बुधवार, 20 जनवरी 2021

एक फ़िल्म जो आज भी मेरे हताश मन को संबल देती है

इस लेख के शीर्षक में 'एक फ़िल्म' की ओर इंगित किया गया है, अत: स्वाभाविक ही है कि उस फ़िल्म से संबंधित बातें मुझे लिखनी हैं । परंतु मुख्यतः इस लेख में मैं जो बताना चाहता हूँ, वह यह है कि ऐसा क्या है उस प्रत्यक्षतः मनोरंजनार्थ बनाई गई व्यावसायिक फ़िल्म में जो वह मेरे जीवन का एक अंग बन गई है । वह है बॉलीवुड के भट्ट बंधुओं (मुकेश भट्ट-महेश भट्ट) द्वारा १९९९ में बनाई गई तनूजा चंद्रा द्वारा निर्देशित अक्षय कुमार, प्रीति ज़िंटा एवं आशुतोष राना की प्रमुख भूमिकाओं वाली हिंदी फ़िल्म 'संघर्ष' ।

पहले फ़िल्म की ही बात कर ली जाए । इसे महेश भट्ट ने लिखा है तथा ऐसा कहा जाता है कि इसकी कथा उन्होंने १९९१ में आई हॉलीवुड फ़िल्म 'द साइलेंस ऑव द लैम्ब्स' से प्रेरित होकर लिखी थी । कई ऑस्कर पुरस्कार जीतने वाली यह फ़िल्म इसी नाम के एक प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित थी । बहरहाल महेश भट्ट ने चाहे कोई मौलिक कहानी न लिखकर एक विदेशी कहानी को ही भारतीय परिवेश में लिखकर प्रस्तुत किया, लेकिन बाख़ूबी किया । यह वह नक़ल थी जो अक़्ल लगाकर की गई थी । अत्यंत तीव्र गति से चलने वाले घटनाक्रम को धार दी गिरीश धमीजा के प्रभावी संवादों ने, रजतपट पर कभी हृदय को कंपित कर देने वाले तो कभी हृदयतल को स्पर्श कर लेने वाले ढंग से प्रदर्शित किया छब्बीस वर्षीया तनूजा चंद्रा के कुशल निर्देशन ने तथा उसे आँधी सरीखा स्वरूप प्रदान कर दिया अमित सक्सेना के संपादन ने जिन्होंने अपनी संपादकीय कैंची कुछ ऐसी तीव्रता से चलाई कि दर्शक को सोच-विचार करने का समय ही न मिले तथा वह अपनी श्वास रोके अपने समक्ष पटल पर प्रवाहित हो रहे कथानक को आदि से अंत तक टकटकी लगाकर देखता चला जाए; न मध्यान्तर होने का पूर्वाभास हो सके और न ही कथा-प्रवाह के अपनी चरम सीमा पर जा पहुँचने का । एक्शन से भरपूर इस फ़िल्म में कला-निर्देशक तथा एक्शन-निर्देशक दोनों ने ही अत्यंत सराहनीय कार्य किया है । चरम (क्लाईमेक्स) में हिंसा इतनी अधिक एवं इतनी वीभत्स है कि मुझे लगता है कि बलि चढ़ाने वाले अंधविश्वासी अपराधी से एक बालक की प्राण-रक्षा की कथा होने पर भी  यह फ़िल्म 'केवल वयस्कों के लिए' ही है (सेंसर प्रमाण-पत्र में तो फ़िल्म को इसी श्रेणी में रखा गया था किन्तु फ़िल्म के पोस्टरों पर 'ए' अंकित नहीं था) ।
फ़िल्म का एक अत्यंत प्रभावी पक्ष गीत-संगीत भी है । समीर द्वारा रचित सुंदर शब्दों को जतिन-ललित ने मधुर धुनों में  ढाला है  यद्यपि फ़िल्म का एक बहुत ही सुंदर गीत - 'हम बड़ी दूर चले आए हैं चलते-चलते'  फ़िल्म में सम्मिलित नहीं किया गया है  तथा उसे केवल एलबम में ही सुना जा सकता है । और मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस फ़िल्म का एक गीत 'मुझे रात-दिन बस मुझे चाहती हो, कहो-न-कहो मुझको सब कुछ पता है'' वस्तुतः ओ.पी.नैयर  साहब  द्वारा रचे गए एवं मोहम्मद रफ़ी साहब द्वारा गाए गए एक बहुत पुराने गीत 'मुझे देखकर आपका मुसकराना मोहब्बत नहीं है तो फिर और क्या है' (जिसे १९६२ में आई फ़िल्म 'एक मुसाफ़िर एक हसीना' के लिए एस.एच. बिहारी जी ने लिखा था) की निर्लज्जता से की गई संपूर्ण नक़ल है । फ़िल्म के जो गीत मुझे अधिक पसंद आए, उनका उल्लेख मैं आगे पृथक् रूप से करूंगा । और यह लिख देना भी मैं समीचीन समझता हूँ कि फ़िल्म का पार्श्व संगीत भी प्रशंसनीय है जो फ़िल्म के समेकित प्रभाव को परिवर्धित कर देता है ।

