अगस्त १९४७ में भारत का विभाजन एक ऐसी भयावह त्रासदी था जिसमें कुछ निहित स्वार्थों के अतिरिक्त सभी हारे। इन निहित स्वार्थों में एक बहुत बड़ी संख्या समाजकंटकों की थी जिनके लिये यह त्रासदी मानो एक अवसर बनकर आई थी आपराधिक कार्यों हेतु। मेरा सदा से यह मानना रहा है कि साम्प्रदायिक दंगों के लाभार्थी केवल समाजकंटक ही होते हैं जिन्हें भीड़ की ओट में अपराध करने का अवसर मिल जाता है। और उत्पीड़ित केवल निर्दोष होते हैं। दंगे करने वाले पुरुष होते हैं लेकिन भुगतना सबसे अधिक पड़ता है महिलाओं को। विभाजन से एक वर्ष पूर्व ही जिन्ना की तथाकथित 'सीधी कार्रवाई' के आह्वान पर देश का एक बड़ा भाग हिन्दू-मुस्लिम दंगों की चपेट में आ गया था। अरसे से चला आ रहा साम्प्रदायिक सद्भाव मिट्टी में मिल गया था और भाईचारा नफ़रत में बदल गया था। निर्दोषों का ख़ून बह रहा था, सम्पत्तियां नष्ट हो रही थीं, बहन-बहू-बेटियों को अपमानित किया जा रहा था। साम्प्रदायिकता की आंधी में अंधे हो गए लोग यह नहीं सोच पा रहे थे कि ख़ून तो ख़ून होता है चाहे हिन्दू का हो या मुसलमान का; माँ-बहनों की इज़्ज़त एक-सी होती है चाहे हिन्दू की हों या मुसलमान की।
विभाजन के बाद भी एक लम्बे समय तक स्थितियां सामान्य नहीं हो सकीं। पर फिर सुविख्यात हिंदी साहित्यकार आचार्य चतुरसेन ने साम्प्रदायिक सद्भाव पर एक उपन्यास लिखा - धर्मपुत्र। यह एक असाधारण उपन्यास है जिसे आधार बनाकर बलदेवराज चोपड़ा ने इसी नाम से एक हिंदी फ़िल्म बनाई जिसका निर्देशन यश चोपड़ा ने किया। फ़िल्म १९६१ में प्रदशित हुई। इस कहानी के केन्द्र में एक युवक है जो मुस्लिम माता-पिता की संतान है लेकिन जिसका लालन-पालन एक हिन्दू परिवार ने अपनी संतान की तरह किया है। यह उपन्यास एक कालजयी उपन्यास है और इस पर बनाई गई फ़िल्म भी बहुत अच्छी है। इसी फ़िल्म में साहिर की अमर नज़्म है - ये किसका लहू है ? कौन मरा ?
'धर्मपुत्र' की कहानी भारत की स्वतंत्रता एवं विभाजन से बहुत पहले एक वयोवृद्ध नवाब मुश्ताक़ अहमद के डॉक्टर अमृतराय के क्लीनिक पहुँचने से शुरू होती है। वे डॉक्टर के स्वर्गवासी पिता के मित्र रहे हैं तथा उन्होंने ही डॉक्टर की शिक्षा-दीक्षा का व्यय उठाया था। उनकी समस्या यह है कि उनकी इकलौती और बिना माँ-बाप की पोती हुस्नबानू विवाह के बिना ही गर्भवती हो चुकी है तथा वे उसका विवाह एक अन्य नवाब से तय कर चुके हैं। उस युग में गर्भपात अवैधानिक था। वे प्रस्ताव रखते हैं कि डॉक्टर जो विवाहित तो हैं किन्तु अभी तक संतान से रहित हैं, उनकी पोती के बच्चे को अपना बच्चा घोषित करके हिन्दू रीति-रिवाज़ों से ही पालें। अर्थात् वे बच्चे के धर्मपिता बनें किन्तु समाज की दृष्टि में वह बच्चा उनका और उनकी पत्नी का अपना बच्चा ही कहलाए।
नवाब मुश्ताक़ अहमद डॉक्टर की पत्नी अरुणा से भी बात करते हैं तथा उन्हें भी इस काम के लिये मना लेते हैं। नवाब के प्रस्ताव में प्रलोभन भी बहुत था क्योंकि वे बहुत-सी सम्पत्ति उस बालक के नाम करने वाले थे। नवाब की योजना के अनुरूप ही बालक का जन्म उनके दिल्ली स्थित निवास से दूर मसूरी में होता है तथा डॉक्टर व अरुणा हुस्नबानू के उस बच्चे को अपना बच्चा बताकर अपने घर ले आते हैं। फिर धूमधाम से उत्सव मनाकर अपने आत्मीय जनों के समक्ष उस बच्चे (लड़के) का नामकरण करते हैं - दिलीप। नवाब अपने वचन के अनुसार बहुत बड़ी जायदाद दिलीप के नाम कर देते हैं। हुस्नबानू का नवाब द्वारा तय किया हुआ विवाह हो जाता है।
