Wednesday, October 28, 2020

एक फ़िल्म जो आज भी मेरे हताश मन को संबल देती है

इस लेख के शीर्षक में 'एक फ़िल्म' की ओर इंगित किया गया है, अत: स्वाभाविक ही है कि उस फ़िल्म से संबंधित बातें मुझे लिखनी हैं । परंतु मुख्यतः इस लेख में मैं जो बताना चाहता हूँ, वह यह है कि ऐसा क्या है उस प्रत्यक्षतः मनोरंजनार्थ बनाई गई व्यावसायिक फ़िल्म में जो वह मेरे जीवन का एक अंग बन गई है । वह है बॉलीवुड के भट्ट बंधुओं (मुकेश भट्ट-महेश भट्ट) द्वारा १९९९ में बनाई गई तनूजा चंद्रा द्वारा निर्देशित अक्षय कुमार, प्रीति ज़िंटा एवं आशुतोष राना की प्रमुख भूमिकाओं वाली हिंदी फ़िल्म 'संघर्ष' । 

पहले फ़िल्म की ही बात कर ली जाए । इसे महेश भट्ट ने लिखा है तथा ऐसा कहा जाता है कि इसकी कथा उन्होंने १९९१ में आई हॉलीवुड फ़िल्म 'द साइलेंस ऑव द लैम्ब्स' से प्रेरित होकर लिखी थी । कई ऑस्कर पुरस्कार जीतने वाली यह फ़िल्म इसी नाम के एक प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित थी । बहरहाल महेश भट्ट ने चाहे कोई मौलिक कहानी न लिखकर एक विदेशी कहानी को ही भारतीय परिवेश में लिखकर प्रस्तुत किया, लेकिन बाख़ूबी किया । यह वह नक़ल थी जो अक़्ल लगाकर की गई थी । अत्यंत तीव्र गति से चलने वाले घटनाक्रम को धार दी गिरीश धमीजा के प्रभावी संवादों ने, रजतपट पर कभी हृदय को कंपित कर देने वाले तो कभी हृदयतल को स्पर्श कर लेने वाले ढंग से प्रदर्शित किया छब्बीस वर्षीया तनूजा चंद्रा के कुशल निर्देशन ने तथा उसे आँधी सरीखा स्वरूप प्रदान कर दिया अमित सक्सेना के संपादन ने जिन्होंने अपनी संपादकीय कैंची कुछ ऐसी तीव्रता से चलाई कि दर्शक को सोच-विचार करने का समय ही न मिले तथा वह अपनी श्वास रोके अपने समक्ष पटल पर प्रवाहित हो रहे कथानक को आदि से अंत तक टकटकी लगाकर देखता चला जाए; न मध्यान्तर होने का पूर्वाभास हो सके और न ही कथा-प्रवाह के अपनी चरम सीमा पर जा पहुँचने का । एक्शन से भरपूर इस फ़िल्म में कला-निर्देशक तथा एक्शन-निर्देशक दोनों ने ही अत्यंत सराहनीय कार्य किया है । चरम (क्लाईमेक्स) में हिंसा इतनी अधिक एवं इतनी वीभत्स है कि मुझे लगता है कि बलि चढ़ाने वाले अंधविश्वासी अपराधी से एक बालक की प्राण-रक्षा की कथा होने पर भी  यह फ़िल्म 'केवल वयस्कों के लिए' ही है (सेंसर प्रमाण-पत्र में तो फ़िल्म को इसी श्रेणी में रखा गया था किन्तु फ़िल्म के पोस्टरों पर 'ए' अंकित नहीं था) ।

 

फ़िल्म का एक अत्यंत प्रभावी पक्ष गीत-संगीत भी है । समीर द्वारा रचित सुंदर शब्दों को जतिन-ललित ने मधुर धुनों में  ढाला है  यद्यपि फ़िल्म का एक बहुत ही सुंदर गीत - 'हम बड़ी दूर चले आए हैं चलते-चलते'  फ़िल्म में सम्मिलित नहीं किया गया है  तथा उसे केवल एलबम में ही सुना जा सकता है । और मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस फ़िल्म का एक गीत 'मुझे रात-दिन बस मुझे चाहती हो, कहो-न-कहो मुझको सब कुछ पता है'' वस्तुतः ओ.पी.नैयर  साहब  द्वारा रचे गए एवं मोहम्मद रफ़ी साहब द्वारा गाए गए एक बहुत पुराने गीत 'मुझे देखकर आपका मुसकराना मोहब्बत नहीं है तो फिर और क्या है' (जिसे १९६२ में आई फ़िल्म 'एक मुसाफ़िर एक हसीना' के लिए एस.एच. बिहारी जी ने लिखा था) की निर्लज्जता से की गई संपूर्ण नक़ल है । फ़िल्म के जो गीत मुझे अधिक पसंद आए, उनका उल्लेख मैं आगे पृथक् रूप से करूंगा । और यह लिख देना भी मैं समीचीन समझता हूँ कि फ़िल्म का पार्श्व संगीत भी प्रशंसनीय है जो फ़िल्म के समेकित प्रभाव को परिवर्धित कर देता है ।

