Friday, June 26, 2020

मानसिक रूप से तृप्त कर देने वाला एक शाब्दिक व्यंजन

बचपन से ही मेरा प्रमुख शौक़ पुस्तकें (तथा पत्र-पत्रिकाएं भी) पढ़ना ही रहा है । मुझे पुस्तकों से बेहतर मित्र कभी नहीं मिला तथा पढ़ने का मेरा यह व्यसन आज भी ज्यों-का-त्यों ही है । पढ़ने के शौक़ ने ही मुझे लिखने के लिए भी प्रेरित किया तथा मैं स्वांतः सुखाय के सिद्धांत पर चलते हुए लिखता रहा क्योंकि मेरा उद्देश्य सदा आत्मसंतोष ही रहा चाहे मेरे लिखे को कोई पढ़े या न पढ़े । मूलतः राजस्थानी होते हुए भी मैंने राजस्थानी साहित्य कम ही पढ़ा (जो कि ठीक नहीं हुआ) । अधिकांशतः मैंने पढ़ना तथा लिखना दो ही भाषाओं में किया - हिन्दी तथा अंग्रेज़ी ।

दूरदर्शन पर प्रति सप्ताह प्रसारित होने वाली हिन्दी फ़िल्में देखने के चस्के ने मुझे कहानियां तथा उपन्यास पढ़ने की ओर झुकाया । अधिकांश हिन्दी उपन्यास लुगदी साहित्य या पॉकेट बुक के नाम से जाने जाने वाले सस्ते उपन्यास होते थे जिनकी कथाएं बॉलीवुड की कथाओं सरीखी ही होती थीं । रहस्य-रोमांच ने मुझे सदा ही आकर्षित किया है, अतः जासूसी उपन्यास मैंने अधिक पढ़े जिनमें आरम्भ में मेरे पसंदीदा लेखक थे 'कर्नल रंजीत' । बहुत बाद में जाकर मुझे दो तथ्य ज्ञात हुए - एक तो यह कि 'कर्नल रंजीत' एक छद्म नाम था (तथा लुगदी साहित्य के अधिकांश उपन्यासों पर छपे उनके लेखकों के नाम भी छद्म ही होते थे) एवं द्वितीय यह कि हिन्दी के अधिकांश जासूसी उपन्यासों के कथानक विदेशी उपन्यासों के कथानकों से चुराए हुए होते थे ।

मेरे बचपन के एक मित्र 'विष्णु मंत्री' एक विशिष्ट लेखक द्वारा लिखे गए जासूसी उपन्यासों के रसिया थे । लेखक का नाम - 'सुरेन्द्र मोहन पाठक' । उनके आग्रह पर एक दिन मैंने उन्हीं के द्वारा दिया गया सुरेन्द्र मोहन पाठक का एक उपन्यास पढ़ा जिसके उपरांत मैं भी पाठक साहब की लेखनी का प्रशंसक बन गया । कालांतर में मैंने पाठक साहब के लिखे हुए अधिकांश उपन्यास पढ़ डाले । मैंने पाया कि कथानक मौलिक हो न हो, पाठक साहब की लेखन-शैली लाजवाब होती थी और यही उनकी लोकप्रियता का प्रमुख कारण था । पाठक साहब कई नायकों की सीरीज़ लिखते थे (और अभी भी लिखते हैं) जिनमें से मेरा पसंदीदा नायक बना एक अख़बारी पत्रकार - 'सुनील कुमार चक्रवर्ती' ।  इक्कीसवीं सदी में जाकर मैंने सुनील का एक नया उपन्यास पढ़ा जो मुझे इतना पसंद आया कि मैंने उसे न जाने कितनी ही बार पढ़ डाला, फिर भी उसे पढ़ने से मैं कभी थका या ऊबा नहीं । जब-जब भी मैंने उसे फिर से पढ़ा, मुझे उसमें कुछ नई ख़ूबियां मिलीं । ख़ूबियों के मालिक इस हिन्दी उपन्यास का नाम है - 'झांसा' जिसकी अंग्रेज़ी में समीक्षा मैं पहले ही लिख चुका हूँ ।


'झांसा' सुनील सीरीज़ का एक ऐसा उपन्यास है जिसका मुख्य घटनाक्रम एक छोटे से पर्यटन-स्थल 'सुंदरबन' में घटित होता है जो भारत में स्थित एक काल्पनिक महानगर - राजनगर से लगभग  सत्तर-बहत्तर मील दूर है (इस महानगर तथा इसके आसपास के स्थानों की एक अत्यन्त सजीव कल्पना स्वयं पाठक साहब ने ही की है) । यहाँ रहता है एक सहृदय उद्योगपति रणजीत महाजन तथा उसके दो सच्चे शुभचिंतक - एक तो चौवन वर्ष की आयु में भी कुंवारा और बंजारा प्रवृत्ति का उसका मित्र मनसुख केडिया एवं दूसरी सोफ़िया डोनाटो नाम की एक अधेड़ आयु की गोवानी महिला जो मिसरानी तथा हाउसकीपर का दोहरा दायित्व निभाती है अर्थात् वह महाजन की रसोई भी संभालती है तथा झेरी में स्थित उसके घर की भी देखभाल करती है ।

