रविवार, 31 जनवरी 2021

कँवल शर्मा करवाते हैं विनय रात्रा के साथ एक रहस्यभरी यात्रा

एक समय था जब न तो हिंदी में जासूसी उपन्यासों अथवा रहस्यकथाओं को पढ़ने वालों की कोई कमी थी और न ही लिखने वालों और छापने वालों की । ऐसे कथा-साहित्य का बाज़ार बहुत बड़ा था, इसलिए ढेर सारी किताबें लुगदी कागज़ पर छपती थीं और माँग के हिसाब से पठन-सामग्री का इंतज़ाम करने के लिए प्रकाशक बहुत-से लेखकों को मौका देते थे । इसीलिए बहुत-से (वास्तविक नाम वाले भी और छद्म नाम वाले भी) लेखक सक्रिय थे तथा असेम्बली लाइन उत्पादन की तरह दर्ज़नों जासूसी उपन्यास विभिन्न प्रकाशनों के सौजन्य से प्रति माह हिंदी के पाठकों की रहस्य-रोमांच की क्षुधा को तृप्त करने हेतु पुस्तकों की दुकानों पर अवतरित हो जाया करते थे ।

वक़्त बदला और इक्कीसवीं सदी में पाठकों और किताबों, दोनों की ही तादाद घटने से प्रकाशक भी घटे जबकि हिंदी के जासूसी उपन्यास लेखक तो केवल दो ही रह गए – सुरेन्द्र मोहन पाठक और वेद प्रकाश शर्मा । १७ फ़रवरी, २०१७ को वेद प्रकाश शर्मा का असामयिक निधन हो गया जबकि बढ़ती आयु तथा प्रकाशन में लगातार आ रही अड़चनों के कारण सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित नवीन पुस्तकें भी अब कम आ रही हैं । इन वजूहात से कुछ अरसा पहले ऐसा लगने लगा था कि पाठक साहब के बाद हिंदी में जासूसी उपन्यास छपने ही बंद हो जाएंगे । इस निराशाजनक स्थिति में आशा की एक किरण बनकर उभरे हैं एक युवा लेखक - कँवल शर्मा । प्रारम्भ में जेम्स हेडली चेज़ के उपन्यासों के हिंदी अनुवादों के माध्यम से रहस्य-रोमांच के शैदाई हिंदी के पाठकों को अपना तआरूफ़ देने वाले कँवल शर्मा ने अपने पहले मौलिक उपन्यास - वन शॉट’ के द्वारा हिंदी जासूसी उपन्यासों के संसार में पदार्पण किया । कँवल जी का यह प्रथम उपन्यास दो वर्ष पूर्व आया था एवम् इसके उपरांत भी उनके द्वारा रचित कई उपन्यास हिंदी के पाठक समुदाय के समक्ष आ चुके हैं, इसलिए वन शॉट’ की यह समीक्षा निश्चय ही विलम्बित है लेकिन यह उपन्यास मुझे इतना पसंद आया था कि देर से ही सही, इस पर कुछ लिखे बिना मेरा मन नहीं माना ।   


कँवल शर्मा का यह पहला उपन्यास उनके कथा-नायक विनय रात्रा का भी पहला कारनामा है । विनय रात्रा प्रत्यक्षतः एक प्राध्यापक है लेकिन वस्तुतः वह एक गुप्तचर है जो अपने देश अर्थात् भारत के लिए सम्पूर्ण निष्ठा, कुशलता एवम् साहस के साथ काम करते हुए राष्ट्र की सुरक्षा में संलग्न रहता है । उपन्यास की शुरुआत एक तूफ़ानी रात में घनघोर अंधकार और बरसात के माहौल में एक कार से एक लाश को वीराने में फेंके जाने के दृश्य से होती है लेकिन उसके बाद उपन्यास का घटनाक्रम विनय रात्रा के साथ-साथ ही चलता है । देश की धरती से दूर विदेशी धरा पर देश के हित में कार्यरत विनय को स्वदेश लौटकर एक निजी अभियान आरम्भ करना  पड़ता है – अपने भाई रोहन रात्रा की निर्मम हत्या की छानबीन करके हत्यारे तक पहुँचने का अभियान । यह कार्य सरल नहीं है क्योंकि इस कार्य के लिए उसे कोई विभागीय सहायता उपलब्ध नहीं है । यद्यपि निजी सम्बन्धों एवम् मित्रता के आधार पर वह विभाग में अपने सहकर्मी मथुरा प्रसाद का सहयोग प्राप्त कर लेता है, तथापि इस सत्य से वह परिचित है कि अधिकांश कार्य उसे अपने आप ही करना है । उसके लिए अच्छी बात यह होती है कि वह पूरी तरह अकेला नहीं पड़ जाता, राजेश नामक उसका एक मित्र एवम् विभाग में लिपिकीय स्तर का कामकाज देखने वाला युवक इस सिलसिले में उसकी परछाईं की मानिंद उसके साथ रहता है और उसके दर्द को समझते हुए उसकी भरपूर मदद करता है । विनय किस प्रकार विभिन्न लोगों से मिलते हुए और नगर के प्रभावशाली व्यक्तियों से टकराव मोल लेते हुए वास्तविक अपराधियों तक पहुँचता है, यह इस उपन्यास का शेष भाग बताता है ।

कँवल शर्मा ने उपन्यास में विनय रात्रा का प्रवेश ही अत्यंत प्रभावी और स्टाइलिश ढंग  से करवाया है । विनय रात्रा किसी गल्प के नायक की भाँति ही वन शॉट’ के पाठकों के समक्ष अवतरित होता है और उनके दिलों पर अपनी छाप छोड़ देता है । और सही मायनों में नायक तो वही होता है जो दिलों पर छाप छोड़ जाए । इस रूप में विनय रात्रा एक पारम्परिक नायक की मानिंद ही कथानक में आता है और अपनी विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से उसी रूप में उसके अंत तक छाया रहता है । ये गतिविधियां दिमागी दांव-पेच, जासूसी, मारधाड़ और एक्शन के साथ-साथ वतनपरस्ती और इनसानी जज़्बात से भी लबरेज़ रहती हैं । उपन्यास के सारे वाक़यात क़त्ल और उसके राज़ के फ़ाश होने से जुड़े हुए नहीं हैं लेकिन वे नायक को नायक के रूप में स्थापित करने में अपनी भूमिका निभाते हैं और इसीलिए अपनी अहमियत रखते हैं । उपन्यास के संवाद (विशेषतः नायक के संवाद) भी अत्यंत प्रभावशाली हैं जो उपन्यास की गुणवत्ता एवम् मनोरंजन-तत्व को बहुत अधिक बढ़ा देते हैं । लेखक हत्या के रहस्य को अंतिम पृष्ठों तक बनाए रखने में सफल रहा है जो एक उत्तम रहस्यकथा की पहचान है । उपन्यास का अंतिम दृश्य भी अत्यंत रोचक और प्रभावी है जो नायक के कद को और भी ऊंचा उठा देता है । सभी पात्र स्वाभाविक एवम् सजीव हैं तथा नायक के अतिरिक्त अन्य पात्रों को भी उभरने का अवसर मिला है जो इस बात का प्रमाण है कि लेखक ने उपन्यास-लेखन की विधा को भलीभाँति समझा और साधा है ।

