Sunday, September 27, 2020

चापलूसी ! लच्छेदार बातें ! छवि-निर्माण ! क्या ये ही हैं सफलता के वास्तविक सूत्र ?

सफलता वह वस्तु है जिसके पीछे आज के युग में लगभग प्रत्येक कार्यशील व्यक्ति भाग रहा है । सफलता वह सब कुछ दिला सकती है जिसकी अभिलाषा है जबकि असफलता का अंतिम परिणान है - वंचन, कुंठा एवं लोगों की अस्वीकृति । सफलता सब को चाहिए, असफलता किसी को नहीं । तो क्या हैं आज के भारत में सफलता के वास्तविक सूत्र (जिनके विषय में सभी सफल व्यक्ति जानते हैं किन्तु मुख से कहते नहीं) ?

इस विषय पर विस्तृत विमर्श से पूर्व मैं विगत मास 'हिंदुस्तान टाइम्स' समाचार-पत्र में पढ़े गए एक लेख का उल्लेख समीचीन समझता हूँ - 'Meritocracy is a myth. And that is not bad' जिसे 'बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप' के भारत स्थित प्रभाग के अध्यक्ष जनमेजय शर्मा ने लिखा है ।  'बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप' संसार भर में प्रसिद्ध एक वैश्विक प्रबंधन सलाहकार संस्था है जिसके परामर्श को संसार की अनेक बड़ी एवं प्रतिष्ठित कंपनियां तथा संस्थाएं बहुमूल्य मानती हैं । लेकिन ऐसी सम्मानित संस्था जिससे कार्य-प्रदर्शन संबंधी उच्च मानदंडों के ही उत्थान एवं प्रसार की ही सभी को अपेक्षा होती है, की भारतीय इकाई के प्रमुख शर्मा जी ने जो कुछ इस लेख में कहा है, उसमें तो भारत में चिरकाल से प्रचलित मानसिकता की ही अनुगूंज मुझे सुनाई दी ।  

छब्बीस जनवरी उन्नीस सौ पचास को एक आधुनिक गणतंत्र बनने से पूर्व भारत चिरकाल तक (अनेक टुकड़ों में बंटकर) राजतंत्र में रहा था । अलग-अलग राज्य अथवा रजवाड़े हुआ करते थे जिनके पृथक्-पृथक् राजा होते थे । कई स्थानों पर राजाओं के अधीनस्थ सामंतों या सूबेदारों का शासन चलता था । जागीरें एवं ज़मींदारियां भी होती थीं जिनके ऊपर संबंधित जागीरदार एवं ज़मींदार शासन करते थे । १८५८ में भारत सरकार अधिनियम द्वारा भारत के एक बड़े भू-भाग को (जो पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार में था) बरतानवी सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया जिसके उपरांत भी निजी रियासतें अथवा रजवाड़े (साथ ही जागीरें एवं ज़मींदारियां भी) स्वतंत्र बने रहे तथा बीसवीं शताब्दी में स्वाधीनता के उपरांत भारत के एकीकरण तक उन्होंने जैसे-तैसे समय निकाला । किंतु १८५७ तक स्थिति यही थी कि विभिन्न राज्य अथवा रियासतें अपने शासकों की साम्राज्य-विस्तार की लालसा के चलते परस्पर युद्धरत रहते थे । जनकल्याण की भावना प्राचीन ग्राम-स्वराज्य के समय रही हो तो रही हो, ईस्वी संवत के आरंभ होने से पूर्व ही तलवार के बल पर राज्य-विस्तार करने वाले (अथवा उपलब्ध सुख-भोगों का आनंद उठाने वाले) शासक ही भारत-भू पर अधिकांशतः दृष्टिगोचर होने लगे थे । ऐसा कोई समय विरला ही हो सकता था जब आर्यावर्त तथा कालांतर में हिंदुस्तान कहलाने वाली इस धरा पर कहीं-न-कहीं युद्ध न हो रहा हो । राजाओं की वीरता उनका भूषण मानी जाने लगी थी । विदेशी आक्रांताओं के आगमन तथा मुग़लों एवं अंग्रेज़ों जैसे विदेशी आक्रांताओं द्वारा भारत में ही स्थापित होकर शासन करने लगने पर भी स्थिति यही रही । जनसामान्य की मानसिकता धीरे-धीरे यही हो गई कि कोउ नृप होइ, हमें का हानि । 

ऐसे में विविध राज्यों, रजवाड़ों, रियासतों, सूबों आदि में एक चाटुकारिता की संस्कृति विकसित हुई । चारण-भाट पनपे जो शासकों की वीरता तथा अन्य (वास्तविक अथवा काल्पनिक) गुणों का यशोगान करके अपनी आजीविका चलाने लगे । यद्यपि अनेक शासकों ने जनहित के कार्य भी किए तथा विभिन्न कला-प्रेमी शासकों की अपनी-अपनी रुचि के अनुरूप अनेक लोक-कलाएं तथा सांस्कृतिक धरोहरें भी अस्तित्व में आईं एवं भलीभांति विकसित हुईं जिनसे जनसामान्य एवं समाज का अप्रत्यक्ष रूप से भला ही हुआ, तथापि धीरे-धीरे लोग राजाओं के चरण-वंदन के अभ्यस्त हो गए । ऐसा भी समय था जब राजा ईश्वर के अवतार के रूप में देखे जाते थे एवं तदनुरूप ही पूजनीय थे । व्यक्ति की योग्यता अपने आप में महत्वपूर्ण नहीं रही, राजा की मान्यता पर निर्भर हो गई । अर्थात् योग्य वही जिसे राजा योग्य मान ले । चाटुकारिता स्वयमेव ही एक कला बन गई । 

और यह कला आज तक चली आ रही है । इसके कलावंत इसे बिना किसी के सिखाए अपने आप ही साधते हैं । सच पूछिए तो शताब्दियों की दासता के परिणामस्वरूप यह कला कला ही न रहकर अधिकांश भारतीयों के स्वभाव का, संस्कारों का तथा व्यक्तित्व का एक अंग बन चुकी है । संयोगवश ऐसा हुआ कि मैंने जब (१९९४ में) प्रथम बार भारतीय सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा दी तो अनिवार्य हिंदी विषय के प्रश्न-पत्र में मुझे निबंध लेखन के लिए उपलब्ध विषयों में एक विषय मिला - 'चापलूसी की कला' । परीक्षा भवन में बैठे हुए मैंने अपनी कल्पनाओं को विस्तार दिया और इसी विषय को चुनकर एक ललित निबंध लिख डाला । परंतु आज मैं अनुभव करता हूँ कि काग़ज़ पर निबंध लिखना एक बात है जबकि वास्तविक जीवन में इस कला (!) को साधना पूर्णतः दूसरी । जो इसे साध सकता है (और साधना चाहता है), वह स्वतः ही इसमें पारंगत हो जाता है । जो न साध सके अथवा जिसका स्वाभिमान उसके समक्ष इस संदर्भ में कोई दुविधा खड़ी करे, वह जीवन भर इस मामले में अनाड़ी ही रह जाता है । भारतीय नाभिकीय ऊर्जा निगम में मेरे भूतपूर्व वरिष्ठ अधिकारी श्री एस. अलगुवेल ने मुझे एक बार (संभवतः सन दो हज़ार पाँच में) एक शुभचिंतक की भांति एकांत में अंग्रेज़ी भाषा में समझाया था - 'माथुर, तुम्हारी प्रगति के पथ में बाधा यह है कि तुम काम तो ठीक करते हो लेकिन तुममें दूसरे व्यक्तियों को प्रसन्न रखने की कला का अभाव है' । मैं संकोचवश उनसे पूछ नहीं सका -'आदरणीय श्रीमान, यदि इस कला को सिखाने की प्रशिक्षण कक्षाएं कहीं चलती हों तो मैं ज्वॉइन कर लूं' । ख़ैर ... 

