मंगलवार, 23 जून 2026

वक़्त से आगे की फ़िल्म

मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ है कि किसी पुस्तक को दूसरी बार पढ़ते समय अथवा किसी फ़िल्म को दूसरी बार देखते समय उसके बारे में मेरे विचारों में परिवर्तन हुआ हो। इसका कारण यह है कि पुस्तक को दूसरी बार पढ़ते समय अथवा फ़िल्म को दूसरी बार देखते समय उसकी कुछ ऐसी ख़ूबियां या ख़ामियां मेरी नज़र में आईं जो कि पहली बार में नज़रअंदाज़ हो गई थीं। लेकिन आज मैं एक ऐसी फ़िल्म के बारे में बात कर रहा हूँ जो कि मैंने उसके प्रदर्शन के लंबे समय बाद देखी। देखने से पहले तक बरसों से मैं केवल उसकी प्रशंसा ही पढ़ता एवं सुनता आया था पर जब उसे देखा तो लगा कि वह प्रशंसा कुछ ज़रूरत से ज़्यादा थी। आलोचकों ने फ़िल्म के गुणों पर ही ध्यान दिया, उसकी कमियों पर नहीं। यह फ़िल्म है - निकाह (१९८२) जिसका निर्माण किया था भारत की प्रतिष्ठित फ़िल्म निर्माण संस्था बी.आर. फ़िल्म्स ने।

भारत में 'तीन तलाक़' अब अवैध घोषित हो चुका है। इस दृष्टि से इसी विषय को आधार बनाकर बनाई गई यह फ़िल्म अपने वक़्त से आगे की फ़िल्म कही जा सकती है। प्रायः वक़्त से आगे की फ़िल्में सफल नहीं होतीं लेकिन 'निकाह' को अद्भुत सफलता प्राप्त हुई। यह फ़िल्म स्त्री-जाति (औरत) के एकालाप से आरंभ होती है जो कि तनूजा के स्वर में है और बताती है कि 'औरत' ने संसार में क्या योगदान दिया है और बदले में उसे क्या मिला है। स्त्री के रेखाचित्रों के साथ दर्शाए गए फ़िल्म के मुश्किल से तीन मिनट लंबे इस प्रारंभिक दृश्य में पुरुष-प्रधान समाज में उसकी स्थिति (चाहे कोई भी धार्मिक समुदाय हो) एवं उसके जीवन की विडंबनाओं का आख्यान है। सच पूछिए तो मुझे फ़िल्म का सर्वश्रेष्ठ दृश्य यही लगा।

'निकाह' का अर्थ होता है विवाह (मुस्लिम समुदाय में विवाह को निकाह कहा जाता है)। वस्तुतः इस फ़िल्म का मूल नाम 'तलाक़ तलाक़ तलाक़' रखा गया था किन्तु प्रदर्शन से पूर्व उसे बदलकर 'निकाह' कर दिया गया। फ़िल्म कहानी कहती है नीलोफ़र (सलमा आग़ा) नामक युवती की जिससे उसके कॉलेज जीवन में हैदर (राज बब्बर) एकतरफ़ा प्रेम करता था किन्तु उसका निकाह हो जाता है वसीम (दीपक पाराशर) से। वसीम एक धनी व्यवसायी है। विवाह के कुछ समय के उपरांत ही नीलोफ़र को लगने लगता है कि उसका यह विवाह अर्थहीन है क्योंकि वसीम के पास उसके लिये समय ही नहीं है। जब उनके विवाह की पहली वर्षगांठ पर नीलोफ़र द्वारा आयोजित पार्टी में भी वसीम नहीं आता तो बाद में पति-पत्नी में तकरार होती है और वसीम क्रोध में आकर नीलोफ़र को 'तलाक़ तलाक़ तलाक़' कह देता है एवं मुस्लिम शरीयत के अनुसार उनका विवाह-विच्छेद हो जाता है।