उपन्यास में प्रयुक्त हिंदी सरल एवम् बोधगम्य होते हुए भी अपने भाषाई सौंदर्य को आद्योपांत बनाए रखती है (यद्यपि कहीं-कहीं यह प्रयोगधर्मी भी है) । उपन्यास में प्रूफ़-रीडिंग तथा सम्पादन की त्रुटियां हैं जो न होतीं तो यह उपन्यास अधिक सराहना का पात्र होता । कथ्य में कहीं-कहीं कसावट की कमी है लेकिन किसी भी स्थान पर मनोरंजन की कमी नहीं है । उपन्यास किसी कुशल निर्देशक द्वारा निर्मित साफ़-सुथरी बॉलीवुड फ़िल्म सरीखा सम्पूर्ण मनोरंजन प्रदान करता है जिसमें कहीं किसी प्रकार की अश्लीलता अथवा अभद्रता विद्यमान नहीं है । उपन्यास में क़त्ल के रहस्य के अतिरिक्त भी कई मनोरंजक घटक हैं जो पाठक को आदि से अंत तक उपन्यास से चिपकाए रखते हैं तथा समापन के उपरांत उसे संतुष्टि की सुखद अनुभूति होती है । इस उपन्यास को इसे पढ़ने वाले के लिए एक ऐसा रहस्यभरा सफ़र कहा जा सकता है जिसमें मंज़िल अहम तो है लेकिन सफ़र अपने आप में ऐसा दिलचस्प और ख़ुशनुमा है कि उसकी अहमियत भी मंज़िल से कुछ कम नहीं । इसीलिए मंज़िल मिल जाने के बाद भी (यानी रहस्य खुल जाने के बाद भी) ऐसे सफ़र को बार-बार करने का मन करता है । किसी रहस्यकथा की इतनी रिपीट वैल्यू होना उसके रचयिता की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । मैं स्वयम् वन शॉट’ को कई बार पढ़ चुका हूँ और मेरा आंकलन यही है कि जो भी हिंदी पाठक विनय रात्रा के साथ इस रहस्यभरी यात्रा को एक बार कर लेगा, वह इस यात्रा पर पुनः जाना चाहेगा ।

© Copyrights reserved

बुधवार, 27 जनवरी 2021

प्रेम की जटिल गुत्थी

इस कायनात का अगर कोई सबसे बड़ा, सबसे ज़्यादा  उलझा हुआ और सबसे पुराना राज़ है तो वह है औरत और मर्द का प्यार । दो भिन्न लिंगियों का पारस्परिक आकर्षण और फिर मिलन ही सृष्टि की उत्तरजीविता का आधार है । यह न होता तो संसार ही न होता, मानव जाति का कोई इतिहास ही न होता । भिन्न लिंगी के प्रति यह आकर्षण मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों में भी होता है लेकिन मनुष्य के पास क्योंकि एक विकसित मस्तिष्क है और वह अपने प्रेम को शब्दों द्वारा अभिव्यक्त कर सकता है, इसलिए उसी के प्रेम की चर्चा (उसी के द्वारा) होती रहती है, होती आ रही है सदियों से । चूंकि मानव-जाति में यह प्रेम किसी विशिष्ट को किसी विशिष्ट से ही होता है, इसलिए यह प्रश्न सनातन काल से चला आ रहा है और अभी तक अनुत्तरित है कि किसी को किसी से प्रेम क्यों होता है, कैसे होता है । क्यों कोई ख़ास किसी ख़ास को ही अपना दिल दे बैठता है या दिल दे बैठती है, किसी और को क्यों नहीं ? प्रेम की यह गुत्थी बड़ी जटिल है । आज तक तो सुलझी नहीं, आगे भी कभी सुलझ सकेगी या नहीं, कौन जाने  

सामाजिक व्यवस्थाओं के विकास एवं परिवार की स्थापना हेतु स्त्री-पुरुष के विवाह की संस्था के उद्भव ने इस अत्यंत प्राकृतिक रूप से अंकुरित होने वाली भावना के संबंध में व्यक्तिगत स्वातंत्र्य को विभिन्न बंधनों में जकड़ दिया । प्रेम पर तो प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता था (और है) लेकिन प्रेम की परिणति प्रेमियों के विवाह में होना कठिन से कठिनतर होता चला गया क्योंकि विवाह में व्यक्ति की नहीं बल्कि उसके माता-पिता, परिवार और समुदाय की इच्छा सर्वोपरि बन गई । पितृसत्तात्मक समाजों में स्त्री के लिए तो जिससे प्रेम हो, उससे विवाह करना लगभग असम्भव ही हो गया क्योंकि उससे तो उसके मन की बात तक पूछे बिना उसका विवाह तय कर दिया जाने लगा और जैसे किसी गाय को खूंटे से बांध दिया जाता है, उसी प्रकार उसे भी बाध्य किया जाने लगा कि जिस व्यक्ति से उसका विवाह उसके परिजनों द्वारा कर दिया जाए, उसी के साथ चली जाए और अपनी इच्छाओं और भावनाओं को भुलाकर आजीवन एक विवाहिता के निर्धारित कर्तव्य निभाती जाए । 

ऐसे में स्वभावत: प्रेम पर पहरे लगाना भी समाज को आवश्यक लगने लगा और वर्जनाओं के कारण प्रेम एक वर्जित फल बन गया जिसका आकर्षण सामान्य से अधिक ही होता है । अत: प्रेम न केवल चारों दिशाओं में फैलने लगा बल्कि कवियों, शायरों और कथाकारों के शब्दों में भी ढलने लगा । कई दुखांत प्रेमकथाएं तो अमर ही हो गईं जो कि सदियों से सुनाई जाती आ रही हैं । आधुनिक साहित्य और सिनेमा में भी सबसे अधिक लोकप्रिय विधा प्रेमकथा ही बन गई क्योंकि जो काम चाहकर भी वास्तविक जीवन में न कर सकें, उसे पुस्तक में पढ़ना और परदे पर देखना लोगों को बहुत भाने लगा । विभिन्न परिवेशों में, विभिन्न आयुवर्ग के पात्रों के साथ प्रेमकथाएं रचने का जो सिलसिला एक बार शुरू हुआ, वह फिर चिरस्थायी दौर ही बन गया । अन्य भाषाओं की तरह हिंदी में भी सबसे अधिक प्रेमकथाएं ही रची जाती हैं । प्रेमकथाओं की इस शृंखला की नवीनतम कड़ी है नवोदित लेखिका अंचल सक्सेना का उपन्यास - 'विश्वास और मैं' । यह उपन्यास आत्मकथ्यात्मक शैली में लिखा गया है अर्थात् प्रेम करने वाली लड़की विश्वास नामक लड़के के साथ अपने संबंध की कहानी अपनी ज़ुबानी बयान करती है और पूरा घटनाक्रम 'मैं' के साथ-साथ चलता है ।

 


पंद्रह-सोलह वर्ष से इक्कीस-बाईस वर्ष के बीच की कच्ची-पक्की आयु कुछ ऐसी होती है कि मन हवा में उड़ने लगता है, अंतस में कोमल भावनाएं बारंबार करवटें बदलती हैं और रह-रहकर जी चाहता है कि किसी को अपना बना लो या किसी के हो जाओ । 'विश्वास और मैं' की नायिका (मैं) भी इसी दौर से गुज़र रही है । स्कूल से निकलकर युवा जब कॉलेज में पहुँचते हैं तो एक किस्म की आज़ादी का एहसास उनके रोम-रोम में समा जाता है । सह-शिक्षा के कारण लड़के-लड़कियों को घुलने-मिलने का अवसर मिलता है, दोस्तियां होती हैं जिनमें से कुछ आगे बढ़कर प्रेम तक जा पहुँचती हैं । कथानायिका और विश्वास के साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही होता है । फ़ोन पर कॉल के ज़रिये ज़बरदस्ती पैदा की गई दोस्ती (या परिचय) वास्तविक दोस्ती में बदलती है और फिर वक़्त के साथ-साथ आगे बढ़ते हुए कम-से-कम नायिका के मन में यह चाह पैदा करती है कि वह जीवन भर के साथ में बदल जाए पर ...  

