निर्माता-निर्देशक बलदेवराज चोपड़ा की संस्था बी.आर. फ़िल्म्स एक अत्यंत प्रतिष्ठित फ़िल्म-निर्माण संस्था रही है जिसने एक-से-एक बढ़कर उत्तम फ़िल्में हिंदी सिने-दर्शकों के लिए प्रस्तुत कीं। युवा होने पर उनके पुत्र रवि चोपड़ा ने भी निर्देशन आरम्भ किया। उन्होंने एक हॉलीवुड फ़िल्म ‘द टॉवरिंग इनफ़र्नो’ देखी जिसमें एक इमारत में आग लगने की घटना का वर्णन था। उस फ़िल्म से प्रेरित होकर उन्होंने एक कुछ भिन्न फ़िल्म की परिकल्पना की जिसमें एक चलती हुई रेलगाड़ी में आग लगने की घटना का कथानक प्रस्तुत किया जाने वाला था। यह हिंदी फ़िल्म अथक परिश्रम के उपरांत बनकर तैयार हो पाई एवं १९८० में प्रदर्शित हुई। इसका नाम है – ‘द बर्निंग ट्रेन’।
‘द बर्निंग ट्रेन’ (जलती हुई
रेलगाड़ी) में अपने समय के अत्यन्त लोकप्रिय सितारों को सम्मिलित किया गया यथा –
धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, विनोद खन्ना, परवीन बॉबी, जीतेंद्र, नीतू सिंह, विनोद मेहरा, डैनी आदि। सभी
सितारों की भूमिकाओं के साथ न्याय करने वाली तथा रेलगाड़ी के जलने की घटना को
केंद्र में रखने वाली कहानी लिखना भी कोई सरल कार्य नहीं था किंतु कमलेश्वर ने यह
सफलतापूर्वक किया। उनकी कथा तथा रवि चोपड़ा के निर्देशन के साथ-साथ कला-निर्देशक शांतिदास, एक्शन निर्देशक मंसूर, सम्पादक प्राण मेहरा एवं छायाकार धरम चोपड़ा ने भी सराहनीय कार्य किया और कलाकारों
के सजीव अभिनय से युक्त यह अविस्मरणीय फ़िल्म रजतपट पर आई।
फ़िल्म तीन बालकों से आरम्भ होती है जिनमें से दो
बचपन से ही प्रतिद्वंद्विता रखते हैं जबकि दो ऐसे हैं जिनकी मित्रता अत्यन्त
प्रगाढ़ है। प्रतिद्वंद्वी बालक रेल का इंजन बनाने का सपना पालते हैं एवं बड़े होकर
भारतीय रेलवे में नौकरी करते हैं। भारतीय रेलवे एक अत्यन्त तीव्र चलने वाली
रेलगाड़ी सुपर एक्सप्रेस की योजना केंद्रीय सरकार को भेजता है जिसके साथ विभिन्न
अभियंताओं द्वारा बनाए गए इंजन के मॉडल भी होते हैं। जब सरकार इस परियोजना को
स्वीकृति दे देती है तो विभिन्न मॉडलों में से तीन मॉडल अंतिम निर्णय हेतु चुने
जाते हैं जो कि बचपन से ही प्रतिद्वंद्विता रखने वाले विनोद (विनोद खन्ना) एवं
रणधीर (डैनी) के अतिरिक्त उनके साथी अभियंता राकेश (विनोद मेहरा) के होते हैं।
संबंधित निर्णयन समिति विनोद द्वारा बनाए गए मॉडल को इंजन बनाने हेतु चुनती है और
यह बात रणधीर को चुभ जाती है जो पहले से ही विनोद से ख़ार खाए बैठा था क्योंकि जिस
युवती शीतल (परवीन बॉबी) से वह विवाह करने की इच्छा रखता था, उसने विनोद से विवाह कर लिया था।
विनोद एक श्रेष्ठ एवं तीव्र गति वाला इंजन बनाने
की धुन अपने मन में लेकर काम में जुट जाता है एवं उसकी इस धुन के चलते उसकी पत्नी