उपन्यास के नायक सुनील के नियोक्ता तथा राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र - 'ब्लास्ट' के स्वामी व प्रधान संपादक श्री बलदेव कृष्ण मलिक महाजन के मित्र हैं तथा वे सुनील को महाजन की सहायता करने का आदेश देते हैं क्योंकि सुनील उनके लिए केवल एक कर्मचारी नहीं है अपितु उनके पुत्र के समान है । महाजन अस्वस्थ है एवं अपनी अस्वस्थता के कारण ही वह न केवल अपनी कंपनी के मुखिया के पद से त्यागपत्र दे चुका है बल्कि अपने राजनगर स्थित आवास को छोड़कर सुंदरबन में रहने चला आया है । उसे वहाँ लाने वाला उसका अभिन्न मित्र केडिया ही है जो उसे उसके आस्तीन के सांप जैसे उन शत्रुओं से बचाना चाहता है जो न केवल उसकी परिश्रमपूर्वक कमाई गई धन-संपत्ति पर कुंडली मारकर बैठे हैं बल्कि उसे कंपनी के साथ धोखाधड़ी के झूठे आरोप में फँसाकर कारागार भेज देना भी चाहते हैं । और ये शत्रु कोई पराये नहीं बल्कि महाजन की दिवंगत धर्मपत्नी वसुंधरा की माता लीलावती तथा भाई भूपेन्द्र हैं जिनके साथ मिले हुए हैं मधुप तोशनीवाल नाम का एक धूर्त वकील एवं मनोज पुरवार नाम का एक ठग ।

जब ये सारे बदमाश सुंदरबन में भी महाजन को चैन से नहीं रहने देते और वहाँ पहुँचकर उसकी कोठी में डेरा डाल देते हैं तो केडिया अपने बीमार दोस्त महाजन को कोठी से बाहर लेकिन उससे जुड़े हुए एक कॉटेज में ले जाता है जिसके चारों ओर भीनी-भीनी ख़ुशबू फैला रहे फूलों के पौधों से लदा हुआ एक ख़ूबसूरत बाग़ीचा है । महाजन की सच्ची हितचिंतिका सोफ़िया जो महाजन के केवल एक अनुरोध पर राजनगर में अपना गोवानी रेस्तरां बंद करके उसकी देखभाल के लिए सुंदरबन चली आई थी, उसकी कोठी तथा कॉटेज का सारा कामकाज संभालती है तथा भोजन भी पकाती है जिसमें महाजन के लिए पृथक् रूप से विशिष्ट भोजन बनाना भी सम्मिलित है । सोफ़िया के साथ-साथ वहाँ चले आए हैं उसके पहले पति से जन्मी उसकी पुत्री अलीशा एवं उसका वर्तमान पति फ़्रैंकी डोनाटो जो कि मनोज पुरवार की जुगलबंदी में ठगी करता रहता है तथा दोहरे व्यक्तित्व का शिकार होने का बहाना बनाकर अपने कुकर्मों का दायित्व जॉनी नाम के एक कल्पित व्यक्ति पर डालता रहता है जिसे वह अपनी दूसरी छवि बताता है । महाजन की ठीक से देखभाल के लिए उसके चिकित्सक डॉक्टर पुनीत पाहवा ने एक नर्स भावना सूद को वहीं रहकर उनका ख़याल रखने की ज़िम्मेदारी दी हुई है । यह डॉक्टर-नर्स की जोड़ी अत्यंत कर्तव्यपरायण, सहृदय एवं सेवाभावी है ।

