शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

साहित्य और सिनेमा : समाज के दर्पण

ऐसा कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है। और यह बात ठीक ही है क्योंकि कोई भी साहित्य (विशेषतः कल्पना पर आधारित साहित्य अपने समकालीन समाज का आईना ही होता है जिसमें समाज अपना चेहरा देख सकता है। समाज में व्याप्त मान्यताएं, प्रथाएं, वर्ग-भेद तथा सामूहिक मानसिकता एवं स्थापित आदर्श; ये सभी समकालीन साहित्य में स्थान पाते हैं। इसीलिए यदि किसी विशिष्ट कालखंड के विशिष्ट समाज को जानना हो तो उस समयावधि में रचे गए साहित्य का पारायण करना चाहिए। किसी-किसी साहित्य को कालजयी भी कहा जाता है क्योंकि उसकी प्रासंगिकता समय-काल से परे होती है। लेकिन ऐसे महान साहित्य की श्रेणी में आने वाली रचनाएं कम ही होती हैं। अधिकतर साहित्य जो कि व्यावसायिक कारणों से रचा जाता है, वही प्रस्तुत करता है जो कि समाज पढ़ना चाहता है।

यही बात सिनेमा पर भी लागू होती है क्योंकि सिनेमा भी एक प्रकार का साहित्य ही है बस उसका स्वरूप शब्द-रूप न होकर दृश्य-रूप होता है। किसी समय का समाज कैसा रहा होगा, यह हम उस काल के सिनेमा को देखकर समझ सकते हैं। साहित्य की ही भांति कुछ फ़िल्में भी कालजयी होती हैं एवं सदैव प्रासंगिक बनी रहती हैं। लेकिन व्यावसायिक कारणों से बनाई जाने वाली अधिकांश फ़िल्में भी वही दिखाती हैं जो कि लोग देखना चाहते हैं। समाज की मानसिकता एवं जीवन मूल्य ही उस समय के सिनेमा में झलकते हैं। अतः सिनेमा को भी समाज का दर्पण कहा जा सकता है। ये दोनों ही विधाएं परस्पर संबद्ध हैं क्योंकि कई फ़िल्में साहित्यिक कृतियों पर आधारित होती हैं।

सामंतवादी काल में जब युद्ध हुआ करते थे एवं राजाओं की वीरता उनका आभूषण मानी जाती थी तो चारण कवि ऐसी रचनाएं किया करते थे जिनमें राजाओं की वीरता (तथा उदारता) का यशोगान होता था। स्त्रियों का हरण कर लिया जाना अनुचित नहीं माना जाता था एवं ऐसी मान्यता थी कि स्त्रियां वीर पुरुषों को ही अपने जीवन-साथी के रूप में पसंद करती थीं। परिणामतः साहित्य भी ऐसा ही रचा जाता था। सती और जौहर जैसी प्रथाओं का महिमामंडन तत्कालीन साहित्य में देखने को मिलता है। तत्कालीन सामाजिक वर्ग-भेद भी ऐसे साहित्य में उपस्थित है और उसकी भाषा भी वही है जो उस समय के समाज में बोली जाती थी। मुग़ल काल में ऐसी पुस्तकों का सृजन हुआ जो कि उस काल के शासकों की शासन-व्यवस्था का वर्णन करती थीं। 'आईन-ए-अकबरी' ऐसी ही एक पुस्तक है। मुग़लों के शासन काल में ही समाज में भक्ति-भाव पनपा एवं एक समय ऐसा भी रहा जिसे भक्ति-काल के नाम से जाना जाता है। इसी काल में मीरा, सूर, तुलसी आदि की भक्ति-रचनाएं सिरजी गईं तो पाखंडों पर प्रहार करने वाले कबीर के दोहे भी रचे गए। रहीम भी इसी काल में हुए और उनके दोहे भी कबीर के दोहों की भांति ही प्रसिद्ध हुए। ये रचनाएं एक ओर तो उस समय के समाज का दर्पण हैं, दूसरी ओर कालजयी भी हैं क्योंकि इनकी प्रासंगिकता आज तक क़ायम है।