शीतल स्वयं को उपेक्षित अनुभव करने लगती है। विनोद का बचपन का अभिन्न मित्र अशोक
(धर्मेंद्र) तीव्र गति से कार चलाने का शौकीन है तथा सीमा (हेमा मालिनी) से प्रेम
करता है किंतु भाग्य उस पर ऐसा वज्रपात करता है कि वह अपने पिता, सम्पूर्ण धन-सम्पत्ति तथा सीमा के प्रेम को भी खो बैठता
है। इस तरह बचपन के तीनों साथियों – विनोद, अशोक तथा रणधीर के जीवन अलग-अलग मोड़ ले लेते हैं।
वर्षों बीत जाते हैं। छह साल के अथक परिश्रम के
उपरांत विनोद एक तीव्र गति वाली एवं भरपूर आरामदायक (लक्ज़री) गाड़ी अर्थात् सुपर
एक्सप्रेस को बनाने में सफल हो जाता है। परंतु उसे धक्का तब लगता है जब गाड़ी की
प्रथम यात्रा से ठीक एक दिन पूर्व उसकी पत्नी शीतल उसे छोड़ देने का निर्णय लेती है
एवं अपने तथा विनोद के पुत्र राजू (मास्टर बिट्टू) को सुपर एक्सप्रेस (जो कि
दिल्ली तथा मुम्बई के बीच चलने वाली है) से ही अकेले उसके ननिहाल भेज देती है एवं
उसके उपरांत विनोद का घर भी छोड़कर चली जाती है। इसी गाड़ी से अशोक भी यात्रा कर रहा
है एवं सीमा भी।
लेकिन कथानक का प्रमुख मोड़ तब आता है जब विनोद
से खुन्नस खाया हुआ रणधीर न केवल गाड़ी के वैक्यूम ब्रेक निकाल देता है, बल्कि इंजन ड्राइवरों से नज़र बचाकर इंजन में एक टाइम बम भी
रख देता है। गाड़ी में सीमा को यात्रा करती पाकर अशोक उससे दूर रहने के लिए मथुरा
स्टेशन पर ही उतर जाता है जहाँ रणधीर पहले से ही उतर चुका है एवं अपनी कारगुज़ारी
कर चुका है। लेकिन अपनी शेखी बघारने के चक्कर में रणधीर अशोक को बता देता है कि
उसने क्या किया है। अब अशोक पहले एक कार से तथा उसके उपरांत एक मोटरसाइकिल से
रेलगाड़ी का पीछा करता है एवं किसी तरह गार्ड के डिब्बे तक पहुँचता है। वह गार्ड उस्मान (दिनेश ठाकुर) को वस्तुस्थिति
बताता है परंतु इससे पहले कि वे इंजन के ड्राइवरों से आपातकालीन ब्रेक लगवाकर गाड़ी
को रुकवा पाएं, रणधीर द्वारा रखा गया बम
फट जाता है। एक ड्राइवर वहीं मर जाता है जबकि दूसरा इंजन के बाहर जाकर गिरता है।
यह समाचार विनोद को मिलता है तो वह गाड़ी को रोकने की तथा यात्रियों को बचाने
की जुगत में लग जाता है। अशोक और उस्मान किसी तरह यात्रियों के डिब्बों में पहुँचते
हैं जहाँ उन्हें एक अच्छे मन वाले चोर रवि (जीतेंद्र) का साथ भी मिलता है जो कि
मूल रूप से एक अनचाहे विवाह से बचने हेतु घर से भागी हुई मधु (नीतू सिंह) के ज़ेवर
चुराने हेतु रेलगाड़ी में चढ़ा था। पर दुर्भाग्य से गाड़ी के रसोईघर में गैस फैलने
से आग लग जाती है और पहले से ही गम्भीर समस्या और भी गम्भीर हो जाती है। इधर रणधीर
अब भी चुपचाप नहीं बैठा है। वह विनोद की गाड़ी रोकने हेतु की गई युक्ति के ऊपर अपनी
