Friday, April 17, 2020

पुरुषों में भावनात्मक जुड़ाव दर्शाने वाली हिन्दी फ़िल्में

मित्रता का भाव भारतीय कथा-साहित्य का भी तथा भारतीय फ़िल्मों का भी स्थायी तत्व रहा है । हम अपने रक्त-संबंधियों का चुनाव स्वयं नहीं कर सकते क्योंकि उनके साथ हमारे स्वाभाविक संबंध हमारे जन्म के साथ ही निर्धारित हो जाते हैं । कुछ इससे मिलती-जुलती बात ही प्रायः पड़ोसियों के संदर्भ में भी लागू होती है क्योंकि मनमाफ़िक पड़ोस मिल जाना हर किसी के भाग्य में नहीं होता । जिस तरह हमें संबंधियों के साथ निभाना होता है, उसी तरह पड़ोसियों के साथ भी निभाना होता है । दुनियादारी का तक़ाज़ा यही है । लेकिन मित्रों (दोस्तों या सहेलियों‌) की बात भिन्न होती है । उन्हें हम स्वयं चुन सकते हैं तथा स्वयं ही चुनते भी हैं । वाक़िफ़कार सब हो सकते हैं लेकिन दोस्त सब नहीं हो सकते । सही मायनों में दोस्त (या सहेली) वही हो सकता है जिसका दिल, मिज़ाज, आदतें, ख़यालात, अख़लाक़ और मैयार आपके जैसे हों; जिसके साथ आप एक ही वेवलेंग्थ पर महसूस करते हों; जो आपको अपना-सा लगता हो । ऐसे शख़्स से ही बातें करना, दुख-सुख बांटना और वक़्त बिताना अच्छा लगता है । उसकी ग़ैर-मौजूदगी में भी हम उसे याद करते हैं और महसूस करते हैं कि वह दूर होकर भी साथ है । इसीलिए अरबी के प्रसिद्ध विद्वान एवं साहित्यकार ख़लील जिब्रान ने कहा है - 'याद करना भी मिलन का ही स्वरूप है' । 

हिंदी फ़िल्में भी मित्रता के पवित्र रूप को सदा से दर्शाती आई हैं । यहाँ संदर्भ केवल पुरुषों अथवा केवल महिलाओं के मध्य की मित्रता का ही है क्योंकि मेरी दृष्टि में (एवं पारम्परिक हिंदी फ़िल्मकारों की दृष्टि में भी)  पुरुष एवं महिला की मित्रता एक पूर्णरूपेण भिन्न विषय है जिस पर विस्तृत विमर्श पृथक् रूप से किया जा सकता है । जहाँ तक महिलाओं के मध्य की मित्रता अथवा सहेलापे का प्रश्न है, ऐसी अनेक फ़िल्में बनी हैं जिनमें सहेलियों को एक-दूसरी के सुख एवं प्रसन्नता के लिए त्याग करते हुए दिखाया गया है । ऐसी कथाओं में सच्ची सहेलियां सगी बहनों से कम नहीं होती हैं । आधुनिक युग में (अर्थात् उत्तर-उदारीकरण युग में) भी दुख-सुख बांटने वाली तथा हर अच्छे-बुरे वक़्त में साथ निभाने वाली सहेलियों की कथाओं पर फ़िल्में बनी हैं । 'पिंक' (२०१६) इसका एक प्रशंसनीय उदाहरण है । लेकिन इस आलेख में मेरा विषय नई धारा की वे फ़िल्में हैं जो समवयस्क आधुनिक पुरुषों के मध्य की मित्रता एवं भावनात्मक जुड़ाव पर आधारित रही हैं अथवा ऐसा भावनात्मक जुड़ाव उनकी कथावस्तु का अभिन्न अंग रहा है । ज़ाहिर है कि न तो मैं 'ये दोस्ती, हम नहीं तोड़ेंगे' वाली 'शोले' (१९७५) मार्का दोस्ती की बात कर रहा हूँ और न ही 'अंदाज़ अपना अपना' (१९९४) मार्का कॉमिक दोस्ती की । मैं अंधे और लंगड़े मित्रों की उस क्लासिक मित्रता की भी बात नहीं कर रहा हूँ जो 'दोस्ती' (१९६४) में दर्शाई गई थी । 

