अपने पिछले जन्मदिन पर अमिताभ बच्चन ८४ वर्ष के हो गए। बढ़ती आयु में अपने आपको शारीरिक एवं मानसिक रूप से चुस्त-दुरूस्त रखने के मामले में वे निश्चय ही एक आदर्श हैं, अपनी अगली पीढ़ी के लिए रोल मॉडल हैं। उन्होंने (सम्भवतः) नियमित व्यायाम एवं संतुलित खान-पान के माध्यम से स्वयं को फ़िट बनाए रखा है, उनकी स्मरण-शक्ति कमाल की है तथा सक्रियता का तो यह हाल है कि इस आयु में भी वे विगत छब्बीस वर्षों से लोकप्रिय 'कौन बनेगा करोड़पति' कार्यक्रम को होस्ट कर रहे हैं। वे मानसिक रूप से भी बेहद मज़बूत हैं। राजनीति तथा व्यवसाय के क्षेत्रों में चोट खाने के उपरांत जिस तरह उन्होंने अपने आपको संभाला तथा अपनी अभिनय प्रतिभा के माध्यम से पुनः उठकर खड़े हुए एवं एक बार फिर से सफलता को अपने चरणों में ले आए, वह निश्चय ही एक मिसाल है। मैं और मेरे जैसे लोग यदि उन्हें अपना पथ-प्रदर्शक मानकर उनके पदचिह्नों पर चलें तो अपना ही भला करेंगे।
अमिताभ बच्चन को फ़िल्मी दुनिया में लोकप्रियता सत्तर के दशक में तब प्राप्त हुई जब लोगों का व्यवस्था से मोहभंग होने लगा था तथा तब की युवा पीढ़ी एक नायक की तलाश में थी - एक ऐसा नायक जो उसके भीतर उमड़े लेकिन दबे हुए आक्रोश को स्वर दे सकता हो। यह स्वर रूपहले परदे पर अमिताभ बच्चन ने दिया फ़िल्म 'ज़ंजीर' (१९७३) के माध्यम से। और दो वर्ष बाद आई फ़िल्म 'दीवार' (१९७५) ने उन्हें स्थायी रूप से एक ग़ुस्सैल नौजवान (एंग्री यंग मैन) की छवि प्रदान कर दी। उनकी यह छवि 'लार्जर दैन लाइफ़' थी अर्थात् वे परदे पर वे सब काम कर दिखाते थे जो वास्तविक जीवन में एक सामान्य व्यक्ति के लिए करना संभव नहीं होता। एक फ़िल्म में आया उनका यह संवाद आज तक प्रसिद्ध है - 'हम जहाँ खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरु होती है'। लोग रजतपट पर अमिताभ को वह करते हुए देखते थे जो वे स्वयं करना तो चाहते थे पर कर नहीं सकते थे। इसी बात ने भारतीय जनता को अमिताभ बच्चन का मुरीद बना दिया।
ऐसी छवियां स्वतः नहीं बनतीं, गढ़ी जाती हैं। अमिताभ की यह 'एंग्री यंग मैन' वाली 'लार्जर दैन लाइफ़' छवि गढ़ी किसने ? उनकी यह छवि गढ़ी थी सलीम-जावेद ने। सलीम-जावेद लेखकों की वह जोड़ी थी जिसने फ़िल्मी दुनिया में लेखकों को भी सम्मान दिलाया वरना पहले लेखक निर्देशक के मुंशी से अधिक नहीं समझे जाते थे। सलीम-जावेद फ़िल्मों की कहानी एवं पटकथा (स्क्रीनप्ले) के साथ-साथ संवाद भी लिखते थे। 'शोले' (१९७५) जैसी सारे देश में धूम मचा देने वाली फ़िल्म के लेखक भी वही थे। उन्होंने ही अमिताभ बच्चन को केंद्र में रखकर कई कथाएं रचीं और उन्हें वह विराट छवि प्रदान की जो आज तक उनके काम आ रही है। सलीम-जावेद अमिताभ के लिए विशेष रूप से प्रभावशाली संवाद लिखते थे जिन्हें अमिताभ जब अपनी ज़ोरदार आवाज़ में अदा करते थे तो सिनेमा हॉल में बैठे उन्हें सुनने वाले दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। इसीलिए अगर कहा जाता है कि अमिताभ को बनाने वाले सलीम-जावेद थे तो ग़लत नहीं लगता।