चाल चलता है। जलती हुई बेलगाम रेलगाड़ी सौ मील प्रति घंटे की रफ़्तार से भागी जा रही
है। बाहर से विनोद और अंदर से रवि तथा अशोक यात्रियों को बचाने हेतु अपने-अपने
प्रयास करते हैं। मुम्बई पहुँचा हुआ राकेश वहाँ अपनी ओर से यात्रियों की
प्राण-रक्षा हेतु एक भिन्न प्रयास करता है। अंत में किस प्रकार से सभी नायक मिलकर
रणधीर के रेल को यात्रियों सहित नष्ट करने के मंसूबों पर पानी फेरते हैं एवं (कुछ
को छोड़कर) सभी यात्रियों को बचाते हैं, यह फ़िल्म के
क्लाईमेक्स में देखने को मिलता है।
‘द बर्निंग ट्रेन’ मानवीय साहस
की एक अद्भुत गाथा है। प्रारंभिक भाग को छोड़कर (जिसमें नायक-नायिकाओं का रोमांस
तथा कथानक का आधार बनाना सम्मिलित है) फ़िल्म रणधीर द्वारा लगाए गए बम के फटने के
उपरांत रेलगाड़ी के बेकाबू होने एवं उसमें आग लग जाने पर ही केंद्रित है। यह
सम्पूर्ण भाग लोमहर्षक है तथा दर्शकों को सांस रोके फ़िल्म को देखते चले जाने पर
विवश कर देता है। नायकों के रेलगाड़ी की छत पर चढ़ने, गार्ड के डिब्बे से यात्रियों के डिब्बे में जाने, आग में फंसे लोगों को बचाने, आग में से (फ़ायर-प्रूफ़ पोशाक पहनकर) गुज़रने तथा अंत में विनोद द्वारा एक
दूसरे इंजन से जलती हुई गाड़ी में पहुँचकर पहले
रणधीर से अंतिम संघर्ष करने एवं उसके उपरांत इंजन तथा गाड़ी के मध्य के
कपलिंग को उड़ाकर यात्रियों को बचाने के सभी दृश्य कला-निर्देशक, छायाकार, एक्शन
निर्देशक, कलाकारों एवं सबसे बढ़कर
मुख्य निर्देशक के सामूहिक प्रयासों के फलस्वरूप देखने लायक बन पड़े हैं। फ़िल्म यह
बताती है कि बड़ी-से-बड़ी मुसीबत में भी इंसान
का साहस उसके काम आता है एवं साहसी तथा कर्मठ मनुष्य लगभग असंभव लगने वाले कार्यों
को भी करके दिखा सकते हैं। जिस तरह से फ़िल्म के चारों नायक – विनोद, अशोक, रवि एवं राकेश
– नामुमकिन से लगने वाले कारनामों को सरंजाम देते हैं तथा लगभग पाँच सौ मुसाफ़िरों की जान बचाते हैं, वह देखने वालों को रोमांच ही नहीं, प्रेरणा से भी भर देता है। फ़िल्म में छात्र बालकों को लेकर
यात्रा कर रही अध्यापिका (सिमी) का पात्र भी प्रेरणादायक है तथा एक महिला कव्वाल
(आशा सचदेव) का भी। विभिन्न यात्रियों का उपचार करने वाले चिकित्सक (नवीन निश्चल)
का पात्र भी प्रेरणादायक है तो गार्ड का भी।
फ़िल्म पति-पत्नी के संबंध पर भी प्रकाश डालती है। जहाँ फ़िल्म यह बताती है कि
पति को पत्नी एवं संतान के प्रति अपने कर्तव्य को उपेक्षित नहीं करना चाहिए, वहीं यह भी बताती है कि पत्नी को संकट के समय अपने पति को
भावनात्मक संबल देना चाहिए एवं उसकी शक्ति बनना चाहिए। घर छोड़कर जा चुकी शीतल जब
यह समझ जाती है तो वह परिस्थिति से जूझ रहे विनोद को भावनात्मक सहारा देने उसके
