मंगलवार, 23 जून 2026

वक़्त से आगे की फ़िल्म

मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ है कि किसी पुस्तक को दूसरी बार पढ़ते समय अथवा किसी फ़िल्म को दूसरी बार देखते समय उसके बारे में मेरे विचारों में परिवर्तन हुआ हो। इसका कारण यह है कि पुस्तक को दूसरी बार पढ़ते समय अथवा फ़िल्म को दूसरी बार देखते समय उसकी कुछ ऐसी ख़ूबियां अथवा ख़ामियां मेरी नज़र में आईं जो कि पहली बार में नज़रअंदाज़ हो गई थीं। लेकिन आज मैं एक ऐसी फ़िल्म के बारे में बात कर रहा हूँ जो कि मैंने उसके प्रदर्शन के लंबे समय बाद देखी। देखने से पहले तक बरसों से मैं केवल उसकी प्रशंसा ही पढ़ता एवं सुनता आया था पर जब उसे देखा तो लगा कि वह प्रशंसा कुछ ज़रूरत से ज़्यादा थी। आलोचकों ने फ़िल्म के गुणों पर ही ध्यान दिया, उसकी कमियों पर नहीं। वह फ़िल्म है - निकाह (१९८२) जिसका निर्माण किया था भारत की प्रतिष्ठित फ़िल्म निर्माण संस्था बी.आर. फ़िल्म्स ने।

भारत में 'तीन तलाक़' अब अवैध घोषित हो चुका है। इस दृष्टि से इसी विषय को आधार बनाकर बनाई गई यह फ़िल्म अपने वक़्त से आगे की फ़िल्म कही जा सकती है। यह फ़िल्म स्त्री-जाति (औरत) के एकालाप से आरंभ होती है जो कि तनूजा के स्वर में है और बताती है कि 'औरत' ने संसार में क्या योगदान दिया है और बदले में उसे क्या मिला है। स्त्री के रेखाचित्रों के साथ दर्शाए गए फ़िल्म के मुश्किल से तीन मिनट लंबे इस प्रारंभिक दृश्य में पुरुष-प्रधान समाज में उसकी स्थिति (चाहे कोई भी धार्मिक समुदाय हो) एवं उसके जीवन की विडंबनाओं का आख्यान है। सच पूछिए तो मुझे फ़िल्म का सर्वश्रेष्ठ दृश्य यही लगा।

'निकाह' का अर्थ होता है विवाह (मुस्लिम समुदाय में विवाह को निकाह कहा जाता है)। वस्तुतः इस फ़िल्म का मूल नाम 'तलाक़ तलाक़ तलाक़' रखा गया था किन्तु प्रदर्शन से पूर्व उसे बदलकर 'निकाह' कर दिया गया। फ़िल्म कहानी कहती है नीलोफ़र (सलमा आग़ा) नामक युवती की जिससे उसके कॉलेज जीवन में हैदर (राज बब्बर) एकतरफ़ा प्रेम करता था किन्तु उसका निकाह हो जाता है वसीम (दीपक पाराशर) से। वसीम एक धनी व्यवसायी है। विवाह के कुछ समय के उपरांत ही नीलोफ़र को लगने लगता है कि उसका यह विवाह अर्थहीन है क्योंकि वसीम के पास उसके लिये समय ही नहीं है। जब उनके विवाह की पहली वर्षगांठ पर नीलोफ़र द्वारा आयोजित पार्टी में भी वसीम नहीं आता तो बाद में पति-पत्नी में तकरार होती है और वसीम क्रोध में आकर नीलोफ़र को 'तलाक़ तलाक़ तलाक़' कह देता है एवं मुस्लिम शरीयत के अनुसार उनका विवाह-विच्छेद हो जाता है।

विवाह-विच्छेद के बाद नीलोफ़र को एक पत्रिका में नौकरी मिलती है जिसका संपादक है हैदर जो आज भी नीलोफ़र से प्रेम करता है। वह नीलोफ़र के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखता है जिसे नीलोफ़र स्वीकार कर लेती है एवं उनका विवाह (अर्थात् निकाह) हो जाता है। दूसरी ओर वसीम को अपनी भूल का अहसास होता है एवं वह नीलोफ़र से पुनः विवाह करना चाहता है। उसे पता चलता है कि शरीयत के अनुसार यह तभी संभव है जब नीलोफ़र किसी और से विवाह करे तथा उससे उसका तलाक़ हो जाए। उसे नीलोफ़र के हैदर से विवाह कर लेने की बात पता चलती है तो उसे लगता है कि हैदर से तलाक़ लेकर नीलोफ़र उससे पुनः विवाह कर सकती है। वह इस बाबत नीलोफ़र को सूचित करता है जो कि हैदर को पता लग जाता है। अब हैदर नीलोफ़र की ख़ुशी के लिए उसे तलाक़ देने को तैयार हो जाता है। पर नीलोफ़र क्या चाहती है ? अंत में नीलोफ़र एक औरत के रूप में अपने जीवन पर अपना अधिकार होने की घोषणा इन दोनों ही पुरुषों के समक्ष करती है और अपनी ज़िन्दगी का फ़ैसला ख़ुद करती है।