अभिनय पक्ष भी अत्यंत सबल है । खलनायक आशुतोष राना ने अपने दिल दहला देने वाले अभिनय के कारण इस फ़िल्म की अपनी भूमिका के लिए कई पुरस्कार जीते जिसके वे सर्वथा योग्य थे । फ़िल्म नायिका-प्रधान है तथा फ़िल्म जगत में उन दिनों नई-नई ही आईं प्रीति ज़िंटा ने अंधकार से डरने वाली तथा अपने अतीत से परेशान एक प्रशिक्षु सीबीआई अधिकारी की कठिन भूमिका में अत्यंत प्रभावशाली अभिनय किया है । फ़िल्म की जान हैं इसके नायक अक्षय कुमार जिनका प्रशंसक मैं इसी फ़िल्म को देखकर बना । एक निर्मल मन वाले अपराधी की भूमिका में अक्षय कुमार ने अपनी अन्य सभी छवियों को ध्वस्त करते हुए ऐसा हृदय-विजयी अभिनय किया है जिसे निर्विवाद रूप से उनके अभिनय-जीवन के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में रखा जा सकता है । सहायक भूमिकाओं में अमन वर्मा, विश्वजीत प्रधान, मदन जैन, अमरदीप झा, निनाद कामत, अभय चोपड़ा, एस.एम. ज़हीर आदि तथा बाल कलाकारों - मास्टर मज़हर, जश त्रिवेदी एवं आलिया भट्ट (जी हाँ, आज की अत्यन्त लोकप्रिय नायिका) ने भी उत्कृष्ट अभिनय किया है । 

फ़िल्म में कमियां हैं लेकिन कम ही हैं । ख़ूबियां उन पर भारी हैं । देखने वाले को शुरू से आख़िर तक दम साधे परदे से चिपकाए रखने वाली यह फ़िल्म टिकट खिड़की पर क्यों असफल रही, कहना मुश्किल है । प्रतिष्ठित समीक्षकों ने भी इस फ़िल्म के साथ न्याय नहीं किया एवं इसकी आलोचना ही की, प्रशंसा नहीं । 

अब इस फ़िल्म में ऐसी भी क्या बात है जो मैंने इसे सिनेमा हॉल में ही पाँच बार देखा तथा आज यह मेरी शख़्सियत का एक हिस्सा बन चुकी है ? इस सवाल का जवाब मैं फ़िल्म समीक्षा करने में अपनी गुरू अरूणा त्यागराजन के इस कथन से देना आरंभ करता हूँ - 'Review is about feelings and what the movie evokes in one. Moviemaking and movie viewing is so subjective. Never know who it reaches out to and how:' (समीक्षा उन भावनाओं से संबंध रखती है जो कि फ़िल्म व्यक्ति में जगाती है । फ़िल्म बनाना तथा फ़िल्म देखना अत्यन्त व्यक्तिपरक बात है । कुछ पता नहीं लगता कि वह किस तक पहुँचती है एवं कैसे पहुँचती है ।) 

जी हाँ, यह बात फ़िल्मों, धारावाहिकों तथा पुस्तकों; सभी पर लागू है । पेशेवर समीक्षकों की बात यदि छोड़ दी जाए जिनका करियर ही यही है तो कोई भी समीक्षा उस समीक्षक में उस फ़िल्म, धारावाहिक या पुस्तक द्वारा उत्पन्न की गई भावनाओं की ही अभिव्यक्ति होती है । कम-से-कम मुझ पर तो यह उक्ति पूरी तरह खरी उतरती है । मैंने विभिन्न जाने-माने फ़िल्म समीक्षकों की पक्षपातपूर्ण एवं आधी-अधूरी समीक्षाएं पढ़कर ही अनुभव किया था कि उनसे बेहतर समीक्षाएं तो मैं लिख सकता था एवं इसीलिए मेरी लेखनी इस क्षेत्र में उतर पड़ी लेकिन मैं यह काम दिमाग़ से नहीं, दिल से करता हूँ और वही लिखता हूँ जो मैंने फ़िल्म के द्वारा अनुभव किया । 'संघर्ष' एक ऐसी ही फ़िल्म है जिसे मैंने अपने जीवन की एक विषम परिस्थिति में देखा एवं जिसने मेरे व्यक्तित्व को अत्यन्त गहनता से प्रभावित किया । 

२९ मार्च, १९९९ को जब मैं कर्णावती एक्सप्रेस द्वारा मुम्बई जा रहा था, तब (अपनी ही भूल से) मैं चलती हुई रेलगाड़ी से बांद्रा के प्लेटफ़ॉर्म पर जा गिरा जिसके परिणामस्वरूप मेरा बायां हाथ बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया । उस अपरिचित नगर में मेरी सहायता पहले तो प्लेटफ़ॉर्म पर ही कुछ सहृदय व्यक्तियों ने की एवं तदोपरांत मेरे एक मित्र (रमेश गुप्ता) ने मुझे संभाला एवं मुम्बई में ही मेरी मेरी शल्य-चिकित्सा का प्रबंध किया । किन्तु वह शल्य-चिकित्सा अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल नहीं रही एवं मुझे कुछ माह के उपरान्त जोधपुर (राजस्थान) में पुनः शल्य-चिकित्सा करवानी पड़ी । दोनों ही बार मेरे हाथ के साथ-साथ कमर की भी शल्य-चिकित्सा हुई क्योंकि हाथ की हड्डी इतनी अधिक टूटी थी कि रिक्त स्थान को भरने के लिए कमर की हड्डी से कुछ भाग लेना पड़ा था (अब मेरा वह हाथ कभी अपनी सामान्य स्थिति में नहीं आ सकता) । महीनों-महीनों मेरे हाथ पर भारी प्लास्टर चढ़ा रहा जो गर्मी के मौसम में एक अत्यन्त दुखदाई अनुभव था । मेरे परिजन अपरिहार्य कारणों से मेरे साथ नहीं रह सकते थे एवं मैं उदयपुर (राजस्थान) में अकेले ही रहकर भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा था जिसकी प्रारंभिक परीक्षा मैंने उस कठिन समय में भी उत्तीर्ण कर ली थी एवं अब मैं दो-दो बार शल्य-चिकित्सा हो चुकने पर भी मुख्य परीक्षा देने के लिए कटिबद्ध था । भोजन के लिए मैंने एक टिफ़िन-सेवा का प्रबंध कर लिया था । घर के तथा अपने शेष कार्य मैं स्वयं करता था । लेकिन परीक्षा देने के मेरे दृढ़ संकल्प पर उस अवसाद की छाया थी जो अपनी शारीरिक अवस्था, मानसिक स्तर पर एकाकीपन, भारी आर्थिक हानि एवं इन सबसे बढ़कर परीक्षा की तैयारी का मूल्यवान समय नष्ट होने से उपजा था । वक़्त-बेवक़्त एक गहरी उदासी मुझ पर तारी हो जाती थी एवं मेरे लिए पढ़ाई में मन लगाना बहुत मुश्किल हो जाता था जबकि पहले ही मेरे पास उसके लिए वक़्त बहुत कम बचा था । 

