सोमवार, 27 अप्रैल 2026

कुछ बातें सीक्वल की

सीक्वल का अर्थ होता है अगली कड़ी। मुख्यतः यह शब्द किसी कहानी के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। कहानी किसी फ़िल्म की भी हो सकती है तथा उपन्यास की भी। यहाँ सीक्वल से आशय यह नहीं है कि किसी कहानी को अपने प्रथम भाग में अधूरा छोड़ दिया जाए तथा उस अधूरे भाग को आगामी कड़ी (या कड़ियों) में पूरा किया जाए। ऐसा पहले तो केवल उपन्यासों के लिए किया जाता था लेकिन अब विगत कुछ वर्षों से फ़िल्में भी इसी भांति बनने लगी हैं जिनमें पहली फ़िल्म में कथा का केवल एक भाग प्रस्तुत किया जाता है जबकि उसका समापन भाग दूसरी फ़िल्म में प्रस्तुत किया जाता है (यह दूसरी फ़िल्म कुछ दिनों या कुछ महीनों के उपरांत प्रदर्शित होती है)। इस लेख में मेरा प्रयोजन उस प्रकार के सीक्वल के बारे में बात करना है जिनमें उसका पूर्व भाग भी अपने आप में सम्पूर्ण होता है तथा उसे देखने के उपरांत दूसरे भाग को देखना अनिवार्य नहीं होता क्योंकि दोनों की कहानियां (कुछ) समान पात्रों को लिए हुए होने के बावजूद स्वतंत्र एवं अपने आप में पूर्ण होती हैं।

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ने ऐसा प्रयोग भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष पर आधारित अपने उपन्यास 'वतन की कसम' में किया था जिसकी पाठक समुदाय में हुई लोकप्रियता के कारण उन्होंने उसका सीक्वल 'ख़ून दो आज़ादी लो' तथा 'बिच्छू' नामक उपन्यासों के रूप में लिखा। इन उपन्यासों में 'वतन की कसम' के अंतिम दृश्य से कहानी को आगे बढ़ाया गया था किंतु 'वतन की कसम' अपने आप में सम्पूर्ण उपन्यास था जबकि सीक्वल के रूप में लिखे गए दो उपन्यासों में उसके कुछ पात्रों को लिए जाने के बावजूद कहानी बिलकुल अलग थी। 

बॉलीवुड फ़िल्मों में ऐसा कई बार किया गया है जब स्थायी पात्र तो सीक्वल में यथावत् रहे किंतु कुछ नए पात्रों के साथ एक नई कहानी दर्शकों के समक्ष रखी गई। देव आनंद की अत्यधिक सफल फ़िल्म 'ज्वेल थीफ़' (१९६७) का सीक्वल एक लंबे अंतराल के उपरांत 'रिटर्न ऑव ज्वेल थीफ़' (१९९६) के रूप में आया किंतु कमज़ोर कथानक एवं निर्देशन के कारण असफल रहा। ऐसा ही फ़िल्म 'हेरा फेरी' (२०००) का सीक्वल 'फिर हेरा फेरी' (२००६) बनाकर किया गया था जिसकी कहानी 'हेरा फेरी' के अंत से आगे बढ़ाई गई थी। वह फ़िल्म भी दर्शकों-समीक्षकों को विशेष प्रभावित नहीं कर सकी। और ऐसा ही अत्यन्त सफल एवं बहु-प्रशंसित फ़िल्म 'रॉक ऑन' (२००८) का सीक्वल 'रॉक ऑन2' (२०१६) बनाकर किया गया जिसमें कुछ प्रमुख पात्रों के साथ कहानी को मूल फ़िल्म के अंत से आगे बढ़ाते हुए एक नई कहानी को परोसा गया पर वह भी मूल फ़िल्म की भांति प्रभावशाली नहीं बन सकी। 

वस्तुतः सीक्वल बनाया तो मूल फ़िल्म की सफलता को भुनाने के लिए जाता है क्योंकि प्रीक्वल की अच्छी स्मृतियां दर्शकों के मन में होती हैं किंतु किसी भी सीक्वल की सफलता एक सुदृढ़ कथानक, कुशल निर्देशन तथा कलाकारों के अभिनय पर निर्भर करती है। ऊपर मैंने जिन फ़िल्मों का उल्लेख किया उनमें सीक्वल का कथानक, निर्देशन तथा अभिनय पक्ष पिछली फ़िल्म (प्रीक्वल) की भांति प्रभावी नहीं था, इसीलिए सीक्वल दर्शकों का साथ नहीं पा सके। लेकिन जब सीक्वल की कहानी, निर्देशन (चाहे वह प्रीक्वल के निर्देशक द्वारा किया जाए या किसी और के द्वारा),अभिनय एवं तकनीकी पक्ष अच्छे हों तो सीक्वल सफल हो जाता है जैसा कि 'तनु वेड्स मनु' (२०११) के सीक्वल 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' (२०१५) के मामले में हुआ जब सीक्वल भी प्रीक्वल की भांति ही सफल रहा। ऐसा ही 'कोई मिल गया' (२००३) के सीक्वल के रूप में बनाई गई फ़िल्मों - 'कृष' तथा 'कृष3' के मामलों में हुआ जब सीक्वलों ने प्रीक्वल की सफलता को दोहराया। 'दृश्यम' (२०१५) का सीक्वल 'दृश्यम2' (२०२२) भी सफल रहा।  'साहब बीवी और गैंगस्टर' (२०११) के भी दो सीक्वल बनाए गए जिनमें से पहला सीक्वल 'साहब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स' (२०१३) तो चुस्त कथानक एवं कुशल निर्देशन के कारण सफल रहा पर जब उसकी भी अगली कड़ी 'साहब बीवी और गैंगस्टर3' (२०१८) के रूप में बनाकर दर्शकों को परोस दी गई तो वह कमज़ोर कथा के कारण असफल रही। इनकी विशेषता यह है कि प्रमुख पात्रों (साहब तथा बीवी) एवं उनके पारस्परिक संबंधों को समझने के लिए दर्शकों हेतु पहली कड़ी को देखना आवश्यक है अन्यथा किसी भी सीक्वल के कथानक को समझने में समस्या हो सकती  है (यद्यपि सीक्वल अपने आप में संपूर्ण हैं)।

