शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

रश्मियों के रथ का सवार

लगभग बारह-तेरह वर्ष की आयु में जब मैं कक्षा नौ में पढ़ता था, मेरी हिंदी विषय की पाठ्यपुस्तक में चौदहवां अध्याय था - 'श्रीकृष्ण का दूतकार्य। अध्याय के परिचय में बताया गया था कि वह रामधारीसिंह दिनकर के प्रबंध काव्य 'रश्मिरथी' से लिया गया था । तब न मैं प्रबंध काव्य का अर्थ जानता था और न ही विद्यालय में कोई मुझे बताने वाला था (सम्भवतः हिंदी में 'प्रभाकर' की उपाधि प्राप्त करने वाली मेरी माता मुझे बता सकतीं लेकिन मुझे उनसे पूछना ही नहीं सूझा था) । आज मैं जानता हूँ कि प्रबंध काव्य एक ऐसा काव्य है जिसका कोई कथासूत्र अनिवार्य रूप से हो एवं इसी कारण से उसका संपूर्ण कलेवर प्रबंधित या व्यवस्थित रूप में हो, उसके समस्त छंद उस कथा की घटनाओं से यथोचित रूप से संबद्ध हों एवं परस्पर सुसंगत हों । यदि वह कई चरित्रों एवं घटनाओं को विस्तार देने वाला हो तो उसे महाकाव्य कहा जाएगा तथा यदि वह किसी एक चरित्र अथवा उसकी किसी एक (या एकाधिक) विशिष्टता को ही केंद्र में रखकर रचा गया हो तो उसे खण्ड-काव्य कहा जाएगा । इस दृष्टि से प्रबंध काव्य वस्तुतः कथा-काव्य होते हैं ।  बहरहाल बात 'रश्मिरथी' की हो रही थी ।

'रश्मिरथी' राष्ट्रकवि दिनकर जी की अत्यंत लोकप्रिय रचना है जो खंड-काव्य है क्योंकि यह केवल एक ही चरित्र तथा उसके सद्गुणों पर आधारित है । यह चरित्र है 'महाभारत' की कथा का एक प्रमुख पात्र - कर्ण । 'महाभारत' का अभिशप्त पात्र है कर्ण जो सूर्यपुत्र होकर भी आजीवन सूतपुत्र कहलाया तथा जिसका मूल्यांकन सदा उसके गुणों के आधार पर नहीं, उसकी जाति के आधार पर किया गया एवं जो जातिगत अपमान को मृत्युपर्यंत सहता रहा । दानवीर तथा सिद्धांतप्रिय कर्ण के आभामंडल को भलीभांति संसार के समक्ष रखने का कार्य दिनकर जी ने 'रश्मिरथी' के माध्यम से किया । अपने जन्म के क्षण से लेकर अपने अवसान के क्षण तक सतत अन्याय सहने वाला कर्ण अपने अंतिम समय में अश्वरथी नहीं था क्योंकि उसके रथ का चक्र भूमि में धंस गया था जिसे निकालने के लिए वह रथ से नीचे भूमि पर उतरा हुआ था जब अर्जुन ने उस निहत्थे का वध कर दिया किंतु अपनी देह से मुक्त आत्मा के साथ वह रश्मिरथी बन गया क्योंकि वह सूर्य-रश्मियों के रथ पर चढ़कर सुरलोक में गया ।   

मेरे व्यक्तित्व के साथ जो बात जुड़ी हुई है, वह यह है कि गायन-वादन-नृत्य तथा लय-सुर-ताल का कोई सम्यक् ज्ञान न होते हुए भी मैं उत्तम संगीत को सराहता हूँ तथा उसे समझने का प्रयास करते हुए उसका आनंद उठाता हूँ; स्वयं चित्रकार या शिल्पकार न होते हुए भी उत्तम चित्र या मूर्ति के गुणों को आत्मसात् करते हुए उसकी प्रशंसा करता हूँ; स्वयं कवि या शायर न होते हुए भी उत्कृष्ट कविता या शायरी के मर्म को अपने भीतर अनुभव करता हूँ एवं संबंधित कवि या शायर के समक्ष मन-ही-मन नतमस्तक होता हूँ । संभवतः इसीलिए मुझे लेखक या फ़िल्मकार न होने पर भी अन्य लोगों द्वारा रचित सामग्री को पढ़कर एवं फ़िल्में देखकर उनका अपने विवेक से मूल्यांकन करना रुचिकर लगता है । इस दृष्टिकोण से मैं (अमेच्युअर या ग़ैर-पेशेवर) समीक्षक हूँ लेकिन मैं इस तथ्य को सदैव स्मरण रखता हूँ कि समीक्षक का कार्य सरल है, रचयिता का कठिन एवं श्रमसाध्य ।   

'रश्मिरथी' की आलोचना तो भारत के सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वमान्य आलोचक नामवर सिंह भी नहीं कर पाए, ऐसे में मैं दिनकर जी की इस महान रचना की समीक्षा भला क्या करूं ? मैं तो इस रचना पर विमर्श के बहाने कर्ण के जीवन एवं धर्म की उसकी व्याख्या पर ही कुछ कहना चाहूंगा । मैंने 'रश्मिरथी' के आद्योपांत पारायण में उसके एक-एक छंद का आनंद उठाया एवं पाया कि दिनकर जी ने कर्ण के उस उदात्त चरित्र को प्रकट किया है जिसे संसार ने देखकर भी अनदेखा किया; उसकी उस घनीभूत पीड़ा को अपने छंदों में पिघलाया है जिसे संसार ने अनुभव करना तो दूर, स्वीकार करने के भी योग्य नहीं समझा । जन्मा तो माता ने पेटी में रखकर सरिता में बहा दिया, मरा तो अपने ही भाई के हाथों छलपूर्वक । जन्म से मरण तक अन्याय-पीड़ित ही रहा वह अभागा । और अति यह कि मृत्यु के उपरांत भी शताब्दियों तक उसे दुर्योधन के साथी के अतिरिक्त कुछ और न माना गया तथा उसके छल से किए गए संहार को भी न्यायोचित ठहरा दिया गया । सच है; जिस पर बीतती है, वही जानता है ।   

तीन दशक पूर्व (जब मैं कलकत्ता में रहकर अध्ययन कर रहा था) मैने अंग्रेज़ी के समाचार-पत्र 'द स्टेट्समैन' में एक लेख पढ़ा था - ‘Ardh-Rathi Karna Died, The Caste-System Still Survives। लेख में कर्ण को निमित्त बनाकर भारत में चिरकाल से प्रचलित अन्यायपूर्ण सामजिक व्यवस्था का विवेचन था जो किसी मनुष्य के किसी विशिष्ट जाति में जन्म लेने के आधार पर उसके साथ भेदभाव करती है । लेख ने एवं उससे भी कहीं अधिक उसके शीर्षक ने मेरे मन पर बहुत गहरा प्रभाव डाला । कालांतर में मैंने पाया कि कर्ण के जीवन पर कई औपन्यासिक पुस्तकें भी लिखी गई हैं जिनमें से शिवाजी सावंत द्वारा रचित 'मृत्युंजय' सर्वाधिक लोकप्रिय है किंतु मुझे मनु शर्मा द्वारा रचित 'कर्ण की आत्मकथा' को पढ़ने का अवसर शीघ्र ही तब मिला जब मैं जयश्री टी एंड इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड के लेखा-परीक्षण कार्य हेतु असम के कछार क्षेत्र में स्थित कलाइन चाय बाग़ान में श्री अरुण चतुर्वेदी के घर पर रहा जहाँ उनके घरेलू पुस्तकालय में मुझे वह पुस्तक उपलब्ध हुई जिसमें कर्ण की व्यथा को कर्ण के ही शब्दों में ढाला गया है । आज दशकों के अंतराल के उपरांत जब मैं 'रश्मिरथी' को पढ़ चुका हूँ तो मैं यह अनुभव करता हूँ कि दिनकर जी की इस अमर कृति ने अनेक रचनाकारों को कर्ण के जीवन पर अपनी लेखनी प्रयुक्त करने के लिए प्रेरित किया होगा ।  

 

किंतु स्वयं दिनकर जी को इस कृति को रचने की प्रेरणा कैसे मिली होगी ? वे महात्मा गांधी से बहुत अधिक प्रभावित थे (अपने ओजपूर्ण कवित्व के बावजूद जो कि गांधी जी की अहिंसा-वृत्ति के अनुकूल नहीं था) तथा गांधी जी के दलितोद्धार संबंधी कृत्यों के अवलोकन से उन्होंने भारत में जातीय आधार पर अनवरत होने रहने वाले भेदभाव एवं अन्याय को अनुभव किया होगा । अपनी अत्यंत लोकप्रिय कृति 'कुरुक्षेत्र' की रचना कर चुकने के उपरांत अब वे एक ऐसी कृति को रचना चाहते थे जो कि उदात्त मानवीय गुणों को आलोकित करे । तब तक गांधी जी की हत्या हो चुकी थी जिसने दिनकर जी को मर्माहत किया था । एक कविता के द्वारा उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित कर चुकने पर भी संभवतः वे एक ऐसा संपूर्ण काव्य रचना चाह रहे होंगे जो कि गांधी जी के आदर्शों के अनुरूप जातिगत एवं जन्माधारित सामाजिक भेदभाव पर प्रहार करे । इस द्विगुणित प्रेरणा ने ही संभवतः उनसे 'रश्मिरथी' की रचना करवाई जिसकी आधारभूत सामग्री उन्हें पुनः ('कुरुक्षेत्र' की भांति) 'महाभारत' ग्रंथ में ही मिली ।  

