Saturday, August 8, 2020

रश्मियों के रथ का सवार

लगभग बारह-तेरह वर्ष की आयु में जब मैं कक्षा नौ में पढ़ता था, मेरी हिंदी विषय की पाठ्यपुस्तक में चौदहवां अध्याय था - 'श्रीकृष्ण का दूतकार्य' । अध्याय के परिचय में बताया गया था कि वह रामधारीसिंह दिनकर के प्रबंध काव्य 'रश्मिरथी' से लिया गया था । तब न मैं प्रबंध काव्य का अर्थ जानता था और न ही विद्यालय में कोई मुझे बताने वाला था (सम्भवतः हिंदी में 'प्रभाकर' की उपाधि प्राप्त करने वाली मेरी माता मुझे बता सकतीं लेकिन मुझे उनसे पूछना ही नहीं सूझा था) । आज मैं जानता हूँ कि प्रबंध काव्य एक ऐसा काव्य है जिसका कोई कथासूत्र अनिवार्य रूप से हो एवं इसी कारण से उसका संपूर्ण कलेवर प्रबंधित या व्यवस्थित रूप में हो, उसके समस्त छंद उस कथा की घटनाओं से यथोचित रूप से संबद्ध हों एवं परस्पर सुसंगत हों । यदि वह कई चरित्रों एवं घटनाओं को विस्तार देने वाला हो तो उसे महाकाव्य कहा जाएगा तथा यदि वह किसी एक चरित्र अथवा उसकी किसी एक (या एकाधिक) विशिष्टता को ही केंद्र में रखकर रचा गया हो तो उसे खण्ड-काव्य कहा जाएगा । इस दृष्टि से प्रबंध काव्य वस्तुतः कथा-काव्य होते हैं ।  बहरहाल बात 'रश्मिरथी' की हो रही थी ।
'रश्मिरथी' राष्ट्रकवि दिनकर जी की अत्यंत लोकप्रिय रचना है जो खंड-काव्य है क्योंकि यह केवल एक ही चरित्र तथा उसके सद्गुणों पर आधारित है । यह चरित्र है 'महाभारत' की कथा का एक प्रमुख पात्र - कर्ण । 'महाभारत' का अभिशप्त पात्र है कर्ण जो सूर्यपुत्र होकर भी आजीवन सूतपुत्र कहलाया तथा जिसका मूल्यांकन सदा उसके गुणों के आधार पर नहीं, उसकी जाति के आधार पर किया गया एवं जो जातिगत अपमान को मृत्युपर्यंत सहता रहा । दानवीर तथा सिद्धांतप्रिय कर्ण के आभामंडल को भलीभांति संसार के समक्ष रखने का कार्य दिनकर जी ने 'रश्मिरथी' के माध्यम से किया । अपने जन्म के क्षण से लेकर अपने अवसान के क्षण तक सतत अन्याय सहने वाला कर्ण अपने अंतिम समय में अश्वरथी नहीं था क्योंकि उसके रथ का चक्र भूमि में धंस गया था जिसे निकालने के लिए वह रथ से नीचे भूमि पर उतरा हुआ था जब अर्जुन ने उस निहत्थे का वध कर दिया किंतु अपनी देह से मुक्त आत्मा के साथ वह रश्मिरथी बन गया क्योंकि वह सूर्य-रश्मियों के रथ पर चढ़कर सुरलोक में गया । 

मेरे व्यक्तित्व के साथ जो बात जुड़ी हुई है, वह यह है कि गायन-वादन-नृत्य तथा लय-सुर-ताल का कोई सम्यक् ज्ञान न होते हुए भी मैं उत्तम संगीत को सराहता हूँ तथा उसे समझने का प्रयास करते हुए उसका आनंद उठाता हूँ; स्वयं चित्रकार या शिल्पकार न होते हुए भी उत्तम चित्र या मूर्ति के गुणों को आत्मसात् करते हुए उसकी प्रशंसा करता हूँ; स्वयं कवि या शायर न होते हुए भी उत्कृष्ट कविता या शायरी के मर्म को अपने भीतर अनुभव करता हूँ एवं संबंधित कवि या शायर के समक्ष मन-ही-मन नतमस्तक होता हूँ । संभवतः इसीलिए मुझे लेखक या फ़िल्मकार न होने पर भी अन्य लोगों द्वारा रचित सामग्री को पढ़कर एवं फ़िल्में देखकर उनका अपने विवेक से मूल्यांकन करना रुचिकर लगता है । इस दृष्टिकोण से मैं (अमेच्युअर या ग़ैर-पेशेवर) समीक्षक हूँ लेकिन मैं इस तथ्य को सदैव स्मरण रखता हूँ कि समीक्षक का कार्य सरल है, रचयिता का कठिन एवं श्रमसाध्य ।

