सोमवार, 2 अगस्त 2021

उन्हें भी जीने का हक़ है

अपने लेख 'मैं शाकाहारी क्यों हूँ' में मैंने कहा है कि जीवन का जितना अधिकार मनुष्यों को है, अन्य प्राणियों को किसी भी प्रकार उससे कम नहीं है। और क्यों हो कम ? जिस प्रकृति, जिस सबसे बड़ी शक्ति ने संपूर्ण सृष्टि को बनाया है, मानवों को बनाया है; उसी ने अन्य प्राणियों को भी बनाया है। जीवन लेने का अधिकार उसी को है जो जीवन दे सकता है। जब हम किसी को ज़िन्दगी दे नहीं सकते तो अपने स्वार्थ के लिए किसी की ज़िन्दगी लेने का भी हमें कोई हक़ नहीं है। क्या इंसान को दिमाग़ इसलिए मिला है कि वह निरीह जानवरों को ग़ुलाम बनाकर उन पर ज़ुल्म करता रहे और जब अपनी सहूलियत नज़र आए, उनकी जान ले ले ? हरगिज़ नहीं ! लेकिन इंसान की इसी ख़ुदगर्ज़ी ने आज समूची क़ायनात के लिए ख़तरा पैदा कर दिया है, इसी ख़ुदगर्ज़ी ने कुदरत को वक़्त-वक़्त पर अपना क़हर ढाने पर मजबूर कर दिया है, यह याद दिलाने पर मजबूर कर दिया है कि दुनिया आख़िरकार फ़ानी ही है। न जाने कब इंसान की आँखें खुलेंगी, कब वह अपनी ख़ुदगर्ज़ी से निजात पाएगा, कब वह समझेगा कि कुदरत के तवाज़न को बिगाड़कर और मासूम जानवरों का क़त्ल करके वह अपनी ही कब्र खोद रहा है ? कम-से-कम हमारे मुल्क के बेहिस और बेईमान निज़ाम में तो ज़्यादातर लोग आँखों वाले अंधे ही साबित हो रहे हैं। वन-सम्पदा, वन्य जीवन तथा वन्य प्राणियों के संरक्षण की बातें ही होती हैं, वास्तविक धरातल पर तो इसके विपरीत ही होता है। 

बॉलीवुड में इस विषय पर 'माँ' (१९७६), सफ़ेद हाथी (१९७) 'हबारी' (१९७) तथा 'सफ़ारी' (१९) जैसी कई अच्छी एवं सार्थक फ़िल्में बनीं हैं। दक्षिण भारत के निर्माता-निर्देशक एम.एम.ए. चिन्नप्पा देवर तो ऐसे पशु-प्रेमी थे कि प्रायः पशुओं से संबंधित कथाओं पर ही फ़िल्में बनाया करते थे (राजेश खन्ना अभिनीत सुपर हिट फ़िल्म 'हाथी मेरे साथी' उन्हीं का सृजन थी)। लेकिन आज सरकारी पाखंड का हाल यह है कि क़त्लख़ाने तो बेरोकटोक चल रहे हैं लेकिन मदारियों और सर्कस चलाने वालों की रोज़ी-रोटी बंद हो गई है, असली जानवरों को लेकर फ़िल्में नहीं बनाई जा सकतीं (यह काम कम्प्यूटर ग्राफ़िक्स से करना पड़ता है) और फ़िल्म में किसी जानवर को दिखाया जाए तो शुरु में बताना पड़ता है कि फ़िल्म बनाते समय किसी जानवर को नुकसान नहीं पहुँचाया गया था (वैसे चाहे अनगिनत जानवर रोज़ मार डाले जाते हैं पर उसकी छूट है)। बाघ संरक्षण की सरकारी परियोजना पर अब तक करोड़ों फूंके जा चुके हैं लेकिन देश में बाघों की संख्या घटती ही जा रही है। कैसे न घटे जब भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से पेशेवर शिकारी कानून से डरे बिना उन्हें मारते जा रहे हों ? इस विषय पर एक सार्थक फ़िल्म की प्रतीक्षा दीर्घकाल से थी। अमेज़न प्राइम प्लेटफ़ॉर्म पर प्रदर्शित हिन्दी फ़िल्म 'शेरनी' ने इस आवश्यकता को पूरा किया है। इसके निर्देशक हैं अमित मसुरकर तथा इसमें प्रमुख भूमिका निभाई है विद्या बालन ने।