कर्ण को अर्द्ध-रथी क्यों कहा गया (भीष्म ने कहा था) जबकि अन्य योद्धा 'महारथी' कहलाते थे ? निश्चय ही उस पर सूत-पुत्र होने का ठप्पा लगा होने के कारण । यह अपमान था उसके पौरूष एवं बाहुबल का, उसकी योग्यता एवं प्रतिभा का, उसकी कर्मठता एवं स्वाभिमान का । यह इस बात का प्रतीक था कि युग चाहे कोई भी हो, हमारे देश एवं समाज में व्यक्ति की जाति उसकी योग्यता एवं गुणों से अधिक महत्व रखती आई है । उच्च कुल में जन्मने वाले को सभी विशेषाधिकार स्वयं ही लब्ध होते रहे हैं जबकि निम्न वर्ग में जन्मने वाले को उसका न्यायोचित अधिकार देना तो दूर, उसके गुणों की भी अवज्ञा ही की जाती रही है । अपनी योग्यता के आधार पर समान व्यवहार का अधिकार माँगना ही उसका वह अपराध माना जाता रहा है जिसके लिए उसे व्यवस्था द्वारा दंडित किया जाए तथा ऐसे अन्यायपूर्ण दंड को भी न्याय माना जाए । व्यक्तियों से तो लड़ा जा सकता है लेकिन अन्याय जब व्यवस्था में अंतर्निहित हो तो व्यवस्था से कौन लडे़ और लड़ भी ले तो कैसे जीते ? ऐसी व्यवस्थाओं को तो स्वयं भगवान कहलाने वाले भी अक्षुण्ण बनाए रखते हैं । जिस व्यवस्था को स्वयं भगवान का अभयदान प्राप्त हो, उसे परिवर्तित करने अथवा सुधारने की बात तक कोई कैसे करे  

दिनकर जी ने 'रश्मिरथी' में कर्ण की दानवीरता का विशद वर्णन किया है । उसने दान देने को अपने जीवन-धर्म का अभिन्न अंग माना तथा कभी किसी याचक को निराश नहीं लौटाया । जन्म के साथ ही उसकी देह से संयुक्त कवच एवं कुण्डल उसकी जीवन-रक्षा का अभेद्य आश्वासन थे जिनके रहते उसे अर्जुन सहित कोई भी नहीं मार सकता था । किन्तु जब अर्जुन के पिता देवराज इंद्र ने ब्राह्मण वेश धरकर उससे कवच-कुण्डल का दान माँगा तो उसने निस्संकोच उन्हें दान कर दिया क्योंकि उसे अपना धर्म अपने प्राणों से अधिक प्रिय था; उसे मरना स्वीकार्य था, अपने दान देने के धर्म से विमुख होना नहीं ।   

दिनकर जी ने कर्ण की सिद्धांतप्रियता का भी उसके एवं कृष्ण के तथा तदोपरांत उसके एवं उसकी जन्मदात्री कुंती के संवादों के माध्यम से समुचित विवेचन किया है । ज्येष्ठ पांडव होने के कारण हस्तिनापुर का शासक बन सकने का प्रलोभन उसे मित्रता एवं कृतज्ञता के आदर्शों से विचलित नहीं कर सकता था । उसने इतने बडे़ प्रलोभन को तुरंत ठुकराया । प्रलोभन का प्रस्ताव रखने वालों के पृथक्-पृथक् स्वार्थ थे । कृष्ण का प्रयोजन था कर्ण को दुर्योधन से काटकर दुर्योधन को दुर्बल कर देना एवं युद्ध में पांडव-पक्ष की विजय सुनिश्चित कर देना जबकि कुंती का प्रयोजन था (कर्ण सहित) अपने सभी पुत्रों की प्राण-रक्षा । परंतु ...  

परंतु न तो कृष्ण ही, न कुंती ही कर्ण के मन में झाँक कर उसके उदात्त चरित्र को पहचान सके जिसकी उच्चता किसी भी प्रलोभन से, किसी भी तर्क (या कुतर्क) से, किसी भी संबंध-जनित भावुकता से अधिक थी । मेरा अपना मानना है कि संसार में कृतघ्नता सम अन्य कोई पाप नहीं । कृतघ्नता एक ऐसा अपराध है जिसके लिए बड़े-से-बड़ा दण्ड भी अपर्याप्त है । कर्ण जैसा सद्गुणी व्यक्ति यह पाप नहीं कर सकता था । जब उसे सबने ठुकराया, सबने दुत्कारा, सबने अपमानित किया; तब दुर्योधन ने उसे गले लगाया, अपना मित्र कहा एवं समुचित सम्मान दिया (चाहे अपने स्वार्थवश ही) । ऐसे में कर्ण के लिए दुर्योधन से बढ़कर कौन होता ? उसने दुर्योधन के अनुचित कार्यों में साथ दिया क्योंकि मित्र से मुख न मोड़ना ही उसका धर्म था । यदि वह किसी भी कारण से दुर्योधन से विलग होता तो क्या यह अधर्म न होता ? हाँ, वह अपने मित्र को उचित मार्ग दिखला सकता था, कुपथगामी होने से रोक सकता था (या रोकने का प्रयास कर सकता था) । क्यों नहीं किया उसने ऐसा  

इस प्रश्न का उत्तर संभवतः कर्ण द्वारा सतत रूप से सहे गए अपमानों में ही अंतर्निहित है । भीम महाभारत की कथा के प्रत्येक चरण पर उसका जातिसूचक शब्द से अपमान ही करता रहा । युधिष्ठिर के धर्मराज होने का बहुत गुणगान किया गया है तथा इस तथाकथित धर्मस्थता के महिमामंडन में कोई न्यूनता नहीं छोड़ी गई है किंतु क्या युधिष्ठिर, क्या कृष्ण, क्या कोई अन्य; किसी ने भी भीम या अर्जुन को कर्ण का केवल उसकी जाति के आधार पर अपमान करने से कभी रोका नहीं । क्या कारण-अकारण, समय-असमय किसी व्यक्ति को उसकी जाति को इंगित करके अपमानित करना भी धर्माचरण में सम्मिलित है ? पांडु-कुमारों को धर्म की शिक्षा देने वाले कृपाचार्य एवं अन्य गुरुओं तथा उनके संपर्क में रहने वाले वयोवृद्धों ने क्या कभी उन्हें इसका अनौचित्य बताया ? नहीं ! क्योंकि उनकी अपनी मानसिकता में भी कर्ण अपमान की ही अर्हता रखता था, सम्मान की नहीं । ऐसे में पांडवों के विरूद्ध दुर्योधन द्वारा किए गए (अनुचित ही सही) कृत्यों से कर्ण उसे क्यों रोकता ?   

अब जो बात रह जाती है, वह है द्रौपदी के चीर-हरण एवं उस राजसभा में कर्ण द्वारा उसके प्रति अपमानजनक शब्दों के प्रयोग की । दिनकर जी ने कर्ण के अंतिम क्षण में उसका 'वधूजन का रक्षण' न कर पाने तथा 'पाप का समर्थन' करने के लिए पश्चाताप दर्शाया है (उन्होंने कर्ण द्वारा द्रौपदी के प्रति अभिव्यक्त अशोभनीय शब्दों का उल्लेख नहीं किया है) । मेरा यह मानना है कि कर्ण से यह अनुचित कृत्य इसलिए हो गया क्योंकि वह द्रौपदी के स्वयंवर में उसके द्वारा किए गए अपने अपमान को कभी नहीं भुला सका । वस्तुतः रामायण में सीता का स्वयंवर तथा महाभारत में द्रौपदी का स्वयंवर सच्चे अर्थों में स्वयंवर थे ही नहीं क्योंकि उन्हें स्वेच्छा से अपना वर नहीं चुनना था वरन उनके वरण के अभ्यर्थियों के सम्मुख (उनके पिताओं द्वारा) जो शर्त प्रस्तुत की गई थी, उसे पूर्ण करने वाले को ही उन्हें वरण करना था । ऐसे में जब कर्ण (ऊर्ध्व में घूमती हुई मत्स्य का जल में प्रतिबिम्ब देखकर वाण से वेधन करने की) शर्त को पूर्ण करने के लिए उद्यत हुआ तो द्रौपदी ने उसे सूत-पुत्र बताकर उससे विवाह करने से मना कर दिया । जातिसूचक ढंग से हुआ यह कर्ण के जीवन का सबसे बड़ा अपमान था जो न तो किसी भी आत्म-सम्मानी पुरुष के लिए विस्मरणीय हो सकता है, न ही क्षम्य । यही वह बीज था जो उस कुरूसभा में कर्ण से हुई महात्रुटि का वृक्ष बनकर उपस्थित हुआ ।  

