गुरुवार, 25 अगस्त 2022

हर मज़हब से ऊँची है क़ीमत इन्सानी जान की

दूरदर्शन पर प्रति वर्ष 'बाल दिवस' के अवसर पर 'चित्रहार' नामक लोकप्रिय कार्यक्रम में पुरानी फ़िल्म 'दो कलियाँ' (१९६८) का एक गीत प्रसारित हुआ करता था (सम्भव है, अब भी होता हो) - 'बच्चे, मन के सच्चे'। इस गीत में बाल कलाकार बेबी सोनिया (अपने बालपन में नीतू सिंह जो बड़ी होकर हिन्दी फ़िल्मों की लोकप्रिय नायिका बनीं) स्वर्गीया लता मंगेशकर के स्वर में गाती हुई बताती हैं: 'इंसां जब तक बच्चा है, तब तक समझो सच्चा है; ज्यों ज्यों उसकी उमर बढ़े, मन पर झूठ का मैल चढ़े; क्रोध बढ़े, नफ़रत घेरे; लालच की आदत घेरे, बचपन इन पापों से हटकर अपनी उमर गुज़ारे'। और इसी गीत के एक अंतरे में वे बताती हैं - 'इनमें छूत और छात नहीं, झूठी जात और पांत नहीं; भाषा की तक़रार नहीं, मज़हब की दीवार नहीं; इनकी नज़रों में एक हैं मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे।' अपने बचपन में जब मैंने साहिर द्वारा रचित एवं रवि द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को सुना था, तब मुझे इसका मर्म इस प्रकार समझ में नहीं आया था जिस प्रकार अब आ गया है। काश हम सब बच्चे ही होते ! साफ़ दिल के और इंसान को सिर्फ़ इंसान की तरह देखने वाले !

पंजाब सहित कई राज्यों में चुनाव हो गए, आज़ादी का अमृत महोत्सव भी मन ही गया। अब किसे याद है कि पिछले साल अट्ठारह दिसम्बर को अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में एक युवक की वहाँ उपस्थित सेवादारों एवं अन्य व्यक्तियों ने पीट-पीटकर (सीसीटीवी कैमरों के सामने, बेधड़क) हत्या कर दी थी ? इल्ज़ाम था कि उसने सिख समुदाय की पवित्र पुस्तक - गुरू ग्रंथ साहिब का अपमान करने एवं धार्मिक सेवाओं को बाधित करने का प्रयास किया था। पुलिस ने (भारत की फ़िल्मी पुलिस की तरह) बाद में वहाँ अपनी आमद दर्ज़ कराई और हत्या करने वालों (जिनके चेहरे टीवी फ़ुटेज में साफ़ नज़र आ रहे थे) के ख़िलाफ़ नहीं, उस बेचारे मार दिए गए शख़्स के ख़िलाफ़ ही हत्या की कोशिश का मामला दर्ज़ कर लिया। कितनी महान है मेरे देश की पुलिस ! धार्मिक ग्रंथ की बेअदबी की साज़िश की बात का जमकर शोर मचाया गया क्योंकि ढाई-तीन महीने में ही पंजाब में चुनाव होने थे और सभी राजनीतिक दलों को सिख समुदाय के थोक में वोट चाहिए थे (चुनाव जीतकर सत्ता पाने के लिए)। किसी ने उस अभागे अजनबी की जान की कोई क़ीमत नहीं समझी जो पता नहीं, उस वक़्त अपने आपे में भी था या नहीं। आज तक पता नहीं चला है कि वह कौन था, कहाँ से आया था, उसका धर्म क्या था और उसके आगे-पीछे कोई है या नहीं। अब किसे क्या करना है जानकर ? चुनाव तो हो गए।

उस वक़्त भी पंजाब के भूतपूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ही इस भीड़ द्वारा पीटकर की गई हत्या (मॉब लिंचिंग) की निंदा की थीबाक़ी किसी भारतीय राजनेता ने नहीं। क्रिकेटर से टीवी के विदूषक और उससे नेता बने एक महानुभाव (जो अब ख़ुद जेल में बैठे हैं) ने तो यहाँ तक कह दिया था कि ऐसे अपराध करने वालों को सार्वजनिक रूप से फाँसी दी जानी चाहिए। तथाकथित बेअदबी या ईशनिंदा (blasphemy) के ऐसे प्रकरण कट्टरपंथी एवं धर्मांध देशों में होते रहते हैं क्योंकि वहाँ की बहुसंख्यक  जनता के धर्म के आधार पर शासन करने वाले राजनेता ऐसे विधि-विधान बनाते हैं जिनका उपयोग प्रायः वहाँ के धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने के निमित्त ही होता है। पाकिस्तान ऐसे देशों (तथा उनमें लागू ऐसे कानूनों) का एक ज्वलंत उदाहरण है जहाँ इस दिशा में सुधार का प्रयास करने के कारण पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की एक धर्मांध व्यक्ति ने हत्या कर दी थी। कुछ समय पूर्व बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के पंडाल में क़ुरान शरीफ़ की प्रति रखने का आरोप लगाकर कट्टरपंथियों ने वहाँ के धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा आरंभ की थी जिस पर शीघ्र ही नियंत्रण पा लिया गया क्योंकि सौभाग्यवश वहाँ शासन एक मानवतावादी एवं उदार विचारों वाली महिला (बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख़ मुजीब-उर-रहमान की पुत्री) शेख़ हसीना वाजेद के हाथ में है। ऐसे झूठ एवं निहित स्वार्थ पर आधारित काम धर्म के नाम पर हमारे सनातन मानवीय मूल्यों पर आधारित राष्ट्र में भी हों तो हममें एवं धर्मांधता पर चलने वाले देशों में क्या अंतर रह जाएगा ?

अपने होश-ओ-हवास में कौन ऐसा है जो बहुसंख्यक भीड़ के हाथों मरना या उत्पीड़ित होना चाहेगा ? कौन ऐसा ग़ैर-मुस्लिम व्यक्ति होगा जो किसी मुस्लिम बहुल देश में क़ुरान या पैग़म्बर का अपमान करेगा ? कौन ऐसा ग़ैर-हिंदू व्यक्ति होगा जो कि भारत में किसी भीड़ भरे मंदिर या हिंदू धार्मिक आयोजन के मध्य में जाकर हिंदू देवताओं या आस्थाओं को अपमानित करने का दुस्साहस करेगा ? कौन ऐसा ग़ैर-सिख व्यक्ति होगा जो कि सिख श्रद्धालुओं की भीड़ से भरे हरमंदिर साहब में जाकर वाहेगुरू या ग्रंथ साहब का अपमान करने की गंभीर भूल करेगा ? मरना या देश के कानून के तहत गिरफ़्तार होकर लम्बी क़ैद की सज़ा पाना कौन चाहता है ? कोई समझदार और दुनियादार बालिग़ शख़्स ऐसा नहीं कर सकता। और करे भी तो उस पर कार्रवाई करने के लिए कानून-व्यवस्था है। ऐसे व्यक्ति की मानसिक स्थिति की जाँच भी होनी चाहिए जिससे यह पता लगे कि कहीं वह अर्द्ध-विक्षिप्त अथवा अल्पविकसित मानस वाला व्यक्ति तो नहीं है। क्या देश में भीड़ को अपनी मनमानी का इंसाफ़ करने की इजाज़त दे दी जाए और जंगल का कानून लागू कर दिया जाए ? जिस घटना को आधार बनाकर मैं यह लेख लिख रहा हूँ, वैसी ही घटना चौबीस घंटे के अंतराल के भीतर ही कपूरथला में भी हुई थी जिसमें गुरूद्वारे में एक युवक पर पवित्र 'निशान साहिब' के अपमान का आरोप लगाकर भीड़ ने उसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। बाद में पुलिस ने यह वक्तव्य दिया कि वह 'निशान साहिब' का अपमान नहीं कर रहा था बल्कि चोरी करने का प्रयास कर रहा था। यदि पुलिस के इस आधिकारिक वक्तव्य को मान भी लिया जाए तो भी क्या भीड़ को उसे जान से मार डालने का अनुज्ञापत्र प्राप्त हो गया था ? 

