गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

फ़िल्म जो भारतीय लोकरुचि का अंग बन गई

भारतीय महाकाव्य 'रामायण' में ऋषि विश्वामित्र अयोध्या के राजा दशरथ के पास जाकर उनके दो पुत्रों राम एवं लक्ष्मण को उन्हें देने के लिये कहते हैं ताकि वे वनों में आतंक मचा रहे दुष्ट असुरों का नाश करके वहाँ रहने वाले ऋषि-मुनियों को भयमुक्त करें एवं शांति व धर्म की पुनर्स्थापना करें। राजा दशरथ अपने इन पुत्रों को बालक ही समझते हुए उन्हें इस प्रयोजन हेतु देने में संकोच करते हैं किंतु विश्वामित्र उन्हें लेने के लिए अटल रहते हैं। अंततः राम एवं लक्ष्मण विश्वामित्र के मार्गदर्शन से असुरों का संहार करके वनों में शांति की स्थापना करने में सफल रहते हैं। 

कुछ-कुछ ऐसी ही एक कथा हिंदी सिनेमा के पटल पर कही गई जो कि इतनी लोकप्रिय हुई कि वह एक फ़िल्म मात्र न बनी रहकर भारतीय लोकरुचि का अंग बन गई। यह फ़िल्म है 'शोले' जिसकी कथा ही नहीं, पात्र, घटनाएं एवं संवाद भी भारतीय जनमानस में स्थापित हो गए। १९७५ में देश में आपातकाल लागू किये जाने के तक़रीबन छह सप्ताह बाद पंद्रह अगस्त अर्थात् भारत के स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रदर्शित हुई तथा प्रारंभ में यह न तो टिकट खिड़की पर भीड़ को खींच सकी एवं न ही समीक्षकों को प्रभावित कर सकी। लेकिन एक बार जो इसने लोकप्रियता की राह पकड़ी तो ऐसी रफ़्तार से पकड़ी कि यह भारतीय फ़िल्मों के इतिहास की सफलतम फ़िल्म बन गई। उन दिनों मैं बाल्यावस्था में था और मुझे याद है कि मेरे जिन साथियों ने यह फ़िल्म देखी थी, वे बारंबार इसके संवाद दोहराते रहते थे और इसके गीत गुनगुनाते रहते थे। लोकप्रिय हिंदी पत्रिका 'सरिता' ने अपने फ़िल्म समीक्षा के स्तम्भ 'चंचल छाया' में इस फ़िल्म को केवल एक स्टार दिया था लेकिन यह फ़िल्म तो अपने आप में ही एक ऐसी सितारा बन गई कि इसे समीक्षकों के सितारों की आवश्यकता ही नहीं रही।

शोले एक पूर्व पुलिस अधिकारी ठाकुर बलदेव सिंह (संजीव कुमार) द्वारा दो साधारण अपराधियों - जय (अमिताभ बच्चन) एवं वीरू (धर्मेन्द्र) की सहायता से एक दुर्दान्त डाकू गब्बर सिंह (अमजद ख़ान) से अपने परिवार की हत्या का प्रतिशोध लेने की कथा कहने वाली फ़िल्म है। रामगढ़ नामक एक काल्पनिक गाँव में दर्शाई गई यह कहानी न तो कोई मौलिक रचना ही है और न ही शोले इस कथा को कहने वाली पहली हिन्दी फ़िल्म। 'शोले' नाम से एक फ़िल्म पहले भी बनी थी जो १९५३ में प्रदर्शित हुई थी। कहते हैं कि फ़िल्म के लेखकों - सलीम-जावेद ने इसका नामकरण 'अंगारे' किया था लेकिन निर्माता-निर्देशक रमेश सिप्पी को 'शोले' नाम ही पसंद था। अतः फ़िल्म का नाम शोले ही रखा गया लेकिन इसकी अंग्रेज़ी वर्तनी को SHOLE के स्थान पर SHOLAY कर दिया गया। सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध एवं अस्सी के दशक के पूर्वार्द्ध में ही नहीं, आज तक भी इस फ़िल्म की लोकप्रियता का आलम यह है कि इसके अधिकांश प्रशंसकों को इसके नाम का अर्थ ही नहीं पता (कोई जानना भी नहीं चाहता)। शोले शब्द का अर्थ होता है आग की लपटें। फ़िल्म का जो स्वरूप उपलब्ध है, उसमें कहीं पर भी किसी भी पात्र के किसी भी संवाद में यह शब्द नहीं आता है। लेकिन चूंकि कथा का आधार ठाकुर बलदेव सिंह के मन में डाकू गब्बर सिंह के प्रति जल रही बदले की आग है, इसलिए यह शीर्षक उपयुक्त ही है। 