'निकाह' का विषय बहुत अच्छा है और जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी तो नवीन भी था। निर्माता-निर्देशक बलदेव राज चोपड़ा ने इस फ़िल्म के माध्यम से एक प्रगतिशील विचार को दर्शक समुदाय के सामने रखा। उन्होंने फ़िल्म के अंत में नीलोफ़र के चरित्र के अपने जीवन के संबंध में लिये गए निर्णय के द्वारा यह स्पष्ट किया कि स्त्री पुरुष की संपत्ति नहीं, जीवन-संगिनी है। इसीलिए मैंने इस फ़िल्म को अपने समय से आगे की फ़िल्म बताया क्योंकि उस समय मुस्लिम समाज में पुरुष द्वारा पत्नी को तीन बार तलाक़ कहकर विवाह-विच्छेद करने, मुस्लिम स्त्री के अपने पूर्व-पति से पुनर्विवाह की प्रक्रिया तथा सबसे बढ़कर मुस्लिम स्त्री के अपने जीवन पर अपना अधिकार होने की बातें करना ही सार्वजनिक रूप से वर्जित-सा था। फ़िल्म के अत्यन्त लोकप्रिय होने तथा भारी व्यावसायिक सफलता प्राप्त करने का प्रमुख कारण यही था। इसकी सफलता का दूसरा कारण था इसका उत्तम संगीत।

लेकिन फ़िल्म की जो कमी मैंने पकड़ी, वह यह है कि इसके चरित्र वास्तविक नहीं लगते, नक़ली लगते हैं। मैं यहाँ मुख्य चरित्रों की बात कर रहा हूँ। विशेष रूप से हैदर का जिस प्रकार से चरित्र-चित्रण किया गया है, वह कहीं से भी यथार्थ के निकट का नहीं लगता। अचला नागर की कहानी को चित्रपट पर उतारते समय निर्देशक बलदेव राज चोपड़ा यह चूक कर गए कि न तो कहानी वास्तविकता के निकट की बन पाई और न ही उसके किरदार वास्तविकता के निकट के बन पड़े। फ़िल्म के विचारोत्तेजक होने के बावजूद सम्पूर्ण फ़िल्म देखते समय मुझे यही लगा कि मैं काल्पनिक पात्रों की कोई काल्पनिक कहानी देख रहा हूँ जिसका वास्तविकता से दूर-दूर तक का संबंध नहीं है। हम जानते हैं कि (बॉलीवुड की) फ़िल्मी कहानियां वास्तविक नहीं हो सकतीं, फिर भी फ़िल्म में कुछ सीमा तक वास्तविकता का पुट अपेक्षित होता है जिससे दर्शक उस कहानी तथा उसके पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर सकें। 'निकाह' इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

ख़ैर, जैसा कि मैंने ऊपर कहा, इस विषय-वस्तु को लेकर फ़िल्म बनाना ही बहुत बड़ी बात थी। इसके बाद फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ूबी रही इसके सुमधुर एवं सार्थक गीत। संगीतकार रवि ने गीतकार हसन कमाल द्वारा लिखे गए गीतों पर अत्यन्त मधुर संगीत दिया है। फ़िल्म में हसरत मोहानी की बहुत पुरानी ग़ज़ल 'चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है' भी डाली गई है जिसे मशहूर ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली ने गाया है। इसके अतिरिक्त 'दिल के अरमां आँसुओं में बह गए', 'बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी', 'दिल की ये आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले', फ़िज़ा भी है जवां जवां', 'चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में' आदि गीत भी लाजवाब हैं। सलमा आग़ा जितनी ख़ूबसूरत ख़ुद थीं, उनकी आवाज़ भी उतनी ही ख़ूबसूरत रही क्योंकि अपने पर फ़िल्माए गए गीत उन्होंने ख़ुद ही गाये हैं। पुरुष के गीतों पर आवाज़ महेन्द्र कपूर की है। 

तकनीकी दृष्टि से फ़िल्म उच्च स्तर की है। जहाँ तक अभिनय का प्रश्न है, सलमा आग़ा ने तो अच्छा अभिनय किया है लेकिन बाक़ी दोनों प्रमुख पात्रों से निर्देशक स्वाभाविक अभिनय नहीं करवा सके। ख़ास तौर से राज बब्बर का अभिनय तो अति-नाटकीयता से प्रभावित है। फ़िल्म अधिक लंबी नहीं है एवं आरंभ से अंत तक दर्शक को बाँधे रखती है। अगर फ़िल्मकार ने गरारे-दुपट्टों एवं मुस्लिम तहज़ीब से अधिक ध्यान कहानी की रूह पर दिया होता तो यह एक उत्कृष्ट फ़िल्म बन सकती थी। फिर भी इसे इसकी ख़ूबियों के कारण क्लासिक माना जाता है। मुझे स्वर्गीय के.पी. सक्सेना जी द्वारा की गई इस फ़िल्म की समीक्षा (जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी) का अंतिम वाक्य याद आता है - (फ़िल्म की कमियों के बावजूद) 'निकाह' ने मुझे निराश नहीं किया, तहज़ीब के बुझते हुए चिराग़ों का धुआँ भी महकदार होता है।

© Copyrights reserved


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें