विश्वनाथ पाटेकर जो कि नाना पाटेकर के नाम से बेहतर जाने जाते थे, नहीं रहे। वे एक बेहतरीन अभिनेता के रूप में जाने जाते थे जो कि लीक से हटकर बनाई गई भूमिकाएं अपने विलक्षण अंदाज़ में करता था और दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था। रंगमंच से अपनी अभिनय-यात्रा आरंभ करके वे 'गमन' (१९७८) से फ़िल्मों में आए और 'अंकुश' (१९८६), प्रतिघात (१९८७), अपने ही द्वारा निर्देशित 'प्रहार' (१९९१), तिरंगा (१९९३), क्रांतिवीर (१९९४), अग्नि साक्षी (१९९६), ख़ामोशी (१९९६), वजूद (१९९८), शक्ति (२००२), वेलकम (२००७) आदि फ़िल्मों में अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ गए। ये सभी उनकी चर्चित फ़िल्में रहीं। इस लेख में मैं उनकी कुछ ऐसी फ़िल्मों की बात करूंगा जिनकी चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई तथा वे आज दर्शकों एवं समीक्षकों की स्मृति से लगभग बाहर हो चुकी हैं लेकिन जिनमें नाना का अभिनय निश्चय ही उनके श्रेष्ठ अभिनय प्रदर्शनों में सम्मिलित है। ये कतिपय फ़िल्में निम्नलिखित हैं:
ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा (१९९७): 'ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा' फ़िल्म में नाना ने शीर्षक भूमिका निभाई। यह एक ऐसे अपराधी की कहानी है जिसे अपने व्यक्तिगत जीवन में आघात लगने पर अहसास होता है कि वह एक ग़लत रास्ते पर चल रहा था। क़िस्मत उसे एक दुश्वारियों से घिरे हुए परिवार तक ले आती है और वह उस परिवार का संरक्षक बनकर अपने गुनाहों का प्रायश्चित करता है। यह फ़िल्म न केवल आदि से अंत तक रोचक है, वरन हमारे देश की मानवता से ओतप्रोत संस्कृति की भी प्रतीक है जिसमें मनुष्यता व्यक्तियों को उनके धर्म या मज़हब से ऊपर उठा देती है तथा मनुष्य को केवल मनुष्य के रूप में देखना सिखाती है। फ़िल्म का नायक एक मुस्लिम है जो अपने जीवन को एक नवीन मोड़ दे देने के उपरांत एक ब्राह्मण परिवार का संरक्षक बन जाता है तथा अंत में अपना प्राणोत्सर्ग कर देता है। फ़िल्म असफल क्यों रही, कहना मुश्किल है क्योंकि यह न केवल दर्शकों को बाँधे रखती है वरन उन्हें गहराई तक प्रभावित भी करती है। मैं इसे नाना की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक मानता हूँ।
युगपुरुष (१९९८): यह नाना की एक ऐसी फ़िल्म है जिसे उन सभी को देखना चाहिए जो गंभीर एवं सार्थक सिनेमा में रुचि रखते हैं। 'युगपुरुष' कौन हो सकता है ? किसे कहा जा सकता है 'युगपुरुष' ? फ़िल्मकार कहानी में नाना के चरित्र के माध्यम से उत्तर देता है - ऐसा व्यक्ति जो बालक की भांति निश्छल हो, जो न असत्य बोलना जानता हो और न ही निजी स्वार्थ के लिए तिकड़में करना। इस मर्मस्पर्शी फ़िल्म में नाना ने एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका निभाई है जो पच्चीस सालों तक एक मानसिक चिकित्सालय में रहने के उपरांत स्वस्थ होकर बाहरी संसार में आया है। वह एक निर्दोष बालक की भांति निष्कपट है एवं सदा सत्य बोलता है। लेकिन मानसिक चिकित्सालय के बाहर का वास्तविक संसार तो झूठ, छलकपट, स्वार्थपरता एवं तिकड़मबाज़ी से भरा पड़ा है। ऐसा संसार उसके जैसे व्यक्ति को कैसे समायोजित करेगा ? एक राजनेता की रखैल (मनीषा कोईराला) से उसे प्रेम हो जाता है तथा वह भी उसकी निर्दोषिता पर फ़िदा हो जाती है। लेकिन दोनों के मिलन की राह आसान नहीं है। एक अन्य धनी व्यक्ति (जैकी श्रॉफ़) भी उस युवती को पाना चाहता है और वह यह नहीं समझ पाता कि क्यों वह युवती इस पागलख़ाने से छूटे व्यक्ति की ओर खिंची चली जा रही है। फ़िल्म का अंत दर्शकों को हिला कर रख देता है। फ़िल्म के संवाद मन को छू जाते हैं। कुछ दृश्य ऐसे हैं जो पटल से सीधे दर्शक की आत्मा में उतरते हैं। और नाना का अभिनय ? उसके तो क्या कहने ! इस भूमिका में नाना के अतिरिक्त किसी और अभिनेता की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह भूमिका जैसे बस उन्हीं के लिए बनी थी। मैं इसे मनीषा कोईराला की भी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म मानता हूँ। फ़िल्म असफल रही थी और आज दर्शकों की स्मृति से भी उतर चुकी है लेकिन मानव मन की जटिलताओं पर आधारित यह असाधारण फ़िल्म जो भी देखेगा, उसके लिए इसे भुला देना सरल नहीं होगा।
तरकीब (२०००): यह भूली-बिसरी और टिकट खिड़की पर असफल फ़िल्म एक रहस्यकथा है जिसमें नाना एक सीबीआई अफ़सर बनकर एक युवती (तब्बू) की हत्या के रहस्य को सुलझाते हैं। फ़िल्म मामूली है लेकिन संवाद लेखक ने नाना के लिए विशेष रूप से रोचक संवाद लिखे हैं जिन्हें नाना ने अपने विलक्षण अंदाज़ में अदा किया है और पूरी फ़िल्म में दर्शकों को कभी तो हंसा दिया है और कभी उनके होठों पर मुस्कान बिखेर दी है। नाना की भूमिका कोई कॉमेडी भूमिका नहीं है लेकिन नाना ने गंभीर भूमिका को भी कॉमेडी का ऐसा पुट दे दिया है कि यही बात फ़िल्म का सबसे सशक्त बिंदु बन गई है। रहस्य को सुलझाने एवं वास्तविक अपराधी तक पहुँचने के लिए नाना जिस तरह से एक-एक व्यक्ति से मिलते हैं एवं उससे बातचीत करते हैं, वह फ़िल्म को अत्यन्त रोचक बना देता है। इस फ़िल्म के द्वारा नाना ने सिद्ध किया कि वे केवल गंभीर भूमिकाएं ही नहीं कर सकते थे बल्कि कॉमेडी का रंग लिए हुए सामान्य भूमिकाएं भी उतनी निपुणता से कर सकते थे। फ़िल्म चाहे आपको कम पसंद आए, आप तो बस नाना का अभिनय देखते रहिए और उनके संवाद सुनते रहिए। यह सामान्य-सी फ़िल्म नाना के प्रशंसकों के लिए किसी उपहार से कम नहीं।
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