इस 'पर' के आगे बहुत कुछ है जिसे लेखिका ने 'अधूरी कहानी का पूरा रिश्ता' नाम दिया है । जब लेखिका ने अपनी लेखनी को विराम दिया है, तब तक इस प्रेमी-युगल के प्रथम परिचय को तेरह वर्ष बीत चुके हैं, जीवन रूपी सरिता में बहुत जल बह चुका है, दोनों ही के जीवन कई कठोर परीक्षाओं का सामना कर चुके हैं और अब कम-से-कम 'मैं' को जीवन को हलके रूप में लेना स्वीकार्य नहीं है । चाहे विश्वास अभी तक परिपक्व न हुआ हो (कई लोग वास्तव में ही जीवन भर परिपक्व नहीं हो पाते) लेकिन वह परिपक्व हो चुकी है और अपने जीवन को किसी के अनिश्चय का दास नहीं बनने दे सकती । लेकिन अपने मन में गहरी जड़ें जमा चुके प्रेम को भी वह उखाड़ कर नहीं फेंक सकती । प्रेम करने वाले साथ रहें या न रहें, प्रेम तो रहेगा । 

फिक्शन लेखन को लेखक की प्रकृति के दृष्टिकोण से दो श्रेणियों में रखा जा सकता है : व्यावसायिक और शौक़िया (अमेचर) । प्राय: नवोदित लेखक जिनकी आजीविका का स्रोत लेखन नहीं, कुछ और होता है, शौक़िया या अमेचर ही होते हैं । स्वयं एक उपन्यास लिख चुकने के कारण मैं यह बात निजी अनुभव से जानता हूँ कि ऐसे लेखक कम-से-कम अपनी प्रारंभिक रचनाएं दिल से लिखते हैं, वह लिखते हैं जो उन्होंने स्वयं अनुभव किया है और जिससे वे स्वयं अपने जीवन में दो-चार हुए हैं । उनके अपने जज़्बात और तजुरबे ही शब्दों में ढलकर किस्से-कहानियों की शक़्ल अख़्तियार कर लेते हैं । चूंकि उनकी ये रचनाएं दिल से लिखी गई होती हैं, इसीलिए ईमानदार होती हैं । 'विश्वास और मैं' भी अपने अधिकांश भाग में दिल से लिखी गई लगती है, इसीलिए लेखिका की अपनी लेखनी के प्रति ईमानदारी पाठक के दिल को छू जाती है । विश्वास और 'मैं' के पारस्परिक संबंध, भावनाओं एवं व्यवहार के अतिरिक्त भारतीय न्यायालयों के भीतर की (अप्रिय) वास्तविकता का चित्रण भी अत्यंत स्वाभाविक है और लेखिका के निजी अनुभवों पर आधारित होने के कारण सत्यनिष्ठा से ओतप्रोत है (लेखिका की आगामी कृति - 'मेरी कचहरी' की थीम यही है) । 

लेकिन शायद उपन्यास के कथानक को आगे बढ़ाने के लिए लेखिका ने कहीं-न-कहीं दिल की जगह दिमाग़ से घटनाएं जोड़ी हैं जिनके कारण उपन्यास की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है । विश्वास की भाभी की आत्महत्या की घटना इसका एक उदाहरण है जिसकी पृष्ठभूमि अथवा कारण का पता अंत तक नहीं चलता । कथानायिका (मैं) और विश्वास के परिवार वाले भी हाड़-मांस-रक्त से बने वास्तविक लोग कम और कैरीकेचर अधिक लगते हैं । जिस तरह से कथानायिका के परिजन बिना उसकी भावनाओं को जानने का प्रयास किए उसका विवाह एक दहेज-लोलुप परिवार में (भारी दहेज देकर) कर देते हैं, वह तो उनकी विवेकशीलता पर ही एक प्रश्नचिह्न लगाता है (और नायिका की भी जो जीवन का इतना महत्वपूर्ण निर्णय केवल इसलिए कर लेती है कि विश्वास उससे विवाह करने से पीछे हट गया) । कथानायिका के ससुराल वाले (उसके पति सहित) भी फ़िल्मी खलनायक ही लगते हैं ।  

मैंने एक बार कहीं पढ़ा था - 'कोई नहीं समझ सकता कि औरत जब किसी (मर्द) से प्यार करती है तो वह उसमें क्या देखती है' । वाक़ई कोई नहीं समझ सकता । इसलिए कथानायिका का विश्वास से प्रेम करना अस्वाभाविक नहीं लगता है, अलबत्ता अपने जीवन और विश्वास के साथ अपने संबंध को लेकर एक परिपक्व निर्णय लेने में उसके द्वारा किया गया असाधारण विलम्ब कुछ-कुछ अस्वाभाविक लगता है । वह परिपक्वता के वांछित स्तर पर उपन्यास के अंतिम दो अध्यायों में पहुँचती है । अपने आने वाले जीवन में वह विश्वास के अतिरिक्त किसी और पुरुष से प्रेम नहीं कर सकेगी, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता लेकिन जैसा प्रेम उसे विश्वास से रहा (और उपन्यास के अंत में भी है), वैसा प्रेम वह निश्चय ही और किसी से नहीं कर सकेगी क्योंकि प्रथम अनुभूति प्रथम ही होती है, वह फिर नहीं दोहराई जा सकती । 

न केवल उपन्यास की विषय-वस्तु आजकल के उठती हुई आयु के युवाओं से जुड़ी है जिनके जीवन में विपरीत लिंग के व्यक्ति से मित्रता और प्रेम अति-महत्वपूर्ण  मुद्दे हैं, लेखिका ने उपन्यास का ताना-बाना भी ऐसी ही शैली में बुना है जो इस आयु-वर्ग के पाठकों को भाने वाला है । लेकिन इसका परिणाम यह निकला है कि अंतिम दो अध्यायों से पहले के लगभग सभी अध्याय किसी हिंदी टी.वी. धारावाहिक की स्क्रिप्ट जैसे लगते हैं ।  फिर भी इसमें कोई शक़ नहीं कि उपन्यास आद्योपांत रोचक है एवं प्रारंभ से अंत तक पाठक को बांधे रखता है । 

