Friday, January 31, 2020

प्यार ही नहीं, काम भी पूजा है

आज के इस स्वार्थपूर्ण युग में जब प्यार को भी एक वक़्ती सहूलियत मानने वाले बहुतेरे हैं, मुझ जैसे लोगों की प्रजाति अभी समाप्त नहीं हुई है जो सच्चे प्यार में विश्वास रखते हैं और प्यार को ईश्वर की आराधना से कम नहीं समझते । मैं तो इसी बहुत पुराने फ़िल्मी गीत के बोलों में यकीन रखता हूँ - 'दिल एक मंदिर है, प्यार की जिसमें होती है पूजा, ये प्रीतम का घर है' । लेकिन प्यार के साथ-साथ व्यक्ति का काम भी तो पूजा से कम नहीं जिसे ईश्वर की आराधना जैसी ही निष्ठा के साथ किया जाना चाहिए । उसके निर्वहन में लापरवाही अथवा आलस्य क्यों किया जाए ? कर्तव्य-पालन में कामचोरी कैसी और किसलिए ?

कई बार स्त्री-पुरुष (विशेषतः युवा) अपने प्रियतम के प्रेम में कुछ इस प्रकार आकंठ डूब जाते हैं कि वे अपने जीवन के कर्म से नयन चुराने लगते हैं । मैं यह बात पुरुषों के संदर्भ में कह रहा हूँ जो अपनी प्रेमिका अथवा नवविवाहिता पत्नी के प्रेम में कुछ ऐसे निमग्न हो जाते हैं कि उन्हें अपने कर्तव्य एवं जीवन की अन्य प्राथमिकताओं का भान ही नहीं रहता । काम में लापरवाही आने लगती है और अपने लक्ष्य से उनका ध्यान भटक जाता है । इसमें दोष प्रायः उनकी प्रेयसी अथवा पत्नी का नहीं, स्वयं उन्हीं का होता है । वे ही भूल बैठते हैं कि ज़िन्दगी सिर्फ़ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है, ज़ुल्फ़-ओ-रुख़सार की जन्नत नहीं कुछ और भी है । 

राजेन्द्र कुमार और वैजयंतीमाला अभिनीत पुरानी फ़िल्म 'साथी' (१९६८) में इस सत्य का निरूपण बड़े अच्छे ढंग से किया गया था । फ़िल्म के नायक-नायिका चिकित्सा के क्षेत्र में हैं लेकिन प्रेम-विवाह करने के उपरांत अपनी प्रणय-लीला में वे अपने कर्तव्य एवं जीवन के लक्ष्य को भुला बैठते हैं । जब उनके गुरु एवं पिता समान वरिष्ठ चिकित्सक (तथा वैज्ञानिक) जो उनकी सहायता से कैंसर का उपचार ढूंढने में जुटे थे, उन्हें लताड़ते हैं तब उनकी आँखें खुलती हैं और उन्हें अपनी भूल का एहसास होता है ।

अपने इस लेख में मैं एक ऐसे हिंदी उपन्यास की समीक्षा कर रहा हूँ जिसकी विषय-वस्तु यही है । इस अनूठी रहस्य-कथा की विशेषता यही है कि इसमें कोई अपराधी ही नहीं है । रहस्य आरंभ से अंत तक बना रहता है लेकिन अंत में उपन्यास के मुख्य पात्रों में से कोई खलनायक (अथवा खलनायिका) नहीं निकलता है । उपन्यास का कथानक इसी महत्वपूर्ण किन्तु प्रायः अनकहे सत्य को रेखांकित करता है जिसका निरूपण इस आलेख के प्रारंभिक दो अनुच्छेदों में किया गया है । स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा द्वारा रचित इस हिंदी उपन्यास का शीर्षक है - 'कानून का पंडित' जो प्रथम बार लगभग साढ़े तीन दशक पूर्व प्रकाशित हुआ था ।

