शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

अंधविश्वासी मत बनिए लेकिन फ़िल्म देख लीजिए

इस रोचक फ़िल्म के विषय में कुछ भी कहने से पूर्व मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मेरा उद्देश्य न तो किसी अंधविश्वास को प्रसारित करना है और न ही समाज में व्याप्त किसी अंधविश्वास को पुष्ट करना है। चूंकि फ़िल्म अत्यन्त रोचक है तथा इसे देखकर भरपूर मनोरंजन होता है, इसीलिए मैं इस पर यह लेख लिख रहा हूँ यद्यपि यह कई अंधविश्वासों को अपने में समाहित किए हुए है। यह फ़िल्म है नागिन (१९७६)।

फ़िल्म की कथा जिन प्रमुख दो अंधविश्वासों पर आधारित है, वे हैं – १. जब कोई नाग सौ वर्ष की आयु पूर्ण कर लेता है तो वह इच्छाधारी नाग बन जाता है अर्थात् उसमें यह क्षमता आ जाते है कि वह अपनी इच्छा से मानव रूप धारण कर सकता है (तथा पुनः नाग के रूप में भी आ सकता है), २. यदि कोई किसी नाग को मार डाले तो उसकी प्रेयसी अर्थात् नागिन मारने वाले (या वालों) से उसका प्रतिशोध लेती है। ये तो हुए प्रमुख अंधविश्वास जिन पर यह फ़िल्म टिकी है। इनके अतिरिक्त कुछ और भी अंधविश्वास इस फ़िल्म के कथानक में पिरोए हुए हैं यथा – मरने वाले नाग की आँख में उसे मारने वाले का चित्र आ जाता है, जब कोई इच्छाधारी नाग (या नागिन) अपने मनुष्य रूप में किसी दर्पण के समक्ष आ जाता है तो उस दर्पण में उसका वास्तविक नाग वाला रूप दिखाई देने लगता है आदि।

फ़िल्म में ढेर सारे कलाकार भरे हुए हैं जिनको फ़िल्म की पटकथा में यथास्थान बैठाया गया है। विजय (सुनील दत्त) अपने पाँच दोस्तों – किरण (अनिल धवन), राजेश (विनोद मेहरा), उदय (कबीर बेदी), सूरज (संजय ख़ान) तथा राज (फ़िरोज़ ख़ान) के साथ जंगल में भ्रमण हेतु जाता है। वह इच्छाधारी नागों पर एक पुस्तक लिख रहा है। इसी संदर्भ में उसकी भेंट एक इच्छाधारी नाग (जीतेंद्र) से ही हो जाती है जब वह उसे एक बाज़ से बचाता है। जब वह अपने दोस्तों को उस इच्छाधारी नाग को मानव रूप में बदलते हुए दिखाने के लिए लाता है तो किरण गोली मारकर उस नाग की हत्या कर देता है। नाग की आँख में सभी दोस्तों की तस्वीरें आ जाती हैं जिन्हें देखने के बाद नाग की प्रेयसी अर्थात् नागिन (रीना रॉय) उनसे प्रतिशोध लेती है अर्थात् एक-एक करके उन्हें मार डालती है। अंत में केवल विजय ही बाक़ी बचता है जब उसे मारने के प्रयास में नागिन स्वयं मारी जाती है।

फ़िल्म की शुरुआत ही एक बहुत रोचक दृश्य से होती है जब मनुष्य के रूप में नाग पर एक बाज़ आक्रमण करता है जिसे गोली मारकर विजय नाग की जान बचाता है। उसके उपरांत नाग की हत्या से जो तेज़ रफ़्तार कहानी शुरु होती है, वह दर्शक को सोचने हेतु एक पल की भी फ़ुरसत नहीं देती तथा उसे सांस रोके हुए फ़िल्म को टकटकी लगाकर देखते चले जाने पर विवश कर देती है। मंत्रमुग्ध-सा दर्शक कथा के प्रवाह के साथ-साथ बहते हुए फ़िल्म को तब तक देखता चला जाता है जब तक वह समाप्त नहीं हो जाती। फ़िल्म दर्शकों को भरपूर मनोरंजन प्रदान करने के अपने उद्देश्य को सौ फ़ी सदी पूरा करती है। किसी प्रबल जलधारा की मानिंद प्रवाहित होती हुई सम्पूर्ण फ़िल्म में उबाऊ पल न के बराबर हैं और यही निर्माता-निर्देशक राजकुमार कोहली की सफलता है।

