शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

फ़िल्म में पुनर्जन्म की गाथा

हम हिंदू पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। पुनर्जन्म होता है, यह बात गीता में भी उद्धृत है। पर न इसे विज्ञान मानता है न देश का विधि-विधान। लेकिन पुनर्जन्म की अनेक कथाएं सुनाई जाती हैं और अनेक फ़िल्में भी इस विषय पर बनी हैं। ऐसी ही एक फ़िल्म है कुदरत (१९८१)। अनेक बड़े सितारों से युक्त इस फ़िल्म को व्यावसायिक सफलता तो नहीं मिली थी किंतु विषय के निर्वहन हेतु इसे सराहा गया था। फ़िल्म के लेखक-निर्देशक थे चेतन आनंद। 


फ़िल्म आरंभ होती है चंद्रमुखी (हेमा मालिनी) के अपने माता-पिता के साथ शिमला आगमन के साथ जहाँ उसे बहुत कुछ पहचाना हुआ लगता है जबकि अपने जन्म के कुछ समय उपरांत की एक यात्रा को छोड़कर वह कभी शिमला नहीं आई थी। वहीं वह मिलती है डॉक्टर नरेश (विनोद खन्ना) से जिसके माता-पिता उसके माता-पिता के मित्र हैं। वे भी मित्र बन जाते हैं। नरेश एक मनोचिकित्सक है।

कुदरत की वास्तविक कहानी शुरु होती है चंद्रमुखी के एक विचित्र स्वप्न देखकर डर जाने तथा एक अपरिचित व्यक्ति मोहन (राजेश खन्ना) को माधो कहकर पुकारने से। मोहन सरकारी वकील है तथा उसे शिमला के एक धनी व्यक्ति चौधरी जनक सिंह (राज कुमार) ने पाल-पोसकर बड़ा किया है। मोहन के माता-पिता नहीं हैं तथा वह चौधरी जनक सिंह का अपने पर बहुत उपकार मानता है एवं उसकी पुत्री करुणा (प्रिया राजवंश) से विवाह करने को तैयार है। करुणा भी वकील है।

पर जब वह चंद्रमुखी के संपर्क में आता है तो चंद्रमुखी उसे माधो तथा स्वयं को पारो कहकर पुकारने लगती है। चंद्रमुखी के स्वप्नावस्था में डर जाने एवं अस्वस्थ हो जाने की स्थिति का उपचार करने के लिए नरेश उसे सम्मोहित (हिप्नोटाइज़) करता है। सम्मोहनावस्था में चंद्रमुखी अपने पूर्व जन्म की स्थिति में पहुँच जाती है। उस स्थिति में वह स्वयं को पारो बताती है एवं यह भी बताती है कि उसे माधो से प्रेम था। वह यह भी बताती है कि छोटे सरकार द्वारा उसके साथ दुराचार किए जाने के उपरांत वे दोनों ही मारे गए थे। ये छोटे सरकार कोई और नहीं चौधरी जनक सिंह ही हैं। ये घटनाएं बीस वर्ष पूर्व की हैं।

मोहन को यह सब पता चलता है तो उसे भी विश्वास हो जाता है कि माधो ने उसके रूप में तथा पारो ने चंद्रमुखी के रूप में पुनर्जन्म लिया है। साथ ही उसे चंद्रमुखी से प्रेम हो जाता है। वे सब अर्थात् मोहन, चंद्रमुखी एवं नरेश माधो की बुज़ुर्ग हो चुकी बहन सत्तो (अरुणा ईरानी) से भी मिलते हैं तथा माधो-पारो से संबंधित बहुत-सी बातें मालूम करते हैं। अब नरेश और मोहन दोनों को लगता है कि चंद्रमुखी की अस्वस्थ मानसिक स्थिति एवं भयावह स्वप्नों का उपचार यही है कि दिवंगत पारो और माधो को न्याय मिले। विभिन्न प्रकार के प्रमाणों को एकत्र करके मोहन चौधरी जनक सिंह पर पारो की हत्या का मुकद्दमा दायर कर देता है। करुणा अपने पिता के लिए बचाव पक्ष की वकील बन जाती है। विभिन्न अदालती दृश्यों के साथ-साथ कथानक में कई मोड़ आने के बाद फ़िल्म अपने क्लाईमेक्स तक पहुँचती है।

किसी भी अनाड़ी फ़िल्मकार के हाथों से यह कहानी ठीक ढंग से चित्रपट पर नहीं उतारी जा सकती थी किंतु चेतन आनंद भारत के अत्यन्त सम्मानित फ़िल्मकार रहे हैं। उन्होंने अपनी ही इस कथा को अत्यन्त कुशलतापूर्वक रजतपट पर उतारा है। फ़िल्म की पुनर्जन्म की कथा (तथा उससे जुड़ी कुछ अन्य बातें भी) चाहे विश्वसनीय न लगे, यह आदि से अंत तक रोचक है एवं दर्शकों को बांधे रखती है। फ़िल्म में राज कुमार, राजेश खन्ना, हेमा मालिनी, विनोद खन्ना एवं प्रिया राजवंश जैसे सितारे हैं एवं फ़िल्म की पटकथा इन सभी सितारों के चरित्रों के साथ न्याय करती है। चेतन आनंद ने सभी से अत्यन्त स्वाभाविक अभिनय करवाया है। सम्पूर्ण कथानक सहज रूप से प्रवाहित होता है जिसमें एक-के-बाद-एक आते मोड़ दर्शक को एक मिनट के लिए भी इधर-उधर होने का अवसर नहीं देते हैं।

तकनीकी दृष्टि से भी फ़िल्म की गुणवत्ता उत्कृष्ट है। शिमला की नयनाभिराम दृश्यावली आँखों को शीतलता पहुँचाती है। कला-निर्देशक तथा छायाकार दोनों ने ही अपना-अपना काम बाख़ूबी किया है। फ़िल्म का पार्श्व संगीत कथानक के अनुरूप ही है। विभिन्न चरित्रों के संवाद भी अच्छे हैं। फ़िल्म की लंबाई कथानक को ध्यान में रखते हुए ठीक ही है विशेषकर यह देखते हुए कि फ़िल्म में अनावश्यक बातें बिलकुल नहीं हैं। प्रत्येक बात, प्रत्येक घटना एवं प्रत्येक दृश्य मुख्य कथा से संबद्ध है।

मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों पर राहुल देव बर्मन ने मधुर संगीत दिया है। तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया’, हमें तुमसे प्यार कितना’, छोड़ो सनम काहे का ग़म आदि गीत तो फ़िल्म के प्रदर्शन के समय लोगों की ज़ुबान पर चढ़ ही गए थे, अन्य गीत भी बहुत अच्छे बन पड़े। ये गीत आज भी सुने जाने पर मन को एक सुखद अनुभूति से भर देते हैं।

कुल मिलाकर कुदरत एक अत्यन्त मनोरंजक एवं प्रभावशाली फ़िल्म है। आप पुनर्जन्म में विश्वास करते हों या नहीं; यह फ़िल्म आपको पसंद आएगी, इसमें संदेह नहीं।

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बुधवार, 14 जनवरी 2026

एक हृदयस्पर्शी रहस्यकथा

हिंदी के लोकप्रिय लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित कई स्थायी पात्र ऐसे हैं जो अत्यन्त संवेदनशील हैं तथा अपने निजी हित से पहले अन्य व्यक्तियों के हिताहित एवं भावनाओं की परवाह करते हैं। उनके द्वारा सृजित एक ऐसा ही पात्र है – पुलिस इंस्पेक्टर प्रभु दयाल जो कि उनकी सुनील सीरीज़ के उपन्यासों में प्रायः दिखाई देता है। सुरेन्द्र मोहन पाठक न केवल प्रभु दयाल को एक अत्यन्त कार्यकुशल एवं कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में चित्रित करते हैं, वरन वे यह भी बताते हैं कि वह ऊपर से चाहे कठोर दिखाई दे, भीतर से एक अत्यन्त संवेदनशील मनुष्य है जो किसी भी निर्दोष को दंड दिलवाने में विश्वास नहीं रखता तथा अन्य व्यक्तियों एवं समाज के हितों को अपनी पुलिसिया कार्रवाई से ऊपर मानता है। उसके इस स्वभाव का उदाहरण है लेखक का ख़ाली मकान नामक उपन्यास जिसका कि नायक वही है।