अभिनय पक्ष भी अत्यंत सबल है । खलनायक आशुतोष राना ने अपने दिल दहला देने वाले अभिनय के कारण इस फ़िल्म की अपनी भूमिका के लिए कई पुरस्कार जीते जिसके वे सर्वथा योग्य थे । फ़िल्म नायिका-प्रधान है तथा फ़िल्म जगत में उन दिनों नई-नई ही आईं प्रीति ज़िंटा ने अंधकार से डरने वाली तथा अपने अतीत से परेशान एक प्रशिक्षु सीबीआई अधिकारी की कठिन भूमिका में अत्यंत प्रभावशाली अभिनय किया है । फ़िल्म की जान हैं इसके नायक अक्षय कुमार जिनका प्रशंसक मैं इसी फ़िल्म को देखकर बना । एक निर्मल मन वाले अपराधी की भूमिका में अक्षय कुमार ने अपनी अन्य सभी छवियों को ध्वस्त करते हुए ऐसा हृदय-विजयी अभिनय किया है जिसे निर्विवाद रूप से उनके अभिनय-जीवन के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में रखा जा सकता है । सहायक भूमिकाओं में अमन वर्मा, विश्वजीत प्रधान, मदन जैन, अमरदीप झा, निनाद कामत, अभय चोपड़ा, एस.एम. ज़हीर आदि तथा बाल कलाकारों - मास्टर मज़हर, जश त्रिवेदी एवं आलिया भट्ट (जी हाँ, आज की अत्यन्त लोकप्रिय नायिका) ने भी उत्कृष्ट अभिनय किया है । 

फ़िल्म में कमियां हैं लेकिन कम ही हैं । ख़ूबियां उन पर भारी हैं । देखने वाले को शुरू से आख़िर तक दम साधे परदे से चिपकाए रखने वाली यह फ़िल्म टिकट खिड़की पर क्यों असफल रही, कहना मुश्किल है । प्रतिष्ठित समीक्षकों ने भी इस फ़िल्म के साथ न्याय नहीं किया एवं इसकी आलोचना ही की, प्रशंसा नहीं । 

अब इस फ़िल्म में ऐसी भी क्या बात है जो मैंने इसे सिनेमा हॉल में ही पाँच बार देखा तथा आज यह मेरी शख़्सियत का एक हिस्सा बन चुकी है ? इस सवाल का जवाब मैं फ़िल्म समीक्षा करने में अपनी गुरू अरूणा त्यागराजन के इस कथन से देना आरंभ करता हूँ - 'Review is about feelings and what the movie evokes in one. Moviemaking and movie viewing is so subjective. Never know who it reaches out to and how:' (समीक्षा उन भावनाओं से संबंध रखती है जो कि फ़िल्म व्यक्ति में जगाती है । फ़िल्म बनाना तथा फ़िल्म देखना अत्यन्त व्यक्तिपरक बात है । कुछ पता नहीं लगता कि वह किस तक पहुँचती है एवं कैसे पहुँचती है ।) 

जी हाँ, यह बात फ़िल्मों, धारावाहिकों तथा पुस्तकों; सभी पर लागू है । पेशेवर समीक्षकों की बात यदि छोड़ दी जाए जिनका करियर ही यही है तो कोई भी समीक्षा उस समीक्षक में उस फ़िल्म, धारावाहिक या पुस्तक द्वारा उत्पन्न की गई भावनाओं की ही अभिव्यक्ति होती है । कम-से-कम मुझ पर तो यह उक्ति पूरी तरह खरी उतरती है । मैंने विभिन्न जाने-माने फ़िल्म समीक्षकों की पक्षपातपूर्ण एवं आधी-अधूरी समीक्षाएं पढ़कर ही अनुभव किया था कि उनसे बेहतर समीक्षाएं तो मैं लिख सकता था एवं इसीलिए मेरी लेखनी इस क्षेत्र में उतर पड़ी लेकिन मैं यह काम दिमाग़ से नहीं, दिल से करता हूँ और वही लिखता हूँ जो मैंने फ़िल्म के द्वारा अनुभव किया । 'संघर्ष' एक ऐसी ही फ़िल्म है जिसे मैंने अपने जीवन की एक विषम परिस्थिति में देखा एवं जिसने मेरे व्यक्तित्व को अत्यन्त गहनता से प्रभावित किया । 

२९ मार्च, १९९९ को जब मैं कर्णावती एक्सप्रेस द्वारा मुम्बई जा रहा था, तब (अपनी ही भूल से) मैं चलती हुई रेलगाड़ी से बांद्रा के प्लेटफ़ॉर्म पर जा गिरा जिसके परिणामस्वरूप मेरा बायां हाथ बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया । उस अपरिचित नगर में मेरी सहायता पहले तो प्लेटफ़ॉर्म पर ही कुछ सहृदय व्यक्तियों ने की एवं तदोपरांत मेरे एक मित्र (रमेश गुप्ता) ने मुझे संभाला एवं मुम्बई में ही मेरी शल्य-चिकित्सा का प्रबंध किया । किन्तु वह शल्य-चिकित्सा अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल नहीं रही एवं मुझे कुछ माह के उपरान्त जोधपुर (राजस्थान) में पुनः शल्य-चिकित्सा करवानी पड़ी । दोनों ही बार मेरे हाथ के साथ-साथ कमर की भी शल्य-चिकित्सा हुई क्योंकि हाथ की हड्डी इतनी अधिक टूटी थी कि रिक्त स्थान को भरने के लिए कमर की हड्डी से कुछ भाग लेना पड़ा था (अब मेरा वह हाथ कभी अपनी सामान्य स्थिति में नहीं आ सकता) । महीनों-महीनों मेरे हाथ पर भारी प्लास्टर चढ़ा रहा जो गर्मी के मौसम में एक अत्यन्त दुखदाई अनुभव था । मेरे परिजन अपरिहार्य कारणों से मेरे साथ नहीं रह सकते थे एवं मैं उदयपुर (राजस्थान) में अकेले ही रहकर भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा था जिसकी प्रारंभिक परीक्षा मैंने उस कठिन समय में भी उत्तीर्ण कर ली थी एवं अब मैं दो-दो बार शल्य-चिकित्सा हो चुकने पर भी मुख्य परीक्षा देने के लिए कटिबद्ध था । भोजन के लिए मैंने एक टिफ़िन-सेवा का प्रबंध कर लिया था । घर के तथा अपने शेष कार्य मैं स्वयं करता था । लेकिन परीक्षा देने के मेरे दृढ़ संकल्प पर उस अवसाद की छाया थी जो अपनी शारीरिक अवस्था, मानसिक स्तर पर एकाकीपन, भारी आर्थिक हानि एवं इन सबसे बढ़कर परीक्षा की तैयारी का मूल्यवान समय नष्ट होने से उपजा था । वक़्त-बेवक़्त एक गहरी उदासी मुझ पर तारी हो जाती थी एवं मेरे लिए पढ़ाई में मन लगाना बहुत मुश्किल हो जाता था जबकि पहले ही मेरे पास उसके लिए वक़्त बहुत कम बचा था । 

