शनिवार, 12 दिसंबर 2020

इंसानी रिश्तों और इंसानी फ़ितरत के रंगों से सजा वसीह कैनवास

१९६३ में हिन्दी उपन्यास जगत के आकाश पर एक नया सितारा उभरा । इस तेईस वर्षीय युवा लेखक का नाम था सुरेन्द्र मोहन पाठक जिसका पहला उपन्यास – ‘पुराने गुनाह नए गुनाहगार’ हिन्दी के पाठक समुदाय के सामने आया । चूंकि इस लेखक ने जासूसी उपन्यास लेखन की विधा को अपनाया, इसलिए उसने उस समय की परंपरा को निभाते हुए अपना एक सीरियल नायक सृजित किया जो कि लेखक द्वारा रचित रहस्य-कथाओं के रहस्यों को सुलझाता था । उन दिनों ऐसे जासूस नायक या तो पुलिस इंस्पेक्टर दिखाए जाते थे या कोई सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी जो कि सेवानिवृत्ति के बाद अपनी निजी जासूसी संस्था खोलकर बैठे हों । सुरेन्द्र मोहन पाठक ने अपना एक नया मुकाम बनाने की कोशिश में अपने जासूस नायक को एक खोजी पत्रकार के रूप में चित्रित किया जो कि एक दैनिक समाचार-पत्र में नौकरी करता है और अपने समाचार-पत्र के लिए सनसनीखेज़ ख़बरें जुटाने के लिए विभिन्न अपराधों की अपने स्तर पर जांच-पड़ताल करता है । लेखक ने इस नायक को एक बंगाली युवक दिखाया और घटनाओं के स्थल के रूप में राजनगर नाम के एक काल्पनिक महानगर को उसकी पूरी भौगोलिक स्थिति के साथ चित्रित किया । सुनील कुमार चक्रवर्ती नाम का यह खोजी पत्रकार आज हिन्दी के जासूसी उपन्यास जगत का बेहद लोकप्रिय नायक है जिसका पहला कारनामा – ‘पुराने गुनाह नए गुनाहगार’ १९६३ में छपा जबकि एक सौ बाईसवां नवीनतम कारनामा – ‘कॉनमैन’ २०१८ में प्रकाशित हुआ । पिछली आधी सदी से लगातार सक्रिय यह चिरयुवा नायक राजनगर से निकलने वाले राष्ट्रीय स्तर के दैनिक समाचार-पत्र – ‘ब्लास्ट’ के लिए काम करता है । इसकी खोजी गतिविधियां आम-तौर पर राजनगर और उसके निकट के काल्पनिक शहरों – विशालगढ़, विश्वनगर, तारकपुर, ख़ैरगढ़, इक़बालपुर आदि एवं साथ ही निकटस्थ पर्यटन-स्थलों – झेरी, सुंदरबन, पंचधारा आदि में चलती हैं यद्यपि कुछ उपन्यास लेखक ने ऐसे भी लिखे हैं जिनमें सुनील को एक पत्रकार से इतर एक वास्तविक जासूस भी बताया गया है जो कि छुपे रूप में स्पेशल इंटेलीजेंस नाम के खुफ़िया सरकारी विभाग के लिए काम करता है जिसके प्रमुख कर्नल मुखर्जी नाम के उच्चाधिकारी हैं । ऐसे उपन्यासों में सुनील को विदेशों में भी भारतीय हितों के लिए जासूसी के काम करते हुए दिखाया गया है लेकिन सुरेन्द्र मोहन पाठक ने कुछ वर्षों बाद ऐसे उपन्यास लिखने बंद कर दिए और सुनील को स्थाई रूप से एक पत्रकार की भूमिका तक ही सीमित कर दिया ।  

१९६३ में हिन्दी जासूसी साहित्य जगत में अवतरित इस नायक का सौवां कारनामा तीस वर्ष बाद १९९३ में आया जिसका शीर्षक है – ‘गोली और ज़हर’ । चूंकि यह इस असाधारण नायक का सौवां उपन्यास था, इसलिए लेखक ने उपन्यास का फ़लक बहुत विस्तृत रखते हुए एक वृहत् कथानक रचा । आम तौर पर सुनील के उपन्यासों की कहानियाँ सुनील के साथ-साथ ही चलती हैं यानी कि पाठक वही जानता है जो कि सुनील जानता है और उपन्यास में ऐसे दृश्य नहीं होते जिनमें सुनील न हो; लेकिन एक विशिष्ट आयोजन के रूप में लिखे गए इस उपन्यास में लेखक को अपनी इस लीक से हटकर कई ऐसे दृश्य भी डालने पड़े जिनमें सुनील अनुपस्थित था । बहरहाल यह रहस्य-कथा बेहद दिलचस्प है जिसका आधार एक ऐसी हत्या है जो कि वस्तुतः गोली से हुई मगर जो ज़हर से भी होनी संभावित थी । किसी ने मक़तूल को ज़हर देकर मारने का इंतज़ाम किया मगर उसकी नौबत आने से पहले ही किसी और ने गोली मारकर उसी बात को अंजाम दे दिया । यही कारण है कि इस उपन्यास का नामकरण ‘गोली और ज़हर’ किया गया ।  

मक़तूल का नाम नरोत्तम ठाकुर था जो कि ऐसी दौलत पर क़ाबिज़ था जिसकी वास्तविक मालकिन उसकी बहन – चंद्रिका ठाकुर थी । नरोत्तम ठाकुर प्रह्लाद राय ठाकुर नाम के एक अमीर आदमी का गोद लिया हुआ बेटा था जिनकी पत्नी – लज्जारानी ठाकुर के विवाह के सोलह बरस बाद तक कोई संतान नहीं हो सकी । पर कुदरत का करिश्मा यह हुआ कि नरोत्तम को गोद लेते ही लज्जारानी ठाकुर गर्भवती हो गईं और उन्होंने चंद्रिका को जन्म दिया । जब वसीयत करने का सवाल आया तो प्रह्लाद राय ठाकुर गोद ली हुई औलाद को अपने ख़ून के बराबर का दर्ज़ा नहीं दे सके । उन्होंने चंद्रिका के नाम सारी संपत्ति लिख दी और नरोत्तम को महज़ गुज़ारे-भत्ते का हक़दार माना । माता-पिता के देहावसान के बाद जहाँ नरोत्तम व्यापार को संभालने लगा, वहीं चंद्रिका ऐशपरस्ती पर उतर आई और देश-विदेश घूमने लगी । एक बार वह सिंगापुर गई तो लौटी ही नहीं और नरोत्तम ने यह ज़ाहिर किया कि वह मर चुकी है और सारी जायदाद पर कब्ज़ा जमाकर ठाठ से रहने लगा । उसकी पहली पत्नी एक पुत्री – पंकज को जन्म देकर चल बसी और अपनी जन्मदात्री माता – चंद्रावती के निधन के बाद नरोत्तम ने अपनी पक्की उम्र में जबकि पंकज भी जवान हो चुकी थी, अपनी लंबी बीमारी के दौरान अपनी सेवा करने वाली युवा नर्स – नम्रता से विवाह कर लिया । उसकी हत्या के वक़्त उस घर के बाशिंदों में नम्रता और पंकज के अलावा चार नौकर और मोती नाम का एक बेहद ख़तरनाक कुत्ता शामिल थे । नौकरों में एक राममिलन नाम का बेहद स्वामीभक्त बूढ़ा नौकर जो कि मुख्यतः नरोत्तम की ही सेवा करता था, पुष्पा नाम की उम्रदराज हाउसकीपर और दो युवा नौकरानियां – कृष्णा और बॉबी थीं । घर से निकट से जुड़े लोगों में प्रदीप सक्सेना नाम का वकील, उसका ड्राइवर – सुभाष जो कि कृष्णा और बॉबी दोनों का ही प्रेमी रह चुका था, नम्रता का एक पुराना परिचित – श्याम भैया जो कि नरोत्तम की मौत की ख़बर पाते ही तुरंत दुबई से चला आया, पंकज के दो पुरुष-मित्र जो कि उससे विवाह करने के इच्छुक थे – कुँवर युद्धवीर सिंह और अंकुर सेठ, अंकुर सेठ के माता-पिता – दरबारी सेठ और दीपा सेठ, नरोत्तम का साझेदार – भूषण कंसल और उसकी युवा उच्छृंखल पत्नी – कल्पना थे । ज़ाहिर है कि ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं थी जिन पे क़त्ल का शुबहा किया जा सके ।  