अंग्रेज़ों के शासन-काल में भारत में पुनर्जागरण हुआ। समाज में सुधार के बहुत-से कार्य हुए। बहुत-से समाज-सुधारक सक्रिय हुए। और भारतीयों की भाषा में भी परिवर्तन हुए। आंचलिक तथा प्रांतीय भाषाएं ज्यों-की-त्यों बनी रहीं लेकिन उत्तर भारत में बोली जाने वाली हिंदी भाषा परिष्कृत हुई तथा उसका एक मानक स्वरूप खड़ी बोली के रूप में प्रचलित हुआ। यह खड़ी बोली शीघ्र ही लोकप्रिय होकर सम्पूर्ण उत्तर भारत में व्याप्त हो गई तथा आज जिसे हम हिन्दी कहते हैं, वह यही है। इसमें अरबी-फ़ारसी के शब्दों को समाहित किये जाने से उर्दू नामक भाषा का उदय हुआ। उस समय का उत्तर-भारतीय समाज ऐसी ही हिंदी-उर्दू मिश्रित भाषा बोला करता था, इसीलिए रचनाएं भी इन्हीं दोनों भाषाओं में हुईं। समाज में होने वाले सुधार (तथा पारंपरिक समाज द्वारा उनका प्रतिरोध भी) तत्कालीन साहित्य में परिलक्षित हुए। १८५७ के विद्रोह के उपरांत अंग्रेज़ों ने देशप्रेम सिखाने वाली पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाए किंतु उनका लिखा जाना रुका नहीं क्योंकि समाज में स्वाधीन होने की भावना धीरे-धीरे पनपती जा रही थी।

किस्से-कहानियां पहले पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाए जाते थे। अब वे लिखे जाने लगे और छापेख़ाने के आविष्कार के साथ किस्से-कहानियों की पुस्तकों ने भी समाज में प्रवेश किया। उपन्यास भी लिखे जाने लगे। अपने दैनंदिन जीवन के दुखों को कल्पना-लोक में विचरण करके भूलना चाहने वाले भारतीयों के लिए देवकीनंदन खत्री की 'चंद्रकांता' एवं 'चंद्रकांता संतति' जैसी रचनाएं सामने आईं तो यथार्थ एवं आदर्श, दोनों ही का निरूपण करने वाली रचनाएं प्रेमचंद ने प्रस्तुत कीं। भारतीय जनमानस में सत्य एवं न्याय जैसे आदर्श सदा से ही स्थापित रहे थे। अतः प्रेमचंद की आरंभिक रचनाएं आदर्शवादी थीं। लेकिन धीरे-धीरे प्रेमचंद ने अपने आसपास के समाज को समझा और यह पाया कि आदर्श मन में चाहे हों, व्यवहार में कम ही दिखाई देते थे। अतः वे समाज की वास्तविकता के अनुरूप ही पहले आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की ओर बढ़े एवं अपने साहित्यिक जीवन के चरम तक पहुँचते-पहुँचते पूर्ण रूप से यथार्थवादी बन गए। तत्कालीन समाज में ऊंच-नीच के भेद तथा शोषक व्यवस्था को समझना हो तो प्रेमचंद की यथार्थवादी कहानियों एवं उपन्यासों (यथा 'गोदान') को पढ़ने से यह सरलता से किया जा सकता है। उसी दौर में सामाजिक एवं जासूसी उपन्यास भी लिखे जाने आरंभ हुए तथा सिनेमा ने भी भारत में प्रवेश किया। एक अपवाद हम जयशंकर प्रसाद की ऐतिहासिक रचनाओं को मान सकते हैं जिनकी भाषा भी संस्कृतनिष्ठ हिंदी है।

