गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

एंग्री यंग मैन और काला पत्थर

अपने पिछले जन्मदिन पर अमिताभ बच्चन ८४ वर्ष के हो गए। बढ़ती आयु में अपने आपको शारीरिक एवं मानसिक रूप से चुस्त-दुरूस्त रखने के मामले में वे निश्चय ही एक आदर्श हैं, अपनी अगली पीढ़ी के लिए रोल मॉडल हैं। उन्होंने (सम्भवतः) नियमित व्यायाम एवं संतुलित खान-पान के माध्यम से स्वयं को फ़िट बनाए रखा है, उनकी स्मरण-शक्ति कमाल की है तथा सक्रियता का तो यह हाल है कि इस आयु में भी वे विगत छब्बीस वर्षों से लोकप्रिय 'कौन बनेगा करोड़पति' कार्यक्रम को होस्ट कर रहे हैं। वे मानसिक रूप से भी बेहद मज़बूत हैं। राजनीति तथा व्यवसाय के क्षेत्रों में चोट खाने के उपरांत जिस तरह उन्होंने अपने आपको संभाला तथा अपनी अभिनय प्रतिभा के माध्यम से पुनः उठकर खड़े हुए एवं एक बार फिर से सफलता को अपने चरणों में ले आए, वह निश्चय ही एक मिसाल है। मैं और मेरे जैसे लोग यदि उन्हें अपना पथ-प्रदर्शक मानकर उनके पदचिह्नों पर चलें तो अपना ही भला करेंगे।

अमिताभ बच्चन को फ़िल्मी दुनिया में लोकप्रियता सत्तर के दशक में तब प्राप्त हुई जब लोगों का व्यवस्था से मोहभंग  होने लगा था तथा तब की युवा पीढ़ी एक नायक की तलाश में थी - एक ऐसा नायक जो उसके भीतर उमड़े लेकिन दबे हुए आक्रोश को स्वर दे सकता हो। यह स्वर रूपहले परदे पर अमिताभ बच्चन ने दिया फ़िल्म 'ज़ंजीर' (१९७३) के माध्यम से। और दो वर्ष बाद आई फ़िल्म 'दीवार' (१९७५) ने उन्हें स्थायी रूप से एक ग़ुस्सैल नौजवान (एंग्री यंग मैन) की छवि प्रदान कर दी। उनकी यह छवि 'लार्जर दैन लाइफ़' थी अर्थात् वे परदे पर वे सब काम कर दिखाते थे जो वास्तविक जीवन में एक सामान्य व्यक्ति के लिए करना संभव नहीं होता। एक फ़िल्म में आया उनका यह संवाद आज तक प्रसिद्ध है - 'हम जहाँ खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरु होती है'। लोग रजतपट पर अमिताभ को वह करते हुए देखते थे जो वे स्वयं करना तो चाहते थे पर कर नहीं सकते थे। इसी बात ने भारतीय जनता को अमिताभ बच्चन का मुरीद बना दिया।

ऐसी छवियां स्वतः नहीं बनतीं, गढ़ी जाती हैं। अमिताभ की यह 'एंग्री यंग मैन' वाली 'लार्जर दैन लाइफ़' छवि गढ़ी किसने ? उनकी यह छवि गढ़ी थी सलीम-जावेद ने। सलीम-जावेद लेखकों की वह जोड़ी थी जिसने फ़िल्मी दुनिया में लेखकों को भी सम्मान दिलाया वरना पहले लेखक निर्देशक के मुंशी से अधिक नहीं समझे जाते थे। सलीम-जावेद फ़िल्मों की कहानी एवं पटकथा (स्क्रीनप्ले) के साथ-साथ संवाद भी लिखते थे। 'शोले' (१९७५) जैसी सारे देश में धूम मचा देने वाली फ़िल्म के लेखक भी वही थे। उन्होंने ही अमिताभ बच्चन को केंद्र में रखकर कई कथाएं रचीं और उन्हें वह विराट छवि प्रदान की जो आज तक उनके काम आ रही है। सलीम-जावेद अमिताभ के लिए विशेष रूप से प्रभावशाली संवाद लिखते थे जिन्हें अमिताभ जब अपनी ज़ोरदार आवाज़ में अदा करते थे तो सिनेमा हॉल में बैठे उन्हें सुनने वाले दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। इसीलिए अगर कहा जाता है कि अमिताभ को बनाने वाले सलीम-जावेद थे तो ग़लत नहीं लगता।

