मंगलवार, 12 मई 2026

नई 'साजन' पसंद है आपको ! पुरानी भी आयेगी !

'साजन' शीर्षक से तीन बार हिंदी फ़िल्में बनी हैं - १९४७ में, १९६९ में और १९९१ में। इनमें से १९९१ में बनी 'साजन' सर्वाधिक सफल रही है जिसमें संजय दत्त, माधुरी दीक्षित तथा सलमान ख़ान ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं। इस फ़िल्म का गीत-संगीत तो आज भी लोकप्रिय है। यह एक सम्पूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली फ़िल्म थी जो आज भी यदि पुनः प्रदर्शित हो जाए तो दर्शकों का प्रतिसाद अवश्य ही पायेगी। 

लेकिन इस फ़िल्म के आने से बाईस वर्ष पूर्व अर्थात् १९६९ में 'साजन' शीर्षक से जो फ़िल्म आई थी, वह भी कम मनोरंजक नहीं है। इस 'साजन' के प्रमुख कलाकार हैं मनोज कुमार एवं आशा पारेख। इस फ़िल्म की विशेषता यह है कि अपने प्रथम भाग में तो यह एक रोमांटिक कॉमेडी की तरह मनोरंजन प्रदान करती है जबकि द्वितीय भाग में यह एक हत्या के रहस्य पर केंद्रित हो जाती है तथा अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है।


फ़िल्म आरंभ होती है एक युवती रजनी (आशा पारेख) से जो कि एक नाटक कंपनी में काम करती है। इस संसार में उसका अपनी माँ के अलावा कोई और नहीं है। वह एक दिन एक कार से लिफ़्ट मांगकर अपने कार्यस्थल पर पहुँचती है। उसे पता नहीं है कि यह कार एक बहुत बड़े व्यवसायी अशोक (मनोज कुमार) की है। चूंकि कार्यस्थल पर कुछ लोग इस कार को पहचान लेते हैं, यह अफ़वाह उड़ जाती है कि रजनी का अशोक से प्रेम-संबंध (अफ़ेयर) है। कम्पनी के हित में रजनी भी इसका खण्डन नहीं करती। लेकिन जब यह बात समाचार-पत्रों में छप जाती है तो उसे पढ़कर अशोक रजनी से मिलने पहुँचता है। अब होता यह है कि रजनी से मिलकर वह रजनी के प्रेम में पड़ जाता है। पहले तो वह अपनी वास्तविकता रजनी से छुपाता है लेकिन अंततः रजनी सब कुछ जान ही जाती है। वह भी अशोक से प्रेम करने लगती है। रजनी की माँ और अशोक के पिता इस रिश्ते को स्वीकार कर लेते हैं।

लेकिन अचानक धरमदास नामक एक व्यक्ति जो कि रजनी की माँ से पूर्व-परिचित है, उसे ब्लैकमेल करने लगता है क्योंकि वह जानता है कि रजनी के पिता एक हत्या के आरोप में जेल में बंद हैं। यह आरोप और किसी की नहीं धरमदास की ही हत्या का है जिसका कि वास्तविक नाम शेरू है और जो एक मुजरिम है। धरमदास रजनी की माँ को ये बातें अशोक के पिता को बता देने की धमकी देता है। अब स्थितियां कुछ ऐसी बनती हैं कि रजनी, अशोक और अशोक का वफ़ादार वाहन-चालक बालम (जिसने आरंभ में रजनी को लिफ़्ट दी थी) अलग-अलग समय पर धरमदास से मिलने पहुँचते हैं। अगले दिन सुबह धरमदास मरा पड़ा पाया जाता है। किसी ने उसे गोली मार दी थी। पुलिस की पूछताछ में अशोक, रजनी और बालम तीनों ही इस अपराध को स्वीकार कर लेते हैं। अब पुलिस इस दुविधा में पड़ जाती है कि इनमें से वास्तविक हत्यारा कौन है। सच्चाई का पता फ़िल्म के क्लाईमेक्स में चलता है।

फ़िल्म का प्रथम भाग एक बहुत पुरानी विदेशी फ़िल्म 'हैप्पी गो लवली' (१९५१) से प्रेरित है। यह भाग दर्शकों को गुदगुदाने में पूरी तरह सफल है। इस भाग की कहानी लेकर बासु चटर्जी ने 'पसंद अपनी अपनी' (१९८३) नामक फ़िल्म बनाई थी जिसमें मिथुन चक्रवर्ती तथा रति अग्निहोत्री ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं। इसके अतिरिक्त आमिर ख़ान एवं असिन अभिनीत 'गजनी' (२००८) का प्रारंभिक भाग भी इसी से प्रेरित था। इस भाग में गीत भी हैं तथा नायक-नायिका का रोमांस भी। और कॉमेडी तो है ही। 'साजन' का यह भाग (उस ज़माने की) हिंदी फ़िल्मों के पारम्परिक दर्शकों के लिये है जिन्हें भरपूर मनोरंजन प्राप्त होता है।

'साजन' का आगे का भाग रहस्यकथाएं पसंद करने वालों के लिये है। हत्या का रहस्य बहुत पेचीदा है तथा वास्तविक हत्यारे का अनुमान लगाना दर्शकों के लिये बहुत कठिन है। फ़िल्म का प्रारंभिक भाग जहाँ मंद गति से चलता है, वहीं यह भाग बहुत तीव्र गति से बढ़ता है एवं दर्शकों को सोचने का समय नहीं देता। जब क्लाईमेक्स में अदालत के दृश्य में रहस्य खुलता है, तब ही दर्शक जान पाते हैं कि वास्तविकता क्या थी। यह भाग भी बहुत रोचक है एवं दर्शकों को स्क्रीन के सामने से हटने नहीं देता।

'साजन' एक आदि से अंत तक रोचक फ़िल्म है जिसकी कहानी कहीं पर भी ढीली नहीं पड़ती। प्रथम दृश्य से ही जो मनोरंजक दृश्यों का सिलसिला आरंभ होता है, वह अंत तक चलता रहता है। फ़िल्म के लेखक एवं निर्देशक दोनों ने ही सराहनीय कार्य किया है। फ़िल्म के सभी तकनीकी पक्ष अच्छे हैं। एक पल के लिये भी यह फ़िल्म दर्शक को बोर नहीं करती। मनोज कुमार एवं आशा पारेख सहित सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। 

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने आनंद बक्शी के गीतों पर सुमधुर संगीत दिया है। शीर्षक गीत 'साजन साजन पुकारूं गलियों में' तो बहुत अच्छा है ही, अन्य गीत भी सुरीले एवं मनभावन हैं (यथा 'रेशम की डोरी', 'बाँसुरी तिहारी नंदलाल' आदि)।

कुल मिलाकर यह पुरानी 'साजन' यदि नई 'साजन' के समकक्ष नहीं है तो मनोरंजन प्रदान करने के मामले में उससे पीछे भी नहीं है। यह संगीतमय रोमांटिक फ़िल्में पसंद करने वालों के लिये भी है तो कॉमेडी देखने वालों के लिये भी तथा रहस्य-प्रधान फ़िल्मों के शौकीनों के लिये भी। पारम्परिक हिंदी सिनेमा देखने वाले प्रत्येक वर्ग को यह फ़िल्म पसंद आयेगी, इसमें संदेह नहीं।

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