Tuesday, November 24, 2020

jmathur_swayamprabha: इंसाफ़ का सूरज

jmathur_swayamprabha: इंसाफ़ का सूरज: अभी ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा है जब मैंने स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास ' जिगर का टुकड़ा ' पर अपने ख़यालात को अल्फ़ाज़ में ढाला था ...

Monday, November 23, 2020

इंसाफ़ का सूरज

अभी ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा है जब मैंने स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास 'जिगर का टुकड़ा' पर अपने ख़यालात को अल्फ़ाज़ में ढाला था और उपन्यास में शामिल तंत्र-मंत्र की बातों पर भी तबसरा किया था । हाल ही में 'जिगर का टुकड़ा' से तक़रीबन नौ-दस साल पहले लिखे गए उनके एक और उपन्यास 'इंसाफ़ का सूरज' को पढ़ने का इत्तिफ़ाक़ हुआ तो मैं यह देखकर दंग रह गया कि इस बेहतरीन उपन्यास में भी तंत्र-मंत्र का ज़िक्र है हालांकि वह उतना ज़्यादा नहीं है जितना कि 'जिगर का टुकड़ा' में है और कहानी में उसकी अहमियत भी कम ही है । बहरहाल इसमें कोई शक़ नहीं कि 'इंसाफ़ का सूरज' भी वेद जी के शानदार उपन्यासों में शामिल है और किसी भी सस्पेंस-थ्रिलर उपन्यासों के शौक़ीन को इसे पढ़े बिना नहीं रहना चाहिए । 

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा का लेखकीय जीवन गुणवत्ता के निकष पर परखा जाए तो सांख्यिकी के सममितीय वितरण (symmetrical distribution) की मानिंद रहा था अर्थात् एकरूप ढंग से उच्चतर होते हुए चरम सीमा पर पहुँचकर उसी प्रकार निम्नतर होता गया तथा अंत में उसी स्तर पर आ गया जिस स्तर पर आरंभ में था । उन्होंने निहायत मामूली उपन्यासों से लिखना शुरु करके आगे चलकर एक-से-एक ज़बरदस्त उपन्यास लिखे लेकिन चोटी पर पहुँचने के बाद फिर से नीचे आते हुए वे मामूली-से-मामूली उपन्यास पेश करते गए जिनमें से कई पर नक़ली (किसी और के लिखे हुए) होने का भी शुबहा होता है । उनका स्वर्णकाल सत्तर के दशक के अंत से लेकर नब्बे के दशक के आरंभ तक माना जा सकता है । अस्सी का दशक तो पूरी तरह उन्हीं का था जब वे लुगदी साहित्य या पल्प फ़िक्शन के बेताज बादशाह माने जाते थे । 'इंसाफ़ का सूरज' उसी समयकाल में सिरजा गया था । 

वेद जी उपन्यासों के नामकरण में भी चतुर थे तथा अपने प्रत्येक उपन्यास का नाम बड़ा आकर्षक रखते थे । प्रायः उनके उपन्यास के नाम का सम्बन्ध उसके कथानक से होता था लेकिन इस उपन्यास में संभवतः उन्हें रखने के लिए कोई ऐसा नाम नहीं सूझा जो कथावस्तु की ओर संकेत करता हो । इसलिए उन्होंने उपन्यास के न्यायप्रिय एवं कर्तव्यपरायण नायक के नाम (सूरज) को रेखांकित करते हुए उपन्यास का नाम 'इंसाफ़ का सूरज' रख दिया जबकि उपन्यास की कहानी से इस शीर्षक का कोई लेना-देना नहीं है । पर उपन्यास है कमाल का । पढ़कर आनंद आ गया ।

'इंसाफ़ का सूरज' कहानी कहता है बम्बई (अब मुम्बई) से कोई पचास किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटे-से कस्बे सरूरपुर में स्थित ठाकुर गजेन्द्रसिंह की हवेली की जो 'ठाकुर की हवेली' के नाम से प्रसिद्ध है । ठाकुर गजेन्द्रसिंह को दिवंगत हुए पाँच वर्ष हो चुके हैं । अब हवेली में उनकी विधवा सुलोचना देवी अपने दो पुत्रों - श्रीकांत तथा शूरवीर के साथ रहती हैं । ज्येष्ठ पुत्र श्रीकांत विवाहित है तथा उसकी पत्नी रमा एक आठ वर्षीय पुत्र की माता है जो दुर्भाग्यवश पैर से विकलांग हो गया है । समस्या कनिष्ठ पुत्र शूरवीर को लेकर है क्योंकि उसकी दो दुलहनों की हत्या हो चुकी है । सुलोचना देवी अब उसका तीसरी बार विवाह करने जा रही हैं मंजू नामक युवती से जिसके लिए उन्हें उसके कथित मामा बिज्जू ने बताया है कि वह बिना माता-पिता की अनाथ युवती है तथा जिसका मामा के अतिरिक्त इस संसार में कोई नहीं है । विवाह को रोकने का प्रयास पुलिस भी करती है तथा प्रकृति भी । वैवाहिक कर्मकांड के मध्य ही भीषण आँधी-तूफान-बारिश आकर विघ्न डालते हैं तथा कई अन्य अपशगुन भी होते हैं । लेकिन विवाह हो ही जाता है ।  

विवाह के उपरांत यह देखकर मंजू का मस्तिष्क घूम जाता है कि उसके ससुराल के विभिन्न व्यक्ति उसे एकदूसरे से सावधान करते हैं तथा उसके पति की पहली दो पत्नियों की मृत्यु की पृथक्-पृथक् व्याख्या करते हैं । परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त घर का एक कुबड़ा नौकर बबरू भी उसे सावधान करने वालों तथा हवेली की दो पूर्व वधुओं की मृत्यु की कहानी सुनाने वालों में सम्मिलित है । ऐसे में मंजू को लगने लगता है कि वह तो किसी पर भी विश्वास नहीं कर सकती तथा उसके प्राण संकट में हैं । लेकिन उसका अपना चरित्र तथा गतिविधियां भी रहस्यमय हैं । हवेली में पहले भी भुतहा घटनाएं घटती रही हैं तथा अब फिर से वैसा होने के कारण वह बदनाम होती जा रही है । सुलोचना देवी के विचार से ऐसा तंत्र-मंत्र द्वारा करवाया जा रहा है तथा करवाने वाला है उनके पति का पुराना मित्र तथा अब शत्रु जिसका नाम वीर बहादुर है एवं जो बम्बई (मुम्बई) में रहता है । उसकी काट भी वह तंत्र-मंत्र द्वारा ही करवाना चाहती हैं जिसके लिए वे चाण्डाल नामक तथाकथित तांत्रिक की सहायता लेती हैं ।