ऐसी ही एक फ़िल्म थी यश चोपड़ा कृत 'काला पत्थर' (१९७९) जो व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही  थी। एक कोयले की ख़ान तथा उसमें काम करने वाले श्रमिकों के जीवन पर आधारित यह फ़िल्म आश्चर्यजनक रूप से अमिताभ बच्चन एवं सलीम-जावेद दोनों की ही असफल फ़िल्मों में से एक है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने १९७१ से आरंभ करके १९७३ तक देश की सभी कोयले की खानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था एवं १९७५ में कोल इंडिया लिमिटेड की स्थापना कर दी गई थी। लेकिन सलीम-जावेद ने अपनी कहानी में एक व्यापारी की निजी कोयले की खदान को दिखाया। उन दिनों देश में समाजीकरण की लहर थी तथा व्यापारी एवं उद्योगपतियों की छवि शोषक की थी जो श्रमिकों का शोषण करते थे एवं उन्हें जीवन की आधारभूत सुविधाओं से भी वंचित रखते थे। सलीम-जावेद ने इस फ़िल्म में एक ऐसा ही मुनाफ़े का लालची व्यापारी धनराज पुरी (प्रेम चोपड़ा) प्रस्तुत किया। 

धनराज अपनी कोयला खान में काम करने वाले श्रमिकों के जीवन-यापन, चिकित्सा तथा सुरक्षा के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण अपनाता है। आए दिन खान में दुर्घटनाएं होती हैं तथा श्रमिकों की मृत्यु होती है पर धनराज पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसी खान में काम करता है सलीम-जावेद द्वारा रचित एंग्री यंग मैन – विजय (अमिताभ बच्चन) जो अपने विगत जीवन में हुई एक दुर्घटना के कारण शोषक व्यक्ति तथा शोषक व्यवस्था से ही नहीं, अपने आप से भी नाराज़ है। अपने भीतर की घुटन को वह दूसरों की सहायता करके संभालता है। उसे अपने जैसे स्वभाव तथा विचारों वाला व्यक्ति मिलता है खान में नवनियुक्त अभियंता रवि (शशि कपूर) के रूप में। साथ ही उसे मिलती है खान की डिस्पेंसरी में नई-नई आई महिला चिकित्सक सुधा (राखी) जो उसकी ही तरह संवेदनशील है और धीरे-धीरे वह उसके दुख बांटने लगती है। लेकिन खान की नौकरी में आ घुसे एक भगोड़े क़ैदी मंगल (शत्रुघन सिन्हा) से उसकी टक्कर होती है। अब नायक तीन हैं तो नायिकाएं भी तीन होनी चाहिए। तो रवि के लिए आ जाती है उसकी पत्रकार बन चुकी भूतपूर्व सहपाठिन अनीता (परवीन बाबी) और मंगल के लिए वहाँ पहले से मौजूद है अंगूठियां तथा सुहागिनों के काम आने वाला सामान बेचने वाली छन्नो (नीतू सिंह)। सुख-दुख के पलों के बीच नाच-गाने भी होते हैं।

धनराज के लालच के कारण एक दिन खान में एक सुरंग की दीवार इतनी कमज़ोर हो जाती है कि वह टूट जाती है तथा पानी से भरी दूसरी सुरंग का पानी उन सुरंगों में फैलने लगता है जिनमें मज़दूर काम कर रहे हैं। इस बाढ़ सरीखी स्थिति में लगभग चार सौ मज़दूरों की ज़िन्दगी ख़तरे में पड़ जाती है। विजय, रवि और मंगल मज़दूरों की जान बचाने में जुटते हैं और अपनी जान जोखिम में डालकर अधिकांश मज़दूरों को बचाकर ले आते हैं पर इस हादसे में मंगल अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है। फ़िल्म विजय को ठुकरा देने वाले उसके माता-पिता द्वारा वहाँ पहुँचने और उसे फिर से अपना लेने के साथ समाप्त होती है। अंत में खान में होती हुई चहल-पहल तो दिखाई गई है (धनराज को गिरफ़्तार कर लिया जाता है) लेकिन वह खान सरकार ने अपने हाथ में ले ली या नहीं, यह स्पष्ट करने की तक़लीफ़ सलीम-जावेद और यश चोपड़ा ने नहीं की।