आज भारतीय संगठनों, संस्थानों एवं व्यवस्थाओं में विशेषतः राजकीय क्षेत्र में चापलूसों का बोलबाला लगभग सभी स्थानों पर देखने को मिलता है । जो योग्य एवं कर्मठ हैं, वे भी अपनी योग्यता एवं परिश्रम का फल तभी पा सकते हैं जब वे काम के साथ-साथ ठीक से चापलूसी भी करें एवं उनके हितों का ध्यान रखने वाला कोई उच्च पद पर आसीन व्यक्ति हो (राजस्थानी भाषा में ऐसे व्यक्ति को धणीधोरी कहते हैं) जिसके वे निकटस्थ (अर्थात् चमचे) हों । अन्यथा सारी योग्यता उपेक्षित हो सकती है, सत्यनिष्ठापूर्वक किया गया संपूर्ण परिश्रम निष्फल हो सकता है । 

संगठन अथवा संस्था में पदोन्नति एवं अन्य परिलाभों की प्राप्ति के निमित्त व्यक्तिपरक निष्ठा एवं चापलूसी के साथ-साथ लच्छेदार बातें करने की कला भी बहुत उपयोगी होती है । प्रायः चापलूसी की कला में निष्णात लोग इस कला को भी साध लेते हैं । आज बातें बनाना श्रेष्ठ कार्य एवं प्रदर्शन (परफ़ॉरमेंस) की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गया है । जो बातों का जादूगर है, वह उन्हीं बातों का सौदागर बनकर बहुत कुछ पा लेता है जबकि चुपचाप अपना कर्तव्य-निर्वहन करने वाला देता ही रहता है, पाने वालों की पंक्ति में वह पीछे ही रह जाता है । आज कम-से-कम भारत में तो मीठी-मीठी बातें बनाना और सुनने वालों को लुभाकर अपना काम बना लेना ही विपणन (मार्केटिंग) की परिभाषा हो गया है । 

मेरे भूतपूर्व उच्चाधिकारी श्री अलगुवेल ने मुझे छवि-निर्माण का महत्व भी समझाया था एवं कहा था कि व्यक्ति की छवि उसके द्वारा किए गए कार्य से भी अधिक सार्थकता रखती है । आप सप्रयास अपनी एक बहुत अच्छी छवि गढ़ लें तो वह अन्य लोगों के लिए आपकी वास्तविकता से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है । आज का समाज ऊपरी आवरण ही देखता है, नीचे की वास्तविकता नहीं । अच्छा काम करो या न करो, बस अच्छी छवि बनाकर रखो तो  लगभग वह सब कुछ मिल सकता है जो आपको दूसरों से या तंत्र से चाहिए । छवि आपकी अपनी किसी त्रुटि से अथवा आपके किसी विरोधी की कुटिल चालों से कलंकित हो गई तो गए काम से । क्यों ? क्योंकि आपके विषय में लोगों का निर्णय आपकी छवि ही निर्धारित करती है, आपकी वास्तविकता अथवा आपके द्वारा किए गए वास्तविक कार्य नहीं ।

व्यक्ति के स्तर पर ये गुण तथा ये कार्यकलाप सफलता दिला सकते हैं जो कि इस भौतिक संसार में रहने वाले लगभग सभी (व्यावहारिक) लोगों का अभीष्ट है किंतु इनसे संबंधित संगठन, संस्थान अथवा व्यवस्था को हानि ही पहुँचती है । इसीलिए सफल संगठनों के स्वामी अथवा सर्वोच्च अधिकारी योग्य व्यक्तियों की योग्यता को एवं तदोपरांत उनकी कर्तव्यनिष्ठा को ही सर्वप्रथम परखते हैं । योग्यता को वरीयता देने पर ही योग्यता-तंत्र अथवा मेरिटोक्रेसी का पथ-प्रशस्त होता है जो कि किसी भी वृहत् व्यावसायिक संगठन अथवा संस्था अथवा सरकारी कार्यालय या मंत्रालय या निकाय की सफलता की कुंजी हो सकता है । अपने इस लेख के आरंभ में मैंने 'बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप'(बीसीजी) के भारत स्थित उच्चाधिकारी शर्मा जी के जिस लेख का उल्लेख किया है उसका सारांश यह है कि मेरिटोक्रेसी केवल एक मिथक (कपोल-कल्पना) है तथा इसका न होना कोई आपत्तिजनक बात नहीं । इस लेख में शर्मा जी ने संगठनों में उन्नति करने के लिए उच्चाधिकारियों के अनुकूल रहने एवं उनसे अच्छे संबंध रखने को निज-उन्नति के लिए आवश्यक बताया है एवं यह विचार व्यक्त किया है कि अधिक योग्य व्यक्ति उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के साथ सामंजस्य न बैठा सकें तो उनका अपने से कम योग्य व्यक्तियों से पिछड़ जाना स्वाभाविक है । उनके विचार में ऐसे (योग्य) व्यक्तियों को वह संगठन छोड़कर किसी ऐसे स्थान पर जाना चाहिए जहाँ वे सही समय पर एवं सही स्थान पर सही व्यक्ति के रूप में स्थापित हो सकें । घुमा-फिराकर परिष्कृत भाषा में कही गई ये बातें वस्तुतः हमारे देश में सर्वव्यापी चापलूसी की वकालत ही है ।

लेकिन वास्तविक उन्नति के लिए आवश्यक तो मेरिटोक्रेसी ही होती है चाहे उसे कोई कपोल-कल्पना ही क्यों न कहे । यदि विशुद्ध मेरिटोक्रेसी की स्थापना व्यावहारिक रूप से अत्यंत कठिन भी है तो भी उसके लिए निरंतर प्रयास किया जाना चाहिए क्योंकि आदर्श व्यवस्था तो वही है चाहे यथार्थ रूप में दिखाई न देती हो । मेरिटोक्रेसी को नकारना मीडियोक्रेसी (अर्थात् ऐसा तंत्र जिसमें कम योग्य अथवा अति-साधारण लोगों को प्राथमिकता दी जाए एवं पुरस्कृत किया जाए) की ओर ले जाता है क्योंकि यदि कोई कम योग्य व्यक्ति केवल प्रभावशाली एवं उच्च-पदस्थ लोगों के साथ अपने मधुर निजी संबंधों द्वारा आगे बढ़कर उच्च पद पर पहुँचेगा तो वह अपने जैसे लोगों को ही तो आगे बढ़ाएगा जिसके परिणामस्वरूप योग्यता की उपेक्षा आगे भी चलती ही रहेगी । आज मेरिटोक्रेसी की उपेक्षा के कारण ही हमारे भारतवर्ष में सर्वत्र मीडियोक्रेसी दिखाई देती है - विशेषतः सरकार में तथा सरकारी एवं अर्द्ध-सरकारी संस्थानों व संगठनों में । निजी क्षेत्र में भी जहाँ यह पांव पसार देती है, वहाँ संबंधित संस्था अथवा संगठन को सफल से असफल होने में अधिक समय नहीं लगता । और यह ढीला-ढाला अकुशल तंत्र बनता है चापलूसों, लच्छेदार बातें करने वालों एवं निजी छवि को येन-केन-प्रकारेण धवल बनाने (चाहे सत्य कुछ और हो) वाले अयोग्य एवं अकर्मठ (यानी निकम्मे) लोगों से । 

यही त्रासदी है हमारे देश की । यही कारण है अनेक समस्याओं के अकारण ही जन्म ले लेने का एवं अनेक समस्याओं के सुलझने के स्थान पर अनवरत उलझते जाने का जो अंततोगत्वा जनसामान्य को ही दारूण दुख देती हैं (समर्थों का कुछ नहीं बिगड़ता) । मुझे शर्मा जी का लेख पढ़कर दुख इस बात से हुआ कि अब उनके जैसे पेशेवर प्रबंधन विशेषज्ञ भी आगे बढ़ने के लिए निजी संबंधों (जिनका आधार चापलूसी अथवा स्वार्थाधारित आदान-प्रदान ही होता है) को व्यक्ति की योग्यता से अधिक महत्वपूर्ण बता रहे हैं । नई पीढ़ी तो वैसे भी 'सफलता किसी भी मूल्य पर' को अपने कार्यशील जीवन (करियर) का मूलमंत्र बना ही चुकी है । सभी को सफलता ही तो चाहिए चाहे वह कैसे भी मिले । और जब सफलता के सूत्र चापलूसी, लच्छेदार बातें एवं छवि-निर्माण ही हों तो मन लगाकर ईमानदारी से काम क्यों किया जाए ? कुर्सी चाहे राजनीति की हो अथवा किसी संगठन या कार्यालय के उच्च एवं अधिकार-संपन्न पदाधिकारी की, इन्हीं सूत्रों पर अमल करने से प्राप्त हो रही है । अपवादों को छोड़कर सभी प्रैक्टिकल हो गए हैं । आदर्शों की परवाह किसे है ? चरित्र, स्वाभिमान एवं सद्गुणों को पुस्तकीय बातें माना जाने लगा है (वैसे अब तो ये बातें पुस्तकों में भी नहीं दिखाई देतीं) । 

क्या होगा इस देश का ? 

