नी की भूमिका में निरुपा रॉय ने बेहतरीन अभिनय किया है। साहिर के गीतों पर एन. दत्ता ने सुमधुर संगीत रचा है। फ़िल्म में 'मैं जब भी अकेली होती हूँ', 'आज की रात', 'तुम्हारी आंखें', 'नैना क्यूं भर आये', 'जो ये दिल दीवाना मचल गया', 'ये किसका लहू है, कौन मरा' आदि बेहतरीन गीत हैं। आरंभ में 'सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' भी है। 

'धर्मपुत्र' उपन्यास दो संस्करणों में उपलब्ध है। एक बड़ा संस्करण है, दूसरा संक्षिप्त संस्करण। मैंने दोनों पढ़े हैं। संक्षिप्त संस्करण अपने बड़े (दीर्घ कहानी कहने वाले) संस्करण से बेहतर है क्योंकि इसमें लेखक ने अनेक अनावश्यक प्रसंग (एवं अनावश्यक पात्र) हटा दिए हैं तथा कथ्य को मूल विषय-वस्तु पर ही केन्द्रित रखा है। इससे कथ्य की गति एवं मनोरंजन प्रदान करने की क्षमता बढ़ गई हैं। इस उपन्यास में आचार्यजी ने संस्कृतनिष्ठ हिंदी का प्रयोग न करके बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है। उर्दू के शब्दों की भी इसमें प्रचुरता है। ऐसा करने से कथ्य अधिक प्रभावी बन पड़ा है। 

आचार्यजी ने अनायास ही एकदूसरे से प्रेम कर बैठे दिलीप और माया की रूमानी भावनाओं का कुशलता से चित्रण किया है जो पाठकों के मन को छू लेता है। भाईबहनों का स्नेह भी कथानक में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और स्त्रीपुरुष का पारस्परिक आकर्षण भी। विवाह करने जा रही कन्या के आत्मसम्मान को भी इसमें रेखांकित किया गया है। उपन्यास के विभिन्न पात्रों की बातें तथा विभिन्न विवरण मानवतावादी लेखक आचार्य चतुरसेन के अपने विचारों एवं भावनाओं का ही प्रतिबिम्ब हैं। कुछ पात्रों को छोड़कर आचार्यजी ने कथानक के सभी प्रमुख पात्रों को अपने आप उभरने एवं भलीभांति विकसित होने का अवसर दिया है। एक स्थान पर लेखक के अम्बेडकर-विरोधी होने का संकेत भी मिलता है। विभाजन के समय के साम्प्रदायिक उन्माद में डूबे वातावरण का भी अत्यन्त सजीव चित्रण है।

आज आचार्य चतुरसेन जैसे साहित्यकार उपलब्ध नहीं हैं जो ऐसी असाधारण कृति रचकर पाठक समुदाय को प्रस्तुत करें और न ही बलदेवराज चोपड़ा और यश चोपड़ा जैसे साहसी फ़िल्मकार अब हैं। भारत के वर्तमान राजनीतिक वातावरण में तो ऐसी फ़िल्म बन ही नहीं सकती। कोई बना भी दे तो भारतीय सेंसर बोर्ड उसे पास ही नहीं करेगा। लेकिन उस युग का यह क्लासिक उपन्यास तथा उस युग की यह क्लासिक फ़िल्म अवलोकन हेतु उपलब्ध हैं। उपन्यास तथा फ़िल्म दोनों ही सभी मानवतावादियों को पसंद आएंगे। 

मेरा तो यही मानना है कि इंसानियत ही सबसे पहला धर्म है इंसान का। क्या व्यक्ति को किसी विशिष्ट धर्म का अनुयायी होने के स्थान पर केवल मनुष्य होकर जीने का अधिकार नहीं है ? देश और मानवता को साम्प्रदायिक सद्भाव चाहिए, न कि साम्प्रदायिक विद्वेष। 'धर्मपुत्र' यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित दूसरी ही फ़िल्म है। उनकी पहली निर्देशित फ़िल्म 'धूल का फूल' (१९५९) का एक गीत है - 'तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा; इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा'। मेरी नज़र में तो जो ईश्वर मस्जिद में है, वही मंदिर में है। 'धर्मपुत्र' फ़िल्म का एक गीत (कव्वाली) भी है - 'ये मस्जिद है, वो बुतख़ाना (मंदिर); चाहे ये मानो, चाहे वो मानो'।  

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मंगलवार, 12 मई 2026

नई 'साजन' पसंद है आपको ! पुरानी भी आयेगी !

'साजन' शीर्षक से तीन बार हिंदी फ़िल्में बनी हैं - १९४७ में, १९६९ में और १९९१ में। इनमें से १९९१ में बनी 'साजन' सर्वाधिक सफल रही है जिसमें संजय दत्त, माधुरी दीक्षित तथा सलमान ख़ान ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं। इस फ़िल्म का गीत-संगीत तो आज भी लोकप्रिय है। यह एक सम्पूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली फ़िल्म है जो आज भी यदि पुनः प्रदर्शित हो जाए तो दर्शकों का प्रतिसाद अवश्य ही पायेगी। 

लेकिन इस फ़िल्म के आने से बाईस वर्ष पूर्व अर्थात् १९६९ में 'साजन' शीर्षक से जो फ़िल्म आई थी, वह भी कम मनोरंजक नहीं है। इस 'साजन' के प्रमुख कलाकार हैं मनोज कुमार एवं आशा पारेख। इस फ़िल्म की विशेषता यह है कि अपने प्रथम भाग में तो यह एक रोमांटिक कॉमेडी की तरह मनोरंजन प्रदान करती है जबकि द्वितीय भाग में यह एक हत्या के रहस्य पर केंद्रित हो जाती है तथा अंत तक दर्शकों को बाँधे रखती है।


फ़िल्म आरंभ होती है एक युवती रजनी (आशा पारेख) से जो कि एक नाटक कंपनी में काम करती है। इस संसार में उसका अपनी माँ के अलावा कोई और नहीं है। वह एक दिन एक कार से लिफ़्ट मांगकर अपने कार्यस्थल पर पहुँचती है। उसे पता नहीं है कि यह कार एक बहुत बड़े व्यवसायी अशोक (मनोज कुमार) की है। चूंकि कार्यस्थल पर कुछ लोग इस कार को पहचान लेते हैं, यह अफ़वाह उड़ जाती है कि रजनी का अशोक से प्रेम-संबंध (अफ़ेयर) है। कम्पनी के हित में रजनी भी इसका खण्डन नहीं करती। लेकिन जब यह बात समाचार-पत्रों में छप जाती है तो उसे पढ़कर अशोक रजनी से मिलने पहुँचता है। अब होता यह है कि रजनी से मिलकर वह रजनी के प्रेम में पड़ जाता है। पहले तो वह अपनी वास्तविकता रजनी से छुपाता है लेकिन अंततः रजनी सब कुछ जान ही जाती है। वह भी अशोक से प्रेम करने लगती है। रजनी की माँ और अशोक के पिता इस रिश्ते को स्वीकार कर लेते हैं।