ऐसे में तीन सितम्बर, १९९९ को 'संघर्ष' प्रदर्शित हुई जिसकी समीक्षा मैंने हिंदी समाचार-पत्र 'राजस्थान पत्रिका' में पाँच सितम्बर, १९९९ को उसके रविवारीय परिशिष्ट में पढ़ी । अब मैंने पढ़ाई से एक दिन का ब्रेक लिया एवं फ़िल्म देखने के लिए उदयपुर के 'पारस' सिनेमा पर जा पहुँचा । फ़िल्म समाप्त होने के उपरांत जब मैं सिनेमा हॉल से बाहर निकला, तब मैं वह नहीं था जो सिनेमा हॉल में प्रवेश करते समय था । मेरे भीतर बहुत कुछ बदल गया था । फ़िल्म देखकर मैं इतना अच्छा महसूस कर रहा था कि मैं कोई सवारी न लेकर बहुत दूर तक पैदल ही चला ।

वैसे तो संघर्ष शब्द ही मेरे जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है । हालात से संघर्ष करते-करते ही मैं बड़ा हुआ और किस्मत वक़्त-वक़्त पर ऐसी करवटें बदलती रही कि सही मायनों में मेरा संघर्ष कभी ख़त्म हुआ ही नहीं । वह आज भी जारी है । लेकिन वह मेरी ज़िन्दगी का एक ऐसा वक़्त था जब मुझे अपने आगे अंधेरे के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता था । ऐसे में मैंने यह फ़िल्म देखी तथा इसकी नायिका (रीत ओबराय) जो कि अपने भाई तथा पिता के असामयिक निधन के उपरांत अपनी विधवा माता के साथ रहने वाली एक पंजाबी युवती है, के संघर्ष एवं पीड़ा ने मेरे मन को छू लिया । उसके सत्य के पथ पर चलने के अडिग निश्चय ने एवं इस विश्वास ने कि 'जीत हमेशा सच की होती है' (कम-से-कम  तब मेरा भी यही विश्वास था) मेरे टूटते हुए मन को संबल दिया । फ़िल्म का गीत 'नाराज़ सवेरा है, हर ओर अंधेरा है, कोई किरण तो आए कहीं से, आए' जब चल रहा था तो मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी रग-रग में जमा हुआ दर्द पिघलकर बाहर निकल रहा हो । और जब मध्यान्तर के उपरांत 'मंज़िल न हो, कोई हासिल न हो तो है बस नाम की ज़िन्दगी, कोई अपना न हो, कोई सपना न हो तो है किस काम की ज़िन्दगी' चल रहा था तो उसका एक-एक शब्द मेरे हृदय के भीतर उतरकर मानो मुझे जीना सिखा रहा था । 

इस नायिका-प्रधान फ़िल्म में नायक के चरित्र को भी अत्यन्त सुघड़ता से आकार दिया गया है । ज़रूरी नहीं कि कानून का मुजरिम इंसानियत और इंसाफ़ का भी मुजरिम हो । अपराधी होकर भी नायक (अमन वर्मा) को एक अत्यन्त अध्ययनशील तथा बुद्धिमान (लगभग जीनियस) व्यक्ति बताया गया है जो सिद्धांतवादी है तथा नायिका की सरलता एवं सत्यनिष्ठा से प्रभावित होकर उसकी सहायता करने के लिए तत्पर हो जाता है । उसे अपने इंसान होने पर कोई फ़ख़्र नहीं क्योंकि उसने इंसानियत का बदसूरत चेहरा देखा है । लेकिन नायिका के रूप में इंसानियत के दूसरे चेहरे से तआरूफ़ उसे बदल डालता है । उसे नायिका से प्रेम हो जाता है लेकिन वह तब तक उसे अपने मन में ही रखता है जब तक परिवर्तित परिस्थितियों में नायिका से उसकी अनपेक्षित भेंट नहीं होती । सच्चा प्यार ऐसा ही होता है जिसके इज़हार को लम्बी-चौड़ी बातों और शोरशराबे की ज़रूरत नहीं होती । नायक को अपने प्रेम का प्रतिदान नायिका से अपने जीवन के अंतिम क्षणों में मिलता है पर उसके लिए उतना भी बहुत है । सच्ची मुहब्बत की एक नज़र और सच्चे प्यार में डूबा हुआ एक पल ज़िन्दगी भर के दिखावटी प्यार से कहीं बेहतर है जिसके मिल जाने के बाद इंसान सुकून से मर सकता है । 