ख़ाली मकान एक विशिष्ट उपन्यास है जिसमें लेखक का लोकप्रिय नायक सुनील उपस्थित नहीं है। लेखक ने इस उपन्यास में अपना स्वयं का पात्र भी रखा है जिससे प्रभु दयाल शिकायत करता है कि एक ओर तो वह उसे एक अत्यन्त कार्यकुशल पुलिस अधिकारी के रूप में चित्रित करता है, वहीं दूसरी ओर उसे किसी भी केस को हल नहीं करने देता। लेखक जब उसे कहते हैं कि सुनील सीरीज़ के उपन्यास में केस को हल करते हुए तो सुनील को ही दिखाना आवश्यक है तो वह कहता है कि एक ऐसा उपन्यास लिखो जिसमें सुनील हो ही नहीं तथा वह केस को हल करे। लेखक उसकी बात मान लेते हैं और उसके लिए एक अत्यन्त पेचीदा केस लेकर आते हैं जिसे हल करना उसके लिए एक चुनौती है।

अब यह रहस्यकथा आरंभ होती है। पुलिस को राजनगर नामक काल्पनिक नगर में बहने वाली कृष्णा नदी में डोलती हुई एक नाव मिलती है जिसमें एक पुरुष तथा एक स्त्री की लाशें हैं। पुरुष के तन पर गिरजाघर के पादरियों द्वारा पहना जाने वाला सफ़ेद चोगा है। स्त्री का गला कटा हुआ है। प्रभु दयाल के लिए प्रथम कार्य है मरने वालों की वास्तविकता का पता लगाना और साथ ही हत्याओं के वास्तविक घटनास्थल तक पहुँचना। और ऐसा कर लेने के उपरांत अपराधी का पता लगाना। उसे पता चलता है कि मृत पुरुष लिटन रोड स्थित चर्च ऑव सेंट माइकल का पादरी जोसेफ़ कॉटन है जबकि मृत स्त्री सूसन डेनिंग नामक एक विवाहित महिला है। प्रभु दयाल जी जान से मामले की छानबीन में लग जाता है। वह दोनों मृतकों से जुड़े अनेक लोगों से मिलता है जिनमें सम्मिलित हैं – पादरी की पत्नी, उसके दो साले, सूसन का पति और उसकी बेटी, पादरी की भूतपूर्व सेक्रेटरी हेलेन रीडली, उसकी वर्तमान सेक्रेटरी सिल्विया नोरिस, पादरी के परिवार का वकील जॉर्ज सैमसन, गिरजाघर की प्रबंधन समिति का अध्यक्ष हेनरी सिल्वेस्टर आदि। घटनास्थल निकलता है जॉर्जटाउन नामक स्थान में स्थित एक ख़ाली मकान जिसमें कि हत्याएं हुई थीं। प्रभु दयाल वहाँ के चौकीदार धनीराम से भी मिलता है। और साथ ही उसकी भेंट होती है एक साधु महाराज से भी जिनकी कुटिया भी उस मकान के समीप ही स्थित है।

मामले को हल करने के लिए रात-दिन एक किए हुए प्रभु दयाल की साधु महाराज से लंबी वार्ता होती है। वह साधु महाराज से बहुत प्रभावित होता है तथा उन्हें अपनी हथेली दिखाकर पूछता है कि वह इस मामले को हल करने में सफल होगा या नहीं। साधु महाराज बहुत सोच-विचार कर उसे यह बताते हैं कि सफलता दो प्रकार की होती है – एक वह जिससे आत्मिक संतोष प्राप्त होता है तथा दूसरी वह जिससे सांसारिक यश मिलता है; उसे प्रथम प्रकार की सफलता मिलेगी, दूसरे प्रकार की नहीं। प्रभु दयाल इस बात को सुनकर समझ नहीं पाता कि जब वह मामले को हल कर लेगा तो उसे सांसारिक यश क्यों नहीं मिलेगा। किंतु जब वह सम्पूर्ण मामले की तह तक जाकर वास्तविक अपराधी का पता लगा लेता है तो उसका संवेदनशील स्वभाव अपराधी को तथा उसके सहयोगियों को पकड़ने के आड़े आ जाता है और तब वह साधु महाराज की बात का मर्म समझ पाता है। उसे लगता है कि यदि वह अपराधी को तथा उसके सहयोगियों को गिरफ़्तार करके न्यायालय में प्रस्तुत करेगा तो वे लोग जो कि उसकी दृष्टि में निर्दोष हैं, अनावश्यक रूप से न्यायिक प्रक्रिया में फंस जाएंगे। उसे वास्तविक अपराधी से सहानुभूति भी होती है तथा उसे लगता है कि यह व्यक्ति तो एक पवित्र लक्ष्य हेतु अपना जीवन होम कर रहा है जिसके चलते उसका दंडित होना और यहाँ तक कि गिरफ़्तार होना भी उसके प्रति न्यायपूर्ण नहीं होगा। अपनी इसी संवेदनशीलता के चलते वह किसी को गिरफ़्तार नहीं करता एवं मामले को अनसुलझा बताकर बंद कर देता है।

