शनिवार, 3 जनवरी 2026

एक मामला, कई हल

प्राय: रहस्यकथाएं लगभग एक ही तरह की होती हैं। कोई क़त्ल होता है जिसकी जाँच-पड़ताल की जाती है, कई व्यक्तियों पर संदेह जाता है एवं अंत में वास्तविक अपराधी का पता चलता है। लेकिन सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित उपन्यास – क्राइम क्लब एक भिन्न प्रकार की कथा है जिसमें कई व्यक्ति अपने दिमाग़ी घोड़े दौड़ाकर एक क़त्ल के मामले का हल निकालने का प्रयास करते हैं तथा सभी भिन्न परिणामों पर पहुँचते हैं।



क्राइम क्लब अपराधशास्त्र में रुचि रखने वाले कुछ व्यक्तियों द्वारा बनाई गई एक संस्था है जिसके सदस्यों के समक्ष एक क़त्ल का मामला आता है। इस मामले को पुलिस असफल होकर बंद कर चुकी है अर्थात् अपराधी का पता नहीं चल सका है। अब क्राइम क्लब के सदस्य पुलिस से कुछ प्राथमिक जानकारी लेकर अपने-अपने ढंग से इस मामले के हल तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। ये सदस्य हैं: 1. विवेक आगाशे जो कि एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं प्राइवेट जासूस हैं, 2. रुचिका केजरीवाल जो कि एक युवा क्राइम रिपोर्टर हैं, 3. लौंगमल दासानी जो कि एक प्रसिद्ध वकील हैं, 4. छाया प्रजापति जो कि एक प्रथम श्रेणी की न्यायिक अधिकारी हैं, 5. अभिजीत घोष जो कि पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं एवं रहस्यकथाओं में रुचि रखते हैं, 6. अशोक प्रभाकर जो कि एक जासूसी उपन्यास लेखक हैं।

मामला यह है कि अंजना निगम नामक एक संपन्न महिला की ज़हरभरी चॉकलेट खाने से मृत्यु हो जाती है। उन चॉकलेटों का पैकेट उसके पति मुकेश निगम को अपने एक साथी दुष्यंत परमार से प्राप्त हुआ था। दुष्यंत परमार को वह पैकेट डाक से मिला था जो कि प्रत्यक्षतः सोराबजी एंड संस नामक एक चॉकलेट निर्मात्री कम्पनी द्वारा उपहार स्वरूप भेजा गया था। अंजना ने अधिक चॉकलेट खाई थीं जबकि उसके पति मुकेश ने दो चॉकलेट खाई थीं एवं बीमार वह भी पड़ा था। प्रश्न यह है कि वे चॉकलेटें यदि सोराबजी एंड संस ने नहीं भेजी थीं तो किसने भेजी थीं एवं भेजने वाले का निशाना कौन था – अंजना निगम अथवा दुष्यंत परमार ? पुलिस इस मामले को नहीं सुलझा पाती एवं अंततः इसे क्राइम क्लब को सौंप देती है।

क्राइम क्लब के सदस्य यह तय करते हैं कि वे सब अलग-अलग और अपने-अपने ढंग से इस मामले को सुलझाने का प्रयास करेंगे तथा कोई भी सदस्य अपनी कार्यप्रणाली एवं जानकारियां दूसरे सदस्य से साझा नहीं करेगा। एक सप्ताह के प्रयास के उपरांत सदस्य बारी-बारी अपना हल बाकी सदस्यों के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। किसकी बारी कब आएगी, यह पर्चियां निकालकर तय किया जाता है। और फिर होता यह है कि एक ही जैसे तथ्यों से विभिन्न सदस्य भिन्न-भिन्न निष्कर्ष निकालते हैं एवं प्रत्येक सदस्य एक भिन्न हल लेकर आता है जिसमें एक भिन्न व्यक्ति को अपराधी के रूप में स्थापित किया जाता है। यह दिमाग़ी व्यायाम बड़ा दिलचस्प साबित होता है और अंतिम सदस्य के अपना हल प्रस्तुत करने के उपरांत जब वास्तविक अपराधी का पता चलता है तो सभी चौंक जाते हैं।

यह उपन्यास सुरेन्द्र मोहन पाठक के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जा सकता है क्योंकि जैसा कि मैंने प्रथम परिच्छेद में कहा कि यह कोई आम रहस्यकथा नहीं है। यह एक ऐसी रहस्यकथा है जो कि सामान्य रहस्यकथाओं से बिलकुल अलग है। लेखक ने सिद्ध किया है कि समान तथ्यों को अलग-अलग व्यक्ति भिन्न कोणों से देखकर अलग-अलग ढंग से उनकी व्याख्या करते हैं और अलग-अलग नतीजे निकालते हैं। साथ ही किसी भी तथ्य के किसी भाग को छुपाकर एवं किसी भाग को विशेष रूप से उजागर करके लोगों को भ्रमित किया जा सकता है।

सरल हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास अत्यंत रोचक है तथा आरम्भ से अंत तक पाठकों को बांधे रखता है। क्राइम क्लब के सदस्यों के साथ-साथ उपन्यास का पाठक भी वास्तविक अपराधी का अनुमान लगाने का प्रयास करता है लेकिन वास्तविक अपराधी को पहचान पाना अत्यंत कठिन है। यही लेखक की सबसे बड़ी सफलता है। उपन्यास में न तो कोई एक्शन या मारधाड़ है और न ही कोई विशेष मोड़ हैं। केवल तथ्यों का अलग-अलग प्रकार से विश्लेषण बताते हुए पाठकों को एक दिमाग़ी ख़ुराक दी गई है जो कि न केवल रहस्यकथाएं पसंद करने वालों को बल्कि सामाजिक उपन्यास पसंद करने वालों को भी रास आएगी।

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1 टिप्पणी:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 4 जनवरी 2026 को लिंक की जाएगी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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