लेखिका ने उपन्यास में कथानायिका के साथ वैवाहिक दुराचार का मुद्दा भी हृदयवेदक रूप में उठाया है । इस संदर्भ में भारतीय न्यायविदों की राय जो भी हो, मानवीय कसौटी पर रखा जाए तो यह निंदनीय (और दंडनीय भी) ही है क्योंकि दुराचार तो दुराचार है चाहे वह विवाह-संस्था के अंतर्गत ही क्यों न हो । लेकिन परिवार वालों द्वारा तय किया गया विवाह करने जा रही युवती यदि अब तक अपरिचित रहे पुरुष के साथ दैहिक-निकटता के लिए मानसिक रूप से तैयार न हो तो बेहतर है कि वह ऐसा विवाह ही न करे । व्यावहारिक दृष्टिकोण तो यही है विशेषत: एक सुशिक्षित तथा आधुनिक युवती के लिए । 

प्रमुखत: एक विशेष आयु-वर्ग के युवाओं को अपील करने वाले इस उपन्यास की भाषा और संवाद वर्तमान पीढ़ी की बोलचाल के अनुरूप ही हैं जो कि उपन्यास के परिवेश के लिहाज़ से सही लगता है । लेकिन नवोदित लेखिका को मेरी सलाह यही है कि वे अपने भाषा-ज्ञान और अभिव्यक्ति, दोनों ही पक्षों में सुधार और परिष्कार करें तथा इस तथ्य को सदा स्मरण रखें कि वे हिंदी की लेखिका हैं, हिंगलिश की नहीं । 

मैंने कुछ वर्षों पूर्व किसी भी कथा के नायक की एक हिंदी उपन्यासकार द्वारा दी गई अग्रलिखित परिभाषा पढ़ी थी : 'नायक वह है जो दिलों पर छाप छोड़ जाए' । इस नज़रिये से 'विश्वास और मैं' में कोई नायक नहीं है (यहाँ नायक में नायिका भी सम्मिलित है) । लेखिका ने 'मैं' द्वारा विश्वास को लिखे गए विस्तृत पत्र के माध्यम से 'प्रेम' और 'प्रेम के भ्रम' के अंतर को सराहनीय ढंग से स्पष्ट किया है । अच्छा यही है कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अध्ययन के साथ-साथ प्रेम की उलझन को भी सुलझाने में लगे युवक-युवती आसक्ति (इनफ़ैचुएशन) और प्रेम (लव) के अंतर को तथा भावी जीवन के लिए सम्बन्धों में प्रतिबद्धता (कमिटमेंट) के महत्व को भली-भांति समझ लें क्योंकि - 

और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा 

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

© Copyrights reserved

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

मानसिक रूप से तृप्त कर देने वाला एक शाब्दिक व्यंजन

बचपन से ही मेरा प्रमुख शौक़ पुस्तकें (तथा पत्र-पत्रिकाएं भी) पढ़ना ही रहा है । मुझे पुस्तकों से बेहतर मित्र कभी नहीं मिला तथा पढ़ने का मेरा यह व्यसन आज भी ज्यों-का-त्यों ही है । पढ़ने के शौक़ ने ही मुझे लिखने के लिए भी प्रेरित किया तथा मैं स्वांतः सुखाय के सिद्धांत पर चलते हुए लिखता रहा क्योंकि मेरा उद्देश्य सदा आत्मसंतोष ही रहा चाहे मेरे लिखे को कोई पढ़े या न पढ़े । मूलतः राजस्थानी होते हुए भी मैंने राजस्थानी साहित्य कम ही पढ़ा (जो कि ठीक नहीं हुआ) । अधिकांशतः मैंने पढ़ना तथा लिखना दो ही भाषाओं में किया - हिन्दी तथा अंगरेज़ी ।

 

दूरदर्शन पर प्रति सप्ताह प्रसारित होने वाली हिन्दी फ़िल्में देखने के चस्के ने मुझे कहानियां तथा उपन्यास पढ़ने की ओर झुकाया । अधिकांश हिन्दी उपन्यास लुगदी साहित्य या पॉकेट बुक के नाम से जाने जाने वाले सस्ते उपन्यास होते थे जिनकी कथाएं बॉलीवुड की कथाओं सरीखी ही होती थीं । रहस्य-रोमांच ने मुझे सदा ही आकर्षित किया है, अतः जासूसी उपन्यास मैंने अधिक पढ़े जिनमें आरम्भ में मेरे पसंदीदा लेखक थे 'कर्नल रंजीत' । बहुत बाद में जाकर मुझे दो तथ्य ज्ञात हुए - एक तो यह कि 'कर्नल रंजीत' एक छद्म नाम था (तथा लुगदी साहित्य के अधिकांश उपन्यासों पर छपे उनके लेखकों के नाम भी छद्म ही होते थे) एवं द्वितीय यह कि हिन्दी के अधिकांश जासूसी उपन्यासों के कथानक विदेशी उपन्यासों के कथानकों से चुराए हुए होते थे ।

 

मेरे बचपन के एक मित्र 'विष्णु मंत्री' एक विशिष्ट लेखक द्वारा लिखे गए जासूसी उपन्यासों के रसिया थे । लेखक का नाम - 'सुरेन्द्र मोहन पाठक' । उनके आग्रह पर एक दिन मैंने उन्हीं के द्वारा दिया गया सुरेन्द्र मोहन पाठक का एक उपन्यास पढ़ा जिसके उपरांत मैं भी पाठक साहब की लेखनी का प्रशंसक बन गया । कालांतर में मैंने पाठक साहब के लिखे हुए अधिकांश उपन्यास पढ़ डाले । मैंने पाया कि कथानक मौलिक हो न हो, पाठक साहब की लेखन-शैली लाजवाब होती थी और यही उनकी लोकप्रियता का प्रमुख कारण था । पाठक साहब कई नायकों की सीरीज़ लिखते थे (और अभी भी लिखते हैं) जिनमें से मेरा पसंदीदा नायक बना एक अख़बारी पत्रकार - 'सुनील कुमार चक्रवर्ती'   इक्कीसवीं सदी में जाकर मैंने सुनील का एक नया उपन्यास पढ़ा जो मुझे इतना पसंद आया कि मैंने उसे न जाने कितनी ही बार पढ़ डाला, फिर भी उसे पढ़ने से मैं कभी थका या ऊबा नहीं । जब-जब भी मैंने उसे फिर से पढ़ा, मुझे उसमें कुछ नई ख़ूबियां मिलीं । ख़ूबियों के मालिक इस हिन्दी उपन्यास का नाम है - 'झांसा' जिसकी अंगरेज़ी में समीक्षा मैं पहले ही लिख चुका हूँ ।

 

'झांसा' सुनील सीरीज़ का एक ऐसा उपन्यास है जिसका मुख्य घटनाक्रम एक छोटे से पर्यटन-स्थल 'सुंदरबन' में घटित होता है जो भारत में स्थित एक काल्पनिक महानगर - राजनगर से लगभग  सत्तर-बहत्तर मील दूर है (इस महानगर तथा इसके आसपास के स्थानों की एक अत्यन्त सजीव कल्पना स्वयं पाठक साहब ने ही की है) । यहाँ रहता है एक सहृदय उद्योगपति रणजीत महाजन तथा उसके दो सच्चे शुभचिंतक - एक तो चौवन वर्ष की आयु में भी कुंवारा और बंजारा प्रवृत्ति का उसका मित्र मनसुख केडिया एवं दूसरी सोफ़िया डोनाटो नाम की एक अधेड़ आयु की गोवानी महिला जो मिसरानी तथा हाउसकीपर का दोहरा दायित्व निभाती है अर्थात् वह महाजन की रसोई भी संभालती है तथा झेरी में स्थित उसके घर की भी देखभाल करती है ।