लेकिन क़त्ल के इल्ज़ाम में गिरफ़्तार किया गया ज्योत्स्ना जोशी नाम की एक युवती को जिसके पिता – विश्वनाथ जोशी नरोत्तम की फ़र्म में हैड-कैशियर की नौकरी करते थे और जिन्हें फ़र्म से पच्चीस लाख रुपये के गबन के आरोप में जेल की सज़ा काटनी पड़ रही थी । क़त्ल के कुछ समय पहले ही ज्योत्स्ना को पता चला था कि नरोत्तम ने वह पच्चीस लाख रुपया अपने पल्ले से फ़र्म में जमा कराया था जबकि  नरोत्तम को यह पता चला था कि वह गबन वास्तव में फ़र्म के दूसरे साझेदार भूषण कंसल ने किया था । इस बाबत नरोत्तम को दीनानाथ चौहान नाम के फ़र्म के उस साझेदार का एक पत्र मिला था जो कि पहले फ़र्म में महज़ एक कैशियर था मगर इस घटना के बाद आनन-फ़ानन में फ़र्म का साझेदार बन बैठा था । उसने अपनी मृत्यु से पूर्व नरोत्तम को इस बाबत पत्र लिखकर सच्चाई बताई । इधर ज्योत्स्ना को  एकाएक चंद्रिका एक मानसिक चिकित्सालय में नज़र आई तो उसे सूझा कि वह इस तथ्य को नरोत्तम पर दबाव बनाने का ज़रिया बना सकती थी और उसे विवश कर सकती थी कि वह उसके निर्दोष पिता को जेल से रिहा करवाए । लेकिन जब वह इस सिलसिले में नरोत्तम से मिली थी तो इत्तफ़ाक़न उसका ड्राइविंग लाइसेन्स नरोत्तम के हाथ लग गया था और उसने ज्योत्स्ना को चोरी के झूठे इल्ज़ाम में गिरफ़्तार करवा दिया था । उपन्यास के नायक सुनील की मदद से वह पुलिस की हिरासत से छूटी थी क्योंकि कुछ समय तक ‘ब्लास्ट’ में नौकरी करने के कारण वह सुनील से पूर्व-परिचित थी । लेकिन ख़ास बात यह थी कि दीनानाथ चौहान के मृत्यु-पूर्व लिखे गए जिस पत्र की बिना पर ज्योत्स्ना अपने पिता के रिहा होने की आशा कर रही थी, वह पहले ही नरोत्तम के घर से चोरी हो चुका था । एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह भी था कि नरोत्तम को अपनी पुत्री – पंकज का कुँवर युद्धवीर सिंह से मिलना-जुलना बिलकुल पसंद नहीं था और इस बाबत उसकी न केवल पंकज से ज़ोरदार बहस हुई थी बल्कि वह स्वयं भी पंकज और युद्धवीर के ताल्लुकात की छान-बीन कर रहा था ।  

जब सुनील को नरोत्तम की हत्या का पता चला तो उसने अपने पास मौजूद सारे तथ्यों को, जमा इस तथ्य को कि घर का कुत्ता – मोती अचानक घर से भाग निकला था, इकट्ठा करके मामले की जांच-पड़ताल शुरू कर दी । उसके मददगार बने उसका कनिष्ठ पत्रकार – अर्जुन और उसका अभिन्न मित्र – रमाकांत मल्होत्रा । रमाकांत सुनील का हमउम्र एक पंजाबी नौजवान है जो कि यूथ क्लब के नाम से एक नाइट-क्लब चलाता है लेकिन वह सुनील की विभिन्न प्रकार की जानकारियां जुटाने में हमेशा मदद करता है । एकदम ख़ुशमिजाज़ रमाकांत हालांकि थोड़ा लालची है लेकिन सुनील की मदद वह केवल दोस्ती के नाते करता है । इस मामले में पुलिस का जाँच-अधिकारी इंस्पेक्टर प्रभुदयाल है जिससे सुनील का ‘कभी प्यार तो कभी तकरार’ का बड़ा पुराना रिश्ता है । सुनील प्रभुदयाल की उसकी कार्यकुशलता, कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए बड़ी इज़्ज़त करता है और प्रभुदयाल भी मूलतः सुनील को पसंद ही करता है लेकिन उसकी पुलिस से हमेशा दो हाथ आगे चलने की कोशिश उन दोनों को बार-बार आमने-सामने लाकर खड़ा कर देती है ।  

सुनील की खोजबीन आगे बढ़ती है तो उसे एक ओर तो यह पता चलता है कि ज्योत्स्ना को दिखाई देने की रात को ही चंद्रिका उस मानसिक चिकित्सालय से भाग निकली थी और दूसरी ओर उसे यह बात बड़ी दिलचस्प लगती है कि हालांकि नरोत्तम के क़त्ल के लिए सभी संबन्धित लोग शक़ के दायरे में आते हैं मगर कोई भी मक़तूल की बेवा – नम्रता पर शक़ करने को तैयार नहीं है । नम्रता की छवि हर एक की दृष्टि में ऐसी पवित्र है कि उस पर शक़ करना भी पाप लगता है । चाहे घर के नौकर हों या मक़तूल का वकील या फिर कोई और, सभी नम्रता को एक पूरी तरह से निष्ठावान पत्नी मानते हैं जिसने बूढ़े और बीमार नरोत्तम के लिए अपनी जवानी होम कर दी । नरोत्तम की मौत के दो दिन बाद जब घर की युवा नौकरानी कृष्णा को नौकरी से निकाल दिया जाता है तो वह सुनील के पास आकर उसे यह बताती है कि नरोत्तम रात को सोने से पहले गरम दूध में ओवल्टीन मिलाकर पीता था और जिस रात उसकी मौत हुई, उस ओवल्टीन के डिब्बे में किसी ने ज़हर मिला दिया था । यानी अगर नरोत्तम की मौत गोली से न होती तो ज़हर से तो उसका मरना वैसे भी तय ही था । वह इसका इल्ज़ाम नम्रता पर धरती है जिसने उसे अपने कंगन की चोरी के इल्ज़ाम में नौकरी से निकाला था । सुनील को घर की सबसे नई और कमउम्र नौकरानी – बॉबी बड़े चंचल स्वभाव की लगती है जिसका फ़ायदा उठाकर वह उससे दोस्ती गाँठता है ताकि उसके माध्यम से कुछ काम की जानकारी हाथ लग सके । इससे पहले कि नरोत्तम के हत्यारे का पता चले, दो क़त्ल और होते हैं । आख़िरकार हमारा नायक इस बेहद उलझे हुए मामले के सभी रहस्यों पर से परदा उठाने में कामयाब हो ही जाता है ।  

इस आलेख के पाठकगण कृपया यह न समझें कि मैंने उपन्यास का सारा कथानक यहाँ लिख दिया है तो उपन्यास पढ़ने की क्या ज़रूरत है । जैसे किसी अच्छी फ़िल्म का कथासार जान लेने के बाद भी उसका वास्तविक आनंद उसे देखकर ही लिया जा सकता है, उसी तरह से इस बेहतरीन उपन्यास का भी वास्तविक आनंद इसे पूरा पढ़कर ही आएगा । मैंने हत्याओं का रहस्य उजागर नहीं किया है और वह आपको इसे आद्योपांत पढ़कर ही पता चलेगा । 

इस उपन्यास का मूल्यांकन मैं दो दृष्टियों से करूंगा – पहले तो जिस तरह से एक मनोरंजक मसालेदार हिन्दी फ़िल्म में मूल कथानक में हास्य, भावनाओं और स्त्री-पुरुष प्रेम को जोड़ा जाता है ताकि दर्शक को सम्पूर्ण मनोरंजन मिल सके, उसी तरह से सुरेन्द्र मोहन पाठक ने इस उपन्यास में मूल रहस्य-कथा के साथ-साथ हास्य, मानवीय भावनाएं और प्रेम की भी भरपूर ख़ुराक पाठकों के लिए मुहैया की है । अपने प्रथम दृश्य से ही उपन्यास पाठक को अपने सम्मोहन में जकड़ लेता है और यह सम्मोहन उस पर अगले तीन सौ से भी अधिक पृष्ठों तक छाया रहता है । चाहे उपन्यास हो या फ़िल्म, उसका प्रथम उद्देश्य तो मनोरंजन ही होता है और इस उद्देश्य को पूरा करने में ‘गोली और ज़हर’ पूरी तरह से सफल है । अगर कोई सक्षम निर्देशक इस कथानक पर निष्ठापूर्वक फ़िल्म बनाए तो निस्संदेह वह एक व्यावसायिक दृष्टि से अत्यंत सफल फ़िल्म होगी जिसे भारतीय दर्शक हाथोंहाथ लेंगे ।  

अब दूसरी बात । चूंकि ‘गोली और ज़हर’ ऐसे वक़्त में आया था जब सस्ते लुगदी कागज़ पर छापे जाने और साज-सज्जा के मामले में इनकी गुणवत्ता कम होने के कारण ऐसे उपन्यासों को, चाहे वे सामाजिक हों या जासूसी, दोयम दरज़े का समझा जाता था । लेकिन केवल जासूसी कथानक या हलके स्तर के कागज़ और साज-सज्जा के आधार पर किसी कृति का मूल्यांकन करना उसके प्रति और उसके सृजन में लगे समय और श्रम के प्रति अन्याय ही है । अच्छा साहित्य वह है जो समाज का दर्पण हो, जो मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत हो, जिसके चरित्रों के साथ पाठक सामंजस्य स्थापित कर सके । सुरेन्द्र मोहन पाठक के अधिकतर उपन्यास इस कसौटी पर खरे उतरते हैं और ‘गोली और ज़हर’ उनमें से एक है । यह वह उपन्यास है जिसमें साहित्य के सभी नौ रस उपस्थित हैं । यह पाठक को हँसाता भी है, रुलाता भी है । दुनिया में हर तरह के लोग होते हैं और ‘गोली और ज़हर’ में पात्रों की विविधता इस तथ्य को मजबूती से स्थापित करती है । मैं पात्रों के चरित्र-चित्रण के माध्यम से इस बात को बेहतर तरीके से कह पाऊंगा :

