गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

फ़िल्म जो भारतीय लोकरुचि का अंग बन गई

भारतीय महाकाव्य 'रामायण' में ऋषि विश्वामित्र अयोध्या के राजा दशरथ के पास जाकर उनके दो पुत्रों राम एवं लक्ष्मण को उन्हें देने के लिये कहते हैं ताकि वे वनों में आतंक मचा रहे दुष्ट असुरों का नाश करके वहाँ रहने वाले ऋषि-मुनियों को भयमुक्त करें एवं शांति व धर्म की पुनर्स्थापना करें। राजा दशरथ अपने इन पुत्रों को बालक ही समझते हुए उन्हें इस प्रयोजन हेतु देने में संकोच करते हैं किंतु विश्वामित्र उन्हें लेने के लिए अटल रहते हैं। अंततः राम एवं लक्ष्मण विश्वामित्र के मार्गदर्शन से असुरों का संहार करके वनों में शांति की स्थापना करने में सफल रहते हैं। 

कुछ-कुछ ऐसी ही एक कथा हिंदी सिनेमा के पटल पर कही गई जो इतनी लोकप्रिय हुई कि वह एक फ़िल्म मात्र न बनी रहकर भारतीय लोकरुचि का अंग बन गई। यह फ़िल्म है 'शोले' जिसकी कथा ही नहीं; पात्र, घटनाएं एवं संवाद भी भारतीय जनमानस में रच-बस चुके हैं। १९७५ में देश में आपातकाल लागू किये जाने के तक़रीबन छह सप्ताह बाद पंद्रह अगस्त अर्थात् भारत के स्वतंत्रता दिवस के दिन शोले प्रदर्शित हुई जो प्रारंभ में न तो टिकट खिड़की पर भीड़ को खींच सकी एवं न ही समीक्षकों को प्रभावित कर सकी। लेकिन एक बार जो इसने लोकप्रियता की राह पकड़ी तो ऐसी रफ़्तार के साथ पकड़ी कि यह भारतीय फ़िल्मों के इतिहास की सफलतम फ़िल्म बन गई। उन दिनों मैं बाल्यावस्था में था और मुझे याद है कि मेरे जिन साथियों ने यह फ़िल्म देखी थी, वे बारंबार इसके संवाद दोहराते रहते थे और इसके गीत गुनगुनाते रहते थे। लोकप्रिय हिंदी पत्रिका 'सरिता' ने अपने फ़िल्म समीक्षा के स्तम्भ 'चंचल छाया' में इस फ़िल्म को केवल एक स्टार दिया था लेकिन यह फ़िल्म तो अपने आप में ही एक ऐसी नायाब फ़िल्म सिद्ध हुई कि इसे समीक्षकों के सितारों की आवश्यकता ही नहीं रही।

शोले एक पूर्व पुलिस अधिकारी ठाकुर बलदेव सिंह (संजीव कुमार) द्वारा दो साधारण अपराधियों - जय (अमिताभ बच्चन) एवं वीरू (धर्मेन्द्र) की सहायता से एक दुर्दान्त डाकू गब्बर सिंह (अमजद ख़ान) से अपने परिवार की हत्या का प्रतिशोध लेने की कथा कहने वाली फ़िल्म है। रामगढ़ नामक एक काल्पनिक गाँव में दर्शाई गई यह कहानी न तो कोई मौलिक रचना ही है और न ही शोले इस कथा को कहने वाली पहली हिन्दी फ़िल्म। 'शोले' नाम से एक फ़िल्म पहले भी बनी थी जो १९५३ में प्रदर्शित हुई थी। कहते हैं कि फ़िल्म के लेखकों - सलीम-जावेद ने इसका नामकरण 'अंगारे' किया था लेकिन निर्माता-निर्देशक रमेश सिप्पी को 'शोले' नाम ही पसंद था। अतः फ़िल्म का नाम शोले ही रखा गया लेकिन इसकी अंग्रेज़ी वर्तनी को SHOLE के स्थान पर SHOLAY कर दिया गया। सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध एवं अस्सी के दशक के पूर्वार्द्ध में ही नहीं, आज तक भी इस फ़िल्म की लोकप्रियता का आलम यह है कि इसके अधिकांश प्रशंसकों को इसके नाम का अर्थ ही नहीं पता (कोई जानना भी नहीं चाहता)। शोले शब्द का अर्थ होता है आग की लपटें। फ़िल्म का जो स्वरूप उपलब्ध है, उसमें कहीं पर भी किसी भी पात्र के किसी भी संवाद में यह शब्द नहीं आता है। लेकिन चूंकि कथा का आधार ठाकुर बलदेव सिंह के मन में डाकू गब्बर सिंह के प्रति जल रही बदले की आग है, इसलिए यह शीर्षक उपयुक्त ही है। 

शोले का कथानक प्रमुखतः जापानी फ़िल्मकार अकीरा कुरोसावा की क्लासिक फ़िल्म 'सेवन समुराई' (१९५४) के कथानक से प्रेरित है । शोले से पहले भी एवं शोले के बाद भी इस कथानक पर हिन्दी फ़िल्में बनीं, यथा 'मेरा गाँव मेरा देश' (१९७१), खोटे सिक्के (१९७४), कर्मा (१९८६), आर्मी (१९९६), चाइना गेट (१९९८), क़ीमत (१९९८) आदि। कथानक की दृष्टि से शोले वस्तुतः 'मेरा गाँव मेरा देश' फ़िल्म के सर्वाधिक निकट है जिसके नायक भी शोले के 'वीरू' धर्मेन्द्र ही हैं तथा जिसमें दर्शाए गए डाकू का नाम जब्बर सिंह है। शोले के लेखकों सलीम-जावेद ने 'सेवन समुराई' के साथ-साथ हॉलीवुड फ़िल्म 'मैग्निफिशेंट सेवन' से तो इसके लिए प्रेरणा ली ही, कई और विदेशी फ़िल्मों से भी इसके विभिन्न दृश्यों हेतु सामग्री ली। लेकिन अंत में जो फ़िल्म शोले के रूप में बनकर आई, वह किसी और फ़िल्म का प्रतिरूप नहीं रही। उसकी अपनी एक अलग ही पहचान बनी। आज शोले अगर एक असाधारण फ़िल्म के रूप में हिंदी फ़िल्मों के इतिहास में प्रतिष्ठित है तो किसी अन्य फ़िल्म से प्रेरित होकर बनाई गई फ़िल्म के रूप में नहीं। इसका भारतीय फ़िल्मों के इतिहास में अपना एक ख़ास ही मुकाम है। कथानक मौलिक न होते हुए भी अपनी समग्रता में शोले मौलिक है जिसकी नक़ल करने का प्रयास ही किया जा सकता है, नक़ल बनाई नहीं जा सकती। जिस तरह 'मोना लिसा' का चित्र अपने आप में अनोखा है, उसी तरह शोले भी अपने आप में अनोखी है।