 

उपन्यास के नायक सुनील के नियोक्ता तथा राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र - 'ब्लास्ट' के स्वामी व प्रधान संपादक श्री बलदेव कृष्ण मलिक महाजन के मित्र हैं तथा वे सुनील को महाजन की सहायता करने का आदेश देते हैं क्योंकि सुनील उनके लिए केवल एक कर्मचारी नहीं है अपितु उनके पुत्र के समान है । महाजन अस्वस्थ है एवं अपनी अस्वस्थता के कारण ही वह न केवल अपनी कंपनी के मुखिया के पद से त्यागपत्र दे चुका है बल्कि अपने राजनगर स्थित आवास को छोड़कर सुंदरबन में रहने चला आया है । उसे वहाँ लाने वाला उसका अभिन्न मित्र केडिया ही है जो उसे उसके आस्तीन के सांप जैसे उन शत्रुओं से बचाना चाहता है जो न केवल उसकी परिश्रमपूर्वक कमाई गई धन-संपत्ति पर कुंडली मारकर बैठे हैं बल्कि उसे कंपनी के साथ धोखाधड़ी के झूठे आरोप में फँसाकर कारागार भेज देना भी चाहते हैं । और ये शत्रु कोई पराये नहीं बल्कि महाजन की दिवंगत धर्मपत्नी वसुंधरा की माता लीलावती तथा भाई भूपेन्द्र हैं जिनके साथ मिले हुए हैं मधुप तोशनीवाल नाम का एक धूर्त वकील एवं मनोज पुरवार नाम का एक ठग ।

 

जब ये सारे बदमाश सुंदरबन में भी महाजन को चैन से नहीं रहने देते और वहाँ पहुँचकर उसकी कोठी में डेरा डाल देते हैं तो केडिया अपने बीमार दोस्त महाजन को कोठी से बाहर लेकिन उससे जुड़े हुए एक कॉटेज में ले जाता है जिसके चारों ओर भीनी-भीनी ख़ुशबू फैला रहे फूलों के पौधों से लदा हुआ एक ख़ूबसूरत बाग़ीचा है । महाजन की सच्ची हितचिंतिका सोफ़िया जो महाजन के केवल एक अनुरोध पर राजनगर में अपना गोवानी रेस्तरां बंद करके उसकी देखभाल के लिए सुंदरबन चली आई थी, उसकी कोठी तथा कॉटेज का सारा कामकाज संभालती है तथा भोजन भी पकाती है जिसमें महाजन के लिए पृथक् रूप से विशिष्ट भोजन बनाना भी सम्मिलित है । सोफ़िया के साथ-साथ वहाँ चले आए हैं उसके पहले पति से जन्मी उसकी पुत्री अलीशा एवं उसका वर्तमान पति फ़्रैंकी डोनाटो जो कि मनोज पुरवार की जुगलबंदी में ठगी करता रहता है तथा दोहरे व्यक्तित्व का शिकार होने का बहाना बनाकर अपने कुकर्मों का दायित्व जॉनी नाम के एक कल्पित व्यक्ति पर डालता रहता है जिसे वह अपनी दूसरी छवि बताता है । महाजन की ठीक से देखभाल के लिए उसके चिकित्सक डॉक्टर पुनीत पाहवा ने एक नर्स भावना सूद को वहीं रहकर उसका ख़याल रखने की ज़िम्मेदारी दी हुई है । यह डॉक्टर-नर्स की जोड़ी अत्यंत कर्तव्यपरायण, सहृदय एवं सेवाभावी है ।

 

चूंकि महाजन को अपने दुश्मनों द्वारा फैलाए गए जाल में फँसकर कानून के शिकंजे में आ जाने का अंदेशा है, अतः वह अपने दोस्त और सुनील के बॉस मलिक साहब से मदद माँगता है । मलिक साहब यह ज़िम्मेदारी अपने चहेते सुनील को देते हैं जो इस बाबत एक तजुर्बेकार और ईमानदार वकील चटर्जी साहब से मशवरा करता है । अपनी वृद्धावस्था तथा रोग के चलते चटर्जी साहब स्वयं तो महाजन से मिलने नहीं जा सकते लेकिन वे अपने स्नेहभाजन सुनील को समुचित मार्गदर्शन देते हैं जिसे लेकर सुनील महाजन से मिलने के लिए सुंदरबन पहुँचता है । वहाँ सुनील महाजन और उसके सच्चे हमदर्दों से तो मिलता ही है और तमाम हालात का जायज़ा लेता है, वह बाकी लोगों को भी ठीक से जानने की कोशिश करता है । उसे यह भी पता चलता है कि अपनी पक्की उम्र में केडिया एक अपने से आधी उम्र की लड़की दीक्षा भटनागर से शादी करने का मंसूबा बना चुका है जबकि महाजन उस लड़की को दुश्मनों की बिछाई हुई साज़िश की बिसात का ही एक मोहरा मानता है ताकि उसके और केडिया के बीच दरार डाली जा सके ।

 

महाजन को तसल्ली देकर राजनगर लौटे सुनील को अगले ही दिन फिर से सुंदरबन जाना पड़ता है क्योंकि उसी रात को न सिर्फ़ ख़ाने में ज़हर मिलने से कोठी के कुछ बाशिंदों की हालत ख़राब होने का वाक़या होता है बल्कि नर्स भावना सूद पर किसी के गोली चलाने की भी वारदात होती है जिससे वह बाल-बाल बचती है । सुनील के साथ उसका हँसमुख मित्र रमाकांत भी जाता है जो राजनगर में 'यूथ क्लब' नाम का एक मनोरंजन प्रदान करने वाला क्लब चलाता है । लेकिन वहाँ भोजन-सामग्री में विष मिलने की घटना पुनः होती है जिसकी चपेट में महाजन, सुनील तथा रमाकांत आ जाते हैं । केडिया अपनी पुरानी जीप से जुड़े हाउस-ट्रेलर में महाजन को लेकर हस्पताल जाता है लेकिन इससे पहले कि वह अपने दोस्त को अंदर ले जाता, कोई उस हाउस-ट्रेलर में घुसकर महाजन को गोली मार देता है । महाजन के मरने के बाद उसकी वसीयत बरामद होती है जिसमें उसने सुनील को अपनी उस वसीयत का एग्ज़ीक्यूटर (लागू करने वाला) बना दिया होता है । वाक़यात के बेहद उलझे हुए सिलसिले में सुनील ख़ुद भी महाजन के शेयर सर्टीफ़िकेट के साथ जालसाज़ी करने के कानूनी फंदे में फँस जाता है । लेकिन आख़िरकार हमारा नायक सुनील न केवल ख़ुद को बचा लेता है बल्कि दुश्मनों की साज़िश का पर्दाफ़ाश करने के साथ-साथ महाजन के हत्यारे को भी बेनक़ाब करके कानून के हवाले कर देता है ।

 