             १. नरोत्तम ठाकुर :

नरोत्तम ठाकुर एक ऐसा व्यक्ति है जिसके साथ उसके पालक पिता ने वसीयत करते समय अन्याय किया जिसे वह अपने मन में स्वीकार नहीं कर सका । इसलिए जब उसे अपनी बहन को मुर्दा साबित करके जायदाद कब्ज़ाने का अवसर मिला तो वह उसे छोड़ नहीं सका । जब ज्योत्स्ना ने चंद्रिका के जीवित होने की बात को उजागर करने की धमकी दी तो अनायास ही हाथ लग गए उसके ड्राइविंग लाइसेन्स के आधार पर उसे झूठे आरोप में हवालात में पहुँचा देने का प्रलोभन भी वह संवरण नहीं कर सका जबकि वास्तव में उसे ज्योत्स्ना से सहानुभूति थी और वह उसके निरपराध पिता को सचमुच ही जेल से बाहर निकालने के लिए उचित कदम उठाना चाहता था । इससे पता चलता है कि मनुष्य का व्यक्तित्व कितना जटिल है । लेखक ने नरोत्तम को कहीं पर भी एक बुरे व्यक्ति के रूप में चित्रित नहीं किया है । वह अपनी बिना माँ की बेटी पंकज को बहुत प्यार करता है और उसके भले-बुरे के लिए एक अच्छे पिता की तरह फ़िक्रमंद रहता है । उसका व्यवहार अपने घर के नौकरों, वकील आदि के लिए भी मानवीय है । वह ज्योत्स्ना के पिता के साथ हुए अन्याय का प्रायश्चित्त करना चाहता है लेकिन साथ ही वह अपने साझेदार भूषण कंसल को भी उसके ग़लत काम की सफ़ाई का एक मौका न्यायोचित रूप से देना चाहता है । उसे अपनी बेटी के युद्धवीर सिंह से अवैध संबंध होने की बात पता चलती है तो वह बिना सोचे-समझे यूँ ही उस पर विश्वास कर लेने को तैयार नहीं होता और एक समझदार और परिपक्व व्यक्ति की तरह सच्चाई जानने की कोशिश करता है । उसने अपने से बहुत छोटी नम्रता से विवाह ज़रूर किया मगर वासना के वशीभूत होकर नहीं । पर एक साधारण मानव की तरह वह भी अपने ऊपर कोई विपदा नहीं देखना चाहता और उसे टालने के लिए कोई ग़लत काम भी करना पड़े तो करना उसे स्वीकार है । वह भीतर से कायर भी है और जब सुनील उससे थाने में जवाबतलबी करता है तो वह घबराकर ज्योत्स्ना के विरुद्ध अपनी शिकायत वापस ले लेता है । और यही मनुष्य का असली रूप है । कोई पूरी तरह से काला नहीं होता, कोई पूरी तरह से उजला नहीं होता । लगभग सभी का वास्तविक रंग सलेटी है । 

             २. नम्रता ठाकुर

कुछ साल पहले जब मैं न्यूक्लियर पॉवर कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड में नौकरी करता था तो मेरे बॉस – श्री अलगुवेल ने मुझे एक दिन मेरे हित में ही समझाते हुए कहा था – ‘माथुर, इमेज इज़ वैरी इम्पॉर्टेन्ट । यू नो दैट यू आर गुड एंड डिज़र्व गुड थिंग्स बट फॉर द वर्ल्ड, यू डोंट मैटर, युअर इमेज मैटर्स । हैन्स टेक प्रॉपर केअर ऑफ युअर इमेज । इन द प्रैक्टिकल वर्ल्ड, इट इज़ ईवन मोर इम्पॉर्टेन्ट दैन व्हाट यू एक्चुअली डू ।’ और सच भी यही है दोस्तों । दुनिया के लिए छवि ज़्यादा मायने रखती है बजाय आपकी वास्तविकता के । इस बात को सुरेन्द्र मोहन पाठक ने नम्रता के किरदार के माध्यम से बहुत अच्छी तरह से स्थापित किया है । उसने अपनी छवि को दूसरों के सामने इतने उम्दा ढंग से विकसित किया है कि कोई भूले से भी संभावित क़ातिल के रूप में उसके नाम पर विचार करने को तैयार नहीं । हमारे मुल्क की तो रीत ही यही है कि जो पकड़ा गया वो चोर है, जो बच गया वो सयाना है । चूंकि इस आलेख को पढ़ने वाले बहुत से लोग कार्यालयों में या कारख़ानों में नौकरी करते होंगे और वो जानते भी होंगे कि बॉस के सामने इमेज बनाना काम करने से भी ज़्यादा महत्व रखता है । ‘गोली और ज़हर’ में नम्रता को जानने वाला हर शख़्स उसकी तारीफ़ के पुल बांधने के अलावा उसके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता । और यही वो तथ्य है जो सुनील को खटकता है । ऐसी छवि अपने आप नहीं बनती, सप्रयास गढ़ी जाती है । नम्रता की तरह जो इस बात को जानता है, वो व्यावहारिक दुनिया में अपने से कहीं ज़्यादा काबिल लोगों से ज़्यादा कामयाब रहता है, अपने हक़ से ज़्यादा वसूल करता है । 

             ३. पंकज ठाकुर

आजकल के ज़माने में औलाद के लिए अपने माता-पिता को ग़लत समझना आसान है, सही समझना मुश्किल । पंकज आधुनिकता की हवा में और कल्पना कंसल जैसियों की संगत में ऐसी बही कि उसने अपने पिता के अपने लिए सच्चे प्यार को नहीं पहचाना और उनकी मृत्यु तक उन्हें ग़लत ही समझती रही । अपने पिता की सच्ची भावनाओं का भान उसे तब हुआ जब उसे उनकी वसीयत के प्रावधान पता चले । और तब उसने पछतावे के आँसू भी बहाए । लेकिन उसके पिता ने उसकी माँ के निधन के बाद माँ और बाप दोनों का प्यार देकर उसे ऐसे संस्कार दिए हैं कि बुरी संगत में पड़कर भी वह अपनी सीमाओं को पार नहीं करती । उसे बीवी के पैसे पर ऐश करने वाला एक निखट्टू अपने पति के रूप में कबूल नहीं । उसमें इतना साहस है कि कल्पना कंसल और युद्धवीर सिंह के मुँह पर उन्हें खरी-खरी सुना सके । इसीलिए संस्कारों का महत्व है जो कि बच्चे को इतना आत्मबल देते हैं कि वह अगर ग़लत रास्ते पर चला भी जाए तो बीच में ही वापस भी लौट सके । 

             ४. कुँवर युद्धवीर सिंह

आपमें से बहुत से लोगों ने ऐसे अक्खड़ लोग देखे होंगे जो अपने आगे किसी और को कुछ नहीं समझते । दूसरा जो भी कहे उसकी कोई कीमत नहीं, ख़ुद ने जो कह दिया वो पत्थर की लकीर समझा जाना चाहिए । अपनी हक़ीक़त खोखली होने के बावजूद दूसरों पर वक़्त-बेवक़्त रौब ग़ालिब करने वाले और दूसरों का फ़ायदा उठाने की फ़िराक़ में लगे रहने वाले ऐसे परजीवी लोगों से बचकर ही रहा जाना चाहिए और अगर संपर्क में आने के बाद उनकी सच्चाई पता लगे तो उनसे तत्काल कन्नी काटी जानी चाहिए । युद्धवीर सिंह एक ऐसा ही किरदार है जिसका चित्रण यह साबित करता है कि अनुभवी लेखक ने ज़िंदगी को बेहद करीब से देखा है और विभिन्न प्रकार के लोगों को अच्छी तरह से पहचाना है । 

             ५. अंकुर सेठ 

अगर आप किसी को चाहते हैं और आपको अपने किसी रक़ीब का पता चलता है तो आपके मन में यही आएगा कि या तो आपका जानेमन उस रक़ीब की नकारात्मक सच्चाई को पहचान कर उससे दूर हो जाए और आपके करीब आ जाए या फिर वह रक़ीब इस फ़ानी दुनिया से ही रुख़सत हो जाए । लेकिन अगर आप बहुत ज़्यादा पढ़े-लिखे और सफ़ेदपोश आदमी हैं तो आप उसकी मौत की दुआ जितनी आसानी से कर सकते हैं, उतनी आसानी से उसकी मौत का सामान नहीं कर सकते । अंकुर सेठ एक ऐसा ही किरदार है जो पंकज से मुहब्बत करता है और अपने रक़ीब के रूप में कुँवर युद्धवीर सिंह से नफ़रत करता है । लेकिन (मेरी तरह) एक चार्टर्ड एकाउंटेंट और संभ्रांत परिवार का होने के कारण वह युद्धवीर सिंह को कोस ही सकता है और कोशिश कर सकता है कि पंकज उसकी असलियत को पहचान कर उससे नाता तोड़ ले । उसमें ख़ुद युद्धवीर को रास्ते से हटा देने की हिम्मत नज़र नहीं आती । लेकिन ख़ूब पढ़ा-लिखा, दुनियादार और समझदार आदमी होने के नाते वह मामले की बारीकियों को समझकर उन पर तबसरा कर सकता है और क़त्ल की कई परिकल्पनाएं गढ़ सकता है । उसका और सुनील का विस्तृत वार्तालाप उसके व्यक्तित्व की इन विशेषताओं को भली-भाँति स्थापित करता है ।  

