हम हिंदू पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। पुनर्जन्म होता है, यह बात गीता में भी उद्धृत है। पर न इसे विज्ञान मानता है न देश का विधि-विधान। लेकिन पुनर्जन्म की अनेक कथाएं सुनाई जाती हैं और अनेक फ़िल्में भी इस विषय पर बनी हैं। ऐसी ही एक फ़िल्म है ‘कुदरत’ (१९८१)। अनेक बड़े सितारों से युक्त इस फ़िल्म को व्यावसायिक सफलता तो नहीं मिली थी किंतु विषय के निर्वहन हेतु इसे सराहा गया था। फ़िल्म के लेखक-निर्देशक थे चेतन आनंद।
‘कुदरत’ की वास्तविक कहानी शुरु
होती है चंद्रमुखी के एक विचित्र स्वप्न देखकर डर जाने तथा एक अपरिचित व्यक्ति
मोहन (राजेश खन्ना) को माधो कहकर पुकारने से। मोहन सरकारी वकील है तथा उसे शिमला
के एक धनी व्यक्ति चौधरी जनक सिंह (राज कुमार) ने पाल-पोसकर बड़ा किया है। मोहन के
माता-पिता नहीं हैं तथा वह चौधरी जनक सिंह का अपने पर बहुत उपकार मानता है तथा
उसकी पुत्री करुणा (प्रिया राजवंश) से विवाह करने को तैयार है। करुणा भी वकील है।
पर जब वह चंद्रमुखी के संपर्क में आता है तो
चंद्रमुखी उसे माधो तथा स्वयं को पारो कहकर पुकारने लगती है। चंद्रमुखी के
स्वप्नावस्था में डर जाने एवं अस्वस्थ हो जाने की स्थिति का उपचार करने के लिए
नरेश उसे सम्मोहित करता है। सम्मोहनावस्था में चंद्रमुखी अपने पूर्व जन्म की
स्थिति में पहुँच जाती है। उस
स्थिति में वह स्वयं को पारो बताती है एवं यह भी बताती है कि उसे माधो से प्रेम
था। वह यह भी बताती है कि ‘छोटे सरकार’ द्वारा उसके साथ दुराचार किए जाने के उपरांत वे दोनों ही
मारे गए थे। ये ‘छोटे सरकार’ कोई और नहीं चौधरी जनक सिंह ही हैं। ये घटनाएं बीस वर्ष
पूर्व की हैं।
मोहन को सब पता चलता है तो वह भी अपने को पूर्व
जन्म का माधो मानने लगता है तथा उसे चंद्रमुखी से प्रेम हो जाता है। वे सब माधो की
बहन सत्तो (अरुणा ईरानी) से भी मिलते हैं। अब नरेश और मोहन दोनों को लगता है कि
चंद्रमुखी की अस्वस्थ स्थिति एवं भयावह स्वप्नों का उपचार यही है कि दिवंगत पारो
और माधो को न्याय मिले। विभिन्न प्रकार के प्रमाणों को एकत्र करके मोहन चौधरी जनक
सिंह पर पारो की हत्या का मुक़द्द्मा दायर कर देता है। करुणा अपने पिता के लिए बचाव
पक्ष की वकील बन जाती है। विभिन्न अदालती दृश्यों के साथ-साथ कथानक में कई मोड़ आने
के बाद फ़िल्म अपने क्लाईमेक्स तक पहुँचती है।
किसी भी अनाड़ी फ़िल्मकार के हाथों से यह कहानी
ठीक ढंग से चित्रपट पर नहीं उतारी जा सकती थी किंतु चेतन आनंद भारत के अत्यन्त
सम्मानित फ़िल्मकार रहे हैं। उन्होंने अपनी ही इस कथा को अत्यन्त कुशलतापूर्वक
रजतपट पर उतारा है। फ़िल्म की पुनर्जन्म की कथा (तथा उससे जुड़ी कुछ अन्य बातें भी)
चाहे विश्वसनीय न लगे, यह आदि से अंत
तक रोचक है एवं दर्शकों को बांधे रखती है। फ़िल्म में राज कुमार, राजेश खन्ना, हेमा मालिनी, विनोद खन्ना एवं प्रिया राजवंश जैसे सितारे हैं एवं फ़िल्म
की पटकथा इन सभी सितारों के चरित्रों के साथ न्याय करती है। चेतन आनंद ने सभी से
अत्यन्त स्वाभाविक अभिनय करवाया है। सम्पूर्ण कथानक सहज रूप से प्रवाहित होता है
जिसमें एक-के-बाद-एक आते मोड़ दर्शक को एक मिनट के लिए भी इधर-उधर होने का अवसर
नहीं देते हैं।
तकनीकी दृष्टि से भी फ़िल्म की गुणवत्ता उत्कृष्ट
है। शिमला की नयनाभिराम दृश्यावली आँखों को शीतलता पहुँचाती है। कला-निर्देशक तथा छायाकार दोनों
ने ही अपना-अपना काम बाख़ूबी किया है। फ़िल्म का पार्श्व संगीत कथानक के अनुरूप ही
है। विभिन्न चरित्रों के संवाद भी अच्छे हैं। फ़िल्म की लंबाई कथानक को ध्यान में
रखते हुए ठीक ही है विशेषकर यह देखते हुए कि फ़िल्म में अनावश्यक बातें बिलकुल नहीं
हैं। प्रत्येक बात, प्रत्येक घटना एवं
प्रत्येक दृश्य मुख्य कथा से संबद्ध है।
मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों पर राहुल देव बर्मन
ने मधुर संगीत दिया है। ‘तूने ओ रंगीले
कैसा जादू किया’, ‘हमें तुमसे प्यार कितना’, ‘छोड़ो सनम काहे का ग़म’ आदि गीत तो फ़िल्म के
प्रदर्शन के समय लोगों की ज़ुबान पर चढ़ ही गए थे, अन्य
गीत भी बहुत अच्छे बन पड़े। ये गीत आज भी सुने जाने पर मन को एक सुखद अनुभूति से भर
देते हैं।
कुल मिलाकर ‘कुदरत’ एक अत्यन्त मनोरंजक एवं
प्रभावशाली फ़िल्म है। आप पुनर्जन्म में विश्वास करते हों या नहीं; यह फ़िल्म आपको पसंद आएगी, इसमें संदेह नहीं।

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