ऐसा कहा जाता है कि सलीम-जावेद ने 'काला पत्थर' की कहानी बिहार (झारखंड) की चासनाला खदान में १९७५ में घटित वास्तविक दुर्घटना से प्रेरित होकर लिखी थी। वास्तविकता चाहे जो भी हो; पटकथा जितनी रोचक है, निर्देशक यश चोपड़ा ने उसे उतने ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। फ़िल्म में कोई ऊबाऊ पल नहीं है तथा तेज़ी से भागती कथा दर्शकों को लगभग तीन घंटे तक बाँधे रखती है तथा फ़िल्म के परदे के सामने से हटने का कोई अवसर नहीं देती। आरंभ से अंत तक दर्शक टकटकी लगाए फ़िल्म को देखता चला जाता है। फ़िल्म का गीत-संगीत भी अच्छा है। रवि और अनीता का एक प्रेमगीत अनावश्यक लगता है जिसे हटाकर फ़िल्म को कुछ छोटा किया जा सकता था अन्यथा फ़िल्म का कोई भी प्रसंग अनावश्यक नहीं लगता। फ़िल्म का तकनीकी पक्ष भी अत्यन्त सबल है। इसीलिए मुझे फ़िल्म की असफलता का तथ्य आश्चर्यचकित करता है क्योंकि फ़िल्म रोचकता से भरपूर है। फ़िल्म का शीर्षक 'काला पत्थर' कोयले की खदान के लिए ही प्रयुक्त किया गया है।

सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। अमिताभ बच्चन का अंडरप्ले कमाल का है। विजय के अतीत तथा वर्तमान जीवन के कारण उसके मन में भरी हुई हताशा एवं घुटन को उन्होंने अपने अभिनय से सजीव कर दिया है। उनके ग़ुस्से वाले दृश्य भी लाजवाब हैं तथा एक्शन दृश्य भी। और उनकी संवाद अदायगी तो अद्वितीय है ही। परदे पर अमिताभ नहीं, विजय का चरित्र ही नज़र आता है। अधिकांश फ़िल्म में उनके मुख पर कोयले की कालिख पुती हुई दिखाई गई है लेकिन निर्देशक महोदय उनके 'अमिताभ कट' के नाम से प्रसिद्ध हो चुके हेयर स्टाइल को बदलना भूल गए। जहाँ-जहाँ उनकी यह केश-सज्जा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, वहीं-वहीं उनका व्यक्तित्व बनावटी लगने लगता है। अन्य कलाकारों ने भी अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है। अमिताभ की ही तरह शत्रुघन सिन्हा भी अपनी स्टाइलिश संवाद अदायगी के लिए मशहूर थे जो इस फ़िल्म में भरपूर मिलती है। परवीन बाबी का चरित्र केवल भरती के लिए लगता है लेकिन नीतू सिंह को छन्नो के रूप में अपना अभिनय (और नृत्य) दिखाने का पूरा-पूरा मौका मिला है।

आज कोयले की खानें निजी हाथों में नहीं हैं, सरकार के स्वामित्व में हैं। श्रमिकों को (ऐसी अपेक्षा है) श्रम कानूनों की सुरक्षा के अंतर्गत सभी बुनियादी सुविधाएं मिल रही हैं तथा उनके जीवन की सुरक्षा का भी ध्यान रखा जा रहा है। इसलिए हो सकता है कि 'काला पत्थर' की विषय-वस्तु आज प्रासंगिक नहीं हो लेकिन मनोरंजन से भरपूर इस हिन्दी फ़िल्म को जो भी देखेगा, उसे यह फ़िल्म अच्छी ही लगेगी। यह केवल अमिताभ ही नहीं, सलीम-जावेद और यश चोपड़ा की भी श्रेष्ठ फ़िल्मों में सम्मिलित है। यह एक मल्टी-स्टारर फ़िल्म है और इसीलिए अमिताभ, शशि कपूर, शत्रुघन सिन्हा, राखी, परवीन बाबी तथा नीतू सिंह के प्रशंसकों के लिए भी एक तोहफ़े की तरह है। मैं मनोरंजन के अभिलाषी सभी दर्शकों को इसे देखने की अनुशंसा करता हूँ।

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शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