६. सुभाष

सुभाष नरोत्तम ठाकुर के वकील प्रदीप सक्सेना का ड्राइवर है और ऐसी तबीयत का युवक है जिसे अपना पेशा दोयम दरज़े का लगता है । उसे सूट-बूट डाटकर की जाने वाली नौकरी अगर आधी तनख़्वाह पर भी मिल जाए तो वह करने को तैयार है । फ़िल्मी तर्ज़ पर सपनों की दुनिया में खोए रहने वाले बहुत सारे युवकों की तरह वह भी ख़याली पुलाव पकाता है कि उसे एक ऑफ़िस में नौकरी मिल जाती है और वहाँ बॉस की सेक्रेट्री उस पर फ़िदा हो जाती है । ऐसे युवक मैंने अपनी ज़िंदगी में भी देखे हैं और जिन दिनों मैं कलकत्ता में चार्टर्ड एकाउंटेंसी का कोर्स कर रहा था, उन दिनों मैं ख़ुद भी ऐसा ही था । अपनी इसी अपरिपक्वता के चलते सुभाष कृष्णा के सच्चे प्यार को नहीं पहचान पाता और ज़्यादा चमक-दमक वाली बॉबी उसे अपनी ओर खींच लेती है । मगर एक सच्चे आशिक़ की तरह आख़िर वह अपनी भूल को पहचान कर कृष्णा के पास लौट जाता है ।  

७. बॉबी

सुरेन्द्र मोहन पाठक कहा करते हैं कि लड़की ख़ूबसूरत हो और अनजान हो, यह तो हो सकता है मगर वो अपनी ख़ूबसूरती से अनजान हो, यह नहीं हो सकता । बॉबी उन ढेरों आधुनिक लड़कियों में से है जो न केवल जानती हैं कि वे ख़ूबसूरत हैं बल्कि अपनी खूबसूरती का अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करना भी बख़ूबी जानती हैं । बॉबी न केवल अपनी बढ़ा-चढ़ा कर पेश की गई ख़ूबसूरती के दम पर सुभाष को कृष्णा से अलग कर देती है बल्कि वह घर के अंदर और बाहर भी अपने आकर्षण और मीठी-मीठी बातों को कैश करते हुए कृष्णा के मुक़ाबले फ़ायदे में ही रहती है । नौकरानी होकर भी उसका दिमाग ऐसा तेज़ है कि वह ख़ुद तो अपनी ख़ूबसूरती और बातों से दूसरों को बेवकूफ़ बना सकती है, कोई उसे बेवकूफ़ नहीं बना सकता । उस घुटी हुई लड़की की इस ख़ासियत का पता सुनील को तब चलता है जब वह उसे महंगे रेस्तरां में ड्रिंक-डिनर करवा के उससे कंगन की चोरी का राज़ उगलवाने की कोशिश करता है और नाकाम होता है ।  

            ८. राममिलन

आपने बुज़ुर्गों के ज़माने के वफ़ादार नौकर तो देखे होंगे । ऐसे नौकर जो नमक का हक़ अदा करने के लिए मालिक के वास्ते अपनी जान तक निसार कर दें । अब चाहे ऐसे नौकर न होते हों, सामंतवादी युग की यादगार ऐसे नौकर पहले निश्चय ही हुआ करते थे जिन्हें अपने से ज़्यादा अपने मालिक का ख़याल रहता था । राममिलन एक ऐसा ही नमकख़्वार नौकर है जिसकी नरोत्तम ठाकुर के लिए स्वामिभक्ति केवल उसके कार्यकलापों में ही नहीं, बल्कि उसकी बातचीत में भी झलकती है । इस बात की उसके चेहरे पर ऐसी स्पष्ट छाप है कि सुनील उसके मुँह से एक शब्द भी सुने बग़ैर उससे प्रभावित हो जाता है ।  

            ९. प्रदीप सक्सेना

प्रदीप सक्सेना नरोत्तम ठाकुर का वकील है और नरोत्तम की मृत्यु के बाद न केवल वह उसकी बदली जाने वाली वसीयत के प्रावधानों की बाबत पुलिस से सहयोग नहीं करता बल्कि नम्रता की लल्लो-चप्पो करता है और उसे यह जताने की कोशिश करता है कि वह उसकी तरफ़ है । कोई जवान औरत अगर विधवा हो जाए और तुर्रा यह कि वह एक अमीर आदमी की विधवा हो तो तथाकथित समझदार लोगों का नज़रिया क्या हो जाता है, यह प्रदीप सक्सेना के व्यक्तित्व से भाँपा जा सकता है । पहले वह सुनील के सामने ग़लती से कह बैठता है कि नरोत्तम ठाकुर की मौत के तुरंत बाद श्याम भैया के दुबई से आ जाने के पीछे शायद नम्रता का ही हाथ है मगर बाद में दोबारा बातचीत के दौरान वह इससे मुकर जाता है । ईमानदार और कर्तव्यपरायण पुलिस अधिकारी इंस्पेक्टर प्रभुदयाल को वह अंततः सहयोग देता भी है तो हेकड़ी जमाकर । ऐसे वकीलों की कोई कमी नहीं है हिंदुस्तान में । यहाँ फिर वही बात आती है कि वास्तविक जीवन के चरित्र पूर्णतः काले या उजले नहीं होते, सलेटी होते हैं ।  

            १०. इंस्पेक्टर प्रभुदयाल

इंस्पेक्टर प्रभुदयाल सुनील सीरीज़ के उपन्यासों का स्थाई पात्र है लेकिन इस उपन्यास के संदर्भ में मैं उसका ज़िक्र विशेष रूप से इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि उसकी और सुनील की मुलाक़ातें ज़िंदगी के व्यावहारिक स्वरूप को प्रस्तुत करती हैं । उपन्यास के पहले ही दृश्य में वह सुनील की चाय-कॉफ़ी आदि से ख़ातिर करने से साफ़ मना कर देता है और उसे दो टूक कहता है कि थाना न तो उसका घर है और न ही सुनील उसका मेहमान है । लेकिन बाद में जब ‘ब्लास्ट’ में छपी ख़बर पढ़कर उसे सुनील से कुछ बातें उगलवानी होती हैं तो वह उसे कॉफ़ी पिलाता है क्योंकि उस वक़्त व्यावहारिकता का तक़ाज़ा यही होता है । प्रभुदयाल एक कर्तव्यनिष्ठ और योग्य पुलिस अधिकारी है और सत्य यही है कि ऐसे पुलिस अधिकारी भारत में चाहे बहुत कम ही क्यों न रह गए हों, उनकी नस्ल अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हो गई है । अपने फ़र्ज़ को अंजाम देने के लिए वह साम-दाम-दंड-भेद सभी तरह के तरीके अपनाने को तैयार रहता है । लेकिन किसी बेगुनाह को सताना या अपनी वर्दी की ताक़त का बेजा इस्तेमाल करना उसे गवारा नहीं । जब वकील प्रदीप सक्सेना से वह नरोत्तम ठाकुर की वसीयत की बाबत वांछित जानकारी नहीं निकलवा पाता तो उसकी लाचारी ज़ाहिर हो जाती है और हम जान जाते हैं कि हिंदुस्तान के मौजूदा निज़ाम में एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी के हाथ कितने तरीकों से बंधे होते हैं ।  

‘गोली और ज़हर’ में किरदार इतने ज़्यादा हैं कि सभी के बारे में ठीक तरह से बताने से यह आलेख ज़रूरत से ज़्यादा विस्तृत होकर अपने आप में ही एक लघु उपन्यास की सूरत अख़्तियार कर लेगा । यह उपन्यास एक बड़ा कैनवास है जिस पर अनुभवी लेखक ने एक कुशल चित्रकार की तरह जीवन के सारे रंगों को सही मिक़दार में सही तरतीब से उकेरा है और जो चित्र बना है, वह बेहद ख़ूबसूरत है । माँ-बाप का गोद लिए बच्चे और अपने ख़ून में फर्क करना, ईर्ष्या, लालच,  डर,  भावनाएं,  स्वामिभक्ति,  प्रेम,  वासना,  फ़रेब,  पारिवारिक संबंध और हास्य; क्या नहीं है इसमें ?  यह रहस्य-कथा किसी साहित्यिक कृति से किसी भी तरह कम नहीं है । पढ़कर देखिए और उसके बाद फ़ैसला कीजिए कि मैंने सही कहा या ग़लत ।  

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शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