सीक्वल ऐसे भी बने हैं जिनमें कहानी को पिछली फ़िल्म या प्रीक्वल से आगे नहीं बढ़ाया गया है केवल प्रमुख पात्रों को लेकर एक नई कहानी बुनी गई है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' (२००३) का सीक्वल 'लगे रहो मुन्नाभाई (२००६) है जिसमें प्रीक्वल के दो प्रमुख पात्रों (मुन्ना तथा सर्किट) को लेकर एक पूरी तरह नई कहानी कही गई है। चूंकि कहानी, निर्देशन, अभिनय, तकनीकी पक्ष, संगीत आदि सभी उत्तम रहे; स्वाभाविक रूप से सीक्वल भी अत्यन्त सफल रहा। 'इश्क़िया' (२०१०) की सीक्वल 'डेढ़ इश्क़िया' (२०१४) भी इसी प्रकार बनाई गई थी एवं वह भी सफल रही थी। इसी प्रारूप में 'गोलमाल-फ़न अनलिमिटेड' (२००६) के भी कई सीक्वल बनाए गए जो बॉक्स ऑफ़िस पर चल गए। लेकिन सफल फ़िल्म 'स्टाइल' (२००१) का सीक्वल 'एक्सक्यूज़ मी' (२००३) सफल नहीं रहा।

सीक्वल को फ़्रेंचाइज़ फ़िल्मों से अलग करके देखा जाना चाहिए। विदेशों की नक़ल करते हुए बॉलीवुड के भट्ट कैम्प ने अपनी 'राज़' (२००२) तथा 'मर्डर' (२००४) जैसी फ़िल्मों के नामों में 2, 3 आदि लगाकर बिलकुल भिन्न फ़िल्में बनाईं जिनमें मूल फ़िल्मों के पात्र तक नहीं थे एवं तथाकथित अगली कड़ियों का मूल फ़िल्म से किसी भी तरह का कोई लेनादेना नहीं था। लेकिन दर्शकों को मूल फ़िल्म का नाम काम में लेकर भ्रमित करने में फ़िल्मकार सफल नहीं रहे एवं वे फ़िल्में (जो कि सीक्वल न होकर फ़्रेंचाइज़ फ़िल्में थीं) दर्शकों द्वारा नकार दी गईं।

एक विशिष्ट सीक्वल की बात मैं विशेष रूप से करना चाहूंगा। प्रतिष्ठित राजश्री बैनर ने अपनी अत्यधिक सफल एवं लोकप्रिय फ़िल्म 'अँखियों के झरोखों से' (१९७८) का सीक्वल 'जाना पहचाना' (२०११) के रूप में बनाया। जब मैंने यह फ़िल्म देखी तो मैं यह देखकर दंग रह गया कि सीक्वल में कम-से-कम आधा हिस्सा प्रीक्वल के दृश्यों से भरा हुआ है। चूंकि दोनों ही फ़िल्में एक ही निर्माता की हैं, अतः ऐसा करने में कृतिस्वाम्य (कॉपीराइट) की तो समस्या नहीं थी किंतु फ़िल्म पसंद आने पर भी मैंने यह महसूस किया कि जब सीक्वल में आधा हिस्सा प्रीक्वल का ही है तो सीक्वल देखने से बेहतर क्या प्रीक्वल को ही पुनः देख लेना नहीं होता ? शायद ऐसा ही दर्शक समुदाय ने महसूस किया होगा जिसके कारण फ़िल्म सफल नहीं रही (समीक्षकों ने भी इसकी आलोचना ही की)।

बॉलीवुड में अब सीक्वल किसी भेड़चाल की तरह हो गया है। जब भी कोई फ़िल्म सफल हो जाती है, उसके नाम में 2 लगाकर उसके सीक्वल की घोषणा कर दी जाती है। ऐसे फ़िल्मकार यह मानने को तैयार नहीं होते कि आज का दर्शक मूढ़ नहीं है। वह अच्छी तरह समझता है कि सीक्वल वस्तुतः क्या होता है। वह उसी फ़िल्म को अपेक्षित प्रतिसाद देता है जो कि अच्छी कहानी के साथ अच्छे ढंग से बनाई गई हो, फिर चाहे वह सीक्वल हो या नहीं।

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