दिनकर जी की स्वर्गस्थ आत्मा मुझे क्षमा करे किन्तु मैं यह कहने पर विवश हूँ कि महान होकर भी 'रश्मिरथी' अपूर्णताओं से मुक्त नहीं है । जिस घटना का वर्णन मैंने पूर्वस्थ परिच्छेद में किया है, उसका दिनकर जी ने 'रश्मिरथी' में कहीं उल्लेख तक नहीं किया है जबकि जाति-आधारित अपमान की जो ज्वाला कर्ण के मन में उन्होंने आजीवन धधकती बताई है, उसमें सबसे बड़ी आहुति तो वही घटना थी । द्वितीय यह कि कर्ण के पालक माता-पिता (राधा एवं अधिरथ) जिनसे कर्ण को असीम स्नेह मिला तथा जिन्होंने कर्ण का निज-संतान की भांति ही पालन-‌पोषण किया, को दिनकर जी ने काव्य में कहीं स्थान ही नहीं दिया है । तृतीय यह कि इन महत्वपूर्ण घटनाओं एवं तथ्यों को तो वे बिसरा बैठे किंतु कृष्ण के दूत बनकर कौरवों से भेंट करने के प्रसंग को उन्होंने अति-विस्तार दिया है (जिसका उल्लेख मैंने इस आलेख के प्रारंभ में किया है) । वह प्रसंग अपने आपमें ओजपूर्ण, प्रभावी एवं प्रेरक है परंतु कर्ण की जीवन-कथा के संदर्भ में उसका कोई विशेष महत्व नहीं है । मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि दिनकर जी दुविधा में पड़ गए थे कि एक ओर तो उन्होंने कृष्ण को छल-प्रयोग करने वाले कूटनीतिज्ञ के रूप में प्रस्तुत कर दिया, दूसरी ओर उन्हें बारंबार भगवान भी बताया; भगवान की आलोचना कर बैठने के इसी अपराध के शमन हेतु ही संभवतः उन्होंने कृष्ण के महिमामंडन वाला वह विस्तृत प्रसंग रचा जो काव्य का सम्पूर्णता में अवलोकन करने पर प्रक्षिप्त-सा प्रतीत होता है ।    

कर्ण की गाथा करूण होकर भी प्रेरक है एवं पुरुषार्थ तथा कर्मठता के महत्व को रेखांकित करती है । आज जब भारतवासियों का एक बड़ा वर्ग आरक्षण-प्राप्त करने, उसे उत्तरोत्तर बढ़ाने तथा उसे चिरकाल तक बनाए रखने के लिए आतुर है; कर्ण का जीवन समाज के वंचित वर्ग के लिए एक आदर्श बनकर उभरता है । कर्ण को किसी आरक्षण की आवश्यकता नहीं थी । उसने अन्यायपूर्ण वंचन एवं असम्मान का प्रतिकार स्वयं को सक्षम एवं समर्थ बनाकर किया । उसने सामर्थ्य किसी की कृपा से नहीं; अपने कर्म, परिश्रम एवं गुणों से प्राप्त किया । वह भिक्षुक नहीं, दानी था । उसका हाथ देने के लिए ही उठता था, लेने के लिए नहीं । अंततः उस रश्मिरथी के समक्ष संसार उसी भांति झुका जिस भांति उगते सूर्य के समक्ष झुकता है । इसीलिए वह मरकर भी अमर है, उसका गुरुत्व अमर है, उसका यश अमर है ।  

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गुरुवार, 7 जनवरी 2021

दर्द सबका एक-सा

(निर्भया के दोषियों को मृत्युदंड दे दिए जाने के उपरांत के घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में लिखा गया यह लेख मूल रूप से एक अप्रैल, २०२० को प्रकाशित हुआ था । कृपया इसे उसी संदर्भ में पढ़ा जाए ।) 

लंबे इंतज़ार के बाद आख़िर निर्भया के मुजरिमों को सज़ा-ए-मौत दे ही दी गई । भारत के प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर दिया कि न्याय की विजय हुई है । लम्बे अरसे से विभिन्न संचार माध्यमों पर सलेब्रिटी बनकर दर्शन एवं वक्तव्य दे रही निर्भया की माता ने अपनी असीम प्रसन्नता की अभिव्यक्ति कर दी । प्रचार के भूखे अन्ना हज़ारे (जिन्हें अब कोई टके के भाव भी नहीं पूछता) ने भी अपना तथाकथित मौन-व्रत समाप्त कर दिया जो उन्होंने तब तक रखने की घोषणा की थी जब तक कि निर्भया को न्याय (!) नहीं मिल जाता । दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्षा ने इसे सारे देश की जीत बताया । सुर्ख़ियों में रहने वाले लगभग सभी लोगों ने आशा व्यक्त की कि अब भारत की महिलाएं अधिक सुरक्षित रहेंगी । क्या वाक़ई ?

 

निर्भया कांड के कुछ समय के उपरांत जब देश अपने जाने-पहचाने जुनून में डूबा हुआ थातब मैंने एक लेख लिखा था : आँखों वाला न्याय चाहिएअंधा प्रतिशोध नहीं । मैं आज भी यही मानता हूँ कि समाज में सुधार विवेकपूर्ण न्याय से होता हैविवेकहीन प्रतिशोध से नहीं । आज से कुछ दशक पूर्व समाज के दबंगों द्वारा उत्पीड़ित अनेक लोग व्यवस्था से न्याय न मिलने पर स्वयं समाज एवं कानून के विरूद्ध शस्त्र उठाकर बाग़ी (या डाकू या दस्यु) बन जाते थे । इंसाफ़ का न मिलना या इतनी देर से मिलना कि वह अपने मायने ही खो बैठेही वस्तुतः समाज की अनेक समस्याओं की जड़ है क्योंकि वह मासूमों को अनचाहे ही मुजरिम बना देता है । कुछ लोगों को सूली चढ़ा देने से भीड़ को राज़ी किया जा सकता हैसमस्या का हल नहीं निकाला जा सकता । बहरहाल इस लेख में मेरा विषय यह नहीं है ।

 

इस लेख में जो मैं कहना चाहता हूँ वह यह है कि दर्द दर्द में फ़र्क़ करना ग़लत है क्योंकि भुगतने वालों का दर्द एक-सा ही होता है । दिल और रूह में उठने वाले दर्द की माप-तौल के कोई पैमाने ईज़ाद न किए गए हैंन किए जा सकते हैं । निर्भया के अपराधियों को मृत्युदण्ड देने के लिए जो उन्माद देश में उठा (जिसका नेतृत्व स्वयं निर्भया के माता-पिता ही कर रहे थे)वैसा उन्माद ऐसी ही अन्य पीड़िताओं के अपराधियों को मृत्युदंड देने के लिए तो नहीं उठा । क्यों ? क्या उनके दर्द को निर्भया के दर्द से कमतर आँका जा सकता है ? या उनके दर्द को देखते वक़्त आम जनताराजनेताओंसामाजिक कार्यकर्ताओंमीडिया और अन्य उत्साही लोगों की निगाहों में फ़र्क़ आ गया था ?

 

राजनेताओं की बात छोड़िए जिनके लिए सत्ता के निमित्त वोट बैंक की राजनीति और 'हम अच्छे तुम बुरेवाली मानसिकता ही सब कुछ है । उन्नीस सौ चौरासी के दिल्ली दंगों की बात करने वाले दो हज़ार दो के गुजरात दंगों की बात नहीं करना चाहते और जो दो हज़ार दो के गुजरात दंगों की बात करते हैंवे उन्नीस सौ चौरासी के दिल्ली दंगों पर चुप्पी साध लेते हैं क्योंकि सभी गुनाहगार हैं जो दूसरों के गुनाह गिनाना चाहते हैंअपने गुनाह नहीं । पर इनसे इतर बाकी प्रबुद्ध लोगों के लिए क्या कहा जाए जो पीड़ितों और उनकी पीड़ा में अंतर करते हैं और जो सज़ा एक पीड़ित के अपराधियों को देने के लिए लामबंद हो जाते हैंउसी सज़ा की माँग दूसरे पीड़ित के अपराधियों के लिए कभी नहीं करते 

 

तीन मार्च दो हज़ार दो को गुजरात में फैले साम्प्रदायिक दंगों के दौरान रणधीकपुर गाँव में दंगाइयों की भीड़ ने बिलकीस बानो के घर पर हमला कियाउस इक्कीस वर्षीया गर्भवती विवाहिता के साथ सामूहिक दुराचार लियाउसकी दुधमुँही बच्ची की उसकी आँखों के सामने नृशंस हत्या कर दी गईउसके परिवार के चौदह लोग निर्ममता से मृत्यु के घाट उतार दिए गए; उस अबला का सम्मान ही नहींसब कुछ बरबाद कर दिया गया और फिर वह बरसोंबरस भटकती फिरी संवेदनहीन और पक्षपाती पुलिसप्रशासन और न्याय के रक्षकों के द्वारों पर । उसे न्याय कैसे मिलता जब सत्ता के मालिकों का हाथ अन्याय और अन्यायियों के सर पर था ? सतरह लंबे वर्षों के इंतज़ार के बाद दो हज़ार उन्नीस में उसे सरकारी नौकरी और सरकारी इमदाद तब जाकर मिली जब सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को फटकारा । दो हज़ार सतरह में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा उस अबला के (कुछ) अपराधियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई । अभियोजन पक्ष ने उनके लिए मृत्युदंड की माँग की जिसे न्यायालय ने ठुकरा दिया । क्या नेताक्या मीडियाक्या तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता और क्या निर्भया की माताकिसी ने उन निर्दयी आतताइयों के लिए मृत्युदंड की माँग नहीं की 