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Tuesday, September 15, 2020

मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे

सन २०१३ में प्रदर्शित 'काय पो छे' फ़िल्म देखने के उपरांत मैं सुशांत सिंह राजपूत का प्रशंसक बन गया था । तीन मित्रों की कथा पर बनी उस फ़िल्म में सबसे अधिक प्रभावशाली भूमिका भी उन्हें ही मिली थी । फ़िल्म के अंत में तो वे दर्शकों के मन को तल तक छू गए थे । २०१५ में 'डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी' देखने के बाद मेरा यह यकीन पुख़्ता हो गया कि वे बेजोड़ कलाकार थे । इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में बड़े परदे पर अपने करियर का आग़ाज़ करने वाले अदाकारों में उनकी पहचान एकदम जुदा थी - जवां दिलों पर राज करने वाली (छोटे परदे पर तो वे अपनी पहचान पहले ही बना चुके थे) । आने वाले सालों में उन्होंने और भी तरक्की की, तारीफ़ें पाईं, अपनी मक़बूलियत में इज़ाफ़ा किया । शोबिज़ की दुनिया में कामयाबी को अपने कदम चूमने पर मजबूर करने वाले सुशांत के चाहने वालों की तादाद दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही थी कि ... कि अचानक वे मौत को गले लगा बैठे । क्यों ? 

आख़िर क्यों केवल चौंतीस साल की उम्र में वे ज़िन्दगी से बेज़ार हो उठे ? ऐसा क्या हो गया ? यह सवाल केवल सुशांत के लिए ही नहीं, हर उस शख़्स के लिए पूछा जा सकता है जिसने ज़ाहिरा तौर पर कामयाब और ख़ुशी से लबरेज़ नज़र आने के बावजूद आख़िरकार मौत की गोद में ही सुकून महसूस किया । पूरी तरह सही जवाब किसी के लिए नहीं मिल सकता - न महान फ़िल्मकार गुरु दत्त के लिए, न नौजवानी से भरपूर जिया ख़ान के लिए, न किसी और ऐसे युवक या युवती के लिए । गुज़िश्ता कुछ वक़्त में ख़ुदकुशी करने वाले सलेब्रिटीज़ की मानो कतार-सी लग गई है । पर जिस किसी ने भी अपनी जान दी, उसने ऐसा क्यों किया, यह तो सही-सही वही जानता था (या जानती थी) । दूसरे लोग तो सिर्फ़ अंदाज़े ही लगा सकते हैं । हक़ीक़त पर से मुक़म्मल तौर पर परदा उठाना शायद किसी के बस की बात नहीं ।

अचानक ख़ुदकुशी कर लेने वालों के अलावा अपनी मरज़ी से मरने का हक़ भी लोगों द्वारा (कानून से) मांगा गया है जिसे इच्छा-मृत्यु (यूथेनेसिया) का अधिकार भी कहा जाता है । इसके अतिरिक्त मृत्युदान अथवा मर्सी किलिंग की बात भी समय-समय पर उठाई गई है जिसमें यह तर्क दिया जाता है कि यदि संबंधित व्यक्ति सम्मान के साथ जी न सके तो उसे अपने जीवन का अंत स्वयं कर लेने दिया जाए अथवा चिकित्सक उसके लिए यह कार्य कर दें । इस विषय पर बॉलीवुड में दो फ़िल्में बनीं हैं (मैने दोनों ही की समीक्षा की है) : १. शायद (१९७९), २. गुज़ारिश (२०१०) ।  'शायद' में मृत्युदान के विषय पर एक चिकित्सक के दृष्टिकोण से विमर्श किया गया था जबकि 'गुज़ारिश' में संबंधित व्यक्ति के देश के विधि-विधान से इच्छा-मृत्यु का अधिकार मांगने की कथा थी । मरने की ख़्वाहिश कोई अच्छी बात तो नहीं जिसे काबिल-ए-एहतराम समझा जाए लेकिन अगर किसी इंसान की ज़िन्दगी उसके लिए मौत से भी बदतर हो जाए, तब ? ज़िंदगी तो वही है जो जीने लायक हो । इंसान इज़्ज़त और ग़ैरत के साथ जी न सके तो उसे मौत में पनाह कैसे न नज़र आए ? 

किसी इंसान को मार डालना ग़लत है तो किसी को ज़बरदस्ती जीने पर मजबूर करना भी ग़लत ही है (अरुणा शानबाग का जीवन एक ऐसा ही उदाहरण रहा है जिन्हें उनकी देखभाल करने वालों के दबाव में बयालीस लंबे वर्षों तक ऐसी अवस्था में रखा गया जो केवल तकनीकी रूप से ही जीवित अवस्था कही जा सकती है, व्यावहारिक दृष्टि से एक मृतक के समान ही होती है) । लेकिन फिर इस बात को भी निगाह में रखना चाहिए कि ऐसा हर मामला अपने आप में अलग (यूनिक़) होता है । इंसानों के दुख-दर्द से जुड़े मामलों को चावल के दानों की तरह एक जैसा मानकर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि ज़िंदगी सभी को अलग-अलग ट्रीटमेंट देती है । अपना ग़म सभी को सबसे बड़ा लगता है जबकि दूसरों के ग़म हलके लगते हैं पर यह सच्चाई तो नहीं । ग़मों से न हारने वाले और उनसे जूझने का जज़्बा अपने अंदर रखने वाले का फ़लसफ़ा तो यह होता है - दुनिया में कितना ग़म है, मेरा ग़म कितना कम है । एक सच यह भी है कि मरने की बात करना जितना आसान है, उतना वास्तव में मर जाना नहीं । ज़्यादातर इंसान मौत से डरते हैं । ऐसे में मरने वाला / वाली किस असाधारण मानसिक अवस्था से गुज़र रहा था /  रही थी, इसे बूझने के लिए भी एक संवेदनशील हृदय चाहिए ।

और ऐसा संवेदनशील हृदय निश्चय ही उनके पास नहीं होता जो किसी की मौत को एक तमाशा बना देते हैं और बलि का ऐसा बकरा ढूंढ़ते हैं जिसके मत्थे उस मौत की ज़िम्मेदारी का मटका फोड़ा जा सके । विगत कुछ वर्षों से 'मीडिया ट्रायल' नामक एक शब्द-युग्म बहुप्रचलित हो गया है जिसका अभिप्राय है किसी आरोपी (अथवा संभावित आरोपी) के कथित अपराध का निर्णय न्यायालय में होने की प्रतीक्षा किए बिना संचार-माध्यमों विशेषतः टी.वी. चैनलों द्वारा अपने स्तर पर आधे-अधूरे तथ्यों एवं असंबद्ध लोगों द्वारा किए गए सतही विमर्श के आधार पर कर दिया जाना । ऐसे मीडिया-ट्रायल का परिणाम यह होता है कि आरोपी चाहे निर्दोष ही क्यों न हो (तथा कालांतर में न्यायालय द्वारा दोषमुक्त कर दिया जाए), जनसाधारण में उसकी छवि मलिन हो जाती है जिसके दुष्परिणाम उसे जीवन-भर भोगने पड़ते हैं । मीडिया-ट्रायल करने वाले अपने तुच्छ व्यावसायिक-स्वार्थ के निमित्त किसी मासूम का करियर एवं पारिवारिक जीवन नष्ट कर देते हैं और उनके इस दुष्कृत्य पर उंगली तक नहीं उठती ।