मैं फ़िल्म के कुछ संवादों का उल्लेख करूंगा क्योंकि उसके बिना इस फ़िल्म से संबंधित मेरी अभिव्यक्ति अपूर्ण ही रह जाएगी :

१. अमन से अपनी प्रथम भेंट में रीत का उससे कहना - 'किताबों के काले अक्षर घोटकर पी लेने से जानवर इंसान नहीं बन जाता । ज्ञान किताबों में लिखी बातों पर अमल करने से आता है, यूं किताबों का ढेर लगा लेने से नहीं ।'

२. अमन और रीत की दूसरी मुलाक़ात में अमन का रीत से कहना - 'इंसानियत की बात मुझसे मत कीजिए । मुझे अपने इंसान होने पर कोई फ़ख़्र नहीं । दुनिया कल जलती हो, आज जल जाए, माचिस चाहिए, मैं दे दूंगा ।'

३. अमन और रीत की अनाधिकृत भेंट में (जब अमन को पुलिस द्वारा यातनाएं दी जा रही हैं), अमन का रीत से कहना - 'बेचारी रीत, समझती है - दूसरों के ग़म बांटने से अपने ज़ख़्म भर जाते हैं ।'

४. पुलिस की गिरफ़्त से फ़रार हो जाने के बाद रीत के अमन से उसके छुपने के स्थान पर मिलने आने पर अमन का रीत से कहना - 'सपने सोच-समझकर देखने चाहिए । सच हो जाते हैं ।'

५. इसी मुलाक़ात में अमन का रीत से सिर्फ़ इतना कहना - 'तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो ।'

६. राज्य के गृह मंत्री के कार्यालय के बाहर रीत का अपने (सहृदय एवं कर्तव्यपरायण) वरिष्ठ अधिकारी से कहना -  'बचपन में मेरी दादी ने मुझसे कहा था कि ईमानदारी के रास्ते पर चलते हुए लोग तुझे रोकेंगे, डराएंगे, तेरे रास्ते में आ के खड़े हो जाएंगे लेकिन तू घबराना मत । लोगों से डरकर रास्ते में बैठ मत जाना बल्कि दुगने जोश के साथ आगे बढ़ना । याद रखना; झूठ चाहे जितना सर उठाए, जीत हमेशा सच की होती है ।'

७. एक आरंभिक दृश्य में रीत के संदर्भ में उसके वरिष्ठ अधिकारी का अपने एक सहकर्मी से कहना - 'जो लोग अंधेरे का अंजाम जानते हैं, वो रोशनी ढूंढ ही लेते हैं । इसके लिए उन्हें चाहे कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े ।'

आज भी मेरे हताश और दुखी मन को सहारा देने वाली इस फ़िल्म का सार इसी एक संवाद में अंतर्निहित है । 

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Tuesday, October 20, 2020

तंत्र-मंत्र : हक़ीक़त या फ़साना

हमारे देश में न तांत्रिकों की कमी है और न ही तंत्र-मंत्र पर लिखी गई किताबों की । कहा जाता है कि तंत्र-साधना करके सिद्ध (तांत्रिक) बन जाने वाले लोग अपनी प्रत्येक इच्छा पूर्ण कर लेते हैं, हर मनचाहा पा लेते हैं । लेकिन जो कुछ भी कथित तंत्र-साधना में की जाने वाली क्रियाओं के विषय में संबंधित पुस्तकों में लिखा गया है, उसे पढ़कर मुझ जैसे साधारण मानव का हृदय कम्पित हो उठता है । ये औघड़ क्रियाएं ऐसी हैं जिन्हें संपादित करना तो छोड़िए, उनकी कल्पना तक करना ही किसी दुर्बल मन वाले व्यक्ति के वश की बात नहीं (यद्यपि कतिपय सात्विक क्रियाओं का उल्लेख भी किसी-किसी पुस्तक में मिलता है) । इसीलिए अघोरी बनना किसी जिगरवाले के ही बस की बात है, कोई पत्थर का कलेजा रखने वाला ही इस दुनिया में घुस सकता है और रह सकता है । अब उसे कुछ (मनचाहा या अनचाहा) मिल पाता है या नहीं, यह दीगर बात है । 

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ने एक हिंदी उपन्यास इसी विषय को कथानक बनाकर लिखा था । इस उपन्यास का नाम है - 'जिगर का टुकड़ा' । 'जिगर का टुकड़ा' उस व्यक्ति को कहा जाता है जो आपको अत्यंत प्रिय हो । इसका सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है - माता के लिए उसकी संतान । यदि ऐसी संतान इकलौती हो तो और भी । चाहे पुत्र हो या पुत्री, ऐसा बच्चा अपनी माता के लिए उसके जिगर का टुकड़ा ही होता है । और अपने जिगर के टुकड़े की सलामती के लिए ममतामयी मां कुछ भी कर गुज़र सकती है । उसके जीवन एवं कल्याण के लिए वह सारे जग से लड़ सकती है । ऐसी ही एक मां की कहानी कहता है यह उपन्यास जिसकी कथावस्तु का एक अभिन्न भाग है तंत्र-मंत्र । 