 

सत्ताईस मई दो हज़ार चौदह को बदायूँ (उत्तर प्रदेश) में दो दलित बच्चियों के शव पेड़ से लटके पाए गए जिनकी दुराचार के बाद हत्या कर दी गई थी । उनके अपराधियों को मृत्युदंड तो क्याकिसी भी प्रकार का दंड दिलाने के लिए कोई विशेष होहल्ला नहीं किया गया । पुलिस तो मामले को रफ़ा-दफ़ा करने में लगी ही रहीसीबीआई जाँच भी निष्पक्ष तथा गंभीर नहीं रही और दिवंगत बच्चियों के असहनीय पीड़ा सह रहे माता-पिताओं को ही उनका हत्यारा ठहराने का प्रयास किया गया । इस जघन्य कांड के आरोपी आज भी निडर होकर जी रहे हैं तथा दंडित होने का उन्हें कोई भय नहीं लगता है । क्या निर्भया के दोषियों को फाँसी लग जाने से  उन मासूम  बच्चियों को न्याय मिल गया है ? क्या निर्भया की बड़बोली माता इस संदर्भ में अब तक कुछ बोली हैं या अब बोलना चाहेंगी ?

 

हमारे देश में तो व्यवस्था तथा उसके प्रति लोगों की आस्था का हाल यह है कि सत्ताईस नवम्बर दो हज़ार उन्नीस को हैदराबाद में एक पशु-चिकित्सिका के साथ अनाचार के बाद उसकी हत्या के गिरफ़्तार आरोपियों (विचाराधीन क़ैदियों) को छह दिसम्बर को तड़के स्थानीय पुलिस ने तथाकथित मुठभेड़ में क्या मार गिराया कि पुलिस पर बधाइयों की बौछार होने लगी, घटना में सम्मिलित पुलिसकर्मियों पर फूल बरसाए जाने लगे बिना यह पुष्टि किए कि वे आरोपी वास्तविक अपराधी थे भी या नहीं और बिना इस बात पर ध्यान दिए कि यही पुलिस यदि समय पर त्वरित कार्रवाई करती तो पीड़िता के प्राण बचाए जा सकते थे । और यदि वे आरोपी समाज के हाई प्रोफ़ाइल शक्तिशाली वर्ग से संबंधित होते तो क्या यही पुलिस उनका ऐसा एनकाउंटर करने का साहस करती स्पष्ट है कि हम अब न्याय के आकांक्षी विवेकशील नागरिक नहीं रहे, रक्तपिपासु अंधी भीड़ में परिवर्तित हो चुके हैं जिसकी संवेदनाएं भी पीड़ितों की जाति, धर्म, वर्ग आदि देखकर जागती हैं  सहानुभूति जताने और न्याय की माँग करने के लिए भी हमारा दृष्टिकोण 'मुँह देखकर तिलक करने वाला' बन गया है 

 

निर्भया का मामला हाई प्रोफ़ाइल बन गया तो ऐसा वातावरण निर्मित हो गया जैसे सम्पूर्ण भारतवासी बाकी सब काम छोड़कर केवल निर्भया के दोषियों को फाँसी लगा देने के लिए एकजुट हो गए हों लेकिन निर्भया के मर्मान्तक अंत से पहले भी और उसके उपरांत भी देश में हज़ारों निर्भयाओं ने अनाचार सहा है, उन्हें न्याय दिलाने तथा भावी निर्भयाओं की सुरक्षा के प्रति हमारी जागरूकता का स्तर क्या अभी भी वही नहीं है जो पहले था ? निर्भया कांड के उपरांत बने नये कानून ने ऐसे अपराधों की रोकथाम नहीं की है बल्कि ऐसी घटनाओं में बहुत अधिक वृद्धि हुई है । और निर्भया के दोषियों के मर जाने के बाद ऐसी घटनाओं में कमी आने की आशा करना अपने आपको भुलावे में रखने से अधिक कुछ नहीं  

 

न्यायालयों की जय-जयकार करने वालों की जानकारी के लिए मैं यह सूचना दे रहा हूँ कि अट्ठाईस जनवरी दो हज़ार बीस को हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने दो हज़ार दो में गुजरात के आणंद ज़िले में हुए दंगों के लिए सज़ा काट रहे अनेक दोषियों को न केवल ज़मानत पर छोड़ दिया बल्कि उन्हें मध्य प्रदेश (गुजरात नहीं) के विभिन्न नगरों में जाकर 'समाज सेवा एवं आध्यात्मिक सेवा' करने का निर्देश दिया । माननीय न्यायालय के इस निर्णय ने दंगा-पीड़ितों के घावों पर कैसा नमक छिड़का होगा, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है  ऐसे न्यायिक वातावरण में दुर्बल, दबे-कुचले और साधनहीन उत्पीड़ित न्याय पाने के लिए अब किसकी ओर देखें


मुस्लिम समुदाय हमारे देश में और विश्व में भी लगभग अलग-थलग इसीलिए पड़ गया है क्योंकि उसके प्रतिनिधि अपने समुदाय पर होने वाले अत्याचार की तो आवाज़ उठाते हैं लेकिन मुस्लिम बहुल देशों और क्षेत्रों में अल्पसंख्यक ग़ैर-मुस्लिमों पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध मौन साध लेते हैं । इससे उनकी छवि अन्य समुदायों में यह बन गई है कि उन्हें केवल अपना दर्द ही दिखाई देता है, दूसरों का नहीं । कश्मीरी पंडितों पर किए गए अत्याचारों के प्रति भारतीय (तथा अन्य) मुस्लिमों की उपेक्षापूर्ण तथा संवेदनहीन चुप्पी ने उनकी छवि बिगाड़ी है और अन्य समुदायों को ऐसा आभास दिया है कि वे यह सोच रखते हैं – हमारा ग़म ग़म है, तुम्हारा ग़म कहानी है; हमारा ख़ून ख़ून है, तुम्हारा ख़ून पानी है । अगर मुस्लिम नेता और विवेकशील मुसलमान इस तथ्य को समझ लेते तो वे भारत और दुनिया में अलग-थलग नहीं पड़ते, अन्य  धर्मावलंबियों द्वारा ग़लत नहीं समझे जाते

 

मैंने ऊपर संदर्भित अपने आलेख में भी यही कहा था और यहाँ भी यही कहता हूँ कि इस समस्या तथा ऐसी अन्य कई समस्याओं का एकमात्र समाधान चरित्र-निर्माण तथा सुसंस्कारों का विकास ही है । देश के युवा भ्रष्ट, उद्दंड एवं चरित्रहीन बनेंगे तो ऐसी घटनाओं का होना किसी भी कानून से नहीं रोका जा सकेगा चाहे हम कितने ही दोषियों को सूली चढ़ा दें । और हमारी संवेदनाएं सभी उत्पीड़ितों के लिए समान होनी चाहिए क्योंकि दर्द तो सबका एक-सा ही होता है । जैसे आततायी केवल आततायी है, वैसे ही पीड़ित भी केवल पीड़ित ही हैं । जिस पर गुज़रती है, उसका दर्द वही जानता है और सही मायनों में इंसानी नज़रिया उसी का है जो पराये दर्द को बिना सहे भी महसूस कर सके  एक सच्चे नागरिक की सहानुभूति राशन कार्ड पर दिए जाने वाले राशन या मंगलवार के प्रसाद की तरह नहीं बंट सकती  हम यह सोचकर उदासीन (या फिर अति-उत्साही‌) नहीं हो सकते कि जो हुआ है, हमारे या हमारे किसी अपने के साथ नहीं हुआ है । चूंकि यहाँ बात महिलाओं के साथ होने वाले अनाचार की है, मैं अपनी माताओं-बहनों से यही कहूंगा कि औरत को तो औरत का दर्द होना चाहिए; इसलिए वे हर औरत के दर्द को बिना उसकी जाति-मज़हब-हैसियत को देखे महसूस करें और उसके आँसुओं को पोंछने की दिल से कोशिश करें ।  