अब सुशांत के मामले में भी वैसा ही एक तमाशा शुरु हो गया है (जो दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है) जैसा कि निर्भया कांड के मामले में हुआ था । जिस तरह से निर्भया के मामले में उसके माता-पिता की भूमिका ऐसी लगती थी कि वे अपनी पुत्री की त्रासदी से दुखी कम और मीडिया पर सलेब्रिटी जैसी हैसियत पाकर प्रफुल्लित अधिक थे, वैसा ही सुशांत के परिजनों के मामले में भी लग रहा है । एक प्रतिभाशाली युवा संसार से चला गया, एक बिन मां का बेटा और परिवार का इकलौता पुत्र सबको छोड़कर चला गया, एक संभावनाओं से भरपूर कलाकार असमय ही दुनिया को अलविदा कह बैठा; यह गहन दुख की बात है, मीडिया पर तमाशा करने की नहीं । जिस रिया चक्रवर्ती के पीछे सुशांत के घरवाले (और राजनीतिक सत्ता से जुड़े अपने निहित स्वार्थों के वशीभूत सरकारी अभिकरण) हाथ धोकर पड़े हुए हैं; क्या वह किसी की बेटी नहीं, किसी की बहन नहीं, भारतभूमि पर जन्मी एक प्रतिभाशाली युवा कन्या नहीं ? क्या उसके कोई मानवीय अधिकार नहीं, क्या उसे बिना न्यायिक प्रक्रिया के केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर खलनायिका बना दिया जाना संवेदनहीनता की अति नहीं ? जब अधिकांश लोग सुशांत की मृत्यु से लगी आग पर केवल अपनी-अपनी रोटियां सेकने की जुगत में लगे हों तो इन गंभीर प्रश्नों की सुध कौन ले ? 

सुशांत की असाधारण लोकप्रियता के कारण उनका मामला हाई-प्रोफ़ाइल बन गया है अन्यथा विगत एक वर्ष में आत्मघात करने वाले कलाकारों की संख्या कम-से-कम दो अंकों में जाती है । लेकिन उनमें से किसी के दुखद आत्मघात पर कोई चर्चा नहीं हो रही है क्योंकि ऐसी चर्चा से किसी का स्वार्थ सिद्ध नहीं होता है । चार वर्ष पूर्व (नौ अगस्त सन दो हज़ार सोलह को) अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री कलिखो पुल ने आत्महत्या कर ली थी लेकिन एक मुख्यमंत्री स्तर के व्यक्ति द्वारा किए गए इस दुखद कृत्य की जाँच तो छोड़िए, ठीक से चर्चा तक नहीं हुई । उनके आत्महत्या-पत्र (सुइसाइड नोट) को सार्वजनिक तक नहीं किया गया जबकि यह कहा जाता है कि उन्होंने व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार से दुखित होकर ऐसा कदम उठाया था एवं अपने आत्महत्या-पत्र में बहुत-से चौंकाने वाले रहस्योद्घाटन किए थे । उनके आत्मघात को बड़ी सहूलियत से भुला दिया गया । यह केवल मीडिया, राजनीतिक दलों तथा संबंधित लोगों की ग़ैर-ज़िम्मेदारी का ही नमूना नहीं बल्कि हम भारतीयों की विवेकशून्यता एवं पाखंड का भी ज्वलंत उदाहरण है ।

आत्मघाती प्रवृत्ति अवसाद (डिप्रैशन) का ही उत्पाद है । छोटे-मोटे एवं अस्थायी अवसाद से तो अधिकतर लोगों का अपने जीवन में कभी-न-कभी साक्षात् हो ही जाता है किन्तु जब अवसाद का घनत्व एवं अवधि दोनों ही बढ़ने लगें तो वह निस्संदेह चिंता का विषय होता है । अवसादग्रस्त पुरुष / महिला यदि दृढ़ व्यक्तित्व का / की है तो वह अपना उपचार स्वयं ही कर सकता है / सकती है । गम्भीर अवस्था होती है अवसाद का ब्रेकिंग प्वॉइंट पर पहुँच जाना जिसके उपरांत संबंधित व्यक्ति मानसिक रूप से टूट जाता है । मैं स्वयं जीवन में कई बार गंभीर अवसाद से गुज़र चुका हूँ । प्रत्येक बार मैंने अपने आपको स्वयं ही संभाला तथा जीवन को नये सिरे से आरंभ किया । इसी विषय पर मैंने कई वर्ष पूर्व एक लेख लिखा था ‌- कहीं आप ब्रेकिंग प्वॉइंट के निकट तो नहीं जिसमें  मैंने समस्या तथा उसके समाधान, दोनों ही पर अपने विचार अभिव्यक्त्त किए थे । 

पेशे से चार्टर्ड लेखाकार होने के बावजूद मैंने जब सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी की थी तो अपने मुख्य विषयों के रूप में मनोविज्ञान एवं समाजशास्त्र को चुना था । आज आत्मघात के बारे में बात करते समय मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि अवसाद के ऐसी उन्नत अवस्था तक पहुँच जाने एवं व्यक्ति के पूरी तरह बिखर जाने को समझने के लिए मनोविज्ञान तथा समाजशास्त्र, दोनों ही को जानना आवश्यक है । टूटन और घुटन की मानसिक अवस्था व्यक्ति की निजी होती है जिसके मूल में यह तथ्य महत्वपूर्ण होता है कि उसके व्यक्तित्व का गठन किस प्रकार हुआ है तथा वह कितने दबाव सह सकता है लेकिन इस गठन के पीछे जो उसके बालपन एवं लड़कपन में हुए लालन-पालन एवं समाजीकरण की प्रक्रिया होती है, उसमें तो परिवार एवं समाज की ही भूमिका अहम रही होती है । स्वामी विवेकानंद अपने देशवासियों के लिए चाहते थे कि उनके स्नायु फ़ौलाद के हों अर्थात् वे मानसिक रूप से बहुत मज़बूत हों । लेकिन ऐसे नागरिकों के निर्माण के लिए आवश्यक है कि परिवार तथा समाज भी अपनी वांछित भूमिका सही ढंग से निभाएं ।

अवसाद का प्रमुख कारण होता है अपने भीतर एकाकीपन की अनुभूति - एक उदासी भरा अकेलेपन का अहसास कि मेरा कोई नहीं है । स्वर्गीय किशोर कुमार जी का अमर गीत इस स्थिति पर पूरी तरह से लागू होता है - कोई होता जिसको अपना हम अपना कह लेते यारों, पास नहीं तो दूर ही होता लेकिन कोई मेरा अपना' । यहाँ पास नहीं तो दूर ही होता' लफ़्ज़ बहुत गहरे मायने रखते हैंं । केवल किसी के साथ रहने या लोगों के इर्द-गिर्द मौजूद रहने से ही अकेलापन दूर हो जाए, यह ज़रूरी नहींं । अगर कोई समझने वाला न हो तो इंसान भीड़ में भी अकेला ही होता है । और ऐसा कोई जो आपको समझ ले, केवल किस्मत से मिलता है । भाग्यशाली है वो जिसे समझने वाला कोई हो, फिर (जैसा कि गीत में कहा गया है) चाहे वह भौतिक रूप से दूर ही क्यों न हो ।

लेकिन जब इंसान की ज़िंदगी में ऐसा कोई अपना, ऐसा कोई समझने वाला (या वाली) न हो और हालात (जो कभी-कभी बयान भी नहीं किए जा सकते) उसे बुरी तरह से तोड़ रहे हों तो वह क्या करे ? वही करे जो मैंने कई बार किया है (और अब भी करता हूँ) - ख़ुद ही ख़ुद को संभाले । एक ग़ज़ल की पंक्तियां हैं - दर्द पैग़ाम लिए चलता है, जैसे कोई चिराग़ जलता है, कौन किसको यहाँ संभालेगा, आदमी ख़ुद-ब-ख़ुद संभलता है । इसलिए जैसे भी हो,  इंसान ख़ुद को संभाले । आत्मघात कोई समाधान नहीं । किसी के मरने से दुनिया को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला । मैं तो ख़ुदकुशी की चाह रखने वाले हर परेशान-हाल शख़्स को कुँअर बेचैन जी के ये अशआर सुनाना चाहता हूँ : 
                                              माना कि मुश्किलों का तेरी हल नहीं कुँअर
                                              फिर भी तू ग़म की आग में यूं जल नहीं कुँअर
                                              कोई-न-कोई रोज़ ही करता है ख़ुदकुशी
                                              क्या बात है कि झील में हलचल नहीं कुँअर

