बुधवार, 20 जुलाई 2022

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

भूपिंदर नहीं रहे। न जाने क्यों अट्ठारह जुलाई के दिन का कोमल भावनाओं एवं संगीत से संबंध रखने वाले कलाकारों से एक विचित्र-सा संबंध मुझे दृष्टिगोचर हुआ ? ठीक एक दशक पूर्व इसी दिन अपने समय में प्रेमिल चलचित्रों के पर्याय बन चुके राजेश खन्ना दिवंगत हुए थे। उस घटना के परिणामस्वरूप मेरी लेखनी से उनकी कालजयी फ़िल्म 'अमर प्रेम' (१९७२) पर एक लेख फूट पड़ा था। आज भूपिंदर के देहावसान के दुखद समाचार ने मुझे 'हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा' गीत की याद दिला दी। मैंने 'परिचय' में रेखांकित किया है कि हिन्दी फ़िल्मी गीतों में मेरा सर्वप्रिय गीत यही है। 

६ फ़रवरी, १९४० को अमृतसर में एक संगीत शिक्षक के पुत्र के रूप में जन्मे भूपिंदर के हृदय में संगीत के प्रति प्रेम विलम्ब से जागृत हुआ किन्तु एक बार जागृत हो गया तो उसके उपरान्त संगीत से उनका संबंध जीवनपर्यन्त रहा। उन्होंने गिटार तथा वायलिन बजाना सीखा एवं ग़ज़ल गायकी में रूचि लेना आरंभ किया। अंततः तो वे ग़ज़ल गायक के रूप में ही सुविख्यात हुए किन्तु उनके गायन की यात्रा तब आरंभ हुई जब १९६२ में (जिन दिनों वे आकाशवाणी में सेवारत थे), प्रारब्ध ने उनकी भेंट हिन्दी फ़िल्मों के महान संगीतकार मदन मोहन जी से करवा दी। मदन मोहन जी की प्रेरणा से वे दिल्ली से मुम्बई (बम्बई) चले आए। प्रसिद्ध फ़िल्मकार चेतन आनंद जी ने जब भारत-चीन युद्ध पर आधारित अपनी अमर कृति 'हक़ीक़त' (१९६४) का निर्माण किया तो उसका संगीत मदन मोहन जी ने दिया। और कैफ़ी आज़मी साहब के रचे हुए हृदयस्पर्शी गीतों पर मदन मोहन जी ने कालजयी संगीत का सृजन किया। इन दोनों विभूतियों ने सात मिनट की अवधि तथा चार अंतरों वाला एक असाधारण गीत सिरजा जिसकी आरंभिक पंक्ति है - हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा। इसके द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ अंतरों को गाने हेतु मदन मोहन जी ने तीन वरिष्ठ एवं दिग्गज गायकों - क्रमशः मोहम्मद रफ़ी, तलत महमूद एवं मन्ना डे का चयन किया किन्तु गीत की स्थायी एवं प्रथम अंतरे के गायन हेतु उन्होंने अत्यंत युवा भूपिंदर को चुना। और भूपिंदर का गाया हुआ वह प्रथम गीत ही हिंदी फ़िल्म संगीत के इतिहास की अनमोल धरोहर बन गया। इस गीत को पटल पर देखते समय संगीत, साहित्य तथा सिनेमा के प्रेमी इस प्रकार मंत्रमुग्ध हो जाते हैं कि किसी को सूझता ही नहीं कि गीत को गाते हुए जो अभिनेता फ़िल्म के दृश्य में दिखाई दे रहे हैं; वे भी कोई अन्य नहीं, स्वयं भूपिंदर ही हैं। 

