शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है . . .

प्रति वर्ष नौ जुलाई को स्वर्गीय गुरु दत्त का जन्मदिन पड़ता है । केवल उनतालीस वर्ष की आयु में उन्होंने मौत को ज़िन्दगी से बेहतर पाया और उसी की गोद में सो गए क्योंकि और कोई गोद उन्हें नसीब ही नहीं हुई । वे उस शायर की तरह थे जिसके लिए कहा गया है कि - वो लिखता है ज़ीस्त की हद तक, मरने पर वो शायर होगा । उनके द्वारा बनाई गई अमर कृति 'प्यासा' (१९५७) के नायक की ही तरह उनके चाहने वाले भी उनकी ज़िन्दगी में कम थे लेकिन जिनकी तादाद उनकी मौत के बाद लगातार बढ़ती ही चली गई ।
तेरह वर्ष पूर्व उनके जन्मदिवस के अवसर पर 'दैनिक भास्कर' समाचार-पत्र के 'नवरंग' नामक साप्ताहिक परिशिष्ट में श्री गीत चतुर्वेदी ने उनके ऊपर 'ग़म की बारिश, नम-सी बारिश' शीर्षक से एक दिल को चीर देने वाला लेख लिखा था । मैंने उन्हीं दिनों अपनी नौकरी बदली थी तथा राजस्थान के रावतभाटा नामक स्थान से निकलकर दिल्ली जा रहा था । रावतभाटा में मैंने चतुर्वेदी जी के लेख को अख़बार में पढ़ा और मेरी हालत यह हुई कि बस आँखें ही ख़ुश्क थीं क्योंकि मैं अपने आँसू किसी को दिखा नहीं सकता था, दिल भीतर-ही-भीतर रो पड़ा था । ग्यारह जुलाई दो हज़ार सात को जब मैंने अपने परिवार के साथ रावतभाटा को छोड़ा तो अख़बार के उस पन्ने को मैं अपने साथ ही ले गया जिस पर वो लेख छपा था । हफ़्ते भर बाद ही अपनी नई नौकरी में मेरा उत्तर प्रदेश के डाला नामक स्थान पर दौरे पर जाना हुआ । मैं अट्ठारह जुलाई को हवाई जहाज़ से वाराणसी पहुँचा और उसके उपरांत लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी सड़क मार्ग से तय करके डाला (सीमेंट फ़ैक्टरी) पहुँचा जहाँ के मेहमानख़ाने में मुझे ठहराया गया । मैं अख़बार का वो पन्ना अपने सामान में रखकर साथ ले आया था जिस पर चतुर्वेदी जी का लेख 'ग़म की बारिश, नम-सी बारिश' छपा था । तीन दिन तक यानी बीस जुलाई तक मैं डाला में रहा और हर रात अपने आरामदेय कमरे के एकांत में उस लेख को बार-बार पढ़ता रहा । मौसम भी बारिश का ही था और हाल यही था कि बाहर आसमान से बारिश होती रहती थी और अंदर (उस लेख को पढ़ते हुए) मेरी आँखों से । 