बीसवीं सदी के नब्बे के दशक में उदारीकरण के युग के सूत्रपात ने भारतीय मध्यम-वर्ग की जीवन-शैली और जीवन मूल्यों दोनों में ही क्रांतिकारी परिवर्तनों को जन्म दिया जिनके भली-भाँति दृष्टिगोचर होने में कुछ वर्ष लगे एवं नवीन शताब्दी के आरंभ होते-होते वे नवीन पीढ़ी के दैनिक जीवन में कुछ इस प्रकार रच-बस गए कि उन्हें अनदेखा करना संभव ही नहीं रहा । वक़्त बदल चुका था । भारतीय परिवारों में पीढ़ियों का अंतर विगत समय की तुलना में कहीं अधिक स्थूल रूप में उपस्थित हो चुका था । शिक्षित मध्यमवर्गीय भारतीय युवाओं के लिए अब मित्र माता-पिता से भी अधिक महत्वपूर्ण हो गए थे क्योंकि उन्हें प्रतीत होने लगा था कि उनके माता-पिता उन्हें नहीं समझ सकते । ज़िन्दगी के जज़्बात चाहे पुराने ही थे मगर दुश्वारियां नई थीं और समझौतावादी मानसिकता लेकर जीना इक्कीसवीं शताब्दी की पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी को स्वीकार्य नहीं था । अब हर बात पर उन्हें ग़लत बताने वाले माँ-बाप से जवान लड़के-लड़कियों को चिढ़ होने लगी थी । अब उपदेश देने वाले गुरू भी उन्हें नहीं चाहिए थे । अब उन्हें ऐसे लोग चाहिए थे जो उन्हें समझ सकें ताकि दिल की बात बेहिचक कही जा सके और उन दुश्वारियों का हल ढूंढा जा सके जिनके बारे में माँ-बाप से बात करना फ़िज़ूल लगने लगा था । अब रोज़-ब-रोज़ की ज़िन्दगी में ऐसे इंसान चाहिए थे जो बात सुनकर कहें - 'हाँ, तुम सही हो' ।

और ऐसे लोग समझाने वाले नहीं हो सकते थे, समझने वाले ही हो सकते थे । और समझ वही सकते थे जो ख़ुद भी अपनी ज़िन्दगी में वैसे ही हालात से दो-चार हो रहे हों । ऐसे हमउम्र ही तो दोस्त बनते ! अब आदर्श मित्रता का पुरातन युग नहीं था, समझने व साथ देने वाली मित्रता का नवीन युग था । फ़िल्में हों अथवा कथा-साहित्य, वे समकालीन जीवन एवं समाज का दर्पण ही तो होते हैं । सो ज़िन्दगी का यही नया रंग हिन्दुस्तानी फ़िल्मों में भी उतर आया । नई सदी में ऐसे दोस्तों की कहानियों पर जितनी फ़िल्में बनीं, लगभग सभी में दो से ज़्यादा दोस्त दिखाए गए । 'गुंडे' (२०१४) अपवाद थी लेकिन उसकी कहानी और पात्र अस्सी के दशक के थे । और मुन्नाभाई सीरीज़ की फ़िल्मों के मुन्ना एवं सर्किट के चरित्र वास्तविक जीवन के चरित्रों की श्रेणी में नहीं रखे जा सकते । जीवन के उतार-चढ़ाव से होते हुए आगे बढ़ रहे एवं इक्कीसवीं शताब्दी के निरन्तर परिवर्तित हो रहे वातावरण में अपना वास्तविक पथ ढूंढ रहे सुशिक्षित भारतीय युवकों के चरित्रों को लेकर बनाई गई प्रथम फ़िल्म थी - 'दिल चाहता है' (२००१) जिसका निर्माण, लेखन एवं दिग्दर्शन किया था एक छब्बीस वर्षीय युवक फ़रहान अख़्तर ने । पुरुषों के मध्य के भावनात्मक बंधन या मेल बॉण्डिंग (male bonding) को लेकर बनाई जाने वाली फ़िल्मों में 'दिल चाहता है' को नव-पथ-प्रवर्तनकारी (path-breaking) भारतीय फ़िल्म माना जा सकता है ।
'दिल चाहता है' में महाविद्यालय की शिक्षा पूर्ण कर चुकने के उपरांत भी अपने नटखट स्वभाव के साथ दिन-प्रतिदिन के जीवन का आनंद ले रहे तीन मित्रों की जीवन-यात्रा है जो तब तक चलती दर्शाई गई है जब तक वे परिपक्व होकर जीवन का वास्तविक अर्थ समझ पाते हैं । खिलंदड़ा आकाश (आमिर ख़ान), कुछ-कुछ बुद्धू जैसा समीर (सैफ़ अली ख़ान) और भावुक व गम्भीर सिद्धार्थ या सिड (अक्षय खन्ना) एक-दूसरे की टांग ज़रूर खींचते हैं लेकिन वे एक-दूसरे के पूरक भी हैं । एक दिन आकाश और सिड की दोस्ती में दरार पड़ जाती है जो तब तक नहीं पटती जब तक आकाश और समीर रिश्तों और जज़्बात का मोल उस तरह नहीं समझ लेते जिस तरह से कि सिड समझता है । तब तक दरिया में बहुत पानी बह चुका है और वे तीनों ही देख चुके हैं कि ज़िन्दगी क्या है । फ़िल्म देखकर मैंने तीनों मित्रों में से सिड के चरित्र के ही निकट अपने आपको पाया तथा इस मर्मस्पर्शी फ़िल्म से बहुत अधिक प्रभावित हुआ परन्तु तब मैं यह नहीं जानता था कि कुछ वर्षों के उपरान्त एक इससे भी श्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्म आने वाली थी । यह फ़िल्म थी 'रॉक ऑन' (२००८)

'रॉक ऑन' से 'दिल चाहता है' के निर्देशक फ़रहान अख़्तर ने अभिनय के क्षेत्र में पदार्पण किया तथा एक दशक पूर्व हिन्दी फ़िल्मों में नायक के रूप में प्रवेश करने वाले अभिषेक कपूर ने (पुबाली चौधरी के साथ मिलकर) न केवल इस फ़िल्म की कथा लिखी बल्कि इसके निर्देशन की भी बागडोर संभाली । हो सकता है, कोई मुझसे सहमत न हो लेकिन महानगरीय युवाओं के सपनों, संघर्षों एवं भावनाओं को संपूर्ण सत्यनिष्ठा से रूपांकित करने वाली ऐसी मर्मस्पर्शी फ़िल्म हिन्दी भाषा में तो मैंने दूसरी नहीं देखी । 'दिल चाहता है' की भाँति दो मित्रों के मध्य मनमुटाव होने व मित्रता के टूटने वाली बात 'रॉक ऑन' में भी है परंतु यह 'दिल चाहता है' की भाँति हलके-फुलके मूड वाली फ़िल्म न होकर प्रारम्भ से अंत तक एक भावुक एवं गंभीर फ़िल्म है । सपनों के बुने जाने, उनके टूटने-बिखरने व फिर नये सिरे से से बुने जाने और रिश्तों के बनने-बिगड़ने-सुधरने की दास्तान है 'रॉक ऑन' जो देखने वालों के दिलों की गहराइयों में समा जाती है । इस कहानी के चार मित्रों में से जहाँ आदित्य श्रॉफ़ या आदि (फ़रहान अख़्तर) तथा केदार झवेरी या केडी (पूरब कोहली) संपन्न हैं, वहीं जोसेफ़ मैस्करेनहास या जो (अर्जुन रामपाल) निर्धन है जबकि रॉबर्ट नैन्सी या रॉब (ल्यूक केनी) नितान्त एकाकी, साधनहीन व असाध्य रोग से ग्रस्त है । कोई दोस्त अमीर है, कोई ग़रीब लेकिन उनका सपना साझा है । उस सुहाने सपने के टूटने के दस साल बाद उसकी किरचें जोड़ी जाती हैं और उसे फिर से बनाया जाता है । सपना पूरा होता है लेकिन किस्मत ऐसा खेल खेलती है कि एक टीस पीछे फिर भी रह जाती है । अपने सपनों को जीने वाले युवाओं को यह फ़िल्म अवश्य देखनी चाहिए ।

'रॉक ऑन' के तक़रीबन सवा साल बाद चेतन भगत के अंग्रेज़ी उपन्यास 'फ़ाइव प्वॉइंट समवन' पर आधारित राजकुमार हिरानी की फ़िल्म '३ इडियट्स' (२००९) आई जो उपन्यास से बहुत अलग है । इंजीनियरिंग कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करते हुए मित्र बनने वाले तीन युवकों की इस कथा में उनके मध्य का भावात्मक बंधन भी है तथा उनके सपने भी लेकिन वे सपने उसी तरह पृथक् हैं जिस तरह से तीनों के परिवारों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति पृथक् हैं । उनमेंं कुछ भी कॉमन नहींं, कोई समानता नहींं । परन्तु हाँ, उनकी मित्रता उदाहरण देने योग्य है । रैंचो (आमिर ख़ान) अपने दोनों मित्रों - फ़रहान (आर. माधवन) तथा राजू (शर्मन जोशी) को सफलता के पीछे भागने के बजाय स्वयं को योग्य बनाने तथा अपने नैसर्गिक एवं वास्तविक कार्यक्षेत्र (true calling) को अपनाने के लिए प्रेरित करता है । एक हास्य फ़िल्म के रूप में बनाई गई '३ इडियट्स' मूल उपन्यास की तुलना में बहुत अधिक मनोरंजक बन पड़ी तथा इसीलिए बॉलीवुड की सर्वकालिक सफलतम फ़िल्मों में सम्मिलित हुई । मेरे परिवार के सदस्यों को तो यह इतनी प्रिय है कि वे इसे सैकड़ों बार देख चुके हैं । संंभवतः यही कारण है कि मेल बॉण्डिंग को अच्छे ढंग से दर्शाने पर भी इसे एक भरपूर मनोरंजन प्रदान करने वाली ऐसी फ़िल्म के रूप में ही स्मरण किया जाता है जिसने पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था के दोषों की ओर ध्यान आकृष्ट किया ।