'शेरनी' वस्तुतः एक शेरनी अथवा मादा बाघ की ही फ़िल्म है जिसके लिए कहा जा रहा है कि वह नरभक्षी (आदमख़ोर) बन गई है। वन विभाग के अभिलेखों में इस बाघिन का नाम है - 'टी-12'  सरकारी वन विभाग अपने ढर्रे से कार्य कर रहा है जबकि निकट के ग्रामवासी आये दिन हो रही मृत्युओं से त्रस्त हैं। सरकारी महकमा ग़रीब गाँव वालों को गाहे-ब-गाहे अपने जानवरों को चराने के लिए उस इलाके में आने से मना कर देता है जो उनके लिए एक दूसरी ही दुश्वारी है क्योंकि वे उन्हें चराने के लिए और कहाँ जाएं ? यह सब दो स्थानीय प्रतिद्वंद्वी राजनेताओं के लिए चुनाव में भुनाने का भी विषय बन गया है। ऐसे में एक संवेदनशील स्त्री मंडलीय वन अधिकारी (DFO) के पद पर वहाँ पहुँचती है तथा सभी परिस्थितियों को निष्ठापूर्वक समझती है। वह स्वयं अपने विभाग द्वारा प्रताड़ित है एवं प्रेम-विवाह करने पर भी पारिवारिक सुख से वंचित है क्योंकि नौकरी करने के निमित्त वह अपने पति से दूर रहती है। नौकरी छोड़ना चाहती है पर पति ही नहीं छोड़ने देता क्योंकि उसका वेतन ही परिवार की आय का मुख्य स्रोत है (पति ठीक से नहीं कमा रहा)। अपने कार्यशील एवं निजी जीवन में नितांत एकाकी यह महिला भी उस शेरनी की ही भांति है जिसे स्वार्थी राजनेताओं से लेकर चापलूस एवं भ्रष्ट सरकारी अधिकारी तथा एक संवेदनहीन शिकारी तक सभी मार डालना चाहते हैं। एक स्थानीय ग्राम पंचायत समिति की सदस्या तथा उस क्षेत्र के वन संबंधी मामलों का विशेषज्ञ एक जीव-विज्ञान का प्राध्यापक वस्तुस्थिति को भलीभांति समझते हैं एवं इस नई वन अधिकारी की सहायता करते हैं। सब कुछ समझ-बूझकर यह संवेदना से ओतप्रोत कर्तव्यनिष्ठ महिला न केवल ग्रामवासियों की समस्याओं को सुलझाने का वरन उस शेरनी एवं उसके दो नन्हे शावकों की प्राण-रक्षा का भी संकल्प लेती है। क्या वह सफल हो पाती है ? इस प्रश्न का उत्तर फ़िल्म के अंत में ही मिलता है।
'शेरनी' फ़िल्म में वास्तविक शेरनी अथवा बाघिन को केवल एक ही दृश्य में दिखाया गया है। पर इस फ़िल्म की नायिका भी वस्तुतः एक शेरनी ही है। लेकिन व्यवस्था में जब चहुँओर सभी स्तरों पर स्वार्थी लोग बैठे हों जो अपनी-अपनी रोटियां सेकने के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हों तो चाहे कोई सद्गुणी एवं कर्तव्यपरायण मनुष्य हो अथवा कोई निर्दोष पशु; कहाँ तक संघर्ष करे, कहाँ तक लड़े ? हमारे देश में अधिकतर स्थानों पर व्यवस्था का हाल यही है कि उच्च पदों पर स्वार्थी एवं संवेदनहीन व्यक्ति ही बैठे होते हैं। उचित मानसिकता वाले, योग्य, परिश्रमी, कर्तव्यनिष्ठ एवं संवेदनशील व्यक्ति (यदि वे चापलूसी एवं सेटिंग करने में निपुण न हों तो) उच्च पदों पर पहुँच ही नहीं पाते। उनकी पदोन्नतियां पहले ही रोक दी जाती हैं तथा वे अपने से कम योग्य (कभी-कभी तो सर्वथा अयोग्य) व्यक्तियों के अधीन कार्य करने पर विवश कर दिए जाते हैं। चूंकि उनके अधिकार सीमित होते हैं, अनेक बार वे चाहकर भी उचित कार्य नहीं कर पाते। व्यवस्था उनके हाथ बाँध देती है, उन्हें बेड़ियों में जकड़ देती है। चापलूसों एवं स्वार्थियों की भीड़ में उनकी बात नक़्क़ारख़ाने में तूती की आवाज़ ही साबित होती है। फिर सरकारी नौकरी हो तो उन्हें रास्ते से हटाने का बहुत ही आसान तरीका हमेशा मौजूद होता है - तबादला। 
लेखिका आस्था टिक्कू की यथार्थपरक एवं संवेदनशील कथा को दिग्दर्शक अमित मसुरकर ने बहुत ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। फ़िल्म वन्य जीवन के संरक्षण के संदर्भ में दोनों आयाम प्रस्तुत करती है - यथार्थ अर्थात् जो विद्यमान है एवं आदर्श अर्थात् जो होना चाहिए। प्रमुख भूमिका के लिए विद्या बालन का चयन फ़िल्म के निर्माताओं का सर्वोत्तम निर्णय था क्योंकि विद्या ने प्रमुख पात्र को पटल पर जीवंत कर दिया है। स्वर्गीय संजीव कुमार के देहावसान के उपरांत विद्या ही मुझे एक ऐसी कलाकार लगती हैं जो प्रत्येक भूमिका हेतु उपयुक्त हैं। वे कच्ची मिट्टी के लौंदे की तरह हैं जो हर साँचे में ढल जाता है। अन्य सभी कलाकारों ने भी अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा-पूरा न्याय किया है। मैंने विजय राज़ को प्रथम बार एक गंभीर भूमिका में (एक संवेदनशील प्राध्यापक एवं वन-विज्ञानी के रूप में) देखा। उनके साथ-साथ स्थानीय पंचायत समिति की सदस्या (जो कि एक आदिवासी महिला है) के रूप में सम्पा मंडल का कार्य भी उल्लेखनीय है। संगीत भी अच्छा है एवं फ़िल्म में रखे गए गीत उसकी कथा के अनुरूप ही हैं। सभी तकनीकी पक्ष अत्यंत उच्च कोटि की गुणवत्ता वाले हैं एवं संबंधित लोग भूरि-भूरि प्रशंसा के अधिकारी हैं। इस फ़िल्म को बनाने हेतु इसके निर्माता (टी सीरीज़) भी साधुवाद के पात्र हैं क्योंकि यह फ़िल्म मनोरंजन के निमित्त है ही नहीं। इसका एक-एक दृश्य सच्चाई और सिर्फ़ सच्चाई को उजागर करता है। 

पर्यावरण तथा वन्य जीवन का संरक्षण भाषणों एवं पाखंड से सम्भव ही नहीं है। यह केवल तभी सम्भव है जब इस कार्य से जुड़े व्यक्तियों, विभागों एवं संस्थाओं की नीयत में सत्य उपस्थित हो। कहा कुछ और जाए, किया कुछ और जाए; ऐसे पाखंड के चलते पर्यावरण, पारिस्थितिकीय संतुलन, वन-सम्पदा, वन्य जीवन, पशु-पक्षी आदि सभी उसी प्रकार विनाश की दिशा में अग्रसर होते जाएंगे जिस प्रकार विगत अनेक दशकों से हो रहे हैं। जहाँ तक जीव-जंतुओं का सवाल है, मैं एक बार फिर दोहराता हूँ, उन्हें सिर्फ़ तभी मारा जाना चाहिए जब ऐसा करना अपनी जान बचाने के लिए ज़रूरी हो जाए। अपनी ख़ुदगर्ज़ी के लिए उनकी जान लेना एक ऐसा गुनाह है जिसके लिए कोई माफ़ी नहीं हो सकती। उन्हें भी जीने का हक़ है, सिर्फ़ हमें नहीं। 

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मंगलवार, 27 जुलाई 2021

सुर बिन तान नहीं, गुरु बिन ज्ञान नहीं

तीन दिवस पूर्व चौबीस जुलाई को इस वर्ष की गुरु पूर्णिमा आकर गई। भारतीय परंपरा में  न केवल गुरु को माता-पिता के समकक्ष माना गया है वरन उसे देवों से कम नहीं समझा गया है । बृहदारण्यक उपनिषद में श्लोक है :

                                              गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः

                                              गुरुः साक्षात्‌ परंब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 

प्राचीन भारत में विद्यमान बड़े पवित्र गुरु-शिष्य संबंधों के विषय में हमें उपलब्ध ग्रंथों एवं प्रचलित व बहुश्रुत कथाओं के माध्यम से जानने को मिलता है । यह वह युग था जब शिष्य अपने घर-परिवार से दूर गुरुकुल में गुरु के साथ ही रहते हुए गुरु तथा गुरुपत्नी की सेवा करते हुए शिक्षा एवं संस्कार दोनों ही प्राप्त करता था । गुरु का उद्देश्य केवल औपचारिक शिक्षा देना ही नहींआदर्श नागरिकों के रूप में आदर्श समाज की नींव रखना भी होता था । न गुरु धन-लोभी होता था शिष्य मात्र नौकरी का आकांक्षी ।

अब न वे गुरु रहे, न वे शिष्य और न वह युग । ज़माना बदल गया है । अब गुरु का स्थान वेतनभोगी अथवा ट्यूशन (अथवा कोचिंग कक्षाओं) से कमाने वाले अध्यापक ले चुके हैं  एवं शिष्य नौकरी के लिए आवश्यक अर्हता पाने के लिए जो ज्ञान चाहिए, उसे अध्यापक को (अथवा संबंधित संस्थान को) शुल्क देकर प्राप्त करते हैं । संस्कार व चरित्र पुस्तकीय बातें बनकर रह गए हैं जिनकी आवश्यकता किसी को नहीं है - न पढ़ने वालों को,  पढ़ाने वालों को, न शिष्यों के परिजनों को, न समाज को, न सरकार को । 