संत-सेवा


भारतीय संस्कृति में संतों को अत्यंत उच्च स्थान दिया गया है । संतों का संग, संतों की वाणी का आस्वादन एवं संतों की सेवा सांसारिक प्राणियों हेतु  सराहनीय एवं वांछनीय कृत्य माने गए हैं । संत उन्हें कहा जाता है जो वीतरागी हैं, सांसारिक जीवन से परे हैं एवं मानव-मात्र के कल्याण का चिंतन करते हैं । ईसाई धर्म में संत की उपाधि महान कार्य करने वाले लोगों को दी जाती है । मानव-मात्र की सेवा में अपना जीवन होम कर देने वाली मदर टेरेसा को भी अब संत के समकक्ष मान लिया गया है । किन्तु भारतीय परंपरा में संत से अभिप्राय है मन से पवित्र व्यक्ति चाहे उसने संसार त्यागा हो अथवा वह सांसारिक जीवन में रहते हुए भी ईश्वर एवं मानवता के प्रति तन-मन-धन से समर्पित रहता हो । संत कबीर एक ऐसे ही संत थे जो कि सांसारिक जीवन में रहकर भी संत कहलाए क्योंकि उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व पवित्र था और उनके आत्मबल ने उन्हें विभिन्न धर्मों के पाखंडों पर प्रहार करने की शक्ति और साहस प्रदान किया था । यदि प्राचीन संतों की बात करें तो न केवल वैदिक युग के हमारे ऋषि-मुनि गृहस्थ होकर भी धर्म-पालन एवं ईश्वरोपासना करने वाले संत थे वरन मिथिला-नरेश जनक को तो एक राजा होकर भी संत माना गया क्योंकि वे मन से पवित्र थे और कर्तव्य-पालन में रत रहते हुए भी सांसारिक सुख-भोगों से पूर्णतः निर्लिप्त रहते थे । स्पष्ट है कि संत होने का अभिप्राय किसी विशेष वेश-भूषा में रहने, घर-बार छोड़कर भटकने, अविवाहित रहने एवं भूखे रहकर तप करने से नहीं है वरन मन से निर्लिप्त होने से है, मोह-माया से मुक्त होकर निर्विकार भाव से अपना कर्तव्य-पालन करने एवं ईश्वर का स्मरण करते हुए उसके उत्तरोत्तर निकट जाने से है । संत वह है जिसे संसार के समस्त व्यापार छूकर निकल जाते हैं किन्तु वह उनके संपर्क में आकर भी उनसे प्रभावित नहीं होता, अपने पथ से विचलित नहीं होता । वह मन से संन्यासी होता है, चाहे प्रकट रूप से वह सामान्य व्यक्ति के रूप में ही रहे ।

आइए, अब समझें कि सेवा क्या है ? सेवा से आशय है किसी की देखभाल या सुश्रूषा । समष्टिगत अर्थ में सेवा से अभिप्राय किसी संगठन अथवा समाज अथवा राष्ट्र अथवा सम्पूर्ण मानवता के प्रति एकनिष्ठ समर्पण से है । किन्तु वह सेवा सेवा नहीं है जो मेवा पाने के लिए की जाए । वही सेवा सच्ची सेवा है जो कि निष्काम भाव से की जाए, जिसके करने के पीछे कुछ प्रतिदान मिलने की भावना उपस्थित न हो । कुछ पाने के लिए यदि सेवा की तो वह सेवा नहीं, लेन-देन से युक्त व्यवसाय हुआ । सेवा वह है जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान चीन में महान भारतीय चिकित्सक डॉक्टर कोटणीस ने सैनिकों की की, सेवा वह है जो विश्व की महान परिचारिका फ़्लोरेंस नाइटिंगेल ने आजीवन रोगियों की की, सेवा वह है जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भारतीय समाज के दीनदुखियों की बिना किसी सामाजिक भेदभाव के की । सेवा का अर्थ अत्यंत व्यापक है । सिरदर्द से पीड़ित व्यक्ति का सिर दबा देने एवं घायल व्यक्ति की मरहम-पट्टी कर देने से लेकर संसार भर की छोटी-बड़ी सुश्रूषाएँ सेवा के अंतर्गत आती हैं । किसी की अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रकार की गई सहायता जो कि दृष्टिगोचर भी न हो, भी सेवा ही कही जाएगी ।

अब प्रश्न यह है कि संत-सेवा किसे कहें ? क्या संतों के आश्रम अथवा निवास-स्थान में उनके साथ रहते हुए उनकी नियमित रूप से की गई सुश्रूषा को संत-सेवा कहा जाए ? आज के समय में तो संतों की सही-सही पहचान करना भी कोई सरल कार्य नहीं क्योंकि भारत देश या यूं कहा जाए कि सम्पूर्ण विश्व ही पाखंडियों से भरा पड़ा है । ऐसे में सेवा करने से पहले पात्र-कुपात्र का विचार कर लेना भी आवश्यक हो गया है । सच्चे संतों को तो सेवा की आवश्यकता भी नहीं होती । वे तो स्वयं ही दूसरों की सेवा करते हैं, किसी से अपनी सेवा करवाते नहीं ।

मेरा विचार यह है कि संत-सेवा से आशय है संतों का संग एवं उनसे सद्गुणों को ग्रहण किया जाना । व्यक्ति का संग ही उसके व्यक्तित्व को सात्विक या तामसिक दिशा में अग्रसर करता है । अतः सत्संग का मानव-जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है । संतों या सत्पुरुषों के संग से उनके व्यक्तित्व की सुगंध संग करने वाले मनुष्य के व्यक्तित्व को भी सुवासित कर देती है । उनके सद्गुण उस पर भी प्रभाव डालते हैं । उनसे जुड़े वातावरण एवं उनके आभामंडल से तो पशुपक्षी तक अछूते नहीं रह पाते । ऐसे में मानव की तो बात ही क्या ? उनके साथ रहते हुए यदि उनकी कुछ सेवाटहल करने का अवसर प्राप्त हो जाए तो इसे संग करने वाले का परम सौभाग्य ही कहा जाएगा । 

मेरे निकट माता-पिता एवं गुरु की सेवा करना भी संत-सेवा ही है । सौभाग्य से मुझे अपने वयोवृद्ध संगीत शिक्षक पंडित नारदानन्द शास्त्री जी के सान्निध्य में रहकर उनसे संगीत का ज्ञान प्राप्त करने एवं उसके साथ-साथ उनकी सेवाटहल करने का अवसर मिला । वे एक प्रकार के संत ही थे जिन्होंने अपना जीवन अधिकांश समय एकाकी रहकर वानप्रस्थ करते हुए संगीत-साधना में बिताया तथा बिना किसी लालच के अपना संगीत-ज्ञान नई पीढ़ी को हस्तांतरित किया । संगीत की अनमोल निधि अपने पास होते हुए भी वे निर्धन ही रहे तथा अपनी निर्धनता पर उन्हें कभी संताप नहीं हुआ क्योंकि उनका संगीत उनके लिए ईश्वर था तथा उसकी सतत  साधना ही उनके लिए ईश्वर की आराधना थी । उनके जीवित रहते जितना भी समय मुझे उनकी छोटी-मोटी सुश्रूषा का मिला, वह मेरा अहोभाग्य रहा । उनके निवास-स्थान पर उनसे संगीत का ज्ञान लेने के साथ-साथ उनके घर के छोटे-छोटे काम कर देना, उनकी आवश्यकता की वस्तुएँ ला देना, उन्हें भोजन करा देना एवं अपने आदर से उन्हें यह अनुभूत कराना कि वे एकाकी नहीं हैं, उनकी परवाह करने वाले भी हैं; मेरे लिए एक प्रकार की संत-सेवा ही थी । और इस संत-सेवा से मुझे मिला एक ऐसा संतोष जिसका मूल्य नहीं आँका जा सकता । आज वे इस संसार से विदा हो चुके हैं लेकिन उनके सान्निध्य में बीता समय, उनकी सेवा में बीते पल एवं उनके सत्संग की स्मृतियाँ मेरी वह संपत्ति है जिसे कोई लूट नहीं सकता, कोई मुझसे छीन नहीं सकता । यह है संत-सेवा का मूल्य जिसे भौतिक मापदण्डों से आकलित नहीं किया जा सकता ।

अपने इस अनुभव के आधार पर मैं यह निस्संकोच कह सकता हूँ कि संत-सेवा से आशय है संतों के संग से अपने व्यक्तित्व को निर्मल बनाते हुए सन्मार्ग पर चलना । वस्तुतः मानवता की सेवा में ही संत-सेवा एवं ईश्वर-सेवा दोनों समाहित हैं । जो इस संत-सेवा को पूर्ण निरासक्त भाव से बिना किसी अपेक्षा के अनवरत करता रहेगा, बहुत संभव है कि वह एक दिन स्वयं ही संत बन जाए । मदर टेरेसा ने निःस्वार्थ भाव से आजीवन मानव-मात्र की सेवा की । यह उनकी संत-सेवा थी जिसने एक दिन उन्हीं को संत के स्थान पर प्रतिष्ठित कर दिया । महात्मा गांधी जीवन-भर दीनदुखियों में ही ईश्वर के दर्शन करते रहे और उन्हीं की सेवा करते-करते स्वयं साबरमती के संत कहलाने लगे । अतः संतों को पहचानिए, संत-सेवा कीजिए तथा सत्संग से स्वयं को बिना किसी अपेक्षा के स्वाभाविक रूप से लाभान्वित होने दीजिए । आपके जीवन में आनंद उस द्वार से प्रवेश कर जाएगा जिसके खुले होने का आपको भान भी नहीं होगा ।

