मंगलवार, 28 जुलाई 2026

हिंदी फ़िल्मों में रहस्यमयी नारियां

हिंदी फ़िल्में विविध विषयों पर बनती हैं जिनमें रहस्य भी एक है। साठ के दशक में ऐसी बहुत-सी फ़िल्में बनीं और उनके कथानक प्रायः ऐसे रहे जिनमें कोई रहस्यमयी नारी दिखाई गई। यह नारी प्रायः श्वेत वस्त्र धारण करती थी और कोई रहस्यभरा गीत गाती थी। नायक को उसके व्यक्तित्व तथा गाए गए गीत से भ्रमित होते हुए दिखाया जाता था। ऐसी फ़िल्में जब अच्छी पटकथा लेकर मनोरंजक ढंग से बनाई गईं एवं उनका गीत-संगीत भी श्रेष्ठ रहा तो दर्शकों द्वारा पसंद भी की गईं। आज ऐसी कई फ़िल्में क्लासिक मानी जाती हैं।

साधना की त्रयी: ऐसी रहस्यमय भूमिकाएं करने में साधना अग्रणी रहीं। पारम्परिक नायिका की छवि से हटकर ऐसी धूसर रंगों वाली भूमिकाएं करना अपने आप में ही एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। लेकिन साधना ने एक बार नहीं तीन-तीन बार ऐसी चुनौती को स्वीकार किया। तीनों ही फ़िल्मों के निर्देशक राज खोसला थे। ये फ़िल्में थीं -

१. वह कौन थी (१९६४): 'वह कौन थी' अपने नाम के अनुरूप ही एक रहस्यमय महिला की कहानी है। इस फ़िल्म का प्रारंभिक दृश्य ही ऐसा है जो दर्शकों को अपने सम्मोहन में जकड़ लेता है। इस दृश्य में बरसात की रात में सड़क पर कार चला रहे मनोज कुमार को श्वेत साड़ी धारण किए हुए साधना मार्ग के बीचोंबीच खड़ी दिखाई देती हैं। वे उन्हें कार में लिफ़्ट देते हैं तथा मार्ग में उनके बीच रहस्यभरा वार्तालाप होता है। साधना उन्हें एक कब्रिस्तान तक ले जाती हैं एवं उनके देखते-ही-देखते उसके भीतर चली जाती हैं। उसके उपरांत सम्पूर्ण फ़िल्म में साधना कई बार अलग-अलग रूपों में मनोज कुमार से मिलती हैं तथा उन्हें भ्रमित करती हैं। वास्तविकता का पता अंत में चलता है। फ़िल्म भी एवं साधना के भिन्न-भिन्न रूप भी दर्शकों को अंत तक बाँधे रखते हैं। अपने सुमधुर गीत-संगीत के साथ यह श्वेत-श्याम फ़िल्म एक अत्यन्त मनोरंजक फ़िल्म है तथा रहस्यमय नायिकाओं वाली फ़िल्मों की श्रेणी में अग्रणी है। लता मंगेशकर के गीत 'नैना बरसे रिमझिम रिमझिम' तथा 'लग जा गले' आज भी संगीत-प्रेमियों का दिल जीत लेते हैं। 

२. मेरा साया (१९६): 'मेरा साया' अपने समय की एक अत्यंत सफल एवं चर्चित फ़िल्म थी जिसमें मुख्य रहस्य साधना का व्यक्तित्व ही है। पुलिस द्वारा गिरफ़्तार की गईं साधना स्वयं को फ़िल्म के नायक सुनील दत्त की पत्नी बताती हैं लेकिन सुनील दत्त की पत्नी का देहांत हो चुका होने के कारण कोई उन पर विश्वास नहीं करता है। फ़िल्म में कोर्ट रूम ड्रामा भी है जो अत्यन्त मनोरंजक है। रहस्य यही है कि साधना सुनील दत्त की पत्नी हैं या नहीं। साधना ने इस फ़िल्म में कमाल का अभिनय किया है एवं सुनील दत्त के साथ उनकी जोड़ी ख़ूब जमी है। इस फ़िल्म का गीत-संगीत भी अत्यंत श्रेष्ठ है तथा आज तक इसके गाने संगीत-प्रेमियों द्वारा बड़े चाव से सुने जाते हैं। लता मंगेशकर का गाया हुआ शीर्षक गीत 'तू जहाँ जहाँ चलेगा' पूरी फ़िल्म में चलता रहता है तथा दर्शकों को रहस्य में डुबोए रखता है।