इसके लगभग डेढ़ साल बाद 'रॉक ऑन' के शीर्षक गीत की एक पंक्ति को ही शीर्षक के रूप में प्रयुक्त करते हुए फ़िल्म आई - 'ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा' (२०११) जिसके तीन नायकों में से एक थे पुनः फ़रहान अख़्तर एवं निर्देशन का कार्यभार संभाला था उन्हीं की बहन ज़ोया अख़्तर ने । यह फ़िल्म स्पष्टतः युवकों के मध्य भावनात्मक जुड़ाव या मेल बॉण्डिंग पर ही आधारित है तथा इसका संदेश भी एकदम स्पष्ट है - 'स्वयं को सभी पुराने भयों एवं ग्रंथियों से मुक्त करो, अतीत के भार को मन से उतार फेंको तथा निर्भय एवं उन्मुक्त होकर जीवन को नये सिरे से आरंभ करो क्योंकि जीवन पुनः नहीं मिलेगा' । कबीर (अभय देओल), अर्जुन (हृतिक रोशन) तथा इमरान (फ़रहान अख़्तर) ज़िंदगी के ये बेशकीमती सबक तब सीखते हैं जब ये तीनों दोस्त अविवाहितों के भ्रमण (bachelors' trip) की अपनी योजना के अन्तर्गत कुछ दिनों के लिए छुट्टियाँ मनाने स्पेन चले जाते हैं जहाँ वे इन छुट्टियों को रोमांचकारी भ्रमण (adventure trip) की तरह मनाते हैं तथा जान-जोखिम के कामों में हिस्सा लेते हुए अपने-अपने डरों से छुटकारा पाते हैं । इस यात्रा में वे एक-दूसरे से अपनी वे समस्याएं बांटते हैं जो किसी अन्य से नहीं कही जा सकतीं तथा उनके समाधान ढूंढने में एक-दूसरे की सहायता करते हैं । फ़िल्म मनोरंजक भी है तथा प्रेरक भी । लेकिन एक ही बात है जिसके कारण मुझ जैसे लोग इससे स्वयं को जोड़ पाने में असमर्थ पाते हैं - फ़िल्म के पात्र अत्यंत धनी हैं जो जब चाहें महंगी विदेश यात्राएं कर सकते हैं तथा पानी की तरह पैसा बहा सकते हैं । ये उच्च वर्ग के युवक निम्न तथा मध्यम वर्ग के लोगों को अपने-से नहीं लगते ।

किन्तु इसके लगभग डेढ़ वर्ष के अंतराल के उपरान्त 'रॉक ऑन' बनाने वाले अभिषेक कपूर ही युवा लड़कों की मित्रता एवं भावनात्मक संबंध पर किसी ताज़ा हवा के झोंके जैसी एक और फ़िल्म लेकर उपस्थित हुए - 'काई पो छे' (२०१३) जिसके छोटे नगर के निवासी तीन नायक सामान्य भारतीय युवकों को नितान्त अपने-से लगे । चेतन भगत के अंग्रेज़ी उपन्यास 'द थ्री मिस्टेक्स ऑव माई लाइफ़' पर आधारित इस कथा के तीन गुजराती युवक - गोविंद (राजकुमार यादव), ओमी (अमित साध) तथा ईशान (सुशांत सिंह राजपूत) मुझ जैसे पुरुषों को किसी दूसरे ग्रह से आए नहीं लगते, अपने ही प्रतिबिम्ब लगते हैं । इनकी मित्रता के अतिरिक्त इस फ़िल्म के कथानक का अभिन्न अंग है - क्रिकेट जो भारतीयों के लिए धर्म से कम नहीं । नौकरी मिलना असंभव सदृश प्रतीत होने पर ये तीनों मिलकर अपने क्रिकेट की धुन को ही अपना करियर बनाने का निश्चय कर लेते हैं तथा एक खेल की सामग्री की दुकान तथा प्रशिक्षण-केंद्र खोलते हैं । इनका यह कार्य तथा इनके व्यक्तिगत जीवन कैसे-कैसे झंझावातों से होकर निकलते हैं, क्या कुछ इन्हें सहना पड़ता है, किस प्रकार इनका अपने सफल व्यवसाय का स्वप्न पुनः-पुनः भंग होता है एवं कैसे ये उसे प्रत्येक बार पुनः गढ़ते हैं; इसे यह फ़िल्म इस तरह दिखाती है मानो नदी की धारा विभिन्न मोड़ लेती हुई समुद्र तक पहुँचने का लक्ष्य लिए अविराम अपनी यात्रा कर रही हो । फ़िल्म का दुखद चरम-बिंदु (क्लाइमेक्स) इसे अविस्मरणीय बना देता है परंतु फ़िल्म का समापन नवीन आशा के साथ होता है । 'काई पो छे' पतंगबाज़ी में प्रयुक्त गुजराती भाषा की हर्षध्वनि है जो दूसरी पतंग को काट देने पर पतंग उड़ाने वालों के मुख से निकलती है जिसका आशय है - 'वो काटा !'

