शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

अंधविश्वासी मत बनिए लेकिन फ़िल्म देख लीजिए

इस रोचक फ़िल्म के विषय में कुछ भी कहने से पूर्व मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मेरा उद्देश्य न तो किसी अंधविश्वास को प्रसारित करना है और न ही समाज में व्याप्त किसी अंधविश्वास को पुष्ट करना है। चूंकि फ़िल्म अत्यन्त रोचक है तथा इसे देखकर भरपूर मनोरंजन होता है, इसीलिए मैं इस पर यह लेख लिख रहा हूँ यद्यपि यह कई अंधविश्वासों को अपने में समाहित किए हुए है। यह फ़िल्म है नागिन (१९७६)।

फ़िल्म की कथा जिन प्रमुख दो अंधविश्वासों पर आधारित है, वे हैं – १. जब कोई नाग सौ वर्ष की आयु पूर्ण कर लेता है तो वह इच्छाधारी नाग बन जाता है अर्थात् उसमें यह क्षमता आ जाते है कि वह अपनी इच्छा से मानव रूप धारण कर सकता है (तथा पुनः नाग के रूप में भी आ सकता है), २. यदि कोई किसी नाग को मार डाले तो उसकी प्रेयसी अर्थात् नागिन मारने वाले (या वालों) से उसका प्रतिशोध लेती है। ये तो हुए प्रमुख अंधविश्वास जिन पर यह फ़िल्म टिकी है। इनके अतिरिक्त कुछ और भी अंधविश्वास इस फ़िल्म के कथानक में पिरोए हुए हैं यथा – मरने वाले नाग की आँख में उसे मारने वाले का चित्र आ जाता है, जब कोई इच्छाधारी नाग (या नागिन) अपने मनुष्य रूप में किसी दर्पण के समक्ष आ जाता है तो उस दर्पण में उसका वास्तविक नाग वाला रूप दिखाई देने लगता है आदि।

फ़िल्म में ढेर सारे कलाकार भरे हुए हैं जिनको फ़िल्म की पटकथा में यथास्थान बैठाया गया है। विजय (सुनील दत्त) अपने पाँच दोस्तों – किरण (अनिल धवन), राजेश (विनोद मेहरा), उदय (कबीर बेदी), सूरज (संजय ख़ान) तथा राज (फ़िरोज़ ख़ान) के साथ जंगल में भ्रमण हेतु जाता है। वह इच्छाधारी नागों पर एक पुस्तक लिख रहा है। इसी संदर्भ में उसकी भेंट एक इच्छाधारी नाग (जीतेंद्र) से ही हो जाती है जब वह उसे एक बाज़ से बचाता है। जब वह अपने दोस्तों को उस इच्छाधारी नाग को मानव रूप में बदलते हुए दिखाने के लिए लाता है तो किरण गोली मारकर उस नाग की हत्या कर देता है। नाग की आँख में सभी दोस्तों की तस्वीरें आ जाती हैं जिन्हें देखने के बाद नाग की प्रेयसी अर्थात् नागिन (रीना रॉय) उनसे प्रतिशोध लेती है अर्थात् एक-एक करके उन्हें मार डालती है। अंत में केवल विजय ही बाक़ी बचता है जब उसे मारने के प्रयास में नागिन स्वयं मारी जाती है।

फ़िल्म की शुरुआत ही एक बहुत रोचक दृश्य से होती है जब मनुष्य के रूप में नाग पर एक बाज़ आक्रमण करता है जिसे गोली मारकर विजय नाग की जान बचाता है। उसके उपरांत नाग की हत्या से जो तेज़ रफ़्तार कहानी शुरु होती है, वह दर्शक को सोचने हेतु एक पल की भी फ़ुरसत नहीं देती तथा उसे सांस रोके हुए फ़िल्म को टकटकी लगाकर देखते चले जाने पर विवश कर देती है। मंत्रमुग्ध-सा दर्शक कथा के प्रवाह के साथ-साथ बहते हुए फ़िल्म को तब तक देखता चला जाता है जब तक वह समाप्त नहीं हो जाती। फ़िल्म दर्शकों को भरपूर मनोरंजन प्रदान करने के अपने उद्देश्य को सौ फ़ी सदी पूरा करती है। किसी प्रबल जलधारा की मानिंद प्रवाहित होती हुई सम्पूर्ण फ़िल्म में ऊबाऊ पल न के बराबर हैं और यही निर्माता-निर्देशक राजकुमार कोहली की सफलता है।