इस उपन्यास में 'परकाया प्रवेश' का भी उल्लेख है । 'परकाया प्रवेश' अर्थात् किसी सिद्ध व्यक्ति का अपनी देह को छोड़कर किसी अन्य देह में प्रवेश कर जाना तथा अपनी इच्छानुसार पुनः मूल देह में लौट आना । यह किवदंती ही है, किसी ने देखी तो है नहीं । शर्माजी ने यह उपन्यास १९९३ में लिखा था और कम-से-कम उस ज़माने में तो वे ऐसी बातों पर यकीन नहीं ही करते थे । इसलिए उपन्यास के आरंभिक दृश्य में प्रदर्शित 'परकाया प्रवेश' के रहस्य को उन्होंने अंतिम पृष्ठों में सांसारिक कृत्यों पर आधारित बताते हुए ही खोला है और यही प्रतिपादित किया है कि वस्तुतः 'परकाया प्रवेश' जैसी कोई बात नहीं होती है । किंतु इसे उन्होंने पूरी तरह से ख़ारिज भी नहीं किया है और इसका वैज्ञानिक स्पष्टीकरण देते हुए यह कहा है कि हो सकता है कि कोई जीवन भर निष्ठापूर्वक साधना करके इस क्षमता को प्राप्त कर सकता हो ।

'जिगर का टुकड़ा' निस्संदेह शर्माजी के अंडर-रेटेड उपन्यासों में से एक है । न तो स्वयं उन्होंने इस अपने इस बेहतरीन उपन्यास का कोई प्रचार-प्रसार किया, न ही इसे वह चर्चा तथा सराहना मिल सकी जो उनके अनेक अन्य उपन्यासों को मिली । उनका पिछला उपन्यास 'वर्दी वाला गुण्डा' (मुख्यतः भरपूर प्रचार के कारण) व्यावसायिक रूप से अत्यंत सफल रहा था जबकि अगला उपन्यास 'लल्लू' उस पर 'सबसे बड़ा खिलाड़ी' नामक हिट फ़िल्म बन जाने के कारण बहुचर्चित हो गया । 'जिगर का टुकड़ा' इन दो अत्यंत लोकप्रिय, सफल एवं चर्चित उपन्यासों के बीच आया था, संभवतः इसलिए भी इसकी विशेष चर्चा नहीं हुई । लेकिन यदि एक पाठक एवं शर्माजी के प्रशंसक के रूप में मुझसे पूछा जाए तो मैं इसे उनके सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिनूंगा । एक ज़बरदस्त सस्पेंस-थ्रिलर है यह जिसमें न रहस्य की कमी है और न ही रोमांच की । साथ ही यह विश्वसनीयता की कसौटी पर भी खरा उतरता है क्योंकि इसमें ऐसी कोई बात नहीं है जो असामान्य लगे । नितांत तर्कपूर्ण ढंग से लिखा गया है यह उपन्यास । 

उपन्यास के केंद्र में है अनमोल नाम का एक पंद्रह वर्षीय बालक जो आँचल नामक एक धनाढ्य विधवा का इकलौता पुत्र है (अर्थात् उसके जिगर का टुकड़ा है) जिसकी हत्या का षड्यंत्र रचते हैं उसके चाचा बलराज तथा उनके संपूर्ण भारतवर्ष में फैले हुए विशाल व्यवसाय का मुख्य प्रबंधक जागेश्वर । यह षड्यंत्र रचा जाता है तंत्र-मंत्र की सहायता से जो करता है एक तांत्रिक - कपालतंत्र । कपालतंत्र ने ही तंत्र-मंत्र करके इस व्यवसाय के स्वामी, आँचल के पति तथा अनमोल के पिता मोहक की हत्या करवाई थी जिसके लिए उसे जागेश्वर से धन एवं एक वैभवशाली आवास प्राप्त हुआ था । कपालतंत्र का दावा है कि वह केवल तंत्र-मंत्र ही नहीं जानता वरन परकाया-प्रवेश भी जानता है तथा वह इसका प्रदर्शन (डिमॉन्स्ट्रेशन) भी करके दिखाता है । बलराज तथा जागेश्वर के यह कार्य तंत्र-मंत्र द्वारा करवाने का उद्देश्य यह है कि जिस प्रकार मोहक की मृत्यु एक दुर्घटना समझी गई थी, उसी प्रकार अनमोल की मृत्यु भी स्वाभाविक समझी जाए तथा हत्या जैसी किसी बात का संदेह न तो पुलिस को हो और न ही आँचल सहित अन्य लोगों को । 

लेकिन बलराज को लगता है कि सारे काम कपालतंत्र से ही करवाने से वह आने वाले समय में उन लोगों पर हावी हो जाएगा तथा संभव है कि वह उन्हें (अर्थात् बलराज एवं जागेश्वर को) ब्लैकमेल भी करने लगे । अतः वह षड्यंत्र को तीन भागों में बांटता है - प्रथम भाग में अनमोल को तंत्र-मंत्र द्वारा बीमार करने का, द्वितीय भाग में बीच-बीच में उसके कुछ-कुछ ठीक हो जाने का एवं तृतीय भाग में उसके मर जाने का । वह प्रथम एवं तृतीय भाग को तो पूर्ण रूप से कपालतंत्र को ही सौंपता है किन्तु द्वितीय भाग में झूठे तांत्रिकों का अभिनय करने के लिए कुछ मामूली बदमाशों को पकड़ लाता है जो धन लेकर किसी के भी लिए कैसा भी और कोई भी (कानूनी-ग़ैरकानूनी) काम करने को तैयार रहते हैं । इन चार बदमाशों का सरगना है - मार्कण्डेय तथा बाकी तीन हैं - उसकी पत्नी मोनिका एवं उसके दो विश्वसनीय साथी गबरू एवं रूस्तम । मार्कण्डेय अपने भूतकाल में अभिनेता रह चुका है एवं बलराज उसकी इसी योग्यता का लाभ उठाकर उसे तांत्रिक का अभिनय करने के लिए उसके साथियों सहित उस कोठी में ले आता है जिसमें वह स्वयं, उसकी भाभी आँचल तथा उसका भतीजा अनमोल रहते हैं । ढोंगी तांत्रिक मार्कण्डेय व उसके साथियों का काम होता है (बलराज द्वारा कपालतंत्र से लेकर आई हुई) तांत्रिक वस्तुओं से अनमोल का उपचार करना जिससे वह अस्थायी रूप से स्वस्थ हो जाए तथा कुछ समय के अंतराल के उपरांत पुनः रोगी हो जाए । 