यह कथानक वस्तुतः जापानी फ़िल्मकार अकीरा कुरोसावा द्वारा निर्मित फ़िल्म 'सेवन समुराई' (१९५४) से प्रेरित है तथा शोले से पहले भी एवं शोले के बाद भी इस कथानक पर हिन्दी फ़िल्में बनीं, यथा 'मेरा गाँव मेरा देश' (१९७१), खोटे सिक्के (१९७४), कर्मा (१९८६), आर्मी (१९९६), चाइना गेट (१९९८), क़ीमत (१९९८) आदि। कथानक की दृष्टि से शोले वस्तुतः 'मेरा गाँव मेरा देश' फ़िल्म के सर्वाधिक निकट है जिसके नायक भी शोले के 'वीरू' धर्मेन्द्र ही हैं तथा जिसमें दर्शाए गए डाकू का नाम जब्बर सिंह है। शोले के लेखकों सलीम-जावेद ने 'सेवन समुराई' के साथ-साथ हॉलीवुड फ़िल्म 'मैग्निफिशेंट सेवन' से तो इसके लिए प्रेरणा ली ही, कई और विदेशी फ़िल्मों से भी इसके विभिन्न दृश्यों हेतु सामग्री ली। लेकिन अंत में जो फ़िल्म शोले के रूप में बनकर आई, वह किसी और फ़िल्म का प्रतिरूप नहीं रही। उसकी अपनी एक अलग ही पहचान बनी। आज शोले अगर एक असाधारण फ़िल्म के रूप में हिंदी फ़िल्मों के इतिहास में प्रतिष्ठित है तो किसी अन्य फ़िल्म से प्रेरित होकर बनाई गई फ़िल्म के रूप में नहीं। इसका भारतीय फ़िल्मों के इतिहास में अपना एक ख़ास ही मुकाम है। कथानक मौलिक न होते हुए भी अपनी समग्रता में शोले मौलिक है जिसकी नक़ल करने का प्रयास ही किया जा सकता है, नक़ल बनाई नहीं जा सकती। जिस तरह 'मोना लिसा' का चित्र अपने आप में अनोखा है, उसी तरह शोले भी अपने आप में अनोखी है।

सलीम-जावेद ने फ़िल्म की मूल कथा में कई उपकथाएं जोड़ीं तथा फ़िल्म के विभिन्न पक्षों पर अपने ढंग से काम किया। इसलिए इस फ़िल्म को केवल एक बदले की कहानी के रूप में नहीं जाना जाता बल्कि सम्पूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली एक ऐसी फ़िल्म के रूप में जाना जाता है जिसका हर किरदार अपनी अलग पहचान रखता है तथा हर संवाद यादगार है। शोले के संवाद इसके गीतों से अधिक लोकप्रिय हैं, विशेषतः गब्बर सिंह के संवाद। वास्तव में इसके संवाद ही इसका सबसे बड़ा गुण एवं सबसे बड़ी शक्ति हैं। 'जो डर गया, समझो मर गया' संवाद तो आज एक कहावत बन चुका है। गब्बर सिंह के अन्य संवाद भी फ़िल्म के अनेक दृश्यों के साथ भारतीय लोकरुचि में समाहित हो चुके हैं। शोले में काम करके धर्मेन्द्र जीवन भर के लिए 'वीरू' बन गए तो हेमा मालिनी जीवन भर के लिए 'बसंती' और अमजद ख़ान जीवन भर के लिए 'गब्बर'। मुम्बई के मिनर्वा सिनेमाघर में सभी शो में लगातार पाँच वर्षों तक चलने वाली शोले की लोकप्रियता ने फ़िल्म की सहायक भूमिकाओं यथा 'अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर' (असरानी) तथा 'सूरमा भोपाली' (जगदीप) ही नहीं, इसकी छोटी-छोटी भूमिकाओं यथा सांभा (मैक मोहन), कालिया (विजू खोटे), इमाम साहब (ए.के. हंगल), अहमद (सचिन), बसंती की मौसी (लीला मिश्रा) आदि को भी अमरत्व प्रदान कर दिया। फ़िल्म में बसंती का तांगा खींचने वाली घोड़ी 'धन्नो' तक का नाम अमर हो चुका है। यदि किसी चरित्र को अपेक्षाकृत कम याद किया जाता है तो वह है 'राधा' (जया भादुड़ी) का चरित्र। लेकिन फ़िल्म को देखने पर राधा का चरित्र दर्शक के मन पर अमिट छाप छोड़ता है। फ़िल्म की आधारभूत कहानी चाहे एक वाक्य में बताई जा सकती हो, वस्तुतः यह पात्रों एवं घटनाओं से भरपूर एक लंबी फ़िल्म है। 