तिस पर भी अच्छे तथा निष्ठावान शिक्षकों को अपने विद्यार्थियों का आदर-मान प्राप्त होता ही है । मैं श्री सुरेन्द्र कुमार मिश्र को सदैव स्मरण रखता हूँ जिन्होंने मुझे अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान दिया तथा इस प्रतिस्पर्द्धी संसार के योग्य बनाया । मैं पंडित नारदानंद जी को भी सदा अपनी स्मृतियों में रखता हूँ जिन्होंने मुझे संगीत के संसार से सदा के लिए संयुक्त कर दिया । आज ये महान व्यक्ति दिवंगत हो चुके हैं लेकिन मेरे तथा मेरे जैसे अनेक शिष्यों के हृदय में वे सदैव ज्योति बनकर जलते रहेंगे, उन्हें प्रकाशित करते रहेंगे । मेरी धर्मपत्नी सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने से पूर्व सतरह वर्षों से अधिक समय तक (ग्रामीण क्षेत्र में) शिक्षिका रहीं तथा अपने निष्ठापूर्ण अध्यापन का फल उन्हें अनेक बालक-बालिकाओं तथा उनके अभिभावकों से जीवन भर के सम्मान  के रूप में मिला है । 

हिंदी फ़िल्मों ने गुरु-शिष्य संबंध की महत्ता को भलीभांति पहचाना तथा इस विषय पर बहुत-सी फ़िल्में बॉलीवुड में बनाई गईं विशेषतः स्वातंत्र्योत्तर सिनेमा में । मैं जागृति (१९५४), परिचय (१९७२), पायल की झंकार (१९८०) तथा तारे ज़मीन पर (२००७) को महान फ़िल्मों की श्रेणी में रखता हूँ । इनमें से 'परिचय' एक खंडित परिवार के बालकों को बिना शारीरिक दंड के अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले अल्पकालिक शिक्षक की प्रेरक गाथा है जो दर्शक को एक अच्छी अनुभूति देकर समाप्त होती है । श्वेत-श्याम फ़िल्म 'जागृति' तथा इक्कीसवीं सदी की फ़िल्म 'तारे ज़मीन पर' ऐसी मार्मिक फ़िल्में रही हैं जिन्होंने मुझे अश्रु बहाने पर विवश कर दिया ।  

पायल की झंकार (१९८०) सबसे अलग पहचान रखती है क्योंकि यह वास्तव में ही हमारे देश की महान गुरु-शिष्य परंपरा को आधुनिक युग में प्रस्तुत करती है । इसमें आदर्शवादी नृत्य-गुरु भी हैं तो आदर्शवादी, सेवाभावी, संवेदनशील तथा नृत्य-कला के प्रति समर्पित शिष्या भी । शिष्या जो एक नन्ही बालिका ही है, वयोवृद्ध गुरु के घर में उनके परिवार की एक सदस्या ही बनकर रहती है तथा उनसे नृत्य कला का ज्ञान प्राप्त करती है । मुझे यह फ़िल्म इतनी पसंद आई कि मैंने इसकी समीक्षा हिंदी तथा अंग्रेज़ी, दोनों ही भाषाओं में लिखी । 

गुरु-शिष्य संबंधों के विविध आयाम - नर्तकी (१९६३), बूंद जो बन गई मोती (१९६७)आँसू बन गए फूल (१९६९), अंजान राहें (१९७४), इम्तिहान (१९७४), बुलंदी (१९८१), हिप हिप हुर्रे (१९८४), सर (१९९३), सुर (२००२), से सलाम इंडिया (२००७)गुड बॉय बैड बॉय (२००७)आरक्षण (२०११) आदि हिंदी फ़िल्मों में देखने को मिले । इनमें से कुछ फ़िल्में औसत गुणवत्ता की रहीं तो कुछ अपनी विषय-वस्तु के साथ ठीक से न्याय नहीं कर पाईं । फिर भी एक तवायफ़ का जीवन संवारने वाले शिक्षक की कथा - 'नर्तकी', स्वर्गीय वी. शांताराम द्वारा प्रस्तुत एक आदर्शवादी शिक्षक की कथा - 'बूंद जो बन गई मोती', भटके विद्यार्थी को मार्गदर्शन देकर स्वयं ही पथभ्रष्ट हो जाने वाले शिक्षक की कथा - 'आँसू बन गए फूल' तथा अनुशासनहीन विद्यार्थियों को अनुशासित होकर जीतना सिखाने वाले खेल-शिक्षक की कथा - 'हिप हिप हुर्रे' निश्चय ही अच्छी फ़िल्में मानी जा सकती हैं । अपेक्षाकृत नवीन फ़िल्म (२०१८ में प्रदर्शित)  'हिचकीभी गुरु-शिष्य संबंधों पर अपने समग्र रूप में एक अच्छी फ़िल्म कही जा सकती है । 

'अंजान राहें' युवा होते विद्यार्थियों की अनकही समस्या जैसे एक अछूते विषय पर बनाई गई फ़िल्म थी जिसे उस ज़माने में हटकर माना जा सकता था लेकिन अच्छे विषय के बावजूद वह फ़िल्म एक बेहतर फ़िल्म बनते-बनते रह गई । 'हिप हिप हुर्रे' जैसी अच्छी फ़िल्म बनाकर अपना निर्देशकीय करियर आरंभ करने वाले प्रकाश झा 'आरक्षण' बनाते समय अपनी ही राजनीतिक उलझन के मकड़जाल में फँसकर फ़िल्म का कबाड़ा कर बैठे । 'सुर' का विषय अलग हटकर था जिसमें शिक्षक (या गुरु कह लें) कोई आदर्शवादी व्यक्ति न होकर इक्कीसवीं सदी का दुनियादार आदमी था जबकि शिष्या गुरु से अधिक प्रतिभाशाली होने के साथ-साथ आदर्शवादी एवं गुरु पर श्रद्धा रखने वाली थी; पर निर्देशिका तनूजा चंद्रा संभवतः स्वयं ही इस जटिल विषय को ठीक से समझ नहीं सकीं और दर्शकों के समक्ष उन्होंने एक अधकचरी फ़िल्म परोस दी । 

'इम्तिहान' स्वर्गीय विनोद खन्ना अभिनीत एक ऐसी फ़िल्म है जो फ़ॉर्मूलाबद्ध होकर भी प्रभावित करती है । इसका कालजयी गीत 'रुक जाना नहीं तू कहीं हार के' विगत कई दशकों से इस लेख के लेखक सहित असंख्य दर्शकों एवं श्रोताओं को प्रेरणा देता आ रहा है तथा आगे भी देता रहेगा । 

अंत में 'पायल की झंकार' की बात पुनः करना चाहूंगा । 'पायल की झंकार' की कहानी की भांति ही इसका संगीत भी अत्यंत मधुर एवं हृदय-विजयी है । इसका एक गीत है 'सुर बिन तान नहीं, गुरु बिन ज्ञान नहीं' । और सच ही है । परीक्षा देने के लिए औपचारिक शिक्षा तो किसी भी तरह पाई जा सकती है लेकिन ज्ञान तो गुरु से ही मिलता है । सौभाग्यशाली है वह शिष्य जिसे सच्चा गुरु मिले । और आज के युग में वह सच्चा गुरु भी सौभाग्यशाली ही कहा जाएगा जिसे सच्चा एवं समर्पित शिष्य मिल जाए । 

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शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है . . .

