बुधवार, 14 जनवरी 2026

एक हृदयस्पर्शी रहस्यकथा

हिंदी के लोकप्रिय लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित कई स्थायी पात्र ऐसे हैं जो अत्यन्त संवेदनशील हैं तथा अपने निजी हित से पहले अन्य व्यक्तियों के हिताहित एवं भावनाओं की परवाह करते हैं। उनके द्वारा सृजित एक ऐसा ही पात्र है – पुलिस इंस्पेक्टर प्रभु दयाल जो कि उनकी सुनील सीरीज़ के उपन्यासों में प्रायः दिखाई देता है। सुरेन्द्र मोहन पाठक न केवल प्रभु दयाल को एक अत्यन्त कार्यकुशल एवं कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में चित्रित करते हैं, वरन वे यह भी बताते हैं कि वह ऊपर से चाहे कठोर दिखाई दे, भीतर से एक अत्यन्त संवेदनशील मनुष्य है जो किसी भी निर्दोष को दंड दिलवाने में विश्वास नहीं रखता तथा अन्य व्यक्तियों एवं समाज के हितों को अपनी पुलिसिया कार्रवाई से ऊपर मानता है। उसके इस स्वभाव का उदाहरण है लेखक का ख़ाली मकान नामक उपन्यास जिसका कि नायक वही है।

ख़ाली मकान एक विशिष्ट उपन्यास है जिसमें लेखक का लोकप्रिय नायक सुनील उपस्थित नहीं है। लेखक ने इस उपन्यास में अपना स्वयं का पात्र भी रखा है जिससे प्रभु दयाल शिकायत करता है कि एक ओर तो वह उसे एक अत्यन्त कार्यकुशल पुलिस अधिकारी के रूप में चित्रित करता है, वहीं दूसरी ओर उसे किसी भी केस को हल नहीं करने देता। लेखक जब उसे कहते हैं कि सुनील सीरीज़ के उपन्यास में केस को हल करते हुए तो सुनील को ही दिखाना आवश्यक है तो वह कहता है कि एक ऐसा उपन्यास लिखो जिसमें सुनील हो ही नहीं तथा वह केस को हल करे। लेखक उसकी बात मान लेते हैं और उसके लिए एक अत्यन्त पेचीदा केस लेकर आते हैं जिसे हल करना उसके लिए एक चुनौती है।

अब यह रहस्यकथा आरंभ होती है। पुलिस को राजनगर नामक काल्पनिक नगर में बहने वाली कृष्णा नदी में डोलती हुई एक नाव मिलती है जिसमें एक पुरुष तथा एक स्त्री की लाशें हैं। पुरुष के तन पर गिरजाघर के पादरियों द्वारा पहना जाने वाला सफ़ेद चोगा है। स्त्री का गला कटा हुआ है। प्रभु दयाल के लिए प्रथम कार्य है मरने वालों की वास्तविकता का पता लगाना और साथ ही हत्याओं के वास्तविक घटनास्थल तक पहुँचना। और ऐसा कर लेने के उपरांत अपराधी का पता लगाना। उसे पता चलता है कि मृत पुरुष लिटन रोड स्थित चर्च ऑव सेंट माइकल का पादरी जोसेफ़ कॉटन है जबकि मृत स्त्री सूसन डेनिंग नामक एक विवाहित महिला है। प्रभु दयाल जी जान से मामले की छानबीन में लग जाता है। वह दोनों मृतकों से जुड़े अनेक लोगों से मिलता है जिनमें सम्मिलित हैं – पादरी की पत्नी, उसके दो साले, सूसन का पति और उसकी बेटी, पादरी की भूतपूर्व सेक्रेटरी हेलेन रीडली, उसकी वर्तमान सेक्रेटरी सिल्विया नोरिस, पादरी के परिवार का वकील जॉर्ज सैमसन, गिरजाघर की प्रबंधन समिति का अध्यक्ष हेनरी सिल्वेस्टर आदि। घटनास्थल निकलता है जॉर्जटाउन नामक स्थान में स्थित एक ख़ाली मकान जिसमें कि हत्याएं हुई थीं। प्रभु दयाल वहाँ के चौकीदार धनीराम से भी मिलता है। और साथ ही उसकी भेंट होती है एक साधु महाराज से भी जिनकी कुटिया भी उस मकान के समीप ही स्थित है।