लेकिन अचानक धरमदास नामक एक व्यक्ति जो कि रजनी की माँ से पूर्व-परिचित है, उसे ब्लैकमेल करने लगता है क्योंकि वह जानता है कि रजनी के पिता एक हत्या के आरोप में जेल में बंद हैं। यह आरोप और किसी की नहीं धरमदास की ही हत्या का है जिसका कि वास्तविक नाम शेरू है और जो एक मुजरिम है। धरमदास रजनी की माँ को ये बातें अशोक के पिता को बता देने की धमकी देता है। अब स्थितियां कुछ ऐसी बनती हैं कि रजनी, अशोक और अशोक का वफ़ादार वाहन-चालक बालम (जिसने आरंभ में रजनी को लिफ़्ट दी थी) अलग-अलग समय पर धरमदास से मिलने पहुँचते हैं। अगले दिन सुबह धरमदास मरा पड़ा पाया जाता है। किसी ने उसे गोली मार दी थी। पुलिस की पूछताछ में अशोक, रजनी और बालम तीनों ही इस अपराध को स्वीकार कर लेते हैं। अब पुलिस इस दुविधा में पड़ जाती है कि इनमें से वास्तविक हत्यारा कौन है। सच्चाई का पता फ़िल्म के क्लाईमेक्स में चलता है।

फ़िल्म का प्रथम भाग एक बहुत पुरानी विदेशी फ़िल्म 'हैप्पी गो लवली' (१९५१) से प्रेरित है। यह भाग दर्शकों को गुदगुदाने में पूरी तरह सफल है। इस भाग की कहानी लेकर बासु चटर्जी ने 'पसंद अपनी अपनी' (१९८३) नामक फ़िल्म बनाई थी जिसमें मिथुन चक्रवर्ती तथा रति अग्निहोत्री ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं। इसके अतिरिक्त आमिर ख़ान एवं असिन अभिनीत 'गजनी' (२००८) का प्रारंभिक भाग भी इसी से प्रेरित था। इस भाग में गीत भी हैं तथा नायक-नायिका का रोमांस भी। और कॉमेडी तो है ही। 'साजन' का यह भाग (उस ज़माने की) हिंदी फ़िल्मों के पारम्परिक दर्शकों के लिये है जिन्हें भरपूर मनोरंजन प्राप्त होता है।

'साजन' का आगे का भाग रहस्यकथाएं पसंद करने वालों के लिये है। हत्या का रहस्य बहुत पेचीदा है तथा वास्तविक हत्यारे का अनुमान लगाना दर्शकों के लिये बहुत कठिन है। फ़िल्म का प्रारंभिक भाग जहाँ मंद गति से चलता है, वहीं यह भाग बहुत तीव्र गति से बढ़ता है एवं दर्शकों को सोचने का समय नहीं देता। जब क्लाईमेक्स में अदालत के दृश्य में रहस्य खुलता है, तब ही दर्शक जान पाते हैं कि वास्तविकता क्या थी। यह भाग भी बहुत रोचक है एवं दर्शकों को स्क्रीन के सामने से हटने नहीं देता।

'साजन' एक आदि से अंत तक रोचक फ़िल्म है जिसकी कहानी कहीं पर भी ढीली नहीं पड़ती। प्रथम दृश्य से ही जो मनोरंजक दृश्यों का सिलसिला आरंभ होता है, वह अंत तक चलता रहता है। फ़िल्म के लेखक एवं निर्देशक दोनों ने ही सराहनीय कार्य किया है। फ़िल्म के सभी तकनीकी पक्ष अच्छे हैं। एक पल के लिये भी यह फ़िल्म दर्शक को बोर नहीं करती। मनोज कुमार एवं आशा पारेख सहित सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। अत्यन्त युवा शत्रुघन सिन्हा की यह पहली फ़िल्म है।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने आनंद बक्शी के गीतों पर सुमधुर संगीत दिया है। शीर्षक गीत 'साजन साजन पुकारूं गलियों में' तो बहुत अच्छा है ही, अन्य गीत भी सुरीले एवं मनभावन हैं (यथा 'रेशम की डोरी', 'बाँसुरी तिहारी नंदलाल' आदि)।

कुल मिलाकर यह पुरानी 'साजन' यदि नई 'साजन' के समकक्ष नहीं है तो मनोरंजन प्रदान करने के मामले में उससे पीछे भी नहीं है। यह संगीतमय रोमांटिक फ़िल्में पसंद करने वालों के लिये भी है तो कॉमेडी देखने वालों के लिये भी तथा रहस्य-प्रधान फ़िल्मों के शौकीनों के लिये भी। पारम्परिक हिंदी सिनेमा देखने वाले प्रत्येक वर्ग को यह फ़िल्म पसंद आयेगी, इसमें संदेह नहीं।

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बुधवार, 6 मई 2026

वेद प्रकाश शर्मा और सुभाष चंद्र बोस

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के विभिन्न नायकों (एवं नायिकाओं) में से किसी ने मेरे हृदय पर स्थायी रूप से आधिपत्य जमाया है तो वे हैं नेताजी सुभाष चंद्र बोस। सुभाष बाबू ने अपने जीवन को ऐसे जिया कि आज उसका सिंहावलोकन करने पर एक रूमानियत का अहसास होता है। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने जो कर दिखाया, वह आज एक स्वप्न सरीखा लगता है। वे मेरे प्रेरणा-स्रोत रहे हैं और रहेंगे। उनके प्रशंसकों की संख्या वैसे तो करोड़ों में है लेकिन मैं एक व्यक्ति को निश्चय ही जानता हूँ जिसके मन में सुभाष बाबू का वही स्थान रहा जो मेरे मन में है। वह व्यक्ति है - हिंदी उपन्यासकार स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा।

वेद प्रकाश शर्मा ने यूँ तो भारत के स्वाधीनता संग्राम को आधार बनाकर कई उपन्यास लिखे किंतु वे सुभाष बाबू के व्यक्तित्व की दृढ़ता एवं अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठा से बहुत अधिक प्रभावित रहे और उन्होंने कुछ उपन्यास ऐसे लिखे जिनमें सुभाष बाबू स्वयं एक पात्र के रूप में उपस्थित हैं। प्रमुखतः दो ऐसे कथानक उन्होंने रचे - पहला 'ख़ून दो आज़ादी लो' व 'बिच्छू' नामक दो भागों में विभाजित कथानक तथा दूसरा 'जय हिंद' व 'वंदे मातरम' नामक दो भागों में विभाजित कथानक। पहला कथानक पराधीन भारत में अंग्रेज़ों से लोहा ले रहे क्रांतिकारियों की गतिविधियों का वर्णन करता है जबकि दूसरा कथानक स्वाधीन भारत में सुभाष बाबू के जीवन से प्रेरित भारतीय युवकों के एक विदेशी षड्यंत्र द्वारा गुमराह हो जाने का वर्णन करता है। मैं अपने इस लेख में इन्हीं दोनों कथानकों की जानकारी दे रहा हूँ।