ऐसे में तीन सितम्बर, १९९९ को 'संघर्ष' प्रदर्शित हुई जिसकी समीक्षा मैंने हिंदी समाचार-पत्र 'राजस्थान पत्रिका' में पाँच सितम्बर, १९९९ को उसके रविवारीय परिशिष्ट में पढ़ी । अब मैंने पढ़ाई से एक दिन का ब्रेक लिया एवं फ़िल्म देखने के लिए उदयपुर के 'पारस' सिनेमा पर जा पहुँचा । फ़िल्म समाप्त होने के उपरांत जब मैं सिनेमा हॉल से बाहर निकला, तब मैं वह नहीं था जो सिनेमा हॉल में प्रवेश करते समय था । मेरे भीतर बहुत कुछ बदल गया था । फ़िल्म देखकर मैं इतना अच्छा महसूस कर रहा था कि मैं कोई सवारी न लेकर बहुत दूर तक पैदल ही चला ।

वैसे तो संघर्ष शब्द ही मेरे जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है । हालात से संघर्ष करते-करते ही मैं बड़ा हुआ और किस्मत वक़्त-वक़्त पर ऐसी करवटें बदलती रही कि सही मायनों में मेरा संघर्ष कभी ख़त्म हुआ ही नहीं । वह आज भी जारी है । लेकिन वह मेरी ज़िन्दगी का एक ऐसा वक़्त था जब मुझे अपने आगे अंधेरे के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता था । ऐसे में मैंने यह फ़िल्म देखी तथा इसकी नायिका (रीत ओबराय) जो कि अपने भाई तथा पिता के असामयिक निधन के उपरांत अपनी विधवा माता के साथ रहने वाली एक पंजाबी युवती है, के संघर्ष एवं पीड़ा ने मेरे मन को छू लिया । उसके सत्य के पथ पर चलने के अडिग निश्चय ने एवं इस विश्वास ने कि 'जीत हमेशा सच की होती है' (कम-से-कम  तब मेरा भी यही विश्वास था) मेरे टूटते हुए मन को संबल दिया । फ़िल्म का गीत 'नाराज़ सवेरा है, हर ओर अंधेरा है, कोई किरण तो आए कहीं से, आए' जब चल रहा था तो मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी रग-रग में जमा हुआ दर्द पिघलकर बाहर निकल रहा हो । और जब मध्यान्तर के उपरांत 'मंज़िल न हो, कोई हासिल न हो तो है बस नाम की ज़िन्दगी, कोई अपना न हो, कोई सपना न हो तो है किस काम की ज़िन्दगी' चल रहा था तो उसका एक-एक शब्द मेरे हृदय के भीतर उतरकर मानो मुझे जीना सिखा रहा था । 

इस नायिका-प्रधान फ़िल्म में नायक के चरित्र को भी अत्यन्त सुघड़ता से आकार दिया गया है । ज़रूरी नहीं कि कानून का मुजरिम इंसानियत और इंसाफ़ का भी मुजरिम हो । अपराधी होकर भी नायक (अमन वर्मा) को एक अत्यन्त अध्ययनशील तथा बुद्धिमान (लगभग जीनियस) व्यक्ति बताया गया है जो सिद्धांतवादी है तथा नायिका की सरलता एवं सत्यनिष्ठा से प्रभावित होकर उसकी सहायता करने के लिए तत्पर हो जाता है । उसे अपने इंसान होने पर कोई फ़ख़्र नहीं क्योंकि उसने इंसानियत का बदसूरत चेहरा देखा है । लेकिन नायिका के रूप में इंसानियत के दूसरे चेहरे से तआरूफ़ उसे बदल डालता है । उसे नायिका से प्रेम हो जाता है लेकिन वह तब तक उसे अपने मन में ही रखता है जब तक परिवर्तित परिस्थितियों में नायिका से उसकी अनपेक्षित भेंट नहीं होती । सच्चा प्यार ऐसा ही होता है जिसके इज़हार को लम्बी-चौड़ी बातों और शोरशराबे की ज़रूरत नहीं होती । नायक को अपने प्रेम का प्रतिदान नायिका से अपने जीवन के अंतिम क्षणों में मिलता है पर उसके लिए उतना भी बहुत है । सच्ची मुहब्बत की एक नज़र और सच्चे प्यार में डूबा हुआ एक पल ज़िन्दगी भर के दिखावटी प्यार से कहीं बेहतर है जिसके मिल जाने के बाद इंसान सुकून से मर सकता है । 