विवाह-विच्छेद के बाद नीलोफ़र को एक पत्रिका में नौकरी मिलती है जिसका संपादक है हैदर जो आज भी नीलोफ़र से प्रेम करता है। वह नीलोफ़र के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखता है जिसे नीलोफ़र स्वीकार कर लेती है एवं उनका विवाह (अर्थात् निकाह) हो जाता है। दूसरी ओर वसीम को अपनी भूल का अहसास होता है एवं वह नीलोफ़र से पुनः विवाह करना चाहता है। उसे पता चलता है कि शरीयत के अनुसार यह तभी संभव है जब नीलोफ़र किसी और से विवाह करे तथा उससे उसका तलाक़ हो जाए। जब नीलोफ़र हैदर से विवाह कर लेती है तो उसे लगता है कि हैदर से तलाक़ लेकर नीलोफ़र उससे पुनः विवाह कर सकती है। वह इस बाबत नीलोफ़र को सूचित करता है जो कि हैदर को पता लग जाता है। अब हैदर नीलोफ़र की ख़ुशी के लिए उसे तलाक़ देने को तैयार हो जाता है। पर नीलोफ़र क्या चाहती है ? आख़िर नीलोफ़र एक औरत के रूप में अपने जीवन पर अपना अधिकार होने की घोषणा इन दोनों ही पुरुषों के सामने करती है और अपनी ज़िन्दगी का फ़ैसला ख़ुद करती है।

'निकाह' का विषय बहुत अच्छा है और जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी तो नवीन भी था क्योंकि पहले कभी इस तरह के विषय पर कोई फ़िल्म नहीं बनी थी। निर्माता-निर्देशक बी.आर. चोपड़ा ने इस फ़िल्म के माध्यम से एक प्रगतिशील विचार को दर्शक समुदाय के सामने रखा। उन्होंने फ़िल्म के अंत में नीलोफ़र के चरित्र के अपने जीवन के संबंध में लिये गए निर्णय के द्वारा यह स्पष्ट किया कि स्त्री पुरुष की जीवन-संगिनी है, उसकी संपत्ति नहीं जिसे जब चाहे छोड़ दिया जाए या किसी को उपहार की तरह दे दिया जाए। इसीलिए मैंने इस फ़िल्म को अपने समय से आगे की फ़िल्म बताया क्योंकि उस समय मुस्लिम समाज में पुरुष द्वारा पत्नी को तीन बार तलाक़ कहकर विवाह-विच्छेद करने, मुस्लिम स्त्री के अपने पूर्व-पति से पुनर्विवाह की प्रक्रिया तथा सबसे बढ़कर मुस्लिम स्त्री के अपने जीवन पर अपना अधिकार होने संबंधी बातें करना ही सार्वजनिक रूप से वर्जित-सा था। फ़िल्म के अत्यन्त लोकप्रिय होने तथा भारी व्यावसायिक सफलता प्राप्त करने का प्रमुख कारण इसकी विषय-वस्तु ही थी। इसकी सफलता का दूसरा कारण था इसका उत्तम संगीत।

लेकिन फ़िल्म की जो कमी मैंने पकड़ी, वह यह है कि इसके चरित्र वास्तविक नहीं लगते, नक़ली लगते हैं। मैं यहाँ मुख्य चरित्रों की बात कर रहा हूँ। विशेष रूप से हैदर का जिस प्रकार से चरित्र-चित्रण किया गया है, वह कहीं से भी यथार्थ के निकट का नहीं लगता। डॉ० अचला नागर की कहानी को चित्रपट पर उतारते समय निर्देशक बलदेव राज चोपड़ा यह चूक कर गए कि न तो कहानी वास्तविकता के निकट की बन पाई और न ही उसके किरदार वास्तविकता के निकट के बन पड़े। फ़िल्म के विचारोत्तेजक होने के बावजूद सम्पूर्ण फ़िल्म देखते समय मुझे यही लगा कि मैं काल्पनिक पात्रों की कोई काल्पनिक कहानी देख रहा हूँ जिसका वास्तविकता से दूर-दूर तक का संबंध नहीं है। हम जानते हैं कि (बॉलीवुड की) फ़िल्मी कहानियां वास्तविक नहीं हो सकतीं, फिर भी एक अच्छी फ़िल्म में कुछ सीमा तक वास्तविकता का पुट अपेक्षित होता है जिससे दर्शक उस कहानी तथा उसके पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर सकें। 'निकाह' इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती। कहानी अच्छी लगती है (विशेष रूप से इसका क्लाईमेक्स) और इसका मुस्लिम परिवेश भी पर इसके पात्र अपने आसपास के जीते-जागते लोगों जैसे नहीं लगते।