पास पहुँचती है। सीमा का पात्र भी फ़िल्म के अंतिम भाग में दर्शकों की सहानुभूति
प्राप्त कर लेता है जब वह अशोक को अपने दूर चले जाने का कारण बताती है।
फ़िल्म में रवि एवं मधु के पात्र केवल फ़िल्म की स्टार वैल्यू बढ़ाने हेतु डाले
गए लगते हैं क्योंकि मूल कथानक से उनका संबंध नहीं है। लेकिन वे भी तथा राकेश व
विभिन्न सहायक पात्रों के चरित्र भी प्रभावी हैं। फ़िल्म में कलाकारों की भरमार है
तथा हास्य उत्पन्न करने हेतु डाले गए कुछ पात्रों को छोड़कर लगभग प्रत्येक कलाकार
अपनी पहचान बनाए रखता है। जहाँ तक प्रमुख पात्रों का प्रश्न है, सभी कलाकारों ने अपनी भूमिकाओं को जीवंत कर दिया है।
राहुल देव बर्मन ने कुल मिलाकर तो फ़िल्म में कोई यादगार संगीत नहीं दिया है
किंतु एक कव्वाली तथा छात्र बालकों एवं उनकी अध्यापिका द्वारा गाई गई वंदना अच्छी
बन पड़ी हैं। पार्श्व संगीत निस्संदेह अच्छा है तथा फ़िल्म के रोमांचक वातावरण के
रोमांच को बढ़ाने वाला है। कमलेश्वर ने पटकथा के साथ-साथ फ़िल्म के संवाद भी लिखे
हैं जो प्रभावी हैं।
बड़ी लागत से अत्यंत परिश्रमपूर्वक बनाई गई ‘द बर्निंग ट्रेन’ व्यावसायिक रूप
से सफल नहीं रही थी। संभवतः भारतीय दर्शकों हेतु यह समय से आगे की फ़िल्म थी। परंतु
यह एक आद्योपांत रोचक फ़िल्म है जिसे जब भी देखा जाए मनोरंजन के साथ-साथ प्रेरणा भी
मिलती है।
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नमस्कार जितेंद्र ज़ी! बहुत दिनों बाद ब्लॉग जगत पर आना हुआ तो पिछली रचनाओं तक पहुँच कर आपके ब्लॉग तक आ पहुंची! हालांकि ब्लॉग पर कितनी बार आई पर कुछ लिख ना पाई! जीवन में बदलते घटनाक्रम में उलझ कर ब्लॉग तक चाहकर भी लिख ना पाई! आपकी इस अभिनव फ़िल्म समीक्षा ने बचपन की उस घटना की याद दिलाई जब किशोरवय में ' The Burning Train 'को दूरदर्शन पर देखकर कई दिन नींद ना आ सकी! मन कितने प्रश्नों से उलझा! खुद से सवाल और जवाब करता रहा कि कैसे बनाई होंगी ये इतनी जटिल कथा वाली फ़िल्म! आखिर एक जलती हुई तीव्र गति से भागती ट्रैन पर कैसे कैमरे लगाए होंगे और इतने दुस्साहसी कलाकार कैसे इतना सजीव पात्र निभा पाए होंगे! फिर भी इतनी रोमांचक और दिल दहला देने वाले घटनाक्रम के पीछे मानवीय षड्यंत्र और उसके समानान्तर दुस्साहस की ये अमर कथा एकमात्र उदाहरण बनकर रह गई! जिसके पहले और ना बाद में कोई फ़िल्मकार एक और जलती ट्रैन बनाने का साहस कर पायेगा! हार्दिक आभार इस सुंदर फ़िल्म समीक्षा और फ़िल्म की भूली कहानी याद दिलाने के लिए! कव्वाली भी कालजयी है!l
जवाब देंहटाएंआपको देखकर मुझे कितनी प्रसन्नता हो रही है रेणु जी, मैं बयान नहीं कर पा रहा। बहुत-बहुत आभार आपका आगमन एवं विस्तृत टिप्पणी के लिए।
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