प्रति वर्ष नौ जुलाई को स्वर्गीय गुरु दत्त का जन्मदिन पड़ता है । केवल उनतालीस वर्ष की आयु में उन्होंने मौत को ज़िन्दगी से बेहतर पाया और उसी की गोद में सो गए क्योंकि और कोई गोद उन्हें नसीब ही नहीं हुई । वे उस शायर की तरह थे जिसके लिए कहा गया है कि - वो लिखता है ज़ीस्त की हद तक, मरने पर वो शायर होगा । उनके द्वारा बनाई गई अमर कृति 'प्यासा' (१९५७) के नायक की ही तरह उनके चाहने वाले भी उनकी ज़िन्दगी में कम थे लेकिन जिनकी तादाद उनकी मौत के बाद लगातार बढ़ती ही चली गई ।
तेरह वर्ष पूर्व उनके जन्मदिवस के अवसर पर 'दैनिक भास्कर' समाचार-पत्र के 'नवरंग' नामक साप्ताहिक परिशिष्ट में श्री गीत चतुर्वेदी ने उनके ऊपर 'ग़म की बारिश, नम-सी बारिश' शीर्षक से एक दिल को चीर देने वाला लेख लिखा था । मैंने उन्हीं दिनों अपनी नौकरी बदली थी तथा राजस्थान के रावतभाटा नामक स्थान से निकलकर दिल्ली जा रहा था । रावतभाटा में मैंने चतुर्वेदी जी के लेख को अख़बार में पढ़ा और मेरी हालत यह हुई कि बस आँखें ही ख़ुश्क थीं क्योंकि मैं अपने आँसू किसी को दिखा नहीं सकता था, दिल भीतर-ही-भीतर रो पड़ा था । ग्यारह जुलाई दो हज़ार सात को जब मैंने अपने परिवार के साथ रावतभाटा को छोड़ा तो अख़बार के उस पन्ने को मैं अपने साथ ही ले गया जिस पर वो लेख छपा था । हफ़्ते भर बाद ही अपनी नई नौकरी में मेरा उत्तर प्रदेश के डाला नामक स्थान पर दौरे पर जाना हुआ । मैं अट्ठारह जुलाई को हवाई जहाज़ से वाराणसी पहुँचा और उसके उपरांत लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी सड़क मार्ग से तय करके डाला (सीमेंट फ़ैक्टरी) पहुँचा जहाँ के मेहमानख़ाने में मुझे ठहराया गया । मैं अख़बार का वो पन्ना अपने सामान में रखकर साथ ले आया था जिस पर चतुर्वेदी जी का लेख 'ग़म की बारिश, नम-सी बारिश' छपा था । तीन दिन तक यानी बीस जुलाई तक मैं डाला में रहा और हर रात अपने आरामदेय कमरे के एकांत में उस लेख को बार-बार पढ़ता रहा । मौसम भी बारिश का ही था और हाल यही था कि बाहर आसमान से बारिश होती रहती थी और अंदर (उस लेख को पढ़ते हुए) मेरी आँखों से । 

लेकिन इक्कीस जुलाई को जब मैं डाला से प्रस्थान करके चुनार नामक स्थान पर स्थित अपनी नियोक्ता कंपनी के दूसरे संस्थान (सीमेंट फ़ैक्टरी) चला गया तो अख़बार का वो पन्ना डाला के मेहमानख़ाने के अपने कमरे में ही (शायद तकिये के नीचे) भूल गया । मैं डाला वापस नहीं लौट सका और तीसरे दिन अपना दौरा पूरा करके चुनार से ही दिल्ली चला गया । तक़रीबन दो महीने बाद मैं डाला के दौरे पर पुनः गया तो सही लेकिन अब अख़बार का वह पन्ना मुझे कहाँ मिलता ? बस वो लेख और ख़ासतौर पर उसका उनवान 'ग़म की बारिश, नम-सी बारिश' मेरे दिल में किसी फाँस की तरह धंसा रह गया । तेरह साल बाद पिछले दिनों मैंने यूँ ही इंटरनेट पर गूगल सर्च में टटोला तो मुझे वह लेख गीत चतुर्वेदी जी के 'वैतागवाड़ी' नामक ब्लॉग पर मिल गया । और तेरह साल बाद उसे फिर से पढ़कर मेरी आँखों से अश्क उसी तरह टपके जिस तरह तेरह साल पहले टपके थे ।
गुरु दत्त पर मैंने तब से पढ़ना और उन्हें तब से समझना शुरु किया था जब मैं एक नादान बच्चा ही था । मेरे बचपन के दिनों की ही बात है जब फ़िल्मी पत्रिका 'माधुरी' में मैंने गुरु दत्त की माँ वासंती पादुकोण का लिखा हुआ लेख पढ़ा था - 'गुरु दत्त - मेरा बेटा' और इस बात को जाना था कि उनकी माँ ही उन्हें सबसे ज़्यादा समझती थी - वो माँ जिसकी गोद उसके बेटे को मरते वक़्त नसीब नहीं हुई और वो माँ जो बेटे की अकाल मौत के बाद तीस साल तक उसके जाने के ग़म के साथ ज़िन्दा रही (ठीक शहीद भगत सिंह की माँ की तरह)।

जब मैंने गुरु दत्त की अमर कृति 'कागज़ के फूल' की समीक्षा लिखी थी तो उस पर मेरे ब्लॉगर मित्र निशांत सिंह (sydbarett) ने टिप्पणी की थी कि दुनिया जीनियस को इसलिए दंडित करती है क्योंकि वो उसकी समझ से परे होता है । और शायद यही एक जीनियस की दुखदायी विडम्बना है कि वो दुनिया के और दुनियादारी के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता, दूसरी ओर दुनियादारी में डूबी दुनिया न उसे समझ पाती है और न ही उसकी प्रतिभा के साथ न्याय कर पाती है । जीनियस अकेला होता है । लेकिन ... लेकिन होता तो इंसान ही है न ? उसे भी तो कोई समझने वाला चाहिए, कोई प्यार करने वाला चाहिए । और न मिले तो ? यही जीनियस गुरु दत्त की ट्रेजेडी थी । 