ख़ाली मकान एक अत्यन्त रहस्यपूर्ण कथा है जिसके वास्तविक रहस्य का सही-सही अनुमान लगाना किसी भी पाठक के लिए लगभग असंभव है। आदि से अंत तक रोचक यह उपन्यास अपने अंतिम भाग में पाठकों के मन को छू लेता है एवं इंस्पेक्टर प्रभु दयाल के एक संवेदनशील मनुष्य होने की विशेषता पर प्रकाश डालता है। पुलिस अधिकारियों की जो छवि भारतीय जनमानस में बनी हुई है, उससे इतर एक छवि पाठकों के समक्ष आती है प्रभु दयाल के रूप में। वह इस प्रलोभन में नहीं आता कि यदि वह केस के हल को तथा संबंधित व्यक्तियों को सबके सामने प्रस्तुत कर देगा तो उसे अपने विभाग, प्रेस तथा जनता में बहुत प्रशंसा मिलेगी (ऐसे में उसकी तरक्की की भी संभावना होगी)। एक संवेदनशील मनुष्य के रूप में वह केस से जुड़े व्यक्तियों ही नहीं, लिटन रोड के सम्पूर्ण ईसाई समुदाय के विषय में सोचता है तथा विचार करता है कि उन सबकी भलाई किस बात में है। और उसका मन उसे प्रेरित करता है कि वह निजी हित को अनदेखा करके उन सबकी भलाई को देखे। उसकी यह संवेदनशीलता पाठकों को यह अनुभव करवाती है कि उन्होंने एक ऐसी रहस्यकथा पढ़ी है जो न केवल रोचक है वरन हृदयस्पर्शी भी है।

सरल हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास सुरेन्द्र मोहन पाठक के श्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जा सकता है। पाठक साहब ने प्रभु दयाल के रूप में जैसा पुलिस अधिकारी अपने पाठकों के समक्ष रखा है, वैसे पुलिस अधिकारी विरले ही होते हैं जो मानवता को अपनी पुलिस तथा कानूनी प्रक्रिया से ऊपर रखें। हिंदी साहित्य के प्रेमी इस असाधारण उपन्यास को अवश्य पढ़ें।

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शनिवार, 3 जनवरी 2026

एक मामला, कई हल

प्राय: रहस्यकथाएं लगभग एक ही तरह की होती हैं। कोई क़त्ल होता है जिसकी जाँच-पड़ताल की जाती है, कई व्यक्तियों पर संदेह जाता है एवं अंत में वास्तविक अपराधी का पता चलता है। लेकिन सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित उपन्यास – क्राइम क्लब एक भिन्न प्रकार की कथा है जिसमें कई व्यक्ति अपने दिमाग़ी घोड़े दौड़ाकर एक क़त्ल के मामले का हल निकालने का प्रयास करते हैं तथा सभी भिन्न परिणामों पर पहुँचते हैं।

क्राइम क्लब अपराधशास्त्र में रुचि रखने वाले कुछ व्यक्तियों द्वारा बनाई गई एक संस्था है जिसके सदस्यों के समक्ष एक क़त्ल का मामला आता है। इस मामले को पुलिस असफल होकर बंद कर चुकी है अर्थात् अपराधी का पता नहीं चल सका है। अब क्राइम क्लब के सदस्य पुलिस से कुछ प्राथमिक जानकारी लेकर अपने-अपने ढंग से इस मामले के हल तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। ये सदस्य हैं: 1. विवेक आगाशे जो कि एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं प्राइवेट जासूस हैं, 2. रुचिका केजरीवाल जो कि एक युवा क्राइम रिपोर्टर हैं, 3. लौंगमल दासानी जो कि एक प्रसिद्ध वकील हैं, 4. छाया प्रजापति जो कि एक प्रथम श्रेणी की न्यायिक अधिकारी हैं, 5. अभिजीत घोष जो कि पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं एवं रहस्यकथाओं में रुचि रखते हैं, 6. अशोक प्रभाकर जो कि एक जासूसी उपन्यास लेखक हैं।