इधर पुलिस के उप-अधीक्षक त्रिपाठी साहब हवेली की दुलहनों की हत्या के मामले की छानबीन अपने सर्वाधिक विश्वस्त एवं सुयोग्य इंस्पेक्टर सूरज को सौंपते हैं जिसकी वे सदा 'इंसाफ़ का सूरज' कहकर प्रशंसा करते हैं । सूरज अपने साथी सब-इंस्पेक्टर खरे के साथ मिलकर मामले की तह में घुसने लगता है लेकिन तभी हवेली में हो रही डरावनी घटनाओं से घबराकर ठाकुर परिवार हवेली को ख़ाली करके अपने फ़ॉर्म हाउस पर रहने चला जाता है । इन डरावनी घटनाओं में सबसे ज़्यादा ख़ौफ़नाक और दहला देने वाली घटना है बबरू की हत्या । 

ख़ाली हवेली में घुस आता है अपराधियों का एक दल जिसके सदस्य अपने वास्तविक नामों के स्थान पर अपनी विशेषताओं के कारण पशुओं के नाम से जाने जाते हैं - एक चीता कहलाता है, एक बन्दर, एक हिरन, एक तोता; और इस दल के मुखिया को करकेंटा कहा जाता है । ख़ाली हवेली में क्या करना चाहते हैं वे ? क्या है उनका निशाना ? एक  रहस्यमयी 'लोमड़ी' इन लोगों के भी पीछे पड़ी है, वह कौन है ? और क्या हवेली की बहुओं की मौत से इन लोगों का कोई ताल्लुक है ? इन सभी सवालों के जवाब तथा कहानी के सभी रहस्यों का ख़ुलासा पाठकों के सामने भी उसी तरह होता जाता है जिस तरह 'इंसाफ़ के सूरज' के सामने । उसके सामने राज़ उसकी अपनी खोजबीन से खुलते हैं तो पाठकों के सामने उपन्यास के पन्नों को पलटते जाने से । 

पुराने ज़माने में राजा-महाराजा-नवाब वग़ैरह तथा ज़मींदार-जागीरदार जैसे रईस लोग जब हवेलियां बनवाते थे तो उनमें तहख़ाने होते थे, सुरंगें होती थीं, छुपे हुए रास्ते होते थे और होता था एक रहस्य का माहौल । इस उपन्यास की हवेली भी ऐसी ही है जिसके कारण वह भी उपन्यास का वैसा ही अभिन्न एवं जीवंत पात्र है जैसे कि इसके मानवीय पात्र । उपन्यास में यह बहुत अच्छे-से स्थापित किया गया है कि वास्तविक संकट से अधिक व्यक्ति को उसके विचार एवं आशंकाएं भयभीत करती हैं । यह भी रेखांकित किया गया है कि व्यक्तियों के विचार वास्तविक तथ्यों से अधिक उनकी अपनी धारणाओं से प्रभावित होते हैं । इन्हीं कारणों से लोग एकदूसरे पर संदेह करते हैं तथा भ्रमित रहते हैं । 

'इंसाफ़ का सूरज' में वेद प्रकाश शर्मा की लेखनी का जादू प्रथम दृश्य से लेकर अंतिम दृश्य तक बना रहता है । उपन्यास के आख़िर में भी वे पाठकों को एक ज़ोरदार झटका दे ही देते हैं । ऐसे ही झटकों के लिए वे अस्सी के दशक में 'झटका स्पेशलिस्ट' के नाम से मशहूर हो गए थे । सरल हिंदी में लिखे गए इस उपन्यास को एक बार यदि आपने पढ़ना आरंभ कर दिया तो इसे अंत तक पढ़े बिना आप रह ही नहीं सकेंगे । उपन्यास में कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर विश्वास न किया जा सके । सब कुछ तार्किक ही है । सब-इंस्पेक्टर खरे के माध्यम से कुछ हास्य भी उत्पन्न किया गया है । अगर आप जानना चाहते हैं कि क्यों अस्सी के दशक में हिंदी के पाठक वेद प्रकाश शर्मा की कलम के दीवाने हो गए थे तो 'इंसाफ़ का सूरज' पढ़ लीजिए । जान जाएंगे । 

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Tuesday, November 3, 2020

पिता-पुत्र संबंध पर बनीं श्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्में

आज (तीन नवम्बर को) मेरे पुत्र सौरव का जन्मदिन है । सामान्यतः माता एवं पुत्र के तथा पिता एवं पुत्री के भावनात्मक जुड़ाव ही विमर्श का विषय बनते हैं क्योंकि प्रायः ऐसा देखा गया है कि भारतीय परिवारों में पुत्री अपने पिता की लाड़ली होती है जबकि पुत्र अपनी माता का लाड़ला होता है । लेकिन पिता एवं पुत्र के मध्य का संबंध भी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं । कई बार पिता अपने पुत्र के प्रति अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त नहीं करते (या बहुत कम करते हैं) लेकिन योग्य पुत्र अपने पिता का गौरव होता है, इसमें कोई संदेह नहीं । पिता के अपनी भावनाओं को मन में दबा लेने तथा पुत्र के साथ संवादहीनता के कारण कभी-कभी पुत्र अपने पिता को ग़लत भी समझने लगते हैं लेकिन अधिकांश उदाहरणों में सत्य यही होता है कि जहाँ एक सफल एवं समर्थ पिता अपने पुत्र को अपने उत्तराधिकारी के रूप में देखना चाहता है, वहीं एक असफल एवं विवश पिता अपने पुत्र को जीवन की प्रत्येक अवस्था में अपने से बेहतर देखना चाहता है तथा यही कामना करता है कि जो कुछ उसने अपने जीवन में भुगता है, उसके पुत्र को न भुगतना पड़े; वह सबल एवं सक्षम बने, अपनी योग्यतानुसार भौतिक जीवन में सब कुछ प्राप्त करे, कभी किसी अभाव का मुख न देखे और सदा सर उठाकर ही जिये, ज़िन्दगी में कभी न हारे । ऐसा हर बाप यही चाहता है कि मेरे ख़्वाब तो पूरे न हुए लेकिन मेरे बेटे के ज़रूर पूरे हों । 

बॉलीवुड ने इस जज़्बाती रिश्ते पर कई फ़िल्में बनाई हैं जिनमें से कुछ बेहतरीन फ़िल्मों की चर्चा मैं इस आलेख में करूंगा । यूँ तो फ़ॉर्मूलाबद्ध फ़िल्में बनाने वाले इस उद्योग ने ऐसी असंख्य पारिवारिक फ़िल्में बनाई हैं जिनमें पिता-पुत्र के मध्य कहीं प्रेम का बाहुल्य तो कहीं तनाव दिखाया गया है । ऐसी स्थापित ढर्रे की फ़िल्मों में पिता-पुत्र तनाव का कारण प्राय: पिता अथवा पुत्र का अपराधी या दुराचारी होना दिखाया गया है । दुनिया (१९६८) तथा त्रिशूल (१९७८) जैसी फ़िल्मों में यह भी दिखाया गया है कि पिता या पुत्र या दोनों को ही एक-दूसरे के साथ अपना संबंध ज्ञात नहीं है । स्कूल मास्टर (१९५९), ज़िन्दगी (१९७६), अवतार (१९८३) तथा बाग़बां (२००३) जैसी फ़िल्मों में स्वार्थी एवं कृतघ्न पुत्र दिखाए गए हैं जो अपने निहित स्वार्थ के लिए पिता को (तथा माता को भी) कष्ट देते हैं तथा आगे चलकर कर्मठ पिता अपने जीवट एवं परिश्रम से पुनः अपना भाग्योदय करते हैं जो कि परजीवी पुत्रों के मुख पर तमाचे सरीखा सिद्ध होता है । लेकिन ऐसी फ़िल्में बहुत कम बनी हैं जिनमें कथावस्तु को पिता-पुत्र के भावात्मक संबंध पर ही  केन्द्रित रखा गया हो (फ़ोकस किया गया हो) । ऐसी कुछ उत्कृष्ट हिन्दी फ़िल्में हैं :