'ख़ून दो आज़ादी लो' व 'बिच्छू': वेद प्रकाश शर्मा ने भारत की स्वतंत्रता हेतु अंग्रेज़ों से जूझने वाले एक क्रांतिकारी दल की गतिविधियों को आधार बनाते हुए 'वतन की कसम' नामक थ्रिलर उपन्यास लिखा था जो अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। उसकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर वेद जी ने उसका सीक्वल लिखने का निर्णय लिया जो कि इन उपन्यासों के रूप में सामने आया। 'वतन की कसम' के अंतिम दृश्य से आरंभ हुए इस कथानक में बताया गया है कि 'वतन की कसम' में जिस क्रांति दल का उल्लेख था, वास्तविक क्रांति दल उससे बहुत अधिक बड़ा है जिसके सरदार की वास्तविकता कोई नहीं जानता है। सरदार नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अपना आदर्श एवं प्रेरणा-स्रोत मानता है तथा समय-समय पर उनसे मार्गदर्शन लेता है। नेताजी उसे मार्गदर्शन देने के अतिरिक्त दल की गतिविधियों में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाते हैं। वह अपनी वास्तविकता केवल नेताजी पर ही प्रकट करता है। 

क्रांति दल की गतिविधियों के साथ-साथ एक समानांतर कहानी गगन, धरा एवं नीला नामक तीन व्यक्तियों की भी चलती है। विद्यार्थी जीवन में वे साथ-साथ पढ़ते थे। नीला एवं धरा सहेलियां थीं। गगन को धरा से प्रेम था जबकि नीला को गगन से। धरा गगन को उसे अपनी बहन स्वीकार करने हेतु मना लेती है और वह नीला से विवाह कर लेता है। अब इन घटनाओं को बारह वर्ष बीत चुके हैं तथा गगन एवं नीला का एक दस वर्षीय पुत्र भी है - टिंकू। गगन के पिता एक उद्योगपति हैं तथा अंग्रेज़ सरकार के पिट्ठू बने हुए हैं जबकि नीला के पिता अंग्रेज़ सरकार के वफ़ादार पुलिस अधिकारी हैं। गगन ने अपने कॉलेज जीवन की सारी बातें (धरा एवं नीला से संबंधित बातों सहित) एक डायरी में लिख रखी हैं जिन्हें वह समय-समय पर पढ़ता रहता है। लंबे समय से उसे धरा की कोई ख़बर नहीं है।

क्रांति दल अंग्रेज़ सरकार के पिट्ठू बने हुए लोगों के पीछे पड़ा रहता है। स्वभावतः वह गगन के पिता के भी पीछे पड़ता है। इधर एक अनजान व्यक्ति जो स्वयं को बिच्छू के नाम से संबोधित करता है, भी गगन के पिता के पीछे पड़ जाता है। गगन स्वयं क्रांति दल में सम्मिलित है। एक दिन अचानक उसकी मुलाक़ात धरा से भी हो जाती है। इधर अंग्रेज़ सरकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस को नज़रबंद कर लेती है तथा वे देश से भागकर विदेश जाने की योजना बनाते हैं जिसमें क्रांति दल का सरदार उन्हें सहयोग देता है। देश से बाहर निकलते समय सरदार के कहने से वे गगन और धरा को भी साथ ले जाते हैं। कथानक के अंत में एक ओर तो गगन एवं धरा सुभाष बाबू के साथ-साथ ही विमान-दुर्घटना में फंसकर (सुभाष बाबू को बचाते हुए) शहीद हो जाते हैं जबकि दूसरी ओर संपूर्ण क्रांति दल अंग्रेज़ों के साथ हुई मुठभेड़ में समाप्त हो जाता है। 

इस कथानक में दर्शाई गई कई बातें विश्वसनीय नहीं हैं लेकिन कथानक अत्यन्त रोचक भी है एवं प्रेरक भी। क्रांति दल का सरदार तथा बिच्छू नामक व्यक्ति वास्तव में कौन हैं, यह उपन्यास के अंत में ही पता लगता है। इस वृहत् कथानक में प्रारम्भ से अंत तक देशप्रेम के साथ-साथ एक रहस्य का वातावरण बना रहता है जो कि पाठक को अंतिम दृश्य तक बांधे रखता है। अंतिम पंक्तियों में भी एक रहस्य का ख़ुलासा होता है जो पाठक को चौंका देता है। उपन्यास में भावनाओं का भी भरपूर सम्प्रेषण है। गगन, धरा एवं नीला के पात्रों के माध्यम से मानवीय संबंधों का बड़ा ही सजीव एवं भावुकतापूर्ण चित्रण किया गया है। कुछ कमियों के बावजूद यह एक श्रेष्ठ उपन्यास है जिसमें मानवीय प्रेम भी है तो देश प्रेम भी, एक्शन भी है तो रहस्य भी और सबसे बढ़कर एक पात्र के रूप में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की उपस्थिति भी जो कि उपन्यास के क्रांति दल के लिये ही नहीं, पाठकों के लिये भी प्रेरणा-स्रोत हैं। वैसे तो 'वतन की कसम' अपने आप में संपूर्ण एवं पृथक् उपन्यास है, फिर भी यदि इस कथानक को पढ़ने से पूर्व 'वतन की कसम' को पढ़ लिया जाए तो इसका अधिक आनंद उठाया जा सकता है। 

'जय हिंद' व 'वंदे मातरम': दो भागों में प्रस्तुत यह कथानक वेद प्रकाश शर्मा की विजय-विकास सीरीज़ के अंतर्गत लिखा गया है। इसमें बताया गया है कि देश के युवकों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रति जो सम्मान की भावना है, उसका लाभ उठाकर एक विदेशी षड्यंत्र भारत को अस्थिर करने हेतु रचा जाता है एवं एक नक़ली सुभाष चंद्र बोस प्रस्तुत कर दिये जाते हैं जो कि एक तथाकथित 'अखंड हिंद फ़ौज' की स्थापना कर रहे हैं। बहुत-से देशभक्त युवक उस कथित नेताजी के प्रभाव में आकर उसके दल से जुड़ जाते हैं जिनमें विकास के पिता रघुनाथ भी हैं।  उपन्यास के घटनाक्रम का स्थान राजनगर नामक एक कल्पित नगर है (विजय-विकास सीरीज़ के उपन्यास प्रायः इसी नगर में घटित होते हैं)। जब भारतीय सीक्रेट सर्विस को इन बातों का पता चलता है तो भारतीय गुप्तचर विजय और विकास इस षड्यंत्र को विफल करके निर्दोष भारतीय युवकों को वास्तविकता से अवगत करवाने की ज़िम्मेदारी लेते हैं। इधर वे अपना काम शुरु करते हैं, उधर नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्वयं विजय के यहाँ पहुँच जाते हैं। अब वे असली सुभाष हैं या नक़ली, यह जानना विजय के लिये ज़रूरी हो जाता है। अंत में वास्तविक नेताजी पुनः परिदृश्य से बाहर हो जाते हैं जबकि नक़ली नेताजी बने बैठे विदेशी एजेंट की योजना को विफल करके उसके चंगुल में फंस गये निर्दोष भारतीय युवकों को उसकी वास्तविकता बताकर उसके षड्यंत्र से बाहर निकाल लिया जाता है। 