अवसादग्रस्त व्यक्ति अगर कहे कि जीने की चाहत नहीं तो मैं उत्तर में यही कहूंगा कि मर के भी राहत नहीं । इंसान अपने ग़म से ज़्यादा उन लोगों के ग़म की परवाह करता है जिनसे उसे प्यार है, लगाव है (चाहे उन्हें न हो) । आज के भ्रष्ट भारत की सच्चाई यही है कि आत्महत्या करने वाला जिन्हें अपने पीछे छोड़ जाता है, उन्हें कई बार जीते-जी मरना पड़ता है (अगर वे ऊंची पहुँच वाले या अति-सामर्थ्यवान न हों) । उनकी ज़िन्दगी को मौत से भी बदतर बना देने में न तो सरकारी अमलदारी कोई कसर उठा रखती है, न ही मीडिया (चाहे आत्महत्या करने वाला अपने सुइसाइड नोट में यह लिखकर ही क्यों न जाए कि उसकी मृत्यु के लिए कोई अन्य उत्तरदायी नहीं) । आदमख़ोर मीडिया को तो रोज़ लाशें चाहिए - मुरदों की नहीं, ज़िन्दों की । और न्याय की बात करना ही व्यर्थ है । किसी अपवादस्वरूप उदाहरण को छोड़ दिया जाए तो स्वतंत्र भारत में दशकों से यही सिद्ध हो रहा है कि यहाँ  न्याय समर्थों की दासी है । ऐसे में डिप्रैशन का (या की) शिकार और उसका चहेता (या चहेती) अगर आम लोग हैं तो अपने बाद जीने पर मजबूर लोगों के हक़ में बेहतर है कि ऐसा इंसान मरने की जगह जिये और अपने डिप्रैशन से लड़े । वरना मरने के बाद भी चैन या राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है । काश सुशांत मरते वक़्त यह सोच पाते कि उनके जाने के बाद रिया और उनके परिजनों पर मीडिया और सरकारी महकमात के हाथों क्या बीतेगी !

अपनी बात मैं अज़ीम शायर ज़ौक़ साहब के इस शेर के साथ ख़त्म करता हूँ :

                                             अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे
                                               मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे ?
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Saturday, September 5, 2020

सुर बिन तान नहीं, गुरु बिन ज्ञान नहीं

आज शिक्षक दिवस है - भारत में शिक्षकों के नाम समर्पित एक दिन । भारतीय परंपरा में  न केवल गुरु को माता-पिता के समकक्ष माना गया है वरन उसे देवों से कम नहीं समझा गया है । बृहदारण्यक उपनिषद में श्लोक है :

                                              गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
                                              गुरुः साक्षात्‌ परंब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

प्राचीन भारत में विद्यमान बड़े पवित्र गुरु-शिष्य संबंधों के विषय में हमें उपलब्ध ग्रंथों एवं प्रचलित व बहुश्रुत कथाओं के माध्यम से जानने को मिलता है । यह वह युग था जब शिष्य अपने घर-परिवार से दूर गुरुकुल में गुरु के साथ ही रहते हुए गुरु तथा गुरुपत्नी की सेवा करते हुए शिक्षा एवं संस्कार दोनों ही प्राप्त करता था । गुरु का उद्देश्य केवल औपचारिक शिक्षा देना ही नहीं, आदर्श नागरिकों के रूप में आदर्श समाज की नींव रखना भी होता था । न गुरु धन-लोभी होता था, न शिष्य मात्र नौकरी का आकांक्षी । 

अब न वे गुरु रहे, न वे शिष्य और न वह युग । ज़माना बदल गया है । अब गुरु का स्थान वेतनभोगी अथवा ट्यूशन (अथवा कोचिंग कक्षाओं) से कमाने वाले अध्यापक ले चुके हैं  एवं शिष्य नौकरी के लिए आवश्यक अर्हता पाने के लिए जो ज्ञान चाहिए, उसे अध्यापक को (अथवा संबंधित संस्थान को) शुल्क देकर प्राप्त करते हैं । संस्कार व चरित्र पुस्तकीय बातें बनकर रह गए हैं जिनकी आवश्यकता किसी को नहीं है - न पढ़ने वालों को, न पढ़ाने वालों को, न शिष्यों के परिजनों को, न समाज को, न सरकार को ।

तिस पर भी अच्छे तथा निष्ठावान शिक्षकों को अपने विद्यार्थियों का आदर-मान प्राप्त होता ही है । मैं श्री सुरेन्द्र कुमार मिश्र को सदैव स्मरण रखता हूँ जिन्होंने मुझे अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान दिया तथा इस प्रतिस्पर्द्धी संसार के योग्य बनाया । मैं पंडित नारदानंद जी को भी सदा अपनी स्मृतियों में रखता हूँ जिन्होंने मुझे संगीत के संसार से सदा के लिए संयुक्त कर दिया । आज ये महान व्यक्ति दिवंगत हो चुके हैं लेकिन मेरे तथा मेरे जैसे अनेक शिष्यों के हृदय में वे सदैव ज्योति बनकर जलते रहेंगे, उन्हें प्रकाशित करते रहेंगे । मेरी धर्मपत्नी सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने से पूर्व सतरह वर्षों से अधिक समय तक (ग्रामीण क्षेत्र में) शिक्षिका रहीं तथा अपने निष्ठापूर्ण अध्यापन का फल उन्हें अनेक बालक-बालिकाओं तथा उनके अभिभावकों से जीवन भर के सम्मान  के रूप में मिला है ।

हिंदी फ़िल्मों ने गुरु-शिष्य संबंध की महत्ता को भलीभांति पहचाना तथा इस विषय पर बहुत-सी फ़िल्में बॉलीवुड में बनाई गईं विशेषतः स्वातंत्र्योत्तर सिनेमा में । मैं जागृति (१९५४), परिचय (१९७२), पायल की झंकार (१९८०) तथा तारे ज़मीन पर (२००७) को महान फ़िल्मों की श्रेणी में रखता हूँ । इनमें से 'परिचय' एक खंडित परिवार के बालकों को बिना शारीरिक दंड के अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले अल्पकालिक शिक्षक की प्रेरक गाथा है जो दर्शक को एक अच्छी अनुभूति देकर समाप्त होती है । श्वेत-श्याम फ़िल्म 'जागृति' तथा इक्कीसवीं सदी की फ़िल्म 'तारे ज़मीन पर' ऐसी मार्मिक फ़िल्में रही हैं जिन्होंने मुझे अश्रु बहाने पर विवश कर दिया । 

पायल की झंकार (१९८०) सबसे अलग पहचान रखती है क्योंकि यह वास्तव में ही हमारे देश की महान गुरु-शिष्य परंपरा को आधुनिक युग में प्रस्तुत करती है । इसमें आदर्शवादी नृत्य-गुरु भी हैं तो आदर्शवादी, सेवाभावी, संवेदनशील तथा नृत्य-कला के प्रति समर्पित शिष्या भी । शिष्या जो एक नन्ही बालिका ही है, वयोवृद्ध गुरु के घर में उनके परिवार की एक सदस्या ही बनकर रहती है तथा उनसे नृत्य कला का ज्ञान प्राप्त करती है । मुझे यह फ़िल्म इतनी पसंद आई कि मैंने इसकी समीक्षा हिंदी तथा अंग्रेज़ी, दोनों ही भाषाओं में लिखी । 

गुरु-शिष्य संबंधों के विविध आयाम - नर्तकी (१९६३), बूंद जो बन गई मोती (१९६७), आँसू बन गए फूल (१९६९), अंजान राहें (१९४), इम्तिहान (१९४), बुलंदी (१९), हिप हिप हुर्रे (१९), सर (१९३), सुर (२००२), से सलाम इंडिया (२००७), गुड बॉय बैड बॉय (२००७), आरक्षण (२०१) आदि हिंदी फ़िल्मों में देखने को मिले । इनमें से कुछ फ़िल्में औसत गुणवत्ता की रहीं तो कुछ अपनी विषय-वस्तु के साथ ठीक से न्याय नहीं कर पाईं । फिर भी एक तवायफ़ का जीवन संवारने वाले शिक्षक की कथा - 'नर्तकी', स्वर्गीय वी. शांताराम द्वारा प्रस्तुत एक आदर्शवादी शिक्षक की कथा - 'बूंद जो बन गई मोती', भटके विद्यार्थी को मार्गदर्शन देकर स्वयं ही पथभ्रष्ट हो जाने वाले शिक्षक की कथा - 'आँसू बन गए फूल' तथा अनुशासनहीन विद्यार्थियों को अनुशासित होकर जीतना सिखाने वाले खेल-शिक्षक की कथा - 'हिप हिप हुर्रे' निश्चय ही अच्छी फ़िल्में मानी जा सकती हैं । अपेक्षाकृत नवीन फ़िल्म (२०८ में प्रदर्शित)  'हिचकी' भी गुरु-शिष्य संबंधों पर अपने समग्र रूप में एक अच्छी फ़िल्म कही जा सकती है ।