सलीम-जावेद ने फ़िल्म की मूल कथा में कई उपकथाएं जोड़ीं तथा फ़िल्म के विभिन्न पक्षों पर अपने ढंग से काम किया। इसलिए इस फ़िल्म को केवल एक बदले की कहानी के रूप में नहीं जाना जाता बल्कि सम्पूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली एक ऐसी क्लासिक फ़िल्म के रूप में जाना जाता है जिसका हर किरदार अपनी अलग पहचान रखता है तथा हर संवाद यादगार है। शोले के संवाद इसके गीतों से अधिक लोकप्रिय हैं, विशेषतः गब्बर सिंह के संवाद। वास्तव में इसके संवाद ही इसका सबसे बड़ा गुण एवं सबसे बड़ी शक्ति हैं। 'जो डर गया, समझो मर गया' संवाद तो आज एक कहावत बन चुका है। गब्बर सिंह के अन्य संवाद भी फ़िल्म के अनेक दृश्यों के साथ भारतीय लोकरुचि में अवशोषित हो चुके हैं। शोले में काम करके धर्मेन्द्र जीवन भर के लिए 'वीरू' बन गए तो हेमा मालिनी जीवन भर के लिए 'बसंती' और अमजद ख़ान जीवन भर के लिए 'गब्बर'। मुम्बई के मिनर्वा सिनेमाघर में सभी शो में लगातार पाँच वर्षों तक चलने वाली शोले की लोकप्रियता ने फ़िल्म की सहायक भूमिकाओं यथा 'अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर' (असरानी) तथा 'सूरमा भोपाली' (जगदीप) ही नहीं, इसकी छोटी-छोटी भूमिकाओं यथा सांभा (मैक मोहन), कालिया (विजू खोटे), इमाम साहब (ए.के. हंगल), अहमद (सचिन), बसंती की मौसी (लीला मिश्रा) आदि को भी अमरत्व प्रदान कर दिया। फ़िल्म में बसंती का तांगा खींचने वाली घोड़ी 'धन्नो' तक का नाम अमर हो चुका है। यदि किसी चरित्र को अपेक्षाकृत कम याद किया जाता है तो वह है 'राधा' (जया भादुड़ी) का चरित्र। लेकिन फ़िल्म को देखने पर राधा का चरित्र दर्शक के मन पर अमिट छाप छोड़ता है। फ़िल्म की आधारभूत कहानी चाहे एक वाक्य में बताई जा सकती हो, वस्तुतः यह पात्रों एवं घटनाओं से भरपूर एक लंबी फ़िल्म है। 

शोले में गब्बर का चरित्र और उसकी संवाद-अदायगी ही नहीं, कई अन्य चरित्र एवं उनके दृश्य भी अति-नाटकीय हैं। और इस फ़िल्म की अत्यधिक मनोरंजन प्रदान करने की क्षमता वस्तुतः इसके अति-नाटकीय होने में ही अंतर्निहित है। किसी कॉमिक पुस्तक सरीखी है यह फ़िल्म। यदि इस फ़िल्म की पटकथा को नाटकीयता के स्थान पर स्वाभाविकता के साथ प्रस्तुत किया जाता तो न तो यह फ़िल्म इतनी मनोरंजक बनती और न ही इतनी लोकप्रिय होती। इसकी असाधारण लोकप्रियता के पीछे इसके नाटकीय स्वरूप का बहुत बड़ा योगदान है। साथ ही गब्बर के लिए विशेष रूप से लिखे गए संवादों तथा अमजद ख़ान द्वारा उन्हें विशिष्ट अंदाज़ से अदा किये जाने का फ़िल्म को यादगार बनाने में बहुत बड़ा हाथ है। यह एक ऐसी अनूठी फ़िल्म है जिसके खलनायक को नायकों से अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। फ़िल्म की नामावली में इसे अमजद ख़ान की पहली फ़िल्म के रूप में बताया गया है लेकिन वयस्क रूप में उनकी पहली फ़िल्म वस्तुतः 'हिन्दुस्तान की कसम' (१९७३) थी। इसके अलावा शोले में हास्य की भरपूर ख़ुराक है। दर्शकों को गुदगुदा देने वाले अनेक दृश्य हैं। यह एक भव्य फ़िल्म है जिसकी तकनीकी गुणवत्ता बहुत ऊंची है। फ़िल्म की पटकथा में कमियां हैं लेकिन कुल मिलाकर यह फ़िल्म इतनी मनोरंजक एवं प्रभावशाली है कि न तो इसकी कमियों पर ध्यान जाता है और न ही इसकी लंबाई पर। मूल लम्बाई (तीन घंटे चौबीस मिनट) में भारतीय सेंसर बोर्ड के हस्तक्षेप के कारण काट-छांट हो जाने के बावजूद यह फ़िल्म बहुत लंबी है लेकिन इसे देखना एक ऐसा अविस्मरणीय अनुभव है कि इसकी लंबाई की शिकायत इसे कोई भी देखने वाला नहीं कर सकता। 

जैसा कि मैंने पहले भी कहा, शोले कोई यथार्थपरक या स्वाभाविक फ़िल्म नहीं है। यह एक फ़ैंटेसी (कपोल-कल्पना) है। एक ऐसी फ़ैंटेसी जिसकी ख़ासियत यह है कि वह फ़ैंटेसी लगती नहीं है। अपने आप में कई किस्सों को समेटे हुए एक दिलचस्प किस्सा है यह फ़िल्म। न तो इसके पात्र वास्तविक संसार के लगते हैं, न ही घटनाएं। यह एक ऐसी कथा है जो सच्ची नहीं लगती लेकिन बड़ी अच्छी लगती है। प्रारंभ से अंत तक दर्शकों को मंत्रमुग्ध किए रखने वाली इस फ़िल्म की तुलना एक ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन से की जा सकती है जिसमें सभी सामग्रियां एवं सभी मसाले सही अनुपात में मिल गए हों जिसके कारण उसका स्वाद ऐसा हो गया हो जो खाने वाले को बार-बार अपनी ओर खींचे। सभी कलाकारों ने अपनी-अपनी भूमिकाओं में यादगार अभिनय किया है चाहे वे प्रमुख चरित्र हों या सहायक चरित्र। फ़िल्म के केवल दो गीत याद रखने लायक़ हैं - होली गीत तथा जय एवं वीरू की दोस्ती का गीत। लेकिन इस फ़िल्म का मूल्यांकन इसकी समग्रता में ही किया जा सकता है, इसके अलग-अलग पक्षों के आधार पर नहीं। और अपनी समग्रता में निश्चय ही यह एक असाधारण फ़िल्म है।

शोले एक ऐसी फ़िल्म है जिसकी कमियां भी उसकी ख़ूबियां बन गईं। अच्छी कृतियां परिश्रम से बनती हैं लेकिन अमर कृतियां या मास्टरपीस संयोग से बनते हैं। शोले भी एक मास्टरपीस है जो संयोग से ही बन गया। लियोनार्दो द विंसी दूसरी मोना लिसा नहीं बना सके थे, रमेश सिप्पी भी दूसरी शोले नहीं बना सके। इस फ़िल्म पर पुस्तकें लिखी गई हैं, स्पूफ़ व पैरोडियां बनाई गई हैं तथा बहुत कुछ कहा गया है पर जितना भी कहा जाए, कम ही लगता है। इसकी कमाई का कीर्तिमान चाहे 'हम आपके हैं कौन' और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे' जैसी फ़िल्मों ने तोड़ दिया हो, इसने सफलता एवं लोकप्रियता का एक इतना ऊंचा मानक स्थापित कर दिया है जिसके आसपास भी कोई अन्य फ़िल्म नहीं पहुँच सकती। कोई आश्चर्य नहीं कि अनेक लोगों ने इसे दर्ज़नों बार देखा है। इसे कई बार पुनः प्रदर्शित किया गया है एवं प्रत्येक बार पुनर्प्रदर्शन पर भी इसने वैसी ही सफलता प्राप्त की है जैसी प्रथम प्रदर्शन पर प्राप्त की थी। इसलिए इसे चाहे जितनी बार सिनेमाघरों में प्रदर्शित किया जा सकता है क्योंकि जैसा कि मैंने पहले भी कहा - यह मात्र एक फ़िल्म नहीं रही है, एक लोककथा बन चुकी है और भारतीय लोकमानस में गहराई तक उतर चुकी है।