लेखक ने कथानक की प्रेरणा संभवतः दो अप्रैल उन्नीस सौ चौरासी को स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा के प्रथम भारतीय अंतरिक्ष यात्री बनने की ऐतिहासिक घटना से ली थी जब राकेश अपने साथी रूसी अंतरिक्ष यात्रियों के साथ रूसी अंतरिक्ष यान सोयूज टी-११ में सवार होकर अंतरिक्ष में गए थे एवं एक सप्ताह तक वहाँ रहे थे । इस महत्वपूर्ण अभियान के लिए सर्वप्रथम भारतीय वायु सेना के बीस पायलटों को चिन्हित किया गया था जिनमें से चार को रूस भेजा गया तथा अंत में दो को आवश्यक प्रशिक्षण के लिए चुना गया । ये दो थे - विंग कमांडर रवीश मल्होत्रा तथा स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा । जाना अंतरिक्ष में इनमें से एक को ही था लेकिन रूस में दो वर्ष का कठोर प्रशिक्षण इन दोनों को दिया गया । अंततः राकेश शर्मा अंतरिक्ष में भेजे जाने के लिए चुने गए जबकि रवीश मल्होत्रा पूर्तिकर (बैकअप) के रूप में रखे गए । राकेश व्योम-पुत्र बनकर अंतरिक्ष में गए एवं भारतीय विज्ञान के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ा ।

'कानून का पंडित' की कहानी भारत के मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉक्टर रामन्ना बाली के परिवार से आरंभ होती है जिनकी धर्मपत्नी का देहावसान हो चुका है तथा उनका युवा पुत्र सिद्धार्थ भी एक अत्यंत प्रतिभाशाली वैज्ञानिक है । उसका मित्र एवं साथी वैज्ञानिक है आलोक जिसे रामन्ना बाली अपने पुत्र की ही भाँति मानते एवं स्नेह करते हैं । सिद्धार्थ एवं आलोक दोनों को ही भारतीय अंतरिक्ष अभियान के लिए चुना जाता है एवं उन्हें कठोर प्रशिक्षण दिया जाना सुनिश्चित होता है किन्तु अंततोगत्वा अंतरिक्ष में जाना इन दोनों में से एक को ही है । सिद्धार्थ एक निर्धन एवं दोषपूर्ण परिवार से आई परन्तु रूप-सौंदर्य में अनुपम युवती पूनम से विवाह कर लेता है । विवाहोपरांत वह अपनी नवविवाहिता पत्नी के प्रेम में कुछ इस प्रकार खो जाता है कि उसे उसके अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु अथवा कार्य दिखाई ही नहीं देता । वह उससे एक दिन भी दूर नहीं रह पाता एवं अंतरिक्ष अभियान के लिए दिए जाने वाले प्रशिक्षण के प्रति भी अरूचि दर्शाने लगता है । उसकी यह दशा उसकी प्रगति से ईर्ष्या करने वाले अन्य युवा वैज्ञानिकों के लिए प्रसन्नता का स्रोत बन जाती है ।

कथानक में मुख्य मोड़ तब आता है जब एक दिन सिद्धार्थ को एक वैज्ञानिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए नगर से बाहर जाना पड़ता है तथा उसकी अनुपस्थिति में ललित नाम का एक व्यक्ति उसके घर में घुसकर पूनम को अपनी पत्नी बताने लगता है । पहले तो पूनम उसे झूठा बताती है और पुलिस भी बुला लेती है लेकिन अगले ही दिन उसका व्यवहार ठीक विपरीत हो जाता है एवं वह यह कहने लगती है कि ललित ही उसका पति है तथा उसने सिद्धार्थ को धोखा दिया था । पुलिस भी भ्रमित हो जाती है क्योंकि ललित अपने और पूनम के विवाह के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करता है ।