लेकिन इक्कीस जुलाई को जब मैं डाला से प्रस्थान करके चुनार नामक स्थान पर स्थित अपनी नियोक्ता कंपनी के दूसरे संस्थान (सीमेंट फ़ैक्टरी) चला गया तो अख़बार का वो पन्ना डाला के मेहमानख़ाने के अपने कमरे में ही (शायद तकिये के नीचे) भूल गया । मैं डाला वापस नहीं लौट सका और तीसरे दिन अपना दौरा पूरा करके चुनार से ही दिल्ली चला गया । तक़रीबन दो महीने बाद मैं डाला के दौरे पर पुनः गया तो सही लेकिन अब अख़बार का वह पन्ना मुझे कहाँ मिलता ? बस वो लेख और ख़ासतौर पर उसका उनवान 'ग़म की बारिश, नम-सी बारिश' मेरे दिल में किसी फाँस की तरह धंसा रह गया । तेरह साल बाद पिछले दिनों मैंने यूँ ही इंटरनेट पर गूगल सर्च में टटोला तो मुझे वह लेख गीत चतुर्वेदी जी के 'वैतागवाड़ी' नामक ब्लॉग पर मिल गया । और तेरह साल बाद उसे फिर से पढ़कर मेरी आँखों से अश्क उसी तरह टपके जिस तरह तेरह साल पहले टपके थे ।
गुरु दत्त पर मैंने तब से पढ़ना और उन्हें तब से समझना शुरु किया था जब मैं एक नादान बच्चा ही था । मेरे बचपन के दिनों की ही बात है जब फ़िल्मी पत्रिका 'माधुरी' में मैंने गुरु दत्त की माँ वासंती पादुकोण का लिखा हुआ लेख पढ़ा था - 'गुरु दत्त - मेरा बेटा' और इस बात को जाना था कि उनकी माँ ही उन्हें सबसे ज़्यादा समझती थी - वो माँ जिसकी गोद उसके बेटे को मरते वक़्त नसीब नहीं हुई और वो माँ जो बेटे की अकाल मौत के बाद तीस साल तक उसके जाने के ग़म के साथ ज़िन्दा रही (ठीक शहीद भगत सिंह की माँ की तरह)।

जब मैंने गुरु दत्त की अमर कृति 'कागज़ के फूल' की समीक्षा लिखी थी तो उस पर मेरे ब्लॉगर मित्र निशांत सिंह (sydbarett) ने टिप्पणी की थी कि दुनिया जीनियस को इसलिए दंडित करती है क्योंकि वो उसकी समझ से परे होता है । और शायद यही एक जीनियस की दुखदायी विडम्बना है कि वो दुनिया के और दुनियादारी के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता, दूसरी ओर दुनियादारी में डूबी दुनिया न उसे समझ पाती है और न ही उसकी प्रतिभा के साथ न्याय कर पाती है । जीनियस अकेला होता है । लेकिन ... लेकिन होता तो इंसान ही है न ? उसे भी तो कोई समझने वाला चाहिए, कोई प्यार करने वाला चाहिए । और न मिले तो ? यही जीनियस गुरु दत्त की ट्रेजेडी थी । 

जिस दिन मैंने 'वैतागवाड़ी' ब्लॉग पर 'ग़म की बारिश, नम-सी बारिश' को फिर से पढ़ा, उसी दिन शाम को नीम-अंधेरे में पूरी तनहाई और ख़ामोशी के आलम में यूट्यूब पर 'प्यासा' में गुरु दत्त पर फ़िल्माई गई साहिर की ग़ज़ल 'तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िन्दगी से हम' को देखा और सुना । फिर उसी फ़िल्म में स्थित साहिर की अमर नज़्म 'ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया' को भी देखा और सुना जिसकी शुरुआत में गाना शुरु करते हुए अंधेरे में दरवाज़े पर खड़े गुरु दत्त का साया सलीब पर टंगे जीसस क्राइस्ट की तरह दिखाई देता है । दोनों ही गीतों में मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ को अपने होठों पर लाते हुए गुरु दत्त के लिए ऐसा लगता है जैसे बोल उनके दिल की गहराई से निकल रहे हैं, वे लफ़्ज़ नहीं अहसास हैं जो बाहर आ रहे हैं - केवल उनके होठों पर नहीं, उनके चेहरे पर भी, उनकी आँखों में भी, सच कहा जाए तो उनके समूचे वजूद के ज़र्रे-ज़र्रे पर ।
गुरु दत्त ने स्वयं एक लेख लिखा था - 'क्लासिक्स एंड कैश' जिसमें उन्होंने इस बात को रेखांकित किया था कि इन दोनों शब्दों में समानता केवल इतनी ही है कि ये दोनों ही अंग्रेज़ी के अक्षर 'सी' से आरंभ होते हैं । अन्यथा जो रचना क्लासिक अर्थात् श्रेष्ठ है, उसे व्यावसायिक सफलता मिलना आवश्यक नहीं तथा जो रचना व्यावसायिक रूप से सफल है, उसका श्रेष्ठता के मानदंडों पर खरा उतरना आवश्यक नहीं । बाज़ार तथा धनार्जन का अपना दर्शन होता है । मामूली चीज़ें बहुत-सा पैसा कमा सकती हैं जबकि बेहतरीन चीज़ों को, हो सकता है कि कोई पूछने वाला ही न मिले । यह बात गुरु दत्त ने सम्भवतः 'कागज़ के फूल' (१९५९) फ़िल्म के संदर्भ में हुए अपने निजी अनुभव के आधार पर लिखी थी । लेकिन संसार सफलता को ही पूजता है, गुणों को नहीं; यह बात गुरु ने उससे भी पहले 'प्यासा' में बिना किसी लागलपेट के स्पष्टतः दर्शा दी थी । यह पाखंडी संसार गुणों का तो बस बखान ही करता है, सच तो यही है कि यहाँ जो बिकता है, वही चलता है । 

'प्यासा' के नायक विजय को आख़िर में किसी शख़्स से कोई शिकायत नहीं थी । उसे शिकायत थी समाज के उस ढाँचे से जो इंसान से उसकी इंसानियत छीन लेता है, मतलब के लिए अपनों को बेगाना बना देता है । उसे शिकायत थी उस तहज़ीब से जिसमें मुरदों को पूजा जाता है और ज़िंदा इंसान को पैरों तले रौंदा जाता है, जिसमें किसी के दुख-दर्द पर दो आँसू बहाना बुज़दिली समझा जाता है और झुककर मिलने को कमज़ोरी समझा जाता है । ऐसे माहौल में उसे कभी शांति नहीं मिल सकती थी । कामयाबी को ही सब कुछ मानने वाले समाज में 'काग़ज़ के फूल' के नायक सुरेश सिन्हा के तजुर्बात भी कुछ ऐसे ही रहे थे । गुरु द्वारा सिरजे गए और निभाए गए ये दोनों ही किरदार शायद उसकी अपनी शख़्सियत में जज़्ब हो गए थे । 

और इसीलिए एक दिन गुरु को नाउम्मीदी हो गई अपनी ज़िंदगी से, ठीक 'प्यासा' के नायक की तरह जो कशमकश-ए-ज़िंदगी से तंग आ गया था और कह रहा था - 

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम, ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बेदिली से हम 
हम ग़मज़दा हैं लाएं कहाँ से ख़ुशी के गीत, देंगे वही जो पाएंगे इस ज़िंदगी से हम 
लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उम्मीद, लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम 

गुरु को अंधेरे से प्यार था, आँसुओं से भी । आख़िर में अंधेरा और आँसू ही उसके हाथ लगे । उसने प्यार भी किया, शादी भी; लेकिन उसे हमसफ़र न मिला । अपनी ज़िन्दगी की आख़िरी रात को उसने हर उस शख़्स को पुकारा जो उसके तपते दिल को कुछ राहत दे पाता, उस पर ठंडक का फाहा रख पाता । पर कोई न आया - न गीता, न वहीदा, न कोई दोस्त, न कोई हमनवा । 'प्यासा' का नायक उसके मुक़ाबले कहीं ख़ुशनसीब था जो उसे एक चाहने वाली, समझने वाली और अपनाने वाली मिली जिसके साथ वो उस मतलबी दुनिया से दूर जाने के सफ़र पर निकल गया । उस दुनिया से दूर जाने के लिए जिसके लिए उसके लबों पर यही था - 

हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी; निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी 
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है 

यहाँ इक खिलौना है इंसां की हस्ती, ये बस्ती है मुरदापरस्तों की बस्ती 
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है 

ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है; वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है 
जहाँ प्यार की क़द्र ही कुछ नहीं है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
और आख़िर में - 

जला दो इसे, फूंक डालो ये दुनिया 
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया 
तुम्हारी है, तुम ही संभालो ये दुनिया 
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है 