'रश्मिरथी' की आलोचना तो भारत के सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वमान्य आलोचक नामवर सिंह भी नहीं कर पाए, ऐसे में मैं दिनकर जी की इस महान रचना की समीक्षा भला क्या करूं ? मैं तो इस रचना पर विमर्श के बहाने कर्ण के जीवन एवं धर्म की उसकी व्याख्या पर ही कुछ कहना चाहूंगा । मैंने 'रश्मिरथी' के आद्योपांत पारायण में उसके एक-एक छंद का आनंद उठाया एवं पाया कि दिनकर जी ने कर्ण के उस उदात्त चरित्र को प्रकट किया है जिसे संसार ने देखकर भी अनदेखा किया; उसकी उस घनीभूत पीड़ा को अपने छंदों में पिघलाया है जिसे संसार ने अनुभव करना तो दूर, स्वीकार करने के भी योग्य नहीं समझा । जन्मा तो माता ने पेटी में रखकर सरिता में बहा दिया, मरा तो अपने ही भाई के हाथों छलपूर्वक । जन्म से मरण तक अन्याय-पीड़ित ही रहा वह अभागा । और अति यह कि मृत्यु के उपरांत भी शताब्दियों तक उसे दुर्योधन के साथी के अतिरिक्त कुछ और न माना गया तथा उसके छल से किए गए संहार को भी न्यायोचित ठहरा दिया गया । सच है; जिस पर बीतती है, वही जानता है । 

तीन दशक पूर्व (जब मैं कलकत्ता में रहकर अध्ययन कर रहा था) मैने अंग्रेज़ी के समाचार-पत्र 'द स्टेट्समैन' में एक लेख पढ़ा था - ‘Ardh-Rathi Karna Died, The Caste-System Still Survives’ । लेख में कर्ण को निमित्त बनाकर भारत में चिरकाल से प्रचलित अन्यायपूर्ण सामजिक व्यवस्था का विवेचन था जो किसी मनुष्य के किसी विशिष्ट जाति में जन्म लेने के आधार पर उसके साथ भेदभाव करती है । लेख ने एवं उससे भी कहीं अधिक उसके शीर्षक ने मेरे मन पर बहुत गहरा प्रभाव डाला । कालांतर में मैंने पाया कि कर्ण के जीवन पर कई औपन्यासिक पुस्तकें भी लिखी गई हैं जिनमें से शिवाजी सावंत द्वारा रचित 'मृत्युंजय' सर्वाधिक लोकप्रिय है किंतु मुझे मनु शर्मा द्वारा रचित 'कर्ण की आत्मकथा' को पढ़ने का अवसर शीघ्र ही तब मिला जब मैं जयश्री टी एंड इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड के लेखा-परीक्षण कार्य हेतु असम के कछार क्षेत्र में स्थित कलाइन चाय बाग़ान में श्री अरुण चतुर्वेदी के घर पर रहा जहाँ उनके घरेलू पुस्तकालय में मुझे वह पुस्तक उपलब्ध हुई जिसमें कर्ण की व्यथा को कर्ण के ही शब्दों में ढाला गया है । आज दशकों के अंतराल के उपरांत जब मैं 'रश्मिरथी' को पढ़ चुका हूँ तो मैं यह अनुभव करता हूँ कि दिनकर जी की इस अमर कृति ने अनेक रचनाकारों को कर्ण के जीवन पर अपनी लेखनी प्रयुक्त करने के लिए प्रेरित किया होगा ।