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सोमवार, 4 जनवरी 2021

महासमर की महागाथा

हमारे देश में चेतन भगत ने साधारण अंग्रेज़ी में लिखे गए साधारण कथानकों वाले उपन्यासों का एक बाज़ार उत्पन्न किया और इस सरिता को अमीश त्रिपाठी ने भारतीय पौराणिक मिथकों को ही तोड़ मरोड़ कर सिरजे गए अपने उपन्यासों की प्रारंभिक त्रयी द्वारा एक सागर में परिवर्तित कर दिया जिससे भारतीय भाषाओं के पाठकगण अंग्रेज़ी में रचित भारतीय उपन्यासों के प्रति कुछ ऐसे आकृष्ट हुए कि पहले से ही सिमटता जा रहा भारतीय भाषाओं विशेषतः हिंदी के साहित्य का प्रसार-क्षेत्र और भी अधिक सिमटने लगा । जहाँ तक लोकप्रिय हिन्दी साहित्य का प्रश्न थाले-देकर उसके इकलौते झंडाबरदार केवल पुराने योद्धा सुरेन्द्र मोहन पाठक रह गए । किन्तु सर्वविदित है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है । २०१६ में नवोदित हिन्दी उपन्यासकार रमाकांत मिश्र (जो पहले से ही एक हिन्दी कथाकार के रूप में पहचाने जाते थे क्योंकि उनके द्वारा रचित कई कहानियां हिन्दी की लोकप्रिय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी थीं) एक ताज़ा हवा के झोंके के समान अपना प्रथम हिन्दी उपन्यास 'सिंह मर्डर केसलेकर प्रस्तुत हुए । थ्रिलर शैली में लिखे गए मन को छू लेने वाले उस उपन्यास को सफलता भी मिली और सराहना भी । दूसरी ओर सबा ख़ान के नाम से एक नवोदित लेखिका भी विदेशी लेखकों के उपन्यासों के अनुवाद के साथ-साथ अपने मौलिक सृजन से भी हिंदी साहित्य जगत में अपनी एक पहचान बना रही थीं । इन दोनों लेखकों ने एक वृहत् कथा को आकार देने के निमित्त संयुक्त प्रयास किया जिसका परिणाम 'महासमरनामक एक महागाथा के रूप में सामने आया । दो भागों में प्रस्तुत इस अत्यंत विस्तृत कथा का प्रथम भाग - परित्राणाय साधूनाम् के रूप में २०१९ में पाठकों के सम्मुख आया तो द्वितीय भाग - सत्यमेव जयते नानृतम् के रूप में २०२० में अवतरित हुआ । बड़े आकार के नौ सौ से अधिक पृष्ठों में समाहित महाभारत सरीखी इस महागाथा की समीक्षा करना भी कोई सरल कार्य नहीं है क्योंकि गुण-दोषों को अलग रखा जाए तो कम-से-कम यह महाप्रयास अपने आप में ही महती सराहना का पात्र है ।

'महासमर' में लेखक-द्वय ने पर्यावरण संरक्षण की पृष्ठभूमि में एक तीव्र गति का थ्रिलर रचा है । प्राणी का शरीर तथा यह संपूर्ण सृष्टि भी पंच महाभूतों से निर्मित बताई जाती है - मृत्तिका अर्थात् मिट्टी, पानी, अग्नि, आकाश तथा वायु । गोस्वामी तुलसीदास की वाणी को उद्धृत किया जाए तो 'क्षिति जल पावक गगन समीरा' ही इस नश्वर देह तथा नश्वर संसार के मूल तत्व हैं । इन पाँच तत्वों में से एक तत्व - जल के महत्व को इस उपन्यास का आधार बनाया गया है एवं उसके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया है । पेशे से कीट वैज्ञानिक रमाकांत मिश्र की पारिस्थितिकी में रुचि होना स्वाभाविक ही लगता है लेकिन यह उपन्यास वस्तुतः पर्यावरण-प्रेमियों के लिए कम तथा रोमांच से युक्त फ़िक्शन पढ़ने में रुचि रखने वालों के लिए अधिक है ।

 

क्राइम फ़िक्शन के रसिया जिन पाठकों ने डॉन ब्राउन का 'द विंची कोड' या अश्विन सांघी के 'द रोज़ाबाल लाइन' और 'द कृष्णा की' जैसे उपन्यास पढ़े हैं, वे 'महासमर' के कथा-प्रवाह की शैली को भलीभांति समझ सकते हैं  (वैसे मूल रूप से ऐसी शैली के सृजक बाबू देवकीनंदन खत्री थे) । जल के महत्व पर प्रकाश डालते हुए एक बाँध के टूटने से हुए जलप्लावन में विश्व बैंक के वित्तपोषण द्वारा निर्मित एक संस्थान के पूर्णरूपेण नष्ट हो जाने की घटना इस सुदीर्घ कथानक के मूल में है लेकिन ये बातें वास्तविक कथा की पृष्ठभूमि ही तैयार करती हैं । कथानक का रंगमंच तो ढेर सारी घुमावदार घटनाओं, हत्याओं, छुपे हुए तथ्यों की खोजबीन, अपराधियों की धरपकड़, नेता-पुलिस-व्यापारी-नौकरशाही गठजोड़, गुप्तचरों (तथा एक खोजी पत्रकार) की भागदौड़ एवं सरकारी तंत्र के अनुत्तरदायी व चरम सीमा तक भ्रष्ट चरित्र से उपजे परिणामों से अटा पड़ा है । ढेर सारे पात्र हैं, ढेर सारे ट्रैक और ढेर सारी घटनाएं । पाठक को आदि से अंत तक उपन्यास से चिपकाए रखने के लिए यह पर्याप्त से भी अधिक है ।

 

सवाल यह उठता है कि इस विशालकाय सृजन के पीछे इन अत्यन्त प्रतिभाशाली लेखकों का उद्देश्य क्या था या क्या है । यदि उद्देश्य एक अतिरोचक, अतिमनोरंजक कथा की रचना करना था तो वे उसमें पूर्णतः सफल रहे हैं । फ़ॉर्मूला कार रेस में कारें जिस तरह दौड़ती हैं, वैसी ही रफ़्तार से इस महागाथा का घटनाक्रम दौड़ता है और पढ़ने वाले को ठहर कर सोचना तो दूर, साँस लेने की भी फ़ुरसत नहीं देता मालूम होता है । एक दिलचस्प थ्रिलर में जो कुछ होने की उम्मीद उसे पढ़ने वाले को होती है, वह सब कुछ 'महासमर' में मौजूद है हालांकि मेरी राय में इसे कोई सस्पेंस-थ्रिलर नहीं कहा जा सकता क्योंकि थ्रिल ही है, कोई बड़ा राज़ कहीं दिखाई नहीं देता जिसके ख़ुलासे के लिए आख़िर तक इंतज़ार रहे । पढ़कर सन्तुष्टि भी होती है तथा एक प्रकार का असंतोष भी क्योंकि दो भागों में विस्तृत हो चुकने के उपरांत भी सभी प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए गए हैं । कई सिरे (बिलाशक़ जान-बूझकर) खुले छोड़े गए हैं जिन्हें पकड़कर आइंदा इस सिलसिले को आगे बढ़ाया जाएगा । लेखकों के आत्मसंतोष तथा भावी लेखन योजना के दृष्टिकोण से उनके लिए यह उचित हो सकता है परन्तु पाठक के दृष्टिकोण से यह उचित प्रतीत नहीं होता । मूल विचार अथवा कतिपय पात्रों को लेकर उपन्यासों की एक शृंखला रची जाने में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लेकिन रची गई कृति अपने आप में सम्पूर्ण होनी चाहिए । कथानक से जुडे़ महत्वपूर्ण प्रश्नों को अनुत्तरित रखकर पाठक को त्रिशंकु की भांति अधर में झूलता छोड़ देना उसके प्रति अन्याय ही है ।

 

पात्रों की भाषा में व्यावहारिकता का ध्यान वहीं रखा गया है जहाँ गाली-गलौज है, अन्यथा अनेक स्थलों पर पात्रों द्वारा ऐसी भाषा बुलवाई गई है जो व्यवहार में प्रयुक्त नहीं होती । और जहाँ तक गाली-गलौज या अपशब्दों के प्रयोग का प्रश्न है, मैं निजी रूप से मानता हूँ कि यह यथासंभव कम-से-कम होना चाहिए और तभी होना चाहिए जब उसके बिना कथानक की गाड़ी न चल सकती हो । लेखकगण यदि चाहते तो निश्चय ही इसे कम कर सकते थे । इसके अतिरिक्त मुझे उपन्यास के दोनों ही भागों में स्त्रियों से संबंधित कुछ प्रसंग अनावश्यक लगे । यदि लेखकगण विशुद्ध व्यावसायिक उद्देश्य को ध्यान में रखकर लिखने वाले उपन्यासकारों की श्रेणी में नहीं आते हैं तो इन प्रसंगों को उपन्यास में सम्मिलित करने से बचा जा सकता था ।

 