१. सम्बंध (१९६९): प्रदीप कुमार तथा देब मुखर्जी को पिता एवं पुत्र के रूप में प्रस्तुत करती इस फ़िल्म को जिन भावुक लोगों ने देखा है, उनके नेत्र अवश्य ही आर्द्र हो उठे होंगे । भाग्य के झंझावात पिता, माता (अनिता गुहा) एवं पुत्र को पृथक् कर देते हैं जिसके उपरान्त पुत्र अपने एकाकी जीवन में बहुत कुछ सह जाता है । लेकिन उसके पिता कोई बुरे व्यक्ति नहीं हैं । किस्मत की आँधी ही ऐसी चलती है कि सब कुछ बिखर जाता है जिस पर किसी का भी कोई बस नहीं चलता । लेकिन आख़िर पिता और पुत्र मिलते हैं । कुछ समय उन्हें एकदूसरे को पहचानने में लगता है लेकिन भावनाओं से भरा पिता अपने पुत्र को बिना पहचाने भी उसके दुख को जान लेता है, अनुभव कर लेता है एवं बांटने का प्रयास करता है । फ़िल्म का अंत कोई अधिक प्रभावी नहीं लेकिन बिछोह के उपरांत जो कुछ घटता है, वह फ़िल्म देखने वालों को कथा के पात्रों से अभिन्न रूप से जोड़ देता है । प्रदीप कुमार एवं देब मुखर्जी दोनों ने ही हृदयस्पर्शी अभिनय किया है । फ़िल्म में 'अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पे भी कुछ डालो, अरे ओ रोशनी वालों' तथा 'चल अकेला चल अकेला चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला' जैसे कालजयी गीत हैं ।

२. ज़िंदा दिल (१९७५): प्राण तथा ऋषि कपूर की प्रमुख भूमिकाओं वाली यह फ़िल्म व्यावसायिक रूप से बुरी तरह से असफल रही थी लेकिन इसकी विषय-वस्तु बहुत अच्छी है । पटकथा एवं निर्देशन भी यदि अच्छे होते तो कमाल की फ़िल्म बनती क्योंकि बाप-बेटे की भूमिकाओं में प्राण और ऋषि कपूर ने पटकथा से ऊपर उठकर शानदार अभिनय किया है और फ़िल्म को एक बार देखने लायक तो बना ही दिया है । पिता अपने दो पुत्रों में भेदभाव करता है क्योंकि वह जानता है कि जिस पुत्र के प्रति वह पक्षपातपूर्ण ढंग से अन्याय करता है, वह ज़िंदा दिल है जबकि दूसरा पुत्र मानसिक रूप से दुर्बल है जिसके कारण उसकी अतिरिक्त देखभाल करनी होती है । इस फ़िल्म में कठोर बाप और ज़िंदा दिल बेटे के बीच के कुछ दृश्य तो ऐसे हैं कि बरबस ही मुँह से 'वाह' निकल पड़ती है ।

३. शक्ति (१९८२): दिलीप कुमार को पिता तथा अमिताभ बच्चन को पुत्र के रूप में दर्शाती रमेश सिप्पी की यह फ़िल्म चाहे व्यावसायिक रूप से कम चली लेकिन पिता-पुत्र की भूमिकाओं में इन दोनों ही असाधारण कलाकारों ने जान डाल दी । अपने कर्तव्य के प्रति अति-सजग पिता अपने पुत्र से प्रेम तो बहुत करता है लेकिन अभिव्यक्त नहीं करता जिसका परिणाम यह निकलता है कि पुत्र अपने पिता को ग़लत समझने लगता है एवं अनायास ही भावनात्मक रूप से एक अपराधी के निकट आ जाता है जबकि पिता से दूर होता चला जाता है । यह दुखांत फ़िल्म भावनाओं की अभिव्यक्ति के महत्व को रेखांकित करती है एवं दिलीप कुमार तथा अमिताभ बच्चन, दोनों की ही श्रेष्ठ फ़िल्मों में गिनी जाती है । इससे कुछ-कुछ मिलती-जुलती फ़िल्म 'स्वर्ग यहाँ नरक यहाँ' (१९९१) थी जिसमें मिथुन चक्रवर्ती ने पिता और पुत्र की दोहरी भूमिका निभाई थी लेकिन वह फ़िल्म ख़राब पटकथा एवं कमज़ोर निर्देशन के कारण बोझिल बन गई तथा दर्शकों को अधिक प्रभावित नहीं कर सकी । 

४. शराबी (१९८४): अमिताभ बच्चन को ही बेटे के रूप में पेश करती प्रकाश मेहरा की यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर अत्यधिक सफल रही थी । व्यवसाय में डूबे पिता की भूमिका प्राण ने निभाई थी ।  मातृहीन पुत्र अपने पिता की उपेक्षा के कारण शराबी बन जाता है जिसे स्नेह केवल अपने पिता के एक कर्मचारी मुंशी जी (ओम प्रकाश) से मिलता है । इस कथा में पिता अपने पुत्र की भावनाओं से अनभिज्ञ रहता है एवं उसे ग़लत समझता है । मुंशी जी का निधन शराबी पुत्र को और भी एकाकी बना देता है किन्तु अंत में पिता को अपनी भूल अनुभव होती है तथा फ़िल्म 'शक्ति' के विपरीत सुखद ढंग से समाप्त होती है । बेहद मनोरंजक यह फ़िल्म यकीनन देखने लायक है जिस में प्राण और अमिताभ बच्चन, दोनों का अभिनय कमाल का है ।