किंतु स्वयं दिनकर जी को इस कृति को रचने की प्रेरणा कैसे मिली होगी ? वे महात्मा गांधी से बहुत अधिक प्रभावित थे (अपने ओजपूर्ण कवित्व के बावजूद जो कि गांधी जी की अहिंसा-वृत्ति के अनुकूल नहीं था) तथा गांधी जी के दलितोद्धार संबंधी कृत्यों के अवलोकन से उन्होंने भारत में जातीय आधार पर अनवरत होने रहने वाले भेदभाव एवं अन्याय को अनुभव किया होगा । अपनी अत्यंत लोकप्रिय ओजस्वी कृति 'कुरुक्षेत्र' की रचना कर चुकने के उपरांत अब वे एक ऐसी कृति को रचना चाहते थे जो कि उदात्त मानवीय गुणों को आलोकित करे । तब तक गांधी जी की हत्या हो चुकी थी जिसने दिनकर जी को मर्माहत किया था । एक कविता के द्वारा उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित कर चुकने पर भी संभवतः वे एक ऐसा संपूर्ण काव्य रचना चाह रहे होंगे जो कि गांधी जी के आदर्शों के अनुरूप जातिगत एवं जन्माधारित सामाजिक भेदभाव पर प्रहार करे । इस द्विगुणित प्रेरणा ने ही संभवतः उनसे 'रश्मिरथी' की रचना करवाई जिसकी आधारभूत सामग्री उन्हें पुनः ('कुरुक्षेत्र' की भांति) 'महाभारत' ग्रंथ में ही मिली ।

कर्ण को अर्द्ध-रथी क्यों कहा गया (भीष्म ने कहा था) जबकि अन्य योद्धा 'महारथी' कहलाते थे ? निश्चय ही उस पर सूत-पुत्र होने का ठप्पा लगा होने के कारण । यह अपमान था उसके पौरूष एवं बाहुबल का, उसकी योग्यता एवं प्रतिभा का, उसकी कर्मठता एवं स्वाभिमान का । यह इस बात का प्रतीक था कि युग चाहे कोई भी हो, हमारे देश एवं समाज में व्यक्ति की जाति उसकी योग्यता एवं गुणों से अधिक महत्व रखती आई है । उच्च कुल में जन्मने वाले को सभी विशेषाधिकार स्वयं ही लब्ध होते रहे हैं जबकि निम्न वर्ग में जन्मने वाले को उसका न्यायोचित अधिकार देना तो दूर, उसके गुणों की भी अवज्ञा ही की जाती रही है । अपनी योग्यता के आधार पर समान व्यवहार का अधिकार माँगना ही उसका वह अपराध माना जाता रहा है जिसके लिए उसे व्यवस्था द्वारा दंडित किया जाए तथा ऐसे अन्यायपूर्ण दंड को भी न्याय माना जाए । व्यक्तियों से तो लड़ा जा सकता है लेकिन अन्याय जब व्यवस्था में अंतर्निहित हो तो व्यवस्था से कौन लडे़ और लड़ भी ले तो कैसे जीते ? ऐसी व्यवस्थाओं को तो स्वयं भगवान कहलाने वाले भी अक्षुण्ण बनाए रखते हैं । जिस व्यवस्था को स्वयं भगवान का अभयदान प्राप्त हो, उसे परिवर्तित करने अथवा सुधारने की बात तक कोई कैसे करे ?

दिनकर जी ने 'रश्मिरथी' में कर्ण की दानवीरता का विशद वर्णन किया है । उसने दान देने को अपने जीवन-धर्म का अभिन्न अंग माना तथा कभी किसी याचक को निराश नहीं लौटाया । जन्म के साथ ही उसकी देह से संयुक्त कवच एवं कुण्डल उसकी जीवन-रक्षा का अभेद्य आश्वासन थे जिनके रहते उसे अर्जुन सहित कोई भी नहीं मार सकता था । किन्तु जब अर्जुन के पिता देवराज इंद्र ने ब्राह्मण वेश धरकर उससे कवच-कुण्डल का दान माँगा तो उसने निस्संकोच उन्हें दान कर दिया क्योंकि उसे अपना धर्म अपने प्राणों से अधिक प्रिय था; उसे मरना स्वीकार्य था, अपने दान देने के धर्म से विमुख होना नहीं । 

दिनकर जी ने कर्ण की सिद्धांतप्रियता का भी उसके एवं कृष्ण के तथा तदोपरांत उसके एवं उसकी जन्मदात्री कुंती के संवादों के माध्यम से समुचित विवेचन किया है । ज्येष्ठ पांडव होने के कारण हस्तिनापुर का शासक बन सकने का प्रलोभन उसे मित्रता एवं कृतज्ञता के आदर्शों से विचलित नहीं कर सकता था । उसने इतने बडे़ प्रलोभन को तुरंत ठुकराया । प्रलोभन का प्रस्ताव रखने वालों के पृथक्-पृथक् स्वार्थ थे । कृष्ण का प्रयोजन था कर्ण को दुर्योधन से काटकर दुर्योधन को दुर्बल कर देना एवं युद्ध में पांडव-पक्ष की विजय सुनिश्चित कर देना जबकि कुंती का प्रयोजन था (कर्ण सहित) अपने सभी पुत्रों की प्राण-रक्षा । परंतु ...