सिद्धार्थ लौटता है तो इन सब बातों को जानकर भौंचक्का रह जाता है । उसके भावुक मन पर मानो बिजली गिरती है । वह क्रोध में अपना आपा खो बैठता है एवं उसके सच्चे प्रेम के बदले उसे धोखा देने वाली पूनम को मार डालने तथा स्वयं उस अपराध में फाँसी चढ़ने को तत्पर हो जाता है । उसकी इस स्थिति को देखकर उससे कुढ़ने तथा जलने वाले वैज्ञानिक यह सोचकर उत्साहित हो जाते हैं कि अब ये तो क्या अंतरिक्ष में जाएगा, इसके मार्ग से हट जाने से हमारे लिए भी अवसर निकल सकता है । लेकिन सिद्धार्थ के अवसर गंवाने पर अंतरिक्ष में जाने के सर्वाधिक अवसर आलोक के हैं जिसे रामन्ना बाली का भी समर्थन प्राप्त है ।

लेकिन रामन्ना बाली अपने टूटे-बिखरे पुत्र सिद्धार्थ को भी यह समझाते हैं कि उसकी यह पागलपन जैसी स्थिति ही उसके शत्रुओं का अभीष्ट था जिन्होंने यह सारा षड्यंत्र रचा है एवं इस प्रकार अपना जीवन नष्ट करना शत्रुओं के हाथों में खेलने के समान ही होगा । शत्रुओं को मुँहतोड़ जवाब देना है तो उसे इस झमेले से बाहर निकलकर अपने कर्तव्य पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए तथा अंतरिक्ष अभियान के लिए जी जान से जुट जाना चाहिए । बात सिद्धार्थ के दिमाग़ में घुस जाती है जिसके बाद वह इन सभी घटनाओं से अपना मन विलग करके अंतरिक्ष अभियान के लिए पूरे मनोयोग से आलोक के साथ-साथ प्रशिक्षण प्राप्त करता है एवं अंततः उसी को भारतीय अंतरिक्ष यात्री के रूप में चुना जाता है । जिस समय वह यान में बैठकर अंतरिक्ष में भ्रमण कर रहा होता है, उसी समय एक भारतीय न्यायालय में चल रहे एक असाधारण मुक़दमे में कथानक के रहस्य का खुलासा होता है ।

रहस्यकथाएं अपराध पर आधारित होती हैं एवं प्रायः एक जैसे ही ढर्रे पर चलती हैं लेकिन वेद प्रकाश शर्मा ने इस उपन्यास के रूप में एक पूर्णरूपेण भिन्न शैली के कथानक की रचना की जो प्रेरणास्पद भी है एवं रोचक तो है ही । उपन्यास के शीर्षक का इसके कथानक से कोई विशेष संबंध नहीं है सिवाय इस बात के कि कहानी का एक पात्र स्वयं को 'कानून का पंडित' कहता है एवं उसके कार्यकलापों से संबंधित एक अत्यन्त रोचक प्रसंग भी उपन्यास में डाला गया है (जो मूल कथानक से जुड़ा हुआ नहीं है) । अत्यंत सरल हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास आदि से अंत तक पाठक को बाँधे रखता है । लेखक ने विभिन्न चरित्रों को अपने आप उभरने एवं कथानक पर अपनी छाप छोड़ने का अवसर दिया है । उपन्यास में बेशक़ कुछ कमियां हैं लेकिन ख़ूबियां इतनी अधिक हैं कि वे कमियों पर भारी पड़ती हैं ।

मेरी आयु-वर्ग के के लोगों को स्मरण होगा कि जब हम प्राथमिक एवं उच्च-प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ते थे तो हमारे पाठ्यक्रम में सम्मिलित प्रत्येक कथा के अंत में कोई-न-कोई शिक्षा (मोरल ऑव द स्टोरी) हुआ करती थी । यह उपन्यास भी एक ऐसी ही कहानी कहता है । सभी हिंदी-प्रेमियों को इस उपन्यास को पढ़ने की सलाह देते हुए मैं यही कहना चाहूंगा कि इस कहानी के माध्यम से जो शिक्षा लेखक ने दी है, उसे हम जीवन में उतारें तथा अपने कर्म को भगवान की पूजा की ही मानिंद निष्ठा एवं समर्पण के साथ सम्पादित करें । यह सच है कि प्यार के बिना ज़िन्दगी अधूरी है और प्यार ही इंसान को जीने और आगे बढ़ने की ताक़त देता है लेकिन इसके साथ ही यह भी तो सच है कि और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

