मेरी ही नहीं, अनेक समालोचकों की राय में भी यशपाल कृत उपन्यास 'झूठा-सच' न केवल हिंदी साहित्य वरन विश्व साहित्य की सर्वोत्कृष्ट कृतियों में से एक है तथा हिंदी भाषा में लिखा गया सर्वश्रेष्ठ यथार्थपरक उपन्यास है। यह उपन्यास केवल मनोरंजन के निमित्त नहीं है वरन भारत की स्वतंत्रता तथा विभाजन के पूर्व की परिस्थितियों एवं उसके उपरांत देश में आये परिवर्तनों को भलीभांति जानने-समझने के लिये भी है।
यह उपन्यास उस ऐतिहासिक कालखंड का एक वास्तविक लेखा-जोखा है क्योंकि इसके लेखक यशपाल चंद्रशेखर आज़ाद द्वारा स्थापित एवं संचालित हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकेशन एसोशियेशन के सदस्य तथा सरदार भगतसिंह के सहयोगी थे। इन क्रांतिकारियों के बलिदान के उपरांत उन्होंने हिंसा का मार्ग छोड़कर स्वयं को साहित्य की सेवा हेतु समर्पित कर दिया। उन्होंने बहुत-सी कथाएं एवं उपन्यास लिखे तथा उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया किन्तु उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना यही है जिसे कोई पुरस्कार नहीं मिला। इस वृहत् उपन्यास में उन्होंने भारत के विभाजन के लिये उत्तरदायी परिस्थितियों, विभाजन के पूर्व एवं उस समय की घटनाओं तथा उसके उपरांत (स्वतंत्र भारत) में राष्ट्रीय चरित्र के पतन का विस्तृत वर्णन किया है।
यह किसी महाकाव्य सरीखी वृहत् कृति दो भागों में विभाजित है - 1. वतन और देश, 2. देश का भविष्य। प्रथम भाग लगभग सन १९४३ ('भारत छोड़ो' आंदोलन के उपरांत) से लेकर १५ अगस्त, १९४७ तक के घटनाक्रम का वर्णन करता है जिसका कि स्थान लाहौर है। द्वितीय भाग १५ अगस्त, १९४७ से आरंभ करके जनवरी १९५७ तक की घटनाओं को दर्शाता है जब देश के दूसरे आम चुनाव के परिणाम घोषित हुए थे। यह पाठकों को एक ओर तो विभाजन के पूर्व भारत में (विशेषतः पंजाब में) रह रहे लोगों की मानसिकता से पूरी तरह से परिचित करवाता है, दूसरी ओर विभाजन के पश्चात् भारतीयों के व्यक्तित्व एवं सोच में आये परिवर्तनों की भी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। यह बड़े ही स्वाभाविक ढंग से बताता है कि पराधीन भारत के तथाकथित देशभक्त एवं आदर्शवादी किस प्रकार स्वाधीन भारत में ऐसे बन गये थे कि उन्हें अपने निहित स्वार्थ के आगे और कुछ दिखाई ही नहीं देता था।
'झूठा-सच' की कहानी दो प्रमुख पात्रों के जीवन के साथ-साथ चलती है। ये दो प्रमुख पात्र हैं - जयदेव पुरी एवं तारा जो कि भाईबहन हैं तथा एक शिक्षक की संतानें हैं। लाहौर में रहने वाला यह परिवार निम्न-मध्यमवर्गीय है जिसमें दो भाई हैं - एक तो तारा एवं जयदेव के पिता तथा दूसरे उनके बड़े भाई। कहानी जयदेव के कारागृह से छूटने के उपरांत आरंभ होती है जो कि 'भारत छोड़ो' आंदोलन में भाग लेकर गिरफ़्तार हुआ था। प्रथम दृश्य जयदेव एवं तारा की दादी के देहावसान का है जिसके उपरांत कथानक कुछ इस प्रकार तीव्र गति से भागता है कि पाठक को पीछे मुड़कर देखने का कोई अवसर नहीं देता (लेखक भी बिना पीछे मुड़े लगातार अपनी लेखनी चलाता गया होगा)। तारा एवं जयदेव दोनों ही आदर्शवादी हैं। कहानी शुरु होने के समय तारा उन्नीस वर्ष की किशोरी है तथा उसे अपने बड़े भाई जयदेव पर गर्व है कि उसने देश की स्वतंत्रता के लिये कारावास सहा। देश की राजनीति तथा समाज में हो रहे परिवर्तनों का प्रभाव इन भाईबहन पर भी पड़ता है। जहाँ तारा को अपने सहपाठी असद से प्रेम हो जाता है, वहीं जयदेव कनक नाम की एक संपन्न परिवार की युवती से प्रेम करने लगता है जिसे वह ट्यूशन पढ़ाने जाया करता है। कनक के पिता लाहौर की एक प्रतिष्ठित राजनीतिक हस्ती हैं।
तारा का विवाह उसकी इच्छा के विरुद्ध एक लोफ़र एवं कम पढ़े-लिखे युवक सोमराज से तय कर दिया जाता है। और तब तारा को यह अहसास होता है कि उसका तथाकथित आदर्शवादी भाई वस्तुतः एक पाखंडी है जो न केवल दोहरे मानदंड अपनाता है बल्कि किसी भी अन्य व्यक्ति के लिये या किसी भी सिद्धांत अथवा आदर्श के लिये कोई भी ठोस क़दम उठाने से कतराता है। तारा के विवाह के उपरांत की प्रथम रात्रि को ही उसके ससुराल के घर पर मुस्लिम दंगाइयों का आक्रमण होता है तथा अपनी जान बचाकर भागती तारा को अनेक बुरे अनुभवों से गुज़रना पड़ता है। अंततः वह बचाकर अमृतसर ले आई जाती है। जयदेव रेलगाड़ी में यात्रा करते समय एक दंगाई आक्रमण में फंस जाता है एवं उसकी परिस्थितियां उसे जालंधर ले आती हैं जहाँ संयोग से ही वह कारागार में अपने साथी रहे वरिष्ठ नेता सूद जी से मिलता है। यहाँ प्रथम भाग समाप्त होता है।