ख़ैर, जैसा कि मैंने ऊपर कहा, इस विषय-वस्तु को लेकर फ़िल्म बनाना ही बहुत बड़ी बात थी। इसके बाद फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ूबी रही इसके सुमधुर एवं सार्थक गीत। संगीतकार रवि ने गीतकार हसन कमाल द्वारा लिखे गए गीतों पर अत्यन्त मधुर संगीत दिया है। फ़िल्म में हसरत मोहानी की बहुत पुरानी ग़ज़ल 'चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है' भी डाली गई है जिसे मशहूर ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली ने गाया है। इसके अतिरिक्त 'दिल के अरमां आँसुओं में बह गए', 'बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी', 'दिल की ये आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले', फ़िज़ा भी है जवां जवां', 'चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में' आदि गीत भी लाजवाब हैं। सलमा आग़ा जितनी ख़ूबसूरत ख़ुद थीं, उनकी आवाज़ भी उतनी ही ख़ूबसूरत रही क्योंकि अपने पर फ़िल्माए गए गीत उन्होंने ख़ुद ही गाये हैं। पुरुष के गीतों पर आवाज़ महेन्द्र कपूर की है। 

तकनीकी दृष्टि से फ़िल्म उच्च स्तर की है। जहाँ तक अभिनय का प्रश्न है, सलमा आग़ा ने तो अच्छा अभिनय किया है लेकिन बाक़ी दोनों प्रमुख पात्रों से निर्देशक स्वाभाविक अभिनय नहीं करवा सके और वे अति-नाटकीयता से प्रभावित रहे। फ़िल्म अधिक लंबी नहीं है एवं आरंभ से अंत तक दर्शक को बाँधे रखती है। अगर फ़िल्मकार ने गरारे-दुपट्टों एवं मुस्लिम तहज़ीब से अधिक ध्यान कहानी की रूह पर दिया होता तो यह एक उत्कृष्ट फ़िल्म बन सकती थी। फिर भी इसे इसकी ख़ूबियों के कारण क्लासिक माना जाता है। मुझे स्वर्गीय के.पी. सक्सेना जी द्वारा की गई इस फ़िल्म की समीक्षा (जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी) का अंतिम वाक्य याद आता है - (फ़िल्म की कमियों के बावजूद) 'निकाह' ने मुझे निराश नहीं किया, तहज़ीब के बुझते हुए चिराग़ों का धुआँ भी महकदार होता है।

© Copyrights reserved

शनिवार, 13 जून 2026

वेद प्रकाश शर्मा का अद्भुत सृजन - विभा जिंदल

जब हिंदी में लुगदी साहित्य की श्रेणी के अंतर्गत विविध उपन्यास नियमित रूप से रचे जाते थे, तब कई उपन्यासकार कुछ ऐसे पात्रों का भी सृजन करते थे जो कि उनके उपन्यासों में दोहराए जाते थे। ऐसे पात्र स्टॉक कैरेक्टर अथवा स्थायी पात्र कहलाते थे। स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की विजय-विकास सीरीज़ के अंतर्गत बहुत-से पात्र ऐसे ही हैं। लेकिन इस सीरीज़ से हटकर भी उन्होंने कुछ ऐसे अद्भुत पात्रों का सृजन किया जो पाठकों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ गये। ऐसे एक पात्र का नाम है - विभा जिंदल।