इस सारे झमेले में दो और पात्र उलझे हुए हैं । एक तो है दिल्ली से सरकार द्वारा आँचल के अनुरोध पर अनमोल की सुरक्षा हेतु भेजा गया ब्लैक कैट कमांडो - डगलस तथा दूसरा है एक अत्यन्त रहस्यमय पात्र - 'अजगर' जो स्वयं सामने आए बिना मार्कण्डेय और उसके साथियों से भूतकाल में अपराध करवाता रहा है । मार्कण्डेय और उसका दल बिना कारण जाने तथा कार्य की पृष्ठभूमि के विषय में बिना कोई प्रश्न किए 'अजगर' के आदेश पर उससे धन लेकर अपराध करते रहे थे । इस बार वे 'अजगर' को बिना बताए बलराज से सौदा करके अनमोल की हत्या के षड्यंत्र में सम्मिलित हो जाते हैं । लेकिन उन्हें दो करारे झटके लगते हैं - एक तो 'अजगर' को अपने आप ही सब कुछ पता लग जाता है कि वे किस फ़िराक़ में हैं और वह उन्हें चुपचाप वहाँ से कूच कर जाने के लिए कहता है, दूसरा अचानक कपालतंत्र भी उस कोठी में आ धमकता है और उसे यह देखकर बहुत बुरा लगता है कि उससे बिना पूछे ही बलराज और जागेश्वर मार्कण्डेय एंड कंपनी को वहाँ ले आए थे । अब अपनी-अपनी पोल खुलने से बचने के लिए इन सभी को आँचल के सामने नाटक करना पड़ता है जिसके तहत कपालतंत्र ख़ुद को मार्कण्डेय वग़ैरह का गुरू तथा वे सभी ख़ुद को उसके चेले बताने लगते हैं । इधर डगलस को कतई ऐतबार नहीं है कि तंत्र-मंत्र जैसी कोई चीज़ होती है और वह इन सभी लोगों को शुरू से ही नक़ली तांत्रिक और ठग समझता है । लेकिन उसके कहने पर भी अपनी इकलौती बीमार औलाद के इलाज के लिए फ़िक्रमंद आँचल उन्हें कोठी से नहीं निकालती क्योंकि अनमोल किसी भी डॉक्टर के इलाज से ठीक नहीं हो पा रहा था ।

अब चूंकि यह उपन्यास सस्पेंस-थ्रिलर है, इसलिए लंबी-चौड़ी पृष्ठभूमि बन जाने के उपरांत घात-प्रतिघात का खेल आरंभ होता है तथा हत्याएं होने लगती हैं । इससे पहले कि हत्याओं के पीछे का रहस्य जानने के लिए प्रयासरत डगलस सत्य तक पहुँचे, वेद प्रकाश शर्मा पाठकों के समक्ष रहस्योद्घाटन कर देते हैं कि वास्तविकता क्या है तथा इस रहस्योद्घाटन से पूर्व सभी दुष्ट एवं अपराधी मारे जाते हैं । 

'जिगर का टुकड़ा' एक अत्यंत चुस्त उपन्यास है जिसमें कहीं कोई फालतू बात नहीं लिखी गई है तथा प्रत्येक शब्द मुख्य कथानक से जुड़ा हुआ है । वेद प्रकाश शर्मा अपने आपको 'झटका स्पेशलिस्ट' कहलवाना पसंद करते थे तथा प्रायः अपने उपन्यासों के प्रथम पृष्ठ पर लिखवाते थे - 'इस उपन्यास के हर पृष्ठ पर वेद प्रकाश शर्मा ने शब्दरूपी करेंटयुक्त तार बिछा रखे हैं' (पढ़ने वालों को झटका देने के लिए) । साथ ही अंतिम पृष्ठ पर यह भी लिखवाते थे - 'सावधान ! इस पृष्ठ (या अंतिम पृष्ठ) पर लिखा कथानक से संबंधित एक शब्द भी 'पहले' न पढ़ें अन्यथा आप अपने द्वारा खर्च किए गए पैसे का भरपूर आनंद उठाने से वंचित रह जाएंगे' । ऐसी बातें उन्होंने 'जिगर का टुकड़ा' के भी प्रथम एवं अंतिम पृष्ठों पर लिखी हैं । और ये बातें उनके स्वर्णिम दिनों में सत्य भी होती थीं । 'जिगर का टुकड़ा' भी पाठकों को बीच-बीच में झटके देता है । इस उपन्यास की एक ख़ूबी यह भी है कि शर्माजी ने रहस्य को परत-दर-परत खोला है और पाठकों को सोचने का मौका भी दिया है कि वे ख़ुद सच्चाई का अंदाज़ा लगाएं । अगर कोई जीनियस पाठक लगा भी ले तो भी वह सच्चाई के एक हिस्से का ही अंदाज़ा लगा सकता है, पूरी सच्चाई का नहीं । उपन्यास में अपनी आवाज़ को किसी और की आवाज़ बना लेने की बात को छोड़कर (यह बात एकदम ग़लत है भी नहीं क्योंकि मिमिक्री की कला तो सर्वविदित है, अलबत्ता उसके लिए कुछ प्राकृतिक योग्यता तथा बहुत अधिक अभ्यास की आवश्यकता होती है) कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर विश्वास न किया जा सके ।'

