रविवार, 19 सितंबर 2021

वतन पे जो फ़िदा होगा, अमर वो नौजवां होगा

बचपन में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में मुग़ल काल के बारे में पढ़ते समय अफ़ग़ान शासक शेर शाह के विषय में भी जाना था जिसका मूल नाम फ़रीद ख़ां सूर था एवं जो कालांतर में मुग़ल बादशाह हुमायूँ को पहले चौसा व तदोपरांत कन्नौज के युद्धों में पराजित करके दिल्ली के राजसिंहासन पर जा बैठा था। १५४० से १५४५ तक भारत के मुग़ल राज्य को अपने अधिकार में रखने वाले शेर शाह सूरी के नाम से प्रसिद्ध इस व्यक्ति को प्रमुखतः उसके प्रशासनिक सुधारों के लिए जाना एवं प्रशंसित किया जाता है। 

१९९८ में अनुजा चौहान ने पेप्सी के पेय पदार्थ को भारत में लोकप्रिय बनाने के लिए एक सूत्रवाक्य (नारा) दिया - ये दिल मांगे मोर। हिंदी एवं अंग्रेज़ी के शब्दों के संयोजन से निर्मित यह सूत्रवाक्य अतिशीघ्र ही अत्यंत लोकप्रिय होकर विज्ञापन जगत पर छा गया। इसकी लोकप्रियता यहाँ तक जा पहुँची कि निर्देशक अनंत महादेवन ने शाहिद कपूर को नायक की भूमिका में लेकर 'दिल मांगे मोर' नामक हिंदी फ़िल्म ही बना डाली जो वर्ष २००४ के अंतिम दिन प्रदर्शित हुई। इस वाक्य का अभिप्राय है कि जो मिला है, उससे मेरा मन नहीं भरा है, मुझे और अधिक (मोर) चाहिए।

लेकिन आज जब 'शेरशाह' शब्द का उल्लेख होता है तो हमें सोलहवीं शताब्दी के अफ़ग़ान शासक का स्मरण नहीं होता, न ही 'ये दिल मांगे मोर' वाक्य को सुनने से पेप्सी के पेय पदार्थ का विचार मन में आता है। इन दोनों को ही अमरत्व प्रदान कर दिया एक चौबीस-पच्चीस वर्ष के युवा भारतीय सैनिक के बलिदान ने जिसका नाम है विक्रम बतरा। सात जुलाई, १९९९ को कारगिल की पहाड़ियों में मातृभूमि की रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग करने वाले उस वीर युवक को कभी नहीं सूझा होगा कि उसके संसार से चले जाने के उपरांत 'शेरशाह' एवं 'ये दिल मांगे मोर' शब्द भारतवासियों के हृदय में सदा के लिए बस जाएंगे। 

भारत एवं पाकिस्तान के बीच हुए चार युद्धों में से सबसे लम्बा चलने वाला यह कारगिल युद्ध ही था जो पचास दिनों तक चला एवं जिसने ५२७ भारतीय सैनिकों की बलि ली। यही सबसे कठिन युद्ध था जिसकी कभी औपचारिक घोषणा भी नहीं की गई लेकिन जिसने भारतीय सेना को अपनी उस भूमि को शत्रु से मुक्त कराने का का लक्ष्य दिया था जो हज़ारों फ़ुट की ऊंचाई पर स्थित थी एवं जहाँ घुसपैठिए बनकर आए शत्रु सुविधाजनक स्थिति में घात लगाए बैठे थे। ऐसी स्थिति में भारतीय वीरों के लिए मरना सरल था, मारना एवं अपनी भूमि पर पुनः अधिकार करना अत्यन्त दुष्कर। लेकिन यह लगभग असंभव-सा कार्य कर दिखाया भारतीय वीरों ने जिनमें से एक था हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मा लेफ़्टिनेंट विक्रम बतरा जिसे युद्धभूमि में ही पदोन्नत करके कैप्टन बनाया गया। 

रणभूमि में अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन करते हुए अपने वतन पर मर-मिटने वाले विक्रम बतरा का व्यक्तित्व कुछ ऐसा नाटकीय एवं फ़िल्मी रंग लिए हुए था कि उनके जीवन पर फ़िल्म तो बननी ही थी। मस्तमौला मिज़ाज वाले, बात-बात पर नाटकीय संवाद बोलने वाले तथा फ़िल्मी अंदाज़ में अपनी प्रेयसी की मांग अपने ख़ून से भरकर उसे अपनी दुलहन बना लेने वाले इस स्टाइलिश युवक की जीवन-कथा रूमानी ढंग से ही चली और रूमानी ढंग से ही अपने चरम पर पहुँच कर पूरी हुई। 