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शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

साहित्य और सिनेमा : समाज के दर्पण

ऐसा कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है। और यह बात ठीक ही है क्योंकि कोई भी साहित्य (विशेषतः कल्पना पर आधारित साहित्य) अपने समकालीन समाज का आईना ही होता है जिसमें समाज अपना चेहरा देख सकता है। समाज में व्याप्त मान्यताएं, प्रथाएं, वर्ग-भेद तथा सामूहिक मानसिकता एवं स्थापित आदर्श; ये सभी समकालीन साहित्य में स्थान पाते हैं। इसीलिए यदि किसी विशिष्ट कालखंड के विशिष्ट समाज को जानना हो तो उस समयावधि में रचे गए साहित्य का पारायण करना चाहिए। किसी-किसी साहित्य को कालजयी भी कहा जाता है क्योंकि उसकी प्रासंगिकता समय-काल से परे होती है। लेकिन ऐसे महान साहित्य की श्रेणी में आने वाली रचनाएं कम ही होती हैं। अधिकतर साहित्य जो कि व्यावसायिक कारणों से रचा जाता है, वही प्रस्तुत करता है जो कि समाज पढ़ना चाहता है।

यही बात सिनेमा पर भी लागू होती है क्योंकि सिनेमा भी एक प्रकार का साहित्य ही है बस उसका स्वरूप शब्द-रूप न होकर दृश्य-रूप होता है। किसी समय का समाज कैसा रहा होगा, यह हम उस काल के सिनेमा को देखकर समझ सकते हैं। साहित्य की ही भांति कुछ फ़िल्में भी कालजयी होती हैं एवं सदैव प्रासंगिक बनी रहती हैं। लेकिन व्यावसायिक कारणों से बनाई जाने वाली अधिकांश फ़िल्में भी वही दिखाती हैं जो कि लोग देखना चाहते हैं। समाज की मानसिकता एवं जीवन मूल्य ही उस समय के सिनेमा में झलकते हैं। अतः सिनेमा को भी समाज का दर्पण कहा जा सकता है। ये दोनों ही विधाएं परस्पर संबद्ध हैं क्योंकि कई फ़िल्में साहित्यिक कृतियों पर आधारित होती हैं।

सामंतवादी काल में जब युद्ध हुआ करते थे एवं राजाओं की वीरता उनका आभूषण मानी जाती थी तो चारण कवि ऐसी रचनाएं किया करते थे जिनमें राजाओं की वीरता (तथा उदारता) का यशोगान होता था। स्त्रियों का हरण कर लिया जाना अनुचित नहीं माना जाता था एवं ऐसी मान्यता थी कि स्त्रियां वीर पुरुषों को ही अपने जीवन-साथी के रूप में पसंद करती थीं। परिणामतः साहित्य भी ऐसा ही रचा जाता था। उस युग में प्रचलित सती और जौहर जैसी प्रथाओं का महिमामंडन तत्कालीन साहित्य में देखने को मिलता है। तत्कालीन सामाजिक वर्ग-भेद भी ऐसे साहित्य में उपस्थित है और उसकी भाषा भी वही है जो उस समय के समाज में बोली जाती थी। मुग़ल काल में ऐसी पुस्तकों का सृजन हुआ जो कि उस काल के शासकों की शासन-व्यवस्था का वर्णन करती थीं। 'आईन-ए-अकबरी' ऐसी ही एक पुस्तक है। मुग़लों के शासन काल में ही समाज में भक्ति-भाव पनपा एवं एक समय ऐसा भी रहा जिसे भक्ति-काल के नाम से जाना जाता है। इसी काल में मीरा, सूर, तुलसी आदि की भक्ति-रचनाएं सिरजी गईं तो पाखंडों पर प्रहार करने वाले कबीर के दोहे भी रचे गए। रहीम भी इसी काल में हुए और उनके दोहे भी कबीर के दोहों की भांति ही प्रसिद्ध हुए। ये रचनाएं एक ओर तो उस समय के समाज का दर्पण हैं, दूसरी ओर कालजयी भी हैं क्योंकि इनकी प्रासंगिकता आज तक क़ायम है।

अंग्रेज़ों के शासन-काल में भारत में पुनर्जागरण हुआ। समाज में सुधार के बहुत-से कार्य हुए। बहुत-से समाज-सुधारक सक्रिय हुए। और भारतीयों की भाषा में भी परिवर्तन हुए। आंचलिक तथा प्रांतीय भाषाएं ज्यों-की-त्यों बनी रहीं लेकिन उत्तर भारत में बोली जाने वाली हिंदी भाषा परिष्कृत हुई तथा उसका मानक स्वरूप खड़ी बोली के रूप में प्रचलित हुआ। (देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली) यह खड़ी बोली शीघ्र ही लोकप्रिय होकर सम्पूर्ण उत्तर भारत में व्याप्त हो गई तथा आज जिसे हम हिन्दी (या हिंदुस्तानी) कहते हैं, वह यही है। इसमें अरबी-फ़ारसी के शब्दों को समाहित किये जाने से उर्दू नामक भाषा का उदय हुआ। उस समय का उत्तर-भारतीय समाज ऐसी ही हिंदी-उर्दू मिश्रित भाषा बोला करता था, इसीलिए रचनाएं भी इन्हीं दोनों भाषाओं में हुईं। समाज में होने वाले सुधार (तथा पारंपरिक समाज द्वारा उनका प्रतिरोध भी) तत्कालीन साहित्य में परिलक्षित हुए। १८५७ के विद्रोह के उपरांत अंग्रेज़ों ने देशप्रेम सिखाने वाली पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाए किंतु उनका लिखा जाना रुका नहीं क्योंकि समाज में स्वाधीन होने की भावना धीरे-धीरे पनपती जा रही थी।

किस्से-कहानियां पहले पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाए जाते थे। अब वे लिखे जाने लगे और छापेख़ाने के आविष्कार के साथ किस्से-कहानियों की पुस्तकों ने भी समाज में प्रवेश किया। उपन्यास भी लिखे जाने लगे। अपने दैनंदिन जीवन के दुखों को कल्पना-लोक में विचरण करके भूलना चाहने वाले भारतीयों के लिए देवकीनंदन खत्री की 'चंद्रकांता' एवं 'चंद्रकांता संतति' जैसी रचनाएं सामने आईं तो यथार्थ एवं आदर्श, दोनों ही का निरूपण करने वाली रचनाएं प्रेमचंद ने प्रस्तुत कीं। भारतीय जनमानस में सत्य एवं न्याय जैसे आदर्श सदा से ही स्थापित रहे थे। अतः प्रेमचंद की आरंभिक रचनाएं आदर्शवादी थीं। लेकिन धीरे-धीरे प्रेमचंद ने अपने आसपास के समाज को समझा और यह पाया कि आदर्श मन में चाहे हों, व्यवहार में कम ही दिखाई देते थे। अतः वे समाज की वास्तविकता के अनुरूप ही पहले आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की ओर बढ़े एवं अपने साहित्यिक जीवन के चरम तक पहुँचते-पहुँचते पूर्ण रूप से यथार्थवादी बन गए। तत्कालीन समाज में ऊंच-नीच के भेद तथा शोषक व्यवस्था को समझना हो तो प्रेमचंद की यथार्थवादी कहानियों एवं उपन्यासों (यथा 'गोदान') को पढ़ने से यह सरलता से किया जा सकता है। उसी दौर में सामाजिक एवं जासूसी उपन्यास भी लिखे जाने आरंभ हुए तथा सिनेमा ने भी भारत में प्रवेश किया। उस युग के गद्य साहित्य में एक अपवाद हम जयशंकर प्रसाद की ऐतिहासिक रचनाओं को मान सकते हैं जिनकी भाषा भी संस्कृतनिष्ठ हिंदी है।