मामला यह है कि अंजना निगम नामक एक संपन्न महिला की ज़हरभरी चॉकलेट खाने से मृत्यु हो जाती है। उन चॉकलेटों का पैकेट उसके पति मुकेश निगम को अपने एक साथी दुष्यंत परमार से प्राप्त हुआ था। दुष्यंत परमार को वह पैकेट डाक से मिला था जो कि प्रत्यक्षतः सोराबजी एंड संस नामक एक चॉकलेट निर्मात्री कम्पनी द्वारा उपहार स्वरूप भेजा गया था। अंजना ने अधिक चॉकलेट खाई थीं जबकि उसके पति मुकेश ने दो चॉकलेट खाई थीं एवं बीमार वह भी पड़ा था। प्रश्न यह है कि वे चॉकलेटें यदि सोराबजी एंड संस ने नहीं भेजी थीं तो किसने भेजी थीं एवं भेजने वाले का निशाना कौन था – अंजना निगम अथवा दुष्यंत परमार ? पुलिस इस मामले को नहीं सुलझा पाती एवं अंततः इसे क्राइम क्लब को सौंप देती है।

क्राइम क्लब के सदस्य यह तय करते हैं कि वे सब अलग-अलग और अपने-अपने ढंग से इस मामले को सुलझाने का प्रयास करेंगे तथा कोई भी सदस्य अपनी कार्यप्रणाली एवं जानकारियां दूसरे सदस्य से साझा नहीं करेगा। एक सप्ताह के प्रयास के उपरांत सदस्य बारी-बारी अपना हल बाकी सदस्यों के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। किसकी बारी कब आएगी, यह पर्चियां निकालकर तय किया जाता है। और फिर होता यह है कि एक ही जैसे तथ्यों से विभिन्न सदस्य भिन्न-भिन्न निष्कर्ष निकालते हैं एवं प्रत्येक सदस्य एक भिन्न हल लेकर आता है जिसमें एक भिन्न व्यक्ति को अपराधी के रूप में स्थापित किया जाता है। यह दिमाग़ी व्यायाम बड़ा दिलचस्प साबित होता है और अंतिम सदस्य के अपना हल प्रस्तुत करने के उपरांत जब वास्तविक अपराधी का पता चलता है तो सभी चौंक जाते हैं।

यह उपन्यास सुरेन्द्र मोहन पाठक के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जा सकता है क्योंकि जैसा कि मैंने प्रथम परिच्छेद में कहा कि यह कोई आम रहस्यकथा नहीं है। यह एक ऐसी रहस्यकथा है जो कि सामान्य रहस्यकथाओं से बिलकुल अलग है। लेखक ने सिद्ध किया है कि समान तथ्यों को अलग-अलग व्यक्ति भिन्न कोणों से देखकर अलग-अलग ढंग से उनकी व्याख्या करते हैं और अलग-अलग नतीजे निकालते हैं। साथ ही किसी भी तथ्य के किसी भाग को छुपाकर एवं किसी भाग को विशेष रूप से उजागर करके लोगों को भ्रमित किया जा सकता है।

सरल हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास अत्यंत रोचक है तथा आरम्भ से अंत तक पाठकों को बांधे रखता है। क्राइम क्लब के सदस्यों के साथ-साथ उपन्यास का पाठक भी वास्तविक अपराधी का अनुमान लगाने का प्रयास करता है लेकिन वास्तविक अपराधी को पहचान पाना अत्यंत कठिन है। यही लेखक की सबसे बड़ी सफलता है। उपन्यास में न तो कोई एक्शन या मारधाड़ है और न ही कोई विशेष मोड़ हैं। केवल तथ्यों का अलग-अलग प्रकार से विश्लेषण बताते हुए पाठकों को एक दिमाग़ी ख़ुराक दी गई है जो कि न केवल रहस्यकथाएं पसंद करने वालों को बल्कि सामाजिक उपन्यास पसंद करने वालों को भी रास आएगी।

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