विभा जिंदल को वेद प्रकाश शर्मा ने सबसे पहले अपने थ्रिलर उपन्यास 'साढ़े तीन घंटे' में प्रस्तुत किया था। वेद प्रकाश शर्मा ने उस उपन्यास में स्वयं को (तथा अपनी पत्नी मधु को) भी प्रस्तुत किया था। यद्यपि विभा का पात्र काल्पनिक ही है, वेद जी ने उन्हें अपने कॉलेज की सहपाठिनी बताया एवं यह बताया कि वे उनसे प्रेम करने लगे थे किन्तु उन्हें यह बात बताने से झिझकते थे। कॉलेज के अंतिम दिन विभा ने उनसे बातचीत की एवं बताया कि वे उनकी भावनाओं से परिचित हैं लेकिन उन्हें इन बातों से परे हटकर अपने लेखन पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि उनमें एक उच्च श्रेणी का जासूसी उपन्यासकार बनने के गुण हैं। वेद जी ने लिखा है (उपन्यास में अपनी पत्नी मधु को बताते हुए) कि विभा की बात को गांठ बाँधकर वे अन्य बातों से ध्यान हटाकर केवल लेखन में ध्यान लगाने लगे। विभा का विवाह एक उद्योगपति परिवार में अनूप जिंदल से हुआ तथा इस प्रकार वे जिन्दल परिवार की बहू बनीं और विभा जिन्दल कहलाने लगीं। वेद जी ने 'साढ़े तीन घंटे' में लिखा है कि वे सपत्नीक विभा से मिलने उनके नगर जिंदलपुरम गये। जिन्दल परिवार के भव्य आवास का नाम 'मंदिर' है क्योंकि उसकी दीवारों पर सम्पूर्ण रामायण अंकित की गई है। वेद जी की इसी यात्रा के दौरान विभा के पति अनूप जिंदल साढ़े तीन घंटे के लिए अपने कमरे में बंद हो जाते हैं तथा उस अवधि के पूर्ण होने पर स्वयं को गोली मारकर आत्महत्या कर लेते हैं। इस उपन्यास का कथानक यही है कि विभा अपने पति को खोने के ग़म को भूलकर किसी कुशल जासूस की भांति उनकी मृत्यु की छानबीन करने लगती हैं तथा अंत में वास्तविक अपराधी को पकड़ने के साथ-साथ सम्पूर्ण रहस्य को भी स्पष्ट कर देती हैं।

कुछ वर्षों के उपरांत वेद प्रकाश शर्मा ने विभा जिंदल को लेकर दूसरा उपन्यास लिखा - 'बीवी का नशा' जिसमें उन्होंने एक बार फिर स्वयं को एक पात्र के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने लिखा कि उनके एक मित्र संजय ने अपनी पत्नी की सहेली की हत्या कर दी थी जिसके आरोप में उसी की पत्नी किरन फंस गई थी और उसके पास कोई ऐसा सबूत नहीं था जिससे वह यह प्रमाणित कर सके कि हत्या उसकी पत्नी ने नहीं, ख़ुद उसी ने की थी। अब वेद जी उसे साथ लेकर चल देते हैं जिन्दलपुरम विभा जिंदल से मिलने और इस मामले में उनकी मदद माँगने। विभा संजय की मदद करती हैं एवं एक कुशल अण्वेषक (इनवेस्टिगेटर) की भांति न केवल सारे रहस्य की परतें खोल देती हैं बल्कि संजय को भी निर्दोष सिद्ध करके वास्तविक हत्यारे को बेनक़ाब कर देती हैं। वेद जी यह भी बताते हैं कि 'साढ़े तीन घंटे' में अपने पति की मृत्यु के समय विभा गर्भवती थीं तथा कुछ समय के उपरांत उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम बाद में वेद जी ने 'विराट' बताया।

एक दशक से अधिक के उपरांत वेद जी ने 'मि० चैलेंज' नामक एक उपन्यास लिखा जिसमें उन्होंने बताया कि उन्हीं के शहर मेरठ के एक कॉलेज में पहले एक महिला व्याख्याता का क़त्ल होता है एवं उसके बाद तो एक के बाद एक क़त्लों का सिलसिला ही चल पड़ता है। अब वे पुनः विभा को जिन्दलपुरम से बुलवाते हैं जिसके लिये वे स्वयं अपना ही अपहरण हो गया दर्शाते हैं। विभा जिंदलपुरम से आती हैं और पहले तो वेद जी को ही ढूंढ़ती हैं तथा उसके बाद सारे मामले की इनवेस्टिगेशन करके हत्यारे के चेहरे को अनावृत कर देती हैं। इस उपन्यास में वेद जी ने समय काल को ध्यान में रखते हुए (अपनी पत्नी मधु के साथ-साथ) अपने चार बच्चों का उल्लेख किया है तथा अपने नन्हे पुत्र शगुन को विभा के साथ-साथ रहकर उनकी इनवेस्टिगेशन में शामिल होते हुए बताया है। चूंकि इस उपन्यास की पृष्ठभूमि वेद जी ने अपने गृहनगर मेरठ को बनाया है, उपन्यास में मेरठ के विभिन्न स्थानों का भी उल्लेख है एवं पाठक उपन्यास के पृष्ठों के माध्यम से मेरठ की सैर करता है।