अब साहित्य के साथ-साथ सिनेमा भी मनोरंजन के साधन के रूप में चल निकला लेकिन वह तत्कालीन समाज का दर्पण बनकर ही सामने आया। फ़िल्में वैसी ही बनीं और सामाजिक उपन्यास वैसे ही लिखे गए, जैसा कि समाज था। जो समाज को स्वीकार्य नहीं था, वह यदि किसी फ़िल्म में दिखाया जाता था तो फ़िल्म के असफल होने की ही संभावना रहती थी। फिर भी 'अछूत कन्या' (१९३६) तथा 'दुनिया ना माने' (१९३७) जैसी फ़िल्में बनाने का साहस कुछ लोगों ने किया जो सामाजिक व्यवस्था में सुधार की हिमायत करती थीं। अंग्रेज़ सरकार केवल उन फ़िल्मों तथा पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाती थी जो कि उनके शासन का किसी भी रूप में विरोध करती हों। फिर भी स्वाधीनता की लड़ाई लड़ने वालों ने चोरी-छुपे जनता को जागरूक एवं उद्वेलित करने वाला साहित्य रचा एवं उसे प्रसारित किया। कथा-साहित्य के साथ-साथ जनता को प्रेरित करने वाले काव्य भी रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत आदि ने रचे। अच्छा जीवन जीने के स्वप्न भी अब भारत के लोग देखने लगे थे और ये स्वप्न भी साहित्य एवं सिनेमा में उतर आए लेकिन लिखने वालों ने भी तथा फ़िल्में बनाने वालों ने भी भारतीय पारम्परिक मूल्यों को अपनी कृतियों में यथावत् बनाए रखा। 

देश आज़ाद हुआ। विभाजन से पहले भी तथा उसके बाद भी पश्चिमी पंजाब से बहुत-से लेखक एवं सृजनधर्मी बम्बई (मुम्बई) चले आए जो कि लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा के केन्द्र के रूप में स्थापित हो चुका था। अविभाजित पंजाब की राजकीय भाषा उर्दू थी और लिखना-पढ़ना उर्दू में ही होता था। अतः इन लेखकों ने जब फ़िल्मी दुनिया में काम करना आरंभ किया तो पात्रों के संवादों में उर्दू का प्रभाव बहुत अधिक रहा। फ़िल्मकारों का शुद्धता पर आग्रह भी रहता था। अतः कलाकारों को शुद्ध उर्दू बोलने के लिए प्रेरित किया जाता था। इसीलिए हम पुरानी फ़िल्मों में कलाकारों को उर्दू का शुद्ध उच्चारण करते हुए देख सकते हैं तथा पुराने फ़िल्मी गीतों में भी गायक-गायिकाओं को उर्दू के शब्दों को पूर्णतः शुद्ध रूप में गाते हुए सुन सकते हैं। भाषा में अंग्रेज़ी का प्रभाव बहुत धीरे-धीरे आया और जब पूरी तरह से आ चुका (इक्कीसवीं सदी में) तो हाल यह हो गया कि फ़िल्मों के पात्र हिंदी कम और अंग्रेज़ी ज़्यादा बोलने लगे। अब तो हिंदी फ़िल्में हिंदी लगती ही नहीं, वे हिंग्रेज़ी (या हिंगलिश) बन गई हैं जिनके पात्र अपनी आधी से ज़्यादा बात अंग्रेज़ी में कहते हैं। यह उत्तर-उदारीकरण युग के समाज के उदय का प्रतीक है।

फ़िल्में हों या उपन्यास, स्त्री-पुरुष का प्रेम (या रोमांस) उनका एक अभिन्न अंग होता था। कारण ? समाज में स्त्री-पुरुष प्रेम वर्जित था। इसलिए लोग वह देखकर आनंदित होते थे जो वे निजी जीवन में स्वयं नहीं कर सकते थे। न्याय न मिलने पर प्रतिशोध लेने की कथाएं भी लोकप्रिय होती थीं क्योंकि जनसामान्य सिनेमा के परदे पर दुष्टों एवं अन्यायियों को नायक द्वारा दंडित होते देखकर प्रसन्न होता था जो कि वास्तविक जीवन में देखने को नहीं मिलता था। इसीलिए लुगदी साहित्य के नाम से रचे जाने वाले लोकप्रिय उपन्यास तथा मुख्यधारा की फ़िल्में लोगों के लिये अपने दैनंदिन दुखों से पलायन का माध्यम बन गई थीं। पहले सिनेमा सस्ता भी बहुत था (टिकट की दरें बहुत कम हुआ करती थीं)। फ़िल्में इसलिए भी ख़ूब बनती थीं क्योंकि यह आम जनता के लिए मनोरंजन का सबसे सस्ता माध्यम था। लुगदी साहित्य के उपन्यास भी सस्ते ही होते थे। लेकिन पलायनवादी कथाओं के युग में भी गुरु दत्त जैसे फ़िल्मकार तथा बिमल मित्र जैसे साहित्यकार उपस्थित थे जिन्होंने अपने-अपने माध्यम से जनता में हो रहे मोहभंग को चित्रित किया। इसी से पत्थर-सी चोट करने वाली 'प्यासा' (१९५७) और 'काग़ज़ के फूल' (१९५९) जैसी फ़िल्में तथा 'मुजरिम हाज़िर' जैसी पुस्तकें जनता के समक्ष आईं। 'साहब, बीवी और ग़ुलाम' (१९६२) फ़िल्म तो इन दोनों ही महान सृजनधर्मियों का सामूहिक प्रयास मानी जा सकती है। यशपाल ने भी अपनी कालजयी कृति 'झूठा सच' में १९४३ से लेकर १९५७ तक के भारतीय समाज तथा स्वतंत्रता के उपरांत उसमें आए परिवर्तनों का दर्पण प्रस्तुत किया।