आने वाले वर्षों में डॉक्टर दंपती के अपने तीन बच्चे होते हैं - सुशील और शिशिर नामक पुत्र तथा करुणा नामक पुत्री। बच्चे बड़े होते हैं और अलग-अलग विचारधाराओं में ढलते हैं। दिलीप कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी बनता है तो सुशील साम्यवादी विचारों का समर्थक तो शिशिर कांग्रेसी। तीनों उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। उनकी छोटी और लाड़ली बहन करुणा लेडी हार्डिंग कॉलेज में चिकित्सा की पढ़ाई कर रही है। वह किसी विचारधारा को नहीं मानती, केवल मानवता से ओतप्रोत है। वह दिलीप को चिढ़ाती है - 'भैया, इस हिन्दू धर्म का तो बेड़ा ही ग़र्क़ होगा। और सब एक ओर रहें - केवल स्त्रियों के आँसुओं के समुद्र में ही वह डूब जाएगा'। ये भाईबहन नहीं जानते कि इनमें सबसे बड़ा भाई वस्तुतः मुस्लिम माता-पिता की संतान है।
दिलीप के लिये राय राधाकृष्ण की पुत्री माया का रिश्ता आता है। दिलीप माया को बिना देखे ही यह सोचकर मना कर देता है कि उच्च शिक्षा प्राप्त वह युवती निश्चय ही पश्चिमी संस्कारों में ढली होगी तथा भारतीय संस्कारों से रहित होगी। इसके अतिरिक्त राय साहब को उनकी विदेश-यात्रा के कारण उनके समुदाय ने जाति से बहिष्कृत किया हुआ है (एक सदी पहले बहुत-से हिंदू समाजों में समुद्र-पार जाने को अनुचित मानने एवं जाने वाले को जाति से बाहर कर देने की कुप्रथा थी)। अब डॉक्टर परेशान हो जाते हैं क्योंकि वे तो राय साहब को रिश्ते की स्वीकृति दे चुके हैं। राय साहब स्वयं माया को साथ लेकर डॉक्टर के यहाँ पहुँचते हैं। जब वे दिलीप से बात करते हैं तो दिलीप उन्हें भी इस रिश्ते के लिये मना कर देता है। पर जब माया दिलीप से मिलती है और उसे अपनी माता द्वारा उपहार स्वरूप भेजी गई घड़ी देती है तो स्थिति कुछ और ही हो जाती है।
होता यह है कि दिलीप और माया पर प्रथम दृष्टि का प्रेम वाली कहावत लागू हो जाती है। पहली नज़र में ही वे दोनों एकदूसरे को अपना दिल दे बैठते हैं। पर दिलीप तो रिश्ते के लिये मना कर चुका है। अब क्या किया जाए ? इधर माया के व्यक्तित्व से प्रभावित डॉक्टर एवं अरुणा राय साहब से उसका रिश्ता सुशील के लिये माँगते हैं तो राय साहब तुरंत उत्तर नहीं देते और लौट जाते हैं। वे माया की माता से इस संबंध में बात करते हैं तो वे स्पष्ट इनकार कर देती हैं - 'हमारी बेटी कोई बिक्री का सौदा नहीं है कि एक ग्राहक से सौदा न पटा तो दूसरे से पटा दिया। बड़े भाई को जूता ओछा पड़ा तो छोटे ने पहन लिया'। राय साहब डॉक्टर को इस संबंध में कोई उत्तर नहीं देते तथा सोच लेते हैं कि अब इस परिवार में रिश्ते की बात ही न की जाए। लेकिन जब उन्हें माया के मन की बात पता चलती है तो वे भी परेशान हो जाते हैं।