पुरुष कलाकारों का उल्लेख मैं फ़िल्म की कहानी बताते समय ऊपर कर चुका हूँ। फ़िल्म में महिला कलाकारों की भी भरमार है। नागिन की केंद्रीय भूमिका में रीना रॉय हैं जिनके साथ फ़िल्म में रेखा, मुमताज़, योगिता बाली, नीलम मेहरा, प्रेमा नारायण आदि भी उपस्थित हैं। इतने सारे कलाकारों के साथ न्याय करना भी निर्देशक हेतु किसी चुनौती से कम नहीं रहा होगा। लेकिन प्रशंसा करनी होगी निर्देशक की कि उसने पटकथा को प्रस्तुत करते समय सभी कलाकारों के साथ उचित न्याय किया। यद्यपि विजय के रूप में सुनील दत्त तथा नागिन के रूप में रीना रॉय को सबसे अधिक दृश्य एवं समय मिला है किन्तु अन्य कलाकारों को भी उचित समय तथा अपनी अभिनय क्षमता दर्शाने का उचित अवसर दिया गया है। निर्देशक सभी कलाकारों से अच्छा अभिनय करवाने में सफल रहा है। रीना रॉय के अभिनय जीवन की तो यह सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा सकती है जिसमें उन्होंने प्रभावी अभिनय किया है। प्रमुख कलाकारों के साथ-साथ एक चमत्कारी फ़कीर बाबा के रूप में प्रेमनाथ, एक मवाली के रूप में रंजीत, एक सपेरे के रूप में जगदीप आदि ने भी अच्छा अभिनय किया है। मुमताज़ की रूमानी नायिका के रूप में यह अंतिम फ़िल्म है जिसमें वे आकर्षक लगी हैं। बाल कलाकार मास्टर बिट्टू का अभिनय भी अच्छा है।

फ़िल्म तकनीकी रूप से उच्च गुणवत्ता वाली है। दो नागों की लड़ाई का दृश्य तथा नाग के मनुष्य रूप में एवं मनुष्य से पुनः नाग रूप में बदलने के दृश्य अद्भुत हैं क्योंकि उस युग में कम्प्यूटर ग्राफ़िक नहीं थे। अतः यह सोचने वाली बात है कि निर्देशक इन दृश्यों (तथा नाग एवं नागिन के अन्य विभिन्न दृश्यों) को कैसे फ़िल्मा पाया। फ़िल्म का कला-निर्देशन भी अच्छा है और पार्श्व संगीत एवं संवाद भी। छायाकार ने नाग तथा नागिन से संबंधित दृश्यों को फ़िल्माने में कमाल कर दिखाया है। सम्पादक ने भी बहुत अच्छा काम किया है और अपनी कैंची कुछ इस तेज़ी से चलाई है कि फ़िल्म अधिक लम्बी नहीं हो, केवल आवश्यक दृश्य सिलसिलेवार उसमें रहें जिन्हें दर्शक अपना दिल थामे देखता चला जाए एक पल को भी नज़रें परदे से हटाए बिना।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने फ़िल्म में मधुर संगीत दिया है। नाग-नागिन पर फ़िल्माया गया गीत तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना कई बार फ़िल्म में आता है और प्रभावित करता है। उसके अतिरिक्त अन्य गीत यथा तेरा मेरा मेरा तेरा मेरा तेरा तेरा मेरा मिल गया दिल दिल से’, हफ़्तों महीनों बरसों नहीं सदियों से हैं पुराने और तेरे इश्क़ का मुझ पे हुआ ये असर है भी अच्छे बन पड़े हैं। फ़िल्म के सुंदर गीत वर्मा मलिक ने लिखे हैं।