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गुरुवार, 26 नवंबर 2020

मर्यादा

मर्यादा से अभिप्राय है व्यवहार की स्वीकार्य सीमा । अतः मर्यादाएँ जुड़ी होती हैं सम्बन्धों से, पद अथवा प्रस्थिति से, सामाजिक व्यवहार से एवं वाणी से । भारतीय परंपरा में मर्यादा के निर्वाह की बड़ी महिमा है । हिंदुओं के आराध्य भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहकर सम्मानित किया गया है । उन्होंने कुल एवं सम्बन्धों की मर्यादाओं का एवं कालांतर में अपने पद एवं कर्तव्य से जुड़ी मर्यादाओं का अनुपालन किया एवं उन्हें अक्षुण्ण बनाए रखा, इसीलिए वे नरश्रेष्ठ कहलाए, पुरुषों में उत्तम माने गए । 

अब प्रश्न यह है कि मर्यादा की इतनी महिमा क्यों ? क्या कारण है कि मर्यादा का पालन वांछनीय एवं प्रशंसनीय है जबकि इसके विपरीत मर्यादा का उल्लंघन अवांछनीय एवं त्याज्य ? इसके लिए हमें यह बात समझनी होगी कि प्रकृति ने मनुष्यों एवं प्राणियों की ही नहीं, विभिन्न निर्जीव वस्तुओं की भी मर्यादाएँ नियत की हैं । मर्यादा का संबंध है व्यवस्था से । सम्पूर्ण सृष्टि की विभिन्न व्यवस्थाओं का आधार है उन व्यवस्थाओं के विभिन्न अंगों द्वारा अपनी-अपनी मर्यादाओं का पालन । ज़रा सोचिए कि यदि एक नदी अपनी मर्यादा भूलकर अपने बंध तोड़ दे तो क्या होगा, यदि समुद्र अपनी मर्यादा तोड़कर सम्पूर्ण पृथ्वी पर जलप्लावन करने चल पड़े तो क्या होगा, यदि पर्वत अपनी मर्यादा छोड़कर अपने स्थान से इधर-उधर खिसक जाएँ तो क्या होगा, यदि विभिन्न ग्रह अपनी-अपनी कक्षाओं की मर्यादा लांघकर अंतरिक्ष में स्वच्छंद निकल पड़ें तो क्या होगा, यदि वन के हिंस्र पशु अपनी मर्यादा से बाहर निकलकर बस्तियों में आ जाएँ तो क्या होगा, यदि ऋतुचक्र अपनी मर्यादा भूल जाए तथा नियत समय पर ऋतु-परिवर्तन होने रुक जाएँ तो क्या होगा ? इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही है – विनाश । यदि संसार को विनाश से बचना है और उत्तरजीवी बने रहना है तो यह अपरिहार्य है कि कोई भी वस्तु – चाहे छोटी हो अथवा बड़ी – अपनी मर्यादा को किसी भी स्थिति में न भूले । 

सांसारिक व्यवस्थाओं के आधार हैं समाज, समुदाय एवं संस्कृति एवं इन सभी की मूल इकाई है – व्यक्ति अथवा मनुष्य । चूंकि ये सभी व्यवस्थाएँ अमूर्त हैं जबकि व्यक्ति इनका मूर्त प्रतीक है जिसकी गतिविधियों एवं व्यवहार से ये व्यवस्थाएँ अपना अस्तित्व पाती है एवं उत्तरोत्तर आगे बढ़ती हैं, अतः व्यक्ति के लिए उसका समाज कतिपय मर्यादाएँ नियत करता है । आज के व्यक्तिपरक एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानने वाले युग में भी सामाजिक मर्यादाओं का मूल्य कम नहीं हुआ है । व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह समाज द्वारा निर्धारित मर्यादाओं के अनुरूप ही अपने आचरण को ढाले । यदि वह ऐसा नहीं करता तो इसे समाज के अहित में माना जाता है तथा समाज व्यक्ति को दंडित करता है । 

जो बात व्यक्ति पर समाज की मूल इकाई के रूप में लागू है, वही बात उस पर राष्ट्र के नागरिक के रूप में भी लागू है । न केवल व्यक्ति से राष्ट्र के लिखित एवं औपचारिक कानूनों को मानने की अपेक्षा की जाती है तथा उनके उल्लंघन पर उसे कानून द्वारा उक्त अपराध हेतु निर्धारित दंड दिया जाता है, वरन् उससे राष्ट्र का एक आदर्श नागरिक बनने की अलिखित अपेक्षा भी की जाती है । यह भी उसके व्यवहार की मर्यादा का ही अंग है । राष्ट्र के नागरिक से कोई भी ऐसा कार्य जो कि राष्ट्र के अथवा आमजन के हित में न हो, चाहे वह कानूनी रूप से अपराध न भी हो; न करना अपेक्षित होता है । 

व्यक्ति के बाद समाज की अगली वृहत्तर इकाई है परिवार । भारतीय परिवेश में परिवार को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है एवं ऐसा लाखों बार हो चुका है जब परिवार के हित के लिए अथवा कुल की मर्यादा के लिए व्यक्ति ने आत्म-बलिदान दिया हो अथवा अपने निजी सुख को परिवार पर निछावर कर दिया हो । इसका कारण यह है कि कुल की मर्यादा कुल की सामाजिक प्रतिष्ठा की प्रतीक मानी गई है। भारतीय सामाजिक सरंचना सदा से इस प्रकार की रही है कि यदि परिवार के किसी सदस्य ने कुल की मर्यादा का उल्लंघन किया तो उसका परिणाम परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाला रहा । पुरुष-प्रधान भारतीय समाज में परिवार अथवा कुटुंब की मर्यादाओं के अनुपालन का अधिक दायित्व नारियों पर डाला गया तथा यही कारण रहा कि वे लंबे समय तक मर्यादाओं के बंधनों में छटपटाती रहीं एवं उन्हें अपनी कामनाओं, सुखों एवं महत्वाकांक्षाओं को छोड़कर मन मारकर जीना पड़ा । पुरुषों के पास सभी अधिकार रहे जबकि नारी को परिवार की धुरी बताकर बिना अधिकार के ही कर्तव्य-पालन एवं मर्यादा-पालन के समस्त दायित्व उस पर लाद दिए गए । परिणामतः पारंपरिक भारतीय समाज में नारियों को पुरुषों की तुलना में बहुत अधिक बलिदान करने पड़े और आज भी करने पड़ते हैं । 

प्रश्न यह है कि मर्यादा-पालन अच्छा है या बुरा । इसे सही माना जाए या ग़लत । इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है क्योंकि बहुत-सी बातों का औचित्य अथवा अनौचित्य सापेक्ष होता है जिसका निर्णय संदर्भों के आधार पर करना पड़ता है । जैसा कि मैंने पहले कहा कि नदी, समुद्र, पर्वत, आकाशीय पिंड, पशु-पक्षी आदि सभी से अपनी-अपनी मर्यादाओं में रहना अपेक्षित है ताकि सृष्टि का व्यापार अनवरत एवं सुचारु रूप से चल सके । यदि सम्बन्धों की मर्यादाओं का खयाल न रखा जाए तो सम्बन्धों का अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है । यदि पद की गरिमा एवं मर्यादा का खयाल न रखा जाए तो उससे जुड़े दायित्वों को निभाना असंभव की सीमा तक कठिन हो सकता है । यदि वाणी की मर्यादा को बनाकर न रखा जाए तो अनेक अनचाही विपत्तियों का सामना करना पड़ सकता है । ऐसे में मर्यादा-पालन को उचित ही समझा जाना चाहिए । 

आज मनुष्य प्रकृति द्वारा नियत नियमों एवं मर्यादाओं को विस्मृत कर बैठा है जिसके कारण पर्यावरण-क्षय एवं प्राकृतिक आपदाओं की समस्या उत्तरोत्तर भीषण होती जा रही है । मनुष्य को ईश्वर ने बुद्धि देकर सर्वश्रेष्ठ प्राणी के रूप में सृजित किया किन्तु मनुष्य भौतिक लालसाओं एवं अस्थाई सुखों के आकर्षण के चलते अपनी मर्यादाओं को बिसरा रहा है, नैसर्गिक कर्तव्यों की ओर से आँखें मूँदे बैठा है । वह विवश कर रहा है अन्य प्राणियों को उनकी मर्यादाओं को छोड़ने के लिए । वह विवश कर रहा है प्रकृति के विविध रूपों को अपनी मर्यादाओं की सीमा से बाहर निकलने के लिए तथा मानव-जाति का विनाश करने के लिए । वन-सम्पदा के विनाश के चलते मरुस्थल अपनी मर्यादा तोड़कर आगे फैलते जा रहे हैं जबकि उपजाऊ मैदान सिकुड़ते जा रहे हैं, कभी नदियां मार्ग छोड़कर विनाश-लीला करने लगती हैं तो कभी समुद्र सुनामी का अवांछनीय उपहार लेकर आ जाता है, पर्वतों पर बर्फ कम जम रही है तथा ग्लेशियरों का पिघलना यह संकेत दे रहा है कि वर्तमान सभ्यता पर संकट के मेघ मंडरा रहे हैं । साथ ही युवा पीढ़ी के दोषपूर्ण समाजीकरण के कारण समाज के विभिन्न अंग तुच्छ हितों के लिए अपनी मर्यादाएँ तोड़ रहे हैं तथा नई पीढ़ी को क्षणिक आनंद प्रत्येक मर्यादा से ऊपर लगने लगा है । परिणामतः सामाजिक व्यवस्था तथा सांस्कृतिक धरोहर का निरंतर क्षरण हो रहा है । 