दस अक्टूबर उन्नीस सौ चौंसठ की रात को अपनी मौत को गले लगाने से पहले शायद गुरु ने 'प्यासा' के नायक के मुँह से कहलवाए गए इन अशआर को ही याद किया, महसूस किया और इस दुनिया को ठुकरा दिया ।

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25 टिप्‍पणियां:

  1. मूल प्रकाशित लेख (21 जुलाई, 2020 को) पर ब्लॉगर साथियों की प्रतिक्रियाएं :

    रेणुJuly 22, 2020 at 12:03 PM
    बहुत भावपूर्ण आलेख है जितेन्द्र जी |अपनी फिल्म के नाकाम नायक की तरह ही गहन नैराश्य भाव में जीने वाले गुरुदत्त - भारतीय सिने- जगत के वो कोहिनूर थे- जो बड़े सस्ते में अपनी जान गँवा बैठे | वे अपने अनमोल जीवन का मोल ना समझ सके और घोर मायूसी ओढ़कर अपनी खुशियों से मुंह मोड़कर अनंत में विलीन हो गये | अगर वे कुछ साल और जीवित रहते तो कहना गलत ना होगा , उनके आगे कोई टिक ना पाता और वे सिनेमा को ना जाने किन ऊँचाइयों तक ले जाते ! एक सुंदर ,स्नेही परिवार के मुखिया और एक अत्यंत प्रतिभाशाली पत्नी के होते उनका भटकाव अतिभावुकता में उन्हें ना जाने किस ओर बहा ले गया और एक बहुआयामी प्रतिभा के स्वामी समस्त सिने प्रेमियों को टीस देकर हमेशा के लिए चले गये | यूँ तो संसार नश्वरता का पर्याय है और हर कोई यहाँ हमेशा नहीं रहता पर किसी ऐसी प्रतिभा का असमय जाना देश , समाज और क्षेत्र विशेष के लिए बहुत बड़ी हानि होता है | गुरुदत्त हमारे जन्म से कहीं पहले दुनिया - ए -फ़ानी से विदा हो गये थे पर उन्होंने हर उम्र हर वर्ग के दर्शकों को हर समय प्रभावित किया | मैंने भी बहुत साल पहले , दूरदर्शन की श्रृंखला विशेष में उनकी मिस्टर मिसिज 55 ,साहेव बीवी और गुलाम और आर - पार फ़िल्में देखी थीं , जो भुलाए नहीं भूलती | एक अत्यंत दर्शनीय, मंजे नायक और समय से आगे की सोच रखने वाले दिग्दर्शकों में उनका नाम हमेशा अमर रहेगा | आपने बहुत मन से और बहुत ईमानदारी से लेख लिखा जिसके लिए आभार |और शुभकामनाएं | गीत चतुर्वेदी जी के ब्लॉग पर आपका मनपसंद लेख पढने का प्रयास रहेगा | गुरुदत्त जी की पुण्य स्मृति को सादर नमन | हर दौर में उनके चाहने वाले कभी कम ना होंगे ऐसा तय है | सादर

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    जितेन्द्र माथुरJuly 22, 2020 at 7:13 PM
    हार्दिक आभार माननीया रेणु जी इस विस्तृत अभिव्यक्ति के लिए । आपने ठीक कहा कि किसी प्रतिभा का असमय जाना देश, समाज तथा उस कार्यक्षेत्र के लिए बहुत बड़ी क्षति होता है । काश गुरु दत्त ज़िंदा रहते और उस दुनिया को बहुत कुछ देते जो उनके जीते-जी उन्हें उनका हक़ नहीं दे सकी !