भूपिंदर कभी काम पाने के निमित्त किसी के पीछे नहीं भागे। इसीलिए उन्होंने फ़िल्मी गीत कम ही गाए लेकिन जो गाए, उनमें से अधिकांश ऐसे रहे जो संगीत के शैदाइयों के लिए हीरे-जवाहरात से भी ज़्यादा क़ीमती साबित हुए। इसी वर्ष सुर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर भी दिवंगत हुई हैं। भूपिंदर ने लता जी के साथ शास्त्रीय राग 'यमन कल्याण' पर आधारित 'बीती ना बिताई रैना' (परिचय-१९७२) तथा 'नाम गुम जाएगा' (किनारा-१९७७) जैसे अविस्मरणीय गीत गाए। 'घरौंदा' (१९७७) फ़िल्म के लिए रूना लैला जी के साथ मिलकर 'दो दीवाने शहर में' मस्ती के साथ गाया तो उसी गीत का एकाकी संस्करण 'एक अकेला इस शहर में' उदास स्वर में भी गाया। फ़िल्मी गायन के क्षेत्र में उन्हें ब्रेक देने वाले मदन मोहन जी ने ही उनसे गुलज़ार साहब द्वारा फ़िल्म 'मौसम' (१९७५) हेतु रचित असाधारण गीत 'दिल ढूंढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन' गवाया - लता जी के साथ भी (द्रुत गति में) एवं अकेले भी (मद्धम गति में)। इनके अलावा 'रुत जवां जवां' (आख़िरी ख़त-१९६६), 'आने से उसके आए बहार' (जीने की राह-१९६९), 'ज़िंदगी मेरे घर आना' (दूरियाँ-१९७९), 'थोड़ी सी जमीन थोड़ा आसमान' (सितारा-१९८०), 'हुज़ूर इस क़दर भी न इतरा के चलिए' (मासूम-१९८३) और 'आवाज़ दी है आशिक़ नज़र ने' (ऐतबार-१९८५) जैसे कई यादगार गीतों में भूपिंदर ने अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा।

उन्होंने कई फ़िल्मी गीतों के लिए अपना स्वर देने के स्थान पर गिटार ही बजाया। क्या 'चिंगारी कोई भड़के' (अमर प्रेम-१९७२), 'तुम जो मिल गए हो' (हंसते ज़ख़्म-१९७३), 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' (यादों की बारात-१९७३) और 'चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना' (चलते चलते-१९७६) जैसे सुमधुर गीतों को सुनते हम कल्पना कर सकते हैं कि उस गीत के संगीत में जो गिटार बज रहा है, उसे भूपिंदर बजा रहे हैं ? 

लेकिन उनका मन ग़ज़ल गाने में ज़्यादा रमता था। उन्होंने निदा फ़ाज़ली साहब की कालजयी ग़ज़ल 'कभी किसी को मुक़म्मल जहाँ नहीं मिलता' को अपने स्वर में भी अजरअमर कर दिया। यह ग़ज़ल फ़िल्म 'आहिस्ता आहिस्ता' (१९८१) में सम्मिलित की गई जिसे ख़य्याम साहब ने संगीतबद्ध किया। और 'ऐतबार' (१९८५) फ़िल्म के लिए भूपिंदर द्वारा आशा भोसले जी के साथ गाई हुई ग़ज़ल 'किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है' निस्संदेह हिन्दी सिने-संगीत की सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लों में सम्मिलित की जा सकती है (इसे हसन कमाल जी ने लिखा था एवं बप्पी लहरी जी ने संगीतबद्ध किया था)। अंततः जब सत्तर के दशक के अंत में टेप पर बजाई जाने वाली कैसेटों के युग के सूत्रपात के साथ ग़ैर-फ़िल्मी ग़ज़लों का दौर आरम्भ हुआ तो भूपिंदर की गाई हुई ग़ज़लों ने शायरी और मौसीक़ी दोनों ही के शैदाइयों के दिल लूट लिए। 