३. अनीता (१९६७): 'अनीता' संभवतः राज खोसला द्वारा 'वह कौन थी' के प्रभाव (हैंगओवर) में आकर बनाई गई थी। उन्हें लगा होगा कि जैसे दर्शकों ने 'वह कौन थी' को स्वीकार किया था, वैसे ही वे इसे भी स्वीकार कर लेंगे। उन्होंने नायक-नायिका 'वह कौन थी' वाले ही रखे (मनोज कुमार एवं साधना)। लेकिन वे कथानक पर बेहतर काम नहीं कर सके और कमज़ोर पटकथा के कारण ही यह फ़िल्म 'वो कौन थी' जैसी प्रभावशाली नहीं बन सकी। लेकिन केंद्रीय भूमिका में रहस्य के आवरण में लिपटी साधना की भूमिका फ़िल्म की जान रही। साधना ने अपने अभिनय से इस भूमिका को जीवंत बना दिया। इसी कारण तथा अच्छे गीत-संगीत के कारण यह फ़िल्म सफल भी रही। 

ये तीन फ़िल्में तो इस श्रेणी की फ़िल्मों में मील का पत्थर मानी ही जाती हैं, कई और फ़िल्में भी बनीं जिनमें एक रहस्यमयी नायिका फ़िल्म के केंद्र में रही। १९६६ में प्रदर्शित 'लाल बंगला' और 'मैं वही हूँ' जैसी फ़िल्में थीं तो ऐसी ही लेकिन वे कमज़ोर कहानी के कारण दर्शकों को प्रभावित नहीं कर सकीं और सफल नहीं रहीं। पर कुछ अच्छी फ़िल्में जो आज भी क्लासिक मानी जाती हैं, इस प्रकार हैं:

महल (१९९): 'महल' में रहस्यमयी नारी की केंद्रीय भूमिका मधुबाला ने निभाई है। वे श्वेत वस्त्र धारण करके 'आएगा आने वाला' गीत गाती हुई फ़िल्म के नायक अशोक कुमार को उलझाए रखती हैं। 'आएगा आने वाला' गीत ने तो सारे देश में धूम मचा दी थी। इसे लता मंगेशकर ने अपने द्वारा गाया गया सर्वश्रेष्ठ गीत माना था। यह गीत आज भी अत्यन्त लोकप्रिय है। कमाल अमरोही द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म एक क्लासिक रहस्य फ़िल्म मानी जाती है। 

बीस साल बाद (१९): 'बीस साल बाद' में रहस्यमय गीत 'कहीं दीप जले कहीं दिल' गाकर फ़िल्म के नायक  को अपनी ओर खींचने वाली स्त्री श्वेत वस्त्र तो धारण नहीं करती है लेकिन फ़िल्म में रहस्य बहुत उत्पन्न करती है। अब वह किस उद्देश्य से ऐसा कर रही है, यह फ़िल्म के अंत में ही पता चलता है। 

कोहरा (१९): 'कोहरा' की विशेषता यह है कि फ़िल्म की नायिका रहस्यमयी स्त्री नहीं है। नायिका तो स्वयं उस रहस्यमयी स्त्री के होने या न होने की बात को लेकर भ्रमित रहती है जो पहले नायक के जीवन में थी एवं अब मर चुकी है। वह स्त्री श्वेत वस्त्र धारण करती थी एवं ऐसा लगता है कि मरने के उपरांत भी उसकी आत्मा उसी घर में मौजूद है। फ़िल्म में उस स्त्री का चेहरा नहीं दिखाया गया है। मुझे भी एक लम्बे समय के उपरांत पता चला था कि वह भूमिका थेल्मा नामक एक अभिनेत्री ने निभाई थी। वह जो गीत गाती है, वह है 'झूम झूम ढलती रात'।

पूनम की रात (१९६५): 'पूनम की रात' में रहस्य यही है कि नायक मनोज कुमार को श्वेत वस्त्रों में रहस्य भरा गीत गाती हुई दिखाई देने वाली स्त्री वस्तुतः कौन है। लता मंगेशकर द्वारा गाया हुआ यह लोकप्रिय गीत है -'साथी रे, तुझ बिन जिया उदास रे, यह कैसी अनबुझ प्यास रे, आ जा'। फ़िल्म में नर्सों की भी भूमिकाएं हैं जो वैसे भी श्वेत वस्त्रों में रहती हैं। फ़िल्म विशेष सफल नहीं रही थी लेकिन निर्देशक किशोर साहू ने कहानी को अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है। गाने वाली श्वेत वसना स्त्री एक (मर चुकी स्त्री की) आत्मा जैसी मालूम होती है लेकिन उसकी वास्तविकता अंत में ही पता चलती है। 