५. एहसास (२००१): ज़िन्दगी को बहुत नज़दीक से देखने वाले निर्देशक महेश मांजरेकर ने यह उत्कृष्ट फ़िल्म बनाई थी जिसके साथ न तो दर्शकों ने न्याय किया, न ही समीक्षकों ने । अपनी ज़िन्दगी में हारने वाला पिता (सुनील शेट्टी) अपने पुत्र (मयंक टंडन) को अपने जैसा नहीं बनते देखना चाहता तथा उसे उसके जीवन में विजेता बनाने के लिए वह उसे इतने कठोर अनुशासन में रखता है कि वह बालक अपने पिता को ग़लत समझने लगता है । उसके पिता उसे कितना प्यार करते हैं, यह बात वह बालक फ़िल्म के अंत में जाकर समझ पाता है । फ़िल्म को पूर्ण रूप से यथार्थपरक रखा गया है, यहाँ तक कि क्लाईमेक्स में भी फ़िल्मी फ़ॉर्मूला न अपनाकर वही दिखाया गया है जो उन परिस्थितियों में संभव था । दिल की गहराई में उतर जाने वाली यह फ़िल्म जिन माता-पिताओं ने नहीं देखी है, मैं उनसे यही कहूंगा कि इसे ज़रूर देखें । सुनील शेट्टी और मयंक टंडन, दोनों ही अपने काम से फ़िल्म देखने वालों का दिल जीत लेते हैं । एक ऐसी ही अच्छी फ़िल्म गोविंद निहलानी द्वारा निर्देशित 'विजेता' (१९८२) थी जिसमें पिता की भूमिका शशि कपूर ने तथा पुत्र की भूमिका उनके वास्तविक पुत्र कुणाल कपूर ने निभाई थी लेकिन पिता-पुत्र संबंध उसकी कथा का केवल एक अंश ही था । 

६. उड़ान (२०१०): 'उड़ान' एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें पिता का चरित्र विशुद्ध नकारात्मक है । मन को झकझोर देने वाली यह फ़िल्म किशोर पुत्र के अपने क्रूर पिता की बेड़ियों से मुक्त होकर जीवन में स्वतंत्र उड़ान भरने की स्थिति में पहुँचने की गाथा है जिसमें पुत्र के यौवन एवं साहस के समक्ष अंततः पिता को पराजय स्वीकार करनी पड़ती है । समीक्षकों द्वारा मुक्त-कंठ से सराही गई एवं अनेक पुरस्कार जीतने वाली इस फ़िल्म में पुत्र की प्रेरक भूमिका रजत बारमेचा ने एवं पाषाण-हृदय पिता की भूमिका रोनित रॉय ने निभाई है और दोनों ने ही अविस्मरणीय अभिनय किया है । मनोज बाजपेयी के सुन्दर अभिनय से सजी 'गली गुलियां' (२०१८) में पिता-पुत्र (नीरज काबी-ओम सिंह) का ट्रैक भी कुछ-कुछ ऐसा ही है लेकिन 'गली गुलियां' अपनी एक अलग श्रेणी की फ़िल्म है और यह बात उसे देखे बिना नहीं समझी जा सकती । 

७. पटियाला हाउस (२०११): क्रिकेट के साथ-साथ इंग्लैंड में नस्लभेद की समस्या की पृष्ठभूमि में बनाई गई निखिल आडवाणी की यह फ़िल्म यदि रटे-रटाये फ़ॉर्मूलों का लोभ संवरण कर पाती तो इसकी गुणवत्ता बहुत उच्च होती । तथापि पिता ऋषि कपूर एवं आज्ञाकारी पुत्र अक्षय कुमार के बीच के उलझे हुए संबंंध को यह फ़िल्म बहुत प्रभावी ढंग से प्रदर्शित करती है जिसमें दोनों ही कलाकारों का अभिनय अत्यन्त प्रशंसनीय रहा है । पिता की भावनाएं आहत न हों, इसके लिए पुत्र अपनी उमंगों का दम घोट देता है एवं अपनी युवावस्था के स्वप्नों का बलिदान कर देता है । लेकिन वर्षों के अंतराल के उपरांत जब उसे अपनी प्रतिभा के साथ न्याय करने का अवसर मिलता है तो वह दुविधा में पड़ जाता है - एक ओर उसका अपना जीवन है, दूसरी ओर पिता की भावनाएं । जब वह पिता की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाता है तो पहले तो पिता उसे ग़लत ही समझता है लेकिन फिर उसके अंदर आया बदलाव फ़िल्म को ख़ुशनुमा ढंग से ख़त्म करता है । 

८. फ़रारी की सवारी (२०१२): आज आदर्शवादी लोग ढूंढे नहीं मिलते । ऐसे में एक आदर्शवादी पिता एवं उसके वैसे ही आदर्शवादी पुत्र की यह कथा न केवल भरपूर मनोरंजन करती है वरन मर्म को स्पर्श करती है तथा एक फ़ीलगुड अनुभूति करवाती है, यह आशा बंधाती है कि इस स्वार्थाधारित समाज तथा मूल्यों के क्षरण के युग में भी अभी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है । आदर्शवादी लोग सदा तथाकथित व्यावहारिक लोगों से हारें, यह आवश्यक नहीं । एक निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के बालक के स्वप्न भी साकार हो सकते हैं जिसके लिए उसके पिता (तथा दादा क्योंकि फ़िल्म में तीन पीढ़ियों वाला परिवार है जिसमें सभी पुरुष हैं) का अपने आदर्शों से समझौता करना आवश्यक नही । बड़े पहले स्वयं आदर्शों पर चलें, तभी वे बालकों को आदर्शों पर चलने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, इस सत्य को यह फ़िल्म स्पष्ट रूप से उद्घाटित करती है । सभी कलाकारों के सजीव अभिनय से ओतप्रोत यह फ़िल्म एक पारसी परिवार में पिता रुस्तम (शर्मन जोशी), पुत्र कायो (ऋत्विक साहोर) तथा पिता के पिता बहराम देबू (बोमन ईरानी) के भावनात्मक संबंधों को दिल को छू लेने वाले ढंग से चित्रित करती है । नन्हा पुत्र ऐसा आदर्शवादी बन चुका है कि अपने सपने को पूरा करने के लिए भी उसे अपने पिता का कोई अनुचित कार्य करना स्वीकार नहीं है । यह फ़िल्म मनोरंजन तथा संदेश, दोनों ही की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है ।

बाप-बेटे के रिश्ते को समझना आसान नहीं लेकिन यह रिश्ता बहुत अहम होता है दोनों ही की ज़िन्दगी में । ऊपर वर्णित फ़िल्में इसका प्रमाण हैं । अपने पुत्र का हित चाहने वाला स्नेहपूर्ण पिता नारियल की भांति भी हो सकता है जिसकी अनुशासनप्रियता के कठोर आवरण में ही उसका अपने पुत्र के प्रति निश्छल प्रेम एवं शुभचिंतन अन्तर्निहित हो । बेटे को सोने का निवाला खिलाने वाले लेकिन शेर की नज़र से देखने वाले बाप ऐसे ही होते हैं । शेष सत्य यही है कि बालक से बड़े होते हुए अपने पुत्र को निहारते समय पिता के मन में यही पंक्तियां चलती रहती हैं - 'तुझे सूरज कहूं या चंदा, तुझे दीप कहूं या तारा, मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राजदुलारा' ।