१९७८ में भूपिंदर की मुलाक़ात बांग्लादेश की निवासिनी मिताली मुखर्जी से हुई जो ख़ुद भी एक गायिका थीं (और हैं)। सरहदें दिलों को मिलने से भला कब रोक पाई हैं ? प्यार हुआ और फिर भूपिंदर-मिताली शादी के बंधन में भी बंधे। दोनों मिलकर गाने लगे और फिर भूपिंदर-मिताली के 'आरज़ू', 'अर्ज़ किया है', 'गुलमोहर', 'तू साथ चल', 'दर्द'-ए-दिल', 'आपस की बात', 'अक्सर', 'जज़्बात', 'मोहब्बत', 'एक आरज़ू', 'शमा जलाए रखना', 'एक हसीन शाम', 'चाँदनी रात', 'आपके नाम' और 'दिल की ज़ुबां' जैसे सुरीले एलबम लोगों के दिलों पर छा गए। मिताली ने अपने एकल एलबम भी निकाले और इन दोनों ने बांग्ला भाषा में भी अपने गीतों के एलबम संगीत-प्रेमियों को प्रस्तुत किए। उन्हें गुलज़ार साहब का भी भरपूर साथ मिला जिसके परिणामस्वरूप संगीत तथा साहित्य दोनों ही के रसिकों को अनमोल उपहार मिले। भूपिंदर-मिताली द्वारा मिलकर गाई गई ग़ज़ल 'राहों पे नज़र रखना, होठों पे दुआ रखना, आ जाए कोई शायद, दरवाज़ा खुला रखना' एक ऐसा नायाब शाहकार है जिसे एक बार सुन लेने के बाद भूलना शायद ही मुमकिन हो।  

मैं इस महान गायक और संगीतज्ञ के साथ न्याय करने योग्य लेख लिखने में स्वयं को असमर्थ पा रहा हूँ। संगीत के संसार में भूपिंदर के योगदान पर तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है एवं लिखा जाना चाहिए। इस वक़्त मैं अपनी बात को भूपिंदर द्वारा फ़िल्म 'बाज़ार' (१९८२) के लिए गाई गई (बशर नवाज़ जी की लिखी हुई एवं ख़य्याम साहब द्वारा संगीतबद्ध) नज़्म की इन पंक्तियों के साथ विराम देता हूँ -  

करोगे याद तो हर बात याद आएगी 
गुज़रते वक़्त की हर मौज ठहर जाएगी

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शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

औरों के ग़म कैसे बाँटें ?

स्वर्गीय जगजीत सिंह जी की गाई हुई और रियाज़ ख़ैराबादी साहब की रची हुई एक ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद है जिसके बोल हैं - वो कौन है दुनिया में जिसे ग़म नहीं होता; किस घर में ख़ुशी होती है, मातम नहीं होता ? सच ही तो है। कोई विरला ही होता है जिसे जीवन में कभी दुख न मिला हो। ग़मगीन इंसान ख़ुद को इस गीत के बोलों से भी तसल्ली दे सकता है - दुनिया में कितना ग़म है, मेरा ग़म कितना कम है (जिसे हिन्दी फ़िल्म 'अमृत' के लिए आनंद बक्षी जी ने रचा तथा अनुराधा पौडवाल जी व मोहम्मद अज़ीज़ जी ने गाया)। लेकिन दुखते दिल को तसल्ली इतनी आसानी से कहाँ मिलती है ?

पुरातन काल में सुखभोगों में पले कपिलवस्तु राज्य के राजकुमार सिद्धार्थ ने नगर-भ्रमण करते हुए जब सर्वत्र दुख-ही-दुख देखा तो वे असहज होकर रात्रि के गहन अंधकार में गृह एवं परिवार (पत्नी यशोधरा एवं पुत्र राहुल) को त्याग कर सत्य के अण्वेषण हेतु निकल पड़े। और एक दिन उन्हें यह ज्ञान हुआ कि संसार में दुख है तथा दुख का कारण भी है। उन्होंने इस कारण के निवारण के उपाय भी विचारे तथा शेष जीवन गौतम बुद्ध बनकर संसार को अपने उपदेशों से आलोकित करने में व्यतीत किया।