अब साहित्य के साथ-साथ सिनेमा भी मनोरंजन के साधन के रूप में चल निकला लेकिन वह तत्कालीन समाज का दर्पण बनकर ही सामने आया। फ़िल्में वैसी ही बनीं और सामाजिक उपन्यास वैसे ही लिखे गए, जैसा कि समाज था। जो समाज को स्वीकार्य नहीं था, वह यदि किसी फ़िल्म में दिखाया जाता था तो फ़िल्म के असफल होने की ही संभावना रहती थी। फिर भी 'अछूत कन्या' (१९३६) तथा 'दुनिया ना माने' (१९३७) जैसी फ़िल्में बनाने का साहस कुछ लोगों ने किया जो सामाजिक व्यवस्था में सुधार की हिमायत करती थीं। अंग्रेज़ सरकार केवल उन फ़िल्मों तथा पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाती थी जो कि उनके शासन का किसी भी रूप में विरोध करती हों। फिर भी स्वाधीनता की लड़ाई लड़ने वालों ने चोरी-छुपे जनता को जागरूक एवं उद्वेलित करने वाला साहित्य रचा एवं उसे प्रसारित किया। कथा-साहित्य के साथ-साथ जनता को प्रेरित करने वाले काव्य भी रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत आदि ने रचे। अच्छा जीवन जीने के स्वप्न भी अब भारत के लोग देखने लगे थे और ये स्वप्न भी साहित्य एवं सिनेमा में उतर आए लेकिन लिखने वालों ने भी तथा फ़िल्में बनाने वालों ने भी भारतीय पारम्परिक मूल्यों को अपनी कृतियों में यथावत् बनाए रखा। 

देश आज़ाद हुआ। विभाजन से पहले भी तथा उसके बाद भी पश्चिमी पंजाब से बहुत-से लेखक एवं सृजनधर्मी मुम्बई चले आए जो कि लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा के केन्द्र के रूप में स्थापित हो चुका था। अविभाजित पंजाब की राजकीय भाषा उर्दू थी और लिखना-पढ़ना उर्दू में ही होता था। अतः इन लेखकों ने जब फ़िल्मी दुनिया में काम करना आरंभ किया तो पात्रों के संवादों में उर्दू का प्रभाव बहुत अधिक रहा। फ़िल्मकारों का शुद्धता पर आग्रह भी रहता था। अतः कलाकारों को शुद्ध उर्दू बोलने के लिए प्रेरित किया जाता था। इसीलिए हम पुरानी फ़िल्मों में कलाकारों को उर्दू का शुद्ध उच्चारण करते हुए देख सकते हैं तथा पुराने फ़िल्मी गीतों में भी गायक-गायिकाओं को उर्दू के शब्दों को पूर्णतः शुद्ध रूप में गाते हुए सुन सकते हैं। भाषा में अंग्रेज़ी का प्रभाव बहुत धीरे-धीरे आया और जब पूरी तरह से आया (इक्कीसवीं सदी में) तो हाल यह हो गया कि वे हिंदी कम और अंग्रेज़ी ज़्यादा बोलने लगे। अब तो हिंदी फ़िल्में हिंदी लगती ही नहीं, वे हिंग्रेज़ी (या हिंगलिश) बन गई हैं जिनके पात्र अपनी आधी से ज़्यादा बात अंग्रेज़ी में कहते हैं। यह उत्तर-उदारीकरण युग के समाज के उदय का प्रतीक है।