नौ अगस्त, १९४२ की अलस्सुबह। अगस्त क्रांति की शुरुआत। गांधीजी सहित सभी चोटी के नेता गिरफ़्तार कर लिये जाते हैं। देश भर में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध प्रदर्शन होने लगते हैं। शिशिर प्रदर्शनकारियों के समूह के समक्ष भाषण देता है और गिरफ़्तार हो जाता है। दिलीप वैसे तो कांग्रेस से घृणा करता है और गांधीजी को 'हिन्दू मुल्ला' कहता है लेकिन भाई के प्रेम की पुकार को वह अनसुना नहीं कर पाता। वह भी अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध एक ओजस्वी भाषण देता है। उस सभा पर अंग्रेज़ी पुलिस गोलीबारी करती है और दिलीप भी गिरफ़्तार कर लिया जाता है।
वह दिन भी आता है जब दोनों भाई घर लौटते हैं। डॉक्टर दम्पती को अब अपने लड़कों के विवाह की चिंता है। राय साहब के घर में बात न बन पाने के बाद और किसी जगह उनके किसी लड़के के विवाह की बात चली ही न थी। कुछ समय बाद देश का हिंदू-मुस्लिम सद्भाव नष्ट होने लगता है और साम्प्रदायिक दंगे होने लगते हैं। अब हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए अंग्रेज़ शत्रु नहीं रहे हैं। अब वे एकदूसरे के शत्रु बन बैठे हैं। निर्दोषों का ख़ून बहने लगता है, माँ-बहन बहू-बेटियां बेइज़्ज़त होने लगती हैं। स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा देश दंगों की आँच में झुलसने लगता है। गुंडे-बदमाशों की बन आती है और निर्दोषों के लिए जीना मुश्किल होने लगता है।
हुस्नबानू अब विधवा हो चुकी है और अपने दो पुराने नौकरों के साथ अपने दादा के पुराने रंगमहल में आकर रहने लगी है। दंगाइयों की भीड़ रंगमहल में आग लगाने आती है। इस भीड़ का नेतृत्व कर रहा है दिलीप। हुस्नबानू को बचाने अरुणा को साथ लेकर डॉक्टर आते हैं और वे दिलीप पर बंदूक तान देते हैं। हुस्नबानू के मुख से शब्द फूटते हैं - 'दि...लीप'। 'हाँ बहन, यही है दिलीप। देख लो इसे आख़िरी बार और पहली बार', अरुणा कहती हैं और फिर अपने पति से संबोधित होती हैं, 'मार दो गोली'।
फिर क्या होता है ? जानने के लिये पढ़िए उपन्यास।
'धर्मपुत्र' कोई आम उपन्यास नहीं, हिंदी साहित्य की धरोहर है। इस बेहतरीन साहित्यिक कृति पर बलदेवराज चोपड़ा ने फ़िल्म बनाने का साहस किया और 'धर्मपुत्र (१९६१) दर्शकों के समक्ष आई। उस समय तक विभाजन के घाव सूखे नहीं थे। अतः कई स्थानों पर फ़िल्म को विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा और कई सिनेमाघरों से फ़िल्म को उतारना पड़ गया। लेकिन इसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
फ़िल्म में उपन्यास से थीम ली गई है लेकिन इसकी पटकथा जो कि बी.आर. फ़िल्म्स के कहानी विभाग द्वारा रची गई है, उपन्यास से काफ़ी भिन्न है। बहुत-से परिवर्तन किए गए हैं जिसके कारण फ़िल्म उपन्यास जैसी प्रभावशाली नहीं बन सकी है। फिर भी निश्चय ही यह फ़िल्म देखने लायक है और इसका गीत-संगीत तो बहुत ही अच्छा है। हुस्नबानू की भूमिका में माला सिन्हा, दिलीप की भूमिका में शशि कपूर, डॉक्टर की भूमिका में मनमोहन कृष्ण तथा उनकी पत्नी की भूमिका में निरुपा रॉय ने बेहतरीन अभिनय किया है। साहिर के गीतों पर एन. दत्ता ने सुमधुर संगीत रचा है। फ़िल्म में 'मैं जब भी अकेली होती हूँ', 'आज की रात', 'तुम्हारी आंखें', 'नैना क्यूं भर आये', 'जो ये दिल दीवाना मचल गया', 'ये किसका लहू है, कौन मरा' आदि बेहतरीन गीत हैं। आरंभ में 'सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' भी है।