'अंजान राहें' युवा होते विद्यार्थियों की अनकही समस्या जैसे एक अछूते विषय पर बनाई गई फ़िल्म थी जिसे उस ज़माने में हटकर माना जा सकता था लेकिन अच्छे विषय के बावजूद वह फ़िल्म एक बेहतर फ़िल्म बनते-बनते रह गई । 'हिप हिप हुर्रे' जैसी अच्छी फ़िल्म बनाकर अपना निर्देशकीय करियर आरंभ करने वाले प्रकाश झा 'आरक्षण' बनाते समय अपनी ही राजनीतिक उलझन के मकड़जाल में फँसकर फ़िल्म का कबाड़ा कर बैठे । 'सुर' का विषय अलग हटकर था जिसमें शिक्षक (या गुरु कह लें) कोई आदर्शवादी व्यक्ति न होकर इक्कीसवीं सदी का दुनियादार आदमी था जबकि शिष्या गुरु से अधिक प्रतिभाशाली होने के साथ-साथ आदर्शवादी एवं गुरु पर श्रद्धा रखने वाली थी; पर निर्देशिका तनूजा चंद्रा संभवतः स्वयं ही इस जटिल विषय को ठीक से समझ नहीं सकीं और दर्शकों के समक्ष उन्होंने एक अधकचरी फ़िल्म परोस दी ।


'इम्तिहान' स्वर्गीय विनोद खन्ना अभिनीत एक ऐसी फ़िल्म है जो फ़ॉर्मूलाबद्ध होकर भी प्रभावित करती है । इसका कालजयी गीत 'रुक जाना नहीं तू कहीं हार के' विगत कई दशकों से इस लेख के लेखक सहित असंख्य दर्शकों एवं श्रोताओं को प्रेरणा देता आ रहा है तथा आगे भी देता रहेगा ।

अंत में 'पायल की झंकार' की बात पुनः करना चाहूंगा । 'पायल की झंकार' की कहानी की भांति ही इसका संगीत भी अत्यंत मधुर एवं हृदय-विजयी है । इसका एक गीत है 'सुर बिन तान नहीं, गुरु बिन ज्ञान नहीं' । और सच ही है । परीक्षा देने के लिए औपचारिक शिक्षा तो किसी भी तरह पाई जा सकती है लेकिन ज्ञान तो गुरु से ही मिलता है । सौभाग्यशाली है वह शिष्य जिसे सच्चा गुरु मिले । और आज के युग में वह सच्चा गुरु भी सौभाग्यशाली ही कहा जाएगा जिसे सच्चा एवं समर्पित शिष्य मिल जाए ।

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Friday, September 4, 2020

मेरी लेखन-यात्रा का नया पड़ाव : किंडल तथा यूट्यूब पर पदार्पण

कल शिक्षक दिवस है तथा मैं इस अवसर पर पृथक् रूप से कुछ लिखने का प्रयास करूंगा क्योंकि प्रत्येक शिक्षक दिवस पर मुझे अपने अंग्रेज़ी शिक्षक स्वर्गीय श्री सुरेन्द्र कुमार मिश्र की याद आ जाती है जो यदि मुझे न मिले होते तो मैं भी उन असंख्य राजस्थानी छात्रों की भांति अंग्रेज़ी भाषा के ज्ञान में दुर्बल ही रह जाता जो राजकीय विद्यालयों में हिंदी माध्यम से शिक्षार्जन करते थे (एवं अब भी करते होंगे) । वे अपना उपनाम मिश्र ही लिखते थे लेकिन मेरे गृहनगर (सांभर झील, ज़िला जयपुर) में सब उन्हें आदरपूर्वक मिश्राजी कहते थे  यह मेरा परम सौभाग्य है कि मैं मिश्राजी का शिष्य बना जिसका परिणाम यह निकला कि न केवल मेरे अंग्रेज़ी भाषा के भावी ज्ञान एवं उपयोग की सुदृढ़ नींव रखी गई वरन मैंने १९८५ में  राजस्थान बोर्ड की उच्च माध्यमिक (हायर सैकंडरी) परीक्षा के वाणिज्य वर्ग में सर्वप्रथम स्थान भी प्राप्त किया एवं अंग्रेज़ी भाषा के प्रश्न-पत्र में पचास में से उनचास अंक प्राप्त करके सभी को चौंका दिया । 

मिश्राजी ने मुझे नौवीं तथा दसवीं कक्षाओं में अंग्रेज़ी विषय पढ़ाया । यह वही समय था जब न केवल मेरी अंग्रेज़ी की लिखावट में सुंदरता आई वरन मुझे अपने मन से कुछ-न-कुछ लिखना भी अच्छा लगने लगा । मेरी माता स्वर्गीया  श्रीमती शकुंतला माथुर ने हिंदी भाषा में प्रभाकर की उपाधि प्राप्त की थी । हिंदी भाषा तथा साहित्य में (तथा कुछ-कुछ उर्दू भाषा की ओर भी) मेरा रूझान उन्हीं के कारण बना । आज आयु का एक वृहत् भाग व्यतीत हो चुकने के उपरांत मुझे दिखाई देता है कि मैं इन दोनों ही भाषाओं से अनुरक्त हूँ । इसीलिए मैं दोनों ही में पढ़ता हूँ, दोनों ही में लिखता हूँ । मुझे उर्दू लिपि नहीं आती लेकिन उर्दू शायरी, साहित्य, ग़ज़लें, नज़्में और नग़मे मुझे बहुत भाते हैं । उन्हें या तो मैं सुनता हूँ या देवनागरी लिपि में उपलब्ध हों तो पढ़ता हूँ । 

अंग्रेज़ी तथा हिंदी, दोनों ही भाषाओं की औपचारिक शिक्षा तो मेरे लिए केवल बारहवीं कक्षा तक ही चली । मैंने स्नातक (बी. कॉम.) तक की शिक्षा हिंदी भाषा में प्राप्त की । तदोपरान्त चार्टर्ड लेखाकार की उपाधि (कलकत्ता से) अंग्रेज़ी भाषा में परीक्षाएं देकर प्राप्त की एवं जब १९९८ में भारतीय सिविल सेवा परीक्षा तथा २००० में राजस्थान प्रशासनिक सेवा के साक्षात्कार स्तर तक पहुंचा तो मेरा लिखित परीक्षा एवं साक्षात्कार, दोनों में ही माध्यम अंग्रेज़ी था । बहरहाल विभिन्न नौकरियों के साथ-साथ दोनों ही भाषाओं की पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते कभी-कभार कुछ लिखने का भी मन करता था तो यूं ही मन-बहलाव के लिए कुछ लिख लेता था । तब भी एवं अब भी, मेरा शुद्धता पर बल रहता है तथा मैं अपने लेखन में भाषाओं की मिलावट जहाँ तक संभव हो, नहीं ही करता । 

२००३ में मैंने अपना पहला हिंदी एकांकी 'दोस्ती' लिखा जिसका सौभाग्य है कि उसे कतिपय नाट्यमंडलों ने मंचित किया तथा उसका एक वीडियो स्वरूप आज यूट्यूब पर भी उपलब्ध है । आने वाले वर्षों में मैंने तीन हिंदी एकांकी और लिखे - २००८ में 'भूमि-पुत्र', २००९ में 'प्रेम और संस्कृति' तथा २००- में 'चिराग-ए-सहर' । २०० में हिन्दी फ़िल्मों तथा पुस्तकों की (कालांतर में अंग्रेज़ी तथा प्रांतीय फ़िल्मों एवं पुस्तकों की भी) समीक्षाएं अंग्रेज़ी भाषा में लिखकर इंटरनेट पर उपलब्ध माउथशट नामक एक प्लेटफ़ॉर्म पर डालनी आरंभ कीं । चूंकि वे तथा उनके साथ बीच-बीच में लिखे गए अंग्रेज़ी ब्लॉग पर्याप्त रूप से लोकप्रिय हुए तो यह लेखन बरसों तक चला । अब मेरे ये अंग्रेज़ी लेख वर्डप्रैस नामक वेबसाइट पर  भी उपलब्ध हैं ।