देश की आज़ादी के बाद जब अंग्रेज़ भारत छोड़कर चले गए तो उनको खलनायक के रूप में प्रस्तुत करती हुई कथाओं का सृजन सरल हो गया क्योंकि अब लिखने वालों और फ़िल्में बनाने वालों को उनका डर नहीं था। इसलिए स्वाधीनता संग्राम एवं उसके विभिन्न नायकों पर फ़िल्में भी बनीं और पुस्तकें भी लिखी गईं। १९६२ से लेकर १९७१ तक की दस साल की अवधि में ही देश को तीन युद्ध लड़ने पड़े। ऐसे में देश में चल पड़ी देशप्रेम की लहर के चलते युद्ध पर आधारित फ़िल्में भी बनीं। अब देश में जो राजनीतिक वातावरण विगत कुछ समय से व्याप्त है, उसके चलते पाकिस्तान-विरोधी तथा मुस्लिम समुदाय को कटघरे में खड़ा करने वाली एवं साथ ही सत्ता से बाहर हो चुके दल पर दोषारोपण करने वाली फ़िल्में ख़ूब बन रही हैं जिनका उद्देश्य धन कमाने के साथ-साथ वर्तमान सत्ताधारियों को प्रसन्न रखना भी है। एक समय में मुस्लिम समाज पर आधारित फ़िल्में (जिन्हें 'मुस्लिम सोशल' कहा जाता था) भी समय-समय पर बनती थीं पर अब ऐसी फ़िल्म को बनाना बहुत बड़ा व्यावसायिक जोखिम है, इसलिए कोई नहीं बनाता।

सत्तर के दशक में भारतीय सिनेमा में परिवर्तन की दो धाराएं आईं - एक तो थी समानांतर सिनेमा की धारा जो कि नाच-गाने, रोमांस तथा मारधाड़ जैसे फ़ॉर्मूलों से युक्त मुख्यधारा के सिनेमा से अलग थी। इस धारा के फ़िल्मकारों ने फ़िल्म के व्यावसायिक पक्ष को अनदेखा करके समाज में व्याप्त वास्तविकता को पटल पर दिखाने का साहस किया। स्वाभाविक रूप से ऐसी फ़िल्में पैसा नहीं कमाती थीं लेकिन वे तत्कालीन समाज (विशेषतः ग्रामीण) समाज का दर्पण थीं। ऐसे सिनेमा से ही नसीरूद्दीन शाह, ओम पुरी, शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल जैसे प्रतिभाशाली कलाकार उभरकर दर्शकों के समक्ष आए। दूसरी धारा वह थी जिसने व्यवस्था से रूष्ट एक विद्रोही नायक को जन्म दिया जिसके कार्यकलाप जनता की मानसिकता को ही दर्शाते थे। इसके प्रतीक बने अमिताभ बच्चन।

नब्बे के दशक के आरंभ में आए उदारीकरण ने भारतीय समाज को पूरी तरह से बदल दिया। स्वाधीनता के कई दशक बाद भी जनमानस में स्थापित आदर्शों की अपनी महत्ता थी (चाहे पुस्तकीय ही सही)। इसीलिए कथाओं के नायक एवं नायिकाएं आदर्शवादी दिखाए जाते थे। चाहे कहानी-उपन्यास हों या फ़िल्म, कभी भी अपराधियों को सज़ा से बचते हुए नहीं दिखाया जाता था। नायिकाएं पारंपरिक जीवन-मूल्यों को आत्मसात् किये हुए होती थीं (उनके वस्त्र भी वैसे ही होते थे) और अपवादों को छोड़कर नायिकाओं को घरेलू बताया जाता था। चाहे कितने ही दुख सहने पड़ें, नायिकाएं परिवार (या पति) को छोड़ने की मानसिकता रखने वाली नहीं बताई जाती थीं। इसीलिए 'एक बार फिर' (१९८०), 'ये नज़दीकियां (१९८२) और 'अर्थ' (१९८२) जैसी फ़िल्मों को नई ज़मीन तोड़ने वाली फ़िल्में माना गया। उसी दौर में 'हमकदम' (१९८०) जैसी सार्थक फ़िल्म भी बनी जो नारी के नौकरी करने के विषय पर आधारित थी। नब्बे के दशक तक जब भारतीय दर्शक समुदाय की मानसिकता पुरुष-प्रधान समाज वाली थी तो फ़िल्मों में प्रायः नारियों को ही झुकते हुए दिखाया जाता था लेकिन जब नारी-सशक्तिकरण का दौर आया तो 'अस्तित्व' (२०००) तथा 'थप्पड़' (२०२०) जैसी फ़िल्में भी बनीं। आज के दौर के सिनेमा की नायिका के परिधान, हाव-भाव, शारीरिक व्यवहार और मानसिकता; सभी कुछ समाज में आए परिवर्तनों के अनुरूप परिवर्तित हो चुके हैं।

उदारीकरण निश्चय ही भारतीय समाज के लिए एक युग-परिवर्तनकारी घटना रही। न केवल इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को बदला बल्कि भारतीय समाज की मानसिकता को भी आमूलचूल बदल डाला। अब आदर्श तिरोहित होते चले गए एवं उपभोक्तावाद सर्वोपरि हो गया। किसी-न-किसी माध्यम से धन कमाना एवं जीवन का अधिकाधिक भौतिक आनंद उठाना ही एक सर्वस्वीकार्य जीवन मूल्य बन गया। इसका स्पष्ट प्रभाव साहित्य एवं सिनेमा पर भी पड़ा। पहले जहाँ फ़िल्मों एवं उपन्यासों में ग़रीबी का महिमामंडन होता था तथा अमीरों की आलोचना की जाती थी, वहीं अब नायक ही अमीर दिखाए जाने लगे। पहले मज़दूरों की हिमायत की जाती थी तथा उद्योगपतियों एवं व्यापारियों को शोषक के रूप में दिखाया जाता था, वहीं अब नायक ही बड़े व्यापारी दिखाए जाने लगे तथा ग़रीबी का महिमामंडन तो पूरी तरह से बंद ही हो गया। इक्कीसवीं सदी में 'अकसर' (२००६), डॉन (२००६), डॉन 2 (२०११) तथा ज़िद (२०१४) जैसी फ़िल्में बनीं जिनमें अपराधी ही नायक बने एवं उन्हें कानून से बचकर अपने अपराध से लाभान्वित होते हुए भी दिखाया गया जबकि पहले ऐसी फ़िल्मों तथा ऐसे नायकों का होना कल्पना से परे था।

यह उदारीकरण का ही प्रभाव है कि हिन्दी उपन्यासकार वेद प्रकाश शर्मा जो कि पहले सदैव अपने उपन्यासों में अपराधियों को दंडित होते हुए दिखाते थे, ने 'सुपरस्टार' एवं 'पैंतरा' जैसे उपन्यास लिखे जिनमें उन्होंने अपराधी को अपने अपराध से फ़ायदा उठाते हुए एवं कानून की पकड़ से बच निकलते हुए दिखाया। जब समाज आदर्शवादी था तो लोकप्रिय हिन्दी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक ने अपने उपन्यासों हेतु एक आदर्शवादी पत्रकार सुनील का सृजन किया था जिसकी सत्य में अटूट आस्था थी। इस नायक को लेकर पाठक साहब ने सौ से अधिक उपन्यास लिखे। लेकिन अब वर्षों से वे इस नायक के उपन्यास (सुनील सीरीज़) लिखना छोड़ चुके हैं क्योंकि उनका पाठक समुदाय ही आदर्शवादी नहीं रहा।