मैंने फ़िल्म 'रंग दे बसंती' (२००६) का ज़िक्र जान-बूझकर नहीं किया हालांकि यह भी युवा लड़कों की गहरी दोस्ती और आपसी जुड़ाव को पुरज़ोर तरीके से दिखाती है । वास्तव में यह एक अनूठी फ़िल्म है जो 'खाओपियो और मौज उड़ाओ' वाली ज़िन्दगी जीने वाले लड़कों को अपने वतन से प्यार करना सिखाती है । राकेश ओमप्रकाश मेहरा निर्देशित 'रंग दे बसंती' के पात्रों - दलजीत या डीजे (आमिर ख़ान), सुखी (शर्मन जोशी), करण (सिद्धार्थ) और असलम (कुणाल कपूर) में गाढ़ी छनती है लेकिन यह फ़िल्म इनकी मेल बॉण्डिंग से अधिक देशप्रेम की भावना पर आधारित है जो इनमें जगाती है एक विदेशी पत्रकार स्यू (एलिस पैटन) जो अंग्रेज़ी दासता की बेड़ियों से माँ भारती को मुक्त करने हेतु संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों पर एक वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) बनाती है जिसमें इन्हें क्रमशः चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, भगतसिंह और अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान की भूमिकाएं दी जाती हैं । आगे चलकर रामप्रसाद बिस्मिल की भूमिका में इनके साथ राष्ट्रवादी मानसिकता वाला लक्ष्मण (अतुल कुलकर्णी) भी जुड़ता है जो मूलतः इनकी मित्र-मंडली का अंग नहीं है । फ़िल्म की कहानी जब आगे बढ़ती है तो इनकी मेल बॉण्डिंग में एक लड़की सोनिया (सोहा अली ख़ान) भी जुड़ जाती है जिसके मंगेतर अजय (आर. माधवन) की असामयिक मृत्यु से उपजे उसके दुख में ये भी भागीदार हैं । इस कथा का आँखों में आँसू उमड़ा देने वाला दर्दनाक अंत इसे कभी न भूली जा सकने वाली फ़िल्म बना देता है जो ऊपर वर्णित मेल बॉण्डिंग वाली फ़िल्मों की श्रेणी में नहीं रखी जा सकती ।

ऐसी फ़िल्में और भी बनी हैं तथा निश्चय ही आगे भी बनेंगी । अब तक बनी फ़िल्मों के तथ्यों पर एक दृष्टि डालने से ही पता चल जाता है कि फ़रहान अख़्तर, अभिषेक कपूर, आमिर ख़ान, शर्मन जोशी व आर. माधवन जैसे नाम इनमें एकाधिक फ़िल्मों से जुड़े रहे हैं । 'दिल चाहता है' से इस अवधारणा को प्रस्तुत करने वाले फ़रहान अख़्तर की ऐसी कथाओं में रुचि स्वाभाविक लगती है । महानगरीय पृष्ठभूमि वाली 'रॉक ऑन' बनाने वाले अभिषेक कपूर के मन में 'द थ्री मिस्टेक्स ऑव माई लाइफ़' पढ़कर यदि नए कलाकारों को लेकर छोटे शहर के पात्रों वाली 'काई पो छे' बनाने का विचार आया तो वह भी स्वाभाविक ही था । बाकी लोगों का ऐसी एक से अधिक फ़िल्मों में आना संयोग ही हो सकता है । बहरहाल ये फ़िल्में भारतीय युवकों को न केवल इस नए दौर में अपने जीवन को संभालने के गुर सिखाती हैं बल्कि उन्हें मित्रता के वे पाठ भी पढ़ाती हैं जिनमें भावनाएं तथा व्यावहारिकता, दोनों ही सम्मिलित हैं ।

अपने आलेख का समापन मैं हिंदी की मूर्धन्य कवयित्री निर्मला सिंह गौर की एक कविता की इन पंक्तियों से करता हूँ :
                        दोस्त क्या होता है, क्या होती हैं उसकी ख़ूबियां
                        इस ज़माने में बड़ी मुश्किल से मिलता है यहाँ
                        जो समंदर की तरह पीता है सारे राज़-ए-दिल
                        हो ख़ुशी या ग़म, ज़रूर मौजूद होता है वहाँ