'झांसा' की वाहिद कमज़ोरी मेरी नज़र में यह है कि क्लाइमेक्स में जब क़त्ल का राज़ और क़ातिल की पहचान उजागर होती है तो उसकी कोई बहुत मज़बूत बुनियाद दिखाई नहीं देती और राज़ का खुलना फीका-फीका-सा लगता है । लेकिन बाकी इस उपन्यास में बस ख़ूबियां-ही-ख़ूबियां हैं । आदि से अंत तक रोचक यह उपन्यास न केवल साहित्य के लगभग सभी रसों (हास्य, शृंगार, करूण, रौद्र, भयानक, वीर, शांत, अद्भुत आदि) को अपने में समाहित किए हुए है वरन मनोरंजन के साथ-साथ प्रेरणा भी देता है । जहाँ इसमें डॉक्टर पुनीत पाहवा तथा नर्स भावना सूद की रूमानी कथा है, वहीं अंतिम दृश्य में मनसुख केडिया की वाग्दत्ता दीक्षा भटनागर के मन को भी निर्मल प्रेम-भावनाओं से ओतप्रोत बताते हुए लेखक ने उसके चरित्र को बहुत ऊंचा उठा दिया है ।

 

सुरेन्द्र मोहन पाठक सदा से यही कहते आए हैं कि 'इट टेक्स ऑल काइंड्स ऑव पीपुल टु मेक द वर्ल्ड' अर्थात् संसार सभी प्रकार के लोगों से मिलकर बना है । अपने इस उपन्यास में लेखक ने इस उक्ति को पूरी तरह चरितार्थ कर दिया है । उपन्यास में लालची, मक्कार एवं तिकड़मी पात्र भी हैं तो पूरी तरह से उदात्त पात्र भी, झूठे एवं स्वार्थाधारित संबंध भी हैं तो सच्चा प्रेम भी एवं साथ ही सच्ची मित्रता भी । धनी रणजीत महाजन तथा साधारण आर्थिक स्थिति के मनसुख केडिया की मित्रता कृष्ण-सुदामा की मित्रता सरीखी जान पड़ती है । जहाँ केडिया अपने मित्र के लिए अपने प्राणों तक को दांव पर लगा देने को तत्पर है वहीं महाजन अपने मित्र की सहायता भी इस ढंंग से करता है कि मित्र के स्वाभिमान पर आँच न आए । सोफ़िया डोनाटो का महाजन की नि:स्वार्थ भाव से सेवा करना भी मन को छू लेता है तो सोफ़िया एवं अलीशा के संबंध माता तथा युवा होती पुत्री के मध्य की जटिल स्थिति पर प्रकाश डालते हैं । डॉक्टर पुनीत व नर्स भावना के चरित्र कर्तव्यनिष्ठा एवं संवेदनशीलता के सजीव उदाहरण हैं ।

 

'झांसा' में हँसी की भरपूर ख़ुराक है । सुनील तथा रमाकान्त दोनों ही कभी अन्य पात्रों पर किए गए व्यंग्य एवं कटाक्ष से तो कभी अपने सामान्य वार्तालाप से ही पाठकों को हँसाते रहते हैं । वैसे तो पाठक साहब ने रमाकांत का चरित्र अपने आरंभिक लेखन के दिनों से ही ऐसा गढ़ा है कि रमाकांत की उपस्थिति मात्र ही उपन्यास पढ़ने वाले के लिए हँसी की गारंटी होती है लेकिन इस उपन्यास में तो मानो हास्य की सरिता बहती है । कथानक के प्रवाह के साथ घुला-मिला हास्य पूर्णरूपेण सहज भी लगता है ।

 

'झांसा' कॉरपोरेट जगत की कार्यशैली को भी भलीभाँति प्रदर्शित करता है । कंपनी अधिनियम तथा संबंधित विनियमों की आड़ में निजी हित कैसे साधे जाते हैं तथा किसी से व्यक्तिगत प्रतिशोध कैसे लिया जाता है, इसका यथार्थपरक चित्रण किया गया है जो कि उपन्यास को मनोरंजन में लिपटी एक सूचनाप्रद पुस्तक की श्रेणी में डालता है तथा इसकी गुणवत्ता एवं उपयोगिता को बढ़ाता है ।

 

'झांसा' का कलेवर बहुत अधिक नहीं है लेकिन जितना भी है एक विविधरंगी विस्तृत कैनवास की तरह है जिसमें पात्रों एवं घटनाओं की भरमार है । छोटी कहानी को रबर की तरह नहीं खींचा गया है बल्कि उसे विविध आयाम प्रदान किए गए हैं तथा सार्थक घटनाओं के माध्यम से फैलाया गया है । पात्रों की संख्या बहुत अधिक है लेकिन प्रत्येक पात्र कथानक में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखता है एवं सहज-स्वाभाविक रूप से उभरकर पाठक के समक्ष आता है ।

 

ठग फ़्रैंकी डोनाटो का किरदार 'झांसा' की ख़ास हाईलाइट है । वह एक बेहद दिलचस्प किरदार है जो औरों को बेवक़ूफ़ बनाने के लिए अपनी दोहरी शख़्सियत का नाटक करता है । उसी के माध्यम से इस बात को भी स्थापित किया गया है कि पुरातन वस्तुओं (एंटीक़) के बाज़ार में ठगी किस सीमा तक होती है तथा हो सकती है । रोचक तथ्य यह है कि सुनील न केवल कठिन परिस्थिति में उसकी सहायता करता है वरन उसी से सीखता है कि दुश्मनों को कैसे झांसा देकर बाज़ी अपने हक़ में पलटी जाए ।

 

सुरेंद्र मोहन पाठक सदा से यह कहते आए हैं कि मेरा उपन्यास तभी पढ़ें जब आपको सिनेमा जैसे मनोरंजन की तलाश हो । चाहे मनोरंजक सिनेमा हो अथवा मनोरंजक उपन्यास, उससे किसी कुशल गृहिणी की पाकशाला से निकले ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन की भाँति होने की अपेक्षा की जाती है जिसमें सभी सामग्रियां एवं सभी मसाले उचित मात्रा में मिलाए गए हों - न कोई वस्तु आवश्यकता से कम, न कोई वस्तु आवश्यकता से अधिक । 'झांसा' इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है । केवल तीन दिनों की समयावधि में समाया इसका घटनाक्रम इसे एक ऐसे शाब्दिक व्यंजन का रूप देता है जो इसे पढ़ने वाले को मानसिक रूप से तृप्त कर देता है ।