दो भागों में फैला हुआ यह कथानक बहुत रोचक है किंतु इसमें थ्रिल ही अधिक है, सस्पेंस नहीं। नेताजी बना बैठा व्यक्ति किसी विदेशी षड्यंत्र का हिस्सा है, यह बात बहुत पहले ही स्पष्ट कर दी जाती है, अतः यह कोई रहस्य उत्पन्न नहीं करती। रहस्य वास्तव में कथानक के प्रथम भाग के अंतिम दृश्य में आता है जबकि विजय स्वयं से मिलने आये नेताजी पर संदेह करता है तथा वे वास्तविक हैं या नहीं, यह जानने के लिये अपना दिमाग़ लगाता है। उपन्यास इस बात को रेखांकित करता है कि सुभाष बाबू के प्रशंसक तथा उनके जीवन से प्रेरणा लेने वाले असंख्य लोग भारत में हैं तथा कोई भी व्यक्ति (अथवा भारत का शत्रु देश) इस तथ्य का अनुचित लाभ उठा सकता है। अपने नाम पर की गई विदेशी साज़िश को नाकाम करने के लिए स्वयं नेताजी भारतीय जासूसों को किस प्रकार सहयोग देते हैं, यह भी बड़े रोचक ढंग से चित्रित किया गया है। कुल मिलाकर कथानक आरंभ से अंत तक पाठक को बाँधे रखने वाला एवं प्रभावी है। यह उपन्यास लेखक की विजय-विकास सीरीज़ के संसार (परिवेश एवं विभिन्न पात्रों) से भी पाठकों का परिचय करवाता है। 

सुभाष बाबू हमारे स्वतंत्रता संग्राम के एक विलक्षण नायक रहे हैं जिन्होंने अपनी अत्यन्त विषम परिस्थितियों में भी अंग्रेज़ सरकार को चकमा देकर देश से निकलने एवं विदेश में आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन करके भारत में शासन कर रही गोरी सरकार को चुनौती देने का ऐसा साहसिक कार्य कर दिखाया जिसके विषय में दूसरा कोई तो सोच तक नहीं सकता। वेद प्रकाश शर्मा ने उनके जीवन को अपने लेखन की प्रेरणा बनाया तथा उन्हीं को एक पात्र के रूप में लेकर रोचक एवं प्रेरक उपन्यास अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किये। ये ऐसे उपन्यास हैं जिन्हें एक बार पढ़ना आरंभ कर देने के उपरांत पूरा पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता। मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि वेद जी द्वारा वर्षों पूर्व रचित ये उपन्यास आज भी यदि कोई पढ़ेगा तो उसे मनोरंजन के साथ-साथ अपने देश के लिये कुछ करने तथा अपने जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा प्राप्त होगी।

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शुक्रवार, 1 मई 2026

विभाजन के पहले और बाद

मेरी ही नहीं, अनेक समालोचकों की राय में भी यशपाल कृत उपन्यास 'झूठा-सच' न केवल हिंदी साहित्य वरन विश्व साहित्य की सर्वोत्कृष्ट कृतियों में से एक है तथा हिंदी भाषा में लिखा गया सर्वश्रेष्ठ यथार्थपरक उपन्यास है। यह उपन्यास केवल मनोरंजन के निमित्त नहीं है वरन भारत की स्वतंत्रता तथा विभाजन के पूर्व की परिस्थितियों एवं उसके उपरांत देश में आये परिवर्तनों को भलीभांति जानने-समझने के लिये भी है।

यह उपन्यास उस ऐतिहासिक कालखंड का एक वास्तविक लेखा-जोखा है क्योंकि इसके लेखक यशपाल चंद्रशेखर आज़ाद द्वारा स्थापित एवं संचालित हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकेशन एसोशियेशन के सदस्य तथा सरदार भगतसिंह के सहयोगी थे। इन क्रांतिकारियों के बलिदान के उपरांत उन्होंने हिंसा का मार्ग छोड़कर स्वयं को साहित्य की सेवा हेतु समर्पित कर दिया। उन्होंने बहुत-सी कथाएं एवं उपन्यास लिखे तथा उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया किन्तु उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना यही है जिसे कोई पुरस्कार नहीं मिला। इस वृहत् उपन्यास में उन्होंने भारत के विभाजन के लिये उत्तरदायी परिस्थितियों, विभाजन के पूर्व एवं उस समय की घटनाओं तथा उसके उपरांत (स्वतंत्र भारत) में राष्ट्रीय चरित्र के पतन का विस्तृत वर्णन किया है।

यह किसी महाकाव्य सरीखी वृहत् कृति दो भागों में विभाजित है - 1. वतन और देश, 2. देश का भविष्य। प्रथम भाग लगभग सन १९४३ ('भारत छोड़ो' आंदोलन के उपरांत) से लेकर १५ अगस्त, १९४७ तक के घटनाक्रम का वर्णन करता है जिसका कि स्थान लाहौर है। द्वितीय भाग १५ अगस्त, १९४७ से आरंभ करके जनवरी १९५७ तक की घटनाओं को दर्शाता है जब देश के दूसरे आम चुनाव के परिणाम घोषित हुए थे। यह पाठकों को एक ओर तो  विभाजन के पूर्व भारत में  (विशेषतः पंजाब में) रह रहे लोगों की मानसिकता से पूरी तरह से परिचित करवाता है, दूसरी ओर विभाजन के पश्चात् भारतीयों के व्यक्तित्व एवं सोच में आये परिवर्तनों की भी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। यह बड़े ही स्वाभाविक ढंग से बताता है कि पराधीन भारत के तथाकथित देशभक्त एवं आदर्शवादी किस प्रकार स्वाधीन भारत में ऐसे बन गये थे कि उन्हें अपने निहित स्वार्थ के आगे और कुछ दिखाई ही नहीं देता था।