'धर्मपुत्र' उपन्यास दो संस्करणों में उपलब्ध है। एक बड़ा संस्करण है, दूसरा संक्षिप्त संस्करण। मैंने दोनों पढ़े हैं। संक्षिप्त संस्करण अपने बड़े (बड़ी कहानी कहने वाले) संस्करण से बेहतर है क्योंकि इसमें लेखक ने अनेक अनावश्यक प्रसंग (एवं अनावश्यक पात्र) हटा दिए हैं तथा कथ्य को मूल विषय-वस्तु पर ही केन्द्रित रखा है। इससे कथ्य की गति एवं मनोरंजन प्रदान करने की क्षमता बढ़ गई हैं। इस उपन्यास में आचार्यजी ने संस्कृतनिष्ठ हिंदी का प्रयोग न करके बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है। उर्दू के शब्दों की भी इसमें प्रचुरता है। ऐसा करने से कथ्य अधिक प्रभावी बन पड़ा है।
आचार्यजी ने अनायास ही एकदूसरे से प्रेम कर बैठे दिलीप और माया की रूमानी भावनाओं का कुशलता से चित्रण किया है जो पाठकों के मन को छू लेता है। भाईबहनों का स्नेह भी कथानक में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और स्त्रीपुरुष का पारस्परिक आकर्षण भी। विवाह करने जा रही कन्या के आत्मसम्मान को भी इसमें रेखांकित किया गया है। उपन्यास के विभिन्न पात्रों की बातें तथा विभिन्न विवरण मानवतावादी लेखक आचार्य चतुरसेन के अपने विचारों एवं भावनाओं का ही प्रतिबिम्ब हैं। कुछ पात्रों को छोड़कर आचार्यजी ने कथानक के सभी प्रमुख पात्रों को अपने आप उभरने एवं भलीभांति विकसित होने का अवसर दिया है। एक स्थान पर लेखक के अम्बेडकर-विरोधी होने का संकेत भी मिलता है।
आज आचार्य चतुरसेन जैसे साहित्यकार उपलब्ध नहीं हैं जो ऐसी असाधारण कृति रचकर पाठक समुदाय को प्रस्तुत करें और न ही बलदेवराज चोपड़ा और यश चोपड़ा जैसे साहसी फ़िल्मकार अब हैं। भारत के वर्तमान राजनीतिक वातावरण में तो ऐसी फ़िल्म बन ही नहीं सकती। कोई बना दे तो भारतीय सेंसर बोर्ड ही उसे पास नहीं करेगा। लेकिन उस युग का यह क्लासिक उपन्यास तथा उस युग की यह क्लासिक फ़िल्म अवलोकन हेतु उपलब्ध हैं। उपन्यास तथा फ़िल्म दोनों ही सभी मानवतावादियों को पसंद आएंगे।
मेरा तो यही मानना है कि इंसानियत ही सबसे पहला धर्म है इंसान का। क्या व्यक्ति को किसी विशिष्ट धर्म का अनुयायी होने के स्थान पर केवल मनुष्य होकर जीने का अधिकार नहीं है ? देश और मानवता को साम्प्रदायिक सद्भाव चाहिए, न कि साम्प्रदायिक विद्वेष। 'धर्मपुत्र' यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित दूसरी ही फ़िल्म है। उनकी पहली निर्देशित फ़िल्म 'धूल का फूल' (१९५९) का एक गीत है - 'तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा; इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा'। मेरी नज़र में तो जो ईश्वर मस्जिद में है, वही मंदिर में है। 'धर्मपुत्र' फ़िल्म का एक गीत (कव्वाली) भी है - 'ये मस्जिद है, वो बुतख़ाना (मंदिर); चाहे ये मानो, चाहे वो मानो'।
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