इस उदारीकरण ने समाज की भाषा, व्यवहार और मानसिकता को अंग्रेज़ियत एवं स्वार्थपरता में ऐसा ढाल दिया है कि पाठ्यपुस्तकें तक बदल गई हैं। बचपन में हम अपनी हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों में नीम की दतौन (दातुन) करने के बारे में पढ़ा करते थे, अब ऐसी बात कहीं लिख भी दी जाए तो शायद हास्यास्पद लगेगी। पहले हमारी अंग्रेज़ी की पाठ्यपुस्तकों में एक अध्याय अनिवार्य रूप से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बारे में होता था। और अब ...? पहले 'सादा जीवन उच्च विचार' में आस्था रखने वाले फ़िल्मकार ताराचंद बड़जात्या हुआ करते थे जिनकी फ़िल्मों के पात्र सादगी से युक्त जीवन जीने वाले तथा उच्च मूल्यों का अनुसरण करने वाले होते थे। लेकिन उदारीकरण के दौर में उनके पौत्र सूरज बड़जात्या ने अमीरी एवं तड़क-भड़क दिखाने वाली फ़िल्में बनानी आरंभ कर दीं। अब शुद्ध भाषा न संवादों में रही, न गीतों में। भाषा की शुद्धता की परवाह अब न लिखने वाले करते हैं, न बोलने या गाने वाले। पहले आदर्श कम-से-कम पुस्तकों में तो मिल जाते थे, अब तो पुस्तकों में भी नहीं मिलते। आज के दौर का साहित्य और सिनेमा आज के समाज का दर्पण है। साहित्य में वही लिखा जाता है जो जनता पढ़ना चाहती है और सिनेमा में वही दिखाया जाता है जो जनता देखना चाहती है। नैतिकता जब जनता में नहीं रही तो साहित्य और सिनेमा में कहाँ से रहेगी ? साहित्य और सिनेमा से समाज नहीं बदलता बल्कि वे समाज में आने वाले बदलाव के अनुरूप बदल जाते हैं। अच्छी बात यह है कि सार्थक फ़िल्में अब भी बन रही हैं। नदी की धारा पीछे नहीं लौटती, आगे ही बढ़ती है। इसलिए पहले वाले दौर की वापसी तो संभव नहीं लगती। चलिए, यही मानकर इस दर्पण को निरखते हैं कि आने वाले कल में ही कोई आशा की किरण छुपी हुई है जो आदर्शों एवं शाश्वत जीवन मूल्यों को प्रासंगिक बनाए रखेगी। 

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गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

एंग्री यंग मैन और काला पत्थर

अपने पिछले जन्मदिन पर अमिताभ बच्चन ८४ वर्ष के हो गए। बढ़ती आयु में अपने आपको शारीरिक एवं मानसिक रूप से चुस्त-दुरूस्त रखने के मामले में वे निश्चय ही एक आदर्श हैं, अपनी अगली पीढ़ी के लिए रोल मॉडल हैं। उन्होंने (सम्भवतः) नियमित व्यायाम एवं संतुलित खान-पान के माध्यम से स्वयं को फ़िट बनाए रखा है, उनकी स्मरण-शक्ति कमाल की है तथा सक्रियता का तो यह हाल है कि इस आयु में भी वे विगत छब्बीस वर्षों से लोकप्रिय 'कौन बनेगा करोड़पति' कार्यक्रम को होस्ट कर रहे हैं। वे मानसिक रूप से भी बेहद मज़बूत हैं। राजनीति तथा व्यवसाय के क्षेत्रों में चोट खाने के उपरांत जिस तरह उन्होंने अपने आपको संभाला तथा अपनी अभिनय प्रतिभा के माध्यम से पुनः उठकर खड़े हुए एवं एक बार फिर से सफलता को अपने चरणों में ले आए, वह निश्चय ही एक मिसाल है। मैं और मेरे जैसे लोग यदि उन्हें अपना पथ-प्रदर्शक मानकर उनके पदचिह्नों पर चलें तो अपना ही भला करेंगे।

अमिताभ बच्चन को फ़िल्मी दुनिया में लोकप्रियता सत्तर के दशक में तब प्राप्त हुई जब लोगों का व्यवस्था से मोहभंग  होने लगा था तथा तब की युवा पीढ़ी एक नायक की तलाश में थी - एक ऐसा नायक जो उसके भीतर उमड़े लेकिन दबे हुए आक्रोश को स्वर दे सकता हो। यह स्वर रूपहले परदे पर अमिताभ बच्चन ने दिया फ़िल्म 'ज़ंजीर' (१९७३) के माध्यम से। और दो वर्ष बाद आई फ़िल्म 'दीवार' (१९७५) ने उन्हें स्थायी रूप से एक ग़ुस्सैल नौजवान (एंग्री यंग मैन) की छवि प्रदान कर दी। उनकी यह छवि 'लार्जर दैन लाइफ़' थी अर्थात् वे परदे पर वे सब काम कर दिखाते थे जो वास्तविक जीवन में एक सामान्य व्यक्ति के लिए करना संभव नहीं होता। एक फ़िल्म में आया उनका यह संवाद आज तक प्रसिद्ध है - 'हम जहाँ खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरु होती है'। लोग रजतपट पर अमिताभ को वह करते हुए देखते थे जो वे स्वयं करना तो चाहते थे पर कर नहीं सकते थे। इसी बात ने भारतीय जनता को अमिताभ बच्चन का मुरीद बना दिया।

ऐसी छवियां स्वतः नहीं बनतीं, गढ़ी जाती हैं। अमिताभ की यह 'एंग्री यंग मैन' वाली 'लार्जर दैन लाइफ़' छवि गढ़ी किसने ? उनकी यह छवि गढ़ी थी सलीम-जावेद ने। सलीम-जावेद लेखकों की वह जोड़ी थी जिसने फ़िल्मी दुनिया में लेखकों को भी सम्मान दिलाया वरना पहले लेखक निर्देशक के मुंशी से अधिक नहीं समझे जाते थे। सलीम-जावेद फ़िल्मों की कहानी एवं पटकथा (स्क्रीनप्ले) के साथ-साथ संवाद भी लिखते थे। 'शोले' (१९७५) जैसी सारे देश में धूम मचा देने वाली फ़िल्म के लेखक भी वही थे। उन्होंने ही अमिताभ बच्चन को केंद्र में रखकर कई कथाएं रचीं और उन्हें वह विराट छवि प्रदान की जो आज तक उनके काम आ रही है। सलीम-जावेद अमिताभ के लिए विशेष रूप से प्रभावशाली संवाद लिखते थे जिन्हें अमिताभ जब अपनी ज़ोरदार आवाज़ में अदा करते थे तो सिनेमा हॉल में बैठे उन्हें सुनने वाले दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। इसीलिए अगर कहा जाता है कि अमिताभ को बनाने वाले सलीम-जावेद थे तो ग़लत नहीं लगता।

ऐसी ही एक फ़िल्म थी यश चोपड़ा कृत 'काला पत्थर' (१९७९) जो व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही  थी। एक कोयले की ख़ान तथा उसमें काम करने वाले श्रमिकों के जीवन पर आधारित यह फ़िल्म आश्चर्यजनक रूप से अमिताभ बच्चन एवं सलीम-जावेद दोनों की ही असफल फ़िल्मों में से एक है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने १९७१ से आरंभ करके १९७३ तक देश की सभी कोयले की खानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था एवं १९७५ में कोल इंडिया लिमिटेड की स्थापना कर दी गई थी। लेकिन सलीम-जावेद ने अपनी कहानी में एक व्यापारी की निजी कोयले की खदान को दिखाया। उन दिनों देश में समाजीकरण की लहर थी तथा व्यापारियों एवं उद्योगपतियों की छवि शोषक की थी जो श्रमिकों का शोषण करते थे एवं उन्हें जीवन की आधारभूत सुविधाओं से भी वंचित रखते थे। सलीम-जावेद ने इस फ़िल्म में एक ऐसा ही मुनाफ़े का लालची व्यापारी धनराज पुरी (प्रेम चोपड़ा) प्रस्तुत किया। 