मैंने इस बाबत जब भी सोचा, मुझे यही लगा कि ज्ञान हासिल करके बुद्ध ख़ुद तो तर गए मगर उनके बाद दुनिया में क्या वाक़ई कोई बेहतरी आई ? उन्होंने ठीक समझा कि संसार में दुख है और दुख का कारण भी है पर ... पर किसी के दुख के कारण का समाधान करके उसके दुख को दूर किया जाए अथवा उनकी भांति प्रत्येक व्यक्ति प्रयास करके जैसा ज्ञान उन्हें प्राप्त हुआ, वैसा ज्ञान प्राप्त करके दुखमुक्त हो जाए ? क्या प्रत्येक दुखी व्यक्ति हेतु ऐसा संभव है ? निश्चय ही नहीं है। उन्हीं की भांति संसार के भिन्न-भिन्न भागों में अनेक महापुरुष हुए जिन्होंने अपने उपदेशों द्वारा ज्ञान का प्रकाश विकीर्ण किया किन्तु उनके अवसान के उपरांत संसार में कोई विशेष गुणात्मक परिवर्तन नहीं आया। क्यों ?

इस प्रश्न का उत्तर मुझे रजनीश (ओशो) के एक कथन में मिला जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे महापुरुषों का व्यक्तित्व एक मशाल की भांति होता है लेकिन उस मशाल की ज्योति वस्तुतः वे स्वयं ही होते हैं; अतः जब तक वे जीवित रहते हैं, मशाल का प्रकाश विद्यमान रहता है एवं उनके देहावसान के साथ ही उस मशाल की ज्योति भी लुप्त हो जाती है; तदोपरांत उनके (वास्तविक भी, तथाकथित भी) अनुयायी केवल मशाल के बुझे हुए डंडे को लेकर उनके नाम की माला जपते रहते हैं। परिणाम ? संसार एवं मानवजाति मन एवं व्यवहार से वैसी ही बनी रहती है जैसी उनके आगमन से पूर्व थी।

विगत वर्ष हमने सुप्रसिद्ध शायर कुँअर बेचैन जी को खोया जिन्होंने अपनी एक ग़ज़ल के एक शेर के द्वारा दुख के निवारण (अथवा उसे न्यून करने) का उपाय बताया है -  तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी, किसी के पाँव का काँटा निकालकर देखो। मैंने इस बात पर एक अरसे तक यकीन किया। अब नहीं करता हूँ क्योंकि अपने पिता की ज़िन्दगी को देखकर और अपनी ज़िन्दगी को गुज़ारते हुए मैंने इस हक़ीक़त को जान लिया है कि औरों के ग़म बाँटने से अपने ज़ख़्म नहीं भरते हैं।

फिर भी कुँअर बेचैन जी ने जो कहा, उसकी महत्ता किसी भी दृष्टिकोण से कम नही आँकी जा सकती। समग्रता में दुख को घटाने का इससे उत्तम उपाय कोई अन्य नहीं है कि प्राणी परस्पर दुख बांटें। यह वह भावनात्मक बीमा है जिसकी अवधि (अर्थात् दुख बाँटने वाले की आयु) पूर्ण हो जाने पर आत्मिक संतोष के अतिरिक्त सम्भवतः कुछ भी प्राप्त नहीं होता किन्तु समाज को, मानवता को एवं सम्पूर्ण सृष्टि को इस अवधि में बहुत कुछ प्राप्त होता है। 

दुखी व्यक्ति किसी पर विश्वास करने का इच्छुक तो होता है किन्तु उसके लिए यह कोई सरल निर्णय नहीं होता क्योंकि जैसा कि कविवर रहीम ने सैकड़ों वर्ष पूर्व ही परामर्श दिया था -  

रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय 
सुनि अठिलैहें लोग सब, बाँटि न लैहें कोय