                        दोस्त है जो अनकहे ही दर्द को पहचान ले   
                        हाल-ए-दिल क्या है, यह बस चेहरे से पढ़कर जान ले
                        आँख से आँसू जो टपके तो बड़े जज़्बात से 
                        उसको मोती की तरह हाथों पे अपने थाम ले 

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Wednesday, April 1, 2020

दर्द सबका एक-सा


लंबे इंतज़ार के बाद आख़िर निर्भया के मुजरिमों को सज़ा-ए-मौत दे ही दी गई । भारत के प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर दिया कि न्याय की विजय हुई है । लम्बे अरसे से विभिन्न संचार माध्यमों पर सलेब्रिटी बनकर दर्शन एवं वक्तव्य दे रही निर्भया की माता ने अपनी असीम प्रसन्नता की अभिव्यक्ति कर दी । प्रचार के भूखे अन्ना हज़ारे (जिन्हें अब कोई टके के भाव भी नहीं पूछता) ने भी अपना तथाकथित मौन-व्रत समाप्त कर दिया जो उन्होंने तब तक रखने की घोषणा की थी जब तक कि निर्भया को न्याय (!) नहीं मिल जाता । दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्षा ने इसे सारे देश की जीत बताया । सुर्ख़ियों में रहने वाले लगभग सभी लोगों ने आशा व्यक्त की कि अब भारत की महिलाएं अधिक सुरक्षित रहेंगी । क्या वाक़ई ?

निर्भया कांड के कुछ समय के उपरांत जब देश अपनी जाने-पहचाने जुनून में डूबा हुआ थातब मैंने एक लेख लिखा था : आँखों वाला न्याय चाहिएअंधा प्रतिशोध नहीं । मैं आज भी यही मानता हूँ कि समाज में सुधार विवेकपूर्ण न्याय से होता हैविवेकहीन प्रतिशोध से नहीं । आज से कुछ दशक पूर्व समाज के दबंगों द्वारा उत्पीड़ित अनेक लोग व्यवस्था से न्याय न मिलने पर स्वयं समाज एवं कानून के विरूद्ध शस्त्र उठाकर बाग़ी (या डाकू या दस्यु) बन जाते थे । इंसाफ़ का न मिलना या इतनी देर से मिलना कि वह अपने मायने ही खो बैठेही वस्तुतः समाज की अनेक समस्याओं की जड़ है क्योंकि वह मासूमों को अनचाहे ही मुजरिम बना देता है । कुछ लोगों को सूली चढ़ा देने से भीड़ को राज़ी किया जा सकता हैसमस्या का हल नहीं निकाला जा सकता । बहरहाल इस लेख में मेरा विषय यह नहीं है ।

इस लेख में जो मैं कहना चाहता हूँ वह यह है कि दर्द दर्द में फ़र्क़ करना ग़लत है क्योंकि भुगतने वालों का दर्द एक-सा ही होता है । दिल और रूह में उठने वाले दर्द की माप-तौल के कोई पैमाने ईज़ाद न किए गए हैंन किए जा सकते हैं । निर्भया के अपराधियों को मृत्युदण्ड देने के लिए जो उन्माद देश में उठा (जिसका नेतृत्व स्वयं निर्भया के माता-पिता ही कर रहे थे)वैसा उन्माद ऐसी ही अन्य पीड़िताओं के अपराधियों को मृत्युदंड देने के लिए तो नहीं उठा । क्यों ? क्या उनके दर्द को निर्भया के दर्द से कमतर आँका जा सकता है ? या उनके दर्द को देखते वक़्त आम जनताराजनेताओंसामाजिक कार्यकर्ताओंमीडिया और अन्य उत्साही लोगों की निगाहों में फ़र्क़ आ गया था ?

राजनेताओं की बात छोड़िए जिनके लिए सत्ता के निमित्त वोट बैंक की राजनीति और 'हम अच्छे तुम बुरेवाली मानसिकता ही सब कुछ है । उन्नीस सौ चौरासी के दिल्ली दंगों की बात करने वाले दो हज़ार दो के गुजरात दंगों की बात नहीं करना चाहते और जो दो हज़ार दो के गुजरात दंगों की बात करते हैंवे उन्नीस सौ चौरासी के दिल्ली दंगों पर चुप्पी साध लेते हैं क्योंकि सभी गुनाहगार हैं जो दूसरों के गुनाह गिनाना चाहते हैंअपने गुनाह नहीं । पर इनसे इतर बाकी प्रबुद्ध लोगों के लिए क्या कहा जाए तो पीड़ितों और उनकी पीड़ा में अंतर करते हैं और जो सज़ा एक पीड़ित के अपराधियों को देने के लिए लामबंद हो जाते हैंउसी सज़ा की माँग दूसरे पीड़ित के अपराधियों के लिए कभी नहीं करते 