१९७१ के भारत-पाक युद्ध पर 'बॉर्डर' (१९९७) जैसी सफल फ़िल्म बना चुके फ़िल्मकार जे.पी. दत्ता ने कारगिल युद्ध पर अपनी व्यावसायिक रूप से असफल लेकिन अत्यन्त प्रामाणिक फ़िल्म 'एल.ओ.सी.-कारगिल' (२००३) में विक्रम बतरा की भूमिका अभिषेक बच्चन को सौंपी जिन्होंने निश्चय ही उसे प्रभावशाली ढंग से निभाया। उनकी प्रेयसी डिम्पल चीमा की भूमिका एशा देओल ने की। लेकिन अत्यन्त विस्तृत कैनवास पर बनी चार घंटे से भी अधिक लम्बी उस फ़िल्म में विक्रम बतरा के ट्रैक को आख़िर कितना फ़ुटेज मिल सकता था ? उनकी जीवन गाथा तो एक स्वतंत्र फ़िल्म की अधिकारिणी थी। यह आवश्यकता अंततः २०२१ में निर्माता धर्मा प्रोडक्शंस तथा निर्देशक विष्णुवर्धन ने संदीप श्रीवास्तव की पटकथा पर फ़िल्म बनाकर पूरी की जिसका नाम स्वाभाविक रूप से 'शेरशाह' ही होना था।

'शेरशाह' फ़िल्म युद्धभूमि में विक्रम बतरा द्वारा लड़ी गई अंतिम लड़ाई से आरम्भ होती है  एवं तदोपरांत फ़्लैश बैक में चलती हुई विक्रम के जीवन के विषय में बताती है। फ़िल्म प्रामाणिक है क्योंकि विक्रम के बचपन से लेकर युवावस्था तक के विभिन्न घटनाक्रम उनके साथ जुड़े लोगों के माध्यम से ज्ञात हैं। विक्रम बचपन से ही जुझारू एवं कभी हार न मानने वाले थे एवं भाग्यशाली भी थे कि जिसे उन्होंने चाहा, उसका भी सच्चा प्रेम उन्हें प्रतिदान में मिला। डिम्पल का प्रेम तो विक्रम के देशप्रेम के समकक्ष रखा जा सकता है क्योंकि उन्होंने विक्रम की स्मृति को ही अपने मन में बसाकर जीवन बिता दिया एवं किसी अन्य व्यक्ति से विवाह नहीं किया। फ़िल्म रोचक ढंग से चलती है एवं दर्शक विक्रम से जुड़ी एक-एक घटना को ध्यान से देखते हुए धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व को समझते चले जाते हैं। स्वाभाविक ही है कि फ़िल्म का अंतिम भाग जिसमें विक्रम की विजय एवं बलिदान हैं, सर्वाधिक प्रभावशाली है। तकनीकी पक्ष, गीत-संगीत अच्छे हैं एवं सभी सहायक कलाकारों का अभिनय सहज-स्वाभाविक है। संवाद लेखक के लिए अधिक कार्य नहीं था क्योंकि कभी न भुलाए जा सकने वाले संवाद तो स्वयं स्वर्गीय विक्रम ही अपने मुख से दे गए थे। 

विक्रम (तथा उनके हमशक़्ल भाई विशाल) की भूमिका में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने प्रभावशाली अभिनय किया है। यदि वे 'एल.ओ.सी.-कारगिल' के अभिषेक बच्चन से बेहतर नहीं रहे तो कमतर भी नहीं रहे। पर एक समीक्षक के रूप में मुझे लगता है कि वे सैन्य जीवन से बाहर एक अपने सपनों को जीने वाले युवा तथा एक प्रेमी की भूमिका में अधिक प्रभावी रहे बजाय अपने सैनिक रूप में। फिर भी अपने करियर की इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका को निभाने के लिए वे पूरे अंकों के अधिकारी हैं। डिम्पल की भूमिका में कियारा आडवाणी ने प्राण फूंक दिए हैं। सिद्धार्थ के साथ उनकी जोड़ी ख़ूब जमी है। फ़िल्म के अंत में वास्तविक विक्रम के साथ-साथ उनसे जुड़े सभी वास्तविक व्यक्तियों के चित्र दिखाए गए हैं लेकिन वास्तविक डिम्पल का चित्र नहीं दिखाया गया है जो कि पूर्णतः उचित है। उस साहसी स्त्री की निजता का सम्मान होना ही चाहिए। 

फ़िल्म में सैन्य जीवन के भीतर की वास्तविकताओं को यथार्थपरक ढंग से ही प्रदर्शित किया गया है जिनमें वरिष्ठों का अहम् भी सम्मिलित है जो कि उनके अपने कनिष्ठों के साथ व्यवहार में परिलक्षित होता है। विक्रम के हृदय की विशालता तथा काश्मीरी लोगों के कष्ट एवं स्थिति को समझकर उन्हें अपना बनाने की विवेकशीलता को भी अच्छे-से दिखाया गया है। इससे फ़िल्म देखने वालों के मन में विक्रम का मान एक बलिदानी सैनिक के रूप में ही नहीं वरन एक सरलचित्त एवं उदार मानव के रूप में भी बढ़ जाता है। 