मानवीय साहस की अद्भुत गाथा

निर्माता-निर्देशक बलदेवराज चोपड़ा की संस्था बी.आर. फ़िल्म्स एक अत्यंत प्रतिष्ठित फ़िल्म-निर्माण संस्था रही है जिसने एक-से-एक बढ़कर उत्तम फ़िल्में हिंदी सिने-दर्शकों के लिए प्रस्तुत कीं। युवा होने पर उनके पुत्र रवि चोपड़ा ने भी निर्देशन आरम्भ किया। उन्होंने एक हॉलीवुड फ़िल्म 'द टॉवरिंग इनफ़र्नो' देखी जिसमें एक इमारत में आग लगने की घटना का वर्णन था। उस फ़िल्म से प्रेरित होकर उन्होंने एक कुछ भिन्न फ़िल्म की परिकल्पना की जिसमें एक चलती हुई रेलगाड़ी में आग लगने की घटना का कथानक प्रस्तुत किया जाने वाला था। यह हिंदी फ़िल्म अथक परिश्रम के उपरांत बनकर तैयार हो पाई एवं १९८० में प्रदर्शित हुई। इसका नाम है – 'द बर्निंग ट्रेन'।

'द बर्निंग ट्रेन' (जलती हुई रेलगाड़ी) में अपने समय के अत्यन्त लोकप्रिय सितारों को सम्मिलित किया यथा – धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, विनोद खन्ना, परवीन बाबी, जीतेंद्र, नीतू सिंह, विनोद मेहरा, डैनी आदि। सभी सितारों की भूमिकाओं के साथ न्याय करने वाली तथा रेलगाड़ी के जलने की घटना को केंद्र में रखने वाली कहानी लिखना भी कोई सरल कार्य नहीं था किंतु कमलेश्वर ने यह सफलतापूर्वक किया। उनकी कथा तथा रवि चोपड़ा के निर्देशन के साथ-साथ कला-निर्देशक शांतिदास, एक्शन निर्देशक मंसूर, सम्पादक प्राण मेहरा एवं छायाकार धरम चोपड़ा ने भी सराहनीय कार्य किया और कलाकारों के सजीव अभिनय से युक्त यह अविस्मरणीय फ़िल्म रजतपट पर आई।

फ़िल्म तीन बालकों से आरम्भ होती है जिनमें से दो बचपन से ही प्रतिद्वंद्विता रखते हैं जबकि दो ऐसे हैं जिनकी मित्रता अत्यन्त प्रगाढ़ है। प्रतिद्वंद्वी बालक रेल का इंजन बनाने का सपना पालते हैं एवं बड़े होकर भारतीय रेलवे में नौकरी करते हैं। भारतीय रेलवे एक अत्यन्त तीव्र चलने वाली रेलगाड़ी सुपर एक्सप्रेस की योजना केंद्रीय सरकार को भेजता है जिसके साथ विभिन्न अभियंताओं द्वारा बनाए गए इंजन के मॉडल भी होते हैं। जब सरकार इस परियोजना को स्वीकृति दे देती है तो विभिन्न मॉडलों में से तीन मॉडल अंतिम निर्णय हेतु चुने जाते हैं जो कि बचपन से ही प्रतिद्वंद्विता रखने वाले विनोद (विनोद खन्ना) एवं रणधीर (डैनी) के अतिरिक्त उनके साथी अभियंता राकेश (विनोद मेहरा) के होते हैं। संबंधित निर्णयन समिति विनोद द्वारा बनाए गए मॉडल को इंजन बनाने हेतु चुनती है और यह बात रणधीर को चुभ जाती है जो पहले से ही विनोद से ख़ार खाए बैठा था क्योंकि जिस युवती शीतल (परवीन बाबी) से वह विवाह करने की इच्छा रखता था, उसने विनोद से विवाह कर लिया था।

विनोद एक श्रेष्ठ एवं तीव्र गति वाला इंजन बनाने की धुन अपने मन में लेकर काम में जुट जाता है एवं उसकी इस धुन के चलते उसकी पत्नी शीतल स्वयं को उपेक्षित अनुभव करने लगती है। विनोद का बचपन का अभिन्न मित्र अशोक (धर्मेंद्र) तीव्र गति से कार चलाने का शौकीन है तथा सीमा (हेमा मालिनी) से प्रेम करता है किंतु भाग्य उस पर ऐसा वज्रपात करता है कि वह अपने पिता, सम्पूर्ण धन-सम्पत्ति तथा सीमा के प्रेम को भी खो बैठता है। इस तरह बचपन के तीनों साथियों – विनोद, अशोक तथा रणधीर के जीवन अलग-अलग मोड़ ले लेते हैं।