अब मैं पुनः लेखकद्वय के इस कथा के सृजन के उद्देश्य की अपनी बात पर लौटता हूँ । यदि उनका उद्देश्य केवल मनोरंजन प्रदान करना न होकर पाठकों में पारिस्थितिकीय जागरूकता उत्पन्न करना था (और है) तो उनकी सफलता सीमित ही है क्योंकि वे उपन्यास में किसी भी स्थान पर इस संदर्भ में किसी प्रकार का भावोद्वेलन उत्पन्न नहीं कर सके हैं । ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उपन्यास में अंतर्निहित ऐसा कोई भाव पढ़ने के उपरान्त भी पाठक के साथ बना रहता है । लेकिन इस तथ्य की ओर ध्यानाकर्षण निस्संदेह सराहनीय है कि घोर स्वार्थी व्यवसायी अपने व्यापारिक लाभ के निमित्त प्राणलेवा रोग उत्पन्न करने वाले विषाणु तक उत्पन्न करके संपूर्ण मानवता के स्वास्थ्य (एवं जीवन) को भी संकट में डाल सकते हैं । इस कटु यथार्थ को रेखांकित करना भी श्लाघनीय है कि स्वार्थी लोग एवं स्वार्थी वर्ग अपने प्रत्येक कुकर्म को न्यायोचित सिद्ध करने के लिए कोई-न-कोई (कु)तर्क ढूंढ ही लेते हैं ।

 

कुल मिलाकर उपन्यास पठनीय है । एक समीक्षक के रूप में मेरी आलोचना अपनी जगह है और उपन्यास की उत्तम गुणवत्ता अपनी जगह । बेस्टसेलर बनने की तमाम ख़ूबियां इसमें हैं । उपन्यास के अंत से ही स्पष्ट है कि लेखकगण की लेखनी थमने वाली नहीं है एवं इस महागाथा का नवीन विस्तार तथा इसके नवीन आयाम भविष्य में हिंदी के पाठकों के समक्ष आएंगे जिनकी प्रतीक्षा अभी से आरंभ हो गई है । प्रतिभाशाली तथा ऊर्जस्वी लेखकद्वय को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ।


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एक ताज़ा हवा का झोंका (पुस्तक समीक्षा-सिंह मर्डर केस)

आजकल हमारे देश में विदेशी लेखकों द्वारा लिखे गए थ्रिलर उपन्यासों का बाज़ार गर्म है । जो भारतीय लेखक भारतीय भाषाओं में ऐसे कथानक भारतीय पाठकों को परोस रहे हैंउनका लेखन भी मुख्यतः विदेशी लेखन से ही प्रेरित लगता है । ऐसे में यदि कोई भारतीय लेखक न केवल भारत में उपस्थित वास्तविकताओं के आधार पर पूर्णतः मौलिक कथानक रचता है तो वह निस्संदेह अभिनंदन का पात्र है । ऐसा ही एक विशुद्ध मौलिक एवं अत्यंत प्रभावशाली प्रयास नवोदित हिन्दी उपन्यासकार रमाकांत मिश्र ने किया है जो हिन्दी के पाठक वर्ग के लिए एक ताज़ा हवा के झोंके के सदृश है । उपन्यास का शीर्षक है – ‘सिंह मर्डर केस’ । पाठक के हृदय के तल को स्पर्श कर लेने वाला यह उपन्यास सामाजिक कथानकों को पढ़ने में रुचि रखने वालों तथा रहस्य-रोमांच के शौकीनोंदोनों ही पाठक-वर्गों की पसंद की कसौटी पर खरा उतरता है ।

अपने शीर्षक से यह कोई हलका-फुलका और तात्कालिक मनोरंजन देने वाला उपन्यास लगता है लेकिन वस्तुतः यह उपन्यास भारतीय पुलिस और न्याय व्यवस्था की सूक्ष्मता और निष्पक्षता से पड़ताल करता है । उपन्यास का आरंभ लखनऊ में एक पुलिस उप अधीक्षक प्रशांत सिंह के पुत्र समर्थ सिंह की उसके विवाह समारोह के दौरान ही हुई हत्या से होता है जब एक पजेरो गाड़ी उसे कुचल डालती है । जब पुलिस विभाग अपने ही एक वरिष्ठ अधिकारी के पुत्र की हत्या के मामले को सुलझाने में विफल रहता है तो यह मामला केंद्रीय जाँच ब्यूरो के उच्चाधिकारी मदन मिश्र के सुपुर्द कर दिया जाता है । मदन मिश्र जो कि एक अत्यंत कार्यकुशल एवं सत्यनिष्ठ अधिकारी हैंइस मामले की छानबीन करते हैं तो इस हत्या से पहले भी और इस हत्या के बाद भी हुई पुलिसियों की हत्याओं का एक ऐसा अजीबोगरीब सिलसिला उनके सामने आता है  कि हत्यारे तक पहुँचने में उन्हें ख़ासी मशक़्क़त करनी पड़ती है । और अंत में हत्यारे को गिरफ़्तार कर लेने के बाद भी वे समझ जाते हैं कि उन्होंने उसे गिरफ़्तार नहीं किया है जिसकी वे तलाश कर रहे थे ।

अपने उपन्यास को एक रहस्य-कथा का जामा पहना रहे रमाकांत मिश्र का यह प्रयास उनकी मौलिक सूझबूझ और प्रतिभा को ही रेखांकित नहीं करता बल्कि उत्तर भारत में चल रही पुलिस-व्यवस्था की विडंबनाओं के उनके गहन ज्ञान को भी प्रतिबिम्बित करता है । उपन्यास का शीर्षक ‘सिंह मर्डर केस’ रखने का संभवतः यही कारण है कि कथानक का मूल बिन्दु समर्थ सिंह नामक व्यक्ति की हत्या हैअन्यथा यह एक रहस्य-कथा कम और एक सामाजिक उपन्यास अधिक है जो भारतीय पुलिस व्यवस्था की सड़ांध को उजागर करता है । भारतीय पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी चाहे जो कह लें और प्रैस के सामने चाहे जैसी डींगें हाँक लेंउनके अधीन चलने वाले थानों और चौकियों का पीड़ादायक और लज्जास्पद सत्य वही है जिसे रमाकांत मिश्र ने पूरी निर्भयता और वस्तुपरकता के साथ पाठक वर्ग के समक्ष रख दिया है । और सत्य सदा सत्य ही रहता है चाहे उसे कोई स्वीकार करे या देखकर भी अनदेखा करने का बहाना करे । आँखें मूंद लेने से सच्चाई लुप्त नहीं हो जाती ।

महिलाओं के प्रति यौन अपराध रोकने की बातें चाहे जितनी हों और होहल्ला चाहे जितना मचा लिया जाएइस दिशा में सार्थक प्रयासों का प्रायः अभाव ही रहता है । लेकिन इस संदर्भ में जो सबसे भयावह वास्तविकता हैवह है कानून और व्यवस्था के रक्षक माने जाने वाले पुलिसियों द्वारा ही ऐसे अपराधों का किया जाना और उससे भी बड़ी बात यह कि थानों और चौकियों के भीतर किया जाना । खेद का विषय है कि भारतीय पुलिस भ्रष्ट और निकम्मे पुलिसियों से ही नहीं वरन लम्पट  और दुराचारी पुलिसियों से भी भरी पड़ी है । न जाने कितनी ही सती नारियों ने ऐसे वर्दी वाले गुंडों के हाथों अपना सतीत्व खोया है । न जाने ऐसी कितनी ही अबलाओं की आवाज़ें थानों और चौकियों की बेरहम चारदीवारियों में घुटकर रह गई हैं । भारतीय पुलिस के पास ऐसी अंधी ताक़त होती है कि ऐसे जघन्य अपराध करने के बाद भी अधिकतर मामलों में अपराधियों का कुछ नहीं बिगड़ता । बल्कि अपनी खाल बचाने के लिए वे निर्दोषों और यथासंभव ऐसी पीड़िताओं के परिवार के पुरुषों को ही फ़र्ज़ी मामलों में फंसाकर अदालतों से सज़ा दिलवा देते हैं । भारतीय न्यायपालिका की निष्पक्षता और कार्यकुशलता केवल एक मिथक है जिसकी सच्चाई भुक्तभोगी ही बेहतर जानते हैं । तो ऐसे में कोई मज़लूम क्या करे जब इंसाफ़ की गुहार सुनने वाला कोई मौजूद न हो ? जहाँ हाकिम ही बेदर्द और ज़ालिमों की ओर होंवहाँ ज़ुल्म के खिलाफ़ फ़रियाद किससे की जाए ? सदियों से ऐसे मज़लूम अंधे कानून को अपने हाथ में लेकर ख़ुद ही अपने ऊपर और अपनों के ऊपर हुए ज़ुल्म-ओ-सितम का हिसाब साफ़ करते आए हैं । न जाने ऐसी कितनी सच्ची दास्तानें कानून की मिसिलों मेंकिस्से-कहानियों में और लोगों की यादों में दफ़न हैं । 'सिंह मर्डर केसभी ऐसी ही एक दास्तान सुनाता है । दास्तान ज़ालिमों के ज़ुल्म की ! दास्तान मज़लूम के इंसाफ़ की !