पुरुष कलाकारों का उल्लेख मैं फ़िल्म की कहानी बताते समय ऊपर कर चुका हूँ। फ़िल्म में महिला कलाकारों की भी भरमार है। नागिन की केंद्रीय भूमिका में रीना रॉय हैं जिनके साथ फ़िल्म में रेखा, मुमताज़, योगिता बाली, नीलम मेहरा, प्रेमा नारायण आदि भी उपस्थित हैं। इतने सारे कलाकारों के साथ न्याय करना भी निर्देशक हेतु किसी चुनौती से कम नहीं रहा होगा। लेकिन प्रशंसा करनी होगी निर्देशक की कि उसने पटकथा को प्रस्तुत करते समय सभी कलाकारों के साथ उचित न्याय किया। यद्यपि विजय के रूप में सुनील दत्त तथा नागिन के रूप में रीना रॉय को सबसे अधिक दृश्य एवं समय मिला है किन्तु अन्य कलाकारों को भी उचित समय तथा अपनी अभिनय क्षमता दर्शाने का उचित अवसर दिया गया है। निर्देशक सभी कलाकारों से अच्छा अभिनय करवाने में सफल रहा है। रीना रॉय के अभिनय जीवन की तो यह सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा सकती है जिसमें उन्होंने प्रभावी अभिनय किया है। प्रमुख कलाकारों के साथ-साथ एक चमत्कारी फ़कीर बाबा के रूप में प्रेमनाथ, एक मवाली के रूप में रंजीत, एक सपेरे के रूप में जगदीप आदि ने भी अच्छा अभिनय किया है। मुमताज़ की रूमानी नायिका के रूप में यह अंतिम फ़िल्म है जिसमें वे आकर्षक लगी हैं। बाल कलाकार मास्टर बिट्टू का अभिनय भी अच्छा है।

फ़िल्म तकनीकी रूप से उच्च गुणवत्ता वाली है। दो नागों की लड़ाई का दृश्य तथा नाग के मनुष्य रूप में एवं मनुष्य से पुनः नाग रूप में बदलने के दृश्य अद्भुत हैं क्योंकि उस युग में कम्प्यूटर ग्राफ़िक नहीं थे। अतः यह सोचने वाली बात है कि निर्देशक इन दृश्यों (तथा नाग एवं नागिन के अन्य विभिन्न दृश्यों) को कैसे फ़िल्मा पाया। फ़िल्म का कला-निर्देशन भी अच्छा है और पार्श्व संगीत एवं संवाद भी। छायाकार ने नाग तथा नागिन से संबंधित दृश्यों को फ़िल्माने में कमाल कर दिखाया है। सम्पादक ने भी बहुत अच्छा काम किया है और अपनी कैंची कुछ इस तेज़ी से चलाई है कि फ़िल्म अधिक लम्बी नहीं हो, केवल आवश्यक दृश्य सिलसिलेवार उसमें रहें जिन्हें दर्शक अपना दिल थामे देखता चला जाए एक पल को भी नज़रें परदे से हटाए बिना।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने फ़िल्म में मधुर संगीत दिया है। नाग-नागिन पर फ़िल्माया गया गीत तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना कई बार फ़िल्म में आता है और प्रभावित करता है। उसके अतिरिक्त अन्य गीत यथा तेरा मेरा मेरा तेरा मेरा तेरा तेरा मेरा मिल गया दिल दिल से’, हफ़्तों महीनों बरसों नहीं सदियों से हैं पुराने और तेरे इश्क़ का मुझ पे हुआ ये असर है भी अच्छे बन पड़े हैं। फ़िल्म के सुंदर गीत वर्मा मलिक ने लिखे हैं।

सार रूप में मुझे बस यही कहना है कि आप अंधविश्वास पर आधारित इस कथा तथा इसमें समाहित अन्य अवधारणाओं पर विश्वास मत कीजिए लेकिन इस फ़िल्म को (यदि अब तक आपने नहीं देखा है तो) देख लीजिए। आपको लगभग सवा दो घंटे का सम्पूर्ण मनोरंजन प्राप्त होगा तथा फ़िल्म देखने के उपरांत कोई निराशा नहीं होगी, यह मेरी गारंटी है।

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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

रहस्य की धुंध

निर्माता-निर्देशक बलदेवराज चोपड़ा ने बहुत-सी अच्छी फ़िल्में बनाई हैं जिनमें कानून (१९६०) तथा  हमराज़ (१९६७) जैसी उत्तम रहस्य फ़िल्में भी सम्मिलित हैं। उन्होंने ऐसी ही एक अच्छी रहस्य फ़िल्म धुंध भी बनाई थी जो सन १९७३ में प्रदर्शित हुई थी। फ़िल्म की कथा के लिए उनकी फ़िल्म निर्माण संस्था बी.आर. फ़िल्म्स के कथा-विभाग को श्रेय दिया गया किंतु वस्तुतः फ़िल्म की कहानी सुप्रसिद्ध रहस्य कथा लेखिका अगाथा क्रिस्टी के नाटक द अनएक्सपेक्टिड गेस्ट (अप्रत्याशित अतिथि) पर आधारित है।


धुंध की कहानी एक हिल स्टेशन पर घटित होती बताई गई है। इस रहस्यकथा का आरंभ एक घर में एक व्यक्ति के आगमन से होता है जिसकी कार रास्ते में ख़राब हो गई है तथा वह किसी गैरेज में फ़ोन करने के उद्देश्य से उस घर में आया है। रात का समय है तथा वातावरण में गहरी धुंध छाई हुई है। उसे घर का द्वार खुला मिलता है जिससे वह अंदर जाता है जहाँ उसे एक व्यक्ति एक कुर्सी पर मरा पड़ा मिलता है। यह व्यक्ति इस घर का स्वामी रंजीत (डैनी) है। आगंतुक चंद्रशेखर (नवीन निश्चल) है जिसकी भेंट हाथ में पिस्तौल लिए हुए एक युवती से होती है। यह युवती रंजीत की पत्नी रानी (ज़ीनत अमान) है। रानी चंद्रशेखर को बताती है कि अपने पति की हत्या उसी ने की है। चंद्रशेखर के कारण पूछने पर वह अपनी दुखभरी कहानी उसे सुनाती है। उसका अपाहिज पति रंजीत उस पर अत्याचार करता था। उसका रवैया अपनी सौतेली मां (उर्मिला भट्ट) तथा अपने सौतेले भाई के प्रति भी वैसा ही था। एक दिन जब वह जीवन से दुखी होकर आत्महत्या करने जा रही थी तो उसे एक वकील सुरेश (संजय) ने बचाया तथा धीरे-धीरे उसका सुरेश से प्रेम-संबंध हो गया। यह बात रंजीत से छुपी नहीं रही। दोनों के बीच झगड़े बढ़ते गए और अंततः आज जब रंजीत उसे मारने जा रहा था तो छीना-झपटी में पिस्तौल चल गई और गोली लगने से रंजीत स्वयं ही मारा गया।

अब रानी चंद्रशेखर को पुलिस को बुलाने के लिए कहती है तो चंद्रशेखर उससे कहता है कि पुलिस तो उसे हत्या के आरोप में गिरफ़्तार कर लेगी जबकि उसने तो जान-बूझकर हत्या की नहीं है, साथ ही उसका अत्याचारी पति रंजीत तो इसी योग्य था। ऐसे में अपने आप को कानून के हवाले करना समझदारी नहीं होगी। तब रानी उससे पूछती है कि उसे क्या करना चाहिए तो चंद्रशेखर उसे बताता है कि पुलिस को ऐसी कहानी परोसी जानी चाहिए जिससे हत्या का आरोप किसी बाहर से आए हुए अज्ञात व्यक्ति पर लगे, न कि उस पर। अब चंद्रशेखर की सलाह के अनुरूप तथा उसके सहयोग से रानी ऐसी स्थिति बनाती है जिससे लाश पर घर की नौकरानी की दृष्टि पड़ती है तथा उसके शोर मचाने के उपरांत ही पुलिस को बुलाया जाता है और बताया जाता है कि संभवतः कोई व्यक्ति बाहर से आया और हत्या करके चला गया। पुलिस अपने ढंग से मामले की छानबीन में लग जाती है और चंद्रशेखर को निर्देश देती है कि पुलिस को सूचना दिए बिना तथा उसकी अनुमति लिए बिना वह शहर छोड़कर न जाए।

पुलिस मामले की गहराई में जाती है तो सुरेश एवं रानी का प्रेम-संबंध उससे छुपा नहीं रहता। पुलिस को कुछ सूत्र ऐसे मिलते हैं जिनसे हत्या का संदेह सुरेश पर जाता है। पुलिस सुरेश को गिरफ़्तार कर लेती है तथा उस पर न्यायालय में रंजीत की हत्या का मुक़द्दमा चलता है। रानी सुरेश को बचाने के लिए न्यायालय में स्वयं यह अपराध स्वीकार कर लेती है। पर क्या सुरेश हत्यारा है ? क्या रानी सच बोल रही है ? वास्तविकता का पता फ़िल्म के अंत में चलता है।

धुंध शब्द अपने आप में ही रहस्य को समाहित किए हुए है। रहस्य के लिए अंग्रेज़ी में मिस्ट्री शब्द का प्रयोग किया जाता है जो मिस्ट से बना है जिसका अर्थ ही है – धुंध। अपने नाम के अनुरूप ही यह एक रहस्य में लिपटी कथा है जिसमें पति-पत्नी का संबंध भी समाविष्ट है तथा एक प्रेमकथा भी। अपने प्रारंभिक दृश्य से लेकर अंतिम दृश्य तक रोचक यह फ़िल्म दर्शक को बांधे रखती है। कहानी तो अच्छी है ही, बलदेवराज चोपड़ा का निर्देशन भी कुशल है।

फ़िल्म तकनीकी दृष्टि से भी उत्कृष्ट है। संवादों से लेकर सम्पादन, पार्श्व संगीत, कला-निर्देशन एवं छायांकन तक सभी उत्तम हैं। हिल स्टेशन के नयनाभिराम दृश्य दर्शक के नयनों को शीतलता प्रदान करते हैं। फ़िल्म की लंबाई भी कम है (मुश्किल से दो घंटे)। निर्देशक ने दर्शकों को सोचने का समय नहीं दिया है। साहिर लुधियानवी के गीतों को संगीतकार रवि ने मधुर धुनों से सजाया है। संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है तथा उलझन सुलझे ना गीत विशेष रूप से अच्छे बन पड़े हैं। पद्मा खन्ना तथा जयश्री तलपदे के नृत्य वाला गीत जो यहाँ था, वो वहाँ क्यूंकर हुआ भी सुनने और देखने में अच्छा लगता है। सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। डैनी का अभिनय विशेष रूप से सराहना योग्य है।

कुल मिलाकर धुंध एक छोटी-सी मगर दिलचस्प फ़िल्म है जिसे बॉलीवुड में बनी सर्वश्रेष्ठ रहस्य फ़िल्मों में शुमार किया जाता है। फ़िल्म में फ़ालतू बातें बिलकुल नहीं हैं। प्रत्येक बात, प्रत्येक दृश्य एवं प्रत्येक चरित्र फ़िल्म के कथानक से पूरी तरह संबद्ध है। फ़िल्म के प्रदर्शन को आधी सदी से अधिक बीत जाने पर भी इसके रंग फीके नहीं पड़े हैं तथा किसी नई फ़िल्म को देखने जैसा ही आनंद प्रदान करते हैं। यह फ़िल्म न केवल रहस्यकथाओं के शौक़ीनों को बल्कि सामान्य फ़िल्में देखने वालों को भी पसंद आएगी। साथ ही यह फ़िल्म उन लोगों को भी पसंद आएगी जिन्होंने अगाथा क्रिस्टी का नाटक द अनएक्स्पेक्टिड गेस्ट पढ़ा है।  

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शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

फ़िल्म में पुनर्जन्म की गाथा

हम हिंदू पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। पुनर्जन्म होता है, यह बात गीता में भी उद्धृत है। पर न इसे विज्ञान मानता है न देश का विधि-विधान। लेकिन पुनर्जन्म की अनेक कथाएं सुनाई जाती हैं और अनेक फ़िल्में भी इस विषय पर बनी हैं। ऐसी ही एक फ़िल्म है कुदरत (१९८१)। अनेक बड़े सितारों से युक्त इस फ़िल्म को व्यावसायिक सफलता तो नहीं मिली थी किंतु विषय के निर्वहन हेतु इसे सराहा गया था। फ़िल्म के लेखक-निर्देशक थे चेतन आनंद। 


फ़िल्म आरंभ होती है चंद्रमुखी (हेमा मालिनी) के अपने माता-पिता के साथ शिमला आगमन के साथ जहाँ उसे बहुत कुछ पहचाना हुआ लगता है जबकि अपने जन्म के कुछ समय उपरांत की एक यात्रा को छोड़कर वह कभी शिमला नहीं आई थी। वहीं वह मिलती है डॉक्टर नरेश (विनोद खन्ना) से जिसके माता-पिता उसके माता-पिता के मित्र हैं। वे भी मित्र बन जाते हैं। नरेश एक मनोचिकित्सक है।

कुदरत की वास्तविक कहानी शुरु होती है चंद्रमुखी के एक विचित्र स्वप्न देखकर डर जाने तथा एक अपरिचित व्यक्ति मोहन (राजेश खन्ना) को माधो कहकर पुकारने से। मोहन सरकारी वकील है तथा उसे शिमला के एक धनी व्यक्ति चौधरी जनक सिंह (राज कुमार) ने पाल-पोसकर बड़ा किया है। मोहन के माता-पिता नहीं हैं तथा वह चौधरी जनक सिंह का अपने पर बहुत उपकार मानता है एवं उसकी पुत्री करुणा (प्रिया राजवंश) से विवाह करने को तैयार है। करुणा भी वकील है।

पर जब वह चंद्रमुखी के संपर्क में आता है तो चंद्रमुखी उसे माधो तथा स्वयं को पारो कहकर पुकारने लगती है। चंद्रमुखी के स्वप्नावस्था में डर जाने एवं अस्वस्थ हो जाने की स्थिति का उपचार करने के लिए नरेश उसे सम्मोहित (हिप्नोटाइज़) करता है। सम्मोहनावस्था में चंद्रमुखी अपने पूर्व जन्म की स्थिति में पहुँच जाती है। उस स्थिति में वह स्वयं को पारो बताती है एवं यह भी बताती है कि उसे माधो से प्रेम था। वह यह भी बताती है कि छोटे सरकार द्वारा उसके साथ दुराचार किए जाने के उपरांत वे दोनों ही मारे गए थे। ये छोटे सरकार कोई और नहीं चौधरी जनक सिंह ही हैं। ये घटनाएं बीस वर्ष पूर्व की हैं।

मोहन को यह सब पता चलता है तो उसे भी विश्वास हो जाता है कि माधो ने उसके रूप में तथा पारो ने चंद्रमुखी के रूप में पुनर्जन्म लिया है। साथ ही उसे चंद्रमुखी से प्रेम हो जाता है। वे सब अर्थात् मोहन, चंद्रमुखी एवं नरेश माधो की बुज़ुर्ग हो चुकी बहन सत्तो (अरुणा ईरानी) से भी मिलते हैं तथा माधो-पारो से संबंधित बहुत-सी बातें मालूम करते हैं। अब नरेश और मोहन दोनों को लगता है कि चंद्रमुखी की अस्वस्थ मानसिक स्थिति एवं भयावह स्वप्नों का उपचार यही है कि दिवंगत पारो और माधो को न्याय मिले। विभिन्न प्रकार के प्रमाणों को एकत्र करके मोहन चौधरी जनक सिंह पर पारो की हत्या का मुकद्दमा दायर कर देता है। करुणा अपने पिता के लिए बचाव पक्ष की वकील बन जाती है। विभिन्न अदालती दृश्यों के साथ-साथ कथानक में कई मोड़ आने के बाद फ़िल्म अपने क्लाईमेक्स तक पहुँचती है।

किसी भी अनाड़ी फ़िल्मकार के हाथों से यह कहानी ठीक ढंग से चित्रपट पर नहीं उतारी जा सकती थी किंतु चेतन आनंद भारत के अत्यन्त सम्मानित फ़िल्मकार रहे हैं। उन्होंने अपनी ही इस कथा को अत्यन्त कुशलतापूर्वक रजतपट पर उतारा है। फ़िल्म की पुनर्जन्म की कथा (तथा उससे जुड़ी कुछ अन्य बातें भी) चाहे विश्वसनीय न लगे, यह आदि से अंत तक रोचक है एवं दर्शकों को बांधे रखती है। फ़िल्म में राज कुमार, राजेश खन्ना, हेमा मालिनी, विनोद खन्ना एवं प्रिया राजवंश जैसे सितारे हैं एवं फ़िल्म की पटकथा इन सभी सितारों के चरित्रों के साथ न्याय करती है। चेतन आनंद ने सभी से अत्यन्त स्वाभाविक अभिनय करवाया है। सम्पूर्ण कथानक सहज रूप से प्रवाहित होता है जिसमें एक-के-बाद-एक आते मोड़ दर्शक को एक मिनट के लिए भी इधर-उधर होने का अवसर नहीं देते हैं।

तकनीकी दृष्टि से भी फ़िल्म की गुणवत्ता उत्कृष्ट है। शिमला की नयनाभिराम दृश्यावली आँखों को शीतलता पहुँचाती है। कला-निर्देशक तथा छायाकार दोनों ने ही अपना-अपना काम बाख़ूबी किया है। फ़िल्म का पार्श्व संगीत कथानक के अनुरूप ही है। विभिन्न चरित्रों के संवाद भी अच्छे हैं। फ़िल्म की लंबाई कथानक को ध्यान में रखते हुए ठीक ही है विशेषकर यह देखते हुए कि फ़िल्म में अनावश्यक बातें बिलकुल नहीं हैं। प्रत्येक बात, प्रत्येक घटना एवं प्रत्येक दृश्य मुख्य कथा से संबद्ध है।

मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों पर राहुल देव बर्मन ने मधुर संगीत दिया है। तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया’, हमें तुमसे प्यार कितना’, छोड़ो सनम काहे का ग़म आदि गीत तो फ़िल्म के प्रदर्शन के समय लोगों की ज़ुबान पर चढ़ ही गए थे, अन्य गीत भी बहुत अच्छे बन पड़े। ये गीत आज भी सुने जाने पर मन को एक सुखद अनुभूति से भर देते हैं।

कुल मिलाकर कुदरत एक अत्यन्त मनोरंजक एवं प्रभावशाली फ़िल्म है। आप पुनर्जन्म में विश्वास करते हों या नहीं; यह फ़िल्म आपको पसंद आएगी, इसमें संदेह नहीं।