अपना दुख अन्य व्यक्तियों के मनोरंजन का साधन बन जाए, यह किसी दुखी व्यक्ति को भला कैसे स्वीकार्य होगा ? ग़मज़दा इंसान क्या किसी को अपनी दास्तान-ए-ग़म इसलिए सुनाए कि वह सुनकर उसी का मज़ाक़ उड़ाने लगे ? क्या अपने दिल का ज़ख़्म किसी के सामने इसलिए उघाड़ा जाए कि वह उस पर नमक बुरकने लगे ? किसे गवारा हो सकता है यह ? लेकिन अफ़सोस की बात यही है कि अक्सर ऐसे ही लोग मिलते हैं ज़माने में जो दूसरों की हालत को समझने की तक़लीफ़ उठाने की जगह उन्हीं पर फ़तवे देने लगते हैं (अंग्रेज़ी में इसे जजमेंटल होना कहते हैं)।

दूसरों के दुख बाँटने का अभिलाषी अनिवार्य रूप से एक संवेदनशील व्यक्ति होता है (या होती है) - वास्तविक अर्थों में संवेदनशील जिसकी संवेदना 'मुँह देखकर तिलक करने' वाली न हो, प्रदर्शनी न हो, संवेदना प्रकट करने का अभिनय न हो। ऐसा व्यक्ति दूसरों पर बात-बेबात टीका-टिप्पणी करने वाला (जजमेंटल) नहीं हो सकता (या सकती। क्या विशेषताएं होनी चाहिए उस व्यक्ति में जो दूसरों के दुख बाँटना चाहे ? 

यदि दुखी व्यक्ति के दुख का कारण उसके साथ हुआ कोई अन्याय अथवा उस पर हुआ कोई अत्याचार है तो उसका दुख तो न्याय मिलने से ही कम हो सकता है। जो व्यक्ति इस संदर्भ में उसकी सहायता करने में सक्षम हैं, वे इस प्रकार उसका दुख बाँट सकते हैं किन्तु प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति ऐसा सक्षम नहीं होता (यद्यपि सौभाग्य से अनेक व्यक्तियों ने अपने सीमित संसाधनों के साथ भी इस दिशा में सार्थक कार्य किया है एवं उनमें से अधिकांश ने इसका व्यक्तिगत स्तर पर भारी मूल्य भी चुकाया है)। ऐसे में दुख बाँटने का कार्य कहे-अनकहे शब्दों द्वारा किया जा सकता है। मैं इसी संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य एवं अपने विचार रखने जा रहा हूँ।

यदि आप किसी दुखी (अथवा परेशान) व्यक्ति की भौतिक रूप से सहायता करते हैं तो इतना ध्यान रहे कि ऐसा करते समय आपकी किसी बात अथवा भाव-भंगिमा से उसके आत्म-सम्मान को ठेस न लगे। हमारी संस्कृति में दान एवं उसके द्वारा दीन-दुखियों-निर्धनों की सहायता करने की बड़ी महिमा है किन्तु दान केवल दाता पर ही नहीं, प्राप्तकर्ता भी निर्भर करता है। ख़ुद्दार इंसान को ज़रूरतमंद होते हुए भी किसी के सामने हाथ पसारना या अपनी ग़रीबी और बेबसी को बे-पर्दा करना मंज़ूर नहीं होता। श्रीकृष्ण-कथा में सुदामा का चरित्र इसका अनुपम उदाहरण है। अगर कोई मददगार उसकी ख़ुद्दारी को चोट पहुँचाकर उसकी मदद भी करे तो ऐसी मदद उसके लिए ज़हर जैसी ही होती है जिसे वह अपनी मजबूरी की वजह से क़ुबूल भी कर ले तो ताज़िन्दगी उसे चैन नहीं मिलता (मेरे अपने साथ जीवन में ऐसा एक से अधिक बार हो चुका है)। इसलिए मेरा दूसरों की सहायता करने वालों से निवेदन है कि सहायता करते समय ध्यान रखें कि उनके किसी भी कथन अथवा कृत्य से सहायता लेने वाले का स्वाभिमान आहत न हो, अन्यथा वह सहायता उस दुखी के दुख को घटाने के स्थान पर बढ़ा सकती है। एक अन्य महत्वपूर्ण बात जो मैं रेखांकित करना चाहता हूँ, वह यह है कि यदि आप किसी की सहायता न कर सकें तो कम-से-कम उसे कोई बिन मांगी सलाह (या उपदेश) भी न दें।