फिर भी मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि 'शेरशाह' फ़िल्म जितनी अच्छी बनी है, उससे भी अधिक अच्छी बन सकती थी एवं बननी चाहिए थी। विक्रम के महान बलिदान को देखकर मन में भावनाओं का वह ज्वार नहीं उठता जो कि ऐसी फ़िल्म को देखते समय किसी भी संवेदनशील एवं देशप्रेमी दर्शक के मन में उठना चाहिए। इसके लिए सम्पादन, दृश्य-संयोजन एवं पटकथा का प्रवाह बेहतर होना चाहिए था। दाल अच्छी बनी पर नमक कुछ कम रह गया। 

फ़िल्म की एक अन्य कमी अत्यंत अभद्र अपशब्दों (भद्दी गालियों) का प्रयोग भी है जिन्हें विक्रम के मुख से भी कहलवाया गया है। रणभूमि में युद्धरत सैनिकों का अपने प्रतिपक्षियों के प्रति अपशब्दों का प्रयोग एक तथ्य होगा लेकिन उन्हें फ़िल्म में ऐसा करते हुए प्रदर्शित करना सम्पूर्ण परिवार एवं बालकों के साथ फ़िल्म देखने वालों के प्रति फ़िल्मकार का अन्याय ही है। यही ग़लती 'एल.ओ.सी.-कारगिल' में जे.पी. दत्ता ने भी की थी। और यही वह कमी है जो 'लम्हा' (२०१०) तथा 'नो वन किल्ड जेसिका' (२०११) जैसी अच्छी फ़िल्मों पर दाग़ लगा देती है। भारतीय दर्शक सीमा पर अपने प्राणों को संकट में डालकर देश की रक्षा करने वाले सैनिकों की वीरता से भलीभांति परिचित हैं, इसके लिए उन्हें गालियां देते हुए दिखाना आवश्यक नहीं। इससे ऐसी फ़िल्मों का प्रभाव घटता है, बढ़ता नहीं। 

लेकिन 'शेरशाह' निश्चय ही देखने लायक फ़िल्म है - देशभक्तों के लिए भी तथा मनोरंजन के आकांक्षियों के लिए भी। इस फ़िल्म की सफलता का श्रेय इसे बनाने वालों से अधिक उस अमर शहीद को है जिस पर यह बनी है। हिंदी फ़िल्म 'फूल बने अंगारे' (१९६३) का गीत है - 'वतन पे जो फ़िदा होगा, अमर वो नौजवां होगा'। वतन पे फ़िदा होकर विक्रम अमर हो गए, युद्ध में उनको दिया गया कूट नाम 'शेरशाह' अमर हो गया, उनका विजय-घोष 'ये दिल मांगे मोर' अमर हो गया, उनके द्वारा विभिन्न अवसरों पर कही गईं विभिन्न बातें अमर हो गईं। विक्रम ने कैफ़ी आज़मी साहब की इन पंक्तियों को अपने जीवन में उतारकर सार्थक कर दिया - 'ज़िन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर जान देने की रुत रोज़ आती नहीं, हुस्न और इश्क़ दोनों को रुसवा करे वो जवानी जो ख़ूं में नहाती नहीं'। इसी गीत की यह पंक्ति भी विक्रम पर शब्दशः लागू होती है - 'मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो'। ज़िन्दगी जीने के अपने बाँकपन को 'शेरशाह' विक्रम ने अपनी शहादत के लम्हे में भी यकीनन क़ायम रखा।

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26 टिप्‍पणियां:

  1. फिल्में तो सभी देखते हैं परंतु ऐसी समीक्षा लिखने का हुनर सबमें नहीं होता। मैं फिल्में नहीं देखती। आपकी समीक्षा पढ़कर फिल्म न देखनेवाले को भी फिल्म देखने का मन होता है।

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  2. बहुत खूबसूरती से लिखी समीक्षा । फ़िल्म के एक एक बिंदु पर अपने विचार प्रस्तुत किये ।

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  3. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(२०-०९-२०२१) को
    'हिन्दी पखवाड़ा'(चर्चा अंक-४१९३)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  4. इतना सूक्ष्म और हर पहलू पर विचार कर सटीक विश्लेषात्मक विश्लेषण लिखना सचमुच बेहद सराहनीय है,आपकी साधना और लगन का परिचायक है सर।
    फिल्में हम भी नहीं देखते पर आपकी समीक्षा पढ़कर ये वाली जरूर देखेंगे अब।