© Copyrights reserved



शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

फ़लसफ़ा प्यार का

प्यार ! इश्क़ ! मुहब्बत ! आशिक़ी ! आशनाई ! और शुद्ध हिंदी में कहें तो प्रेम ! क्या है इस शय का फ़लसफ़ा क्या है इसका दर्शन क्या है इसका अर्थ कहने की आवश्यकता नहीं कि बात यहाँ स्त्री-पुरुष के उस प्रेम की हो रही है जो आदिकाल से चला आ रहा है और जो सृष्टि का आधार है । नर-मादा प्रणय-संबंध तो पशु-पक्षियों में भी होते हैं जिनसे उनकी प्रजाति उत्तरोत्तर चलती रहती है लेकिन मनुष्यों की बात भिन्न इसलिए है क्योंकि उनके प्रेम में केवल देह ही नहीं भावनाएँ भी सम्मिलित होती हैं । इसलिए एक पुरुष एवं एक नारी जब परस्पर प्रेम-बंधन में बंधते हैं तो वे एक-दूसरे से प्रेम में डूबी हुई बातें करते हैंएक-दूसरे को प्रेम-पत्र लिखते हैंजब मिलते हैं तो एक-दूसरे को प्रेमभरी दृष्टि से देखते हैंबिना स्पर्श के भी एक-दूसरे के साहचर्य से आनंदित होते हैंसीधे-सीधे मिलना संभव न हो तो एक-दूसरे को छुप-छुप के देखने का प्रयास करते हैंकवि-हृदय हों तो कविताएँ रचते हैंएक-दूसरे को प्रेमोपहार देते हैं जिनका मूल्यांकन केवल उनमें निहित भावों से ही किया जा सकता है । उर्दू शायरी भरी-पड़ी है इश्क़ो मुहब्बत के जज़्बात और इज़हार से । असफल प्रेमियों की दर्दभरी कथाएँ अमर हो चुकी हैं  और लोकरुचि का अंग बनकर सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती आ रही हैं । सभी भाषाओं और सभी देशों के साहित्यनाट्यकर्म और सिनेमा का मुख्य अंश प्रेमकथाएँ ही हैं । यह संसार न केवल प्रेम के द्वारा ही चल रहा है वरन इसका सौंदर्य भी प्रेम के कारण ही है । ज़रा सोचिएप्रेम के बिना यह संसार कितना कुरूप होता !  

किसी को किसी से प्रेम क्यों और कैसे होता हैयह तो सनातन काल से चला आ रहा अनसुलझा रहस्य है । लेकिन इस लेख में एक हिंदी उपन्यास की समीक्षा के बहाने मैं इस बात पर विमर्श करना चाहता हूँ कि प्रेम वस्तुतः है क्या प्रेम में दैहिक आकर्षण सम्मिलित हो सकता हैलेकिन यह उससे कहीं अधिक हैबहुत अधिक है । मैंने देखा हैजाना है और महसूस किया है कि लोग प्रेम करते तो हैं लेकिन उसके मर्म को समझते नहीं । अपने निजी अनुभव से मैं यह जान पाया हूँ कि प्रेम कोई लेन-देन नहींयह तो केवल देने का ही नाम है । सच्चे प्रेम की कसौटी है त्याग और बलिदान । दिलों के सौदे नफ़ा-नुकसान देखकर नहीं किये जा सकते । नफ़े-नुकसान का सवाल जहाँ उठेवहाँ और चाहे कुछ भी होप्यार नहीं हो सकता । प्यार में सौदा नहीं होता । न ही कोई शर्तें लगाई जाती हैं । जिससे प्यार किया जाएउससे कुछ पाने की नहीं बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उसके लिये सब कुछ छोड़ देने की इच्छा ही प्यार करने वाले के मन में पूरी शिद्दत से समा जाती है । किसी की मुहब्बत ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं मिल सकतीउसे तो सजदा करके ही हासिल किया जा सकता है । कुछ ऐसे ही जज़्बात से सराबोर और पढ़ने वाले के दिल को छू जाने वाला हिंदी उपन्यास है - 'सुहाग से बड़ाजो तीन दशक पूर्व स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की लेखनी से निकला था । 

भारतीय परंपरा और संस्कारों के अनुसार एक हिंदुस्तानी औरत के लिए उसका सुहाग अर्थात् उसका पति ही सर्वोपरि होता है (यदि वह क्रूर अथवा कुकर्मी हो तो बात अलग है) । भारतीय नारी के लिए उसके सुहाग से बढ़कर कुछ नहीं होताकोई नहीं होता । एक हिंदू विवाहिता का आदर्श सावित्री है जो सत्यवान को मृत्यु के मुख से लौटा लाई थी । फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई उसके लिए उसके सुहाग से भी बड़ा बन जाए इस प्रश्न का उत्तर यह उपन्यास देता है जो एक मार्मिक प्रेमकथा द्वारा प्रेम की वास्तविक परिभाषा प्रस्तुत करता है ।   

'सुहाग से बड़ाकहानी है देवराज और माधुरी के पवित्र प्रेम की । घटनाक्रम पटना शहर में रखा गया है । देवराज अपराध की दुनिया में है लेकिन बचपन में मिली एक गहरी पीड़ा ने उसके कोमल मन पर ऐसी छाप छोड़ी है कि वह अपराधी होकर भी एक संवेदनशील मानव है । कानून के ख़िलाफ़ काम करते हुए भी वह अपने उसूलों के साथ कोई समझौता नहीं करता । वह वे काम करता है जिनकी इजाज़त कानून नहीं देता मगर वह ऐसा कोई काम नहीं करता जिसकी इजाज़त उसका ज़मीर उसे नहीं देता ।    

इधर माधुरी बहन है अशोक की जिसे पुलिस में नौकरी मिलने पर उसकी प्रशिक्षण-अवधि में ही एक गोपनीय योजना के अंतर्गत पुलिस का मुख़बिर बनाकर देवराज के दल में घुसा दिया जाता है । ये दोनों भाई-बहन अनाथ हैं और इसीलिए जहाँ अशोक के लिए अपनी बहन माधुरी से बढ़कर कोई नहीं हैवहीं माधुरी के लिए सबसे प्यारा कोई है तो बस उसका भाई अशोक है । अशोक का मित्र अमित पहले से ही पुलिस की नौकरी में है और वह माधुरी से विवाह करना चाहता है जिस पर अशोक को कोई आपत्ति नहीं । जहाँ तक माधुरी का प्रश्न हैअपने भाई की इच्छा की ख़ातिर उसे भी अमित से विवाह करना स्वीकार्य है । लेकिन . . . 

लेकिन हालात माधुरी को देवराज के निकट ले आते हैं । दोनों प्रेम-बंधन में बंध जाते हैं । यह वह पवित्र प्रेम है जो आत्मा से किया गया हैदेह से नहीं । माधुरी के प्यार की ख़ातिर देवराज अपराध की दुनिया छोड़ देने का फ़ैसला भी कर लेता है पर तक़दीर को कुछ और ही मंज़ूर है । देवराज पर दो राज़ एक साथ खुलते हैं - एक तो यह कि उसके दल में सम्मिलित अशोक पुलिस का मुख़बिर है जिसे दल के नियम के अनुसार मृत्युदंड देना उसका कर्तव्य है और दूसरा यह कि अशोक उसकी प्रेमिका माधुरी का भाई है । देवराज माधुरी से यह सच्चाई नहीं छुपाता । अब माधुरी उसे उसकी मुहब्बत का वास्ता देती है और कहती है कि अगर उसकी मुहब्बत सच्ची है तो वह अशोक की जान बख़्श देगा । 