धनराज अपनी कोयला खान में काम करने वाले श्रमिकों के जीवन-यापन, चिकित्सा तथा सुरक्षा के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण अपनाता है। आए दिन खान में दुर्घटनाएं होती हैं तथा श्रमिकों की मृत्यु होती है पर धनराज पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसी खान में काम करता है सलीम-जावेद द्वारा रचित एंग्री यंग मैन – विजय (अमिताभ बच्चन) जो अपने विगत जीवन में हुई एक दुर्घटना के कारण शोषक व्यक्ति तथा शोषक व्यवस्था से ही नहीं, अपने आप से भी नाराज़ है। अपने भीतर की घुटन को वह दूसरों की सहायता करके संभालता है। उसे अपने जैसे स्वभाव तथा विचारों वाला व्यक्ति मिलता है खान में नवनियुक्त अभियंता रवि (शशि कपूर) के रूप में। साथ ही उसे मिलती है खान की डिस्पेंसरी में नई-नई आई महिला चिकित्सक सुधा (राखी) जो उसकी ही तरह संवेदनशील है और धीरे-धीरे वह उसके दुख बांटने लगती है। लेकिन खान की नौकरी में आ घुसे एक भगोड़े क़ैदी मंगल (शत्रुघन सिन्हा) से उसकी टक्कर होती है। अब नायक तीन हैं तो नायिकाएं भी तीन होनी चाहिए। तो रवि के लिए आ जाती है उसकी पत्रकार बन चुकी भूतपूर्व सहपाठिन अनीता (परवीन बाबी) और मंगल के लिए वहाँ पहले से मौजूद है अंगूठियां तथा सुहागिनों के काम आने वाला सामान बेचने वाली छन्नो (नीतू सिंह)। सुख-दुख के पलों के बीच नाच-गाने भी होते हैं।

धनराज के लालच के कारण एक दिन खान में एक सुरंग की दीवार इतनी कमज़ोर हो जाती है कि वह टूट जाती है तथा पानी से भरी दूसरी सुरंग का पानी उन सुरंगों में फैलने लगता है जिनमें मज़दूर काम कर रहे हैं। इस बाढ़ सरीखी स्थिति में लगभग चार सौ मज़दूरों की ज़िन्दगी ख़तरे में पड़ जाती है। विजय, रवि और मंगल मज़दूरों की जान बचाने में जुटते हैं और अपनी जान जोखिम में डालकर अधिकांश मज़दूरों को बचाकर ले आते हैं पर इस हादसे में मंगल अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है। फ़िल्म विजय को ठुकरा देने वाले उसके माता-पिता के वहाँ पहुँचने और उसे फिर से अपना लेने के साथ समाप्त होती है। अंत में खान में होती हुई चहल-पहल तो दिखाई गई है (धनराज को गिरफ़्तार कर लिया जाता है) लेकिन वह खान सरकार ने अपने हाथ में ले ली या नहीं, यह स्पष्ट करने की तक़लीफ़ सलीम-जावेद और यश चोपड़ा ने नहीं की।

ऐसा कहा जाता है कि सलीम-जावेद ने 'काला पत्थर' की कहानी बिहार (झारखंड) की चासनाला खदान में १९७५ में घटित वास्तविक दुर्घटना से प्रेरित होकर लिखी थी। वास्तविकता चाहे जो भी हो; पटकथा जितनी रोचक है, निर्देशक यश चोपड़ा ने उसे उतने ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। फ़िल्म में कोई ऊबाऊ पल नहीं है तथा तेज़ी से भागती कथा दर्शकों को लगभग तीन घंटे तक बाँधे रखती है तथा फ़िल्म के परदे के सामने से हटने का कोई अवसर उन्हें नहीं देती। आरंभ से अंत तक दर्शक टकटकी लगाए फ़िल्म को देखता चला जाता है। फ़िल्म का गीत-संगीत भी अच्छा है। रवि और अनीता का एक प्रेमगीत अनावश्यक लगता है जिसे हटाकर फ़िल्म को कुछ छोटा किया जा सकता था अन्यथा फ़िल्म का कोई भी प्रसंग अनावश्यक नहीं लगता। फ़िल्म का तकनीकी पक्ष भी अत्यन्त सबल है। इसीलिए मुझे फ़िल्म की असफलता का तथ्य आश्चर्यचकित करता है क्योंकि फ़िल्म रोचकता से भरपूर है। फ़िल्म का शीर्षक 'काला पत्थर' कोयले की खदान के लिए ही प्रयुक्त किया गया है।

सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। अमिताभ बच्चन का अंडरप्ले कमाल का है। विजय के अतीत तथा वर्तमान जीवन के कारण उसके मन में भरी हुई हताशा एवं घुटन को उन्होंने अपने अभिनय से सजीव कर दिया है। उनके ग़ुस्से वाले दृश्य भी लाजवाब हैं तथा एक्शन दृश्य भी। और उनकी संवाद अदायगी तो अद्वितीय है ही। परदे पर अमिताभ नहीं, विजय का चरित्र ही नज़र आता है। अधिकांश फ़िल्म में उनके मुख पर कोयले की कालिख पुती हुई दिखाई गई है लेकिन निर्देशक महोदय उनके 'अमिताभ कट' के नाम से प्रसिद्ध हो चुके हेयर स्टाइल को बदलना भूल गए। जहाँ-जहाँ उनकी यह केश-सज्जा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, वहीं-वहीं उनका व्यक्तित्व बनावटी लगने लगता है। अन्य कलाकारों ने भी अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है। अमिताभ की ही तरह शत्रुघन सिन्हा भी अपनी स्टाइलिश संवाद अदायगी के लिए मशहूर थे जो इस फ़िल्म में भरपूर मिलती है। परवीन बाबी का चरित्र केवल भरती के लिए लगता है लेकिन नीतू सिंह को छन्नो के रूप में अपना अभिनय (और नृत्य) दिखाने का पूरा-पूरा मौका मिला है।

आज कोयले की खानें निजी हाथों में नहीं हैं, सरकार के स्वामित्व में हैं। श्रमिकों को (ऐसी अपेक्षा है) श्रम कानूनों की सुरक्षा के अंतर्गत सभी बुनियादी सुविधाएं मिल रही हैं तथा उनके जीवन की सुरक्षा का भी ध्यान रखा जा रहा है। इसलिए हो सकता है कि 'काला पत्थर' की विषय-वस्तु आज प्रासंगिक नहीं हो लेकिन मनोरंजन से भरपूर इस हिन्दी फ़िल्म को जो भी देखेगा, उसे यह फ़िल्म अच्छी ही लगेगी। यह केवल अमिताभ ही नहीं, सलीम-जावेद और यश चोपड़ा की भी श्रेष्ठ फ़िल्मों में सम्मिलित है। यह एक मल्टी-स्टारर फ़िल्म है और इसीलिए अमिताभ, शशि कपूर, शत्रुघन सिन्हा, राखी, परवीन बाबी तथा नीतू सिंह के प्रशंसकों के लिए भी एक तोहफ़े की तरह है। मैं मनोरंजन के अभिलाषी सभी दर्शकों को इसे देखने की अनुशंसा करता हूँ।