घटनाएं हुईं, भुला दी गईं। बस इतनी ही क़ीमत है अब हमारे मुल्क में इंसानी जान की । हत्यारे आज़ाद घूम रहे हैं। मरने वाले गुमनाम लोगों के ख़िलाफ़ बेमक़सद मामले दर्ज़ होकर पुलिस की फ़ाइलों में बंद हो गए हैं। मारने वाले बेख़ौफ़ हैं। साफ़ तौर पर टीवी कैमरों के सामने हत्या करने के बाद भी न उन्हें पकड़ा गया, न उनके विरूद्ध पुलिस ने कोई मामला दर्ज़ किया, न हमारे वोटों के भूखे नेताओं और उनके दलों ने इस बाबत कुछ कहा। अब यदि अवसर मिलने पर वे अपने इस कुकृत्य की पुनरावृत्ति कर दें तो क्या आश्चर्य क्योंकि यह बात तो उनके मन में स्थान बना चुकी है कि यदि अपराध धर्म के नाम पर करें तो उनका कुछ बिगड़ने वाला नहीं। एक ज़माने में महज़ अख़बार में छपी ऐसी ख़बरों को जनहित याचिका मानकर हमारे उच्च न्यायालयों के जज उनका संज्ञान लेते थे एवं समुचित जाँच और कार्रवाई का आदेश दे देते थे। अब तो ...। क्या कहूँ ? 

लेकिन क्या जनमानस भी तथा सुशिक्षित एवं संतुलित मस्तिष्क से विचार करने वाले जागरूक नागरिक भी धर्मांधता के साँचे में ऐसे ढल गए हैं कि किसी को ऐसी बातों से कोई अंतर नहीं पड़ता ? सम्भवतः (और दुर्भाग्यवश) ऐसा ही है। मरने वाले मर गए। उनके होते-सोते उनकी मौत के बारे में जानकर भी शायद इसलिए सामने नहीं आए कि कहीं उन्मादी भीड़ और अंधा कानून उन्हें भी अपना शिकार न बना ले। मैंने इस लेख को लिखने की प्रक्रिया अनेक दिवस पूर्व आरंभ की थी। देख रहा हूँ कि तब से अब तक ही दरिया में बहुत पानी बह गया है और ऐसे ही कुछ अलग मगर दिल को चीर देने वाले वाक़ये और हो गए हैं। 

महाकवि कालिदास द्वारा रचित महाकाव्य 'कुमारसम्भव' में एक श्लोक की एक पंक्ति है - 'शरीरमाद्यम् खलु धर्मसाधनम्' अर्थात् शरीर निश्चय ही धर्म के पालन का प्रथम साधन है। अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान का ध्येय वाक्य भी यही है। यह आदर्श-वाक्य शरीर को निरोग एवं स्वस्थ रखने पर बल देने हेतु उद्धृत किया जाता है किन्तु इसे एक अन्य कोण से देखने पर यही आदर्श-वाक्य हमारे समक्ष यह भी स्पष्ट करता है कि हमारी यह देह धर्म के पालन हेतु ही है (अधर्म के पालन हेतु नहीं)। अब धर्म किसे कहें ? मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं - धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह: धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्। किसी निर्दोष के प्राण ले लेना अथवा उस पर अत्याचार करना इन दस लक्षणों में कहाँ स्थित है ? कहीं नहीं। इनमें तो क्रोध के परित्याग को भी सम्मिलित किया गया है। 