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Wednesday, January 8, 2020

दहेज समस्या का अनछुआ पहलू

भारतीय समाज की एक बहुत बड़ी और बहुत पुरानी कुरीति है - कन्याओं के विवाह में वर-पक्ष द्वारा की जाने वाली दहेज की माँग और उसे पूरा करने का कन्या-पक्ष पर अत्याचार-सरीखा दबाव । इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ तक विवाह के संदर्भ में कन्या की इच्छा और पसंद को जानना तो बहुत दूर की बात, उसके विवाह के लिए दहेज जुटाना ही एक बहुत बड़ा मुद्दा हुआ करता था और इस नवीन सदी में भी स्थिति में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं आया है । लड़के वाले निर्लज्ज होकर (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से) दहेज की माँग करते हैं या लड़की वालों पर अपने रीति-रिवाज़ों की दुहाई देकर अनावश्यक आर्थिक भार डालते हैं । लड़की वालों की विवशता होती है कि उन्हें अपनी कन्या को विदा करना है, उसका घर बसाना है और इस प्रकार अपना (अपरिहार्य) सामाजिक उत्तरदायित्व पूर्ण करना है; इसलिए वे चुपचाप ऐसी सही-ग़लत माँगें मानते रहते हैं और इस प्रक्रिया में बहुत कुछ मन-ही-मन घुट-घुटकर सहते रहते हैं । 

महान फ़िल्मकार स्वर्गीय वी. शांताराम ने इस कुप्रथा पर बड़ी मार्मिक फ़िल्म - दहेज (१९५०) बनाई थी । एक लम्बे अंतराल के बाद अस्सी-नब्बे के दशक में इस सामाजिक कुरीति पर - दूल्हा बिकता है (१९८२), एक बार चले आओ (१९८३), शुभकामना (१९८३), बहू की आवाज़ (१९८५), सस्ती दुल्हन महंगा दूल्हा (१९८६), ये आग कब बुझेगी (१९९१)  आदि कई फ़िल्में बनीं । प्रायः ऐसी फ़िल्मों ने चित्रपट पर समस्या को सतही ढंग से ही प्रस्तुत किया ।

सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक में पॉकेट बुक व्यवसाय के अंतर्गत हिंदी में ढेरों उपन्यास लिखे जाते थे जिनमें सामाजिक तथा जासूसी दोनों ही प्रकार के उपन्यास होते थे । आम तौर पर बॉलीवुडिया फ़िल्मी अंदाज़ में लिखे जाने वाले ऐसे अनेक सामाजिक उपन्यासों में भी दहेज की समस्या को विषय-वस्तु बनाया जाता था किन्तु परिणाम वही रहता था - समस्या का सतही विश्लेषण एवं प्रस्तुतीकरण ।

इसी समयावधि में वेद प्रकाश शर्मा नामक एक युवा लेखक ने हिंदी के पाठक-वर्ग में अपनी एक पृथक् पहचान बनाई । वे रहस्यकथाओं को भी सामाजिक परिवेश में ढालकर इस प्रकार रोचक एवं प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते थे कि उनके उपन्यासों को जासूसी उपन्यास पढ़ने वालों के साथ-साथ वे भी पढ़ते थे जो जासूसी उपन्यासों के नाम से ही नाक-भौं सिकोड़ते थे । यही कारण था कि उनके पाठकों में असंख्य महिलाएं भी थीं । दहेज की दावानल जैसी सामाजिक कुरीति पर अपनी लेखनी द्वारा सबसे सशक्त प्रहार उन्होंने ही किया ।