अब तंत्र-मंत्र की बातें हक़ीक़त हैं या फ़साना, ख़ुदा ही जाने । इस वैज्ञानिक युग में इन बातों पर भरोसा करना कठिन ही है (वैसे वेद प्रकाश शर्मा ने उपन्यास में कपालतंत्र द्वारा डगलस को इन बातों का विशेषतः परकाया-प्रवेश का, विस्तृत एवं तार्किक स्पष्टीकरण दिलवाया है जो एक दृष्टि में तो पूर्णतः वैज्ञानिक ही लगता है) । मैं तो इस उपन्यास को वेद प्रकाश शर्मा की लेखनी से निकला एक अत्यंत मनोरंजक एवं आदि से अंत तक पाठकों को बांधे रखने वाला उपन्यास मानता हूँ जो मनोरंजन के अभ्यर्थियों को निराश नहीं करेगा एवं पढ़ चुकने के उपरांत उन्हें संतुष्टि की अनुभूति प्रदान करेगा । 

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Sunday, October 18, 2020

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

अपने अमर महाकाव्य 'कुरुक्षेत्र' के सप्तम सर्ग में कविवर रामधारी सिंह दिनकर शरशय्या पर अपनी निर्वाण-वेला की प्रतीक्षा में लेटे पितामह भीष्म से युधिष्ठिर को कहलवाते हैं - 

यह अरण्य झुरमुट जो काटे, अपनी राह बना ले
क्रीतदास यह नहीं किसी का, जो चाहे अपना ले 
जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर, जो उससे डरते हैं 
वह उनका जो चरण रोप, निर्भय होकर लड़ते हैं 

आज भारत में साधनहीन तथा निस्सहाय लोगों के लिए जो चीज़ें दुर्लभ हो गई हैं उनमें से सबसे महत्वपूर्ण है पीड़ित होने पर न्याय का मिलना । जिसके पास साधन न हों, समर्थन न हो, जो अपने लिए न्याय ख़रीद न सके (क्योंकि दुर्भाग्यवश हमारे देश में न्याय बिकाऊ ही है); वह यदि न्याय को छीनकर पाने में भी सक्षम न हो तो उसके लिए अपने पीड़ित होने के यथार्थ को सदा के लिए भूल जाने तथा न्याय की आकांक्षा को अपने भीतर से सदा के लिए निकाल देने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं रहता है । 

परन्तु इस स्थिति में दिनकर जी की ऊपर उद्धृत पंक्तियां ऐसे उत्पीड़ित एवं दबे-कुचले व्यक्तियों को न्याय के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती हैं, उसके लिए लड़ने की ऊर्जा तथा साहस देती हैं । फ़िल्मकार महेश भट्ट की तनूजा चंद्रा द्वारा निर्देशित अक्षय कुमार, प्रीति ज़िंटा एवं आशुतोष राणा की प्रमुख भूमिकाओं वाली फ़िल्म 'संघर्ष' (१९९९) का एक कालजयी संवाद है - 'जो अंधेरे का अंजाम जानते हैं, वे रोशनी ढूंढ ही लेते हैं चाहे उन्हें इसके लिए कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े' । तो जब पीड़ित का साथ समाज न दे, व्यवस्था न दे तो अपने चारों ओर फैले अंधेरे में रोशनी पाने के लिए उसे स्वयं ही संघर्ष करना होगा क्योंकि अंधेरे का अंजाम उसी को मालूम है । जिस पर बीतेगी, वही तो जानेगा ।

और पक्षपाती मानसिकता की बेड़ियों में जकड़े भारतीय समाज में बीतती तो रहती ही है उन पर जो दुर्बल हैं, विवश हैं, आसान शिकार (soft target) हैं । व्यवस्था प्रायः झूठों और आततायियों की ओर रहती है, अतः सत्य एवं न्याय के हिस्से पराजय ही आती है । अन्यायी के लिए अन्याय करना इसीलिए सरल होता है क्योंकि साधनहीन तथा एकाकी उत्पीड़ित के लिए न्याय पाना अत्यधिक कठिन होता है । अन्यायी इसी विश्वास के साथ अन्याय करता है कि जो अन्याय उसने चुटकियों में कर दिया है, उसके निराकरण तथा न्याय की प्राप्ति में उत्पीड़ित का संपूर्ण जीवन व्यतीत हो जाएगा (और तब भी उसे न्याय मिल ही जाए, यह आवश्यक नहीं) । इसीलिए भारत में अन्याय एवं अत्याचार होते ही रहते हैं, उनका सिलसिला थमता ही नहीं । एक हादसे की डरा देने वाली याद धुंधली भी नहीं पड़ी होती कि दूसरा, वैसा ही दहला देने वाला हादसा हो जाता है । घटनाएं वही रहती हैं, बस किरदार बदल जाते हैं ।