जिस दिन मैंने 'वैतागवाड़ी' ब्लॉग पर 'ग़म की बारिश, नम-सी बारिश' को फिर से पढ़ा, उसी दिन शाम को नीम-अंधेरे में पूरी तनहाई और ख़ामोशी के आलम में यूट्यूब पर 'प्यासा' में गुरु दत्त पर फ़िल्माई गई साहिर की ग़ज़ल 'तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िन्दगी से हम' को देखा और सुना । फिर उसी फ़िल्म में स्थित साहिर की अमर नज़्म 'ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया' को भी देखा और सुना जिसकी शुरुआत में गाना शुरु करते हुए अंधेरे में दरवाज़े पर खड़े गुरु दत्त का साया सलीब पर टंगे जीसस क्राइस्ट की तरह दिखाई देता है । दोनों ही गीतों में मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ को अपने होठों पर लाते हुए गुरु दत्त के लिए ऐसा लगता है जैसे बोल उनके दिल की गहराई से निकल रहे हैं, वे लफ़्ज़ नहीं अहसास हैं जो बाहर आ रहे हैं - केवल उनके होठों पर नहीं, उनके चेहरे पर भी, उनकी आँखों में भी, सच कहा जाए तो उनके समूचे वजूद के ज़र्रे-ज़र्रे पर ।
गुरु दत्त ने स्वयं एक लेख लिखा था - 'क्लासिक्स एंड कैश' जिसमें उन्होंने इस बात को रेखांकित किया था कि इन दोनों शब्दों में समानता केवल इतनी ही है कि ये दोनों ही अंग्रेज़ी के अक्षर 'सी' से आरंभ होते हैं । अन्यथा जो रचना क्लासिक अर्थात् श्रेष्ठ है, उसे व्यावसायिक सफलता मिलना आवश्यक नहीं तथा जो रचना व्यावसायिक रूप से सफल है, उसका श्रेष्ठता के मानदंडों पर खरा उतरना आवश्यक नहीं । बाज़ार तथा धनार्जन का अपना दर्शन होता है । मामूली चीज़ें बहुत-सा पैसा कमा सकती हैं जबकि बेहतरीन चीज़ों को, हो सकता है कि कोई पूछने वाला ही न मिले । यह बात गुरु दत्त ने सम्भवतः 'कागज़ के फूल' (१९५९) फ़िल्म के संदर्भ में हुए अपने निजी अनुभव के आधार पर लिखी थी । लेकिन संसार सफलता को ही पूजता है, गुणों को नहीं; यह बात गुरु ने उससे भी पहले 'प्यासा' में बिना किसी लागलपेट के स्पष्टतः दर्शा दी थी । यह पाखंडी संसार गुणों का तो बस बखान ही करता है, सच तो यही है कि यहाँ जो बिकता है, वही चलता है । 

'प्यासा' के नायक विजय को आख़िर में किसी शख़्स से कोई शिकायत नहीं थी । उसे शिकायत थी समाज के उस ढाँचे से जो इंसान से उसकी इंसानियत छीन लेता है, मतलब के लिए अपनों को बेगाना बना देता है । उसे शिकायत थी उस तहज़ीब से जिसमें मुरदों को पूजा जाता है और ज़िंदा इंसान को पैरों तले रौंदा जाता है, जिसमें किसी के दुख-दर्द पर दो आँसू बहाना बुज़दिली समझा जाता है और झुककर मिलने को कमज़ोरी समझा जाता है । ऐसे माहौल में उसे कभी शांति नहीं मिल सकती थी । कामयाबी को ही सब कुछ मानने वाले समाज में 'काग़ज़ के फूल' के नायक सुरेश सिन्हा के तजुर्बात भी कुछ ऐसे ही रहे थे । गुरु द्वारा सिरजे गए और निभाए गए ये दोनों ही किरदार शायद उसकी अपनी शख़्सियत में जज़्ब हो गए थे । 

और इसीलिए एक दिन गुरु को नाउम्मीदी हो गई अपनी ज़िंदगी से, ठीक 'प्यासा' के नायक की तरह जो कशमकश-ए-ज़िंदगी से तंग आ गया था और कह रहा था - 

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम, ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बेदिली से हम 
हम ग़मज़दा हैं लाएं कहाँ से ख़ुशी के गीत, देंगे वही जो पाएंगे इस ज़िंदगी से हम 
लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उम्मीद, लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम 

गुरु को अंधेरे से प्यार था, आँसुओं से भी । आख़िर में अंधेरा और आँसू ही उसके हाथ लगे । उसने प्यार भी किया, शादी भी; लेकिन उसे हमसफ़र न मिला । अपनी ज़िन्दगी की आख़िरी रात को उसने हर उस शख़्स को पुकारा जो उसके तपते दिल को कुछ राहत दे पाता, उस पर ठंडक का फाहा रख पाता । पर कोई न आया - न गीता, न वहीदा, न कोई दोस्त, न कोई हमनवा । 'प्यासा' का नायक उसके मुक़ाबले कहीं ख़ुशनसीब था जो उसे एक चाहने वाली, समझने वाली और अपनाने वाली मिली जिसके साथ वो उस मतलबी दुनिया से दूर जाने के सफ़र पर निकल गया । उस दुनिया से दूर जाने के लिए जिसके लिए उसके लबों पर यही था - 

हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी; निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी 
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है 

यहाँ इक खिलौना है इंसां की हस्ती, ये बस्ती है मुरदापरस्तों की बस्ती 
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है 

ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है; वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है 
जहाँ प्यार की क़द्र ही कुछ नहीं है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
और आख़िर में - 

जला दो इसे, फूंक डालो ये दुनिया 
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया 
तुम्हारी है, तुम ही संभालो ये दुनिया 
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है 

दस अक्टूबर उन्नीस सौ चौंसठ की रात को अपनी मौत को गले लगाने से पहले शायद गुरु ने 'प्यासा' के नायक के मुँह से कहलवाए गए इन अशआर को ही याद किया, महसूस किया और इस दुनिया को ठुकरा दिया ।

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मंगलवार, 29 जून 2021

वो शाम जो भुलाए न भूले

डॉ. वर्षा सिंह के असामयिक निधन के उपरांत मेरा मन ब्लॉग जगत से उचाट हो गया है। न अब कुछ नवीन लिखकर यहाँ डालने का मन करता है, न ही साथी ब्लॉगरों के पृष्ठों पर जाने का उत्साह अनुभव होता है। किन्तु हाल ही में एक संस्मरण को पढ़कर अपना भी एक संस्मरण साझा करने की प्रेरणा मिली तो लिख रहा हूँ। यह घटना है उस शाम की जो आज से ठीक बीस साल पहले मेरी ज़िन्दगी में वाक़या हुई थी यानी तीस जून दो हज़ार एक को।

मैं राजस्थानी हूँ। जब मैंने भारतीय नाभिकीय ऊर्जा निगम में नौकरी स्वीकार की तो मेरी प्रथम नियुक्ति १९९९ में तारापुर परमाणु बिजलीघर (महाराष्ट्र) में हुई थी जहाँ से अपने गृह राज्य में स्थानांतरण के मेरे प्रयास जनवरी २००१ में जाकर फलीभूत हुए तथा मैं राजस्थान में कोटा नगर के निकट रावतभाटा नामक स्थान पर स्थित राजस्थान परमाणु बिजलीघर में आ पहुँचा। उस छोटे-से कस्बे से बिजलीघर के कर्मचारियों को कोटा ले जाने तथा वापस लाने के लिए दिन में तीन बार बिजलीघर की बस सेवा हुआ करती थी (अब भी होती होगी)। उस बस को 'कोटा मिनी बस' कहा जाता था जिसमें अपनी सीट पहले से आरक्षित करवानी पड़ती थी। उस समय मेरे माता-पिता मेरे मूल स्थान सांभर झील में रहा करते थे जबकि राजकीय सेवा में स्थित मेरी धर्मपत्नी एवं मेरी नन्ही पुत्री राजस्थान के बाड़मेर ज़िले में स्थित बायतु नामक गाँव में रहा करते थे जहाँ मेरी पत्नी की नियुक्ति एक अध्यापिका के रूप में वहाँ के राजकीय विद्यालय में थी। 

