रविवार, 29 मार्च 2026

आनंद बनाम कल हो ना हो

सुप्रतिष्ठित फ़िल्मकार हृषिकेश मुखर्जी ने दो फ़िल्में ऐसी बनाईं जिनमें नायक या नायिका को असाध्य रोग से पीड़ित दिखाया गया है – १. आनंद (१९७१), . मिली (१९७५)। इनमें से आनंद को एक कालजयी फ़िल्म माना जाता है। आनंद का नायक आनंद (राजेश खन्ना) कैंसर का रोगी है तथा उसके जीवन का कुछ ही समय शेष रह गया है जब वह मुम्बई आता है एवं कई लोगों से मिलता है। वह जानता है कि वह शीघ्र ही मरने वाला है लेकिन वह ज़िंदादिली से भरपूर है तथा मिलने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर अपने सकारात्मक दृष्टिकोण का प्रभाव छोड़ता है। वह अपनी चिकित्सा करने वाले डॉक्टर भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) का उनकी प्रेयसी (सुमिता सान्याल) से मिलन भी करवाता है। इस संसार को छोड़कर जाते-जाते भी वह बहुत-से लोगों को जीने की नव-प्रेरणा दे जाता है। जीवन के प्रति सकारात्मक ऊर्जा से भरी हुई यह फ़िल्म बहुत सराही गई तथा इसे एक क्लासिक फ़िल्म ही नहीं, भारत में बनी हुई सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक माना जाता है। इस फ़िल्म में राजेश खन्ना का अभिनय संभवतः उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय है।

तीन दशक से अधिक समय के उपरांत निर्माता करण जौहर ने आनंद की कहानी से प्रेरणा लेकर अपनी नई फ़िल्म की कहानी लिखी जिसका नाम है कल हो ना हो जिसका निर्देशन करण ने स्वयं न करके निखिल अडवाणी से करवाया। कल हो ना हो (२००३) का नायक अमन माथुर (शाह रुख़ ख़ान) भी एक असाध्य रोग से पीड़ित है तथा उसका जीवनकाल अधिक नहीं बचा है। इस तथ्य के साथ वह न्यू यॉर्क आता है एवं अपने रोग की बात सभी से छुपाते हुए कई लोगों से मिलता है जिनमें प्रमुख है उसका पड़ोसी परिवार जिसे एक दोषपूर्ण परिवार कहा जा सकता है क्योंकि परिवार की प्रमुख जेनिफ़र (जया बच्चन) एवं उनकी सास लाजवंती (सुषमा सेठ) एक-दूसरी से घृणा करती हैं। वह इस परिवार की कन्या नैना (प्रीति ज़िंटा) से मन-ही-मन प्रेम करने लगता है किंतु अपने जीवन की अल्पकालिकता को जानते हुए उससे अपने मन की बात नहीं कहता एवं उसे उसके सच्चे मित्र रोहित (सैफ़ अली ख़ान) के निकट ले आता है। इस प्रक्रिया में वह अपने चहुँओर सकारात्मक ऊर्जा को प्रसारित करता है तथा अपने संपर्क में आने वाले लोगों को जीने की नई प्रेरणा देता है।


मेरी दृष्टि में ये दोनों ही फ़िल्में बहुत अच्छी हैं तथा जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने एवं ज़िंदादिल रहकर जीवन बिताने की प्रेरणा देती हैं। सादगी से परिपूर्ण आनंद तथा भव्यता के साथ बनाई गई कल हो ना हो कथानक की समानता के बावजूद कई रूपों में भिन्न हैं। आनंद के रोग तथा अल्पजीवी होने के बारे में उसके आसपास के लोगों को जानकारी है। वह अच्छा इंसान है लेकिन उसके आसपास के लोग भी अच्छे इंसान ही हैं। उसकी सकारात्मकता को उसके संपर्क में आने वाले अच्छे लोगों की सकारात्मकता का संबल मिलता है। यदि आपके आसपास के लोग नकारात्मक हों तो आपका सकारात्मक बने रहना अत्यन्त कठिन हो जाता है। आनंद के विपरीत कल हो ना हो का नायक अमन माथुर अपने रोग के विषय में अपने आसपास के लोगों को जानकारी नहीं होने देता। उसके आसपास के माहौल (पड़ोस) में नकारात्मकता है जिसे वह अपने प्रयासों से सकारात्मकता में बदल देता है। मुझे आनंद का अपने रोग का संदर्भ देकर दूसरों को भावुक कर देना पसंद नहीं आया (विशेषकर वह दृश्य जब वह गुजराती भाषा सीखने की कई पुस्तकें ख़रीद लाता है)। अमन भी आनंद की ही भांति दूसरों को ख़ुशियां बांटने में ही प्रयासरत रहता है किंतु वह अपने रोग की बात किसी को भी बताकर उसे दुखी नहीं करना चाहता। दूसरे लोगों पर उसकी सकारात्मकता का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है विशेष रूप से फ़िल्म की नायिका पर जो कि उससे मिलने से पहले हीनभावना से ग्रसित रहती थी। उससे मिलने के उपरांत ही उसमें आत्मविश्वास का संचार होता है।