निर्भया मामले को अपने वैधानिक समापन तक पहुँचने में सात साल से अधिक लगे । इस बीच न जाने कितनी ही और निर्भयाएं जघन्य अत्याचार का शिकार बन गईं । बदायूँ कांड की पीड़ित दलित बच्चियों को न्याय केवल 'आर्टिकल पंद्रह' नामक फ़िल्म में ही मिला, वास्तविकता में कभी नहीं मिला । अब हाथरस की पीड़िता के मामले में तो व्यवस्था के ठेकेदारों ने अत्याचार की ही नहीं, असामाजिकता एवं संवेदनहीनता की भी सभी सीमाएं पार कर दी हैं लेकिन ... । लेकिन उस मार डाली गई युवती को अथवा उसके परिजनों को कभी न्याय मिल पाएगा, कहना कठिन ही है । मैंने अपने लेख दर्द सबका एक-सा में लिखा है कि सहानुभूति जताने और न्याय की माँग करने के लिए भी हमारा दृष्टिकोण 'मुँह देखकर तिलक करने' वाला बन गया है । वस्तुतः संसार का सबसे बड़ा और सबसे पुराना पीड़ित वर्ग हैं महिलाएं जिन पर बिना किसी जाति, धर्म व स्थान के अंतर के चिरकाल से अत्याचार एवं अन्याय होते आ रहे हैं । लेकिन आज के भारत की तुच्छ राजनीति में डूबी मानसिकता ने इन पीड़िताओं को भी  अनेक (उप)वर्गों में विभक्त कर दिया है । किसी वर्ग की उत्पीड़ित स्त्री के लिए किसी का मन पसीजता है तो किसी दूसरे वर्ग की उत्पीड़ित स्त्री के लिए किसी दूसरे का । हमारी संवेदनशीलता (यदि विद्यमान है तो) शुद्ध नहीं रही है, पक्षपाती हो गई है । हम दर्दमंदों के दर्द का सही मायनों में अहसास तभी कर पाते हैं जब वैसे ही दर्द से हमें भी गुज़रना पड़े । वरना ऐसे दिल हिला देने वाले मामलों में भी हमारी बातें हिंदुस्तानी राजनीतिबाज़ों की तरह दिखावटी और फ़रमायशी ही होती हैं । विगत एक दशक से तो ऐसा आभास हो रहा है मानो हम वास्तविक जीवन से दूर होकर केवल ट्विटर वाले बन गए हैं जो ट्वीट कर-कर के ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं अथवा फ़ेसबुक तथा वॉट्सअप पर अपना (अधकचरा) ज्ञान बघार कर स्वयं को सर्वज्ञ घोषित कर देते हैं ।

लेकिन जिस पर गुज़री है, वह क्या करे ? अगर जान ही चली गई है तो वह ख़ुद तो कुछ कर नहीं सकता (या सकती) । जिसे उसके लिए इंसाफ़ चाहिए, उसे ताक़तवर सिस्टम से लड़ना होगा - उस ताक़तवर सिस्टम से जो ज़ुल्म करने वालों का सगा है, दौलत के हाथों बिकता है, ताक़त के आगे झुकता है; जिसे सही-ग़लत से कोई मतलब नहीं । समाज के दुर्बल भाग से संबद्ध किसी भी पीड़ित के लिए न्याय पाना (अथवा ऐसे किसी पीड़ित को न्याय दिलाना) असंभव की सीमा तक कठिन हो सकता है । पर फिर यही तो आततायियों की शक्ति है कि पीड़ित सदा न्याय का भिक्षुक बना रहे किन्तु उसे न्याय न मिले । ऐसे में मर-मर कर बरसों जीते रहने से तो बेहतर है कि इंसाफ़ के लिए लड़ते हुए ही मरा जाए । महात्मा गांधी ने भी तो जब किसी भी तरह मांगने से अंग्रेज़ों से आज़ादी नहीं मिली थी तो 'करो या मरो' का नारा दिया था । कायरों का जीवन जीने से तो मर जाना अच्छा है ।

वैधानिक व्यवस्था स्वयं को तटस्थ कहती है । बहुत-से लोग भी स्वयं को तटस्थ कहकर अपने आप को ही धोखा देते हैं - हम तो किसी की भी तरफ़ नहीं हैं । लेकिन सच वह है जो मेरे प्रिय हिंदी लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक अपने कई उपन्यासों में कह चुके हैं - तटस्थता आततायी का साथ देती है, पीड़ित का नहीं । तथाकथित तटस्थ व्यवस्था का अनकहा सिद्धांत यही तो है कि जो समर्थ है, वही सही है । गोस्वामी तुलसीदास तो सैकड़ों वर्ष पूर्व ही लिख गए हैं - समरथ को नहीं दोष गुसाईं । ज़ालिम तो समर्थ और ताक़तवर होगा ही, तभी तो वह कमज़ोर पर ज़ुल्म कर पाएगा । अगर आप शक्तिशाली आततायी एवं दुर्बल उत्पीड़ित में से किसी की ओर नहीं हैं तो अप्रत्यक्षतः आप आततायी की ही ओर हैं क्योंकि आपकी इस कथित तटस्थता का लाभ उसी को प्राप्त होगा ।

लेकिन ऐसे स्वयंभू तटस्थ लोगों को जो कि 'हमें क्या' का दृष्टिकोण पालकर निश्चिंत रहते हैं, यह विस्मरण नहीं करना चाहिए कि समय से अधिक बलवान कोई नहीं । उनका भी वक़्त हमेशा वैसा ही नहीं रहने वाला है जैसा वे आज देख रहे हैं । मैंने दिनकर जी की पंक्तियों के साथ यह लेख आरंभ किया था । उन्हीं की एक कालजयी कविता की इन पंक्तियों के साथ मैं इस लेख का समापन करता हूँ :

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

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