शुक्रवार, 5 जून 2026

पूनम की रात

पूनम या पूर्णिमा या पूर्णमासी। इन सभी शब्दों का एक ही अर्थ है वह दिवस जिसकी रात पूरे चाँद की रात होती है अर्थात् चंद्रमा अपनी सम्पूर्ण सोलह कलाओं के साथ पूर्णतः गोलाकार स्वरूप में आकाश पर अवतरित होता है और वह रात चाँदनी रात कहलाती है। चूंकि इस रात का सौंदर्य अद्भुत होता है, ये नाम सौंदर्य के प्रतीक माने जाते हैं। इसीलिए कन्याओं के नाम चाँदनी, पूनम, पूर्णिमा आदि रखे जाते हैं। 

पर साथ ही इस रात का और इस रात को निकलने वाले पूर्ण गोलाई के चाँद का अन्य महत्व भी है। भौगोलिक दृष्टि से बात करें तो इस रात को समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटा प्रभावित होते हैं। ज्वार के रूप में समुद्र का जल बहुत ऊंचाई तक जाता है तथा भाटा के रूप में बहुत गहराई तक। कारण यह है कि इस रात को पृथ्वी सूर्य एवं चंद्रमा के मध्य में होती है जिसके कारण दोनों का ही गुरुत्वाकर्षण बल एक ही दिशा में काम करता है।

लेकिन इस लेख में मेरा विषय पूनम के चाँद का मनोवैज्ञानिक प्रभाव है। ऐसा माना जाता है कि जो मनुष्य कुछ असामान्य मानसिकता वाले हों, उन पर पूरे चाँद का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि उनकी असामान्यता बढ़ जाती है। यदि ऐसे व्यक्ति को नींद में चलने की बीमारी है तो पूनम की रात को ऐसा अवश्य होता है अर्थात् वह व्यक्ति नींद में चलता है (या चलती है) तथा ऐसी अवस्था में उसे अपने द्वारा किए गए किसी भी काम का आभास नहीं होता। इस विषय को आधार बनाकर उपन्यास भी लिखे गए हैं तथा फ़िल्म भी बनाई गई है। अर्ल स्टेनले गार्डनर ने इसी तथ्य को आधार बनाकर अपना पेरी मेसन सीरीज़ का उपन्यास 'The case of the sleepwalker's niece' लिखा तो हिंदी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक ने भी अपनी सुनील सीरीज़ के अंतर्गत 'पूरे चाँद की रात' नामक उपन्यास लिखा। 

निर्माता-निर्देशक-अभिनेता किशोर साहू ने इसी विषय को आधार बनाकर हिन्दी फ़िल्म 'पूनम की रात' (१९६५) बनाई। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं - मनोज कुमार, कुमुद छुगानी, शिव कुमार, नंदिनी, डी.के. सप्रू, लीला मिश्रा, रबीन्द्र बनर्जी, परवीन चौधरी, बेला बोस, प्रेम चोपड़ा एवं स्वयं किशोर साहू। किशोर साहू ने स्वयं ही इस फ़िल्म की कहानी लिखी है एवं इसे निर्देशित किया है। यह एक रहस्यकथा है।

फ़िल्म रानी नामक एक स्त्री के सीढ़ियों से गिरकर मर जाने से आरंभ होती है। बहुत बाद में जब शहर में रहकर अध्ययन कर रहा फ़िल्म का नायक मनोज कुमार एवं उसका मित्र शिव कुमार अपने कॉलेज के साथियों के साथ एक भ्रमण पर हैं तो शिव कुमार को अपने पिता (डी.के. सप्रू) के गंभीर रूप से अस्वस्थ होने का पता चलता है। वह मनोज कुमार के साथ अपने गृहनगर आता है तो मार्ग में एक दुकान पर मनोज कुमार को वर्षों पूर्व हुई रानी की रहस्यमय मृत्यु के विषय में सुनने का अवसर मिलता है जो कि शिव कुमार के पिता की रखैल बताई जाती थी। उसकी मृत्यु पूनम की रात को हुई थी। घर पहुँचने के बाद जहाँ उन्हें पता चलता है कि शिव कुमार के पिता लकवाग्रस्त हो गए हैं, वहीं मनोज कुमार को शिव कुमार के पूरे परिवार से मिलने का अवसर मिलता है। उसे संकेत मिलता है कि इस संयुक्त परिवार के विभिन्न सदस्यों में सद्भाव एवं स्नेह से युक्त संबंध नहीं हैं तथा कई सदस्य पारिवारिक संपत्ति पर नज़र गड़ाए हुए हैं। शिव कुमार की एक बहन कुमुद छुगानी मनोज कुमार से प्रेम करने लगती है तो दूसरी बहन नंदिनी भी उसकी ओर आकर्षित हो जाती है। 