मैं फ़िल्म के कुछ संवादों का उल्लेख करूंगा क्योंकि उसके बिना इस फ़िल्म से संबंधित मेरी अभिव्यक्ति अपूर्ण ही रह जाएगी :

१. अमन से अपनी प्रथम भेंट में रीत का उससे कहना - 'किताबों के काले अक्षर घोटकर पी लेने से जानवर इंसान नहीं बन जाता । ज्ञान किताबों में लिखी बातों पर अमल करने से आता है, यूं किताबों का ढेर लगा लेने से नहीं ।'

२. अमन और रीत की दूसरी मुलाक़ात में अमन का रीत से कहना - 'इंसानियत की बात मुझसे मत कीजिए । मुझे अपने इंसान होने पर कोई फ़ख़्र नहीं । दुनिया कल जलती हो, आज जल जाए, माचिस चाहिए, मैं दे दूंगा ।'

३. अमन और रीत की अनाधिकृत भेंट में (जब अमन को पुलिस द्वारा यातनाएं दी जा रही हैं), अमन का रीत से कहना - 'बेचारी रीत, समझती है - दूसरों के ग़म बांटने से अपने ज़ख़्म भर जाते हैं ।'

४. पुलिस की गिरफ़्त से फ़रार हो जाने के बाद रीत के अमन से उसके छुपने के स्थान पर मिलने आने पर अमन का रीत से कहना - 'सपने सोच-समझकर देखने चाहिए । सच हो जाते हैं ।'

५. इसी मुलाक़ात में अमन का रीत से सिर्फ़ इतना कहना - 'तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो ।'

६. राज्य के गृह मंत्री के कार्यालय के बाहर रीत का अपने (सहृदय एवं कर्तव्यपरायण) वरिष्ठ अधिकारी से कहना -  'बचपन में मेरी दादी ने मुझसे कहा था कि ईमानदारी के रास्ते पर चलते हुए लोग तुझे रोकेंगे, डराएंगे, तेरे रास्ते में आ के खड़े हो जाएंगे लेकिन तू घबराना मत । लोगों से डरकर रास्ते में बैठ मत जाना बल्कि दुगने जोश के साथ आगे बढ़ना । याद रखना; झूठ चाहे जितना सर उठाए, जीत हमेशा सच की होती है ।'

७. एक आरंभिक दृश्य में रीत के संदर्भ में उसके वरिष्ठ अधिकारी का अपने एक सहकर्मी से कहना - 'जो लोग अंधेरे का अंजाम जानते हैं, वो रोशनी ढूंढ ही लेते हैं । इसके लिए उन्हें चाहे कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े ।'

आज भी मेरे हताश और दुखी मन को सहारा देने वाली इस फ़िल्म का सार इसी एक संवाद में अंतर्निहित है । 

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शनिवार, 9 जनवरी 2021

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

अपने अमर महाकाव्य 'कुरुक्षेत्र' के सप्तम सर्ग में कविवर रामधारी सिंह दिनकर शरशय्या पर अपनी निर्वाण-वेला की प्रतीक्षा में लेटे पितामह भीष्म से युधिष्ठिर को कहलवाते हैं - 

यह अरण्य झुरमुट जो काटे, अपनी राह बना ले
क्रीतदास यह नहीं किसी का, जो चाहे अपना ले 
जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर, जो उससे डरते हैं 
वह उनका जो चरण रोप, निर्भय होकर लड़ते हैं 

आज भारत में साधनहीन तथा निस्सहाय लोगों के लिए जो चीज़ें दुर्लभ हो गई हैं उनमें से सबसे महत्वपूर्ण है पीड़ित होने पर न्याय का मिलना । जिसके पास साधन न हों, समर्थन न हो, जो अपने लिए न्याय ख़रीद न सके (क्योंकि दुर्भाग्यवश हमारे देश में न्याय बिकाऊ ही है); वह यदि न्याय को छीनकर पाने में भी सक्षम न हो तो उसके लिए अपने पीड़ित होने के यथार्थ को सदा के लिए भूल जाने तथा न्याय की आकांक्षा को अपने भीतर से सदा के लिए निकाल देने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं रहता है । 

परन्तु इस स्थिति में दिनकर जी की ऊपर उद्धृत पंक्तियां ऐसे उत्पीड़ित एवं दबे-कुचले व्यक्तियों को न्याय के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती हैं, उसके लिए लड़ने की ऊर्जा तथा साहस देती हैं । फ़िल्मकार महेश भट्ट की तनूजा चंद्रा द्वारा निर्देशित अक्षय कुमार, प्रीति ज़िंटा एवं आशुतोष राणा की प्रमुख भूमिकाओं वाली फ़िल्म 'संघर्ष' (१९९९) का एक कालजयी संवाद है - 'जो अंधेरे का अंजाम जानते हैं, वे रोशनी ढूंढ ही लेते हैं चाहे उन्हें इसके लिए कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े' । तो जब पीड़ित का साथ समाज न दे, व्यवस्था न दे तो अपने चारों ओर फैले अंधेरे में रोशनी पाने के लिए उसे स्वयं ही संघर्ष करना होगा क्योंकि अंधेरे का अंजाम उसी को मालूम है । जिस पर बीतेगी, वही तो जानेगा ।