शोले में गब्बर का चरित्र और उसकी संवाद-अदायगी ही नहीं, कई अन्य चरित्र एवं उनके दृश्य भी अति-नाटकीय हैं। और इस फ़िल्म की मनोरंजन प्रदान करने की क्षमता वस्तुतः इसके अति-नाटकीय होने के कारण ही है। किसी कॉमिक पुस्तक सरीखी है यह फ़िल्म। यदि इस फ़िल्म की पटकथा को नाटकीयता के स्थान पर स्वाभाविकता के साथ प्रस्तुत किया जाता तो न तो यह फ़िल्म इतनी मनोरंजक बनती और न ही इतनी लोकप्रिय होती। इसकी असाधारण लोकप्रियता के पीछे इसके नाटकीय स्वरूप का बहुत बड़ा हाथ है। गब्बर के लिए विशेष रूप से लिखे गए संवादों तथा अमजद ख़ान द्वारा उन्हें विशिष्ट अंदाज़ से अदा किये जाने का फ़िल्म को यादगार बनाने में बहुत बड़ा हाथ है। इसे अमजद ख़ान की पहली फ़िल्म के रूप में बताया गया है लेकिन उनकी पहली फ़िल्म वस्तुतः 'हिन्दुस्तान की कसम' (१९७३) थी। शोले में हास्य की भरपूर ख़ुराक है। दर्शकों को गुदगुदा देने वाले अनेक दृश्य हैं। यह एक भव्य फ़िल्म है जिसकी तकनीकी गुणवत्ता बहुत ऊंची है। फ़िल्म की पटकथा में कमियां हैं लेकिन कुल मिलाकर यह फ़िल्म इतनी मनोरंजक है कि न तो इसकी कमियों पर ध्यान जाता है और न ही इसकी लंबाई पर। मूल लम्बाई (तीन घंटे चौबीस मिनट) में भारतीय सेंसर बोर्ड के हस्तक्षेप के कारण काट-छांट हो जाने के बावजूद यह फ़िल्म बहुत लंबी है लेकिन इसे देखना एक ऐसा अनुभव है कि लंबाई की शिकायत कोई भी देखने वाला नहीं कर सकता। 

जैसा कि मैंने पहले भी कहा, शोले कोई यथार्थपरक या स्वाभाविक फ़िल्म नहीं है। यह एक फ़ैंटेसी है। एक ऐसी फ़ैंटेसी जिसकी ख़ासियत यह है कि वह फ़ैंटेसी लगती नहीं है। अपने आप में कई  किस्सों को समेटे हुए एक दिलचस्प किस्सा है यह फ़िल्म। प्रारंभ से अंत तक दर्शकों को मंत्रमुग्ध किए रखने वाली इस फ़िल्म की तुलना एक ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन से की जा सकती है जिसमें सभी सामग्रियां एवं सभी मसाले सही अनुपात में मिल गए हों जिसके कारण उसका स्वाद ऐसा हो गया हो जो खाने वाले को बार-बार अपनी ओर खींचे। फ़िल्म के केवल दो गीत याद रखने लायक़ हैं - होली गीत तथा जय एवं वीरू की दोस्ती का गीत। सभी कलाकारों ने यादगार अभिनय किया है चाहे वे प्रमुख चरित्र हों या सहायक चरित्र। 

शोले एक ऐसी फ़िल्म है जिसकी कमियां भी ख़ूबियां बन गईं। अच्छी कृतियां परिश्रम से बनती हैं लेकिन अमर कृतियां या मास्टरपीस संयोग से बनते हैं। शोले भी एक मास्टरपीस है जो संयोग से ही बन गया। लियोनार्दो द विंसी दूसरी मोना लिसा नहीं बना सके थे, रमेश सिप्पी भी दूसरी शोले नहीं बना सके। इस फ़िल्म पर पुस्तकें लिखी गई हैं,स्पूफ़ व पैरोडियां बनाई गई हैं तथा बहुत कुछ कहा गया है पर जितना भी कहा जाए, कम ही लगता है। इसकी कमाई का कीर्तिमान चाहे 'हम आपके हैं कौन' और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे' जैसी फ़िल्मों ने तोड़ दिया हो, इसने सफलता एवं लोकप्रियता का एक इतना ऊंचा मानक स्थापित कर दिया है जिसके आसपास भी कोई अन्य फ़िल्म नहीं पहुँच सकती। कोई आश्चर्य नहीं कि अनेक लोगों ने इसे दर्ज़नों बार देखा है। इसे कई बार पुनः प्रदर्शित किया गया है एवं प्रत्येक बार पुनर्प्रदर्शन पर भी इसने वैसी ही सफलता प्राप्त की है जैसी प्रथम प्रदर्शन पर प्राप्त की थी। इसलिए इसे चाहे जितनी बार सिनेमाघरों में प्रदर्शित किया जा सकता है क्योंकि जैसा कि मैंने पहले भी कहा, शोले मात्र एक फ़िल्म नहीं रही है, एक लोककथा बन चुकी है और भारतीय लोकमानस में गहराई तक उतर चुकी है।

© Copyrights reserved

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें