इस रोचक फ़िल्म के विषय में कुछ भी कहने से पूर्व मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मेरा उद्देश्य न तो किसी अंधविश्वास को प्रसारित करना है और न ही समाज में व्याप्त किसी अंधविश्वास को पुष्ट करना है। चूंकि फ़िल्म अत्यन्त रोचक है तथा इसे देखकर भरपूर मनोरंजन होता है, इसीलिए मैं इस पर यह लेख लिख रहा हूँ यद्यपि यह कई अंधविश्वासों को अपने में समाहित किए हुए है। यह फ़िल्म है ‘नागिन’ (१९७६)।
फ़िल्म में ढेर सारे कलाकार भरे हुए हैं जिनको
फ़िल्म की पटकथा में यथास्थान बैठाया गया है। विजय (सुनील दत्त) अपने पाँच दोस्तों – किरण (अनिल धवन), राजेश (विनोद मेहरा), उदय (कबीर बेदी), सूरज (संजय ख़ान) तथा राज (फ़िरोज़ ख़ान) के साथ जंगल में
भ्रमण हेतु जाता है। वह इच्छाधारी नागों पर एक पुस्तक लिख रहा है। इसी संदर्भ में
उसकी भेंट एक इच्छाधारी नाग (जीतेंद्र) से ही हो जाती है जब वह उसे एक बाज़ से
बचाता है। जब वह अपने दोस्तों को उस इच्छाधारी नाग को मानव रूप में बदलते हुए
दिखाने के लिए लाता है तो किरण गोली मारकर उस नाग की हत्या कर देता है। नाग की आँख
में सभी दोस्तों की तस्वीरें आ जाती हैं जिन्हें देखने के बाद नाग की प्रेयसी
अर्थात् नागिन (रीना रॉय) उनसे प्रतिशोध लेती है अर्थात् एक-एक करके उन्हें मार
डालती है। अंत में केवल विजय ही बाक़ी बचता है जब उसे मारने के प्रयास में नागिन
स्वयं मारी जाती है।
फ़िल्म की शुरुआत ही एक बहुत रोचक दृश्य से होती
है जब मनुष्य के रूप में नाग पर एक बाज़ आक्रमण करता है जिसे गोली मारकर विजय नाग
की जान बचाता है। उसके उपरांत नाग की हत्या से जो तेज़ रफ़्तार कहानी शुरु होती है, वह दर्शक को सोचने हेतु एक पल की भी फ़ुरसत नहीं देती तथा
उसे सांस रोके हुए फ़िल्म को टकटकी लगाकर देखते चले जाने पर विवश कर देती है।
मंत्रमुग्ध-सा दर्शक कथा के प्रवाह के साथ-साथ बहते हुए फ़िल्म को तब तक देखता चला जाता है जब तक वह समाप्त नहीं हो
जाती। फ़िल्म दर्शकों को भरपूर मनोरंजन प्रदान करने के अपने उद्देश्य को सौ फ़ी सदी
पूरा करती है। किसी प्रबल जलधारा की मानिंद प्रवाहित होती हुई सम्पूर्ण फ़िल्म में उबाऊ पल न के बराबर हैं और यही
निर्माता-निर्देशक राजकुमार कोहली की सफलता है।
पुरुष कलाकारों का उल्लेख मैं फ़िल्म की कहानी
बताते समय ऊपर कर चुका हूँ। फ़िल्म में महिला कलाकारों की भी भरमार है। नागिन की
केंद्रीय भूमिका में रीना रॉय हैं जिनके साथ फ़िल्म में रेखा, मुमताज़, योगिता बाली, नीलम मेहरा, प्रेमा नारायण
आदि भी उपस्थित हैं। इतने सारे कलाकारों के साथ न्याय करना भी निर्देशक हेतु किसी
चुनौती से कम नहीं रहा होगा। लेकिन प्रशंसा करनी होगी निर्देशक की कि उसने पटकथा
को प्रस्तुत करते समय सभी कलाकारों के साथ उचित न्याय किया। यद्यपि विजय के रूप
में सुनील दत्त तथा नागिन के रूप में रीना रॉय को सबसे अधिक दृश्य एवं समय मिला है
किन्तु अन्य कलाकारों को भी उचित समय तथा अपनी अभिनय क्षमता दर्शाने का उचित अवसर
दिया गया है। निर्देशक सभी कलाकारों से अच्छा अभिनय करवाने में सफल रहा है। रीना
रॉय के अभिनय जीवन की तो यह सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा सकती है जिसमें
उन्होंने प्रभावी अभिनय किया है। प्रमुख कलाकारों के साथ-साथ एक चमत्कारी फ़कीर
बाबा के रूप में प्रेमनाथ, एक मवाली के
रूप में रंजीत, एक सपेरे के रूप में जगदीप
आदि ने भी अच्छा अभिनय किया है। मुमताज़ की रूमानी नायिका के रूप में यह अंतिम
फ़िल्म है जिसमें वे आकर्षक लगी हैं। बाल कलाकार मास्टर बिट्टू का अभिनय भी अच्छा
है।
फ़िल्म तकनीकी रूप से उच्च गुणवत्ता वाली है। दो
नागों की लड़ाई का दृश्य तथा नाग के मनुष्य रूप में एवं मनुष्य से पुनः नाग रूप में
बदलने के दृश्य अद्भुत हैं क्योंकि उस युग में कम्प्यूटर ग्राफ़िक नहीं थे। अतः यह
सोचने वाली बात है कि निर्देशक इन दृश्यों (तथा नाग एवं नागिन के अन्य विभिन्न
दृश्यों) को कैसे फ़िल्मा पाया। फ़िल्म का कला-निर्देशन भी अच्छा है और पार्श्व
संगीत एवं संवाद भी। छायाकार ने नाग तथा नागिन से संबंधित दृश्यों को फ़िल्माने में
कमाल कर दिखाया है। सम्पादक ने भी बहुत अच्छा काम किया है और अपनी कैंची कुछ इस
तेज़ी से चलाई है कि फ़िल्म अधिक लम्बी नहीं हो, केवल आवश्यक दृश्य सिलसिलेवार उसमें रहें जिन्हें दर्शक अपना दिल थामे देखता
चला जाए एक पल को भी नज़रें परदे से हटाए बिना।
लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने फ़िल्म में मधुर संगीत
दिया है। नाग-नागिन पर फ़िल्माया गया गीत ‘तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना’ कई बार फ़िल्म
में आता है और प्रभावित करता है। उसके अतिरिक्त अन्य गीत यथा ‘तेरा मेरा मेरा तेरा मेरा तेरा तेरा मेरा मिल गया दिल दिल से’, ‘हफ़्तों महीनों बरसों नहीं सदियों से हैं पुराने’ और ‘तेरे इश्क़ का मुझ पे हुआ ये असर है’ भी अच्छे बन पड़े
हैं। फ़िल्म के सुंदर गीत वर्मा मलिक ने लिखे हैं।
सार रूप में मुझे बस यही कहना है कि आप
अंधविश्वास पर आधारित इस कथा तथा इसमें समाहित अन्य अवधारणाओं पर विश्वास मत कीजिए
लेकिन इस फ़िल्म को (यदि अब तक आपने नहीं देखा है)
तो देख लीजिए। आपको लगभग ढाई घंटे का सम्पूर्ण मनोरंजन प्राप्त होगा तथा
फ़िल्म देखने के उपरांत कोई निराशा नहीं होगी, यह मेरी गारंटी है।

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