रात को मनोज कुमार को एक रहस्यपूर्ण गीत सुनाई देता है (साथी रे, तुझ बिन जिया उदास रे) जिसे कोई महिला गा रही है। पर ढूंढ़ने पर उसे कोई नहीं मिलता। इस घर में हो रही केवल यही एक रहस्यमय बात नहीं है, ऐसी कई बातें हो रही हैं (विशेषतः रात को) जो उसके दिमाग़ को परेशान करती हैं। अचानक एक रात को शिव कुमार के लकवाग्रस्त पिता कोई भयावह बात देखते हैं और पलंग से नीचे गिर जाते हैं। इससे उनकी हालत और बिगड़ जाती है तथा वे अपने बोलने की शक्ति भी खो बैठते हैं। उनकी देखभाल के लिए उनके चिकित्सक किशोर साहू द्वारा रखी गई नर्स ग़ायब हो जाती है। बाद में उसकी लाश घर के अंदर ही बने हुए एक कुएं में मिलती है। ये घटनाएं पूनम की रात को होती हैं। चूंकि वहाँ के वातावरण का प्रभाव मनोज कुमार पर पड़ रहा है, उसकी असामान्य स्थिति को देखकर शिव कुमार को उसी पर नर्स की हत्या का संदेह होता है। वह किशोर साहू से इस विषय में बात करता है तो वे उसे पूनम की रात के असामान्य व्यक्तियों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बताते हैं। रहस्य का ख़ुलासा तब होता है जब अगली पूनम की रात आती है। 

फ़िल्म रहस्य से भरी है किन्तु निर्देशक ने कहानी के रहस्य को धीरे-धीरे फैलाया है। फ़िल्म मद्धम गति से आगे बढ़ती है लेकिन इसमें रोचकता की कोई कमी नहीं है। दर्शक फ़िल्म देखते समय अनुभव करता है जैसे उसके सामने कोई धुंध-सी छाई हुई है जो फ़िल्म के अंतिम दृश्य में ही हटती है तथा सब कुछ स्पष्ट होता है। नाच-गाने, रोमांस, कॉमेडी आदि के बावजूद यह रहस्य ही है जो फ़िल्म में व्याप्त है। इस दृष्टि से 'पूनम की रात' को एक विशुद्ध रहस्य फ़िल्म कहा जा सकता है। फ़िल्म के क्लाईमेक्स में कोई एक्शन नहीं है। केवल रहस्य को स्पष्ट किया गया है। सम्भवतः इसी कारण यह फ़िल्म विशेष सफल नहीं रही थी क्योंकि भारतीय दर्शक एक्शन से भरा क्लाईमेक्स देखने के आदी थे। राज खोसला या विजय आनंद जैसे रहस्यकथाओं को प्रस्तुत करने में निष्णात निर्देशक शायद इस कहानी को बेहतर ढंग से बना सकते थे लेकिन किशोर साहू ने भी विषय-वस्तु के साथ पूरा न्याय किया है और फ़िल्म के अंतिम दृश्य में सभी बातों को तार्किक ढंग से समझाया है।

यह श्वेत-श्याम फ़िल्म लगभग पूरी तरह से घर के भीतर ही फ़िल्माई गई है। कला-निर्देशक ने ठीक काम किया है जबकि छायाकार ने अपना कैमरा कुछ इस कुशलता से काम में लिया है कि आरंभ से अंत तक फ़िल्म में एक रहस्य का वातावरण बना रहता है। तकनीकी रूप से फ़िल्म अच्छी है। इसकी लंबाई भी अधिक नहीं है। शैलेंद्र के गीतों पर सलिल चौधरी ने मधुर संगीत दिया है। 'साथी रे, तुझ बिन जिया उदास रे' तो लता मंगेशकर का एक लोकप्रिय गीत है ही, अन्य गीत भी अच्छे बन पड़े हैं। पार्श्व संगीत फ़िल्म की विषय-वस्तु के अनुकूल है।

फ़िल्म की नायिका कुमुद छुगानी सहित अनेक कलाकारों (नंदिनी, शिव कुमार, रबीन्द्र बनर्जी) आदि की यह पहली ही फ़िल्म है। मनोज कुमार सहित सभी ने ठीक-ठाक काम किया है। मनोज कुमार के साथ कुमुद की जोड़ी अच्छी बन पड़ी है (इन दोनों की पहली मुलाक़ात बड़ी रोमांटिक और गुदगुदाने वाली है)। यदि मुझे सर्वश्रेष्ठ कलाकार को चुनना हो तो मैं लीला मिश्रा को चुनूंगा जिन्होंने शिव कुमार की बुआ की भूमिका निभाई है।

अब पूरे चाँद के साथ आने वाली पूनम या पूर्णिमा या पूर्णमासी की रात का मनुष्यों पर वस्तुतः कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं ‌‌(विशेषतः असामान्य व्यक्तियों के व्यवहार पर) यह तो मनोवैज्ञानिक ही जानें। पर यह भूली-बिसरी फ़िल्म निश्चय ही एक मनोरंजक फ़िल्म है जो सस्पेंस फ़िल्में देखने वालों को अवश्य पसंद आयेगी। 

© Copyrights reserved