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Sunday, November 1, 2020

सतर्क भारत – समृद्ध भारत

भारत हो या कोई भी देश, उसकी समृद्धि तभी सुनिश्चित हो सकती है जब उसके नागरिक जागरूक एवं सतर्क हों । यह सतर्कता चाहिए भ्रष्ट तौरतरीकों के विरूद्ध, अनैतिकता एवं असामाजिकता के विरूद्ध, अपराध एवं नियमों और कानून-कायदों के उल्लंघन के विरूद्ध । 

देश बनता है देशवासियों से, देश में निवास करने वाले उसके नागरिकों से । केवल नदियों, पहाड़ों, रेगिस्तानों, मैदानों और ज़मीन से ही देश नहीं बन जाता । देश का निर्माण उसके नागरिक करते हैं । उनका अच्छा या बुरा चरित्र ही देश को महानता के पथ पर आगे बढ़ा सकता है या पतन के गर्त में ढकेल सकता है ।

कौनसा ऐसा देश है जो समृद्ध नहीं होना चाहता ? हमारा भारतवर्ष भी समृद्ध क्यों न हो ? आप कहेंगे कि भारत तो समृद्ध है ही । लेकिन अनेक विद्वान अर्थशास्त्रियों की मानिंद मैं यह कहूंगा कि भारत एक समृद्ध देश है जिसके अधिसंख्य निवासी समृद्धिविहीन हैं तथा देश के विकास  का लाभ उन तक नहीं पहुँच पाता । क्यों ?

इसके कारण को समझना इतना कठिन नहीं है जितना प्रत्यक्षतः लगता है । जब कोई राष्ट्र प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण हो एवं उसके शासकों की नीतियां भी जनकल्याणकारी हों तो जनसामान्य के समृद्ध होने में बाधा एक ही होती है – नीतियों का कार्यान्वयन करने वालों का भ्रष्ट आचरण । इस भ्रष्ट आचरण को ऊर्जा मिलती है उन्हें धन देकर अपने अनुचित (या उचित भी) काम करवाने वालों से ।

एक मामूली खरोंच से बढ़ते- बढ़ते नासूर बन चुका भ्रष्टाचार कोई असाध्य रोग नहीं है । इस रोग का उपचार एक ही है – सतर्कता अथवा जागरुकता । सतर्कता में सम्मिलित है अनुचित कार्य, बात या माँग का विरोध । इस विरोध के रौद्र अथवा हिंसक हो जाने की कोई आवश्यक्ता नहीं है । एक शताब्दी पूर्व ही हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हमें असत्य के सविनय विरोध का मार्ग दिखला चुके हैं । समझने योग्य मुख्य बात है भ्रष्ट व्यक्ति के भ्रष्ट आचरण से असहयोग, उसका अस्वीकरण । हम भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लें तो वह कैसे मिटेगा ? रोगी यदि अपने रोग को  अंगीकार कर ले तो उसका उपचार कैसे होगा ? अधिसंख्य लोगों की मूक स्वीकृति से ही भ्रष्टाचार व्यवस्था में रच-बस जाता है तथा भ्रष्ट व्यक्ति की सोच यह बन जाती है – ‘रिश्वत लेते हुए पकड़े भी गए तो रिश्वत देकर छूट जाएंगे’ । यह मानसिकता ही इस समस्या के मूल में है ।

इस समस्या की गंभीरता के कारण ही १९६४ में केंद्रीय सतर्कता आयोग अस्तित्व में आया । आज सार्वजनिक क्षेत्र के विभिन्न कार्यालयों एवं उपक्रमों में सतर्कता विभाग होते हैं, सतर्कता अधिकारी होते हैं, सतर्कता विभाग द्वारा समय-समय पर दिशानिर्देश दिए जाते हैं जिनका अनुपालन करके विभिन्न आधिकारिक कार्यों में पारदर्शिता एवं स्वच्छता सुनिश्चित की सकती है एवं भ्रष्टाचार को पनपने से रोका जा सकता है । कार्मिकों को जागरूक करने के लिए प्रतिवर्ष सतर्कता सप्ताह मनाया जाता है । किन्तु  ये शासकीय प्रयास भ्रष्टाचार के उन्मूलन हेतु पर्याप्त नहीं हैं । तो क्या किया जाए जिससे व्यवस्था स्वच्छ हो एवं नागरिकों की समृद्धि से राष्ट्र वास्तविक अर्थों में समृद्ध कहला सके ?

सर्वप्रथम तो हम अपने आत्मबल को जागृत करें एवं स्वयं भ्रष्ट अथवा नियम-विरुद्ध आचरण से दूर रहें क्योंकि किसी पापी पर पहला पत्थर फेंकने का अधिकार उसी को है जिसने स्वयं कभी कोई पाप न किया हो । बालकों का चारित्रिक विकास करें जिससे उनकी बाल्यावस्था में ही एक आदर्श समाज की सुदृढ नींव रखी जा सके । कोई पिता अपने बालक से यह न कहे कि बेटा, दुनिया न गोल है, न चौकोर, दुनिया तो चार सौ बीस है । भ्रष्टाचार से पूर्ण असहयोग किया जाए, उसके साथ कभी किसी भी प्रकार का समायोजन न किया जाए । भ्रष्टाचार के संबंध में प्रत्येक  सूचना-प्रदाता (व्हिसल ब्लोअर) को सरकार पूर्ण संरक्षण प्रदान करे ताकि लोग भ्रष्टाचारियों से भयभीत न हों तथा निर्भय होकर अनुचित कार्यकर्लापों के विषय में सक्षम प्राधिकारियों को बिना किसी संकोच के सूचित करें ।

और अंतिम बात है व्यक्ति की अपनी अंतरात्मा । हम सबको धोखा दे सकते  हैं, अपने आप को नहीं । दुनिया की हर अदालत से ऊपर होती है इंसान के ज़मीर की अदालत जिससे कोई भी मुजरिम बरी नहीं हो सकता । ‘ऊपर की कमाई’ का प्रलोभन चाहे जितना बड़ा हो, यदि यह स्मरण रखा जाए कि वह तथाकथित ऊपर की कमाई किसी निर्दोष के ख़ून-पसीने की कमाई की लूट है तो ग़लत काम करते हुए हमारे हाथ अपने आप ही रुक जाएंगे । हमारे एक दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि सरकार द्वारा जनकल्याण के कार्यों हेतु प्रेषित किए गए एक  रुपये में से मात्र पंद्रह पैसे ही वास्तविक लाभार्थियों तक  पहुँच पाते हैं । वह पूरा रुपया उन तक पहुँचे, इसके लिए  हमें सतर्क होना होगा – केवल दूसरों के आचरण के प्रति ही नहीं, अपने आचरण के प्रति भी । तभी देश के कोने-कोने में सच्ची समृद्धि आएगी । एक सतर्क भारत ही एक समृद्ध भारत का आधार बनेगा ।