    प्रणाम सर
    सादर।

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    1. हार्दिक आभार माननीया श्वेता जी। यह फ़िल्म यदि आप देखेंगी तो मुझे विश्वास है कि आपको पसंद आएगी।

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  5. फिल्म के हर दृश्य का गहराई से अवलोकन किया आपने,बहुत सुंदर समीक्षा,फिल्म में रुचि जगती हुई ।

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  6. बहुत ही उम्दा समीक्षा आपके इस समीक्षा की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है! फिर मैं तो बहुत सारी कमियां रहेगी पर आपकी समीक्षा में कोई कमी नहीं है ! आपने ना सिर्फ फिल्म की समीक्षा की बल्कि एक इतिहास को बहुत खूबसूरत इसे प्रस्तुत किया है! हर उस महत्वपूर्ण बिंदु पर प्रकाश डाला है आपने जिस पर अन्य समीक्षक डालने से चूक गए है!
    इस फ़िल्म की सफलता का श्रेय इसे बनाने वालों से अधिक उस अमर शहीद को है जिस पर यह बनी है।
    👆एकदम सत्य प्रतिशत सत्य बात कही है आपने!
    आपकी समीक्षा बहुत ही उम्दा है उन सभी मशहूर समीक्षकों से भी अधिक ! लेकिन दुर्भाग्य ही है कि यहाँ मशहूर लोगों के नाम बिकतें है! मैं ये नहीं कहती कि जो लोग मशहूर होते हैं वे अच्छे नहीं होते! लेकिन कुछ लोग उनसे भी अधिक बेहतरीन होते हैं!पर मशहूर न होने के कारण उनके काम को वो प्यार और सम्मान नही मिल पाता जिसके वे हकदार होते हैं! आपकी सभी समीक्षाएं बहुत ही उम्दा और प्रभावशाली होती है!

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  7. बहुत उम्दा और सटीक समीक्षा।
    मैंने फिल्म देखी है सभी बातें बिल्कुल सही कही है

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  8. भूतभी उम्दा समीक्षा, जितेंद भाई। मुझे लगता है कि फ़िल्म देखते वक्त आपके जेहन में यह उथल पुथल व्हलती होगी कि गिलम के कौन से भाग से क्या समीक्षा में लिखूंगा। है न?

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    1. हार्दिक आभार ज्योति जी। मैं सभी देखी गई फ़िल्मों की समीक्षा नहीं करता। मैं प्रायः उन्हीं फ़िल्मों की समीक्षा (या उन से संबंधित आलेख) लिखता हूँ जो मुझे कम-से-कम किसी एक कारण से देखने योग्य लगती हों।

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  9. अक्षरशः सत्य कहा आपने । शेरशाह देखते हुए कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ ।

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  10. समीक्षा लिखने में आपको महारत हासिल है। आपकी हर एक समीक्षा लाज़बाब होती है पर ये तो लाज़बाब से भी ऊपर है। सच कहा मनीषा ने कि-फिल्म में बहुत कमियां थी जो दिल को छूने में नाकाम रही मगर आप की समीक्षा ने आदि से अंत तक बांधे रखा। फिल्मों की शौकीन हूँ मैं आपकी समीक्षा पढ़कर उन फिल्मों का मजा दुगुना हो जाता है। और अपने देश के इन वीर सपूतों के बारे में क्या कहना -इन्हें तो बस सत-सत नमन, ये वीर जवान है तो हम है। सादर नमन जितेंद्र जी

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    1. हृदयतल से आपका आभार प्रकट करता हूँ माननीया कामिनी जी। ठीक कहा आपने। ये वीर जवान हैं तो हम हैं।

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  11. सुंदर, सार्थक रचना !........
    ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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  12. विक्रम के महान बलिदान को देखकर मन में भावनाओं का वह ज्वार नहीं उठता जो कि ऐसी फ़िल्म को देखते समय किसी भी संवेदनशील एवं देशप्रेमी दर्शक के मन में उठना चाहिए। इसके लिए सम्पादन, दृश्य-संयोजन एवं पटकथा का प्रवाह बेहतर होना चाहिए था। दाल अच्छी बनी पर नमक कुछ कम रह गया।
    सही कहा आपने जितेन्द्र जी! मैंने भी देखी ये फिल्म और ऐसा ही महसूस किया जैसा आपने लिखा वाकई ये और अच्छी हो सकती थी साथ ही जो गाली ग्लोज बीच में डाले हैं वे नितांत अनावश्यक है हाँ इस अच्छी दाल में कुछ कमी है ये महसूस किया पर नमक की कमी है ये आप जैसा समीक्षक ही समझ सकता है बहुत ही लाजवाब समीक्षा की है आपने....।किसी भी फिल्म की समीक्षा करने में आपका कोई सानी नहीं है।

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