और पक्षपाती मानसिकता की बेड़ियों में जकड़े भारतीय समाज में बीतती तो रहती ही है उन पर जो दुर्बल हैं, विवश हैं, आसान शिकार (soft target) हैं । व्यवस्था प्रायः झूठों और आततायियों की ओर रहती है, अतः सत्य एवं न्याय के हिस्से पराजय ही आती है । अन्यायी के लिए अन्याय करना इसीलिए सरल होता है क्योंकि साधनहीन तथा एकाकी उत्पीड़ित के लिए न्याय पाना अत्यधिक कठिन होता है । अन्यायी इसी विश्वास के साथ अन्याय करता है कि जो अन्याय उसने चुटकियों में कर दिया है, उसके निराकरण तथा न्याय की प्राप्ति में उत्पीड़ित का संपूर्ण जीवन व्यतीत हो जाएगा (और तब भी उसे न्याय मिल ही जाए, यह आवश्यक नहीं) । इसीलिए भारत में अन्याय एवं अत्याचार होते ही रहते हैं, उनका सिलसिला थमता ही नहीं । एक हादसे की डरा देने वाली याद धुंधली भी नहीं पड़ी होती कि दूसरा, वैसा ही दहला देने वाला हादसा हो जाता है । घटनाएं वही रहती हैं, बस किरदार बदल जाते हैं ।

निर्भया मामले को अपने वैधानिक समापन तक पहुँचने में सात साल से अधिक लगे । इस बीच न जाने कितनी ही और निर्भयाएं जघन्य अत्याचार का शिकार बन गईं । बदायूँ कांड की पीड़ित दलित बच्चियों को न्याय केवल 'आर्टिकल पंद्रह' नामक फ़िल्म में ही मिला, वास्तविकता में कभी नहीं मिला । अब हाथरस की पीड़िता के मामले में तो व्यवस्था के ठेकेदारों ने अत्याचार की ही नहीं, असामाजिकता एवं संवेदनहीनता की भी सभी सीमाएं पार कर दी हैं लेकिन ... । लेकिन उस मार डाली गई युवती को अथवा उसके परिजनों को कभी न्याय मिल पाएगा, कहना कठिन ही है । मैंने अपने लेख 'दर्द सबका एक-सा' में लिखा है कि सहानुभूति जताने और न्याय की माँग करने के लिए भी हमारा दृष्टिकोण 'मुँह देखकर तिलक करने' वाला बन गया है । वस्तुतः संसार का सबसे बड़ा और सबसे पुराना पीड़ित वर्ग हैं महिलाएं जिन पर बिना किसी जाति, धर्म व स्थान के अंतर के चिरकाल से अत्याचार एवं अन्याय होते आ रहे हैं । लेकिन आज के भारत की तुच्छ राजनीति में डूबी मानसिकता ने इन पीड़िताओं को भी  अनेक (उप)वर्गों में विभक्त कर दिया है । किसी वर्ग की उत्पीड़ित स्त्री के लिए किसी का मन पसीजता है तो किसी दूसरे वर्ग की उत्पीड़ित स्त्री के लिए किसी दूसरे का । हमारी संवेदनशीलता (यदि विद्यमान है तो) शुद्ध नहीं रही है, पक्षपाती हो गई है । हम दर्दमंदों के दर्द का सही मायनों में अहसास तभी कर पाते हैं जब वैसे ही दर्द से हमें भी गुज़रना पड़े । वरना ऐसे दिल हिला देने वाले मामलों में भी हमारी बातें हिंदुस्तानी राजनीतिबाज़ों की तरह दिखावटी और फ़रमायशी ही होती हैं । विगत एक दशक से तो ऐसा आभास हो रहा है मानो हम वास्तविक जीवन से दूर होकर केवल ट्विटर वाले बन गए हैं जो ट्वीट कर-कर के ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं अथवा फ़ेसबुक तथा वॉट्सअप पर अपना (अधकचरा) ज्ञान बघार कर स्वयं को सर्वज्ञ घोषित कर देते हैं ।

लेकिन जिस पर गुज़री है, वह क्या करे ? अगर जान ही चली गई है तो वह ख़ुद तो कुछ कर नहीं सकता (या सकती) । जिसे उसके लिए इंसाफ़ चाहिए, उसे ताक़तवर सिस्टम से लड़ना होगा - उस ताक़तवर सिस्टम से जो ज़ुल्म करने वालों का सगा है, दौलत के हाथों बिकता है, ताक़त के आगे झुकता है; जिसे सही-ग़लत से कोई मतलब नहीं । समाज के दुर्बल भाग से संबद्ध किसी भी पीड़ित के लिए न्याय पाना (अथवा ऐसे किसी पीड़ित को न्याय दिलाना) असंभव की सीमा तक कठिन हो सकता है । पर फिर यही तो आततायियों की शक्ति है कि पीड़ित सदा न्याय का भिक्षुक बना रहे किन्तु उसे न्याय न मिले । ऐसे में मर-मर कर बरसों जीते रहने से तो बेहतर है कि इंसाफ़ के लिए लड़ते हुए ही मरा जाए । महात्मा गांधी ने भी तो जब किसी भी तरह मांगने से अंग्रेज़ों से आज़ादी नहीं मिली थी तो 'करो या मरो' का नारा दिया था । कायरों का जीवन जीने से तो मर जाना अच्छा है ।