विद्यालयों में ग्रीष्मकालीन अवकाश के कारण मेरी पत्नी और पुत्री मेरे पास रावतभाटा आए हुए थे तथा एक जुलाई को विद्यालयों के पुनः खुलने पर मेरी पत्नी को ज्वॉइन करने के लिए लौटना था। मुझे मिनी बस में पत्नी के लिए सीट समय से बुक करवा लेनी चाहिए थी लेकिन मेरी लापरवाही का परिणाम यह निकला कि सारी सीटें बुक हो गईं और मैं सीट आवंटित नहीं करवा सका (तीस जून को शनिवार था तथा बहुत-से लोगों को कोटा जाना था, इसलिए सीटें जल्दी ही भर गई थीं)। मेरी पत्नी और पुत्री को कोटा से जोधपुर के लिए रात को नौ बजे संबंधित ट्रैवल एजेंसी के स्थान से चलने वाली बस पकड़नी थी जिसमें उनके लिए स्लीपर बुक था। लेकिन अब शाम को लगभग सवा पाँच बजे रावतभाटा में बिजलीघर की कॉलोनी से मिलने वाली मिनी बस में तो सीट उपलब्ध हुई नहीं थी। अतः राजस्थान रोडवेज की बस से कोटा तक की यात्रा करनी थी। 

वह बस लेने के लिए हमें कुछ ऊंचाई पर बसे हुए उस कस्बे में नीचे की ओर स्थित एक बस स्टैंड (जिसे फ़ेज़ टू कहा जाता था) पर जाना चाहिए था लेकिन न जाने किसके भ्रमित करने के कारण मैं पत्नी और पुत्री के साथ ठीक विपरीत दिशा में चारभुजा नामक स्थान पर नये बने बस स्टैंड पर पहुँच गया और वहाँ बहुत देर तक बस की प्रतीक्षा में समय नष्ट किया। परिणाम यह निकला कि वहाँ तो बस आई नहीं और जहाँ से मिलनी थी, वहाँ से भी छूट गई। रावतभाटा से कोटा जाने का एक विकल्प निजी जीपें भी हैं लेकिन वे तभी चलती हैं जब वे सवारियों से भर जाएं। उस दिन सवारियां न होने तथा मौसम भी बरसात का होने के कारण कोटा जाने के लिए कोई भी जीप उपस्थित नहीं थी। अब हमारी स्थिति बड़ी विकट हो गई। जाना ज़रूरी था। शैक्षणिक सत्र के प्रथम दिवस पर एक शिक्षिका के रूप में मेरी पत्नी की विद्यालय में उपस्थिति अपरिहार्य थी। अब हालत यह हो गई कि करें तो क्या करें। 

मेरी पत्नी और पुत्री मेरे साथ स्कूटर पर सवार थे। हरे रंग का बजाज सुपर स्कूटर मुझे विवाह में ससुराल वालों ने दिया था। वह स्कूटर मुझे अत्यन्त प्रिय था एवं विगत कुछ महीनों में मैंने रावतभाटा से कोटा तक की लगभग पचास किलोमीटर की दूरी कई बार उसी से तय की थी जिसमें मुझे ऊंचे-नीचे रास्तों, मोड़ों, चढ़ाइयों, घाटियों तथा जंगल (दरा अभयारण्य उसी क्षेत्र में है) से गुज़रने के बावजूद बहुत मज़ा आया था क्योंकि रास्ता ख़तरनाक तो था लेकिन उसमें कुदरत की ख़ूबसूरती भी थी। पर यह सफ़र मैंने सदा दिन के उजाले में ही तय किया था और वो भी अकेले। अब मैंने पत्नी के समक्ष एक जोखिम भरा प्रस्ताव रखा कि मैं उन्हें स्कूटर से ही कोटा में उनकी बस तक पहुँचा देता हूँ। मजबूरी में पत्नी ने मान लिया और मैंने पत्नी तथा पुत्री को उनके सामान के भारी बैग के साथ स्कूटर पर बैठाकर सफ़र शुरु कर दिया। उस समय शाम के लगभग साढ़े छः बजे थे। 

अभी रावतभाटा की सीमा से निकले ही थी कि बरसात शुरु हो गई। पहले बूंदाबांदी, फिर तेज़। ऊपर से अंधेरा रास्ता जिसमें स्कूटर की हैडलाइट की रोशनी में ही आगे देखते हुए स्कूटर चलाना था। हैडलाइट पर मच्छर और पतंगे मंडराने लगे। आँखों को उनसे बचाने के लिए हमने अपने पास मौजूद धूप वाले चश्मे लगा लिए लेकिन मेरे लिए चश्मा लगाकर स्कूटर चलाना सुविधाजनक नहीं था, अतः उसे उतार दिया। बुरी तरह बरसात में भीगते हुए मैं जैसेतैसे (और डरतेडरते) स्कूटर चलाता रहा। जंगल और कई जगह ख़तरनाक ढंग से बल खाए हुए ऊंचेनीचे रास्तों पर वह स्कूटर भागता रहा जिसे मैंने विवाह से लेकर अब तक सदा अपने परिवार का एक अंग ही समझा है। बरसात की बूंदें मेरी आँखों में गिर रही थीं लेकिन रुकना नहीं था। फिर भी बीच-बीच में कभी नन्ही पुत्री को तो कभी सामान के बैग को ठीक से समायोजित करने हेतु कुछ पलों के लिए रुकना भी पड़ा। लेकिन कुछ पलों के लिए ही। जंगल से गुज़र रहे थे तो रात्रि के अंधकार में किसी जंगली जानवर के भी आ जाने का भय था। पुत्री बहुत छोटी थी और परेशान थी लेकिन वह एक समझदार बच्ची बनकर अपने माता-पिता के साथ बारिश में भीगते-भीगते वह अनोखा सफ़र तय करती रही।

एक घंटे से अधिक की ड्राइव के उपरांत मार्ग में बोराबास नाम का एक छोटा-सा गाँव आया जहाँ मुख्य सड़क पर ही कुछ चाय की दुकानें और ढाबे बने हुए थे। हम वहाँ कुछ मिनटों के लिए रुके, चाय पी और इस ब्रेक के बाद सफ़र फिर से शुरु कर दिया। बारिश तो रुकी नहीं थी। स्कूटर के साथ यह तीन प्राणियों का परिवार भीगता रहा और अपने गंतव्य की ओर बढ़ता रहा। आख़िर कोटा नगर की सीमा में प्रवेश किया तो रोशनी में आए। ट्रैवल एजेंसी का स्थान अभी भी कुछ किलोमीटर दूर था (रोडवेज के नयापुरा बस स्टैंड के निकट)। जब स्कूटर वहाँ जाकर रुका तो नौ बजने ही वाले थे और जोधपुर की बस जाने के लिए तैयार ही खड़ी थी। पत्नी और पुत्री बस में सवार हुए और मैंने उन्हें विदा दी। वे मेरे लिए चिंतित थे क्योंकि उस ख़राब मौसम में रात के समय मेरा स्कूटर पर लौट पाना लगभग असंभव ही था। 