    Kavita RawatJuly 26, 2020 at 8:16 AM
    जला दो इसे, फूंक डालो ये दुनिया
    मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
    तुम्हारी है, तुम ही संभालो ये दुनिया
    ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है,
    ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
    --- और सच में दुनिया को ठोकर मार कर चल दिए एक अलग दुनिया में जहाँ झूठ -फरेब, मतलब नहीं

    मर्मस्पर्शी प्रस्तुति

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    जितेन्द्र माथुरJuly 27, 2020 at 12:20 AM
    आभार कविता जी । सच कहा आपने ।

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  2. बहुत भावपूर्ण लेख जितेंद्र जी। एक बार फिर पढ़कर अच्छा लगा। गुरुदत्त जी सरीखे बहुमुखीप्रतिभा संपन्न व्यक्ति का असमय और दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में अवसान एक ऐसी क्षति थी जिसकी पूर्ति कभी ना हो सकी और होने की कोई आशा भी नहीं। सादर

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    1. हृदय की गहनता से आपका आभार आदरणीया रेणु जी। आपने जो कहा, सच है और सच ही रहेगा।

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  3. हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी; निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी
    ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

    यहाँ इक खिलौना है इंसां की हस्ती, ये बस्ती है मुरदापरस्तों की बस्ती
    यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

    ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है; वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है
    जहाँ प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
    बहुत ही उम्दा लेख!
    भावनाओं से ओतप्रोत लेख! सर आपने बहुत ही खूबसूरती से हर पहलू पर प्रकाश डाला है!

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  4. किसी प्रतिभा का असमय जाना देश,समाज तथा उस कार्यक्षेत्र के लिए बहुत बड़ी क्षति होता है। गुरूदत्त जी के मामले में यह बिल्कुल सही है। भावनाओ से ओतप्रोत बहुत सुंदर रचना,जितेंद्र भाई।

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  5. गुरुदत्त जी जैसे शख्सियत बार-बार नहीं आते हमारी ना-कादरी कई बार हमसे अनमोल चीज़े छीन लेती है। गुरुदत्त जी के बारे भी यही कह सकते हैं। आपकी समीक्षात्मक शैली लाजबाब है। गुरुदत्त जी के बारे में जानते तो सब थे मगर फिर भी आपका लिखा पढ़ने में आनंद आया। गीत चतुर्वेदी जी के 'वैतागवाड़ी" ब्लॉग पर मैं भी अवश्य जाऊँगी। फिल्मे और फ़िल्मी दुनिया मेरा भी पसंदीदा विषय है। सादर नमन आपको

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    1. बहुत-बहुत शुक्रिया कामिनी जी। आपने ठीक कहा कि हमारी नाक़दरी कई बार अनमोल चीज़ें छीन लेती है। ऐसा बहुत बार देखा गया है कि जीनियस दुनिया को बहुत कुछ दे सकता (या दे सकती) है लेकिन दुनिया (उसके जीते जी) उसकी क़ाबिलियत की क़दर ही नहीं करती।

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  6. आपके ब्लॉगर मित्र निशांत सिंह जी ने बहुत सही कहा कि "दुनिया जीनियस को इसलिए दंडित करती है क्योंकि वो उसकी समझ से परे होता है । और शायद यही एक जीनियस की दुखदायी विडम्बना है कि वो दुनिया के और दुनियादारी के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता, दूसरी ओर दुनियादारी में डूबी दुनिया न उसे समझ पाती है और न ही उसकी प्रतिभा के साथ न्याय कर पाती है ।" मर्मस्पर्शी सृजन जितेन्द्र जी ।

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  7. बहुत ही सारगर्भित और मार्मिक लेख,एक शानदार अभिनेता का समय निधन,आज भी जब कभी स्मृतियों में गुरुदत्त जी आते है,तो उनके अभिनयशिल्प के कायल हुए बिना रह पाते उनके प्रशंसक, मुझे और मेरे घर में सभी उनकी अभिनय कला के दीवाने थे और आज भी हैं, क्योंकि उनका स्थान लेना किसी अभिनेता के वश में नहीं। आपको मेरा सादर अभिवादन।

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    1. हार्दिक आभार माननीया जिज्ञासा जी। गुरु दत्त असाधारण अभिनेता ही नहीं, असाधारण निर्देशक भी थे। हिन्दी सिनेमा की कुछ कालजयी कृतियां उनकी ही परिकल्पना से साकार हुईं।

