Thursday, February 13, 2020

शहीद ! या बलि के बकरे ?

विगत वर्ष चौदह फ़रवरी के दिन मैं दिल्ली में अपने नियोक्ता संगठन के मुख्यालय में आयोजित एक सम्मेलन में उपस्थित था । आयोजन इतना लंबा चला कि कार्यालय में ही रात के सवा नौ बज गए तथा वह इतना व्यस्त था कि इंटरनेट पर नवीनतम समाचार (ब्रेकिंग न्यूज़) देखने तथा स्वयं को अद्यतन रखने का अवकाश ही नहीं था । उस दिन दिल्ली में बेमौसम की बरसात भी हुई थी । इसलिए अंधेरी रात में बरसते माहौल में मैं दफ़्तर से निकला और जैसे-तैसे एक ऑटोरिक्शा पकड़कर अपने ठिकाने पर पहुँचा । हारा-थका होने के कारण बिना किसी से बात किए और बिना कुछ देखे मैं जल्दी ही सो गया । अगले दिन सुबह ही मैं जान पाया कि पिछले दिन कैसी दर्दनाक घटना घट गई थी । जम्मू-काश्मीर के पुलवामा इलाके में जैश-ए-मोहम्मद संगठन के एक मरजीवड़े ने विस्फोटकों से भरे अपने वाहन को केंद्रीय आरक्षित पुलिस बल (सीआरपीएफ़) के जम्मू से श्रीनगर जा रहे काफ़िले से टकरा दिया था जिसमें चालीस निर्दोष जवान अकाल मृत्यु का ग्रास बन गए थे । 

घटना अत्यंत गंभीर थी तथा हमारे देश की गुप्तचर व्यवस्था पर एक वृहत् प्रश्नचिह्न थी क्योंकि इतना अधिक विस्फोटक पदार्थ लेकर किसी व्यक्ति का बिना किसी रोक-टोक के सैन्य-दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में प्रवेश कर जाना कोई साधारण बात नहीं । उस हृदयविदारक घटना के स्वाभाविक परिणामस्वरूप संपूर्ण राष्ट्र में जो भावोद्रेक प्रसृत हुआ, वह अतिशीघ्र ही बालाकोट में भारतीय वायुसेना द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के शिविरों पर किए गए आक्रमण का आधार बना । स्वभावतः इस सैन्य-कृत्य (एयर स्ट्राइक) की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई, सत्ताधारियों ने न केवल इसका श्रेय लिया वरन इसे तीन मास के भीतर हुए लोक सभा चुनाव में भी भुनाया । पुलवामा के शहीदों (!) के नाम पर वोट माँगे गए एवं सफलतापूर्वक प्राप्त किए गए । राष्ट्रभक्ति के नाम पर देश के कोने-कोने में ऐसा युद्धोन्माद उत्पन्न किया गया मानो पाकिस्तान से आर-पार का युद्ध होने ही जा रहा था । लेकिन ...

लेकिन वह दुखद घटना कैसे घटी, कैसे घट पाई; इस पर कोई गम्भीर चिंतन-मनन नहीं हुआ । सरकार ने इस संदर्भ में प्रश्न पूछने वालों के प्रति ऐसा आक्रामक दृष्टिकोण अपनाया कि पूछने वाले ही भयभीत हो जाएं । अनौपचारिक तथा औपचारिक दोनों ही रूपों से सरकार द्वारा यही कहा गया कि हमारी गुप्तचर व्यवस्था विफल नहीं हुई तथा सुरक्षा-व्यवस्था में कोई चूक नहीं हुई । यदि कहीं कोई विफलता अथवा चूक नहीं हुई थी तो फिर पुलवामा में जो हुआ, वो क्योंकर हो पाया ? सरकार तथा उसके प्रतिनिधियों ने इस प्रश्न को पूर्ण रूप से अनदेखा किया । वे या तो जवाब देने से बचते रहे या फिर सवाल करने वालों के लिए ऐसा रवैया इख़्तियार करते रहे कि वे सहम जाएं, देशद्रोही या गद्दार का बिल्ला लगा दिए जाने की आशंका से डर कर चुप्पी साध लें । क्या यह सही था ? या सही है ?