मैंने एक निकटस्थ होटल में कमरा लिया। स्कूटर को उसी होटल की पार्किंग में खड़ा किया। बदलने के लिए कपड़े नहीं थे। अत: होटल वालों का दिया हुआ तौलिया ही लपेटकर सो गया। सुबह देखा तो बरसात कभी की रुक चुकी थी और धूप निकली हुई थी। रविवार का दिन था, इसलिए नौकरी पर तो जाना नहीं था। सात बजे के लगभग होटल छोड़ा और स्कूटर को पुनः स्टार्ट करके वापसी की यात्रा आरंभ कर दी। अब न कोई जल्दी थी, न कोई डर। मौसम सुहाना था। अतः बेधड़क स्कूटर चलाते हुए लगभग नौ बजे रावतभाटा में अपने क्वार्टर पर पहुँच गया। रास्ते में केवल एक बार चाय पीने के लिए एक जगह रुका। पत्नी एवं पुत्री के सकुशल जोधपुर पहुँच जाने का समाचार फ़ोन से प्राप्त हुआ। स्कूटर की वफ़ादारी ने मेरा दिल जीत लिया था क्योंकि भीषण बारिश में लगातार भीगने के बावजूद न तो वह पिछले दिन कहीं रुका था, न ही उसने वापसी यात्रा में मुझे कोई कष्ट दिया। उस दिन यानी कि एक जुलाई को जब अपने घर पर मैं आराम से लेटा था, तब मैंने बीती शाम के बारे में सोचा तो यही पाया कि वह शाम कभी भुलाई नहीं जा सकेगी। आज बीस साल बाद भी यही लगता है जैसे कल-की-सी-बात हो।

सोमवार, 21 जून 2021

आख़िर छपा उपन्यास

कुछ वर्ष पूर्व मैंने 'क़त्ल की आदत' नाम से एक हिन्दी उपन्यास लिखा था। कथानक सर्वथा मौलिक था क्योंकि वह मेरे निजी अनुभवों पर आधारित था। आजकल लिखने से भी अधिक दुस्साध्य कार्य पुस्तक को प्रकाशित करना (या करवाना) होता है। जैसे-तैसे वह पुस्तक इंटरनेट पर ई-पुस्तक के रूप में कुछ स्थानों पर उपलब्ध करवाने में तो मैं सफल हो पाया लेकिन उसका काग़ज़ पर प्रकाशित हो पाना स्वप्न-सदृश ही रहा। मैंने स्वयं भी इस दिशा में अधिक रुचि नहीं ली। लेकिन मेरी पुत्री (स्वयंप्रभा) का प्रबल आग्रह था कि पुस्तक काग़ज़ पर प्रकाशित हो। अतः लम्बे अंतराल के उपरांत इस वर्ष मैंने इस संदर्भ में प्रयास आरंभ किए तथा अंततोगत्वा मेरी यह रचना चंडीगढ़ की सृष्टि प्रकाशन नामक संस्था से पुस्तकाकार में प्रकाशित हुई। अब यह पुस्तक फ़्लिपकार्ट पर उपलब्ध है जिसका लिंक मैं अपने मित्रगणों तथा पुस्तक-प्रेमियों के लिए यहाँ साझा कर रहा हूँ। 


फ़्लिपकार्ट का संबंधित लिंक इस प्रकार है: 

https://www.flipkart.com/qatal-ki-aadat/p/itm9c859811f0c33?pid=9789390814206&lid=LSTBOK9789390814206XJSCEG&marketplace=FLIPKART&q=QATAL+KI+AADAT&store=search.flipkart.com&srno=s_1_1&otracker=search&otracker1=search&fm=SEARCH&iid=1db1fba8-b270-4331-95de-cc8d04d79f27.9789390814206.SEARCH&ppt=sp&ppn=sp&ssid=vc2hwmad0w0000001624330101570&qH=b84fe7445f498dc8

पुस्तक एक उपन्यास है जिसका कथानक एक रहस्यकथा है जो एक छोटे-से औद्योगिक कस्बे में घटित होती है। मुख्यतः यह रहस्यकथाएं पढ़ने में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए है। हमारे ब्लॉगर मित्र विकास नैनवाल ने वर्षों पूर्व इसकी हिंदी में समीक्षा लिखी थी जिसका लिंक भी मैं यहाँ दे रहा हूँ:

https://www.ekbookjournal.com/2016/02/Qatl-Ki-Aadat-by-Jitendra-Mathur.html

मैं कोई व्यावसायिक लेखक नहीं। अपनी लगभग सभी रचनाओं की भांति इसे भी मैंने आत्मसंतोष के लिए ही लिखा था तथा अपनी पुत्री की अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए इसे पुस्तकाकार में प्रकाशित करवाया है। जो भी इसे पढ़े और किसी क़ाबिल पाए, उसका मैं शुक्रिया अदा करता हूँ।



गुरुवार, 20 मई 2021

सुनील और कर्नल मुखर्जी की जुगलबंदी

सुरेन्द्र मोहन पाठक का ऐसा कोई प्रशंसक नहीं जो उनके द्वारा रचित प्रथम नायक सुनील कुमार चक्रवर्ती से परिचित न हो । राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र 'ब्लास्ट' में पत्रकार की नौकरी कर रहे इस लगभग तीस वर्षीय नौजवान से हम उतने ही परिचित हैं जितने कि इसके प्रणेता पाठक साहब से । यह जीवन के ऊंचे मूल्यों को लेकर चलने वाला, हाज़िर-जवाब, शानदार खान-पान का शौकीन, शानदार कपड़े पहनने और ठाठ से रहने का रसिया, एम. वी. आगस्ता अमेरिका नामक बाइक पर शाही ढंग से विचरने वाला और हर किसी की दुख-तकलीफ़ से पिघल कर उसकी मदद करने को तैयार हो जाने वाला चिर-कुंवारा शख़्स १९६३ से पाठकों के दिलों पर राज कर रहा है । 

पाठक साहब ने ऐसे अनेक उपन्यास लिखे हैं जिनमें सुनील एक पत्रकार से इतर एक गुप्तचर की भूमिका में हमारे समक्ष आता है और 'ब्लास्ट' के लिए नहीं बल्कि भारत के लिए, हमारे राष्ट्र के लिए काम करता है । देश के हितों की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों पर खेल जाने वाला यह युवक 'ब्लास्ट' के मालिक और मुख्य संपादक बलदेव कृष्ण मलिक साहब का कर्मचारी ही नहीं बल्कि भारत सरकार के केंद्रीय जाँच ब्यूरो के एक अत्यंत विशिष्ट विभाग स्पेशल इंटेलिजेंस का सदस्य भी है जिसके प्रमुख हैं कर्नल मुखर्जी । 

सुनील की ही तरह कई विश्वासपात्र और योग्य गुप्तचर हैं जो कर्नल साहब के निर्देशों पर देश के हित के लिए काम करते हैं । यहाँ तक कि कई विदेशी मुल्कों में भी स्पेशल इंटेलिजेंस के एजेंट मौजूद हैं । राजनगर में कर्नल मुखर्जी के सुनील के अलावा दो अन्य अत्यंत कार्यकुशल एजेंट हैं –  १. विंग कमांडर रामू, २. गोपाल । जैसा कि प्रत्यक्ष है,  विंग कमांडर रामू कर्नल मुखर्जी की ही तरह सेना से जुड़ा रहा  है जबकि गोपाल राजनगर के होटल नीलकमल में वेटर की नौकरी करता है । जिस तरह सुनील की 'ब्लास्ट' की नौकरी उसके जासूसी कारोबार के लिए ओट है, वैसे ही गोपाल की वेटरगिरी उसके लिए है । गोपाल कई भाषाएं जानता है और होटल की नौकरी के दौरान अपने कान खुले रखते हुए लोगों की बातें ग़ौर से सुनता है । फिर जो जानकारी काम की लगे, उसे कर्नल साहब को हस्तांतरित कर देता है । 