© जितेन्द्र माथुर २०२० सर्वाधिकार सुरक्षित 


(यह लेख मैंने अपने नियोक्ता संगठन में आयोजित सतर्कता सप्ताह के अंतर्गत निबंध प्रतियोगिता की प्रविष्टि के रूप में लिखा था) 


Wednesday, October 28, 2020

एक फ़िल्म जो आज भी मेरे हताश मन को संबल देती है

इस लेख के शीर्षक में 'एक फ़िल्म' की ओर इंगित किया गया है, अत: स्वाभाविक ही है कि उस फ़िल्म से संबंधित बातें मुझे लिखनी हैं । परंतु मुख्यतः इस लेख में मैं जो बताना चाहता हूँ, वह यह है कि ऐसा क्या है उस प्रत्यक्षतः मनोरंजनार्थ बनाई गई व्यावसायिक फ़िल्म में जो वह मेरे जीवन का एक अंग बन गई है । वह है बॉलीवुड के भट्ट बंधुओं (मुकेश भट्ट-महेश भट्ट) द्वारा १९९९ में बनाई गई तनूजा चंद्रा द्वारा निर्देशित अक्षय कुमार, प्रीति ज़िंटा एवं आशुतोष राना की प्रमुख भूमिकाओं वाली हिंदी फ़िल्म 'संघर्ष' । 

पहले फ़िल्म की ही बात कर ली जाए । इसे महेश भट्ट ने लिखा है तथा ऐसा कहा जाता है कि इसकी कथा उन्होंने १९९१ में आई हॉलीवुड फ़िल्म 'द साइलेंस ऑव द लैम्ब्स' से प्रेरित होकर लिखी थी । कई ऑस्कर पुरस्कार जीतने वाली यह फ़िल्म इसी नाम के एक प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित थी । बहरहाल महेश भट्ट ने चाहे कोई मौलिक कहानी न लिखकर एक विदेशी कहानी को ही भारतीय परिवेश में लिखकर प्रस्तुत किया, लेकिन बाख़ूबी किया । यह वह नक़ल थी जो अक़्ल लगाकर की गई थी । अत्यंत तीव्र गति से चलने वाले घटनाक्रम को धार दी गिरीश धमीजा के प्रभावी संवादों ने, रजतपट पर कभी हृदय को कंपित कर देने वाले तो कभी हृदयतल को स्पर्श कर लेने वाले ढंग से प्रदर्शित किया छब्बीस वर्षीया तनूजा चंद्रा के कुशल निर्देशन ने तथा उसे आँधी सरीखा स्वरूप प्रदान कर दिया अमित सक्सेना के संपादन ने जिन्होंने अपनी संपादकीय कैंची कुछ ऐसी तीव्रता से चलाई कि दर्शक को सोच-विचार करने का समय ही न मिले तथा वह अपनी श्वास रोके अपने समक्ष पटल पर प्रवाहित हो रहे कथानक को आदि से अंत तक टकटकी लगाकर देखता चला जाए; न मध्यान्तर होने का पूर्वाभास हो सके और न ही कथा-प्रवाह के अपनी चरम सीमा पर जा पहुँचने का । एक्शन से भरपूर इस फ़िल्म में कला-निर्देशक तथा एक्शन-निर्देशक दोनों ने ही अत्यंत सराहनीय कार्य किया है । चरम (क्लाईमेक्स) में हिंसा इतनी अधिक एवं इतनी वीभत्स है कि मुझे लगता है कि बलि चढ़ाने वाले अंधविश्वासी अपराधी से एक बालक की प्राण-रक्षा की कथा होने पर भी  यह फ़िल्म 'केवल वयस्कों के लिए' ही है (सेंसर प्रमाण-पत्र में तो फ़िल्म को इसी श्रेणी में रखा गया था किन्तु फ़िल्म के पोस्टरों पर 'ए' अंकित नहीं था) ।

 

फ़िल्म का एक अत्यंत प्रभावी पक्ष गीत-संगीत भी है । समीर द्वारा रचित सुंदर शब्दों को जतिन-ललित ने मधुर धुनों में  ढाला है  यद्यपि फ़िल्म का एक बहुत ही सुंदर गीत - 'हम बड़ी दूर चले आए हैं चलते-चलते'  फ़िल्म में सम्मिलित नहीं किया गया है  तथा उसे केवल एलबम में ही सुना जा सकता है । और मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस फ़िल्म का एक गीत 'मुझे रात-दिन बस मुझे चाहती हो, कहो-न-कहो मुझको सब कुछ पता है'' वस्तुतः ओ.पी.नैयर  साहब  द्वारा रचे गए एवं मोहम्मद रफ़ी साहब द्वारा गाए गए एक बहुत पुराने गीत 'मुझे देखकर आपका मुसकराना मोहब्बत नहीं है तो फिर और क्या है' (जिसे १९६२ में आई फ़िल्म 'एक मुसाफ़िर एक हसीना' के लिए एस.एच. बिहारी जी ने लिखा था) की निर्लज्जता से की गई संपूर्ण नक़ल है । फ़िल्म के जो गीत मुझे अधिक पसंद आए, उनका उल्लेख मैं आगे पृथक् रूप से करूंगा । और यह लिख देना भी मैं समीचीन समझता हूँ कि फ़िल्म का पार्श्व संगीत भी प्रशंसनीय है जो फ़िल्म के समेकित प्रभाव को परिवर्धित कर देता है ।

अभिनय पक्ष भी अत्यंत सबल है । खलनायक आशुतोष राना ने अपने दिल दहला देने वाले अभिनय के कारण इस फ़िल्म की अपनी भूमिका के लिए कई पुरस्कार जीते जिसके वे सर्वथा योग्य थे । फ़िल्म नायिका-प्रधान है तथा फ़िल्म जगत में उन दिनों नई-नई ही आईं प्रीति ज़िंटा ने अंधकार से डरने वाली तथा अपने अतीत से परेशान एक प्रशिक्षु सीबीआई अधिकारी की कठिन भूमिका में अत्यंत प्रभावशाली अभिनय किया है । फ़िल्म की जान हैं इसके नायक अक्षय कुमार जिनका प्रशंसक मैं इसी फ़िल्म को देखकर बना । एक निर्मल मन वाले अपराधी की भूमिका में अक्षय कुमार ने अपनी अन्य सभी छवियों को ध्वस्त करते हुए ऐसा हृदय-विजयी अभिनय किया है जिसे निर्विवाद रूप से उनके अभिनय-जीवन के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में रखा जा सकता है । सहायक भूमिकाओं में अमन वर्मा, विश्वजीत प्रधान, मदन जैन, अमरदीप झा, निनाद कामत, अभय चोपड़ा, एस.एम. ज़हीर आदि तथा बाल कलाकारों - मास्टर मज़हर, जश त्रिवेदी एवं आलिया भट्ट (जी हाँ, आज की अत्यन्त लोकप्रिय नायिका) ने भी उत्कृष्ट अभिनय किया है । 