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बुधवार, 14 जनवरी 2026

एक हृदयस्पर्शी रहस्यकथा

हिंदी के लोकप्रिय लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित कई स्थायी पात्र ऐसे हैं जो अत्यन्त संवेदनशील हैं तथा अपने निजी हित से पहले अन्य व्यक्तियों के हिताहित एवं भावनाओं की परवाह करते हैं। उनके द्वारा सृजित एक ऐसा ही पात्र है – पुलिस इंस्पेक्टर प्रभु दयाल जो कि उनकी सुनील सीरीज़ के उपन्यासों में प्रायः दिखाई देता है। सुरेन्द्र मोहन पाठक न केवल प्रभु दयाल को एक अत्यन्त कार्यकुशल एवं कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में चित्रित करते हैं, वरन वे यह भी बताते हैं कि वह ऊपर से चाहे कठोर दिखाई दे, भीतर से एक अत्यन्त संवेदनशील मनुष्य है जो किसी भी निर्दोष को दंड दिलवाने में विश्वास नहीं रखता तथा अन्य व्यक्तियों एवं समाज के हितों को अपनी पुलिसिया कार्रवाई से ऊपर मानता है। उसके इस स्वभाव का उदाहरण है लेखक का ख़ाली मकान नामक उपन्यास जिसका कि नायक वही है।

ख़ाली मकान एक विशिष्ट उपन्यास है जिसमें लेखक का लोकप्रिय नायक सुनील उपस्थित नहीं है। लेखक ने इस उपन्यास में अपना स्वयं का पात्र भी रखा है जिससे प्रभु दयाल शिकायत करता है कि एक ओर तो वह उसे एक अत्यन्त कार्यकुशल पुलिस अधिकारी के रूप में चित्रित करता है, वहीं दूसरी ओर उसे किसी भी केस को हल नहीं करने देता। लेखक जब उसे कहते हैं कि सुनील सीरीज़ के उपन्यास में केस को हल करते हुए तो सुनील को ही दिखाना आवश्यक है तो वह कहता है कि एक ऐसा उपन्यास लिखो जिसमें सुनील हो ही नहीं तथा वह केस को हल करे। लेखक उसकी बात मान लेते हैं और उसके लिए एक अत्यन्त पेचीदा केस लेकर आते हैं जिसे हल करना उसके लिए एक चुनौती है।

अब यह रहस्यकथा आरंभ होती है। पुलिस को राजनगर नामक काल्पनिक नगर में बहने वाली कृष्णा नदी में डोलती हुई एक नाव मिलती है जिसमें एक पुरुष तथा एक स्त्री की लाशें हैं। पुरुष के तन पर गिरजाघर के पादरियों द्वारा पहना जाने वाला सफ़ेद चोगा है। स्त्री का गला कटा हुआ है। प्रभु दयाल के लिए प्रथम कार्य है मरने वालों की वास्तविकता का पता लगाना और साथ ही हत्याओं के वास्तविक घटनास्थल तक पहुँचना। और ऐसा कर लेने के उपरांत अपराधी का पता लगाना। उसे पता चलता है कि मृत पुरुष लिटन रोड स्थित चर्च ऑव सेंट माइकल का पादरी जोसेफ़ कॉटन है जबकि मृत स्त्री सूसन डेनिंग नामक एक विवाहित महिला है। प्रभु दयाल जी जान से मामले की छानबीन में लग जाता है। वह दोनों मृतकों से जुड़े अनेक लोगों से मिलता है जिनमें सम्मिलित हैं – पादरी की पत्नी, उसके दो साले, सूसन का पति और उसकी बेटी, पादरी की भूतपूर्व सेक्रेटरी हेलेन रीडली, उसकी वर्तमान सेक्रेटरी सिल्विया नोरिस, पादरी के परिवार का वकील जॉर्ज सैमसन, गिरजाघर की प्रबंधन समिति का अध्यक्ष हेनरी सिल्वेस्टर आदि। घटनास्थल निकलता है जॉर्जटाउन नामक स्थान में स्थित एक ख़ाली मकान जिसमें कि हत्याएं हुई थीं। प्रभु दयाल वहाँ के चौकीदार धनीराम से भी मिलता है। और साथ ही उसकी भेंट होती है एक साधु महाराज से भी जिनकी कुटिया भी उस मकान के समीप ही स्थित है।