'झूठा-सच' की कहानी दो प्रमुख पात्रों के जीवन के साथ-साथ चलती है। ये दो प्रमुख पात्र हैं - जयदेव पुरी एवं तारा जो कि भाईबहन हैं तथा एक शिक्षक की संतानें हैं। लाहौर में रहने वाला यह परिवार निम्न-मध्यमवर्गीय है जिसमें दो भाई हैं - एक तो तारा एवं जयदेव के पिता तथा दूसरे उनके बड़े भाई। कहानी जयदेव के कारागृह से छूटने के उपरांत आरंभ होती है जो कि 'भारत छोड़ो' आंदोलन में भाग लेकर गिरफ़्तार हुआ था। प्रथम दृश्य जयदेव एवं तारा की दादी के देहावसान का है जिसके उपरांत कथानक कुछ इस प्रकार तीव्र गति से भागता है कि पाठक को पीछे मुड़कर देखने का कोई अवसर नहीं देता (लेखक भी बिना पीछे मुड़े लगातार अपनी लेखनी चलाता गया होगा)। तारा एवं जयदेव दोनों ही आदर्शवादी हैं। कहानी शुरु होने के समय तारा किशोरावस्था में है तथा उसे अपने बड़े भाई जयदेव पर गर्व है कि उसने देश की स्वतंत्रता के लिये कारावास सहा। देश की राजनीति तथा समाज में हो रहे परिवर्तनों का प्रभाव इन भाईबहन पर भी पड़ता है। जहाँ तारा को अपने सहपाठी असद से प्रेम हो जाता है, वहीं जयदेव कनक नाम की एक संपन्न परिवार की युवती से प्रेम करने लगता है जिसे वह ट्यूशन पढ़ाने जाया करता है। कनक के पिता लाहौर की एक प्रतिष्ठित राजनीतिक हस्ती हैं। 

तारा का विवाह उसकी इच्छा के विरुद्ध एक आवारा एवं कम पढ़े-लिखे युवक सोमराज से तय कर दिया जाता है। और तब तारा को यह अहसास होता है कि उसका तथाकथित आदर्शवादी भाई वस्तुतः एक पाखंडी है जो न केवल दोहरे मानदंड अपनाता है बल्कि किसी भी अन्य व्यक्ति के लिये या किसी भी सिद्धांत अथवा आदर्श के लिये कोई भी ठोस क़दम उठाने से कतराता है। तारा के विवाह के उपरांत की प्रथम रात्रि को ही उसके ससुराल के घर पर मुस्लिम दंगाइयों का आक्रमण होता है तथा अपनी जान बचाकर भागती तारा को अनेक बुरे अनुभवों से गुज़रना पड़ता है। अंततः वह बचाकर अमृतसर ले आई जाती है। जयदेव रेलगाड़ी में यात्रा करते समय एक दंगाई आक्रमण में फंस जाता है एवं उसकी परिस्थितियां उसे जालंधर ले आती हैं जहाँ संयोग से ही वह कारागार में अपने साथी रहे वरिष्ठ नेता सूद जी से मिलता है। यहाँ प्रथम भाग समाप्त होता है।

द्वितीय भाग में भारतीयों का बलिदानी देशभक्तों से केवल अपने निहित स्वार्थों में रुचि लेने वाले लोगों में रूपांतरण दिखाया गया है। यहाँ आकर भाई और बहन के व्यक्तित्वों का अंतर पूरी तरह स्पष्ट होता है। जयदेव एक छद्म राष्ट्रवादी सिद्ध होता है तथा सूद जी के साथ मिलकर एक भ्रष्ट प्रकाशक एवं व्यवसायी बन जाता है। वह अपने कार्यकलापों से अपने आदर्शों के खोखलेपन को उजागर कर देता है। इस प्रकार वह न केवल अपने माता-पिता बल्कि कनक (जो अब उसकी पत्नी बन चुकी है) की दृष्टि में भी गिर जाता है क्योंकि वे अब उसके पाखंड को जान गये हैं। तारा के विषय में पहले तो सबको यही पता चला था कि जब दंगाइयों ने उसके ससुराल के घर को आग लगा दी थी तो वह जलकर मर गई थी लेकिन बाद में उसके बच जाने की बात (जयदेव सहित) सभी जान जाते हैं। अपने भाई के विपरीत वह अपने आदर्शों पर टिकी रहकर अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए तथा विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों से मिलते हुए अपनी मेहनत, लगन एवं दृढ़ निश्चय से इस स्वार्थी संसार में अपना एक मुकाम बनाने में सफल हो जाती है। वह सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण करके भारत सरकार में अवर सचिव का पद प्राप्त कर लेती है। जीवन में बहुत कुछ देख चुकने के कारण अब वह शीघ्रता में किसी से भी विवाह करने को तैयार नहीं है। तभी उसकी सुखद भेंट डॉक्टर प्राण नाथ से होती है जो लाहौर में उसके शिक्षक थे एवं अब भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार हैं। आयु के अंतर के बावजूद वे विवाह करने का निश्चय करते हैं लेकिन उनके विवाह के उपरांत जयदेव अपनी बहन पर दो बार विवाह करने का आरोप लगा देता है (जो कि एक सिविल सेवक होने के नाते तारा के लिये एक आपराधिक कृत्य है)। उपन्यास के अंत में तारा तथा उसके पति इस आरोप से बरी हो जाते हैं जबकि जयदेव के साझेदार सूद जी दूसरे आम चुनाव में अपनी सीट से हार जाते हैं।

इस मुख्य कथा में अनेक उप-कथाएं जुड़ी हैं एवं अनेक पात्र हैं जो प्रारंभ से लेकर अंत तक पाठकों के समक्ष आते हैं। यह वृहत् उपन्यास किसी प्रबल जलधारा की भांति पाठकों को अपने साथ बहाए ले चलता है। ऐतिहासिक घटनाएं तथा ऐतिहासिक पात्र उपन्यास में ऐसी कुशलता से पिरोए गये हैं कि वे कथानक का ही अभिन्न अंग बन गये हैं। लेखक ने अपने स्वतंत्रता-सेनानी होने के अनुभव का उपन्यास के लेखन में पूरा-पूरा उपयोग किया है। उपन्यास में सांप्रदायिक दंगों एवं हिंदू-मुस्लिम मानसिकता को विस्तार से दर्शाया गया है लेकिन लेखक ने कहीं पर भी किसी भी समुदाय के प्रति पक्षपात नहीं किया है। उसने न तो किसी भी समुदाय का अंधा समर्थन किया है, न ही अंधा विरोध। उसने तथ्यों को जस-का-तस पाठकों के समक्ष रख दिया है। दोनों ही समुदायों के एकदूसरे के प्रति पूर्वाग्रहों को भी उसने ज्यों-का-त्यों दर्शाया है। चाहे प्रमुख पात्र हों या अन्य पात्र, लेखक ने सभी को मनुष्य के रूप में ही दिखाया है जिसमें अच्छाइयां व दुर्बलताएं दोनों ही होती हैं। लेखक यह स्थापित करने में सफल रहा है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी समय और स्थान पर अवस्थित परिस्थितियों का ही उत्पाद होता है और वह उनके अनुरूप ही सोचता एवं व्यवहार करता है। यह उपन्यास भीड़ के व्यवहार को भी स्पष्ट करता है तथा सुशिक्षित व्यक्तियों की सामाजिक-राजनीतिक समझ को भी चाहे वे किसी भी समुदाय के हों।