आनंद में कोई प्रेम-त्रिकोण नहीं है जबकि कल हो ना हो में प्रेम-त्रिकोण है। आनंद में आनंद अपने मित्र एवं चिकित्सक भास्कर बनर्जी को उनकी प्रेयसी से मिलाने में निमित्त बनता है तो कल हो ना हो में अमन अपनी प्रेयसी नैना को अपने से दूर करके उसके मित्र रोहित से उसका जीवन भर का साथ बना देने में निमित्त बनता है। आनंद में कोई दोषपूर्ण परिवार नहीं है जबकि कल हो ना हो में अमन का पड़ोसी कपूर परिवार एक दोषपूर्ण परिवार है जिसके दो महत्वपूर्ण सदस्यों के बीच अच्छे संबंध नहीं हैं तथा उसका एक पीड़ादायी अतीत है। आनंद के मुरारीलाल वाले दृश्य से प्रेरणा लेकर ही करण जौहर ने कल हो ना हो में रामदयाल वाला प्रसंग रचा है। आनंद एक गुदगुदाने वाली फ़िल्म होते हुए भी मूलत: एक गंभीर फ़िल्म है जबकि कल हो ना हो का काफ़ी सारा भाग एक हास्य फ़िल्म होने का आभास देता है एवं गंभीर पक्ष को इसमें कम समय दिया गया है।

आनंद एक साफ़सुथरी फ़िल्म है जबकि कल हो ना हो में रोहित की नौकरानी कांताबेन (सुलभा आर्य) के चरित्र को लेकर करण जौहर ने अभद्र हास्य ठूंसने की मूर्खता की है जिससे फ़िल्म की गुणवत्ता कम ही हुई है। आनंद दर्शकों को अपने आसपास का ही व्यक्ति लगता है जबकि अमन का चरित्र लार्जर दैन लाइफ़ है जो प्रभावित तो करता है लेकिन किसी दूसरी ही दुनिया से आया हुआ लगता है। स्वाभाविक रूप से दोनों ही फ़िल्में दुखांत हैं किंतु इनके केंद्रीय चरित्र दर्शकों के मन में अमिट छाप छोड़ जाते हैं। आनंद एक छोटी-सी फ़िल्म है जबकि कल हो ना होएक अनावश्यक रूप से लम्बी फ़िल्म है। आनंद में स्त्री पात्रों की भूमिकाएं छोटी हैं जबकि कल हो ना हो में नायिका नैना की भूमिका नायक अमन से भी अधिक लम्बी एवं प्रभावपूर्ण है। वस्तुतः कल हो ना हो को नैना के आत्मकथ्य के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है।