अतः धर्म के नाम पर अधर्म ही करते हैं वे लोग जो या तो स्वयं अपनी विवेक-बुद्धि खो चुके हैं अथवा अपने किसी निहित स्वार्थ की सिद्धि करने में लगे हैं। भारत महान इसीलिए बना तथा सम्पूर्ण विश्व में उसने प्रतिष्ठा इसीलिए अर्जित की क्योंकि इसके अधिसंख्य नागरिक धर्मांध देशों के नागरिकों की भांति न बनकर उदार एवं विवेकशील बने। हमने धर्म को सदाचरण का ही पर्याय माना। अब जो हो रहा है, वह इस देश का दुर्भाग्य ही है। मेरे विचारों के निकट तो फ़िल्म 'राम तेरे कितने नाम' (१९८५) का यह गीत ही है - 'इंसानियत ही सबसे पहला धर्म है इंसान का'। कम-से-कम मेरा धर्म तो यही है। 

पुरानी श्वेत-श्याम फ़िल्म 'दीदी' (१९५) का गीत है - 'बच्चों तुम तक़दीर हो कल के हिन्दुस्तान की'। अपनी इस लम्बी हो चुकी बात को मैं इसी गीत की इन पंक्तियों के साथ विराम देता हूँ - 

दीन-धरम के नाम पे कोई बीज फूट का बोए ना 
जो सदियों के बाद मिली है, वो आज़ादी खोएं ना 
हर मज़हब से ऊँची है क़ीमत इन्सानी जान की 

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शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन

संसार का सबसे बड़ा एवं सबसे प्राचीन रहस्य (जब से मानव-प्रजाति अस्तित्व में आई है) है - स्त्रीपुरुष का पारस्परिक प्रेम। यह रहस्य सनातन है कि किसी को किसी से प्रेम क्यों होता है। मेरा मानना है कि इस मुक़म्मल कायनात में बिना वजह कोई बात नहीं होती। इसलिए किसी को किसी से प्यार होने के पीछे भी कोई वजह होनी ही चाहिए। मगर उस वजह को ढूंढा नहीं जा सकता। राज़-ए-मुहब्बत एक ऐसा राज़ है जिसका ख़ुलासा शायद रहती दुनिया तक न हो सके। किसी औरत को किसी मर्द से या किसी मर्द को किसी औरत से प्यार क्यों होता है, यह सवाल शायद हमेशा सवाल ही रहे - एक ऐसा सवाल जिसके जवाब तक किसी इंसान की पहुँच मुमकिन नहीं। चाहे इसे इश्क़ कहें या मुहब्बत या फिर कुछ और; प्यार एक ऐसी शय है जिसके मुताल्लिक जितना कहा जाए, कम ही लगता है। आज मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि मैंने अपने कितने ही लेखों में इस विषय को छुआ है, इस पर बहुत कुछ अभिव्यक्त किया है, यथा  'प्रेम की जटिल गुत्थी', 'फ़लसफ़ा प्यार का', 'प्यार ही नहीं काम भी पूजा है', 'गोपिकाओं का निश्छल प्रेम', 'सेल्यूलॉइड पर लिखी दर्दभरी कविता', 'शर्तों पर प्रेम?', 'काग़ज़ की नाव', 'प्रमोद' आदि। फिर भी लगता है कि अभी और भी लिखा जा सकता है, बहुत कुछ और कहा जा सकता है। आज भी कहना है - एक हिन्दी फ़िल्म की समीक्षा करने के बहाने। 

मुम्बई के बांद्रा (पश्चिम) उपनगर में एक स्थान है - जॉगर्स पार्क। यह एक रमणीक उपवन है जिसमें एक भ्रमण-पथ (जॉगिंग ट्रैक) भी है। यह न केवल एक पर्यटन स्थल है वरन यहाँ स्थानीय नागरिक भी प्रातः काल घूमने अथवा धीमे-धीमे दौड़ने (जॉगिंग करने) के निमित्त आते हैं। इसी स्थान को कथानक के प्रारम्भ का आधार बनाकर एवं इसी को शीर्षक के रूप में लेकर एक हिन्दी फ़िल्म बनाई गई थी - 'जॉगर्स पार्क' (२००३)। फ़िल्म के निर्माता सुभाष घई द्वारा लिखी गई इस कथा के दो प्रमुख पात्र जॉगर्स पार्क में ही एकदूसरे से परिचित होते हैं जिसके उपरांत आरम्भ होता है उनके मध्य एक आत्मीय संबंध जो कि कथानक का केन्द्र-बिन्दु है। 