उपन्यास की भाषा हिंदी है किन्तु इसमें पंजाबी संस्कृति का विशद वर्णन है - विशेषकर इसके प्रथम भाग में। इसीलिए संवादों में अनेक स्थानों पर पंजाबी भाषा का प्रयोग है। कहीं-कहीं शिक्षित पात्रों के संवादों में अंग्रेज़ी का भी प्रयोग है। लेकिन लेखक ने पंजाबी एवं अंग्रेज़ी संवादों के साथ वहीं पर (कोष्ठक में) उनका हिंदी अनुवाद भी दे दिया है। अतः पाठक हेतु उन्हें समझने की कोई कठिनाई नहीं है। उपन्यास के माध्यम से पंजाबी रीति-रिवाज़ों एवं लोक-संगीत का भरपूर परिचय पाठकों को प्राप्त होता है। साथ ही तत्कालीन लाहौर के भूगोल एवं विभिन्न स्थानों की भी सटीक जानकारी मिलती है और पाठक को लगता है मानो उपन्यास के पृष्ठों के माध्यम से वह उस युग के लाहौर का भ्रमण कर रहा है।

यदि आप हमारे देश के उस कठिन समय तथा विभाजन के पूर्व एवं पश्चात् के समयकाल को ठीक से जानना चाहते हैं तो यह काल्पनिक कहानी कहने वाली पुस्तक किसी भी इतिहास की पुस्तक से अधिक उपयोगी हो सकती है क्योंकि यह एक स्वतंत्रता-सेनानी द्वारा अपने भोगे हुए यथार्थ के आधार पर लिखी गई है जिसका दृष्टिकोण पूर्णरूपेण निष्पक्ष एवं वस्तुपरक है। सच पूछिये तो यह एक कालजयी कृति है। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी 'This  is  not  that  dawn' के नाम से प्रकाशित हो चुका है। किसी ऐतिहासिक दस्तावेज़ के समकक्ष होने के बावजूद यह केवल शुष्क इतिहास नहीं है वरन एक मनोरंजक पुस्तक है जिसमें साहित्य के सभी रसों को समाहित करती हुई पूरी तरह से मानवीय कहानी कही गई है।

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सोमवार, 27 अप्रैल 2026

कुछ बातें सीक्वल की

सीक्वल का अर्थ होता है अगली कड़ी। मुख्यतः यह शब्द किसी कहानी के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। कहानी किसी फ़िल्म की भी हो सकती है तथा उपन्यास की भी। यहाँ सीक्वल से आशय यह नहीं है कि किसी कहानी को अपने प्रथम भाग में अधूरा छोड़ दिया जाए तथा उस अधूरे भाग को आगामी कड़ी (या कड़ियों) में पूरा किया जाए। ऐसा पहले तो केवल उपन्यासों के लिए किया जाता था लेकिन अब विगत कुछ वर्षों से फ़िल्में भी इसी भांति बनने लगी हैं जिनमें पहली फ़िल्म में कथा का केवल एक भाग प्रस्तुत किया जाता है जबकि उसका समापन भाग दूसरी फ़िल्म में प्रस्तुत किया जाता है (यह दूसरी फ़िल्म कुछ दिनों या कुछ महीनों के उपरांत प्रदर्शित होती है)। इस लेख में मेरा प्रयोजन उस प्रकार के सीक्वल के बारे में बात करना है जिनमें उसका पूर्व भाग भी अपने आप में सम्पूर्ण होता है तथा उसे देखने के उपरांत दूसरे भाग को देखना अनिवार्य नहीं होता क्योंकि दोनों की कहानियां (कुछ) समान पात्रों को लिए हुए होने के बावजूद स्वतंत्र एवं अपने आप में पूर्ण होती हैं।

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ने ऐसा प्रयोग भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष पर आधारित अपने उपन्यास 'वतन की कसम' में किया था जिसकी पाठक समुदाय में हुई लोकप्रियता के कारण उन्होंने उसका सीक्वल 'ख़ून दो आज़ादी लो' तथा 'बिच्छू' नामक उपन्यासों के रूप में लिखा। इन उपन्यासों में 'वतन की कसम' के अंतिम दृश्य से कहानी को आगे बढ़ाया गया था किंतु 'वतन की कसम' अपने आप में सम्पूर्ण उपन्यास था जबकि सीक्वल के रूप में लिखे गए दो उपन्यासों में उसके कुछ पात्रों को लिए जाने के बावजूद कहानी बिलकुल अलग थी। 

बॉलीवुड फ़िल्मों में ऐसा कई बार किया गया है जब स्थायी पात्र तो सीक्वल में यथावत् रहे किंतु कुछ नए पात्रों के साथ एक नई कहानी दर्शकों के समक्ष रखी गई। देव आनंद की अत्यधिक सफल फ़िल्म 'ज्वेल थीफ़' (१९६७) का सीक्वल एक लंबे अंतराल के उपरांत 'रिटर्न ऑव ज्वेल थीफ़' (१९९६) के रूप में आया किंतु कमज़ोर कथानक एवं निर्देशन के कारण असफल रहा। ऐसा ही फ़िल्म 'हेरा फेरी' (२०००) का सीक्वल 'फिर हेरा फेरी' (२००६) बनाकर किया गया था जिसकी कहानी 'हेरा फेरी' के अंत से आगे बढ़ाई गई थी। वह फ़िल्म भी दर्शकों-समीक्षकों को विशेष प्रभावित नहीं कर सकी। और ऐसा ही अत्यन्त सफल एवं बहु-प्रशंसित फ़िल्म 'रॉक ऑन' (२००८) का सीक्वल 'रॉक ऑन2' (२०१६) बनाकर किया गया जिसमें कुछ प्रमुख पात्रों के साथ कहानी को मूल फ़िल्म के अंत से आगे बढ़ाते हुए एक नई कहानी को परोसा गया पर वह भी मूल फ़िल्म की भांति प्रभावशाली नहीं बन सकी। 