मामले को हल करने के लिए रात-दिन एक किए हुए प्रभु दयाल की साधु महाराज से लंबी वार्ता होती है। वह साधु महाराज से बहुत प्रभावित होता है तथा उन्हें अपनी हथेली दिखाकर पूछता है कि वह इस मामले को हल करने में सफल होगा या नहीं। साधु महाराज बहुत सोच-विचार कर उसे यह बताते हैं कि सफलता दो प्रकार की होती है – एक वह जिससे आत्मिक संतोष प्राप्त होता है तथा दूसरी वह जिससे सांसारिक यश मिलता है; उसे प्रथम प्रकार की सफलता मिलेगी, दूसरे प्रकार की नहीं। प्रभु दयाल इस बात को सुनकर समझ नहीं पाता कि जब वह मामले को हल कर लेगा तो उसे सांसारिक यश क्यों नहीं मिलेगा। किंतु जब वह सम्पूर्ण मामले की तह तक जाकर वास्तविक अपराधी का पता लगा लेता है तो उसका संवेदनशील स्वभाव अपराधी को तथा उसके सहयोगियों को पकड़ने के आड़े आ जाता है और तब वह साधु महाराज की बात का मर्म समझ पाता है। उसे लगता है कि यदि वह अपराधी को तथा उसके सहयोगियों को गिरफ़्तार करके न्यायालय में प्रस्तुत करेगा तो वे लोग जो कि उसकी दृष्टि में निर्दोष हैं, अनावश्यक रूप से न्यायिक प्रक्रिया में फंस जाएंगे। उसे वास्तविक अपराधी से सहानुभूति भी होती है तथा उसे लगता है कि यह व्यक्ति तो एक पवित्र लक्ष्य हेतु अपना जीवन होम कर रहा है जिसके चलते उसका दंडित होना और यहाँ तक कि गिरफ़्तार होना भी उसके प्रति न्यायपूर्ण नहीं होगा। अपनी इसी संवेदनशीलता के चलते वह किसी को गिरफ़्तार नहीं करता एवं मामले को अनसुलझा बताकर बंद कर देता है।

ख़ाली मकान एक अत्यन्त रहस्यपूर्ण कथा है जिसके वास्तविक रहस्य का सही-सही अनुमान लगाना किसी भी पाठक के लिए लगभग असंभव है। आदि से अंत तक रोचक यह उपन्यास अपने अंतिम भाग में पाठकों के मन को छू लेता है एवं इंस्पेक्टर प्रभु दयाल के एक संवेदनशील मनुष्य होने की विशेषता पर प्रकाश डालता है। पुलिस अधिकारियों की जो छवि भारतीय जनमानस में बनी हुई है, उससे इतर एक छवि पाठकों के समक्ष आती है प्रभु दयाल के रूप में। वह इस प्रलोभन में नहीं आता कि यदि वह केस के हल को तथा संबंधित व्यक्तियों को सबके सामने प्रस्तुत कर देगा तो उसे अपने विभाग, प्रेस तथा जनता में बहुत प्रशंसा मिलेगी (ऐसे में उसकी तरक्की की भी संभावना होगी)। एक संवेदनशील मनुष्य के रूप में वह केस से जुड़े व्यक्तियों ही नहीं, लिटन रोड के सम्पूर्ण ईसाई समुदाय के विषय में सोचता है तथा विचार करता है कि उन सबकी भलाई किस बात में है। और उसका मन उसे प्रेरित करता है कि वह निजी हित को अनदेखा करके उन सबकी भलाई को देखे। उसकी यह संवेदनशीलता पाठकों को यह अनुभव करवाती है कि उन्होंने एक ऐसी रहस्यकथा पढ़ी है जो न केवल रोचक है वरन हृदयस्पर्शी भी है।

सरल हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास सुरेन्द्र मोहन पाठक के श्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जा सकता है। पाठक साहब ने प्रभु दयाल के रूप में जैसा पुलिस अधिकारी अपने पाठकों के समक्ष रखा है, वैसे पुलिस अधिकारी विरले ही होते हैं जो मानवता को अपनी पुलिस तथा कानूनी प्रक्रिया से ऊपर रखें। हिंदी साहित्य के प्रेमी इस असाधारण उपन्यास को अवश्य पढ़ें।

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