जॉगर्स पार्क में अकस्मात् एकदूसरे के सम्पर्क में आने वाले ये दो व्यक्ति हैं - पैंसठ वर्षीय सेवानिवृत्त न्यायाधीश ज्योतिन प्रसाद चटर्जी (विक्टर बनर्जी) जिनका भरापूरा परिवार है एवं बत्तीस वर्षीया कामकाजी अविवाहित युवती जेनी सूरतवाला (पेरिज़ाद ज़ोराबियन)। जज साहब को इस बात का अभिमान है कि उन्होंने जीवन भर सम्पूर्ण सत्यनिष्ठा के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए न्याय का संरक्षण एवं पोषण किया तथा कभी अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया। लेकिन एक हक़ीक़त यह भी है कि वे ज़िन्दगी भर कानून की किताबों एवं मुक़दमों से बाहर निकले ही नहीं। घरवालों ने शादी कर दी तो बीवी (आभा धुलिया) के साथ निबाह लिया, बेटे-बेटी हुए तो एक आम बाप की तरह उनकी परवरिश कर दी, बेटे की भी शादी कर दी और एक मासूम पोती के दादा बन गए। ज़िन्दगी में कुछ ऐसा हुआ ही नहीं जिसकी कोई कहानी बन सकती हो। 

दूसरी ओर जेनी ने उनसे आधी उम्र की होने के बावजूद उनसे ज़्यादा दुनिया देख ली है, ज़माने भर की ठोकरें खा ली हैं और ज़िन्दगी की तल्ख़ हक़ीक़त से वह उनसे कहीं बेहतर वाक़िफ़ है। उसने ज़िन्दगी को भी और ज़िन्दगी में टकराने वाले लोगों को भी इतने रंग बदलते हुए देखा है कि अब वह किसी पर भी ऐतबार नहीं कर पाती। उसने कई नौकरियां बदली हैं, रोज़ीरोटी की ख़ातिर कई काम किए हैं और हालफ़िलहाल वह एक होटल से जुड़ी रहकर ईवेंट मैनेजमेंट करती है। वह जज साहब के एक भाषण को सुनकर उनसे बहुत प्रभावित हुई है तथा जॉगर्स पार्क में उनसे परिचय होने पर उसे लगने लगता है कि वे उसके सच्चे मित्र सिद्ध हो सकते हैं - ऐसे मित्र जिन पर वह नेत्र मूंदकर विश्वास कर सकती है। 

और दोस्ती हो जाती है उनकी। जज साहब जेनी की एक सम्पत्ति से सम्बंधित कानूनी विवाद में सहायता करते हैं। मित्रता प्रगाढ़ होती जाती है। जेनी के माध्यम से जज साहब युवा पीढ़ी के उस संसार को देखते हैं जिससे वे अब तक अपरिचित थे। एक ग़ज़ल गाने वाला युवक (ख़ालिद सिद्दीक़ी) जेनी को चाहता है लेकिन जेनी ने उसके प्रेम को स्वीकार नहीं किया है। वह तो उम्र के फ़ासले के बावजूद जज साहब की ओर खिंची चली जा रही है। उसे लग रहा है कि उनके रूप में उसे एक ऐसा इंसान मिल गया है जो उसे समझता है। उधर जज साहब को महसूस होने लगता है कि जिस प्यार के मुद्दे पर वे कभी नई पीढ़ी का मज़ाक़ उड़ाया करते थे, वह प्यार ख़ुद उन्हें हो गया है - जेनी से। वे एक मनोचिकित्सक से परामर्श करते हैं कि ढलती आयु में इस प्रकार का प्रेम हो जाना क्या अस्वाभाविक नहीं तो उन्हें वह विशेषज्ञ यही बताता है कि इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं। 