वस्तुतः सीक्वल बनाया तो मूल फ़िल्म की सफलता को भुनाने के लिए जाता है क्योंकि उस फ़िल्म की अच्छी स्मृतियां दर्शकों के मन में होती हैं किंतु किसी भी सीक्वल की सफलता एक सुदृढ़ कथानक, कुशल निर्देशन तथा कलाकारों के अभिनय पर निर्भर करती है। ऊपर मैंने जिन फ़िल्मों का उल्लेख किया उनमें सीक्वल का कथानक, निर्देशन तथा अभिनय पक्ष पिछली फ़िल्म (प्रीक्वल) की भांति प्रभावी नहीं था, इसीलिए सीक्वल दर्शकों का साथ नहीं पा सके। लेकिन जब सीक्वल की कहानी, निर्देशन (चाहे वह प्रीक्वल के निर्देशक द्वारा किया जाए या किसी और के द्वारा),अभिनय एवं तकनीकी पक्ष अच्छे हों तो सीक्वल सफल हो जाता है जैसा कि 'तनु वेड्स मनु' (२०११) के सीक्वल 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' (२०१५) के मामले में हुआ जब सीक्वल भी प्रीक्वल की भांति ही सफल रहा। ऐसा ही 'कोई मिल गया' (२००३) के सीक्वल के रूप में बनाई गई फ़िल्मों - 'कृष' तथा 'कृष3' के मामलों में हुआ जब सीक्वलों ने प्रीक्वल की सफलता को दोहराया। 'दृश्यम' (२०१५) का सीक्वल 'दृश्यम2' (२०२२) भी सफल रहा। सन्नी देओल ने अपनी अत्यन्त सफल (राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित) फ़िल्म 'घायल (१९९०) का सीक्वल 'घायल वंस अगेन (२०१६) स्वयं ही निर्देशित किया और मुँह के बल गिरे लेकिन उनकी सुपरहिट फ़िल्म 'गदर-एक प्रेमकथा' (२००१) का सीक्वल 'गदर2 (२०२३) अपने प्रीक्वल की भांति ही सुपरहिट रहा।

'साहब बीवी और गैंगस्टर' (२०११) के भी दो सीक्वल बनाए गए जिनमें से पहला सीक्वल 'साहब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स' (२०१३) तो चुस्त कथानक एवं कुशल निर्देशन के कारण सफल रहा पर जब उसकी भी अगली कड़ी 'साहब बीवी और गैंगस्टर3' (२०१८) के रूप में बनाकर दर्शकों को परोस दी गई तो वह कमज़ोर कथा के कारण असफल रही। इनकी विशेषता यह है कि प्रमुख पात्रों (साहब तथा बीवी) एवं उनके पारस्परिक संबंधों को समझने के लिए दर्शकों हेतु पहली कड़ी को देखना आवश्यक है अन्यथा किसी भी सीक्वल के कथानक को समझने में समस्या हो सकती  है (यद्यपि सीक्वल अपने आप में संपूर्ण हैं)।

सीक्वल ऐसे भी बने हैं जिनमें कहानी को पिछली फ़िल्म या प्रीक्वल से आगे नहीं बढ़ाया गया है केवल प्रमुख पात्रों को लेकर एक नई कहानी बुनी गई है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' (२००३) का सीक्वल 'लगे रहो मुन्नाभाई (२००६) है जिसमें प्रीक्वल के दो प्रमुख पात्रों (मुन्ना तथा सर्किट) को लेकर एक पूरी तरह से नई कहानी कही गई है। चूंकि कहानी, निर्देशन, अभिनय, तकनीकी पक्ष, संगीत आदि सभी उत्तम रहे; स्वाभाविक रूप से सीक्वल भी अत्यन्त सफल रहा। 'इश्क़िया' (२०१०) की सीक्वल 'डेढ़ इश्क़िया' (२०१४) भी इसी प्रकार बनाई गई थी एवं वह भी सफल रही थी। इसी प्रारूप में 'गोलमाल-फ़न अनलिमिटेड' (२००६) के भी कई सीक्वल बनाए गए जो बॉक्स ऑफ़िस पर चल गए। लेकिन सफल फ़िल्म 'स्टाइल' (२००१) का सीक्वल 'एक्सक्यूज़ मी' (२००३) सफल नहीं रहा।

सीक्वल को फ़्रेंचाइज़ फ़िल्मों से अलग करके देखा जाना चाहिए। विदेशों की नक़ल करते हुए बॉलीवुड के भट्ट कैम्प ने अपनी 'राज़' (२००२) तथा 'मर्डर' (२००४) जैसी फ़िल्मों के नामों में 2, 3 आदि लगाकर बिलकुल भिन्न फ़िल्में बनाईं जिनमें मूल फ़िल्मों के पात्र तक नहीं थे एवं तथाकथित अगली कड़ियों का मूल फ़िल्म से किसी भी तरह का कोई लेनादेना नहीं था। लेकिन दर्शकों को मूल फ़िल्म का नाम काम में लेकर भ्रमित करने में फ़िल्मकार सफल नहीं रहे एवं वे फ़िल्में (जो कि सीक्वल न होकर फ़्रेंचाइज़ फ़िल्में थीं) दर्शकों द्वारा नकार दी गईं।

एक विशिष्ट सीक्वल की बात मैं विशेष रूप से करना चाहूंगा। प्रतिष्ठित राजश्री बैनर ने अपनी अत्यधिक सफल एवं लोकप्रिय फ़िल्म 'अँखियों के झरोखों से' (१९७८) का सीक्वल 'जाना पहचाना' (२०११) के रूप में बनाया। जब मैंने वह फ़िल्म देखी तो मैं यह देखकर दंग रह गया कि सीक्वल में कम-से-कम आधा हिस्सा प्रीक्वल के दृश्यों से भरा हुआ है। चूंकि दोनों ही फ़िल्में एक ही निर्माता की हैं, अतः ऐसा करने में कृतिस्वाम्य (कॉपीराइट) की तो समस्या नहीं थी किंतु फ़िल्म पसंद आने पर भी मैंने यह महसूस किया कि जब सीक्वल में आधा हिस्सा प्रीक्वल का ही है तो सीक्वल देखने से बेहतर क्या प्रीक्वल को ही पुनः देख लेना नहीं होता ? शायद ऐसा ही दर्शक समुदाय ने महसूस किया होगा जिसके कारण फ़िल्म सफल नहीं रही (समीक्षकों ने भी इसकी आलोचना ही की)।

बॉलीवुड में अब सीक्वल किसी भेड़चाल की तरह हो गया है। जब भी कोई फ़िल्म सफल हो जाती है, उसके नाम में 2 लगाकर उसके सीक्वल की घोषणा कर दी जाती है। ऐसे फ़िल्मकार यह मानने को तैयार नहीं होते कि आज का दर्शक मूढ़ नहीं है। वह अच्छी तरह समझता है कि सीक्वल वस्तुतः क्या होता है। वह उसी फ़िल्म को अपेक्षित प्रतिसाद देता है जो कि अच्छी कहानी के साथ अच्छे ढंग से बनाई गई हो, फिर चाहे वह सीक्वल हो या नहीं।