वर्षों बीत जाते हैं। छह साल के अथक परिश्रम के उपरांत विनोद एक तीव्र गति वाली एवं भरपूर आरामदायक (लक्ज़री) गाड़ी अर्थात् सुपर एक्सप्रेस को बनाने में सफल हो जाता है। परंतु उसे धक्का तब लगता है जब गाड़ी की प्रथम यात्रा से ठीक एक दिन पूर्व उसकी पत्नी शीतल उसे छोड़ देने का निर्णय लेती है एवं अपने तथा विनोद के पुत्र राजू (मास्टर बिट्टू) को सुपर एक्सप्रेस (जो कि दिल्ली तथा मुम्बई के बीच चलने वाली है) से ही अकेले उसके ननिहाल भेज देती है एवं उसके उपरांत विनोद का घर भी छोड़कर चली जाती है। इसी गाड़ी से अशोक भी यात्रा कर रहा है एवं सीमा भी।

लेकिन कथानक का प्रमुख मोड़ तब आता है जब विनोद से खुन्नस खाया हुआ रणधीर न केवल गाड़ी के वैक्यूम ब्रेक निकाल देता है, बल्कि इंजन ड्राइवरों से नज़र बचाकर इंजन में एक टाइम बम भी रख देता है। गाड़ी में सीमा को यात्रा करती पाकर अशोक उससे दूर रहने के लिए मथुरा स्टेशन पर ही उतर जाता है जहाँ रणधीर पहले से ही उतर चुका है एवं अपनी कारगुज़ारी कर चुका है। लेकिन अपनी शेखी बघारने के चक्कर में रणधीर अशोक को बता देता है कि उसने क्या किया है। अब अशोक पहले एक कार से तथा उसके उपरांत एक मोटरसाइकिल से रेलगाड़ी का पीछा करता है एवं किसी तरह गार्ड के डिब्बे तक पहुँचता है। वह गार्ड उस्मान (दिनेश ठाकुर) को वस्तुस्थिति बताता है परंतु इससे पहले कि वे इंजन के ड्राइवरों से आपातकालीन ब्रेक लगवाकर गाड़ी को रुकवा पाएं, रणधीर द्वारा रखा गया बम फट जाता है। एक ड्राइवर वहीं मर जाता है जबकि दूसरा इंजन के बाहर जाकर गिरता है।

यह समाचार विनोद को मिलता है तो वह गाड़ी को रोकने की तथा यात्रियों को बचाने की जुगत में लग जाता है। अशोक और उस्मान किसी तरह यात्रियों के डिब्बों में पहुँचते हैं जहाँ उन्हें एक अच्छे मन वाले चोर रवि (जीतेंद्र) का साथ भी मिलता है जो कि मूल रूप से एक अनचाहे विवाह से बचने हेतु घर से भागी हुई मधु (नीतू सिंह) के ज़ेवर चुराने हेतु रेलगाड़ी में चढ़ा था। पर दुर्भाग्य से गाड़ी के रसोईघर में गैस फैलने से आग लग जाती है और पहले से ही गम्भीर समस्या और भी गम्भीर हो जाती है। इधर रणधीर अब भी चुपचाप नहीं बैठा है। वह विनोद की गाड़ी रोकने हेतु की गई युक्ति के ऊपर अपनी चाल चलता है। जलती हुई बेलगाम रेलगाड़ी सौ मील प्रति घंटे की रफ़्तार से भागी जा रही है। बाहर से विनोद और अंदर से रवि तथा अशोक यात्रियों को बचाने हेतु अपने-अपने प्रयास करते हैं। मुम्बई पहुँचा हुआ राकेश वहाँ अपनी ओर से यात्रियों की प्राण-रक्षा हेतु एक भिन्न प्रयास करता है। अंत में किस प्रकार से सभी नायक मिलकर रणधीर के रेल को यात्रियों सहित नष्ट करने के मंसूबों पर पानी फेरते हैं एवं (कुछ को छोड़कर) सभी यात्रियों को बचाते हैं, यह फ़िल्म के क्लाईमेक्स में देखने को मिलता है।