एक लंबे समय के अंतराल के बाद वेद जी ने विभा को लेकर पुनः एक उपन्यास लिखा - 'क्योंकि वो बीवियां बदलते थे'। इस उपन्यास की ख़ासियत यह है कि उपन्यास में हो रही विभिन्न हत्याओं का कारण उपन्यास के शीर्षक में ही स्पष्ट कर दिया गया है। फिर भी यह उपन्यास अत्यन्त रोचक बन पड़ा है। इस बार विभा को विभिन्न उद्योगपति घरानों के पुरुषों एवं महिलाओं की एक के बाद एक हो रही हत्याओं के रहस्य को सुलझाना है। इस काम में उनकी मदद वेद जी तथा उनका बेटा शगुन भी करते हैं। यह सुदीर्घ उपन्यास पाठकों के दिमाग़ को चकरा कर रख देता है। हत्यारे की वास्तविकता अंतिम पृष्ठ पर अंतिम पंक्तियों में ही पता चलती है। इस उपन्यास में वेद जी ने विभा के व्यक्तित्व पर भी आयु का प्रभाव पड़ा दिखाया है और साथ ही बताया है कि उनका पुत्र विराट अब बड़ा हो चुका है।

विभा जिंदल के ये चारों उपन्यास वेद जी की श्रेष्ठ कृतियों में सम्मिलित हैं। जिस प्रकार विश्वप्रसिद्ध रहस्यकथा लेखिका अगाथा क्रिस्टी ने मिस मार्पल नामक एक उम्रदराज़ महिला जासूस का अत्यन्त लोकप्रिय पात्र रचा है, कुछ-कुछ वैसा ही यह वेद जी द्वारा रचा गया पात्र है। विभा के साथ-साथ स्वयं को एवं अपने परिवार के सदस्यों को भी इन उपन्यासों में प्रस्तुत करके वेद जी ने न केवल इस काल्पनिक चरित्र पर वास्तविकता का रंग चढ़ाया है वरन उपन्यासों की रोचकता को भी बढ़ा दिया है। इन उपन्यासों में वेद जी ने स्वयं को एक सामान्य बुद्धि वाले व्यक्ति के रूप में ही चित्रित किया है। और जहाँ तक विभा के चित्रण की बात है, वेद जी ने अपने शब्दों से विभा के व्यक्तित्व का ऐसा जीवंत चित्र ख़ींचा है कि इन उपन्यासों को पढ़ते समय हमें लगता है मानो हम किसी काल्पनिक पात्र के बारे में नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि अपने सामने जीती-जागती विभा जिंदल को उपस्थित देख रहे हैं। यूँ तो वेद जी ने विकास, वतन, केशव पंडित आदि कई पात्रों का सृजन किया है लेकिन विभा जिन्दल की बात ही कुछ और है। जिन्हें हिंदी उपन्यास पढ़ने में रुचि है, उन्हें मैं सलाह दूंगा कि इन उपन्यासों को पढ़ें एवं जिन्दलपुरम के औद्योगिक साम्राज्य की मालकिन होते हुए भी सादगी से परिपूर्ण इस असाधारण नारी से मिलें।

© Copyrights reserved

शुक्रवार, 5 जून 2026

पूनम की रात

पूनम या पूर्णिमा या पूर्णमासी। इन सभी शब्दों का एक ही अर्थ है वह दिवस जिसकी रात पूरे चाँद की रात होती है अर्थात् चंद्रमा अपनी सम्पूर्ण सोलह कलाओं के साथ पूर्णतः गोलाकार स्वरूप में आकाश पर अवतरित होता है और वह रात चाँदनी रात कहलाती है। चूंकि इस रात का सौंदर्य अद्भुत होता है, ये नाम सौंदर्य के प्रतीक माने जाते हैं। इसीलिए कन्याओं के नाम चाँदनी, पूनम, पूर्णिमा आदि रखे जाते हैं। 

पर साथ ही इस रात का और इस रात को निकलने वाले पूर्ण गोलाई के चाँद का अन्य महत्व भी है। भौगोलिक दृष्टि से बात करें तो इस रात को समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटा प्रभावित होते हैं। ज्वार के रूप में समुद्र का जल बहुत ऊंचाई तक जाता है तथा भाटा के रूप में बहुत गहराई तक। कारण यह है कि इस रात को पृथ्वी सूर्य एवं चंद्रमा के मध्य में होती है जिसके कारण दोनों का ही गुरुत्वाकर्षण बल एक ही दिशा में काम करता है।