फ़िल्म में कमियां हैं लेकिन कम ही हैं । ख़ूबियां उन पर भारी हैं । देखने वाले को शुरू से आख़िर तक दम साधे परदे से चिपकाए रखने वाली यह फ़िल्म टिकट खिड़की पर क्यों असफल रही, कहना मुश्किल है । प्रतिष्ठित समीक्षकों ने भी इस फ़िल्म के साथ न्याय नहीं किया एवं इसकी आलोचना ही की, प्रशंसा नहीं । 

अब इस फ़िल्म में ऐसी भी क्या बात है जो मैंने इसे सिनेमा हॉल में ही पाँच बार देखा तथा आज यह मेरी शख़्सियत का एक हिस्सा बन चुकी है ? इस सवाल का जवाब मैं फ़िल्म समीक्षा करने में अपनी गुरू अरूणा त्यागराजन के इस कथन से देना आरंभ करता हूँ - 'Review is about feelings and what the movie evokes in one. Moviemaking and movie viewing is so subjective. Never know who it reaches out to and how:' (समीक्षा उन भावनाओं से संबंध रखती है जो कि फ़िल्म व्यक्ति में जगाती है । फ़िल्म बनाना तथा फ़िल्म देखना अत्यन्त व्यक्तिपरक बात है । कुछ पता नहीं लगता कि वह किस तक पहुँचती है एवं कैसे पहुँचती है ।) 

जी हाँ, यह बात फ़िल्मों, धारावाहिकों तथा पुस्तकों; सभी पर लागू है । पेशेवर समीक्षकों की बात यदि छोड़ दी जाए जिनका करियर ही यही है तो कोई भी समीक्षा उस समीक्षक में उस फ़िल्म, धारावाहिक या पुस्तक द्वारा उत्पन्न की गई भावनाओं की ही अभिव्यक्ति होती है । कम-से-कम मुझ पर तो यह उक्ति पूरी तरह खरी उतरती है । मैंने विभिन्न जाने-माने फ़िल्म समीक्षकों की पक्षपातपूर्ण एवं आधी-अधूरी समीक्षाएं पढ़कर ही अनुभव किया था कि उनसे बेहतर समीक्षाएं तो मैं लिख सकता था एवं इसीलिए मेरी लेखनी इस क्षेत्र में उतर पड़ी लेकिन मैं यह काम दिमाग़ से नहीं, दिल से करता हूँ और वही लिखता हूँ जो मैंने फ़िल्म के द्वारा अनुभव किया । 'संघर्ष' एक ऐसी ही फ़िल्म है जिसे मैंने अपने जीवन की एक विषम परिस्थिति में देखा एवं जिसने मेरे व्यक्तित्व को अत्यन्त गहनता से प्रभावित किया । 

२९ मार्च, १९९९ को जब मैं कर्णावती एक्सप्रेस द्वारा मुम्बई जा रहा था, तब (अपनी ही भूल से) मैं चलती हुई रेलगाड़ी से बांद्रा के प्लेटफ़ॉर्म पर जा गिरा जिसके परिणामस्वरूप मेरा बायां हाथ बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया । उस अपरिचित नगर में मेरी सहायता पहले तो प्लेटफ़ॉर्म पर ही कुछ सहृदय व्यक्तियों ने की एवं तदोपरांत मेरे एक मित्र (रमेश गुप्ता) ने मुझे संभाला एवं मुम्बई में ही मेरी मेरी शल्य-चिकित्सा का प्रबंध किया । किन्तु वह शल्य-चिकित्सा अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल नहीं रही एवं मुझे कुछ माह के उपरान्त जोधपुर (राजस्थान) में पुनः शल्य-चिकित्सा करवानी पड़ी । दोनों ही बार मेरे हाथ के साथ-साथ कमर की भी शल्य-चिकित्सा हुई क्योंकि हाथ की हड्डी इतनी अधिक टूटी थी कि रिक्त स्थान को भरने के लिए कमर की हड्डी से कुछ भाग लेना पड़ा था (अब मेरा वह हाथ कभी अपनी सामान्य स्थिति में नहीं आ सकता) । महीनों-महीनों मेरे हाथ पर भारी प्लास्टर चढ़ा रहा जो गर्मी के मौसम में एक अत्यन्त दुखदाई अनुभव था । मेरे परिजन अपरिहार्य कारणों से मेरे साथ नहीं रह सकते थे एवं मैं उदयपुर (राजस्थान) में अकेले ही रहकर भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा था जिसकी प्रारंभिक परीक्षा मैंने उस कठिन समय में भी उत्तीर्ण कर ली थी एवं अब मैं दो-दो बार शल्य-चिकित्सा हो चुकने पर भी मुख्य परीक्षा देने के लिए कटिबद्ध था । भोजन के लिए मैंने एक टिफ़िन-सेवा का प्रबंध कर लिया था । घर के तथा अपने शेष कार्य मैं स्वयं करता था । लेकिन परीक्षा देने के मेरे दृढ़ संकल्प पर उस अवसाद की छाया थी जो अपनी शारीरिक अवस्था, मानसिक स्तर पर एकाकीपन, भारी आर्थिक हानि एवं इन सबसे बढ़कर परीक्षा की तैयारी का मूल्यवान समय नष्ट होने से उपजा था । वक़्त-बेवक़्त एक गहरी उदासी मुझ पर तारी हो जाती थी एवं मेरे लिए पढ़ाई में मन लगाना बहुत मुश्किल हो जाता था जबकि पहले ही मेरे पास उसके लिए वक़्त बहुत कम बचा था । 

ऐसे में तीन सितम्बर, १९९९ को 'संघर्ष' प्रदर्शित हुई जिसकी समीक्षा मैंने हिंदी समाचार-पत्र 'राजस्थान पत्रिका' में पाँच सितम्बर, १९९९ को उसके रविवारीय परिशिष्ट में पढ़ी । अब मैंने पढ़ाई से एक दिन का ब्रेक लिया एवं फ़िल्म देखने के लिए उदयपुर के 'पारस' सिनेमा पर जा पहुँचा । फ़िल्म समाप्त होने के उपरांत जब मैं सिनेमा हॉल से बाहर निकला, तब मैं वह नहीं था जो सिनेमा हॉल में प्रवेश करते समय था । मेरे भीतर बहुत कुछ बदल गया था । फ़िल्म देखकर मैं इतना अच्छा महसूस कर रहा था कि मैं कोई सवारी न लेकर बहुत दूर तक पैदल ही चला ।