कहते हैं इश्क़ और मुश्क़ छुपाए नहीं छुपते। देरसवेर दुनिया को ख़बर लग ही जाती है। अब इस रिश्ते का क्या अंजाम हो सकता है ? कहते हैं; वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा। लेकिन क्या छोड़ देने से ऐसे अफ़साने दफ़न हो जाते हैं ? नहीं होते। नहीं हो सकते। समंदर की लहरें रेत पर बनाए गए घरों को बहाकर ले जाती हैं लेकिन उनके निशानात नहीं मिटा पातीं। सब कुछ ख़त्म हो जाने के बाद भी वो लम्हे ज़िन्दा रहते हैं जो एक साथ जी लिए गए हैं। यादें बाक़ी रह जाती हैं जिनके दरिया में प्यार करने वाले और प्यार पाने वाले ताज़िन्दगी डूबते-उतराते हैं। यादों के खंडहर हमेशा मौजूद रहते हैं जिनमें मन बरबस ही घूमने लगता है। यादों से बचकर कोई कहाँ जा सकता है ? अगर ज़िन्दगी से यादों को निकाल दिया जाए तो उसमें रहेगा ही क्या ? 

बहरहाल जज साहब के अहसानमंद एक पत्रकार (मनोज जोशी) के कारण जज साहब और जेनी का रिश्ता स्कैंडल की सूरत में तो लोगों के सामने नहीं आ पाता मगर उनकी बेटी (दिव्या दत्ता) पर यह भेद खुल जाता है। अब बेटी अपने बाप से साफ़ कहती है कि वे चाहें तो अपने इस रिश्ते को क़ायम रखें; जब इतनी ज़िन्दगी उनकी वजह से सर उठाकर जी है तो बाक़ी की ज़िन्दगी उनकी ख़्वाहिशों की ख़ातिर सर झुकाकर भी जी ली जाएगी। लेकिन क्या जज साहब ऐसा कर सकते हैं ? वे अपने बेटे को उसके एक अफ़ेयर के लिए बुरी तरह फटकार कर साफ़ कह चुके हैं कि परिवार की इज़्ज़त सबसे ऊपर होती है। अब जब वे जान गए हैं कि पचास साल में कमाई गई इज़्ज़त पचास सैकंड में धूल में मिल सकती है तो क्या वे मुहब्बत की इस बाज़ी को खेलने और इस इज़्ज़त को दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं ?

नतीजा वही निकलता है जो दुनियादारी के हिसाब से निकलना लाज़िमी होता है। जज साहब को जेनी से बिछुड़ना पड़ता है। और यही ठीक भी है क्योंकि लड़की चाहे ख़ुदमुख़्तार हो और प्यार किसी से भी कर ले, उसे शादी और अपना परिवार तो हर हाल में चाहिए। प्रेम अनमोल होता है पर समाज में जीने वाली नारी को सामाजिक सुरक्षा व सम्मान भी चाहिए, मातृत्व का सुख भी चाहिए। यह हर औरत का जायज़ हक़ है और जो उसे यह न दे सके, उसे उसकी ज़िन्दगी से निकल ही जाना चाहिए। 

कुछ साल बाद ! अचानक एक हवाई अड्डे पर जज साहब जेनी के रूबरू हो जाते हैं। लेकिन वह अकेली नहीं है। साथ में उसका पति है। उसका नन्हा बालक है। चंद पलों की यह मुलाक़ात बता देती है कि जेनी मोड़ काटकर ज़िन्दगी की राह में आगे बढ़ गई है। पर क्या जज साहब भी बढ़ पाए हैं ? या फिर प्यार का काँटा आज भी उनके दिल में धंसा है ? 