लेकिन इस लेख में मेरा विषय पूनम के चाँद का मनोवैज्ञानिक प्रभाव है। ऐसा माना जाता है कि जो मनुष्य कुछ असामान्य मानसिकता वाले हों, उन पर पूरे चाँद का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि उनकी असामान्यता बढ़ जाती है। यदि ऐसे व्यक्ति को नींद में चलने की बीमारी है तो पूनम की रात को ऐसा अवश्य होता है अर्थात् वह व्यक्ति नींद में चलता है (या चलती है) तथा ऐसी अवस्था में उसे अपने द्वारा किए गए किसी भी काम का आभास नहीं होता। इस विषय को आधार बनाकर उपन्यास भी लिखे गए हैं तथा फ़िल्म भी बनाई गई है। अर्ल स्टेनले गार्डनर ने इसी तथ्य को आधार बनाकर अपना पेरी मेसन सीरीज़ का उपन्यास 'The case of the sleepwalker's niece' लिखा तो हिंदी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक ने भी अपनी सुनील सीरीज़ के अंतर्गत 'पूरे चाँद की रात' नामक उपन्यास लिखा। 

निर्माता-निर्देशक-अभिनेता किशोर साहू ने इसी विषय को आधार बनाकर हिन्दी फ़िल्म 'पूनम की रात' (१९६५) बनाई। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं - मनोज कुमार, कुमुद छुगानी, शिव कुमार, नंदिनी, डी.के. सप्रू, लीला मिश्रा, रबीन्द्र बनर्जी, परवीन चौधरी, बेला बोस, प्रेम चोपड़ा एवं स्वयं किशोर साहू। किशोर साहू ने स्वयं ही इस फ़िल्म की कहानी लिखी है एवं इसे निर्देशित किया है। यह एक रहस्यकथा है।

फ़िल्म रानी नामक एक स्त्री के सीढ़ियों से गिरकर मर जाने से आरंभ होती है। बहुत बाद में जब शहर में रहकर अध्ययन कर रहा फ़िल्म का नायक मनोज कुमार एवं उसका मित्र शिव कुमार अपने कॉलेज के साथियों के साथ एक भ्रमण पर हैं तो शिव कुमार को अपने पिता (डी.के. सप्रू) के गंभीर रूप से अस्वस्थ होने का पता चलता है। वह मनोज कुमार के साथ अपने गृहनगर आता है तो मार्ग में एक दुकान पर मनोज कुमार को वर्षों पूर्व हुई रानी की रहस्यमय मृत्यु के विषय में सुनने का अवसर मिलता है जो कि शिव कुमार के पिता की रखैल बताई जाती थी। उसकी मृत्यु पूनम की रात को हुई थी। घर पहुँचने के बाद जहाँ उन्हें पता चलता है कि शिव कुमार के पिता लकवाग्रस्त हो गए हैं, वहीं मनोज कुमार को शिव कुमार के पूरे परिवार से मिलने का अवसर मिलता है। उसे संकेत मिलता है कि इस संयुक्त परिवार के विभिन्न सदस्यों में सद्भाव एवं स्नेह से युक्त संबंध नहीं हैं तथा कई सदस्य पारिवारिक संपत्ति पर नज़र गड़ाए हुए हैं। शिव कुमार की एक बहन कुमुद छुगानी मनोज कुमार से प्रेम करने लगती है तो दूसरी बहन नंदिनी भी उसकी ओर आकर्षित हो जाती है। 

रात को मनोज कुमार को एक रहस्यपूर्ण गीत सुनाई देता है (साथी रे, तुझ बिन जिया उदास रे) जिसे कोई महिला गा रही है। पर ढूंढ़ने पर उसे कोई नहीं मिलता। इस घर में हो रही केवल यही एक रहस्यमय बात नहीं है, ऐसी कई बातें हो रही हैं (विशेषतः रात को) जो उसके दिमाग़ को परेशान करती हैं। अचानक एक रात को शिव कुमार के लकवाग्रस्त पिता कोई भयावह बात देखते हैं और पलंग से नीचे गिर जाते हैं। इससे उनकी हालत और बिगड़ जाती है तथा वे अपने बोलने की शक्ति भी खो बैठते हैं। उनकी देखभाल के लिए उनके चिकित्सक किशोर साहू द्वारा रखी गई नर्स ग़ायब हो जाती है। बाद में उसकी लाश घर के अंदर ही बने हुए एक कुएं में मिलती है। ये घटनाएं पूनम की रात को होती हैं। चूंकि वहाँ के वातावरण का प्रभाव मनोज कुमार पर पड़ रहा है, उसकी असामान्य स्थिति को देखकर शिव कुमार को उसी पर नर्स की हत्या का संदेह होता है। वह किशोर साहू से इस विषय में बात करता है तो वे उसे पूनम की रात के असामान्य व्यक्तियों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बताते हैं। रहस्य का ख़ुलासा तब होता है जब अगली पूनम की रात आती है। 