चूंकि महाजन को अपने दुश्मनों द्वारा फैलाए गए जाल में फँसकर कानून के शिकंजे में आ जाने का अंदेशा है, अतः वह अपने दोस्त और सुनील के बॉस मलिक साहब से मदद माँगता है । मलिक साहब यह ज़िम्मेदारी अपने चहेते सुनील को देते हैं जो इस बाबत एक तजुर्बेकार और ईमानदार वकील चटर्जी साहब से मशवरा करता है । अपनी वृद्धावस्था तथा रोग के चलते चटर्जी साहब स्वयं तो महाजन से मिलने नहीं जा सकते लेकिन वे अपने स्नेहभाजन सुनील को समुचित मार्गदर्शन देते हैं जिसे लेकर सुनील महाजन से मिलने के लिए सुंदरबन पहुँचता है । वहाँ सुनील महाजन और उसके सच्चे हमदर्दों से तो मिलता ही है और तमाम हालात का जायज़ा लेता है, वह बाकी लोगों को भी ठीक से जानने की कोशिश करता है । उसे यह भी पता चलता है कि अपनी पक्की उम्र में केडिया एक अपने से आधी उम्र की लड़की दीक्षा भटनागर से शादी करने का मंसूबा बना चुका है जबकि महाजन उस लड़की को दुश्मनों की बिछाई हुई साज़िश की बिसात का ही एक मोहरा मानता है ताकि उसके और केडिया के बीच दरार डाली जा सके ।

महाजन को तसल्ली देकर राजनगर लौटे सुनील को अगले ही दिन फिर से सुंदरबन जाना पड़ता है क्योंकि उसी रात को न सिर्फ़ ख़ाने में ज़हर मिलने से कोठी के कुछ बाशिंदों की हालत ख़राब होने का वाक़या होता है बल्कि नर्स भावना सूद पर किसी के गोली चलाने की भी वारदात होती है जिससे वह बाल-बाल बचती है । सुनील के साथ उसका हँसमुख मित्र रमाकांत भी जाता है जो राजनगर में 'यूथ क्लब' नाम का एक मनोरंजन प्रदान करने वाला क्लब चलाता है । लेकिन वहाँ भोजन-सामग्री में विष मिलने की घटना पुनः होती है जिसकी चपेट में महाजन, सुनील तथा रमाकांत आ जाते हैं । केडिया अपनी पुरानी जीप से जुड़े हाउस-ट्रेलर में महाजन को लेकर हस्पताल जाता है लेकिन इससे पहले कि वह अपने दोस्त को अंदर ले जाता, कोई उस हाउस-ट्रेलर में घुसकर महाजन को गोली मार देता है । महाजन के मरने के बाद उसकी वसीयत बरामद होती है जिसमें उसने सुनील को अपनी उस वसीयत का एग्ज़ीक्यूटर (लागू करने वाला) बना दिया होता है । वाक़यात के बेहद उलझे हुए सिलसिले में सुनील ख़ुद भी महाजन के शेयर सर्टीफ़िकेट के साथ जालसाज़ी करने के कानूनी फंदे में फँस जाता है । लेकिन आख़िरकार हमारा नायक सुनील न केवल ख़ुद को बचा लेता है बल्कि दुश्मनों की साज़िश का पर्दाफ़ाश करने के साथ-साथ महाजन के हत्यारे को भी बेनक़ाब करके कानून के हवाले कर देता है ।

'झांसा' की वाहिद कमज़ोरी मेरी नज़र में यह है कि क्लाईमेक्स में जब क़त्ल का राज़ और क़ातिल की पहचान उजागर होती है तो उसकी कोई बहुत मज़बूत बुनियाद दिखाई नहीं देती और राज़ का खुलना फीका-फीका-सा लगता है । लेकिन बाकी इस उपन्यास में बस ख़ूबियां-ही-ख़ूबियां हैं । आदि से अंत तक रोचक यह उपन्यास न केवल साहित्य के लगभग सभी रसों (हास्य, शृंगार, करूण, रौद्र, भयानक, वीर, शांत, अद्भुत आदि) को अपने में समाहित किए हुए है वरन मनोरंजन के साथ-साथ प्रेरणा भी देता है । जहाँ इसमें डॉक्टर पुनीत पाहवा तथा नर्स भावना सूद की रूमानी प्रेमकथा है, वहीं अंतिम दृश्य में मनसुख केडिया की वाग्दत्ता दीक्षा भटनागर के मन को भी निर्मल प्रेम-भावनाओं से ओतप्रोत बताते हुए लेखक ने उसके चरित्र को बहुत ऊंचा उठा दिया है ।