यह रात फिर ना आयेगी (१९६६): 'यह रात फिर ना आयेगी' फ़िल्म की रहस्यमयी नायिका हैं शर्मिला ठाकुर (टैगोर) जो नायक को अपने आत्मा होने के भ्रम में डालती है। फ़िल्म मनोरंजक तो है ही, इसका गीत-संगीत भी अत्यन्त मधुर है। यह नायिका वस्तुतः कौन है तथा किस उद्देश्य से नायक को अपनी ओर खींच रही है, इसका पता फ़िल्म के अंत में ही लगता है। शर्मिला ने अच्छा अभिनय किया है। 

अनामिका (१९७३): 'अनामिका' की कहानी 'अनीता' की कहानी से प्रेरित प्रतीत होती है। इस फ़िल्म में नायिका को 'अनामिका' इसलिए कहा गया है क्योंकि उसका कोई नाम ज्ञात नहीं है। इस 'अनामिका' की भूमिका निभाई है जया भादुड़ी ने जो नायक संजीव कुमार को अपने अलग-अलग रूपों से भ्रमित करती हैं। नायक-नायिका के सुंदर अभिनय से सजी यह फ़िल्म एक अत्यन्त मनोरंजक फ़िल्म है। इसका गीत-संगीत भी बहुत अच्छा है। शीर्षक गीत (मेरी भीगी-भीगी सी पलकों पे रह गए) तथा 'बाहों में चले आओ' आज भी लोकप्रिय हैं।

रोचक बात यह है कि साठ के दशक में बनीं ऐसी कई क्लासिक रहस्य फ़िल्मों के नायक मनोज कुमार या बिश्वजीत रहे। मनोज कुमार के बारे में मैं ऊपर लिख चुका हूँ। 'बीस साल बाद', 'कोहरा' तथा 'यह रात फिर ना आयेगी' के नायक बिश्वजीत थे। ये नायक ऐसी फ़िल्में बनाने वालों के पसंदीदा क्यों रहे, यह उन्हें बनाने वाले ही बेहतर जानते थे।

'मेरा साया', 'अनीता' और 'अनामिका' को छोड़कर ऐसी सभी फ़िल्में श्वेत-श्याम फ़िल्में हैं क्योंकि रंगीन फ़िल्मों का युग तब तक नहीं आया था। लेकिन इनका श्वेत-श्याम होना इनके रहस्य के तत्व के लिए अच्छा ही रहा क्योंकि श्वेत-श्याम पृष्ठभूमि में रहस्य का वातावरण बेहतर ढंग से उभर पाया। 

रेखा एवं जीतेन्द्र अभिनीत 'जल महल' (१९८०) भी कुछ-कुछ ऐसी ही फ़िल्म है। इसके कुछ वर्ष पूर्व आई फ़िल्म 'वही रात वही आवाज़' (१९७३) में भी किसी स्त्री को 'मेरा मन भटक रहा दीवाना' गाते हुए रहस्य उत्पन्न करते हुए दिखाया गया है। 'नक़ाब' (१९८९) में नायक ऋषि कपूर को भ्रमित करती हुई ऐसी भूमिका फ़रहा ने निभाई तो 'अब क्या होगा' (१९७७) में नायक शत्रुघ्न सिन्हा को भ्रमित करने का काम किया नीतू सिंह ने। लेकिन इन फ़िल्मों की पटकथा कमज़ोर थी। सुदृढ़ पटकथा वाली ऐसी एक फ़िल्म 'दस्तूर' (१९९१) है जिसके आरंभिक दृश्य में श्वेत वस्त्रधारी नायिका को रहस्यमय ढंग से चलते हुए और गीत गाते हुए दिखाया गया है।

प्रश्न यह है कि स्त्रियों को ही ऐसी रहस्यमय भूमिकाओं में क्यों दिखाया जाता रहा, पुरुषों को क्यों नहीं ? उत्तर शायद यही है कि ऐसी कहानियां लिखने वाले भी एवं ऐसी फ़िल्में बनाने वाले भी पुरुष ही रहे और पुरुष के लिए तो स्त्री सदैव ही एक पहेली रही है जिसे सुलझाने का प्रयास वह सदियों से करता आ रहा है। हिंदी उपन्यासकार स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा के तो एक उपन्यास का शीर्षक ही है - 'औरत एक पहेली'। बहरहाल रहस्यमयी नारियों को प्रस्तुत करती हुई क्लासिक हिंदी फ़िल्में आज भी देखें तो एक अच्छा अहसास कराती हैं। 

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