फ़िल्म रहस्य से भरी है किन्तु निर्देशक ने कहानी के रहस्य को धीरे-धीरे फैलाया है। फ़िल्म मद्धम गति से आगे बढ़ती है लेकिन इसमें रोचकता की कोई कमी नहीं है। दर्शक फ़िल्म देखते समय अनुभव करता है जैसे उसके सामने कोई धुंध-सी छाई हुई है जो फ़िल्म के अंतिम दृश्य में ही हटती है तथा सब कुछ स्पष्ट होता है। नाच-गाने, रोमांस, कॉमेडी आदि के बावजूद यह रहस्य ही है जो फ़िल्म में व्याप्त है। इस दृष्टि से 'पूनम की रात' को एक विशुद्ध रहस्य फ़िल्म कहा जा सकता है। फ़िल्म के क्लाईमेक्स में कोई एक्शन नहीं है। केवल रहस्य को स्पष्ट किया गया है। सम्भवतः इसी कारण यह फ़िल्म विशेष सफल नहीं रही थी क्योंकि भारतीय दर्शक एक्शन से भरा क्लाईमेक्स देखने के आदी थे। राज खोसला या विजय आनंद जैसे रहस्यकथाओं को प्रस्तुत करने में निष्णात निर्देशक शायद इस कहानी को बेहतर ढंग से बना सकते थे लेकिन किशोर साहू ने भी विषय-वस्तु के साथ पूरा न्याय किया है और फ़िल्म के अंतिम दृश्य में सभी बातों को तार्किक ढंग से समझाया है।

यह श्वेत-श्याम फ़िल्म लगभग पूरी तरह से घर के भीतर ही फ़िल्माई गई है। कला-निर्देशक ने ठीक काम किया है जबकि छायाकार ने अपना कैमरा कुछ इस कुशलता से काम में लिया है कि आरंभ से अंत तक फ़िल्म में एक रहस्य का वातावरण बना रहता है। तकनीकी रूप से फ़िल्म अच्छी है। इसकी लंबाई भी अधिक नहीं है। शैलेंद्र के गीतों पर सलिल चौधरी ने मधुर संगीत दिया है। 'साथी रे, तुझ बिन जिया उदास रे' तो लता मंगेशकर का एक लोकप्रिय गीत है ही, अन्य गीत भी अच्छे बन पड़े हैं। पार्श्व संगीत फ़िल्म की विषय-वस्तु के अनुकूल है।

फ़िल्म की नायिका कुमुद छुगानी सहित अनेक कलाकारों (नंदिनी, शिव कुमार, रबीन्द्र बनर्जी आदि) की यह पहली ही फ़िल्म है। मनोज कुमार सहित सभी ने ठीक-ठाक काम किया है। मनोज कुमार के साथ कुमुद की जोड़ी अच्छी बन पड़ी है (इन दोनों की पहली मुलाक़ात बड़ी रोमांटिक और गुदगुदाने वाली है)। यदि मुझे सर्वश्रेष्ठ कलाकार को चुनना हो तो मैं लीला मिश्रा को चुनूंगा जिन्होंने शिव कुमार की बुआ की भूमिका निभाई है।

अब पूरे चाँद के साथ आने वाली पूनम या पूर्णिमा या पूर्णमासी की रात का मनुष्यों पर वस्तुतः कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं ‌‌(विशेषतः असामान्य व्यक्तियों के व्यवहार पर) यह तो मनोवैज्ञानिक ही जानें। पर यह भूली-बिसरी फ़िल्म निश्चय ही एक मनोरंजक फ़िल्म है जो सस्पेंस फ़िल्में देखने वालों को अवश्य पसंद आयेगी। 

© Copyrights reserved