मामले को हल करने के लिए रात-दिन एक किए हुए प्रभु दयाल की साधु महाराज से लंबी वार्ता होती है। वह साधु महाराज से बहुत प्रभावित होता है तथा उन्हें अपनी हथेली दिखाकर पूछता है कि वह इस मामले को हल करने में सफल होगा या नहीं। साधु महाराज बहुत सोच-विचार कर उसे यह बताते हैं कि सफलता दो प्रकार की होती है – एक वह जिससे आत्मिक संतोष प्राप्त होता है तथा दूसरी वह जिससे सांसारिक यश मिलता है; उसे प्रथम प्रकार की सफलता मिलेगी, दूसरे प्रकार की नहीं। प्रभु दयाल इस बात को सुनकर समझ नहीं पाता कि जब वह मामले को हल कर लेगा तो उसे सांसारिक यश क्यों नहीं मिलेगा। किंतु जब वह सम्पूर्ण मामले की तह तक जाकर वास्तविक अपराधी का पता लगा लेता है तो उसका संवेदनशील स्वभाव अपराधी को तथा उसके सहयोगियों को पकड़ने के आड़े आ जाता है और तब वह साधु महाराज की बात का मर्म समझ पाता है। उसे लगता है कि यदि वह अपराधी को तथा उसके सहयोगियों को गिरफ़्तार करके न्यायालय में प्रस्तुत करेगा तो वे लोग जो कि उसकी दृष्टि में निर्दोष हैं, अनावश्यक रूप से न्यायिक प्रक्रिया में फंस जाएंगे। उसे वास्तविक अपराधी से सहानुभूति भी होती है तथा उसे लगता है कि यह व्यक्ति तो एक पवित्र लक्ष्य हेतु अपना जीवन होम कर रहा है जिसके चलते उसका दंडित होना और यहाँ तक कि गिरफ़्तार होना भी उसके प्रति न्यायपूर्ण नहीं होगा। अपनी इसी संवेदनशीलता के चलते वह किसी को गिरफ़्तार नहीं करता एवं मामले को अनसुलझा बताकर बंद कर देता है।

ख़ाली मकान एक अत्यन्त रहस्यपूर्ण कथा है जिसके वास्तविक रहस्य का सही-सही अनुमान लगाना किसी भी पाठक के लिए लगभग असंभव है। आदि से अंत तक रोचक यह उपन्यास अपने अंतिम भाग में पाठकों के मन को छू लेता है एवं इंस्पेक्टर प्रभु दयाल के एक संवेदनशील मनुष्य होने की विशेषता पर प्रकाश डालता है। पुलिस अधिकारियों की जो छवि भारतीय जनमानस में बनी हुई है, उससे इतर एक छवि पाठकों के समक्ष आती है प्रभु दयाल के रूप में। वह इस प्रलोभन में नहीं आता कि यदि वह केस के हल को तथा संबंधित व्यक्तियों को सबके सामने प्रस्तुत कर देगा तो उसे अपने विभाग, प्रेस तथा जनता में बहुत प्रशंसा मिलेगी (ऐसे में उसकी तरक्की की भी संभावना होगी)। एक संवेदनशील मनुष्य के रूप में वह केस से जुड़े व्यक्तियों ही नहीं, लिटन रोड के सम्पूर्ण ईसाई समुदाय के विषय में सोचता है तथा विचार करता है कि उन सबकी भलाई किस बात में है। और उसका मन उसे प्रेरित करता है कि वह निजी हित को अनदेखा करके उन सबकी भलाई को देखे। उसकी यह संवेदनशीलता पाठकों को यह अनुभव करवाती है कि उन्होंने एक ऐसी रहस्यकथा पढ़ी है जो न केवल रोचक है वरन हृदयस्पर्शी भी है।

सरल हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास सुरेन्द्र मोहन पाठक के श्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जा सकता है। पाठक साहब ने प्रभु दयाल के रूप में जैसा पुलिस अधिकारी अपने पाठकों के समक्ष रखा है, वैसे पुलिस अधिकारी विरले ही होते हैं जो मानवता को अपनी पुलिस तथा कानूनी प्रक्रिया से ऊपर रखें। हिंदी साहित्य के प्रेमी इस असाधारण उपन्यास को अवश्य पढ़ें।

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शनिवार, 3 जनवरी 2026

एक मामला, कई हल

प्राय: रहस्यकथाएं लगभग एक ही तरह की होती हैं। कोई क़त्ल होता है जिसकी जाँच-पड़ताल की जाती है, कई व्यक्तियों पर संदेह जाता है एवं अंत में वास्तविक अपराधी का पता चलता है। लेकिन सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित उपन्यास – क्राइम क्लब एक भिन्न प्रकार की कथा है जिसमें कई व्यक्ति अपने दिमाग़ी घोड़े दौड़ाकर एक क़त्ल के मामले का हल निकालने का प्रयास करते हैं तथा सभी भिन्न परिणामों पर पहुँचते हैं।