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  8. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कलमंगलवार (13-7-21) को "प्रेम में डूबी स्त्री"(चर्चा अंक 4124) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    --
    कामिनी सिन्हा

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  9. बेहद भावपूर्ण लेख,
    व्यक्तित्व के गहराई में उतरकर व्यक्ति के विलक्षण गुणों को सम्मान देना इतना सरल भी नहीं होता है। चित्रपट जगत के ऐसा बहुमूल्य हीरा,कला के प्रति समर्पित साधनारत कलाकार जिसका मूल्य उसके जाने के बाद लोगों ने जाना।

    शोधपरक लेख के लिए आभार।
    प्रणाम सर
    सादर।

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    1. किसी गुणी व्यक्ति के व्यक्तित्व की गहराई में उतरकर उसके विलक्षण गुणों को सम्मान देना वास्तव में सरल नहीं होता है आदरणीया श्वेता जी। सच ही कहा आपने। हृदय से आभारी हूँ आपका।

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  10. गुरु दत्त के ऊपर लिखे इस आलेख के लिए आपको बहुत बहुत बधाई ... इसके माध्यम से आपने जैसे जिया है गुरु दत्त साहब को ... मेरे भी बहुत पसंदीदा नायक रहे हैं ... आज तक वो भी अपने आप में एक ही हैं ...

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    1. बहुतबहुत शुक्रिया आदरणीय दिगम्बर जी। सच कहा आपने। वे अद्वितीय ही थे और हैं।

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  11. बाज़ार तथा धनार्जन का अपना दर्शन होता है । मामूली चीज़ें बहुत-सा पैसा कमा सकती हैं जबकि बेहतरीन चीज़ों को, हो सकता है कि कोई पूछने वाला ही न मिले ।
    एकदम सटीक....।
    हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी; निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी
    ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
    जिस दुनिया में किसी की काबिलियत की कद्र नहीं उस दुनिया से ये निराशा ये शिकायत तो लाजिमी है...आखिर असमय ही छोड़ दी उन्होंने ये दुनिया।
    प्रतिभासम्पन्न गुरुदत्त जी के हर पहलू पर प्रकाश डालता बहुत ही भावपूर्ण एवं हृदयस्पर्शी लेख।

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    1. बहुतबहुत आभार आदरणीया सुधा जी। गुरु दत्त को इस बात से ज़्यादा शिकायत थी कि इस दुनिया में काबिलियत के साथसाथ प्यार की भी क़द्र नहीं है, उन्हें शिकायत थी समाज के उस ढांचे से जो इंसान से उसकी इंसानियत छीन लेता है।

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  12. हमेशा की तरह जानदार और शानदार प्रस्तुति। आपको बहुत-बहुत बधाई। गुरुदत्त के बारे मेंं थोड़ा सा जानकर बहुत अच्छा लगा। माथुर साहब बधाई आपको।

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    1. शुक्रिया वीरेन्द्र सिंह जी। इतने दिनों बाद आपको देखकर मुझे भी बहुत अच्छा लगा।

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  13. हमेशा की तरह ही यह लेख दिल को छू गया। आपने सही कहा क्लासिक और कैश कभी कभार ही मिलते हैं। यही कारण है कि मुझे नसीरुद्दीन शाह जी की यह फिलोसफी अच्छी लगती है कि कुछ कार्य पैसों के लिए करिए ताकि अच्छा काम बिना पैसे लिए भी कर सकें। यह संतुलन जिंदगी में होना जरूरी है।

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    1. बिलकुल सही कहा विकास जी आपने। यह संतुलन गुरु दत्त ने भी अपने जीवन में बनाकर रखा था। उन्होंने भी बहुत-सा कार्य विशुद्ध रूप से धनार्जन के लिए अपरिहार्यतः किया ताकि श्रेष्ठ कार्य हेतु संसाधन जुटा सकें। बहुत-बहुत शुक्रिया आपका।

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