फ़िल्में हों या उपन्यास, स्त्री-पुरुष का प्रेम (या रोमांस) उनका एक अभिन्न अंग होता था। कारण ? समाज में स्त्री-पुरुष प्रेम वर्जित था। इसलिए लोग वह देखकर आनंदित होते थे जो वे स्वयं नहीं कर सकते थे। न्याय न मिलने पर प्रतिशोध लेने की कथाएं भी लोकप्रिय होती थीं क्योंकि जनसामान्य सिनेमा के परदे पर दुष्टों एवं अन्यायियों को नायक द्वारा दंडित होते देखकर प्रसन्न होता था जो कि वास्तविक जीवन में देखने को नहीं मिलता था। इसीलिए लुगदी साहित्य के नाम से रचे जाने वाले लोकप्रिय उपन्यास तथा मुख्यधारा की फ़िल्में लोगों के लिये अपने दैनंदिन दुखों से पलायन का माध्यम बन गई थीं। पहले सिनेमा सस्ता भी बहुत था (टिकट की दरें बहुत कम हुआ करती थीं), इसलिए भी ख़ूब फ़िल्में बनती थीं क्योंकि यह मनोरंजन का सबसे सस्ता माध्यम था। लुगदी साहित्य के उपन्यास भी सस्ते ही होते थे। लेकिन गुरु दत्त जैसे फ़िल्मकार तथा बिमल मित्र जैसे साहित्यकार भी थे जिन्होंने अपने-अपने माध्यम से जनता में हो रहे मोहभंग को चित्रित किया। इसी से 'प्यासा' (१९५७) और 'काग़ज़ के फूल' (१९५९) जैसी फ़िल्में तथा 'मुजरिम हाज़िर' जैसी पुस्तकें जनता के समक्ष आईं। 'साहब, बीवी और ग़ुलाम' (१९६२) फ़िल्म तो इन दोनों ही महान सृजनधर्मियों का सामूहिक प्रयास मानी जा सकती है। यशपाल ने भी अपनी कालजयी कृति 'झूठा सच' में १९४३ से लेकर १९५७ तक के भारतीय समाज तथा स्वतंत्रता के उपरांत उसमें आए परिवर्तनों का दर्पण प्रस्तुत किया।

सत्तर के दशक में भारतीय सिनेमा में परिवर्तन की दो धाराएं आईं - एक तो थी समानांतर सिनेमा की धारा जो कि नाच-गाने, रोमांस तथा मारधाड़ जैसे फ़ॉर्मूलों से युक्त मुख्यधारा के सिनेमा से अलग थी। इस धारा के फ़िल्मकारों ने फ़िल्म के व्यावसायिक पक्ष को अनदेखा करके समाज में व्याप्त वास्तविकता को पटल पर दिखाने का साहस किया। स्वाभाविक रूप से ऐसी फ़िल्में पैसा नहीं कमाती थीं लेकिन वे तत्कालीन समाज (विशेषतः ग्रामीण) समाज का दर्पण थीं। ऐसे सिनेमा से ही नसीरूद्दीन शाह, ओम पुरी, शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल जैसे प्रतिभाशाली कलाकार उभरकर दर्शकों के समक्ष आए। दूसरी धारा वह थी जिसने व्यवस्था से रूष्ट एक विद्रोही नायक को जन्म दिया जिसके कार्यकलाप जनता की मानसिकता को ही दर्शाते थे। इसके प्रतीक बने अमिताभ बच्चन।

नब्बे के दशक के आरंभ में आए उदारीकरण ने भारतीय समाज को पूरी तरह से बदल दिया। स्वाधीनता के कई दशक बाद भी जनमानस में स्थापित आदर्शों की अपनी महत्ता थी (चाहे पुस्तकीय ही सही)। इसीलिए कथाओं के नायक एवं नायिकाएं आदर्शवादी दिखाए जाते थे। चाहे कहानी-उपन्यास हों या फ़िल्म, कभी भी अपराधियों को सज़ा से बचते हुए नहीं दिखाया जाता था। नायिकाएं पारंपरिक जीवन-मूल्यों को आत्मसात् किये हुए होती थीं (उनके वस्त्र भी वैसे ही होते थे) और अपवादों को छोड़कर नायिकाओं को घरेलू बताया जाता था। चाहे कितने ही दुख सहने पड़ें, नायिकाएं परिवार (या पति) को छोड़ने की मानसिकता रखने वाली नहीं बताई जाती थीं। इसीलिए 'एक बार फिर' (१९८०), 'ये नज़दीकियां (१९८२) और 'अर्थ' (१९८२) जैसी फ़िल्मों को नई ज़मीन तोड़ने वाली फ़िल्में माना गया। 