सार रूप में मुझे बस यही कहना है कि आप अंधविश्वास पर आधारित इस कथा तथा इसमें समाहित अन्य अवधारणाओं पर विश्वास मत कीजिए लेकिन इस फ़िल्म को (यदि अब तक आपने नहीं देखा है तो) देख लीजिए। आपको लगभग सवा दो घंटे का सम्पूर्ण मनोरंजन प्राप्त होगा तथा फ़िल्म देखने के उपरांत कोई निराशा नहीं होगी, यह मेरी गारंटी है।

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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

रहस्य की धुंध

निर्माता-निर्देशक बलदेवराज चोपड़ा ने बहुत-सी अच्छी फ़िल्में बनाई हैं जिनमें कानून (१९६०) तथा  हमराज़ (१९६७) जैसी उत्तम रहस्य फ़िल्में भी सम्मिलित हैं। उन्होंने ऐसी ही एक अच्छी रहस्य फ़िल्म धुंध भी बनाई थी जो सन १९७३ में प्रदर्शित हुई थी। फ़िल्म की कथा के लिए उनकी फ़िल्म निर्माण संस्था बी.आर. फ़िल्म्स के कथा-विभाग को श्रेय दिया गया किंतु वस्तुतः फ़िल्म की कहानी सुप्रसिद्ध रहस्य कथा लेखिका अगाथा क्रिस्टी के नाटक द अनएक्सपेक्टिड गेस्ट (अप्रत्याशित अतिथि) पर आधारित है।


धुंध की कहानी एक हिल स्टेशन पर घटित होती बताई गई है। इस रहस्यकथा का आरंभ एक घर में एक व्यक्ति के आगमन से होता है जिसकी कार रास्ते में ख़राब हो गई है तथा वह किसी गैरेज में फ़ोन करने के उद्देश्य से उस घर में आया है। रात का समय है तथा वातावरण में गहरी धुंध छाई हुई है। उसे घर का द्वार खुला मिलता है जिससे वह अंदर जाता है जहाँ उसे एक व्यक्ति एक कुर्सी पर मरा पड़ा मिलता है। यह व्यक्ति इस घर का स्वामी रंजीत (डैनी) है। आगंतुक चंद्रशेखर (नवीन निश्चल) है जिसकी भेंट हाथ में पिस्तौल लिए हुए एक युवती से होती है। यह युवती रंजीत की पत्नी रानी (ज़ीनत अमान) है। रानी चंद्रशेखर को बताती है कि अपने पति की हत्या उसी ने की है। चंद्रशेखर के कारण पूछने पर वह अपनी दुखभरी कहानी उसे सुनाती है। उसका अपाहिज पति रंजीत उस पर अत्याचार करता था। उसका रवैया अपनी सौतेली मां (उर्मिला भट्ट) तथा अपने सौतेले भाई के प्रति भी वैसा ही था। एक दिन जब वह जीवन से दुखी होकर आत्महत्या करने जा रही थी तो उसे एक वकील सुरेश (संजय) ने बचाया तथा धीरे-धीरे उसका सुरेश से प्रेम-संबंध हो गया। यह बात रंजीत से छुपी नहीं रही। दोनों के बीच झगड़े बढ़ते गए और अंततः आज जब रंजीत उसे मारने जा रहा था तो छीना-झपटी में पिस्तौल चल गई और गोली लगने से रंजीत स्वयं ही मारा गया।

अब रानी चंद्रशेखर को पुलिस को बुलाने के लिए कहती है तो चंद्रशेखर उससे कहता है कि पुलिस तो उसे हत्या के आरोप में गिरफ़्तार कर लेगी जबकि उसने तो जान-बूझकर हत्या की नहीं है, साथ ही उसका अत्याचारी पति रंजीत तो इसी योग्य था। ऐसे में अपने आप को कानून के हवाले करना समझदारी नहीं होगी। तब रानी उससे पूछती है कि उसे क्या करना चाहिए तो चंद्रशेखर उसे बताता है कि पुलिस को ऐसी कहानी परोसी जानी चाहिए जिससे हत्या का आरोप किसी बाहर से आए हुए अज्ञात व्यक्ति पर लगे, न कि उस पर। अब चंद्रशेखर की सलाह के अनुरूप तथा उसके सहयोग से रानी ऐसी स्थिति बनाती है जिससे लाश पर घर की नौकरानी की दृष्टि पड़ती है तथा उसके शोर मचाने के उपरांत ही पुलिस को बुलाया जाता है और बताया जाता है कि संभवतः कोई व्यक्ति बाहर से आया और हत्या करके चला गया। पुलिस अपने ढंग से मामले की छानबीन में लग जाती है और चंद्रशेखर को निर्देश देती है कि पुलिस को सूचना दिए बिना तथा उसकी अनुमति लिए बिना वह शहर छोड़कर न जाए।