परंतु न तो कृष्ण ही, न कुंती ही कर्ण के मन में झाँक कर उसके उदात्त चरित्र को पहचान सके जिसकी उच्चता किसी भी प्रलोभन से, किसी भी तर्क (या कुतर्क) से, किसी भी संबंध-जनित भावुकता से अधिक थी । मेरा अपना मानना है कि संसार में कृतघ्नता सम अन्य कोई पाप नहीं । कृतघ्नता एक ऐसा अपराध है जिसके लिए बडे़-से-बड़ा दण्ड भी अपर्याप्त है । कर्ण जैसा सद्गुणी व्यक्ति यह पाप नहीं कर सकता था । जब उसे सबने ठुकराया, सबने दुत्कारा, सबने अपमानित किया; तब दुर्योधन ने उसे गले लगाया, अपना मित्र कहा एवं समुचित सम्मान दिया (चाहे अपने स्वार्थवश ही) । ऐसे में कर्ण के लिए दुर्योधन से बढ़कर कौन होता ? उसने दुर्योधन के अनुचित कार्यों में साथ दिया क्योंकि मित्र से मुख न मोड़ना ही उसका धर्म था । यदि वह किसी भी कारण से दुर्योधन से विलग होता तो क्या यह अधर्म न होता ? हाँ, वह अपने मित्र को उचित मार्ग दिखला सकता था, कुपथगामी होने से रोक सकता था (या रोकने का प्रयास कर सकता था) । क्यों नहीं किया उसने ऐसा ?

इस प्रश्न का उत्तर संभवतः कर्ण द्वारा सतत रूप से सहे गए अपमानों में ही अंतर्निहित है । भीम महाभारत की कथा के प्रत्येक चरण पर उसका जातिसूचक शब्द से अपमान ही करता रहा । युधिष्ठिर के धर्मराज होने का बहुत गुणगान किया गया है तथा इस तथाकथित धर्मस्थता के महिमामंडन में कोई न्यूनता नहीं छोड़ी गई है किंतु क्या युधिष्ठिर, क्या कृष्ण, क्या कोई अन्य; किसी ने भी भीम या अर्जुन को कर्ण का केवल उसकी जाति के आधार पर अपमान करने से कभी रोका नहीं । क्या कारण-अकारण, समय-असमय किसी व्यक्ति को उसकी जाति को इंगित करके अपमानित करना भी धर्माचरण में सम्मिलित है ? पांडु-कुमारों को धर्म की शिक्षा देने वाले कृपाचार्य एवं अन्य गुरुओं तथा उनके संपर्क में रहने वाले वयोवृद्धों ने क्या कभी उन्हें इसका अनौचित्य बताया ? नहीं ! क्योंकि उनकी अपनी मानसिकता में भी कर्ण अपमान की ही अर्हता रखता था, सम्मान की नहीं । ऐसे में पांडवों के विरूद्ध दुर्योधन द्वारा किए गए (अनुचित ही सही) कृत्यों से कर्ण उसे क्यों रोकता ? 

अब जो बात रह जाती है, वह है द्रौपदी के चीर-हरण एवं उस राजसभा में कर्ण द्वारा उसके प्रति अपमानजनक शब्दों के प्रयोग की । दिनकर जी ने कर्ण के अंतिम क्षण में उसका 'वधूजन का रक्षण' न कर पाने तथा 'पाप का समर्थन' करने के लिए पश्चाताप दर्शाया है (उन्होंने कर्ण द्वारा द्रौपदी के प्रति किए गए अशोभनीय शब्दों का उल्लेख नहीं किया है) । मेरा यह मानना है कि कर्ण से यह अनुचित कृत्य इसलिए हो गया क्योंकि वह द्रौपदी के स्वयंवर में उसके द्वारा किए गए अपने अपमान को कभी नहीं भुला सका । वस्तुतः रामायण में सीता का स्वयंवर तथा महाभारत में द्रौपदी का स्वयंवर सच्चे अर्थों में स्वयंवर थे ही नहीं क्योंकि उन्हें स्वेच्छा से अपना वर नहीं चुनना था वरन उनके वरण के अभ्यर्थियों के सम्मुख (उनके पिताओं द्वारा) जो शर्त प्रस्तुत की गई थी, उसे पूर्ण करने वाले को ही उन्हें वरण करना था । ऐसे में जब कर्ण (ऊर्ध्व में घूमती हुई मत्स्य का जल में प्रतिबिम्ब देखकर वाण से वेधन करने की) शर्त को पूर्ण करने के लिए उद्यत हुआ तो द्रौपदी ने उसे सूत-पुत्र बताकर उससे विवाह करने से मना कर दिया । जातिसूचक ढंग से हुआ यह कर्ण के जीवन का सबसे बड़ा अपमान था जो न तो किसी भी आत्म-सम्मानी पुरुष के लिए विस्मरणीय हो सकता है, न ही क्षम्य । यही वह बीज था जो उस कुरूसभा में कर्ण से हुई महात्रुटि का वृक्ष बनकर उपस्थित हुआ । 