देवराज दुविधा में है कि भावना और कर्तव्य में से किसे चुने जबकि माधुरी को पूरा विश्वास है कि देवराज उसके प्राणप्रिय भाई को मारकर उसके प्रेम को कलंकित नहीं करेगा । दूसरी ओर बंतासिंह नामक एक अपराधी कारागार से फ़रार हो जाता है । वह अमित और देवराजदोनों ही का शत्रु है । घटनाक्रम कुछ इस तरह घूमता है कि अमित अलग-अलग ढंग से माधुरीअशोक और बंतासिंहसभी के संपर्क में आता है और देवराज के अड्डे पर धावा बोलकर उसके संपूर्ण दल का सफ़ाया कर देता है । देवराज गिरफ़्तार हो जाता है और अशोक की लाश बरामद होती है । माधुरी यह मान बैठती है कि उसके भाई का हत्यारा उसका प्रेमी ही है । उसकी गवाही के दम पर अदालत देवराज को फाँसी की सज़ा सुना देती है और वह उसी दिन अमित से विवाह कर लेती है । 

अब उन बातों को बरसों बीत चुके हैं । देवराज की फाँसी की सज़ा ऊंची अदालत में अपील किए जाने पर उम्र-क़ैद में बदल चुकी है और वह जेल में अपने दिन काट रहा है । अमित पुलिस में पदोन्नति पाकर वरिष्ठ पद पर पहुँच गया है और उसकी पत्नी माधुरी अब उसके पुत्र की माँ है । बंतासिंह कभी का विदेश भागकर कानून की पकड़ से बहुत दूर हो चुका है । लेकिन . . . 

लेकिन एक दिन अतीत के कब्रिस्तान में दफ़न कुछ मुरदे अपनी कब्रों से उठकर खड़े हो जाते हैं और कुछ भूले-बिसरे राज़ अपना परदाफ़ाश होने की धमकी देने लगते हैं । माधुरी को पता लगता है कि देवराज उसका सुहाग तो नहीं बन सका लेकिन वह उसके लिए सुहाग से भी बड़ा है । वह अब जान पाती है कि जो इंसान उसकी माँग में सिंदूर बनकर नहीं सज सकाउसका प्यार कितना महान है । लेकिन नियति तो अपना खेल खेल चुकी है । अब क्या हो सकता है दिल को झकझोर देने वाली इस दास्तान का क्लाईमेक्स सच्ची मुहब्बत की ऊंचाई को दिखलाता है । इस कहानी का अंत यह बताता है कि सच्चा प्यार करने वाले चाहे ख़ुद मिट जाएंउनका प्यार एक रोशन मीनार बनकर आने वाली नस्लों तक को समझा सकता है कि हक़ीक़त में प्यार होता क्या है ।  

मैं नहीं जानता कि इस बेमिसाल कहानी का मूल विचार स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की मौलिक सोच का परिणाम था अथवा उन्होंने इसे कहीं से उधार लिया था । लेकिन भावनाओं के कुशल चितेरे शर्मा जी ने इस उपन्यास को अत्यंत रोचक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है और सभी प्रमुख चरित्रों को स्वतः ही उभरने और कथानक पर अपनी-अपनी छाप छोड़ने का अवसर दिया है । उन्होंने बताया है कि प्यार कर बैठने वालों को प्यार करना आता हो और वे प्यार के फ़लसफ़े को ठीक से समझते होंयह ज़रूरी नहीं । सच्चे प्रेम का आधार है विश्वास । और उसका अभिन्न अंग है अपने प्रिय के लिए बड़े-से‌‌‌-बड़ा त्याग कर सकने की क्षमता । 

रहस्यकथाएँ और रोमांचक उपन्यास (थ्रिलर) लिखने के लिए विख्यात वेद प्रकाश शर्मा ने अपने लेखन-कर्म के प्रारम्भिक वर्षों में सामाजिक उपन्यास भी लिखे थे । उनके ऐसे एक उपन्यास का नाम है - 'राखी और सिंदूरजो सम्भवतः उन्होंने बहुत कम आयु में लिखा था । मैंने वह उपन्यास पढ़ा तो नहीं लेकिन अनुमान लगा सकता हूँ कि वह एक विवाहिता की दुविधा की कहानी होगी जिसे राखी अर्थात् अपने भाई और सिंदूर अर्थात् अपने पति में से किसी एक को चुनना हो । 'सुहाग से बड़ामें नायिका के समक्ष ऐसी कोई दुविधा नहीं है । वह अपने भाई से अधिक प्रेम किसी से नहीं करती तथा उसके हत्यारे को दंडित करवाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है । इस उपन्यास में दुविधा वस्तुतः नायक के समक्ष है जिसका शर्मा जी ने बड़ा ही हृदयविदारक चित्रण किया है । देवराज को बेचैन कर रही उसकी उलझन और उसके अंतर्मन की पीड़ादोनों ही का वर्णन कुछ ऐसा है कि पढ़ने वाले को लगता है मानो वह जीते-जागते देवराज को अपनी आँखों से देख रहा हो । अपनी महबूबा के लिए देवराज दीवानगी की हद से गुज़र जाता है जिसे महसूस करके इस दर्दभरी दास्तां को पढ़ रहे शख़्स की आँखें नम हो सकती हैं  । और उपन्यास के अंतिम भाग में वास्तविकता से अवगत हो चुकी माधुरी की पीड़ाप्रतिशोध और प्रायश्चितसभी पढ़ने वाले के दिल की गहराई में उतर जाते हैं । 

मुझे दुख है कि वेद प्रकाश शर्मा ने अपनी इस असाधारण कृति पर 'इंटरनेशनल खिलाड़ी' (१९९९) जैसी मामूली फ़िल्म बनवाई जिसमें अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना ने नायक-नायिका की भूमिकाएँ निभाई थीं । फ़िल्म में उपन्यास की संपूर्ण कहानी नहीं बल्कि केवल उसके कुछ पात्र तथा उसके घटनाक्रम का एक अंश ही लिया गया है और बाकी की कहानी (जो कि कथानक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है) फ़िल्म से निकाल दी गई है । जहाँ उपन्यास एक अमर प्रेमकथा हैवहीं फ़िल्म एक साधारण एक्शन फ़िल्म से अधिक कुछ नहीं है । फ़िल्म में न भाई-बहन का प्रेम ठीक से उभर पाया हैन ही प्रेमी-प्रेमिका का । फ़िल्म में उपन्यास की रूह का नामोनिशान तक नहीं है । मुझे ऐसा लगता है कि पात्रों के चरित्र-चित्रणभावपक्ष और कथानक की आत्मा की दृष्टि से कंगना रानाउत की प्रथम फ़िल्म 'गैंगस्टर' (२००६) इस उपन्यास के अधिक निकट है बजाय 'इंटरनेशनल खिलाड़ीके । 

सरल हिंदी में लिखा गया थ्रिलर और सामाजिक कथा का मिश्रण यह उपन्यास आदि से अंत तक पढ़ने वाले को बांधे रखता है । इसे उन लोगों को भी पढ़ना चाहिए जिन्होंने 'इंटरनेशनल खिलाड़ीफ़िल्म देख रखी है क्योंकि उपन्यास का कैनवास फ़िल्म से बहुत अधिक विस्तृत है और इसमें प्यार का वह रंग है जो फ़िल्म में कहीं नज़र नहीं आता । प्यार तो अपने जीवन में लगभग सभी मनुष्य करते हैं चाहे वे किसी भी लिंग के हों लेकिन प्यार के फ़लसफ़े को उनमें से बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं । अगर आप समझना चाहते हैं तो 'सुहाग से बड़ाको ज़रूर पढ़िए ।

© Copyrights reserved