वैधानिक व्यवस्था स्वयं को तटस्थ कहती है । बहुत-से लोग भी स्वयं को तटस्थ कहकर अपने आप को ही धोखा देते हैं - हम तो किसी की भी तरफ़ नहीं हैं । लेकिन सच वह है जो मेरे प्रिय हिंदी लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक अपने कई उपन्यासों में कह चुके हैं - तटस्थता आततायी का साथ देती है, पीड़ित का नहीं । तथाकथित तटस्थ व्यवस्था का अनकहा सिद्धांत यही तो है कि जो समर्थ है, वही सही है । गोस्वामी तुलसीदास तो सैकड़ों वर्ष पूर्व ही लिख गए हैं - समरथ को नहीं दोष गुसाईं । ज़ालिम तो समर्थ और ताक़तवर होगा ही, तभी तो वह कमज़ोर पर ज़ुल्म कर पाएगा । अगर आप शक्तिशाली आततायी एवं दुर्बल उत्पीड़ित में से किसी की ओर नहीं हैं तो अप्रत्यक्षतः आप आततायी की ही ओर हैं क्योंकि आपकी इस कथित तटस्थता का लाभ उसी को प्राप्त होगा ।

लेकिन ऐसे स्वयंभू तटस्थ लोगों को जो कि 'हमें क्या' का दृष्टिकोण पालकर निश्चिंत रहते हैं, यह विस्मरण नहीं करना चाहिए कि समय से अधिक बलवान कोई नहीं । उनका भी वक़्त हमेशा वैसा ही नहीं रहने वाला है जैसा वे आज देख रहे हैं । मैंने दिनकर जी की पंक्तियों के साथ यह लेख आरंभ किया था । उन्हीं की एक कालजयी कविता की इन पंक्तियों के साथ मैं इस लेख का समापन करता हूँ :

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

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शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

फ़लसफ़ा प्यार का

प्यार ! इश्क़ ! मुहब्बत ! आशिक़ी ! आशनाई ! और शुद्ध हिंदी में कहें तो प्रेम ! क्या है इस शय का फ़लसफ़ा क्या है इसका दर्शन क्या है इसका अर्थ कहने की आवश्यकता नहीं कि बात यहाँ स्त्री-पुरुष के उस प्रेम की हो रही है जो आदिकाल से चला आ रहा है और जो सृष्टि का आधार है । नर-मादा प्रणय-संबंध तो पशु-पक्षियों में भी होते हैं जिनसे उनकी प्रजाति उत्तरोत्तर चलती रहती है लेकिन मनुष्यों की बात भिन्न इसलिए है क्योंकि उनके प्रेम में केवल देह ही नहीं भावनाएँ भी सम्मिलित होती हैं । इसलिए एक पुरुष एवं एक नारी जब परस्पर प्रेम-बंधन में बंधते हैं तो वे एक-दूसरे से प्रेम में डूबी हुई बातें करते हैंएक-दूसरे को प्रेम-पत्र लिखते हैंजब मिलते हैं तो एक-दूसरे को प्रेमभरी दृष्टि से देखते हैंबिना स्पर्श के भी एक-दूसरे के साहचर्य से आनंदित होते हैंसीधे-सीधे मिलना संभव न हो तो एक-दूसरे को छुप-छुप के देखने का प्रयास करते हैंकवि-हृदय हों तो कविताएँ रचते हैंएक-दूसरे को प्रेमोपहार देते हैं जिनका मूल्यांकन केवल उनमें निहित भावों से ही किया जा सकता है । उर्दू शायरी भरी-पड़ी है इश्क़ो मुहब्बत के जज़्बात और इज़हार से । असफल प्रेमियों की दर्दभरी कथाएँ अमर हो चुकी हैं  और लोकरुचि का अंग बनकर सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती आ रही हैं । सभी भाषाओं और सभी देशों के साहित्यनाट्यकर्म और सिनेमा का मुख्य अंश प्रेमकथाएँ ही हैं । यह संसार न केवल प्रेम के द्वारा ही चल रहा है वरन इसका सौंदर्य भी प्रेम के कारण ही है । ज़रा सोचिएप्रेम के बिना यह संसार कितना कुरूप होता !  

किसी को किसी से प्रेम क्यों और कैसे होता हैयह तो सनातन काल से चला आ रहा अनसुलझा रहस्य है । लेकिन इस लेख में एक हिंदी उपन्यास की समीक्षा के बहाने मैं इस बात पर विमर्श करना चाहता हूँ कि प्रेम वस्तुतः है क्या प्रेम में दैहिक आकर्षण सम्मिलित हो सकता हैलेकिन यह उससे कहीं अधिक हैबहुत अधिक है । मैंने देखा हैजाना है और महसूस किया है कि लोग प्रेम करते तो हैं लेकिन उसके मर्म को समझते नहीं । अपने निजी अनुभव से मैं यह जान पाया हूँ कि प्रेम कोई लेन-देन नहींयह तो केवल देने का ही नाम है । सच्चे प्रेम की कसौटी है त्याग और बलिदान । दिलों के सौदे नफ़ा-नुकसान देखकर नहीं किये जा सकते । नफ़े-नुकसान का सवाल जहाँ उठेवहाँ और चाहे कुछ भी होप्यार नहीं हो सकता । प्यार में सौदा नहीं होता । न ही कोई शर्तें लगाई जाती हैं । जिससे प्यार किया जाएउससे कुछ पाने की नहीं बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उसके लिये सब कुछ छोड़ देने की इच्छा ही प्यार करने वाले के मन में पूरी शिद्दत से समा जाती है । किसी की मुहब्बत ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं मिल सकतीउसे तो सजदा करके ही हासिल किया जा सकता है । कुछ ऐसे ही जज़्बात से सराबोर और पढ़ने वाले के दिल को छू जाने वाला हिंदी उपन्यास है - 'सुहाग से बड़ाजो तीन दशक पूर्व स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की लेखनी से निकला था । 