दिनकर जी की स्वर्गस्थ आत्मा मुझे क्षमा करे किन्तु मैं यह कहने पर विवश हूँ कि महान होकर भी 'रश्मिरथी' अपूर्णताओं से मुक्त नहीं है । जिस घटना का वर्णन मैंने पूर्वस्थ परिच्छेद में किया है, उसका दिनकर जी ने 'रश्मिरथी' में कहीं उल्लेख तक नहीं किया है जबकि जाति-आधारित अपमान की जो ज्वाला कर्ण के मन में उन्होंने आजीवन धधकती बताई है, उसमें सबसे बड़ी आहुति तो वही घटना थी । द्वितीय यह कि कर्ण के पालक माता-पिता (राधा एवं अधिरथ) जिनसे कर्ण को असीम स्नेह मिला तथा जिन्होंने कर्ण का निज-संतान की भांति ही पालन-‌पोषण किया, को दिनकर जी ने काव्य में कहीं स्थान ही नहीं दिया है । तृतीय यह कि इन महत्वपूर्ण घटनाओं एवं तथ्यों को तो वे बिसरा बैठे किंतु कृष्ण के दूत बनकर कौरवों से भेंट करने के प्रसंग को उन्होंने अति-विस्तार दिया है (जिसका उल्लेख मैंने इस आलेख के प्रारंभ में किया है) । वह प्रसंग अपने आपमें ओजपूर्ण, प्रभावी एवं प्रेरक है परंतु कर्ण की जीवन-कथा के संदर्भ में उसका कोई विशेष महत्व नहीं है । मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि दिनकर जी दुविधा में पड़ गए थे कि एक ओर तो उन्होंने कृष्ण को छल-प्रयोग करने वाले कूटनीतिज्ञ के रूप में प्रस्तुत कर दिया, दूसरी ओर उन्हें बारंबार भगवान भी बताया; भगवान की आलोचना कर बैठने के इसी अपराध के शमन हेतु ही संभवतः उन्होंने कृष्ण के महिमामंडन वाला वह विस्तृत प्रसंग रचा जो काव्य का सम्पूर्णता में अवलोकन करने पर प्रक्षिप्त-सा प्रतीत होता है ।   

कर्ण की गाथा करूण होकर भी प्रेरक है एवं पुरुषार्थ तथा कर्मठता के महत्व को रेखांकित करती है । आज जब भारतवासियों का एक बड़ा वर्ग आरक्षण-प्राप्त करने, उसे उत्तरोत्तर बढ़ाने तथा उसे चिरकाल तक बनाए रखने के लिए आतुर है; कर्ण का जीवन समाज के वंचित वर्ग के लिए एक आदर्श बनकर उभरता है । कर्ण को किसी आरक्षण की आवश्यकता नहीं थी । उसने अन्यायपूर्ण वंचन एवं असम्मान का प्रतिकार स्वयं को सक्षम एवं समर्थ बनाकर किया । उसने सामर्थ्य किसी की कृपा से नहीं; अपने कर्म, परिश्रम एवं गुणों से प्राप्त किया । वह भिक्षुक नहीं, दानी था । उसका हाथ देने के लिए ही उठता था, लेने के लिए नहीं । अंततः उस रश्मिरथी के समक्ष संसार उसी भांति झुका जिस भांति उगते सूर्य के समक्ष झुकता है । इसीलिए वह मरकर भी अमर है, उसका गुरुत्व अमर है, उसका यश अमर है ।

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