पुलिस मामले की गहराई में जाती है तो सुरेश एवं रानी का प्रेम-संबंध उससे छुपा नहीं रहता। पुलिस को कुछ सूत्र ऐसे मिलते हैं जिनसे हत्या का संदेह सुरेश पर जाता है। पुलिस सुरेश को गिरफ़्तार कर लेती है तथा उस पर न्यायालय में रंजीत की हत्या का मुक़द्दमा चलता है। रानी सुरेश को बचाने के लिए न्यायालय में स्वयं यह अपराध स्वीकार कर लेती है। पर क्या सुरेश हत्यारा है ? क्या रानी सच बोल रही है ? वास्तविकता का पता फ़िल्म के अंत में चलता है।

धुंध शब्द अपने आप में ही रहस्य को समाहित किए हुए है। रहस्य के लिए अंग्रेज़ी में मिस्ट्री शब्द का प्रयोग किया जाता है जो मिस्ट से बना है जिसका अर्थ ही है – धुंध। अपने नाम के अनुरूप ही यह एक रहस्य में लिपटी कथा है जिसमें पति-पत्नी का संबंध भी समाविष्ट है तथा एक प्रेमकथा भी। अपने प्रारंभिक दृश्य से लेकर अंतिम दृश्य तक रोचक यह फ़िल्म दर्शक को बांधे रखती है। कहानी तो अच्छी है ही, बलदेवराज चोपड़ा का निर्देशन भी कुशल है।

फ़िल्म तकनीकी दृष्टि से भी उत्कृष्ट है। संवादों से लेकर सम्पादन, पार्श्व संगीत, कला-निर्देशन एवं छायांकन तक सभी उत्तम हैं। हिल स्टेशन के नयनाभिराम दृश्य दर्शक के नयनों को शीतलता प्रदान करते हैं। फ़िल्म की लंबाई भी कम है (मुश्किल से दो घंटे)। निर्देशक ने दर्शकों को सोचने का समय नहीं दिया है। साहिर लुधियानवी के गीतों को संगीतकार रवि ने मधुर धुनों से सजाया है। संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है तथा उलझन सुलझे ना गीत विशेष रूप से अच्छे बन पड़े हैं। पद्मा खन्ना तथा जयश्री तलपदे के नृत्य वाला गीत जो यहाँ था, वो वहाँ क्यूंकर हुआ भी सुनने और देखने में अच्छा लगता है। सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। डैनी का अभिनय विशेष रूप से सराहना योग्य है।

कुल मिलाकर धुंध एक छोटी-सी मगर दिलचस्प फ़िल्म है जिसे बॉलीवुड में बनी सर्वश्रेष्ठ रहस्य फ़िल्मों में शुमार किया जाता है। फ़िल्म में फ़ालतू बातें बिलकुल नहीं हैं। प्रत्येक बात, प्रत्येक दृश्य एवं प्रत्येक चरित्र फ़िल्म के कथानक से पूरी तरह संबद्ध है। फ़िल्म के प्रदर्शन को आधी सदी से अधिक बीत जाने पर भी इसके रंग फीके नहीं पड़े हैं तथा किसी नई फ़िल्म को देखने जैसा ही आनंद प्रदान करते हैं। यह फ़िल्म न केवल रहस्यकथाओं के शौक़ीनों को बल्कि सामान्य फ़िल्में देखने वालों को भी पसंद आएगी। साथ ही यह फ़िल्म उन लोगों को भी पसंद आएगी जिन्होंने अगाथा क्रिस्टी का नाटक द अनएक्स्पेक्टिड गेस्ट पढ़ा है।  

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