२० तथा २०२ में हैदराबाद 'बी' रेडियो पर हिंदी वार्ताएं देने का अवसर मिला जो 'प्रकाश किरण' नामक कार्यक्रम में प्रातःकाल (मेरे ही स्वर में) प्रसारित हुईं । कुल चार वार्ताएं मैंने इस निमित्त लिखीं - १. भावनाएं, २. संंवेदना, ३. मर्यादा, ४. संत-सेवा । अब मैंने अपना हिंदी का (प्रस्तुत) ब्लॉग भी आरंभ कर दिया तथा इन वार्ताओं को तो लेख के रूप में इस पर डाला ही, समय-समय पर अन्य हिन्दी लेख भी सिरजकर इस पर डालने आरंभ कर दिए । अंग्रेज़ी की तुलना में हिंदी में कम लिखा । इस बात का संबंध पढ़ने वालों की कम संख्या से नहीं है क्योंकि मेरा सिद्धांत तो सदा स्वांत: सुखाय के लिए अथवा आत्मसंतोष के लिए लिखना ही रहा है चाहे उसे कोई पढ़े अथवा नहीं ।

२०२ में अंग्रेज़ी तथा बांग्ला की सुपरिचित लेखिका, कवयित्री एवं समीक्षिका - गीताश्री चटर्जी की प्रेरणा से एक हिंदी उपन्यास लिखना आरंभ किया । मौलिक सृजन था, बहुत सोचना पड़ता था और लेखन की गाड़ी बार-बार अटक जाती थी । अतः डेढ़ साल के उपरान्त २०४ में जाकर मैं उसे पूरा कर पाया । उपन्यास का नाम है - 'क़त्ल की आदत' । 

अब लिख तो लिया पर छापे कौन ? छापने वाला आज तक न मिला । मेरी पुत्री की इच्छा है कि यह काग़ज़ पर छपे तथा इसे लोग किताब के रूप में पढ़ें । अब उसकी इच्छा मैं कब पूरी कर पाता हूँ, यह भविष्य ही बताएगा । बहरहाल भारत में स्व-प्रकाशन के प्रणेताओं में अग्रणी रहीं महिला उपन्यासकार - रसना अत्रेय जी की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से मैं सतत प्रयास करता रहा कि काग़ज़ पर नहीं तो ई-पुस्तक के रूप में ही प्रकाशित हो जाए । ई-पुस्तक के रूप में यह पहले पोथी डॉट कॉम नामक स्व-प्रकाशन वेबसाइट पर छपा जहाँ यह आज भी उपलब्ध है तथा कुछ समय के लिए डेलीहंट नामक वेबसाइट पर भी उपलब्ध रहा । दोनों ही स्थलों पर यह पीडीएफ़ रूप में डाला गया । लेकिन विलंब से ही सही, अब मैंने इसे किंडल पर भी प्रकाशित कर दिया है । मैं फ़ेसबुक से प्रायः दूर ही रहता हूँ लेकिन अपने इस उपन्यास के नाम से मैंने फ़ेसबुक पर भी एक पृष्ठ बना रखा है जिसका नाम वही है जो उपन्यास का नाम है ।

उपन्यास से संबंधित लिंक इस प्रकार हैं : 

https://www.facebook.com/pages/category/Book/%E0%A5%98%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%A4-585891931517016/

https://store.pothi.com/book/ebook-%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A5%81%E0%A4%B0-%E0%A5%98%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%A4

https://www.amazon.in/%E0%A5%98%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-ebook/dp/B0899QTWF1

मेरा पुत्र विगत कुछ समय से एक लोकप्रिय यूट्यूब चैनल चला रहा है । फ़िल्म समीक्षाएं करने में मेरी रुचि को देखकर उसने मेरे लिए भी एक यूट्यूब चैनल बना डाला है - Forgotten Bollywood Gems जिस पर मैंने हिंदी में बोलते हुए भूली-बिसरी हिंदी फ़िल्मों के विषय में अपने ज्ञान को साझा करना आरंभ किया है । इस पर डाला गया पहला वीडियो एक भूली-बिसरी श्वेत-श्याम हिंदी फ़िल्म - 'इंसाफ़ का मंदिर' (१९६९) से संबंधित है जिसका लिंक इस प्रकार है :

https://www.youtube.com/watch?v=Yt5Atd8BmmM

मैं कैमरे के समक्ष सहज नहीं हूँ, अत: देखने वालों को इस चैनल तथा मेरे प्रदर्शन, दोनों में ही सुधार की बहुत आवश्यकता प्रतीत होगी । मुझे तो हुई ही है । और सुधार की भावना तो कर्म करने वाले के मानस में सदा रहनी ही चाहिए । 

मैं नौकरी-पेशा हूँ, इसलिए रचनात्मकता के लिए समय कम ही मिलता है । तिस पर मैं तकनीकी रूप से अधिक सक्षम भी नहीं हूँ । इस यूट्यूब चैनल का श्रेय वस्तुतः मेरी संतानों (पुत्र-पुत्री) को ही जाता है जिनसे मैं इन दिनों दूर रहता हूँ क्योंकि मेरी नौकरी विशाखापट्टणम में है जबकि मेरा परिवार पुणे में रहता है ।

अपनी लेखन-यात्रा के इस पड़ाव पर मैं अपने सभी प्रशंसकों तथा आलोचकों का आभारी हूँ एवं आगे भी रहूंगा । शुक्रिया ! शुक्रिया ! शुक्रिया !

   

Tuesday, September 1, 2020

विद्या बालन और संजीव कुमार

एक कला-प्रेमी एवं स्वयंभू समीक्षक के रूप में मेरी दृष्टि में भारतीय रजतपट का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता यदि कोई रहा है तो वह है स्वर्गीय संजीव कुमार । यदि भारतीय सिनेमा अथवा इसे थोड़ा संकुचित करते हुए कहें तो हिंदी सिनेमा के एक सदी से अधिक के इतिहास में संपूर्ण अभिनेता कहलाने की अर्हता रखने वाले एकमात्र कलाकार मेरे दृष्टिकोण से तो संजीव कुमार ही रहे हैं । अत्यन्त आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी संजीव अपने आप में अभिनय कला का जीता-जागता विद्यालय थे तथा यह भारतीय सिनेमा एवं सिने-प्रेमियों का दुर्भाग्य ही है कि वे अल्पायु में ही दिवंगत हो गए । वे प्रत्येक भूमिका के लिए उपयुक्त थे चाहे वह नायिका के साथ रूमानी ढंग से नाचने-वाले पारंपरिक नायक की भूमिका हो अथवा परंपरा से हटकर की जाने वाली कोई जटिल भूमिकाचाहे युवक की भूमिका हो अथवा प्रौढ़ व्यक्ति अथवा वृद्ध की भूमिकाचाहे सकारात्मक भूमिका हो अथवा नकारात्मक भूमिकाचाहे गंभीर भूमिका हो अथवा हास्य भूमिकाचाहे प्रमुख भूमिका हो अथवा सहायक भूमिका । उनकी एक फ़िल्म का नाम था - 'अपने रंग हज़ार। और उनके रंग हज़ार ही थे । वे हर रंग में रंग जाते थेहर सांचे में ढल जाते थे  । चाहे फ़िल्म ख़राब हो या उनका किरदार ख़राब ढंग से लिखा गया होवे कभी ख़राब अभिनय नहीं करते थे । उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार दो बार जीता तथा 'नया दिन नई रात' (१९७४) में अकेले ही नौ भूमिकाएं निभाकर विश्व रिकॉर्ड बना डाला  उनकी अभिनय कला का आकाश अनंत था । उन जैसा अदाकार न उनसे पहले कोई आया था और न ही १९८५ में उनके दुनिया से चले जाने के बाद कोई आया 