कर्नल साहब का एक नौकर है – धर्म सिंह । जब भी सुनील विदेश जाता है, उसका पासपोर्ट, वीज़ा, टिकट तथा अन्य काग़ज़ात धर्म सिंह ही हवाई अड्डे पर जाकर उस तक पहुँचाता है । सुनील धर्म सिंह पर हमेशा संदेह करता है । उसे लगता है कि धर्म सिंह महत्वपूर्ण सूचनाएं दुश्मनों को लीक कर देता है । लेकिन उसका संदेह सदा ही निराधार सिद्ध होता है जबकि कर्नल मुखर्जी का धर्म सिंह पर विश्वास सही सिद्ध होता है । 

पाठक साहब ने 'ब्लास्ट' के संवाददाता के रूप में अभी सुनील के कुल जमा पाँच ही उपन्यास लिखे थे कि उन्हें इस सीरीज़ में विविधता पैदा करने की ज़रूरत महसूस होने लगी और सुनील का छठा कारनामा – हांगकांग में हंगामा ही ऐसा आ गया जो कि उसे एक जासूस के रूप में पेश करता था । फिर तो सुनील और कर्नल मुखर्जी की जुगलबंदी बराबर चली और क्या खूब चली ! 

सुनील के कई ऐसे उपन्यास पढ़ते समय हम उसके साथ विदेशों की सैर करते हैं । उनमें हमें विदेशों का ऐसा सजीव और प्रामाणिक चित्रण देखने को मिलता है जिसे करना केवल पाठक साहब के बस की ही बात है, और किसी भारतीय लेखक के बस की नहीं । इनमें सुनील जमकर ख़ूनख़राबा करता है, जेल जाता है, जेल तोड़कर भागता है और ऐसे-ऐसे साहसिक काम करता है जिनकी कल्पना उसे एक पत्रकार के रूप में देखते हुए नहीं की जा सकती । 

लेकिन सुनील द्वारा किए जा रहे रक्तपात के बीच भी पाठक साहब ने एक संवेदनशील मनुष्य होने का उसका मूल रूप बनाए रखा है क्योंकि वह, जहाँ तक संभव हो, बिना किसी की हत्या किए अपना काम बना लेने का प्रयास करता है । योरोप में हंगामा में लुईसा पेकाटी उसे एस्पियानेज (गुप्तचरी) के खेल का कच्चा खिलाड़ी बताती है क्योंकि वह उसके और उसके साथी के प्राण लेने की जगह केवल उन्हें रस्सियों से बाँधकर छोड़ गया था । 

बसरा में हंगामा और स्पाई चक्र उपन्यासों में हमारी मुलाक़ात त्रिवेणी प्रसाद शास्त्री से होती है जो कि काहिरा में स्पेशल इंटेलिजेंसका कर्ताधर्ता है । कई उपन्यासों में सुनील की टक्कर अंतर्राष्ट्रीय अपराधी कार्ल प्लूमर से होती है तो कई उपन्यासों में सुनील को पाकिस्तान की गुप्तचर सेवा के अधिकारी अब्दुल वहीद कुरैशी को मात देते हुए दिखाया जाता है । कभी सुनील पीकिंग (बीजिंग) जा पहुँचता है तो कभी सिंगापुर तो कभी हांगकांग तो कभी ओस्लो (नार्वे) तो कभी पेरिस तो कभी रोम तो कभी तेहरान लंदन में हंगामा में सुनील 'ब्लास्ट' के लंदन स्थित संवाददाता सरदार जगतार सिंह का सहयोग हासिल करता है जो कि अपनी बातों से पाठकों को हँसा-हँसाकर लोटपोट कर देने में कसर नहीं छोड़ता । 

अमन के दुश्मन और हाईजैक (संयुक्त संस्करण – लहू पुकारेगा आस्तीं का’) बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम पर आधारित हैं । ये पाठक साहब ने इतने भावुक ढंग से लिखे हैं कि इन्हें पढ़कर किसी भी वतनपरस्त की आँखें भर आएं । पाठक साहब हमें यह भी बताते हैं कि सुनील का जन्म भी अविभाजित बंगाल के गोपालगंज नामक स्थान पर हुआ था जो कि अब बांग्लादेश में है ।   

सवाल यह है कि इन सब कारनामों के बीच सुनील की नौकरी कैसे चलती है ? ‘स्पाई चक्र में तो सुनील को डकैती डालकर जानबूझकर गिरफ़्तारी देने के बाद और अदालत से सज़ायाफ़्ता होकर काहिरा की जेल में भी बंद होना पड़ता है । तो फिर वह 'ब्लास्ट' की नौकरी कैसे करता है ? ‘बसरा में हंगामा के अंत में पाठक साहब ने इस सवाल का जवाब दिया है कि जब वह मिशन से लौटकर 'ब्लास्ट' में जॉइन करता है तो तुरंत ही उसे मलिक साहब की लिखित चेतावनी मिल जाती है कि अगर फिर कभी वह इस तरह से बिना सूचना दिए ग़ायब हो तो अपने आपको नौकरी से बर्ख़ास्त समझे । 

एक गुप्तचर के रूप में सुनील का अंतिम उपन्यास ऑपरेशन सिंगापुर  है जो कि इस सीरीज़ का उनसठवां उपन्यास है लेकिन सुनील और कर्नल मुखर्जी की जुगलबंदी सुनील के बासठवें उपन्यास ख़ून का खेल में भी कायम रहती है जिसमें उपन्यास के पूर्वार्द्ध में तो सुनील एक पत्रकार के रूप में ही सक्रिय रहता  है लेकिन उत्तरार्द्ध में वह कर्नल मुखर्जी के सहयोग और मार्गदर्शन से वतन के दुश्मनों को थाम लेता है । 

कर्नल मुखर्जी को आख़िरी बार पाठक साहब ने सुनील के तिरेसठवें उपन्यास नया दिन नई लाश में पलक झपकने जैसी अपीयरेंस में दिखाया है । जिस एकमात्र दृश्य में वे हाज़िरी भरते हैं उसमें सुनील के मौजूद होते हुए भी उनकी आपस में कोई बातचीत या अन्य संपर्क नहीं होता है । 

नया दिन नई लाश के बाद कर्नल साहब सुनील सीरीज़ से विदा हो गए, ‘ख़ून का खेल के बाद सुनील 'ब्लास्ट' के कर्मचारी और पत्रकार के अतिरिक्त किसी अन्य रूप में दिखाई देना बंद हो गया और ऑपरेशन सिंगापुर के बाद पाठक साहब ने सुनील के जासूसी कारनामे लिखने पूरी तरह छोड़ दिए । लेकिन सुनील सीरीज़ के ये उपन्यास जितने भी हैं, काबिल-ए-दाद हैं । रोलरकोस्टर राइड जैसी उत्तेजना और रोमांच देने वाले ये उपन्यास न केवल पाठकों का मनोरंजन करते हैं बल्कि उन्हें अनमोल जानकारियों से नवाज़ते हैं और दिल में वतनपरस्ती का जज़्बा जगाते हैं । 

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