तीन मार्च दो हज़ार दो को गुजरात में फैले साम्प्रदायिक दंगों के दौरान रणधीकपुर गाँव में दंगाइयों की भीड़ ने बिलकीस बानो के घर पर हमला कियाउस इक्कीस वर्षीया गर्भवती विवाहिता के साथ सामूहिक दुराचार लियाउसकी दुधमुँही बच्ची की उसकी आँखों के सामने नृशंस हत्या कर दी गईउसके परिवार के चौदह लोग निर्ममता से मृत्यु के घाट उतार दिए गएउस अबला का सम्मान ही नहींसब कुछ बरबाद कर दिया गया और फिर वह बरसोंबरस भटकती फिरी संवेदनहीन और पक्षपाती पुलिसप्रशासन और न्याय के रक्षकों के द्वारों पर । उसे न्याय कैसे मिलता जब सत्ता के मालिकों का हाथ अन्याय और अन्यायियों के सर पर था ? सतरह लंबे वर्षों के इंतज़ार के बाद दो हज़ार उन्नीस में उसे सरकारी नौकरी और सरकारी इमदाद तब जाकर मिली जब सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को फटकारा । दो हज़ार सतरह में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा उस अबला के (कुछ) अपराधियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई । अभियोजन पक्ष ने उनके लिए मृत्युदंड की माँग की जिसे न्यायालय ने ठुकरा दिया । क्या नेताक्या मीडियाक्या तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता और क्या निर्भया की माताकिसी ने उन निर्दयी आतताइयों के लिए मृत्युदंड की माँग नहीं की 

सत्ताईस मई दो हज़ार चौदह को बदायूँ (उत्तर प्रदेश) में दो दलित बच्चियों के शव पेड़ से लटके पाए गए जिनकी दुराचार के बाद हत्या कर दी गई थी । उनके अपराधियों को मृत्युदंड तो क्याकिसी भी प्रकार का दंड दिलाने के लिए कोई विशेष होहल्ला नहीं किया गया । पुलिस तो मामले को रफ़ा-दफ़ा करने में लगी ही रहीसीबीआई जाँच भी निष्पक्ष तथा गंभीर नहीं रही और दिवंगत बच्चियों के असहनीय पीड़ा सह रहे माता-पिताओं को ही उनका हत्यारा ठहराने का प्रयास किया गया । इस जघन्य कांड के आरोपी आज भी निडर होकर जी रहे हैं तथा दंडित होने का उन्हें कोई भय नहीं लगता है । क्या निर्भया के दोषियों को फाँसी लग जाने से  उन मासूम  बच्चियों को न्याय मिल गया है ? क्या निर्भया की बड़बोली माता इस संदर्भ में अब तक कुछ बोली हैं या अब बोलना चाहेंगी ?

हमारे देश में तो व्यवस्था तथा उसके प्रति लोगों की आस्था का हाल यह है कि सत्ताईस नवम्बर दो हज़ार उन्नीस को हैदराबाद में एक पशु-चिकित्सिका के साथ अनाचार के बाद उसकी हत्या के गिरफ़्तार आरोपियों (विचाराधीन क़ैदियों) को छह दिसम्बर को तड़के स्थानीय पुलिस ने तथाकथित मुठभेड़ में क्या मार गिराया कि पुलिस पर बधाइयों की बौछार होने लगी, घटना में सम्मिलित पुलिसकर्मियों पर फूल बरसाए जाने लगे बिना यह पुष्टि किए कि वे आरोपी वास्तविक अपराधी थे भी या नहीं और बिना इस बात पर ध्यान दिए कि यही पुलिस यदि समय पर त्वरित कार्रवाई करती तो पीड़िता के प्राण बचाए जा सकते थे । और यदि वे आरोपी समाज के हाई प्रोफ़ाइल शक्तिशाली वर्ग से संबंधित होते तो क्या यही पुलिस उनका ऐसा एनकाउंटर करने का साहस करती स्पष्ट है कि हम अब न्याय के आकांक्षी विवेकशील नागरिक नहीं रहे, रक्तपिपासु अंधी भीड़ में परिवर्तित हो चुके हैं जिसकी संवेदनाएं भी पीड़ितों की जाति, धर्म, वर्ग आदि देखकर जागती हैं  सहानुभूति जताने और न्याय की माँग करने के लिए भी हमारा दृष्टिकोण 'मुँह देखकर तिलक करने' वाला बन गया है 