दहेज के लोभ में अपनी बहू की बलि चढ़ा देने वाले एक लालची एवं क्रूर ससुराली परिवार की कहानी वेद प्रकाश शर्मा ने अपने उपन्यास 'बहू माँगे इंसाफ़' में लिखी । इस उपन्यास को असाधारण लोकप्रियता प्राप्त हुई तथा बहू की आवाज़ (१९८५) फ़िल्म इसी उपन्यास को आधार बनाकर निर्मित की गई थी । लेकिन जिन दिनों यह समस्या अपने चरम पर थी, उन्हीं दिनों कई निर्दोष ससुराल वालों को दहेज के लिए बहू की हत्या के झूठे आरोप में फँसा देने के भी मामले सामने आया करते थे । वेद प्रकाश शर्मा ने समस्या के इस विपरीत पक्ष को भी समझा तथा इसके आधार पर 'दुल्हन माँगे दहेज' नामक उपन्यास लिखा ।

लेकिन अपने इस आलेख में मैं न 'बहू माँगे इंसाफ़' की चर्चा कर रहा हूँ, न ही 'दुल्हन माँगे दहेज' की । मैं चर्चा कर रहा हूँ वेद जी द्वारा उपर्युक्त दोनों उपन्यासों के प्रकाशन के कई वर्षों के उपरान्त लिखे गए एक अनूठे कथानक की जिसका आधार दहेज की कुरीति ही थी लेकिन इसे एक पूर्णरूपेण नवीन तथा सर्वथा अछूते कोण से देखा गया था । दो भागों में विभाजित इस कथानक के उपन्यासों के नाम हैं 'दहेज में रिवॉल्वर' तथा 'जादू भरा जाल' ।
वेद जी ने इस कथानक में अब तक सदा उपेक्षित रहे इस तथ्य पर ध्यान दिया है कि जब किसी आर्थिक रूप से दुर्बल अथवा साधारण स्थिति के परिवार की कन्या के विवाह के लिए अपने आप को मानो जीते-जी मारकर उसके माता-पिता, भाई आदि धन जुटाते हैं एवं उसके दहेज-लोलुप ससुराल-पक्ष के आगे बार-बार झुकते तथा अपमानित होते हैं तो उसके कोमल मन पर क्या बीतती है । क्या वह निर्दोष कन्या अपने ससुराल में जाकर स्नेह, सम्मान एवं सेवा की गंगा बहा सकती है ? क्या वह अपने बाबुल, माता, भाई आदि को दहेज के लिए ख़ून के आँसू रूलाने वालों को क्षमा करके उनके साथ सहज भाव से रह सकती है ? क्या वह दहेज-लोभी सास-ससुर को माता-पिता की तरह सम्मान दे सकती है ? ननद-देवर की स्नेहमयी भाभी बन सकती है ? पति को अपनी देह सौंंपकर उसके अंश को अपनी कोख में धारण कर सकती है ? क्या वह एक सामान्य मानवी नहीं है जो उस घर के लोगों के दुख से दुखी न हो जिसमें उसका बचपन एवं कैशोर्य बीता है, जहाँ खेलकर एवं ढेर सारा दुलार पाकर एक लाडली बेटी के रूप में वह बड़ी हुई है ? वेद जी की इस कहानी की नायिका सुधा का स्पष्ट उत्तर है - नहीं !