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सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

नाना पाटेकर की कुछ कम चर्चित फ़िल्में

विश्वनाथ पाटेकर जो कि नाना पाटेकर के नाम से बेहतर जाने जाते थे, नहीं रहे। उनकी पहचान एक बेहतरीन अभिनेता के रूप में थी जो लीक से हटकर सिरजी गई भूमिकाएं अपने विलक्षण अंदाज़ में करता था और अपने प्रदर्शन से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था। रंगमंच से अपनी अभिनय-यात्रा आरंभ करके वे 'गमन' (१९७८) से फ़िल्मों में आए और 'अंकुश' (१९८६), प्रतिघात (१९८७), अपने ही द्वारा निर्देशित 'प्रहार' (१९९१), तिरंगा (१९९३), क्रांतिवीर (१९९४), अग्नि साक्षी (१९९६), ख़ामोशी (१९९६), वजूद (१९९८), शक्ति (२००२), वेलकम (२००७) आदि फ़िल्मों में अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ गए। ये सभी उनकी चर्चित फ़िल्में रहीं। इस लेख में मैं उनकी कुछ ऐसी फ़िल्मों की बात करूंगा जिनकी चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई तथा वे आज दर्शकों एवं समीक्षकों की स्मृति से लगभग बाहर हो चुकी हैं लेकिन जिनमें नाना का अभिनय निश्चय ही उनके श्रेष्ठ अभिनय प्रदर्शनों में सम्मिलित है। ये कतिपय फ़िल्में निम्नलिखित हैं:

ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा (१९९७): 'ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा' फ़िल्म में नाना ने शीर्षक भूमिका निभाई। यह एक ऐसे अपराधी की कहानी है जिसे अपने व्यक्तिगत जीवन में आघात लगने पर अहसास होता है कि वह एक ग़लत रास्ते पर चल रहा था। क़िस्मत उसे एक दुश्वारियों से घिरे हुए परिवार तक ले आती है और वह उस परिवार का संरक्षक बनकर अपने गुनाहों का प्रायश्चित करता है। यह फ़िल्म न केवल आदि से अंत तक रोचक है, वरन हमारे देश की मानवता से ओतप्रोत संस्कृति की भी प्रतीक है जिसमें मनुष्यता व्यक्तियों को उनके धर्म या मज़हब से ऊपर उठा देती है तथा मनुष्य को केवल मनुष्य के रूप में देखना सिखाती है। फ़िल्म का नायक एक मुस्लिम है जो अपने जीवन को एक नवीन मोड़ दे देने के उपरांत एक ब्राह्मण परिवार का संरक्षक बन जाता है तथा अंत में अपना प्राणोत्सर्ग कर देता है। फ़िल्म असफल क्यों रही, कहना मुश्किल है क्योंकि यह न केवल दर्शकों को बाँधे रखती है वरन उन्हें गहराई तक प्रभावित भी करती है। मैं इसे नाना की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक मानता हूँ।

युगपुरुष (१९९८): यह नाना की एक ऐसी फ़िल्म है जिसे उन सभी को देखना चाहिए जो गंभीर एवं सार्थक सिनेमा में रुचि रखते हैं। 'युगपुरुष' कौन हो सकता है ? किसे कहा जा सकता है 'युगपुरुष' ? फ़िल्मकार कहानी में नाना के चरित्र के माध्यम से उत्तर देता है - ऐसा व्यक्ति जो बालक की भांति निश्छल हो, जो न असत्य बोलना जानता हो और न ही निजी स्वार्थ के लिए तिकड़में करना। इस मर्मस्पर्शी फ़िल्म में नाना ने एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका निभाई है जो पच्चीस सालों तक एक मानसिक चिकित्सालय में रहने के उपरांत स्वस्थ होकर बाहरी संसार में आया है। वह एक निर्दोष बालक की भांति निष्कपट है एवं सदा सत्य बोलता है। लेकिन मानसिक चिकित्सालय के बाहर का वास्तविक संसार तो झूठ, छलकपट, स्वार्थपरता एवं तिकड़मबाज़ी से भरा पड़ा है। ऐसा संसार उसके जैसे व्यक्ति को कैसे समायोजित करेगा ? एक राजनेता की रखैल (मनीषा कोईराला) से उसे प्रेम हो जाता है तथा वह भी उसकी निर्दोषिता पर फ़िदा हो जाती है। लेकिन दोनों के मिलन की राह आसान नहीं है। एक अन्य धनी व्यक्ति (जैकी श्रॉफ़) भी उस युवती को पाना चाहता है और वह यह नहीं समझ पाता कि क्यों वह युवती इस पागलख़ाने से छूटे व्यक्ति की ओर खिंची चली जा रही है। फ़िल्म का अंत दर्शकों को हिला कर रख देता है। फ़िल्म के संवाद मन को छू जाते हैं। कुछ दृश्य ऐसे हैं जो पटल से सीधे दर्शक की आत्मा में उतरते हैं। और नाना का अभिनय ? उसके तो क्या कहने ! इस भूमिका में नाना के अतिरिक्त किसी और अभिनेता की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह भूमिका जैसे बस उन्हीं के लिए बनी थी। मैं इसे मनीषा कोईराला की भी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म मानता हूँ। फ़िल्म असफल रही थी और आज दर्शकों की स्मृति से भी उतर चुकी है लेकिन मानव मन की जटिलताओं पर आधारित यह असाधारण फ़िल्म जो भी देखेगा, उसके लिए इसे भुला देना सहज नहीं होगा। 

तरकीब (२०००): यह भूली-बिसरी और टिकट खिड़की पर असफल फ़िल्म एक रहस्यकथा है जिसमें नाना एक सीबीआई अफ़सर बनकर एक युवती (तब्बू) की हत्या के रहस्य को सुलझाते हैं। फ़िल्म मामूली है लेकिन संवाद लेखक ने नाना के लिए विशेष रूप से रोचक संवाद लिखे हैं जिन्हें नाना ने अपने विलक्षण अंदाज़ में अदा किया है और पूरी फ़िल्म में दर्शकों को कभी तो हंसा दिया है और कभी उनके होठों पर मुस्कान बिखेर दी है। नाना की भूमिका कोई कॉमेडी भूमिका नहीं है लेकिन नाना ने गंभीर भूमिका को भी कॉमेडी का ऐसा पुट दे दिया है कि यही बात फ़िल्म का सबसे सशक्त बिंदु बन गई है। रहस्य को सुलझाने एवं वास्तविक अपराधी तक पहुँचने के लिए नाना जिस तरह से एक-एक व्यक्ति से मिलते हैं एवं उससे बातचीत करते हैं, वह फ़िल्म को अत्यन्त रोचक बना देता है। इस फ़िल्म के द्वारा नाना ने सिद्ध किया कि वे केवल गंभीर भूमिकाएं ही नहीं कर सकते थे बल्कि कॉमेडी का रंग लिए हुए सामान्य भूमिकाएं भी उतनी ही निपुणता से कर सकते थे। फ़िल्म चाहे आपको कम पसंद आए, आप तो बस मंत्रमुग्ध होकर नाना का अभिनय देखते रहिए और उनके संवाद सुनते रहिए। यह सामान्य-सी फ़िल्म नाना के प्रशंसकों के लिए किसी उपहार से कम नहीं।

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