स्वर्गीय अनंत बालानी ने फ़िल्म का निर्देशन प्रशंसनीय ढंग से किया है (उनका फ़िल्म के प्रदर्शन से कुछ दिवस पूर्व ही निधन हो गया था)। कथा तो प्रत्यक्षतः छोटी-सी ही है लेकिन पटकथा इस ढंग से लिखी गई है कि एक के बाद एक घटनाएं घटती चली जाती हैं, भावनाओं से ओतप्रोत कथा में मोड़ और घुमाव आते चले जाते हैं और दर्शक आख़िर तक बंधे रहते हैं। किसी भी स्थान पर फ़िल्म ऊबने नहीं देती। एक छोटी-सी कहानी को इस क़दर दिलचस्प तरीक़े से पेश करना बहुत बड़ी बात है। 

फ़िल्म के पात्र फ़िल्मी नहीं लगते, हाड़-मांस के बने जीते-जागते इंसान लगते हैं। प्यार में बड़ी से बड़ी उम्र का इंसान बच्चे जैसा व्यवहार करने लगता है और जिसे वह चाहता है, उस पर हक़ जताने लगता है (पज़ेसिव होने लगता है)। यह तथ्य फ़िल्म में अत्यंत रोचक ढंग से रेखांकित किया गया है। फिर बात यह भी तो है कि वो इश्क़ ही क्या जिसमें जुनून न हो ?

फ़िल्म के लेखक एवं दिग्दर्शक ने दोनों प्रमुख पात्रों को पूरी गरिमा एवं आदर के साथ प्रस्तुत किया है एवं उनके व्यक्तित्व में कहीं पर भी हल्कापन नहीं दर्शाया है। केवल अल्हड़ व्यक्ति ही तो प्रेम नहीं करते, परिपक्व व्यक्ति भी तो कर सकते हैं और करते हैं। मुझे इस तथ्य ने बहुत प्रभावित किया कि एक अनजाने-से रिश्ते में बंध गए दोनों ही व्यक्ति (पुरुष भी, स्त्री भी) एकदूसरे का बहुत सम्मान करते हैं। मेरे अपने विचार में भी पारस्परिक सम्मान का स्थान प्रेम से पूर्व आता है। आप उसी को प्रेम कर सकते हैं जिसका सम्मान भी करते हों। 

संगीत पक्ष में क़ाबिल-ए-तारीफ़ सिर्फ़ स्वर्गीय जगजीत सिंह जी की गाई हुई ग़ज़ल है - 'बड़ी नाज़ुक है ये मंज़िल,  मोहब्बत का सफ़र है; धड़क आहिस्ता से ऐ दिल, मोहब्बत का सफ़र है'। इस ग़ज़ल का यह शेर फ़िल्म की कहानी पर एकदम सटीक बैठता है‌ - 'कोई सुन ले न ये किस्सा, बहुत डर लगता है; मगर डरने से क्या हासिल, मोहब्बत का सफ़र है'। तकनीकी रूप से भी फ़िल्म ठीक ही है। शोर कुछ कम होता तो बेहतर रहता। अभिनय पक्ष अत्यंत सबल है। जज साहब की पोती के रूप में (बाल कलाकार) भावना रूपारेल ने शानदार काम किया है। अन्य सहायक पात्रों में विशेष उल्लेख जज साहब की पुत्री की भूमिका में दिव्या दत्ता का किया जा सकता है। वैसे सभी कलाकारों ने अपने चरित्रों के साथ न्याय किया है। परंतु यह फ़िल्म वस्तुतः इसके दोनों मुख्य पात्रों के कंधों पर ही टिकी है तथा दोनों ने ही अपनी-अपनी भूमिकाओं में प्राण फूंक दिए हैं। आयु का बहुत अंतर होने पर भी विक्टर बनर्जी तथा पेरिज़ाद ज़ोराबियन ने रजतपट पर प्रशंसनीय संगति प्रस्तुत की है। दोनों ने ही अपने-अपने किरदारों के जज़्बात को बाख़ूबी उभारा है। कुल मिलाकर यह एक साफ़-सुथरी और देखने लायक़ फ़िल्म है। 