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सोमवार, 13 अप्रैल 2026

यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग

आशा भोसले नहीं रहीं। आशा ताई के नाम से मशहूर महान गायिका अपने करोड़ों प्रशंसकों से विदा लेकर दिगंत में विलीन हो गई। अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की ही भांति वे भी दीर्घायु हुईं। लेकिन सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ने से पूर्व उन्होंने अपने जीवन में जो संघर्ष किया, वह उनकी अग्रजा के संघर्ष से भी अधिक रहा। अपने पिता के निधन के उपरांत चारों बहनें (लता, आशा, उषा और मीना) तथा एक भाई (हृदयनाथ) बम्बई (मुम्बई) की फ़िल्मी दुनिया में अपना एक मुकाम बनाने के लिए उतर पड़े। लता को १९४९ में बीस वर्ष की आयु में ही 'महल' तथा 'बरसात' जैसी फ़िल्मों से जो सफलता मिली, उसके उपरांत उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लेकिन आशा के जीवन में वैसी सफलता को आने में एक लंबा समय लगा। इसके अतिरिक्त आशा ने अल्पायु में ही विवाह कर लिया तथा अल्पायु में ही वे माता भी बन गईं। अपने वैवाहिक जीवन में आशा ने दुख-ही-दुख सहे तथा एक दिन उन्हें अपने तीन बच्चों के दायित्व के साथ अकेले ही जीवन-समर में उतरना पड़ा। लता तो तब तक सफलता की चोटी पर जा बैठी थीं। अब हाल यह था कि एक तो आशा का स्वर लता से मिलता-जुलता था, दूसरी ओर जहाँ लता को नायिकाओं वाले गीत गाने के लिए मिलते थे, वहीं आशा को प्रायः नृत्यांगनाओं वाले गीत ही मिलते थे। उन्हें पारिश्रमिक भी लता से बहुत कम मिलता था जबकि उनके ऊपर अपनी तीन संतानों के भरण-पोषण का दायित्व था। लेकिन आशा ने हिम्मत नहीं हारी।

उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि वे अपनी बड़ी बहन की परछाईं से निकलकर ही रहेंगी। उन्होंने प्रयास करके अपने स्वर को लता के स्वर से भिन्न बनाया तथा जो भी गीत मिले, उन्हें गाते हुए अपने समय की प्रतीक्षा करती रहीं। विवाह-विच्छेद हो चुकने पर भी उन्होंने अपने प्रथम पति के उपनाम 'भोसले' को जीवन भर अपने नाम के साथ जोड़े रखा। वे 'आशा मंगेशकर' नहीं, 'आशा भोसले' ही बनी रहीं। धीरे-धीरे उनकी अपनी पहचान बनी जो कि लता से पूर्णरूपेण भिन्न थी। 

संगीतकार ओ.पी.नैय्यर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना तथा उन्हें बहुत-से ऐसे गीत गाने को दिए जो कि अत्यंत लोकप्रिय हुए (ओ.पी.नैय्यर ने लता से कभी कोई गीत नहीं गवाया)। आगे चलकर पश्चिमी संगीत से प्रभावित राहुल देव बर्मन ने भी उनसे कुछ ऐसे गीत गवाए जो कि उनके अलावा शायद कोई गायिका नहीं गा सकती थी। अपनी समकालीन गायिकाओं में वे विलक्षण रहीं। जो मस्ती,  जो पुलक आशा जी के स्वर में थी; वो किसी और के स्वर में नहीं थी। आज ढेरों ऐसे गीत हैं जो उन्हीं के नाम से पहचाने जाते हैं। अपनी विलक्षणता को पहचान कर उन्होंने कालांतर में पॉप गीत भी गाए तथा अपने ही पुराने गीतों के रीमिक्स भी निकाले। वैजयंतीमाला पर फ़िल्माए गए 'नया दौर' (१९५७) के यादगार गीत 'उड़ें जब-जब ज़ुल्फ़ें तेरी' से लेकर करिश्मा कपूर पर फ़िल्माए गए 'दिल तो पागल है' (१९९७) के गीत 'ले गई ले गई' तक आशा जी के स्वर का यौवन जस-का-तस बना रहा। अपने जीवन में सदा साहसिक निर्णय लेने वाली आशा जी ने नानी तक बन चुकने के उपरांत राहुल देव बर्मन से विवाह करके अपने साहस का फिर परिचय दिया।

उनके स्वर में शायरी को जादुई बना देने का जो गुण था, उसे संगीतकार ख़य्याम ने पहचानकर फ़िल्म 'उमराव जान' (१९८१) में रेखा पर फ़िल्माई गई ग़ज़लें उनसे गवाईं और उन ग़ज़लों ने इतिहास बना दिया। 'दिल चीज़ क्या है', 'इन आँखों की मस्ती के', 'ये क्या जगह है दोस्तों' और 'जुस्तजू जिसकी थी' जैसी ग़ज़लें आशा जी की दिलकश आवाज़ में अमर हो गईं।

लेकिन मैंने आशा जी की आवाज़ में ग़ज़लों और नज़्मों के जादू को सही मायनों में उनके ग़ज़ल एलबम 'मेराज-ए-ग़ज़ल' में महसूस किया। यह ग़ज़ल एलबम उन्होंने ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली के साथ मिलकर निकाला था। दो भागों में प्रस्तुत इस एलबम में एक भी ऐसा गीत या ग़ज़ल नहीं है जिसमें आशा जी का स्वर न हो। उनकी आवाज़ एकल में भी है और युगल में भी। मेराज-ए-ग़ज़ल का अर्थ है - ग़ज़ल का उत्कर्ष।

१९८३ में मूल रूप से कैसेट के रूप में निकले इस एलबम के पहले भाग की 'ए' साइड में 'रूदाद-ए-मोहब्बत क्या कहिए', 'दयार-ए-दिल की रात में' तथा 'यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग' हैं। इनमें से आशा जी की ग़ज़ल 'यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग' मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल है जिसमें उर्दू शायरी अपने पूरे जलाल पर है। 'बी' साइड में 'गए दिनों का सुराग लेकर', 'हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहां तक आ गए (आशा जी की एक बेहतरीन ग़ज़ल) तथा 'रात जो तूने दीप बुझाए (आशा जी की एक बेहतरीन नज़्म) हैं।

इस एलबम के दूसरे भाग की 'ए' साइड में 'फिर सावन रुत की पवन चली', 'दर्द जब तेरी अता है तो गिला किससे करें (आशा जी की दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल) और 'करूं न याद मगर किस तरह भुलाऊं उसे' (आशा जी की बेहतरीन ग़ज़ल) हैं। 'बी' साइड में आशा जी के दो बेहतरीन गीत हैं - पहले नम्बर पर 'सलोना-सा सजन है' और तीसरे नम्बर पर 'नैना तोसे लागे' जबकि इनके बीच में दोनों कलाकारों द्वारा गाई हुई ग़ज़ल है - 'दिल धड़कने का सबब याद आया'।

'मेराज-ए-ग़ज़ल' आशा जी के प्रशंसकों के लिए किसी अनमोल उपहार से कम नहीं। यह संगीत-प्रेमियों के लिए भी है तथा शायरी के रसिकों के लिए भी। आशा जी को उनके गीतों, ग़ज़लों, नज़्मों आदि ने अमरत्व प्रदान कर दिया है। वे हमारे दिलों में हमेशा रहेंगी।

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