सुरेन्द्र मोहन पाठक सदा से यह कहते रहे हैं कि 'इट टेक्स ऑल काइंड्स ऑव पीपुल टु मेक द वर्ल्ड' अर्थात् संसार सभी प्रकार के लोगों से मिलकर बना है । अपने इस उपन्यास में लेखक ने इस उक्ति को पूरी तरह चरितार्थ कर दिया है । उपन्यास में लालची, मक्कार एवं तिकड़मी पात्र भी हैं तो पूरी तरह से उदात्त पात्र भी, झूठे एवं स्वार्थाधारित संबंध भी हैं तो सच्चा प्रेम भी एवं साथ ही सच्ची मित्रता भी । धनी रणजीत महाजन तथा साधारण आर्थिक स्थिति के मनसुख केडिया की मित्रता कृष्ण-सुदामा की मित्रता सरीखी जान पड़ती है । जहाँ केडिया अपने मित्र के लिए अपने प्राणों तक को दांव पर लगा देने को तत्पर है, वहीं महाजन अपने मित्र की सहायता भी इस ढंंग से करता है कि मित्र के स्वाभिमान पर आँच न आए । सोफ़िया डोनाटो का महाजन की नि:स्वार्थ भाव से सेवा करना भी मन को छू लेता है तो सोफ़िया एवं अलीशा के संबंध माता तथा युवा होती पुत्री के मध्य की जटिल स्थिति पर प्रकाश डालते हैं । डॉक्टर पुनीत व नर्स भावना के चरित्र कर्तव्यनिष्ठा एवं संवेदनशीलता के सजीव उदाहरण हैं ।

'झांसा' में हँसी की भरपूर ख़ुराक है । सुनील तथा रमाकान्त दोनों ही कभी अन्य पात्रों पर किए गए व्यंग्य एवं कटाक्ष से तो कभी अपने सामान्य वार्तालाप से ही पाठकों को हँसाते रहते हैं । वैसे तो पाठक साहब ने रमाकांत का चरित्र अपने आरंभिक लेखन के दिनों से ही ऐसा गढ़ा है कि रमाकांत की उपस्थिति मात्र ही उपन्यास पढ़ने वाले के लिए हँसी की गारंटी होती है लेकिन इस उपन्यास में तो मानो हास्य की सरिता बहती है । कथानक के प्रवाह के साथ घुला-मिला हास्य पूर्णरूपेण सहज भी लगता है ।

'झांसा' कॉरपोरेट जगत की कार्यशैली को भी भलीभाँति प्रदर्शित करता है । कंपनी अधिनियम तथा संबंधित विनियमों की आड़ में निजी हित कैसे साधे जाते हैं तथा किसी से व्यक्तिगत प्रतिशोध कैसे लिया जाता है, इसका यथार्थपरक चित्रण किया गया है जो कि उपन्यास को मनोरंजन में लिपटी एक सूचनाप्रद पुस्तक की श्रेणी में डालता है तथा इसकी गुणवत्ता एवं उपयोगिता को बढ़ाता है ।

'झांसा' का कलेवर बहुत अधिक नहीं है लेकिन जितना भी है, एक विविधरंगी विस्तृत कैनवास की तरह है जिसमें पात्रों एवं घटनाओं की भरमार है । छोटी कहानी को रबर की तरह नहीं खींचा गया है बल्कि उसे विविध आयाम प्रदान किए गए हैं तथा सार्थक घटनाओं के माध्यम से फैलाया गया है । पात्रों की संख्या बहुत अधिक है लेकिन प्रत्येक पात्र कथानक में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखता है एवं सहज-स्वाभाविक रूप से उभरकर पाठक के समक्ष आता है ।

ठग फ़्रैंकी डोनाटो का किरदार 'झांसा' की ख़ास हाईलाइट है । वह एक बेहद दिलचस्प किरदार है जो औरों को बेवक़ूफ़ बनाने के लिए अपनी दोहरी शख़्सियत का नाटक करता है । उसी के माध्यम से इस बात को भी स्थापित किया गया है कि पुरातन वस्तुओं (एंटीक़) के बाज़ार में ठगी किस सीमा तक होती है तथा हो सकती है । रोचक तथ्य यह है कि सुनील न केवल कठिन परिस्थिति में उसकी सहायता करता है वरन उसी से सीखता है कि दुश्मनों को कैसे झांसा देकर बाज़ी अपने हक़ में पलटी जाए ।

सुरेंद्र मोहन पाठक हमेशा से यह कहते आए हैं कि मेरा उपन्यास तभी पढ़ें जब आपको सिनेमा जैसे मनोरंजन की तलाश हो । चाहे मनोरंजक सिनेमा हो अथवा मनोरंजक उपन्यास, उससे किसी कुशल गृहिणी की पाकशाला से निकले ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन की भाँति होने की अपेक्षा की जाती है जिसमें सभी सामग्रियां एवं सभी मसाले उचित मात्रा में मिलाए गए हों - न कोई वस्तु आवश्यकता से कम, न कोई वस्तु आवश्यकता से अधिक । 'झांसा' इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है । केवल तीन दिनों की समयावधि में समाया इसका घटनाक्रम इसे एक ऐसे शाब्दिक व्यंजन का रूप देता है जो इसे पढ़ने वाले को मानसिक रूप से तृप्त कर देता है ।

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