विषय-वस्तु पर एक सरसरी निगाह डालने पर 'सिंह मर्डर केसएक रूटीन कथानक लगता है लेकिन ऐसा है नहीं । ऐसा प्रतीत होता है कि रमाकांत मिश्र ने भारतीय पुलिस के चरित्र और कार्यप्रणाली दोनों को ही निकट से देखा है और उनका गहन अध्ययन किया है । इसीलिए कथानक के पात्र और घटनाएं दोनों ही काल्पनिक होकर भी पाठक को वास्तविक लगते हैं । लेखक ने कथानक के परिवेश के छोटे-से-छोटे पक्ष पर पूरा ध्यान दिया है और कथानक को वास्तविक जैसा बनाकर प्रस्तुत करते हुए भी रोचकता के तत्व को आद्योपांत अक्षुण्ण बनाए रखा है जिससे पाठक कहीं पर भी ऊब का अनुभव नहीं करता । लेखक ने कहानी के रहस्यात्मक पक्ष को कम और भावनात्मक पक्ष को अधिक महत्व दिया है । पीड़ित पात्रों की व्यथा और उसकी अभिव्यक्ति अनेक स्थलों पर बरबस ही पाठक के दिल को छू लेती हैं । लेखक की लेखनी ने जादूभरे शब्दों का ऐसा तानाबाना बुना है कि पाठक का पीड़ित पात्रों से तादात्म्य स्वाभाविक रूप से स्थापित हो जाता है और वह उनकी पीड़ा को अपने भीतर अनुभव करते हुए अत्याचारियों के विनाश की कामना करने लगता है । लेखक ने पीड़ित द्वारा कानून को अपने हाथ में लिए जाने को इस प्रकार से रूपायित किया है कि वह न्याय ही दृष्टिगोचर होता हैप्रतिशोध नहीं । लेखक ने फ़्लैश-बैक और कट टू तकनीकों का उपयोग अत्यंत कौशलपूर्वक करते हुए उपन्यास को ऐसा शिल्प दिया है कि पढ़ने वाला शब्दों के साथ बंधकर रह जाता है और कहानी के पात्र मानो उसके समक्ष सजीव हो उठते हैं । राष्ट्रभाषा पर मजबूत पकड़ रखने वाले लेखक द्वारा अपनी बात कहने के लिए किए गए शब्दों का ही नहींलोकोक्तियों का चयन भी सराहनीय है । उपन्यास को एक भावुक कर देने वाले दृश्य के साथ सकारात्मक बिन्दु पर समाप्त किया गया है जो कि लेखक की सुलझी हुई मानसिकता का ही प्रमाण है ।

आज जब चेतन भगत जैसे लेखक अपनी साधारण अंग्रेज़ी छांटते हुए मामूली और बासी कथानकों को सुशिक्षित भारतीयों को परोसकर चाँदी काट रहे हैं तो रमाकांत मिश्र द्वारा अत्यंत परिश्रमपूर्वक लिखा गया यह हिन्दी उपन्यास अपनी अलग पहचान बनाते हुए राष्ट्रभाषा हिन्दी के सुधी पाठकों का ध्यानाकर्षण माँगता है । इसे पढ़ने के उपरांत मेरे हृदय के तल से लेखक के लिए यही सदिच्छा उभरी है कि यह सर्वथा मौलिक एवं अत्यंत प्रशंसनीय उपन्यास अधिकाधिक पाठकों तक पहुँचे तथा हिन्दी का पाठक और आलोचक जगत यह देख सके कि भारतीय लेखन प्रतिभाएं विदेशी लेखकों से किसी भी तरह कम नहीं हैंबस उन्हें प्रकाश में लाए जाने की आवश्यकता है ।

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शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

फ़लसफ़ा प्यार का

प्यार ! इश्क़ ! मुहब्बत ! आशिक़ी ! आशनाई ! और शुद्ध हिंदी में कहें तो प्रेम ! क्या है इस शय का फ़लसफ़ा क्या है इसका दर्शन क्या है इसका अर्थ कहने की आवश्यकता नहीं कि बात यहाँ स्त्री-पुरुष के उस प्रेम की हो रही है जो आदिकाल से चला आ रहा है और जो सृष्टि का आधार है । नर-मादा प्रणय-संबंध तो पशु-पक्षियों में भी होते हैं जिनसे उनकी प्रजाति उत्तरोत्तर चलती रहती है लेकिन मनुष्यों की बात भिन्न इसलिए है क्योंकि उनके प्रेम में केवल देह ही नहीं भावनाएँ भी सम्मिलित होती हैं । इसलिए एक पुरुष एवं एक नारी जब परस्पर प्रेम-बंधन में बंधते हैं तो वे एक-दूसरे से प्रेम में डूबी हुई बातें करते हैंएक-दूसरे को प्रेम-पत्र लिखते हैंजब मिलते हैं तो एक-दूसरे को प्रेमभरी दृष्टि से देखते हैंबिना स्पर्श के भी एक-दूसरे के साहचर्य से आनंदित होते हैंसीधे-सीधे मिलना संभव न हो तो एक-दूसरे को छुप-छुप के देखने का प्रयास करते हैंकवि-हृदय हों तो कविताएँ रचते हैंएक-दूसरे को प्रेमोपहार देते हैं जिनका मूल्यांकन केवल उनमें निहित भावों से ही किया जा सकता है । उर्दू शायरी भरी-पड़ी है इश्क़ो मुहब्बत के जज़्बात और इज़हार से । असफल प्रेमियों की दर्दभरी कथाएँ अमर हो चुकी हैं  और लोकरुचि का अंग बनकर सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती आ रही हैं । सभी भाषाओं और सभी देशों के साहित्यनाट्यकर्म और सिनेमा का मुख्य अंश प्रेमकथाएँ ही हैं । यह संसार न केवल प्रेम के द्वारा ही चल रहा है वरन इसका सौंदर्य भी प्रेम के कारण ही है । ज़रा सोचिएप्रेम के बिना यह संसार कितना कुरूप होता !  

किसी को किसी से प्रेम क्यों और कैसे होता हैयह तो सनातन काल से चला आ रहा अनसुलझा रहस्य है । लेकिन इस लेख में एक हिंदी उपन्यास की समीक्षा के बहाने मैं इस बात पर विमर्श करना चाहता हूँ कि प्रेम वस्तुतः है क्या प्रेम में दैहिक आकर्षण सम्मिलित हो सकता हैलेकिन यह उससे कहीं अधिक हैबहुत अधिक है । मैंने देखा हैजाना है और महसूस किया है कि लोग प्रेम करते तो हैं लेकिन उसके मर्म को समझते नहीं । अपने निजी अनुभव से मैं यह जान पाया हूँ कि प्रेम कोई लेन-देन नहींयह तो केवल देने का ही नाम है । सच्चे प्रेम की कसौटी है त्याग और बलिदान । दिलों के सौदे नफ़ा-नुकसान देखकर नहीं किये जा सकते । नफ़े-नुकसान का सवाल जहाँ उठेवहाँ और चाहे कुछ भी होप्यार नहीं हो सकता । प्यार में सौदा नहीं होता । न ही कोई शर्तें लगाई जाती हैं । जिससे प्यार किया जाएउससे कुछ पाने की नहीं बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उसके लिये सब कुछ छोड़ देने की इच्छा ही प्यार करने वाले के मन में पूरी शिद्दत से समा जाती है । किसी की मुहब्बत ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं मिल सकतीउसे तो सजदा करके ही हासिल किया जा सकता है । कुछ ऐसे ही जज़्बात से सराबोर और पढ़ने वाले के दिल को छू जाने वाला हिंदी उपन्यास है - 'सुहाग से बड़ाजो तीन दशक पूर्व स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की लेखनी से निकला था । 

भारतीय परंपरा और संस्कारों के अनुसार एक हिंदुस्तानी औरत के लिए उसका सुहाग अर्थात् उसका पति ही सर्वोपरि होता है (यदि वह क्रूर अथवा कुकर्मी हो तो बात अलग है) । भारतीय नारी के लिए उसके सुहाग से बढ़कर कुछ नहीं होताकोई नहीं होता । एक हिंदू विवाहिता का आदर्श सावित्री है जो सत्यवान को मृत्यु के मुख से लौटा लाई थी । फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई उसके लिए उसके सुहाग से भी बड़ा बन जाए इस प्रश्न का उत्तर यह उपन्यास देता है जो एक मार्मिक प्रेमकथा द्वारा प्रेम की वास्तविक परिभाषा प्रस्तुत करता है ।   

'सुहाग से बड़ाकहानी है देवराज और माधुरी के पवित्र प्रेम की । घटनाक्रम पटना शहर में रखा गया है । देवराज अपराध की दुनिया में है लेकिन बचपन में मिली एक गहरी पीड़ा ने उसके कोमल मन पर ऐसी छाप छोड़ी है कि वह अपराधी होकर भी एक संवेदनशील मानव है । कानून के ख़िलाफ़ काम करते हुए भी वह अपने उसूलों के साथ कोई समझौता नहीं करता । वह वे काम करता है जिनकी इजाज़त कानून नहीं देता मगर वह ऐसा कोई काम नहीं करता जिसकी इजाज़त उसका ज़मीर उसे नहीं देता ।    

इधर माधुरी बहन है अशोक की जिसे पुलिस में नौकरी मिलने पर उसकी प्रशिक्षण-अवधि में ही एक गोपनीय योजना के अंतर्गत पुलिस का मुख़बिर बनाकर देवराज के दल में घुसा दिया जाता है । ये दोनों भाई-बहन अनाथ हैं और इसीलिए जहाँ अशोक के लिए अपनी बहन माधुरी से बढ़कर कोई नहीं हैवहीं माधुरी के लिए सबसे प्यारा कोई है तो बस उसका भाई अशोक है । अशोक का मित्र अमित पहले से ही पुलिस की नौकरी में है और वह माधुरी से विवाह करना चाहता है जिस पर अशोक को कोई आपत्ति नहीं । जहाँ तक माधुरी का प्रश्न हैअपने भाई की इच्छा की ख़ातिर उसे भी अमित से विवाह करना स्वीकार्य है । लेकिन . . . 