निर्भया का मामला हाई प्रोफ़ाइल बन गया तो ऐसा वातावरण निर्मित हो गया जैसे सम्पूर्ण भारतवासी बाकी सब काम छोड़कर केवल निर्भया के दोषियों को फाँसी लगा देने के लिए एकजुट हो गए हों लेकिन निर्भया के मर्मान्तक अंत से पहले भी और उसके उपरांत भी देश में हज़ारों निर्भयाओं ने अनाचार सहा है, उन्हें न्याय दिलाने तथा भावी निर्भयाओं की सुरक्षा के प्रति हमारी जागरूकता का स्तर क्या अभी भी वही नहीं है जो पहले था ? निर्भया कांड के उपरांत बने नये कानून ने ऐसे अपराधों की रोकथाम नहीं की है बल्कि ऐसी घटनाओं में बहुत अधिक वृद्धि हुई है । और निर्भया के दोषियों के मर जाने के बाद ऐसी घटनाओं में कमी आने की आशा करना अपने आपको भुलावे में रखने से अधिक कुछ नहीं  

न्यायालयों की जय-जयकार करने वालों की जानकारी के लिए मैं यह सूचना दे रहा हूँ कि इसी वर्ष अट्ठाईस जनवरी को हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने दो हज़ार दो में गुजरात के आणंद ज़िले में हुए दंगों के लिए सज़ा काट रहे अनेक दोषियों को न केवल ज़मानत पर छोड़ दिया बल्कि उन्हें मध्य प्रदेश (गुजरात नहीं) के विभिन्न नगरों में जाकर 'समाज सेवा एवं आध्यात्मिक सेवा' करने का निर्देश दिया । माननीय न्यायालय के इस निर्णय ने दंगा-पीड़ितों के घावों पर कैसा नमक छिड़का होगा, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है  ऐसे न्यायिक वातावरण में दुर्बल, दबे-कुचले और साधनहीन उत्पीड़ित न्याय पाने के लिए अब किसकी ओर देखें

मुस्लिम समुदाय हमारे देश में और विश्व में भी लगभग अलग-थलग इसीलिए पड़ गया है क्योंकि उसके प्रतिनिधि अपने समुदाय पर होने वाले अत्याचार की तो आवाज़ उठाते हैं लेकिन मुस्लिम बहुल देशों और क्षेत्रों में अल्पसंख्यक ग़ैर-मुस्लिमों पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध मौन साध लेते हैं । इससे उनकी छवि अन्य समुदायों में यह बन गई है कि उन्हें केवल अपना दर्द ही दिखाई देता है, दूसरों का नहीं । काश्मीरी पंडितों पर किए गए अत्याचारों के प्रति भारतीय (तथा अन्य) मुस्लिमों की उपेक्षापूर्ण तथा संवेदनहीन चुप्पी ने उनकी छवि बिगाड़ी है और अन्य समुदायों को ऐसा आभास दिया है कि वे यह सोच रखते हैं – हमारा ग़म ग़म है, तुम्हारा ग़म कहानी है; हमारा ख़ून ख़ून है, तुम्हारा ख़ून पानी है । अगर मुस्लिम नेता और विवेकशील मुसलमान इस तथ्य को समझ लेते तो वे भारत और दुनिया में अलग-थलग नहीं पड़ते, अन्य धर्मावलंबियों द्वारा ग़लत नहीं समझे जाते  

मैंने ऊपर संदर्भित अपने आलेख में भी यही कहा था और यहाँ भी यही कहता हूँ कि इस समस्या तथा ऐसी अन्य कई समस्याओं का एकमात्र समाधान चरित्र-निर्माण तथा सुसंस्कारों का विकास ही है । देश के युवा भ्रष्ट, उद्दंड एवं चरित्रहीन बनेंगे तो ऐसी घटनाओं का होना किसी भी कानून से नहीं रोका जा सकेगा चाहे हम कितने ही दोषियों को सूली चढ़ा दें । और हमारी संवेदनाएं सभी उत्पीड़ितों के लिए समान होनी चाहिए क्योंकि दर्द तो सबका एक-सा ही होता है । जैसे आततायी केवल आततायी है, वैसे ही पीड़ित भी केवल पीड़ित ही हैं । जिस पर गुज़रती है, उसका दर्द वही जानता है और सही मायनों में इंसानी नज़रिया उसी का है जो पराये दर्द को बिना सहे भी महसूस कर सके  एक सच्चे नागरिक की सहानुभूति राशन कार्ड पर दिए जाने वाले राशन या मंगलवार के प्रसाद की तरह नहीं बंट सकती  हम यह सोचकर उदासीन (या फिर अति-उत्साही‌) नहीं हो सकते कि जो हुआ है, हमारे या हमारे किसी अपने के साथ नहीं हुआ है । चूंकि यहाँ बात महिलाओं के साथ होने वाले अनाचार की है, मैं अपनी माताओं-बहनों से यही कहूंगा कि औरत को तो औरत का दर्द होना चाहिए; इसलिए वे हर औरत के दर्द को बिना उसकी जाति-मज़हब-हैसियत को देखे महसूस करें और उसके आँसुओं को पोंछने की दिल से कोशिश करें 

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