निष्कर्ष यही है कि यद्यपि आज के व्यक्तिपरक युग में जबकि निजी स्वतन्त्रता एक जीवन-मूल्य बन चुकी है, मर्यादा के नाम पर किसी भी व्यक्ति पर कुछ थोपा नहीं जाना चाहिए किन्तु जो मर्यादाएँ वृहत् व्यवस्थाओं के अस्तित्व एवं विकास के लिए अपरिहार्य हैं, उनके मूल्य को समझना तथा उनका निष्ठापूर्वक अनुपालन किया जाना अत्यंत आवश्यक है । स्मरण रहे कि जब माता सीता ने लक्ष्मण-रेखा की मर्यादा का उल्लंघन किया तो मात्र उनके ही नहीं, रामायण के अनेक चरित्रों के जीवन में कैसे पीड़ाजनक मोड़ आए । अतः आइए, मर्यादाओं को मात्र बंधन न मानकर सांसारिक जीवन का एक अनिवार्य अंग मानें एवं उनके महत्व को समष्टिगत संदर्भों में समझें ।

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सोमवार, 16 मई 2011

भारतीय खेलों के गौरव – प्रकाश पादुकोण


मॉडल से अभिनेत्री बनीं आज की चोटी की सिने तारिका – दीपिका पादुकोण का नाम तो लगभग सभी जानते हैं लेकिन उनके प्रशंसकों को मैं यह बताना चाहता हूँ कि उनके पिता प्रकाश पादुकोण उनसे कई गुणा अधिक सफल एवम् चर्चित रहे हैं । आज से तीन दशक पहले प्रकाश पादुकोण का नाम भारत के हर खेल-प्रेमी की ज़ुबान पर हुआ करता था ।

१९५५ में कर्नाटक के एक बैडमिंटन-प्रेमी परिवार में जन्मे प्रकाश को खेल का वातावरण बचपन से ही मिला । जब बालक प्रकाश ने खिलाड़ी बनने का निर्णय लिया तो उसे टेनिस खेलने की सलाह देने वाले कई लोग मिले जिन्होंने उससे कहा कि टेनिस में तो बड़े-बड़े इनाम होते हैं, खिलाड़ी एक मुक़ाबले में ही बन जाता है वग़ैरह । पर प्रकाश के मन में जो बात थी वो यह थी कि दो ही तो खेल हैं जिनमें एशिया का बोलबाला है – हॉकी और बैडमिंटन । अतः उन्होंने बैडमिंटन को अपनाने का निर्णय लिया ।
 
प्रकाश ने बैडमिंटन की दुनिया में किशोरावस्था से ही अपना नाम चमकाना शुरू कर दिया । मात्र चौदह वर्ष की आयु में ही अपनी धुन का पक्का यह बालक देश का जूनियर नंबर एक खिलाड़ी बन गया । १९७१ में मात्र सोलह वर्ष की आयु में राष्ट्रीय बैडमिंटन प्रतियोगिता में पहले प्रकाश ने जूनियर ख़िताब जीता और दो दिन बाद ही फ़ाइनल में देश के धुरंधर खिलाड़ी देवेन्द्र आहूजा को हराकर सीनियर ख़िताब भी जीत लिया. यह पहला अवसर था जब किसी खिलाड़ी ने जूनियर और सीनियर दोनों ख़िताब एक साथ जीत लिए हों । उसके बाद तो राष्ट्रीय प्रतियोगिता जीतने का सिलसिला ही चल पड़ा । एक-दो-तीन बार नहीं, पूरे नौ बार लगातार राष्ट्रीय प्रतियोगिता जीतकर प्रकाश ने रिकॉर्ड कायम किया । प्रकाश का यह रिकॉर्ड आज तक भी नहीं टूटा है ।

राष्ट्रीय स्तर पर अपना दबदबा क़ायम कर लेने के बाद प्रकाश ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करना आरम्भ किया यद्यपि वे १९७४ में तेहरान (ईरान) में हुए एशियाई खेलों में कांस्य पदक विजेता भारतीय दल के सदस्य रहे, तथापि शुरूआती कुछ सालों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी सफलता सीमित ही रही और विश्व के नामचीन खिलाड़ियों में उनकी गिनती नहीं हुई । १९७८ में एडमंटन (कनाडा) में हुए राष्ट्रकुल खेलों में बैडमिंटन के एकल मुकाबलों के फ़ाइनल में इंग्लैंड के डेरेक टालबोट को हराकर प्रकाश ने भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता । प्रकाश की इस स्वर्णिम सफलता पर देश में ख़ुशी की ऐसी लहर दौड़ी कि भारतीय संसद में लड्डू बांटे गए । यह प्रकाश की सफलता का ही प्रेरक प्रभाव था कि चार साल बाद ब्रिसबेन (ऑस्ट्रेलिया) में हुए राष्ट्रकुल खेलों में प्रकाश की अनुपस्थिति में सैयद मोदी ने भी इस स्वर्णिम सफलता को दोहराकर दिखा दिया ।

प्रकाश के खेल का जादू अब बैडमिंटन-प्रेमियों के सर चढ़कर बोलने लगा । १९७९ में इंग्लैंड में हुई ‘ईवनिंग ऑव चैंपियंस’ में विश्व के नामी बैडमिंटन खिलाड़ी इकट्ठे हुए । दुनिया के श्रेष्ठ खिलाड़ियों की उपस्थिति में प्रकाश ने उसमें विजेता होने का गौरव पाया । इस जीत के बाद प्रकाश को बैडमिंटन का विश्व चैम्पियन घोषित किया गया और तब भारतीय खेल जगत को यह एहसास हुआ कि प्रकाश के रूप में संसार में भारत का नाम रौशन करने वाला एक असाधारण खिलाड़ी सामने आया है ।
प्रकाश के खेल-जीवन का चरम मार्च १९८० में आया जब उन्होंने केवल दो सप्ताह के भीतर स्वीडिश ओपन, डेनिश ओपन और ऑल इंग्लैंड जैसी तीन बड़ी प्रतियोगिताएं लगातार जीतकर अपने खेल का डंका सारी दुनिया में बजा दिया । इनमें से तीसरी सफलता सबसे बड़ी और सबसे महत्त्वपूर्ण थी । बैडमिंटन में ऑल इंग्लैंड प्रतियोगिता का वही स्थान है जो कि टेनिस में विम्बलडन का है । इस प्रतिष्ठित ख़िताब को जीतना भारतीय खिलाडियों के लिए सदा से एक सपना ही रहा था । १९७८ और १९७९ में इस प्रतियोगिता को जीतने वाले इंडोनेशिया के खिलाड़ी  लिम स्वी किंग को लगातार तीसरे वर्ष भी ख़िताब का प्रबल दावेदार माना जा रहा था । प्रकाश ने हदियांतो, स्वेन प्री और मॉर्टन फ्रॉस्ट जैसे खिलाड़ियों को हराकर फ़ाइनल में किंग से भिड़ंत तय की तो विशेषज्ञों ने किंग की ख़िताबी तिकड़ी को सुनिश्चित मान लिया । लेकिन जब प्रकाश ने किंग को सीधे गेमों में १५-३ १५-१० से हराकर इस प्रतिष्ठित ट्रॉफी पर कब्ज़ा कर लिया तो विशेषज्ञों के मुँह खुले-के-खुले रह गए । ऑल इंग्लैंड ट्रॉफी को लेकर भारत लौटने वाले प्रकाश का हवाई अड्डे पर भव्य स्वागत किया गया । भाव-विह्वल देशवासियों ने प्रकाश को फूलमालाओं से लाद दिया । 


इसके दो माह बाद जकार्ता (इंडोनेशिया) में हुई अधिकृत विश्व चैम्पियनशिप में प्रकाश को शीर्ष वरीयता दी गई । इंडोनेशिया की गर्मी को न सह पाए प्रकाश क्वार्टर फ़ाइनल में ही हदियांतो से हार गए तो इंडोनेशिया के अख़बारों ने शोर मचाया कि प्रकाश की किंग पर जीत एक तुक्का थी । पर इससे अपने देशवासियों के मन में प्रकाश का मान कम नहीं हुआ और प्रकाश ने अपने मनोबल को लगातार ऊँचा बनाये रखा ।

१९८१ में जापान ओपन खेलकर भारत लौटने के बाद राष्ट्रीय प्रतियोगिता में लगातार नौ ख़िताबी जीतों के बाद दसवें साल प्रकाश को फ़ाइनल में सैयद मोदी के हाथों पराजय मिली । मार्च १९८१ में अपने ख़िताब की रक्षा के लिए ऑल इंग्लैंड प्रतियोगिता में उतरे प्रकाश को छठी वरीयता दी गई । एक चैम्पियन को छठी वरीयता देना उसकी तौहीन थी । लेकिन प्रकाश ने अपने शानदार प्रदर्शन से निचली वरीयता देने वाले आयोजकों को क़रारा जवाब दिया और फ़ाइनल तक जा पहुँचे जहाँ एक बार फिर उनका मुक़ाबला किंग से हुआ । लेकिन इस बार किंग ने पिछले वर्ष की पराजय का हिसाब चुकाते हुए प्रकाश को हरा दिया ।