लेकिन हालात माधुरी को देवराज के निकट ले आते हैं । दोनों प्रेम-बंधन में बंध जाते हैं । यह वह पवित्र प्रेम है जो आत्मा से किया गया हैदेह से नहीं । माधुरी के प्यार की ख़ातिर देवराज अपराध की दुनिया छोड़ देने का फ़ैसला भी कर लेता है पर तक़दीर को कुछ और ही मंज़ूर है । देवराज पर दो राज़ एक साथ खुलते हैं - एक तो यह कि उसके दल में सम्मिलित अशोक पुलिस का मुख़बिर है जिसे दल के नियम के अनुसार मृत्युदंड देना उसका कर्तव्य है और दूसरा यह कि अशोक उसकी प्रेमिका माधुरी का भाई है । देवराज माधुरी से यह सच्चाई नहीं छुपाता । अब माधुरी उसे उसकी मुहब्बत का वास्ता देती है और कहती है कि अगर उसकी मुहब्बत सच्ची है तो वह अशोक की जान बख़्श देगा । 

देवराज दुविधा में है कि भावना और कर्तव्य में से किसे चुने जबकि माधुरी को पूरा विश्वास है कि देवराज उसके प्राणप्रिय भाई को मारकर उसके प्रेम को कलंकित नहीं करेगा । दूसरी ओर बंतासिंह नामक एक अपराधी कारागार से फ़रार हो जाता है । वह अमित और देवराजदोनों ही का शत्रु है । घटनाक्रम कुछ इस तरह घूमता है कि अमित अलग-अलग ढंग से माधुरीअशोक और बंतासिंहसभी के संपर्क में आता है और देवराज के अड्डे पर धावा बोलकर उसके संपूर्ण दल का सफ़ाया कर देता है । देवराज गिरफ़्तार हो जाता है और अशोक की लाश बरामद होती है । माधुरी यह मान बैठती है कि उसके भाई का हत्यारा उसका प्रेमी ही है । उसकी गवाही के दम पर अदालत देवराज को फाँसी की सज़ा सुना देती है और वह उसी दिन अमित से विवाह कर लेती है । 

अब उन बातों को बरसों बीत चुके हैं । देवराज की फाँसी की सज़ा ऊंची अदालत में अपील किए जाने पर उम्र-क़ैद में बदल चुकी है और वह जेल में अपने दिन काट रहा है । अमित पुलिस में पदोन्नति पाकर वरिष्ठ पद पर पहुँच गया है और उसकी पत्नी माधुरी अब उसके पुत्र की माँ है । बंतासिंह कभी का विदेश भागकर कानून की पकड़ से बहुत दूर हो चुका है । लेकिन . . . 

लेकिन एक दिन अतीत के कब्रिस्तान में दफ़न कुछ मुरदे अपनी कब्रों से उठकर खड़े हो जाते हैं और कुछ भूले-बिसरे राज़ अपना परदाफ़ाश होने की धमकी देने लगते हैं । माधुरी को पता लगता है कि देवराज उसका सुहाग तो नहीं बन सका लेकिन वह उसके लिए सुहाग से भी बड़ा है । वह अब जान पाती है कि जो इंसान उसकी माँग में सिंदूर बनकर नहीं सज सकाउसका प्यार कितना महान है । लेकिन नियति तो अपना खेल खेल चुकी है । अब क्या हो सकता है दिल को झकझोर देने वाली इस दास्तान का क्लाईमेक्स सच्ची मुहब्बत की ऊंचाई को दिखलाता है । इस कहानी का अंत यह बताता है कि सच्चा प्यार करने वाले चाहे ख़ुद मिट जाएंउनका प्यार एक रोशन मीनार बनकर आने वाली नस्लों तक को समझा सकता है कि हक़ीक़त में प्यार होता क्या है ।  

मैं नहीं जानता कि इस बेमिसाल कहानी का मूल विचार स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की मौलिक सोच का परिणाम था अथवा उन्होंने इसे कहीं से उधार लिया था । लेकिन भावनाओं के कुशल चितेरे शर्मा जी ने इस उपन्यास को अत्यंत रोचक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है और सभी प्रमुख चरित्रों को स्वतः ही उभरने और कथानक पर अपनी-अपनी छाप छोड़ने का अवसर दिया है । उन्होंने बताया है कि प्यार कर बैठने वालों को प्यार करना आता हो और वे प्यार के फ़लसफ़े को ठीक से समझते होंयह ज़रूरी नहीं । सच्चे प्रेम का आधार है विश्वास । और उसका अभिन्न अंग है अपने प्रिय के लिए बड़े-से‌‌‌-बड़ा त्याग कर सकने की क्षमता । 

रहस्यकथाएँ और रोमांचक उपन्यास (थ्रिलर) लिखने के लिए विख्यात वेद प्रकाश शर्मा ने अपने लेखन-कर्म के प्रारम्भिक वर्षों में सामाजिक उपन्यास भी लिखे थे । उनके ऐसे एक उपन्यास का नाम है - 'राखी और सिंदूरजो सम्भवतः उन्होंने बहुत कम आयु में लिखा था । मैंने वह उपन्यास पढ़ा तो नहीं लेकिन अनुमान लगा सकता हूँ कि वह एक विवाहिता की दुविधा की कहानी होगी जिसे राखी अर्थात् अपने भाई और सिंदूर अर्थात् अपने पति में से किसी एक को चुनना हो । 'सुहाग से बड़ामें नायिका के समक्ष ऐसी कोई दुविधा नहीं है । वह अपने भाई से अधिक प्रेम किसी से नहीं करती तथा उसके हत्यारे को दंडित करवाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है । इस उपन्यास में दुविधा वस्तुतः नायक के समक्ष है जिसका शर्मा जी ने बड़ा ही हृदयविदारक चित्रण किया है । देवराज को बेचैन कर रही उसकी उलझन और उसके अंतर्मन की पीड़ादोनों ही का वर्णन कुछ ऐसा है कि पढ़ने वाले को लगता है मानो वह जीते-जागते देवराज को अपनी आँखों से देख रहा हो । अपनी महबूबा के लिए देवराज दीवानगी की हद से गुज़र जाता है जिसे महसूस करके इस दर्दभरी दास्तां को पढ़ रहे शख़्स की आँखें नम हो सकती हैं  । और उपन्यास के अंतिम भाग में वास्तविकता से अवगत हो चुकी माधुरी की पीड़ाप्रतिशोध और प्रायश्चितसभी पढ़ने वाले के दिल की गहराई में उतर जाते हैं । 

मुझे दुख है कि वेद प्रकाश शर्मा ने अपनी इस असाधारण कृति पर 'इंटरनेशनल खिलाड़ी' (१९९९) जैसी मामूली फ़िल्म बनवाई जिसमें अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना ने नायक-नायिका की भूमिकाएँ निभाई थीं । फ़िल्म में उपन्यास की संपूर्ण कहानी नहीं बल्कि केवल उसके कुछ पात्र तथा उसके घटनाक्रम का एक अंश ही लिया गया है और बाकी की कहानी (जो कि कथानक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है) फ़िल्म से निकाल दी गई है । जहाँ उपन्यास एक अमर प्रेमकथा हैवहीं फ़िल्म एक साधारण एक्शन फ़िल्म से अधिक कुछ नहीं है । फ़िल्म में न भाई-बहन का प्रेम ठीक से उभर पाया हैन ही प्रेमी-प्रेमिका का । फ़िल्म में उपन्यास की रूह का नामोनिशान तक नहीं है । मुझे ऐसा लगता है कि पात्रों के चरित्र-चित्रणभावपक्ष और कथानक की आत्मा की दृष्टि से कंगना रानाउत की प्रथम फ़िल्म 'गैंगस्टर' (२००६) इस उपन्यास के अधिक निकट है बजाय 'इंटरनेशनल खिलाड़ीके । 

सरल हिंदी में लिखा गया थ्रिलर और सामाजिक कथा का मिश्रण यह उपन्यास आदि से अंत तक पढ़ने वाले को बांधे रखता है । इसे उन लोगों को भी पढ़ना चाहिए जिन्होंने 'इंटरनेशनल खिलाड़ीफ़िल्म देख रखी है क्योंकि उपन्यास का कैनवास फ़िल्म से बहुत अधिक विस्तृत है और इसमें प्यार का वह रंग है जो फ़िल्म में कहीं नज़र नहीं आता । प्यार तो अपने जीवन में लगभग सभी मनुष्य करते हैं चाहे वे किसी भी लिंग के हों लेकिन प्यार के फ़लसफ़े को उनमें से बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं । अगर आप समझना चाहते हैं तो 'सुहाग से बड़ाको ज़रूर पढ़िए ।

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