‘द बर्निंग ट्रेन’ मानवीय साहस की एक अद्भुत गाथा है। प्रारंभिक भाग को छोड़कर (जिसमें नायक-नायिकाओं का रोमांस तथा कथानक का आधार बनाना सम्मिलित है) फ़िल्म रणधीर द्वारा लगाए गए बम के फटने के उपरांत रेलगाड़ी के बेकाबू होने एवं उसमें आग लग जाने पर ही केंद्रित है। यह सम्पूर्ण भाग लोमहर्षक है तथा दर्शकों को सांस रोके फ़िल्म को देखते चले जाने पर विवश कर देता है। नायकों के रेलगाड़ी की छत पर चढ़ने, गार्ड के डिब्बे से यात्रियों के डिब्बे में जाने, आग में फंसे लोगों को बचाने, आग में से (फ़ायर-प्रूफ़ पोशाक पहनकर) गुज़रने तथा अंत में विनोद द्वारा एक दूसरे इंजन से जलती हुई गाड़ी में पहुँचकर पहले रणधीर से अंतिम संघर्ष करने एवं उसके उपरांत इंजन तथा गाड़ी के मध्य के कपलिंग को उड़ाकर यात्रियों को बचाने के सभी दृश्य कला-निर्देशक, छायाकार, एक्शन निर्देशक, कलाकारों एवं सबसे बढ़कर मुख्य निर्देशक के सामूहिक प्रयासों के फलस्वरूप देखने लायक बन पड़े हैं। फ़िल्म यह बताती है कि बड़ी-से-बड़ी मुसीबत में भी इंसान का साहस उसके काम आता है एवं साहसी तथा कर्मठ मनुष्य लगभग असंभव लगने वाले कार्यों को भी करके दिखा सकते हैं। जिस तरह से फ़िल्म के चारों नायक – विनोद, अशोक, रवि एवं राकेश – नामुमकिन से लगने वाले कारनामों को सरंजाम देते हैं तथा लगभग पाँच सौ मुसाफ़िरों की जान बचाते हैं, वह देखने वालों को रोमांच ही नहीं, प्रेरणा से भी भर देता है। फ़िल्म में छात्र बालकों को लेकर यात्रा कर रही अध्यापिका (सिमी) का पात्र भी प्रेरणादायक है तथा एक महिला कव्वाल (आशा सचदेव) का भी। विभिन्न यात्रियों का उपचार करने वाले चिकित्सक (नवीन निश्चल) का पात्र भी प्रेरणादायक है तो गार्ड का भी।

फ़िल्म पति-पत्नी के संबंध पर भी प्रकाश डालती है। जहाँ फ़िल्म यह बताती है कि पति को पत्नी एवं संतान के प्रति अपने कर्तव्य को उपेक्षित नहीं करना चाहिए, वहीं यह भी बताती है कि पत्नी को संकट के समय अपने पति को भावनात्मक संबल देना चाहिए एवं उसकी शक्ति बनना चाहिए। घर छोड़कर जा चुकी शीतल जब यह समझ जाती है तो वह परिस्थिति से जूझ रहे विनोद को भावनात्मक सहारा देने उसके पास पहुँचती है। सीमा का पात्र भी फ़िल्म के अंतिम भाग में दर्शकों की सहानुभूति प्राप्त कर लेता है जब वह अशोक को अपने दूर चले जाने का कारण बताती है।

फ़िल्म में रवि एवं मधु के पात्र केवल फ़िल्म की स्टार वैल्यू बढ़ाने हेतु डाले गए लगते हैं क्योंकि मूल कथानक से उनका संबंध नहीं है। लेकिन वे भी तथा राकेश व विभिन्न सहायक पात्रों के चरित्र भी प्रभावी हैं। फ़िल्म में कलाकारों की भरमार है तथा हास्य उत्पन्न करने हेतु डाले गए कुछ पात्रों को छोड़कर लगभग प्रत्येक कलाकार अपनी पहचान बनाए रखता है। जहाँ तक प्रमुख पात्रों का प्रश्न है, सभी कलाकारों ने अपनी भूमिकाओं को जीवंत कर दिया है।     

राहुल देव बर्मन ने कुल मिलाकर तो फ़िल्म में कोई यादगार संगीत नहीं दिया है किंतु एक कव्वाली तथा छात्र बालकों एवं उनकी अध्यापिका द्वारा गाई गई वंदना अच्छी बन पड़ी हैं। पार्श्व संगीत निस्संदेह अच्छा है तथा फ़िल्म के रोमांचक वातावरण के रोमांच को बढ़ाने वाला है। कमलेश्वर ने पटकथा के साथ-साथ फ़िल्म के संवाद भी लिखे हैं जो प्रभावी हैं।

बड़ी लागत से अत्यंत परिश्रमपूर्वक बनाई गई ‘द बर्निंग ट्रेन’ व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही थी। संभवतः भारतीय दर्शकों हेतु यह समय से आगे की फ़िल्म थी। परंतु यह एक आद्योपांत रोचक फ़िल्म है जिसे जब भी देखा जाए मनोरंजन के साथ-साथ प्रेरणा भी मिलती है।

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