और ग़मगीन इंसान का ग़म उसे बिना कुछ दिये या उसके लिए बिना कुछ किये भी बाँटा जा सकता है। अगर हक़ीक़तन हम किसी का ग़म बाँटना चाहते हैं तो उस पर अपने दिल का हाल कहने के लिए दबाव नहीं डालना चाहिए। अगर हमारी छवि उसकी नज़र में अच्छी है और ऐसी है कि वह हम पर अपना ऐतबार ला सके तो वह ख़ुद ही कहेगा (या कहेगी)। ऐसे में केवल चुप रहना और अपनी मौजूदगी से उसे अपनेपन का एहसास दिलाना ही काफ़ी है। यदि वह एकांत की इच्छा प्रकट करे तो कुछ समय के लिए उसे एकांत अवश्य देना चाहिए (बीच-बीच में छुपकर उस पर दृष्टि रखकर इस बात का ध्यान रखते हुए कि कहीं उसका दुख अवसाद का रूप लेकर उसे आत्मघात अथवा ऐसा ही कोई अन्य नकारात्मक कार्य करने के पथ पर न ढकेल दे)।

मैंने कई बार ऐसा देखा (और भुगता भी) है कि दुखी व्यक्ति से संबद्ध लोग (उसके दुख को जाने बिना ही) उस पर कुछ-न-कुछ खाने-पीने का दबाव डालने लगते हैं। माना कि जीवन के लिए आहार अनिवार्य है लेकिन जिसका मन दुखी हो, उसे इस प्रकार का दबाव और अधिक मानसिक कष्ट देता है। जब वह व्यक्ति दुख से कुछ उबरकर सामान्य अवस्था की ओर लौटेगा (या लौटेगी) तो स्वतः ही उसकी देह की आवश्यकता उसे आहार ग्रहण करने के लिए प्रेरित करेगी। उससे पहले उसके चाहे बिना उसे बलपूर्वक कुछ खिलाना (या पिलाना) या इसके लिए उसे बार-बार कहना उस दुखी व्यक्ति के दुख की अग्नि में घी का ही काम करता है और उसका दुख चिड़चिड़ेपन में परिवर्तित हो जाता है। दुख घटने में अपना समय लेता है एवं दुखी मन को कुछ भी नहीं सुहाता, इस तथ्य को समझा जाना चाहिए विशेष रूप से तब जब दुखी के दुख का कारण भी भलीभांति ज्ञात न हो।

और अगर वह इंसान अपने दिल का दर्द बाँटना चाहे तो उसकी बात बिना उसे रोके‌-टोके बेहद सब्र के साथ सुनी जानी चाहिए। धीरज के साथ किसी दुखी व्यक्ति की दुखभरी बात को बिना व्यवधान डाले सुन लेना उसके घाव पर शीतल लेप लगाने के समान है जिससे कुछ समय के लिए तो उसे हलकापन तथा विश्रांति का अनुभव होता ही है। उसके वक्तव्य के बीच-बीच में हुंकारा भरना एवं यदि वह बोलते-बोलते एकाएक मौन हो जाए तो उसे आगे बोलने हेतु (एक-दो शब्दों के द्वारा) तनिक प्रोत्साहन दे देना ही पर्याप्त होता है। अगर वह रोने लगे तो उसे ज़बरदस्ती चुप कराने की जगह थोड़ा-सा ढाढ़स बंधाना और उसके आँसुओं को निकल जाने देना ही ठीक होता है। मेरे नज़रिये में ऐसे शख़्स को रोने से कभी रोका नहीं जाना चाहिए जिसके दिल के फफोले आपके सामने फूटे हों। आँसुओं के साथ पूरा दर्द चाहे न निकले, उसका एक हिस्सा तो निकल ही जाता है। और उसके बाद जो ऐतबार उसने सुनने वाले पर जताया है, उसे क़ायम रखते हुए जब तक हो सके (और जहाँ तक मुनासिब हो), उसकी बताई हुई बात को राज़ ही रखा जाना चाहिए। यदि दुखी व्यक्ति को यह ज्ञात हो कि उसने जिस पर विश्वास करके उसके समक्ष अपने हृदय की पीड़ा को प्रकट किया था, उसने उसकी गोपनीयता भंग कर दी तो उसकी पीड़ा तो बढ़ेगी ही, उसके लिए  अपने जीवन में पुनः किसी अन्य पर विश्वास करना भी अत्यंत कठिन हो जाएगा। 

जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, किसी का दुख बाँटने की प्रक्रिया में स्वयं उस पर अथवा उसके साथ जो बीती है, उस पर अनावश्यक टीका‌-टिप्पणी करना सर्वथा वर्जनीय है। पहली बात तो यह है कि आप सर्वज्ञ नहीं हैं एवं बिना यथेष्ट जानकारी एवं अनुभव के अपना ज्ञान (नि:शुल्क) वितरित करना कोई बुद्धिमत्ता अथवा परिपक्वता नहीं है। दूसरे, ज़िन्दगी सबके साथ जुदा-जुदा ढंग से पेश आती है, इसीलिए लोगों के तजुर्बात और दर्द भी जुदा-जुदा होते हैं। अपनी तक़लीफ़ को मुक़म्मल तौर से वही जानता (या जानती) है जिस पर गुज़री है। जूता कहाँ काटता है, यह जूता पहनने वाले को ही पता चल सकता है, न पहनने वाले को नहीं। अतः किसी का ग़म बाँटने के लिए उसके हालात को उसकी नज़र से देखने की कोशिश करनी चाहिए। यह काम मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं। ग़मज़दा इंसान की जगह पर ख़ुद को रखकर देखने पर हम उसके ग़म और उसके दिल की हालत को बेहतर समझ सकते हैं, उसके दर्द को बाँटने की ज़िम्मेदारी बेहतर ढंग से निबाह सकते हैं। हमें इस बात को भी गाँठ बाँध लेना चाहिए कि दूसरे का दर्द बाँटकर हम उस पर कोई एहसान नहीं कर रहे हैं। अगर हम अच्छे हैं तो हमारी अच्छाई अपना इनाम ख़ुद है, हमें बदले में कुछ मिलने की उम्मीद कभी नहीं करनी चाहिए (हमदर्दी के बदले हमदर्दी की भी नहीं)।

बरसों पहले मेरे एक दोस्त ने एक बार बातचीत के दौरान मुझसे कहा था - जो सबकी परवाह करता है, उसकी परवाह कोई नहीं करता है। मैंने इस सत्य को अपने स्वर्गीय पिता के जीवन में प्रत्यक्ष देखा एवं धीरे-धीरे अनुभव से यह जाना कि निस्वार्थ भाव से अन्य व्यक्तियों के दुख बाँटने वाले सभी लोगों के साथ ऐसा चाहे न होता हो, अधिकांश के साथ तो होता ही है कि उनके अपने दुख को समझने वाला उन्हें कोई नहीं मिलता (बाँटने वाले की तो बात ही छोड़िए)। लेकिन ऐसे सोने का दिल रखने वाले लोगों को इस कड़वी सच्चाई का सामना करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। अगर औरों के ग़म बाँटते रहने पर भी ख़ुद उन्हें सारी ज़िन्दगी घुट-घुटकर जीना पड़े तो उन्हें कोई शिकवा नहीं करना चाहिए और अपने लिए यही मान लेना चाहिए कि - 

ज़ख़्म-ए-दिल-ओ-जिगर की नुमाइश फ़िज़ूल है 
हर एक से इलाज की ख़्वाहिश फ़िज़ूल है

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