उदारीकरण निश्चय ही भारतीय समाज के लिए एक युग-परिवर्तनकारी घटना रही। न केवल इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को बदला बल्कि भारतीय समाज की मानसिकता को भी आमूलचूल बदल डाला। अब आदर्श तिरोहित होते चले गए एवं उपभोक्तावाद सर्वोपरि हो गया। किसी-न-किसी माध्यम से धन कमाना एवं जीवन का अधिकाधिक भौतिक आनंद उठाना ही एक सर्वस्वीकार्य जीवन मूल्य बन गया। इसका स्पष्ट प्रभाव साहित्य एवं सिनेमा पर भी पड़ा। पहले जहाँ फ़िल्मों एवं उपन्यासों में ग़रीबी का महिमामंडन होता था तथा अमीरों की आलोचना की जाती थी, वहीं अब नायक ही अमीर दिखाए जाने लगे। पहले मज़दूरों की हिमायत की जाती थी तथा उद्योगपतियों एवं व्यापारियों को शोषक के रूप में दिखाया जाता था, वहीं अब नायक ही बड़े व्यापारी दिखाए जाने लगे तथा ग़रीबी का महिमामंडन तो पूरी तरह से बंद ही हो गया। इक्कीसवीं सदी में 'अकसर' (२००६), डॉन (२००६), डॉन 2 (२०११) तथा ज़िद (२०१४) जैसी फ़िल्में बनीं जिनमें अपराधी ही नायक बने एवं उन्हें अपने अपराध से लाभान्वित होते हुए भी दिखाया गया जबकि पहले ऐसी फ़िल्मों तथा ऐसे नायकों का होना कल्पना से परे था।

यह उदारीकरण का ही प्रभाव है कि हिन्दी उपन्यासकार वेद प्रकाश शर्मा जो कि पहले सदैव अपने उपन्यासों में अपराधियों को दंडित होते हुए दिखाते थे, ने 'सुपरस्टार' एवं 'पैंतरा' जैसे उपन्यास लिखे जिनमें उन्होंने अपराधी को अपने अपराध से फ़ायदा उठाते हुए एवं कानून की पकड़ से बच निकलते हुए दिखाया। जब समाज आदर्शवादी था तो लोकप्रिय हिन्दी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक ने अपने उपन्यासों हेतु एक आदर्शवादी पत्रकार सुनील का सृजन किया था जिसकी सत्य में अटूट आस्था थी। इस नायक को लेकर पाठक साहब ने सौ से अधिक उपन्यास लिखे। लेकिन अब वर्षों से वे इस नायक के उपन्यास (सुनील सीरीज़) लिखना छोड़ चुके हैं क्योंकि उनका पाठक समुदाय ही आदर्शवादी नहीं रहा।

इस उदारीकरण ने समाज की भाषा, व्यवहार और मानसिकता को अंग्रेज़ियत एवं स्वार्थपरता में ऐसा ढाल दिया है कि पाठ्यपुस्तकें तक बदल गई हैं। बचपन में हम अपनी हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों में नीम की दतौन (दातुन) करने के बारे में पढ़ा करते थे, अब ऐसी बात कहीं लिख भी दी जाए तो शायद हास्यास्पद लगेगी। पहले हमारी अंग्रेज़ी की पाठ्यपुस्तकों में एक अध्याय अनिवार्य रूप से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बारे में होता था। और अब ...? पहले 'सादा जीवन उच्च विचार' में आस्था रखने वाले फ़िल्मकार ताराचंद बड़जात्या हुआ करते थे जिनकी फ़िल्मों के पात्र सादगी से युक्त जीवन जीने वाले तथा उच्च मूल्यों का पालन करने वाले होते थे। लेकिन उदारीकरण के दौर में उनके पौत्र सूरज बड़जात्या ने अमीरी एवं तड़क-भड़क दिखाने वाली फ़िल्में बनानी आरंभ कर दीं। अब शुद्ध भाषा न संवादों में रही, न गीतों में। पहले आदर्श कम से कम पुस्तकों में तो होते थे, अब तो पुस्तकों में भी नहीं मिलते। आज के दौर का साहित्य और सिनेमा आज के समाज का दर्पण है। नदी की धारा पीछे नहीं लौटती, आगे ही बढ़ती है। इसलिए पहले वाले दौर की वापसी तो संभव नहीं लगती। आने वाले कल में ही कोई आशा की किरण छुपी हुई है जो आदर्शों एवं शाश्वत जीवन मूल्यों को प्रासंगिक बनाए रखेगी, यही मानकर इस दर्पण को निरखते हैं। 

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