हाल ही में मैंने पिछले साल प्रदर्शित हुई फ़िल्म 'मिशन मंगलको डिज़्नी हॉटस्टार पर देखा । फ़िल्म अच्छी है जिसमें दर्शकों के लिए मनोरंजन एवं प्रेरणा दोनों ही तत्व हैं । फ़िल्म की जान हैं विद्या बालन । नायक के रूप में अक्षय कुमार ने भी अच्छा अभिनय किया है लेकिन फ़िल्म देखते समय तथा उसके उपरांत उस पर सोच-विचार करते समय भी मुझे लगा कि कोई और अभिनेता इस भूमिका में होना चाहिए था । कौन ? किसे होना चाहिए था विद्या बालन के साथ अग्रणी भूमिका में ? कौन 'मिशन मंगलमें उनके साथ सर्वोपयुक्त लगता ? मेरे अंतर्मन ने उत्तर तो दिया लेकिन वह उत्तर व्यावहारिक नहीं है क्योंकि विद्या बालन के साथ अभिनय करते हुए जिस अभिनेता का चित्र मेरे मानस-पटल पर उभरावह तो कभी का इस संसार से जा चुका है 

मैं जब भी हिंदी सिनेमा के सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में स्वर्गीय संजीव कुमार के विषय में सोचता थामेरे मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उभरता था कि हिंदी सिनेमा की सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री किसे कहा जा सकता है । कई अभिनेत्रियों के नाम मेरे समक्ष आते थे पर जिस प्रकार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में संजीव कुमार पर मेरा मन स्थिर हो जाता थासर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में किसी के भी नाम पर मेरा मन स्थिर नहीं हो पाता था । हिंदी चित्रपट की सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री किसे माना जाएयह प्रश्न मेरे मन में अनुत्तरित ही रहता था । लेकिन 'मिशन मंगलदेखते-देखते अचानक मुझे इस सवाल का जवाब मिल गया । विद्या बालन ! निश्चय ही विद्या बालन जो संजीव कुमार ही की भांति प्रत्येक भूमिका के लिए उपयुक्त हैंउन्हीं की तरह सुंदर हैंउन्हीं की तरह असाधारण प्रतिभा की स्वामिनी हैं तथा उन्हीं की तरह हर रंग में रंग जाने और हर सांचे में ढल जाने की कूव्वत रखती हैं 

संजीव कुमार मूल रूप से गुजराती थे (उनका वास्तविक नाम हरिभाई जरीवाला था) लेकिन उनकी फ़िल्में देखते समय कहीं से भी पता नहीं लगता कि वे वास्तव में भारत के किस प्रदेश के थे क्योंकि वे अपनी भूमिका में पूरी तरह से उतर जाते थेजो चरित्र निभाते थेस्वयं वही हो जाते थे । ठीक यही बात विद्या बालन के साथ भी है । वे मूल रूप से एक तमिल परिवार की हैं । उनके जन्म के परिवार में घर के भीतर तमिल एवं मलयालम में वार्तालाप किया जाता है । पर उनकी किसी भी फ़िल्म को देखते समय उनके दक्षिण भारतीय होने अथवा मुम्बई में पली-बढ़ी व पढ़ी-लिखी होने का कोई आभास नहीं मिलता है क्योंकि वे भी जो चरित्र निभाती हैंवही बन जाती हैं  'परिणीता' (२००५) एवं 'कहानी(२०१२) जैसी फ़िल्मों में बंगाली युवती की भूमिका में उन्हें देखकर कहीं से भी महसूस नहीं होता कि वे बंगालन नहीं हैं 

नाटकों से अपनी अभिनय-यात्रा आरंभ करने वाले संजीव कुमार को अपने फ़िल्मी करियर में प्रारंभिक वर्षों में महत्वहीन भूमिकाएं भी करनी पड़ीं । बहुत-सी फ़िल्मों में सहायक भूमिकाएं कीं और नायक बने तो 'बी ग्रेडकहलाने वाली फ़िल्मों में । एक 'श्रेणी के नायक के रूप में अपनी पहचान बनाने में उन्हें एक दशक से अधिक समय लग गया । एकता कपूर के टी.वी. धारावाहिक 'हम पाँचमें पहली बार परदे पर आने वाली विद्या बालन इस संदर्भ में संजीव कुमार की तुलना में सौभाग्यशालिनी रहीं कि पूर्णकालिक रूप से अभिनय के क्षेत्र में पदार्पण करने पर उन्हें प्रारंभ में ही प्रमुख भूमिकाएं करने के अवसर मिले तथा अपनी पहली ही हिंदी फ़िल्म 'परिणीतासे उन्होंने ढेरों प्रशंसाएं बटोरीं । लेकिन वास्तविक अर्थों में अपनी पहचान बनाने में उन्हें भी समय लगा । वस्तुतः 'कहानीकी सफलता के उपरांत ही उनकी गणना चोटी की नायिकाओं में होनी आरंभ हुई । जिस तरह संजीव कुमार किसी भी भूमिका को निभाने की चुनौती से कभी नहीं कतराए तथा उन्होंने 'खिलौना' (१९७०में एक विक्षिप्त व्यक्ति से लेकर 'कोशिश' (१९७२में एक गूंगे-बहरे व्यक्ति तक की भूमिकाएं निर्भय होकर स्वीकार कींविद्या बालन ने भी 'द डर्टी पिक्चर' (२०११) में सिल्क स्मिता की कठिन भूमिका भयमुक्त होकर निभाई जिसके लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता 

संजीव कुमार के मुख पर तब भी परिपक्वता थी जब वे अत्यंत युवा थे । यही तथ्य विद्या बालन पर भी लागू है जिन्होंने अपने नायिका बनने से पूर्व किए गए कई विज्ञापनों में एक भरी-पूरी भारतीय गृहिणी को यथार्थता के साथ परदे पर तब प्रस्तुत किया था जब वे बीस वर्ष की भी नहीं हुई थीं । संजीव के तन पर आयु के साथ-साथ (तथा संभवतः उनकी बीमारी एवं जीवन-शैली के कारण भी) मोटापा छाने लगा था लेकिन मोटे होने पर भी उनके व्यक्तित्व के पुरुषोचित आकर्षण में कोई कमी नहीं आई थी । यही बात विद्या के साथ भी है । उन्होंने 'द डर्टी पिक्चरके लिए भूमिका की मांग के अनुरूप मोटापे को अपनाया था लेकिन अब विवाहोपरांत गृहस्थ जीवन में होने तथा आयु के चालीस पार हो जाने के कारण वे स्वाभाविक रूप से भी मोटी हो गई हैं पर उनका स्त्रियोचित सौंदर्य यथावत् ही है 

यदि 'मिशन मंगलमें अक्षय कुमार की जगह संजीव कुमार होते तो विद्या बालन के साथ वे इस फ़िल्म को असाधारण ऊंचाइयों तक ले जाते । मगर अफ़सोस ! ये दोनों असाधारण कलाकार समकालीन नहीं रहे  संजीव कुमार अपने करियर के शीर्ष पर पहुँच चुके थे जब विद्या का जन्म हुआ था । और जब विद्या एक अबोध बालिका ही थींतब संजीव संसार छोड़ गए  आज संजीव तो स्मृति-शेष ही हैं लेकिन विद्या से उनके प्रशंसकों को अभी भी उनके उत्कृष्ट अभिनय के अनेक रंग देखने को मिल सकते हैं क्योंकि संजीव ही की भांति विद्या भी कभी ख़राब अभिनय नहीं करती हैंउनकी भूमिका चाहे जैसी हो । दोनों ही कलाकारों के अभिनय की रेंज असीमित रही है । ये दोनों ही कभी सुपर-स्टारडम की दौड़ में शामिल नहीं रहेन ही कभी फ़िल्मी गलियारों और फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं में इन्हें अव्वल नम्बर का नायक या नायिका माना गया । लोकप्रियता तथा व्यावसायिक मूल्य की कसौटी पर इनके समकालीन दूसरे नायक-नायिकाओं को सदा इनसे ऊपर ही माना गया  पर सबसे बड़ा सच यही है कि सिने-प्रेमियों के दिलों पर इन्होंने हमेशा राज किया और हमेशा राज करेंगे    

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