क्राइम क्लब अपराधशास्त्र में रुचि रखने वाले कुछ व्यक्तियों द्वारा बनाई गई एक संस्था है जिसके सदस्यों के समक्ष एक क़त्ल का मामला आता है। इस मामले को पुलिस असफल होकर बंद कर चुकी है अर्थात् अपराधी का पता नहीं चल सका है। अब क्राइम क्लब के सदस्य पुलिस से कुछ प्राथमिक जानकारी लेकर अपने-अपने ढंग से इस मामले के हल तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। ये सदस्य हैं: 1. विवेक आगाशे जो कि एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं प्राइवेट जासूस हैं, 2. रुचिका केजरीवाल जो कि एक युवा क्राइम रिपोर्टर हैं, 3. लौंगमल दासानी जो कि एक प्रसिद्ध वकील हैं, 4. छाया प्रजापति जो कि एक प्रथम श्रेणी की न्यायिक अधिकारी हैं, 5. अभिजीत घोष जो कि पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं एवं रहस्यकथाओं में रुचि रखते हैं, 6. अशोक प्रभाकर जो कि एक जासूसी उपन्यास लेखक हैं।

मामला यह है कि अंजना निगम नामक एक संपन्न महिला की ज़हरभरी चॉकलेट खाने से मृत्यु हो जाती है। उन चॉकलेटों का पैकेट उसके पति मुकेश निगम को अपने एक साथी दुष्यंत परमार से प्राप्त हुआ था। दुष्यंत परमार को वह पैकेट डाक से मिला था जो कि प्रत्यक्षतः सोराबजी एंड संस नामक एक चॉकलेट निर्मात्री कम्पनी द्वारा उपहार स्वरूप भेजा गया था। अंजना ने अधिक चॉकलेट खाई थीं जबकि उसके पति मुकेश ने दो चॉकलेट खाई थीं एवं बीमार वह भी पड़ा था। प्रश्न यह है कि वे चॉकलेटें यदि सोराबजी एंड संस ने नहीं भेजी थीं तो किसने भेजी थीं एवं भेजने वाले का निशाना कौन था – अंजना निगम अथवा दुष्यंत परमार ? पुलिस इस मामले को नहीं सुलझा पाती एवं अंततः इसे क्राइम क्लब को सौंप देती है।

क्राइम क्लब के सदस्य यह तय करते हैं कि वे सब अलग-अलग और अपने-अपने ढंग से इस मामले को सुलझाने का प्रयास करेंगे तथा कोई भी सदस्य अपनी कार्यप्रणाली एवं जानकारियां दूसरे सदस्य से साझा नहीं करेगा। एक सप्ताह के प्रयास के उपरांत सदस्य बारी-बारी अपना हल बाकी सदस्यों के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। किसकी बारी कब आएगी, यह पर्चियां निकालकर तय किया जाता है। और फिर होता यह है कि एक ही जैसे तथ्यों से विभिन्न सदस्य भिन्न-भिन्न निष्कर्ष निकालते हैं एवं प्रत्येक सदस्य एक भिन्न हल लेकर आता है जिसमें एक भिन्न व्यक्ति को अपराधी के रूप में स्थापित किया जाता है। यह दिमाग़ी व्यायाम बड़ा दिलचस्प साबित होता है और अंतिम सदस्य के अपना हल प्रस्तुत करने के उपरांत जब वास्तविक अपराधी का पता चलता है तो सभी चौंक जाते हैं।

यह उपन्यास सुरेन्द्र मोहन पाठक के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जा सकता है क्योंकि जैसा कि मैंने प्रथम परिच्छेद में कहा कि यह कोई आम रहस्यकथा नहीं है। यह एक ऐसी रहस्यकथा है जो कि सामान्य रहस्यकथाओं से बिलकुल अलग है। लेखक ने सिद्ध किया है कि समान तथ्यों को अलग-अलग व्यक्ति भिन्न कोणों से देखकर अलग-अलग ढंग से उनकी व्याख्या करते हैं और अलग-अलग नतीजे निकालते हैं। साथ ही किसी भी तथ्य के किसी भाग को छुपाकर एवं किसी भाग को विशेष रूप से उजागर करके लोगों को भ्रमित किया जा सकता है।

सरल हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास अत्यंत रोचक है तथा आरम्भ से अंत तक पाठकों को बांधे रखता है। क्राइम क्लब के सदस्यों के साथ-साथ उपन्यास का पाठक भी वास्तविक अपराधी का अनुमान लगाने का प्रयास करता है लेकिन वास्तविक अपराधी को पहचान पाना अत्यंत कठिन है। यही लेखक की सबसे बड़ी सफलता है। उपन्यास में न तो कोई एक्शन या मारधाड़ है और न ही कोई विशेष मोड़ हैं। केवल तथ्यों का अलग-अलग प्रकार से विश्लेषण बताते हुए पाठकों को एक दिमाग़ी ख़ुराक दी गई है जो कि न केवल रहस्यकथाएं पसंद करने वालों को बल्कि सामाजिक उपन्यास पसंद करने वालों को भी रास आएगी।

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