'दहेज में रिवॉल्वर' से आरम्भ हुए इस कथानक के दहेज-लोलुप परिवार के मुखिया हैं - गिरधारीलाल जो कि एक व्यापारी हैं । उनके परिवार में हैं उनकी धर्मपत्नी कमला देवी, उनके दो पुत्र - पंकज और बादल तथा उनकी अविवाहित पुत्री बिंदु । वे अपने बड़े पुत्र पंकज की नवविवाहिता पत्नी सुनयना की दहेज न लाने के कारण एक गुंडे कुंदा के द्वारा इस प्रकार हत्या करवा देते हैं कि वह सुनियोजित हत्या नहीं लगती । उन्होंने सुनयना के परिवार वालों से कोई दहेज नहीं माँगा था क्योंकि उन्हें बिना माँगे ही अच्छा-ख़ासा दहेज मिल जाने की आशा थी जो कि पूरी नहीं हुई थी । अब वे विधुर पंकज का रिश्ता एक सेवानिवृत्त अध्यापक शारदा प्रसाद की पुत्री सुधा से तय करते हैं और विवाह (यहाँ तक कि सगाई) होने से भी पहले दहेज की लम्बी-चौड़ी माँगें उनके सामने रख देते हैं । बेचारे निर्धन शारदा प्रसाद और उनकी धर्मपत्नी दुर्गा देवी जैसे-तैसे घर का सामान और पुश्तैनी आभूषण तक बेचकर और कर्ज़ का बोझ सर पर लादकर उनका सुरसा जैसा फैला हुआ लोभी मुँह भरते रहते हैं लेकिन वे यह नहीं जान पाते कि उनकी यह हालत देखकर सुधा के मन पर क्या बीत रही है, अपने माँ-बाप का यह हाल देखकर वह किस कदर तड़प रही है और अंदर-ही-अंदर घुट रही है ।

शारदा प्रसाद ने अपने पुत्र (और सुधा के बड़े भाई) बलदेव को उसकी गुंडागर्दी के कारण घर से निकाल दिया हुआ है लेकिन यह बात केवल सुधा जानती है कि उसका भाई केवल उसके सम्मान की रक्षा के लिए ही अपनी शिक्षा अधूरी छोड़कर अपराध के मार्ग पर उतरा है क्योंकि कुंदा की सुधा पर बुरी नज़र है । बलदेव अब बल्लम नाम के गुंडे के रूप में जाना जाता है और उसका परछाईं जैसा साथी है पोपट जो सुधा को अपनी सगी बहन जैसी ही मानता है । इधर दिवंगत सुनयना का भाई विनय पुलिस इंस्पेक्टर बन चुका है और वह बरसों पहले शारदा प्रसाद का शिष्य रह चुका है । उसे शारदा प्रसाद द्वारा सगाई की रस्म तक होने से पहले गिरधारीलाल के परिवार को भारी-भरकम दहेज दे दिया जाने से संदेह होता है कि कहीं उसकी बहन सुनयना की असमय मृत्यु उसके विवाह में दहेज न दिए जाने के कारण तो नहीं हुई थी । अब वह चुपके-चुपके इस बाबत अपनी जाँच-पड़ताल शुरु कर देता है ।

लेकिन सगाई तक होने से पहले दे दिए गए कीमती दहेज को पाकर ख़ुशी से नाच रहे गिरधारीलाल और उनके बीवी-बच्चों के तब छक्के छूट जाते हैं जब दहेज के सामान में से एक रिवॉल्वर निकलता है । यह वही रिवॉल्वर है जिसे कुंदा को देकर उन्होंने उससे सुनयना की हत्या करवाई थी । इधर यह सस्पेंस उनका हाल बुरा कर रहा है कि वह रिवॉल्वर दहेज के सामान में कहाँ से आ गया, उधर कुंदा जेल में रहते हुए भी उन्हें ब्लैकमेल करना शुरु कर देता है जो कि उनके लिए एक दूसरा सरदर्द बन जाता है । 

सगाई भी होती है, विवाह भी । लेकिन सुधा का नया-नवेला पति पंकज और ससुराल वाले उसके व्यवहार को देखकर भौंचक्के रह जाते हैं । वह न केवल अपने ससुराल वालों को आस-पड़ोस वालों के सामने अपमानित करती है बल्कि अपने ससुराल वालों की ऐसी तस्वीरें (पेंटिंगें) बनाने लगती है जिनमें उन्हें मरते हुए दिखाया जाता है । अचानक इस परिवार के सदस्यों की उसी ढंग से हत्याएं होने लगती हैं जिस ढंग से सुधा द्वारा रचित पेंटिंगों में दर्शाया जाता है । हत्याओं का यह सिलसिला इस कथानक के दूसरे भाग 'जादू भरा जाल' में तब तक चलता है जब तक इस परिवार के सभी सदस्य काल के गाल में नहीं समा जाते । इसी सिलसिले के दौरान कुंदा भी मारा जाता है । 