फ़िल्म की बात तो हो गई। दुनियावी सवाल यह है कि क्या ऐसे रिश्ते जो शादी या हमेशा के साथ में न बदल सकें, बनाए जाने चाहिए। जवाब यह है कि जज़्बाती रिश्ते बनाए नहीं जाते, अपने आप बन जाते हैं। जब कोई अच्छा लगने लगता (या लगती) है तो उससे कन्नी नहीं काटी जा सकती। उमेश अपराधी जी द्वारा रचित एक गीत की एक पंक्ति है - कैसे ठुकरा दूं कि किसी ने जब अपना माना है मुझको ? प्यार सोच-समझकर नहीं किया जा सकता और बार-बार दोहराया गया यह सच वाक़ई एक सच ही है कि प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है। स्वर्गीय जगजीत सिंह जी का गाया हुआ तथा उन्हीं के द्वारा संगीतबद्ध एक गीत है - 'होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो'। इंदीवर जी के लिखे हुए इस अति सुंदर एवं मर्मस्पर्शी गीत की दो पंक्तियां इस प्रकार हैं - न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन। जॉगर्स पार्क के ये प्रेमी (यदि इनके अपरिभाषित संबंध को हम 'प्रेम' का नाम दे दें) भी बस इकदूजे का मन ही देखते हैं, और कुछ नहीं। मैंने ऊपर ही लिखा है कि यह फ़िल्म साफ़सुथरी है। पुरुष और स्त्री में संबंध मन का है, तन की ओर तो कोई संकेत तक नहीं है। संभवतः आत्मिक संबंध (जिन्हें प्लेटोनिक संबंध कहा जाता है) ऐसे ही होते हैं। आजकल 'सोलमेट' शब्द भी बहुत सुनने में आता है जिसका अर्थ ही है - रूह का साथी (जिस्म का नहीं)। 

मगर न तो समाज प्रेमियों के हिसाब से चलता है, न ही दुनिया। अगर दोनों ही अकेले हैं तो वे अपने प्यार के दम पर यकीनन निबाह लेंगे और दुनिया का भी सामना कर लेंगे लेकिन अगर दोनों में से किसी एक का या फिर दोनों ही का पहले से परिवार है तो फिर बिछोह ही उनका मुक़द्दर है। क़ुरबानी देनी ही होगी - अपने प्यार की न सही (क्योंकि वह तो दिलों में हमेशा रहेगा) तो अपने साथ की। और प्यार का दूसरा नाम क़ुरबानी ही तो है। जब तक समाज है, तब तक मर्यादा है और मर्यादा की ख़ातिर प्यार को सदा बलिवेदी पर झुकना ही पड़ा है - चाहे सोलहवीं सदी रही हो या इक्कीसवीं। 

भावनाओं का सागर है यह फ़िल्म जो भावुक व्यक्तियों के लिए ही बनी है पर जिसे वे भी पसंद करेंगे जो भावुक कम हैं, व्यावहारिक अधिक। आदम और हव्वा के ज़माने से ही हम जानते हैं कि विपरीत लिंगी के आकर्षण के मामले में औरत का दिल किसी और तरीक़े से काम करता है, मर्द का किसी और तरीक़े से। मैं तो पुरुष हूँ, स्त्री के मन की थाह लेना मेरे वश की बात नहीं। पर हाँ, पुरुष को स्त्री से क्या चाहिए; इसे मैं 'होठों से छू लो तुम' गीत के ही इस अंतरे के माध्यम से स्पष्ट कर सकता हूँ:

जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा
सब जीता किए मुझसे, मैं हरदम ही हारा 
तुम हार के दिल अपना मेरी जीत अमर कर दो

youtube video link:
https://www.youtube.com/watch?v=v5gIjY_G2-s

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