ऐसी ही एक फ़िल्म थी यश चोपड़ा कृत 'काला पत्थर' (१९७९) जो व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही थी। एक कोयले की ख़ान तथा उसमें काम करने वाले श्रमिकों के जीवन पर आधारित यह फ़िल्म आश्चर्यजनक रूप से अमिताभ बच्चन एवं सलीम-जावेद दोनों की ही असफल फ़िल्मों में से एक है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने १९७१ से आरंभ करके १९७३ तक देश की सभी कोयले की खानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था एवं १९७५ में कोल इंडिया लिमिटेड की स्थापना कर दी गई थी। लेकिन सलीम-जावेद ने अपनी कहानी में एक व्यापारी की निजी कोयले की खदान को दिखाया। उन दिनों देश में समाजीकरण की लहर थी तथा व्यापारी एवं उद्योगपतियों की छवि शोषक की थी जो श्रमिकों का शोषण करते थे एवं उन्हें जीवन की आधारभूत सुविधाओं से भी वंचित रखते थे। सलीम-जावेद ने इस फ़िल्म में एक ऐसा ही मुनाफ़े का लालची व्यापारी धनराज पुरी (प्रेम चोपड़ा) प्रस्तुत किया।
धनराज अपनी कोयला खान में काम करने वाले श्रमिकों के जीवन-यापन, चिकित्सा तथा सुरक्षा के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण अपनाता है। आए दिन खान में दुर्घटनाएं होती हैं तथा श्रमिकों की मृत्यु होती है पर धनराज पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसी खान में काम करता है सलीम-जावेद द्वारा रचित एंग्री यंग मैन – विजय (अमिताभ बच्चन) जो अपने विगत जीवन में हुई एक दुर्घटना के कारण शोषक व्यक्ति तथा शोषक व्यवस्था से ही नहीं, अपने आप से भी नाराज़ है। अपने भीतर की घुटन को वह दूसरों की सहायता करके संभालता है। उसे अपने जैसे स्वभाव तथा विचारों वाला व्यक्ति मिलता है खान में नवनियुक्त अभियंता रवि (शशि कपूर) के रूप में। साथ ही उसे मिलती है खान की डिस्पेंसरी में नई-नई आई महिला चिकित्सक सुधा (राखी) जो उसकी ही तरह संवेदनशील है और धीरे-धीरे वह उसके दुख बांटने लगती है। लेकिन खान की नौकरी में आ घुसे एक भगोड़े क़ैदी मंगल (शत्रुघन सिन्हा) से उसकी टक्कर होती है। अब नायक तीन हैं तो नायिकाएं भी तीन होनी चाहिए। तो रवि के लिए आ जाती है उसकी पत्रकार बन चुकी भूतपूर्व सहपाठिन अनीता (परवीन बाबी) और मंगल के लिए वहाँ पहले से मौजूद है अंगूठियां तथा सुहागिनों के काम आने वाला सामान बेचने वाली छन्नो (नीतू सिंह)। सुख-दुख के पलों के बीच नाच-गाने भी होते हैं।
धनराज के लालच के कारण एक दिन खान में एक सुरंग की दीवार इतनी कमज़ोर हो जाती है कि वह टूट जाती है तथा पानी से भरी दूसरी सुरंग का पानी उन सुरंगों में फैलने लगता है जिनमें मज़दूर काम कर रहे हैं। इस बाढ़ सरीखी स्थिति में लगभग चार सौ मज़दूरों की ज़िन्दगी ख़तरे में पड़ जाती है। विजय, रवि और मंगल मज़दूरों की जान बचाने में जुटते हैं और अपनी जान जोखिम में डालकर अधिकांश मज़दूरों को बचाकर ले आते हैं पर इस हादसे में मंगल अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है। फ़िल्म विजय को ठुकरा देने वाले उसके माता-पिता द्वारा वहाँ पहुँचने और उसे फिर से अपना लेने के साथ समाप्त होती है। अंत में खान में होती हुई चहल-पहल तो दिखाई गई है (धनराज को गिरफ़्तार कर लिया जाता है) लेकिन वह खान सरकार ने अपने हाथ में ले ली या नहीं, यह स्पष्ट करने की तक़लीफ़ सलीम-जावेद और यश चोपड़ा ने नहीं की।