जहाँ तक इस कथानक के रहस्य का प्रश्न है, यह अगाथा क्रिस्टी के क्लासिक उपन्यास 'एंड दैन देयर वर नन' से प्रेरित लगता है । लेकिन वस्तुतः यह कथानक रहस्य-प्रधान न होकर भावना-प्रधान है । मुख्यतः यह सुधा की भावनाओं पर आधारित है जो कि विवाह करके किसी की पत्नी और किसी दूसरे परिवार की बहू बनने से पहले अपने माता-पिता की पुत्री है, अपने भाई की बहन है । अपने विवाह के लिए चादर से बाहर पैर फैलाकर जैसे-तैसे दहेज जुटा रहे अपने साधनहीन माता-पिता की दुर्दशा उसके मन में आग भर देती है । परिणामतः वह एक पारम्परिक पुत्रवधू न बनकर एक विद्रोही बहू के रूप में अपने ससुराल में कदम रखती है और फिर अपने पति और ससुरालियों से अपने माता-पिता को सताने के गिन-गिनकर बदले लेती है ।

उपन्यास में माता-पिता की अपनी बेटी-बेटे के प्रति भावनाओं तथा भाई-बहन के बीच के प्रेम को भी दर्शाया गया है । सुधा को केवल अपने सगे भाई बलदेव का ही प्रेम नहीं मिलता, बलदेव का मित्र पोपट और साथ ही शारदा प्रसाद को अपने पिता समान समझने वाला उनका शिष्य तथा दिवंगत सुनयना का भाई विनय भी उसे अपनी बहन की ही भाँति स्नेह करते हैं । घर से निकाल दिए गए बलदेव की अपनी बहन की शादी में शामिल न हो पाने की कसक मन को झकझोर देती है । भावनाओं के कुशल चितेरे वेद प्रकाश शर्मा ने इन सभी भावनाओं को बड़ी कुशलता से दोनों उपन्यासों के पृष्ठों पर उकेरा है । 

लेकिन भावनाओं का चरम इस उपन्यास के अंतिम दृश्य में आता है जब कथानक समाप्त हो चुका है, हत्याओं का रहस्य खुल चुका है, सभी दहेज-लोभी मर चुके हैं और सुधा अपने ससुराल की कोठी में अकेली रह गई है । तब जो कुछ भी उसकी (अब की) भावनाओं के बारे में लेखक ने लिखा है, वह मेरे जैसे किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के हृदय को आलोड़ित कर देने के लिए पर्याप्त है । उपन्यास का अंतिम अनुच्छेद और उसकी अंतिम पंक्ति पढ़ चुकने के बाद मन में हूक-सी उठती है और कथानक का यह अंत लम्बे समय तक पाठक के साथ बना रहता है ।  

पारंपरिक भारतीय परिवारों में कन्या को पराया धन समझा जाता है और यही बात कन्याओं के मन में भी बाल्यकाल से ही भरी जाती है । इसलिए कन्या का विवाह उसके परिजनों को ही नहीं, स्वयं उसे भी अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य लगता है जिसके पूरा हो जाने पर मानो कोई बड़ा भार कंधों (और मन) से उतर जाता है, कोई गंतव्य मिल जाता है, कोई लक्ष्य प्राप्त हो जाता है । लेकिन वेद प्रकाश शर्मा के ये उपन्यास इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि पराया धन समझी जाने वाली कन्या भी अपने जन्म के परिवार से उसी तरह जुड़ी होती है जिस तरह माँस से नाखून जुड़ा होता है । दहेज के लिए अपने परिवार को सताने वालों के लिए वह अपने मन में ज़बरदस्ती सद्भावनाएं नहीं पाल सकती । वह भी इंसान है, पत्थर नहीं ।

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