सरकार के मंत्रियों ने दावा किया कि बालाकोट की एयर स्ट्राइक में सैंकड़ों आतंकवादी मारे गए थे (यद्यपि वास्तविक तथ्यों से अभी तक कोई परिचित नहीं है) । ज़रूर मारे गए होंगे लेकिन उनके मारे जाने से जो चालीस मासूम जानें चली गईं, वे तो वापस आने वाली नहीं; जो चालीस भारतीय परिवार उजड़ गए, उनका दुख-दर्द तो कम नहीं हो सकता । बालाकोट में एयर स्ट्राइक करके अपनी पीठ थपथपा लेना ही क्या पर्याप्त है ? क्या अब हम फिर से किसी और पुलवामा जैसी वारदात होने तक ख़ामोश बैठे रहेंगे और हो जाने के बाद कोई सर्जीकल हमला करके अपने आपको यह शाबाशी देने लगेंगे कि देखो, उन्होंने तो हमारे इतने ही मारे थे, हमने तो उनके सैंकड़ों मार दिए । मैं ख़ुद पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट हूँ लेकिन इस बात को सियासतदानों और हुक्मरानों से बेहतर जानता हूँ कि ज़िन्दगी और मौत के हिसाब-किताब आँकड़ों से नहीं होते, नहीं हो सकते ।

अगर सच यही है कि हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियों से कोई चूक नहीं हुई तो इसका एक ही मतलब निकलता है कि जो हुआ एक गहरी साज़िश के तहत हुआ जिसके मास्टरमाइंड मुल्क के बाहर नहीं हैं, इसी मुल्क में मौजूद हैं । जिन पे हिफ़ाज़त का ज़िम्मा था, वो ही क़ातिल बन बैठे । पुलवामा में मरने वाले शहीद नहीं, चुनावी बिसात पर पिटने वाले मोहरे थे । महज़ क़ुरबानी के बकरे थे वे जिनकी क़ुरबानी सिर्फ़ सियासी फ़ायदे के लिए दी गई थी । उनका अवसान मातृभूमि की रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग नहीं था बल्कि राजनीति के हवन-कुंड में दी गई बलि थी तथा इस यज्ञ का वांछित फल था चुनाव में विजय । उन्हें इसलिए मरवाया गया ताकि उनकी मृत्यु के आधार पर राजनीति की चौसर पर मनमाफ़िक चाल चली जा सके और देश भर में ऐसा वातावरण बनाया जा सके जो चुनाव में वोट दिलाने वाला हो । अन्यथा इस असाधारण घटना की विस्तृत एवं निष्पक्ष जाँच न करवाए जाने का क्या औचित्य है ? क्या देश की जनता को (जिसमें दिवंगतों के शोकमग्न परिजन भी सम्मिलित हैं) यह जानने का अधिकार नहीं है कि इतना बड़ा कांड कैसे संभव हो पाया तथा भविष्य में ऐसे कांडों को होने से रोकने के लिए सत्ता में बैठे लोग क्या कर रहे हैं (जिन पर संपूर्ण देशवासियों की सुरक्षा का दायित्व है) ?

मुझे यह देखकर बहुत दुख होता है कि हमारे राजनीतिक दल ही नहीं, विभिन्न अ-राजनीतिक तथा सामाजिक संगठन भी शक्तिशाली सत्ताधारियों से भयभीत होकर इस संबंध में मौन साधकर बैठ गए । हमारे हाई प्रोफ़ाइल पत्रकार भी (जो आजकल सलेब्रिटी से कम नहीं माने जाते) इस विषय पर अपने लेखों के माध्यम से कुछ कहने का साहस नहीं कर सके, जवाबदारों से जवाबतलबी की हिम्मत नहीं कर सके । शायद देश में होने वाले हर चुनाव से पहले 'कौन जीतेगा' का हिसाब लगाते रहना और हर चुनाव के बाद 'जीतने वाला क्यों जीता तथा हारने वाला क्यों हारा' का विश्लेषण करते रहना ही अब उनका काम रह गया है ।

मेरे प्रिय हिंदी उपन्यासकार वेद प्रकाश शर्मा इस दुखद घटना से दो वर्ष पूर्व (सतरह फ़रवरी, दो हज़ार सतरह को) इस संसार से चले गए थे । काश वे जीवित होते ! यदि वे जीवित होते तो मैं उनसे इस घटना को आधार बनाकर एक वस्तुपरक एवं प्रभावशाली उपन्यास लिखने का आग्रह करता क्योंकि सामयिक घटनाओं पर अपनी लेखनी चलाना उनका कर्म था । आज जब इस अतिशय दुखद त्रासदी को एक वर्ष पूर्ण हो रहा है, मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि जो चालीस निर्दोष अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गए, उनके परिजनों में से ही कोई सत्य के अण्वेषण का बीड़ा उठाए ताकि इस षड्यंत्र के वास्तविक रचयिता के मुख को ढकने वाला आवरण हट सके । अन्यथा क्या गारंटी है कि भविष्य में पुनः किसी महत्वपूर्ण चुनाव के आसन्न होने पर पुलवामा की पुनरावृत्ति नहीं होगी ?

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