बहरहाल प्रकाश की क़ामयाबियों का क़ाबिल-ए-दाद सफ़रनामा १९८१ में भी जारी रहा । उन्होंने भारत में पहली बार आयोजित अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता इंडियन मास्टर्स बैडमिंटन चैंपियनशिप चीन के हान जियान को हराकर जीती । १९८१ में ही कुआलालम्पुर में पहली बार बैडमिंटन का विश्व कप आयोजित हुआ । प्रकाश ने फ़ाइनल में जियान को ही हराते हुए विश्व कप को भारत की झोली में डाल दिया । 

१९८२ में प्रकाश ने हांग कांग ओपन और डच ओपन ख़िताब जीते । प्रकाश पर पेशेवर होने का आरोप लगाकर उन्हें नई दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों में भारत की ओर से नहीं खेलने दिया गया । अपने ही देश में आयोजित खेल महाकुंभ में अपने देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाना प्रकाश के लिए काफ़ी दुखद रहा । पर उन्होंने अपने मनोबल को गिरने नहीं दिया और ग़ैर-खिलाड़ी कप्तान के रूप में भारतीय बैडमिंटन दल का नेतृत्व करते हुए पाँच कांस्य पदक भारत की झोली में डलवाए । 

प्रकाश के घुटने के ऑपरेशन ने उनके खेल पर विपरीत प्रभाव डाला । १९८२ के बाद कोई बड़ा ख़िताब उन्होंने नहीं जीता लेकिन वे सदा विश्व के शीर्ष बैडमिंटन खिलाड़ियों में शामिल रहे और लगभग सभी बड़ी प्रतियोगिताओं के क्वार्टर फ़ाइनल, सेमी फ़ाइनल या फ़ाइनल तक पहुँचना उनके लिए सामान्य बात रही । १९८६ में एशियाई खेलों के नियमों में ढील देते हुए प्रकाश को खेलने की अनुमति दी गई । तब तक प्रकाश की आयु ३१ वर्ष की हो चुका थी और प्रतिस्पर्द्धी खेल के हिसाब से वे युवा नहीं रहे थे । इसके बावज़ूद भारत और चीन के बीच हुए दलगत मुक़ाबले में प्रकाश ने १९८५ के ऑल इंग्लैंड चैम्पियन और अपने से दस वर्ष छोटे झाओ जियान हुआ को इतनी सहजता से हराया कि खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों तथा विशेषज्ञों सभी ने दाँतों तले उंगली दबा ली ।
 
भारत में विश्व-स्तर के खिलाड़ियों की कमी के कारण भारत अक्सर बैडमिंटन की दलगत स्पर्द्धा की सबसे बड़ी प्रतियोगिता – थॉमस कप के क्षेत्रीय मुक़ाबलों में ही बाहर हो जाया करता था । लेकिन १९८८ में प्रकाश ने अपनी ढलती आयु के बावजूद शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत को थॉमस कप के अन्तिम दौर में पहुँचाया । मूल रूप से एकल के खिलाड़ी प्रकाश ने इस बार उदय पवार के साथ जोड़ी बनाकर युगल मुक़ाबले भी खेले तथा अनेक महत्वपूर्ण एकल एवं युगल मुक़ाबले जीतते हुए भारत को अन्तिम दौर में पहुँचाकर ही दम लिया । 

प्रकाश के आगमन से पूर्व भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी दमखम और फ़िटनेस की कमी के कारण अन्य देशों के खिलाड़ियों का सामना नहीं कर पाते थे । प्रकाश ने ही फ़िटनेस को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए अन्य खिलाड़ियों को सही मार्ग दिखलाया । प्रकाश की खेल तकनीक़, चुस्ती-फुरती और खेल के प्रति समर्पण ने ही भारत में बैडमिंटन के प्रति लोगों की धारणा भी बदली तथा पहली बार भारतीयों को लगा कि बैडमिंटन नाजुक कलाई का खेल नहीं, रफ़्तार और दमखम का कमाल है ।
 
अपने करियर के दौरान प्रकाश को डेनमार्क की नागरिकता लेकर कोपेनहेगन में बस जाने का अवसर मिला जिसको अपनाकर वे अपार धन कमा सकते थे । लेकिन अपने देश से प्यार करने वाले प्रकाश ने धन के प्रलोभन में आकर अपना वतन छोड़ने की जगह भारत में ही रहकर खेल के उत्थान के लिए काम करने का निश्चय किया ।

आज तो ख़ैर खिलाड़ियों का विज्ञापनों में मॉडल बनकर धन कमाना एक आम बात है, उस ज़माने में भी प्रसिद्ध खिलाड़ी अपनी लोकप्रियता को भुनाते हुए विज्ञापनों के द्वारा धन कमाया करते थे । परंतु प्रकाश ने सदा अपनी एक गरिमा बनाये रखी तथा विज्ञापनों से दूर रहकर केवल खेल पर अपना ध्यान केन्द्रित किया । लेकिन जब देश की एकता और अखंडता का प्रश्न आया तो विभिन्न खेलों के खिलाड़ियों को लेकर राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन देने के निमित्त दूरदर्शन द्वारा बनाये गए वृत्तचित्र में प्रकाश ने भी काम किया ।

प्रकाश की सफलता में उनकी अर्द्धांगिनी और दीपिका की माँ उजला की प्रेरणा भी महत्वपूर्ण रही है । उजला करकल से प्रकाश की मँगनी बहुत पहले ही हो गई थी लेकिन उन्होंने विवाह तब तक नहीं किया जब तक कि उन्होंने खिलाड़ी के रूप में अपने करियर के चरम को नहीं छू लिया । दीपिका भी पहले बैडमिंटन खेला करती थीं लेकिन प्रकाश और उजला ने अपनी इच्छाओं को उन पर थोपा नहीं और मॉडलिंग तथा अभिनय की ओर उनके रूझान को पहचानकर आधुनिक माता-पिता होने का परिचय देते हुए उन्हें अपने करियर की दिशा बदलने में पूरा सहयोग दिया ।

जुलाई १९८८ में भारत के दूसरे नंबर के बैडमिंटन खिलाड़ी सैयद मोदी की अचानक हत्या हो गई । मोदी के इस असामयिक देहावसान ने प्रकाश को मानसिक आघात पहुँचाया । फिर उनका प्रतिस्पर्द्धात्मक स्तर पर खेलने का मन नहीं हुआ तथा खिलाड़ी के रुप में उन्होंने खेल को अलविदा कह दिया । उसके बाद उन्होंने अपना ध्यान युवा बैडमिंटन खिलाड़ियों को मार्गदर्शन और प्रशिक्षण देने की ओर लगाया । उन्होंने दूरदर्शन के लिए एक कार्यक्रम - ‘शटल टाइम विद प्रकाश पादुकोण’ भी बनाया जिसमें वे स्वयं खेल की बारीक़ियाँ बताया करते थे ।

लगभग सभी भारतीय खेलों की तरह बैडमिंटन भी खेल संघ की राजनीति से अछूता नहीं रहा । खेल संघ की गंदी राजनीति के चलते युवा प्रतिभाओं को कुंठित किए जाने से प्रकाश व्यथित रहा करते थे । आख़िर प्रकाश ने देश में बैडमिंटन की दशा सुधारने का बीड़ा उठाते हुए भारतीय बैडमिंटन संघ (बीएआई) की समानान्तर संस्था - भारतीय बैडमिंटन परिसंघ (आईबीसी) बनाई । यह प्रकाश की लोकप्रियता और खेल के प्रति उनके समर्पण का ही परिणाम था कि आनन-फ़ानन में अनेक राज्यों की बैडमिंटन इकाइयों ने उन्हें समर्थन देते हुए उनकी संस्था से नाता जोड़ लिया । आख़िर भारतीय बैडमिंटन संघ को झुकते हुए प्रकाश से समझौता करना पड़ा । संघ का पुनर्गठन हुआ तथा प्रकाश उसके कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए । प्रकाश ने अपने पद पर निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए भारतीय प्रतिभाओं को तराशा । २००१ में पुल्लेला गोपीचंद ने ऑल इंग्लैंड प्रतियोगिता जीतकर इक्कीस वर्ष बाद यह प्रतिष्ठित ट्रॉफ़ी फिर से भारत पहुँचाई । बाद के वर्षों में भी अपर्णा पोपट, अनूप श्रीधर, अरविंद भट्ट, ज्वाला गुट्टा, वी. डीजू और सायना नेहवाल जैसे खिलाड़ियों ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बैडमिंटन में भारत का परचम बुलंद रखा ।

आज अपनी आयु के छठे दशक में भी भारतीय खेलों के आकाश का यह जगमगाता सितारा उत्साह और ऊर्जा से परिपूर्ण है । प्रकाश की पुत्री दीपिका का नाम मनोरंजन जगत में चमक रहा है लेकिन दीपिका के पिता का नाम भारतीय खेलों के इतिहास में इतने गहरे और सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है कि उसका मिटना तो दूर धुंधलाना भी संभव नहीं है । गर्व है ऐसे प्रकाश पर ।

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