भारतीय परंपरा और संस्कारों के अनुसार एक हिंदुस्तानी औरत के लिए उसका सुहाग अर्थात् उसका पति ही सर्वोपरि होता है (यदि वह क्रूर अथवा कुकर्मी हो तो बात अलग है) । भारतीय नारी के लिए उसके सुहाग से बढ़कर कुछ नहीं होताकोई नहीं होता । एक हिंदू विवाहिता का आदर्श सावित्री है जो सत्यवान को मृत्यु के मुख से लौटा लाई थी । फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई उसके लिए उसके सुहाग से भी बड़ा बन जाए इस प्रश्न का उत्तर यह उपन्यास देता है जो एक मार्मिक प्रेमकथा द्वारा प्रेम की वास्तविक परिभाषा प्रस्तुत करता है ।   

'सुहाग से बड़ाकहानी है देवराज और माधुरी के पवित्र प्रेम की । घटनाक्रम पटना शहर में रखा गया है । देवराज अपराध की दुनिया में है लेकिन बचपन में मिली एक गहरी पीड़ा ने उसके कोमल मन पर ऐसी छाप छोड़ी है कि वह अपराधी होकर भी एक संवेदनशील मानव है । कानून के ख़िलाफ़ काम करते हुए भी वह अपने उसूलों के साथ कोई समझौता नहीं करता । वह वे काम करता है जिनकी इजाज़त कानून नहीं देता मगर वह ऐसा कोई काम नहीं करता जिसकी इजाज़त उसका ज़मीर उसे नहीं देता ।    

इधर माधुरी बहन है अशोक की जिसे पुलिस में नौकरी मिलने पर उसकी प्रशिक्षण-अवधि में ही एक गोपनीय योजना के अंतर्गत पुलिस का मुख़बिर बनाकर देवराज के दल में घुसा दिया जाता है । ये दोनों भाई-बहन अनाथ हैं और इसीलिए जहाँ अशोक के लिए अपनी बहन माधुरी से बढ़कर कोई नहीं हैवहीं माधुरी के लिए सबसे प्यारा कोई है तो बस उसका भाई अशोक है । अशोक का मित्र अमित पहले से ही पुलिस की नौकरी में है और वह माधुरी से विवाह करना चाहता है जिस पर अशोक को कोई आपत्ति नहीं । जहाँ तक माधुरी का प्रश्न हैअपने भाई की इच्छा की ख़ातिर उसे भी अमित से विवाह करना स्वीकार्य है । लेकिन . . . 

लेकिन हालात माधुरी को देवराज के निकट ले आते हैं । दोनों प्रेम-बंधन में बंध जाते हैं । यह वह पवित्र प्रेम है जो आत्मा से किया गया हैदेह से नहीं । माधुरी के प्यार की ख़ातिर देवराज अपराध की दुनिया छोड़ देने का फ़ैसला भी कर लेता है पर तक़दीर को कुछ और ही मंज़ूर है । देवराज पर दो राज़ एक साथ खुलते हैं - एक तो यह कि उसके दल में सम्मिलित अशोक पुलिस का मुख़बिर है जिसे दल के नियम के अनुसार मृत्युदंड देना उसका कर्तव्य है और दूसरा यह कि अशोक उसकी प्रेमिका माधुरी का भाई है । देवराज माधुरी से यह सच्चाई नहीं छुपाता । अब माधुरी उसे उसकी मुहब्बत का वास्ता देती है और कहती है कि अगर उसकी मुहब्बत सच्ची है तो वह अशोक की जान बख़्श देगा । 

देवराज दुविधा में है कि भावना और कर्तव्य में से किसे चुने जबकि माधुरी को पूरा विश्वास है कि देवराज उसके प्राणप्रिय भाई को मारकर उसके प्रेम को कलंकित नहीं करेगा । दूसरी ओर बंतासिंह नामक एक अपराधी कारागार से फ़रार हो जाता है । वह अमित और देवराजदोनों ही का शत्रु है । घटनाक्रम कुछ इस तरह घूमता है कि अमित अलग-अलग ढंग से माधुरीअशोक और बंतासिंहसभी के संपर्क में आता है और देवराज के अड्डे पर धावा बोलकर उसके संपूर्ण दल का सफ़ाया कर देता है । देवराज गिरफ़्तार हो जाता है और अशोक की लाश बरामद होती है । माधुरी यह मान बैठती है कि उसके भाई का हत्यारा उसका प्रेमी ही है । उसकी गवाही के दम पर अदालत देवराज को फाँसी की सज़ा सुना देती है और वह उसी दिन अमित से विवाह कर लेती है । 

अब उन बातों को बरसों बीत चुके हैं । देवराज की फाँसी की सज़ा ऊंची अदालत में अपील किए जाने पर उम्र-क़ैद में बदल चुकी है और वह जेल में अपने दिन काट रहा है । अमित पुलिस में पदोन्नति पाकर वरिष्ठ पद पर पहुँच गया है और उसकी पत्नी माधुरी अब उसके पुत्र की माँ है । बंतासिंह कभी का विदेश भागकर कानून की पकड़ से बहुत दूर हो चुका है । लेकिन . . . 