दोनों ही फ़िल्मों में मुख्य पात्रों सहित सभी कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय किया है। जहाँ राजेश खन्ना ने आनंद के चरित्र को अमर कर दिया है वहीं शाह रुख़ ख़ान ने भी अमन के चरित्र को अत्यन्त प्रभावी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है जो अपने दर्द को अपने ही भीतर रखकर बाहर ख़ुशियां बिखेरते हैं। कल हो ना हो के कई पात्र केवल हास्य पैदा करने हेतु रखे गए लगते हैं एवं इसी कारण बनावटी लगते हैं। कल हो ना हो में सास लाजवंती तथा बहू जेनिफ़र के मध्य की दूरी एक फ़िल्मी संयोग द्वारा दूर करवाई गई है जिसके उपरांत वह परिवार एक होता है। ऐसा कुछ आनंद में नहीं है। आनंद में गीत तो अवश्य हैं लेकिन कल हो ना हो की भांति फ़िल्मी अंदाज़ का नाच-गाना नहीं है। वैसे संगीत दोनों ही फ़िल्मों का सुमधुर है। आनंद के गीत तो जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करने वाली साहित्यिक कविताओं की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। आनंद में नायक के साथ कोई नायिका नहीं है जबकि कल हो ना हो में नायिका को हम नायक के साथ की ही नायिका मान सकते हैं क्योंकि दोनों मन-ही-मन एक दूसरे से प्रेम करते हैं। कल हो ना हो में अमन नैना को अपने से दूर करने के लिए अपने विवाहित होने का झूठ बोलता है। इस संदर्भ में नायिका का अपनी मां जेनिफ़र से यह कहना मुझे तर्कपूर्ण नहीं लगा कि यदि उसे अमन के विवाहित होने की बात पता होती तो वह उससे प्रेम नहीं करती क्योंकि प्रेम जान-बूझकर नहीं किया जाता, बस हो जाता है।

कल हो ना हो में मनोरंजन तत्व प्रधान है जबकि आनंद में भावनात्मक तत्व प्रधान है। इसीलिए कल हो ना हो तुलनात्मक दृष्टि से अधिक मनोरंजन प्रदान करती है। आनंद एक क्लासिक है और सदा रहेगी जबकि कल हो ना हो प्रमुखतः करण जौहर द्वारा प्रवासी भारतीय दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई फ़िल्मों की श्रेणी में आने वाली फ़िल्म लगती है। लेकिन यदि जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को विकसित करना हो तो इन दोनों ही फ़िल्मों को देखा जा सकता है। अलग-अलग ढंग की फ़िल्में होने पर भी उनका संदेश एक ही है जिसे आनंद के इस संवाद द्वारा समझा जा सकता है – ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं

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14 टिप्‍पणियां:

  1. तुलनात्मक समीक्षा बहुत सटीक है जितेन्द्र जी !दोनों फिल्में देखी हुई हैं सो कह सकती हूँ कि आपकी बहुत सुन्दर और रोचक पोस्ट है ।सादर नमस्कार !

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    1. हृदय की गहराई से आपका आभार प्रकट करता हूँ माननीया मीना जी

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  2. सटीक समीक्षा, आनंद देखी है, दूसरी नहीं देखी पर अब लगता है देख ली !!

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद आपका अनिता जी। 'कल हो ना हो' को भी देख लीजिए। अच्छी फिल्म है वह भी।

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  3. बह सुन्दर तुलनात्मक समीक्षा "कल हो आ हो' देखी है , अब आनंद देखने का मन है.।

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    1. हृदय के तल से आपका आभार प्रकट करता हूँ माननीया सुधाजी। आनंद अवश्य देखिए। आपको बहुत पसंद आएगी।

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  4. ‘ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं’। आनंद ने बहुत प्रभावित किया है। अंतिम सीन दिल को छू देने वाला है या कहिए रुला देने वाला... बढ़िया लिखा है आपने ।

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    1. बहुत-बहुत आभार शिवम जी। सच ही आनंद का अंतिम दृश्य दिल को छू लेने वाला है।

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  5. दोनों फिल्मे देखी हुई है। हमेशा की तरह बहुत हि बढ़िया समिक्षा। ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं। यह डायलॉग तो बहुत ही फेमस है।

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  6. मैंने दोनों फिल्में देखीं हैं। दोनों सकारात्मक और प्रेरक फिल्म है। परन्तु दोनों में तुलना नहीं कर सकती। आनन्द फिल्म के निर्माण का समय और कल हो न हो के निर्माण के समय में बहुत परिवर्तन हुआ। समय के अनुसार समाज के बदलाव के अनुसार दोनों की कहानी और पृष्ठभूमि है। आपने बहुत अच्छ तुलनात्मक समीक्षा की है। बधाई

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    1. मैं आपसे सहमत हूँ माननीया जेन्नी जी। हार्दिक आभार आपका।

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