ऐसा कहा जाता है कि सलीम-जावेद ने 'काला पत्थर' की कहानी बिहार (झारखंड) की चासनाला खदान में १९७५ में घटित वास्तविक दुर्घटना से प्रेरित होकर लिखी थी। वास्तविकता चाहे जो भी हो; पटकथा जितनी रोचक है, निर्देशक यश चोपड़ा ने उसे उतने ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। फ़िल्म में कोई ऊबाऊ पल नहीं है तथा तेज़ी से भागती कथा दर्शकों को लगभग तीन घंटे तक बाँधे रखती है तथा फ़िल्म के परदे के सामने से हटने का कोई अवसर नहीं देती। आरंभ से अंत तक दर्शक टकटकी लगाए फ़िल्म को देखता चला जाता है। फ़िल्म का गीत-संगीत भी अच्छा है। रवि और अनीता का एक प्रेमगीत अनावश्यक लगता है जिसे हटाकर फ़िल्म को कुछ छोटा किया जा सकता था अन्यथा फ़िल्म का कोई भी प्रसंग अनावश्यक नहीं लगता। फ़िल्म का तकनीकी पक्ष भी अत्यन्त सबल है। इसीलिए मुझे फ़िल्म की असफलता का तथ्य आश्चर्यचकित करता है क्योंकि फ़िल्म रोचकता से भरपूर है। फ़िल्म का शीर्षक 'काला पत्थर' कोयले की खदान के लिए ही प्रयुक्त किया गया है।
सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। अमिताभ बच्चन का अंडरप्ले कमाल का है। विजय के अतीत तथा वर्तमान जीवन के कारण उसके मन में भरी हुई हताशा एवं घुटन को उन्होंने अपने अभिनय से सजीव कर दिया है। उनके ग़ुस्से वाले दृश्य भी लाजवाब हैं तथा एक्शन दृश्य भी। और उनकी संवाद अदायगी तो अद्वितीय है ही। परदे पर अमिताभ नहीं, विजय का चरित्र ही नज़र आता है। अधिकांश फ़िल्म में उनके मुख पर कोयले की कालिख पुती हुई दिखाई गई है लेकिन निर्देशक महोदय उनके 'अमिताभ कट' के नाम से प्रसिद्ध हो चुके हेयर स्टाइल को बदलना भूल गए। जहाँ-जहाँ उनकी यह केश-सज्जा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, वहीं-वहीं उनका व्यक्तित्व बनावटी लगने लगता है। अन्य कलाकारों ने भी अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है। अमिताभ की ही तरह शत्रुघन सिन्हा भी अपनी स्टाइलिश संवाद अदायगी के लिए मशहूर थे जो इस फ़िल्म में भरपूर मिलती है। परवीन बाबी का चरित्र केवल भरती के लिए लगता है लेकिन नीतू सिंह को छन्नो के रूप में अपना अभिनय (और नृत्य) दिखाने का पूरा-पूरा मौका मिला है।
आज कोयले की खानें निजी हाथों में नहीं हैं, सरकार के स्वामित्व में हैं। श्रमिकों को (ऐसी अपेक्षा है) श्रम कानूनों की सुरक्षा के अंतर्गत सभी बुनियादी सुविधाएं मिल रही हैं तथा उनके जीवन की सुरक्षा का भी ध्यान रखा जा रहा है। इसलिए हो सकता है कि 'काला पत्थर' की विषय-वस्तु आज प्रासंगिक नहीं हो लेकिन मनोरंजन से भरपूर इस हिन्दी फ़िल्म को जो भी देखेगा, उसे यह फ़िल्म अच्छी ही लगेगी। यह केवल अमिताभ ही नहीं, सलीम-जावेद और यश चोपड़ा की भी श्रेष्ठ फ़िल्मों में सम्मिलित है। यह एक मल्टी-स्टारर फ़िल्म है और इसीलिए अमिताभ, शशि कपूर, शत्रुघन सिन्हा, राखी, परवीन बाबी तथा नीतू सिंह के प्रशंसकों के लिए भी एक तोहफ़े की तरह है। मैं मनोरंजन के अभिलाषी सभी दर्शकों को इसे देखने की अनुशंसा करता हूँ।
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