लेकिन एक दिन अतीत के कब्रिस्तान में दफ़न कुछ मुरदे अपनी कब्रों से उठकर खड़े हो जाते हैं और कुछ भूले-बिसरे राज़ अपना परदाफ़ाश होने की धमकी देने लगते हैं । माधुरी को पता लगता है कि देवराज उसका सुहाग तो नहीं बन सका लेकिन वह उसके लिए सुहाग से भी बड़ा है । वह अब जान पाती है कि जो इंसान उसकी माँग में सिंदूर बनकर नहीं सज सकाउसका प्यार कितना महान है । लेकिन नियति तो अपना खेल खेल चुकी है । अब क्या हो सकता है दिल को झकझोर देने वाली इस दास्तान का क्लाईमेक्स सच्ची मुहब्बत की ऊंचाई को दिखलाता है । इस कहानी का अंत यह बताता है कि सच्चा प्यार करने वाले चाहे ख़ुद मिट जाएंउनका प्यार एक रोशन मीनार बनकर आने वाली नस्लों तक को समझा सकता है कि हक़ीक़त में प्यार होता क्या है ।  

मैं नहीं जानता कि इस बेमिसाल कहानी का मूल विचार स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की मौलिक सोच का परिणाम था अथवा उन्होंने इसे कहीं से उधार लिया था । लेकिन भावनाओं के कुशल चितेरे शर्मा जी ने इस उपन्यास को अत्यंत रोचक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है और सभी प्रमुख चरित्रों को स्वतः ही उभरने और कथानक पर अपनी-अपनी छाप छोड़ने का अवसर दिया है । उन्होंने बताया है कि प्यार कर बैठने वालों को प्यार करना आता हो और वे प्यार के फ़लसफ़े को ठीक से समझते होंयह ज़रूरी नहीं । सच्चे प्रेम का आधार है विश्वास । और उसका अभिन्न अंग है अपने प्रिय के लिए बड़े-से‌‌‌-बड़ा त्याग कर सकने की क्षमता । 

रहस्यकथाएँ और रोमांचक उपन्यास (थ्रिलर) लिखने के लिए विख्यात वेद प्रकाश शर्मा ने अपने लेखन-कर्म के प्रारम्भिक वर्षों में सामाजिक उपन्यास भी लिखे थे । उनके ऐसे एक उपन्यास का नाम है - 'राखी और सिंदूरजो सम्भवतः उन्होंने बहुत कम आयु में लिखा था । मैंने वह उपन्यास पढ़ा तो नहीं लेकिन अनुमान लगा सकता हूँ कि वह एक विवाहिता की दुविधा की कहानी होगी जिसे राखी अर्थात् अपने भाई और सिंदूर अर्थात् अपने पति में से किसी एक को चुनना हो । 'सुहाग से बड़ामें नायिका के समक्ष ऐसी कोई दुविधा नहीं है । वह अपने भाई से अधिक प्रेम किसी से नहीं करती तथा उसके हत्यारे को दंडित करवाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है । इस उपन्यास में दुविधा वस्तुतः नायक के समक्ष है जिसका शर्मा जी ने बड़ा ही हृदयविदारक चित्रण किया है । देवराज को बेचैन कर रही उसकी उलझन और उसके अंतर्मन की पीड़ादोनों ही का वर्णन कुछ ऐसा है कि पढ़ने वाले को लगता है मानो वह जीते-जागते देवराज को अपनी आँखों से देख रहा हो । अपनी महबूबा के लिए देवराज दीवानगी की हद से गुज़र जाता है जिसे महसूस करके इस दर्दभरी दास्तां को पढ़ रहे शख़्स की आँखें नम हो सकती हैं  । और उपन्यास के अंतिम भाग में वास्तविकता से अवगत हो चुकी माधुरी की पीड़ाप्रतिशोध और प्रायश्चितसभी पढ़ने वाले के दिल की गहराई में उतर जाते हैं । 

मुझे दुख है कि वेद प्रकाश शर्मा ने अपनी इस असाधारण कृति पर 'इंटरनेशनल खिलाड़ी' (१९९९) जैसी मामूली फ़िल्म बनवाई जिसमें अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना ने नायक-नायिका की भूमिकाएँ निभाई थीं । फ़िल्म में उपन्यास की संपूर्ण कहानी नहीं बल्कि केवल उसके कुछ पात्र तथा उसके घटनाक्रम का एक अंश ही लिया गया है और बाकी की कहानी (जो कि कथानक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है) फ़िल्म से निकाल दी गई है । जहाँ उपन्यास एक अमर प्रेमकथा हैवहीं फ़िल्म एक साधारण एक्शन फ़िल्म से अधिक कुछ नहीं है । फ़िल्म में न भाई-बहन का प्रेम ठीक से उभर पाया हैन ही प्रेमी-प्रेमिका का । फ़िल्म में उपन्यास की रूह का नामोनिशान तक नहीं है । मुझे ऐसा लगता है कि पात्रों के चरित्र-चित्रणभावपक्ष और कथानक की आत्मा की दृष्टि से कंगना रानाउत की प्रथम फ़िल्म 'गैंगस्टर' (२००६) इस उपन्यास के अधिक निकट है बजाय 'इंटरनेशनल खिलाड़ीके । 

सरल हिंदी में लिखा गया थ्रिलर और सामाजिक कथा का मिश्रण यह उपन्यास आदि से अंत तक पढ़ने वाले को बांधे रखता है । इसे उन लोगों को भी पढ़ना चाहिए जिन्होंने 'इंटरनेशनल खिलाड़ीफ़िल्म देख रखी है क्योंकि उपन्यास का कैनवास फ़िल्म से बहुत अधिक विस्तृत है और इसमें प्यार का वह रंग है जो फ़िल्म में कहीं नज़र नहीं आता । प्यार तो अपने जीवन में लगभग सभी मनुष्य करते हैं चाहे वे किसी भी लिंग के हों लेकिन प्यार के फ़लसफ़े को उनमें से बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं । अगर आप समझना चाहते हैं तो 'सुहाग से बड़ाको ज़रूर पढ़िए ।

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