द्वितीय भाग में भारतीयों का बलिदानी देशभक्तों से केवल अपने निहित स्वार्थों में रुचि लेने वाले लोगों में रूपांतरण दिखाया गया है। यहाँ आकर भाई और बहन के व्यक्तित्वों का अंतर पूरी तरह स्पष्ट होता है। जयदेव एक छद्म राष्ट्रवादी सिद्ध होता है तथा सूद जी के साथ मिलकर एक भ्रष्ट प्रकाशक एवं व्यवसायी बन जाता है। वह अपने कार्यकलापों से अपने आदर्शों के खोखलेपन को उजागर कर देता है। इस प्रकार वह न केवल अपने माता-पिता बल्कि कनक (जो अब उसकी पत्नी बन चुकी है) की दृष्टि में भी गिर जाता है क्योंकि वे अब उसके पाखंड को जान गये हैं। तारा के विषय में पहले तो सबको यही पता चला था कि जब दंगाइयों ने उसके ससुराल के घर को आग लगा दी थी तो वह जलकर मर गई थी लेकिन बाद में उसके बच जाने की बात (जयदेव सहित) सभी जान जाते हैं। अपने भाई के विपरीत वह अपने आदर्शों पर टिकी रहकर अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए तथा विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों से मिलते हुए अपनी मेहनत, लगन एवं दृढ़ निश्चय से इस स्वार्थी संसार में अपना एक मुकाम बनाने में सफल हो जाती है। वह सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण करके भारत सरकार में अवर सचिव का पद प्राप्त कर लेती है। जीवन में बहुत कुछ देख चुकने के कारण अब वह शीघ्रता में किसी से भी विवाह करने को तैयार नहीं है। तभी उसकी सुखद भेंट डॉक्टर प्राण नाथ से होती है जो लाहौर में उसके शिक्षक थे एवं अब भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार हैं। आयु के अंतर के बावजूद वे विवाह करने का निश्चय करते हैं लेकिन उनके विवाह के उपरांत जयदेव अपनी बहन पर दो बार विवाह करने का आरोप लगा देता है (जो कि एक सिविल सेवक होने के नाते तारा के लिये एक आपराधिक कृत्य है)। उपन्यास के अंत में तारा तथा उसके पति इस आरोप से बरी हो जाते हैं जबकि जयदेव के साझेदार सूद जी दूसरे आम चुनाव में अपनी सीट से हार जाते हैं।
इस मुख्य कथा में अनेक उप-कथाएं जुड़ी हैं एवं अनेक पात्र हैं जो प्रारंभ से लेकर अंत तक पाठकों के समक्ष आते हैं। यह वृहत् उपन्यास किसी प्रबल जलधारा की भांति पाठकों को अपने साथ बहाए ले चलता है। ऐतिहासिक घटनाएं तथा ऐतिहासिक पात्र उपन्यास में ऐसी कुशलता से पिरोए गये हैं कि वे कथानक का ही अभिन्न अंग बन गये हैं। लेखक ने अपने स्वतंत्रता-सेनानी होने के अनुभव का उपन्यास के लेखन में पूरा-पूरा उपयोग किया है। उपन्यास में सांप्रदायिक दंगों एवं हिंदू-मुस्लिम मानसिकता को विस्तार से दर्शाया गया है लेकिन लेखक ने कहीं पर भी किसी भी समुदाय के प्रति पक्षपात नहीं किया है। उसने न तो किसी भी समुदाय का अंधा समर्थन किया है, न ही अंधा विरोध। दोनों ही समुदायों के एकदूसरे के प्रति पूर्वाग्रहों को भी उसने ज्यों-का-त्यों रखा है। चाहे प्रमुख पात्र हों या अन्य पात्र, लेखक ने सभी को मनुष्य के रूप में ही दिखाया है जिसमें अच्छाइयां व दुर्बलताएं दोनों ही होती हैं। लेखक यह स्थापित करने में सफल रहा है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी समय और स्थान पर अवस्थित परिस्थितियों का ही उत्पाद होता है और वह उनके अनुरूप ही सोचता एवं व्यवहार करता है। यह उपन्यास भीड़ के व्यवहार को भी स्पष्ट करता है तथा सुशिक्षित व्यक्तियों की सामाजिक-राजनीतिक समझ को भी चाहे वे किसी भी समुदाय के हों।
यदि आप हमारे देश के उस कठिन समय तथा विभाजन के पूर्व एवं पश्चात् के समयकाल को ठीक से जानना चाहते हैं तो यह काल्पनिक कहानी कहने वाली पुस्तक किसी भी इतिहास की पुस्तक से अधिक उपयोगी हो सकती है क्योंकि यह एक स्वतंत्रता-सेनानी द्वारा अपने भोगे हुए यथार्थ के आधार पर लिखी गई है जिसका दृष्टिकोण पूर्णरूपेण निष्पक्ष एवं वस्तुपरक है। अब इसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी 'This is not that dawn' के नाम से प्रकाशित हो चुका है। किसी ऐतिहासिक दस्तावेज़ के समकक्ष होने के बावजूद यह केवल शुष्क इतिहास नहीं है वरन एक मनोरंजक पुस्तक है जिसमें साहित्य के सभी रसों को समाहित करती हुई पूरी तरह से मानवीय कहानी कही गई है।
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