वैसे तो संघर्ष शब्द ही मेरे जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है । हालात से संघर्ष करते-करते ही मैं बड़ा हुआ और किस्मत वक़्त-वक़्त पर ऐसी करवटें बदलती रही कि सही मायनों में मेरा संघर्ष कभी ख़त्म हुआ ही नहीं । वह आज भी जारी है । लेकिन वह मेरी ज़िन्दगी का एक ऐसा वक़्त था जब मुझे अपने आगे अंधेरे के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता था । ऐसे में मैंने यह फ़िल्म देखी तथा इसकी नायिका (रीत ओबराय) जो कि अपने भाई तथा पिता के असामयिक निधन के उपरांत अपनी विधवा माता के साथ रहने वाली एक पंजाबी युवती है, के संघर्ष एवं पीड़ा ने मेरे मन को छू लिया । उसके सत्य के पथ पर चलने के अडिग निश्चय ने एवं इस विश्वास ने कि 'जीत हमेशा सच की होती है' (कम-से-कम  तब मेरा भी यही विश्वास था) मेरे टूटते हुए मन को संबल दिया । फ़िल्म का गीत 'नाराज़ सवेरा है, हर ओर अंधेरा है, कोई किरण तो आए कहीं से, आए' जब चल रहा था तो मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी रग-रग में जमा हुआ दर्द पिघलकर बाहर निकल रहा हो । और जब मध्यान्तर के उपरांत 'मंज़िल न हो, कोई हासिल न हो तो है बस नाम की ज़िन्दगी, कोई अपना न हो, कोई सपना न हो तो है किस काम की ज़िन्दगी' चल रहा था तो उसका एक-एक शब्द मेरे हृदय के भीतर उतरकर मानो मुझे जीना सिखा रहा था । 

इस नायिका-प्रधान फ़िल्म में नायक के चरित्र को भी अत्यन्त सुघड़ता से आकार दिया गया है । ज़रूरी नहीं कि कानून का मुजरिम इंसानियत और इंसाफ़ का भी मुजरिम हो । अपराधी होकर भी नायक (अमन वर्मा) को एक अत्यन्त अध्ययनशील तथा बुद्धिमान (लगभग जीनियस) व्यक्ति बताया गया है जो सिद्धांतवादी है तथा नायिका की सरलता एवं सत्यनिष्ठा से प्रभावित होकर उसकी सहायता करने के लिए तत्पर हो जाता है । उसे अपने इंसान होने पर कोई फ़ख़्र नहीं क्योंकि उसने इंसानियत का बदसूरत चेहरा देखा है । लेकिन नायिका के रूप में इंसानियत के दूसरे चेहरे से तआरूफ़ उसे बदल डालता है । उसे नायिका से प्रेम हो जाता है लेकिन वह तब तक उसे अपने मन में ही रखता है जब तक परिवर्तित परिस्थितियों में नायिका से उसकी अनपेक्षित भेंट नहीं होती । सच्चा प्यार ऐसा ही होता है जिसके इज़हार को लम्बी-चौड़ी बातों और शोरशराबे की ज़रूरत नहीं होती । नायक को अपने प्रेम का प्रतिदान नायिका से अपने जीवन के अंतिम क्षणों में मिलता है पर उसके लिए उतना भी बहुत है । सच्ची मुहब्बत की एक नज़र और सच्चे प्यार में डूबा हुआ एक पल ज़िन्दगी भर के दिखावटी प्यार से कहीं बेहतर है जिसके मिल जाने के बाद इंसान सुकून से मर सकता है । 


मैं फ़िल्म के कुछ संवादों का उल्लेख करूंगा क्योंकि उसके बिना इस फ़िल्म से संबंधित मेरी अभिव्यक्ति अपूर्ण ही रह जाएगी :

१. अमन से अपनी प्रथम भेंट में रीत का उससे कहना - 'किताबों के काले अक्षर घोटकर पी लेने से जानवर इंसान नहीं बन जाता । ज्ञान किताबों में लिखी बातों पर अमल करने से आता है, यूं किताबों का ढेर लगा लेने से नहीं ।'

२. अमन और रीत की दूसरी मुलाक़ात में अमन का रीत से कहना - 'इंसानियत की बात मुझसे मत कीजिए । मुझे अपने इंसान होने पर कोई फ़ख़्र नहीं । दुनिया कल जलती हो, आज जल जाए, माचिस चाहिए, मैं दे दूंगा ।'

३. अमन और रीत की अनाधिकृत भेंट में (जब अमन को पुलिस द्वारा यातनाएं दी जा रही हैं), अमन का रीत से कहना - 'बेचारी रीत, समझती है - दूसरों के ग़म बांटने से अपने ज़ख़्म भर जाते हैं ।'

४. पुलिस की गिरफ़्त से फ़रार हो जाने के बाद रीत के अमन से उसके छुपने के स्थान पर मिलने आने पर अमन का रीत से कहना - 'सपने सोच-समझकर देखने चाहिए । सच हो जाते हैं ।'

५. इसी मुलाक़ात में अमन का रीत से सिर्फ़ इतना कहना - 'तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो ।'

६. राज्य के गृह मंत्री के कार्यालय के बाहर रीत का अपने (सहृदय एवं कर्तव्यपरायण) वरिष्ठ अधिकारी से कहना -  'बचपन में मेरी दादी ने मुझसे कहा था कि ईमानदारी के रास्ते पर चलते हुए लोग तुझे रोकेंगे, डराएंगे, तेरे रास्ते में आ के खड़े हो जाएंगे लेकिन तू घबराना मत । लोगों से डरकर रास्ते में बैठ मत जाना बल्कि दुगने जोश के साथ आगे बढ़ना । याद रखना; झूठ चाहे जितना सर उठाए, जीत हमेशा सच की होती है ।'

७. एक आरंभिक दृश्य में रीत के संदर्भ में उसके वरिष्ठ अधिकारी का अपने एक सहकर्मी से कहना - 'जो लोग अंधेरे का अंजाम जानते हैं, वो रोशनी ढूंढ ही लेते हैं । इसके लिए उन्हें चाहे कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े ।'

आज भी मेरे हताश और दुखी मन को सहारा देने वाली इस फ़िल्म का सार इसी एक संवाद में अंतर्निहित है । 

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Tuesday, October 20, 2020

तंत्र-मंत्र : हक़ीक़त या फ़साना

हमारे देश में न तांत्रिकों की कमी है और न ही तंत्र-मंत्र पर लिखी गई किताबों की । कहा जाता है कि तंत्र-साधना करके सिद्ध (तांत्रिक) बन जाने वाले लोग अपनी प्रत्येक इच्छा पूर्ण कर लेते हैं, हर मनचाहा पा लेते हैं । लेकिन जो कुछ भी कथित तंत्र-साधना में की जाने वाली क्रियाओं के विषय में संबंधित पुस्तकों में लिखा गया है, उसे पढ़कर मुझ जैसे साधारण मानव का हृदय कम्पित हो उठता है । ये औघड़ क्रियाएं ऐसी हैं जिन्हें संपादित करना तो छोड़िए, उनकी कल्पना तक करना ही किसी दुर्बल मन वाले व्यक्ति के वश की बात नहीं (यद्यपि कतिपय सात्विक क्रियाओं का उल्लेख भी किसी-किसी पुस्तक में मिलता है) । इसीलिए अघोरी बनना किसी जिगरवाले के ही बस की बात है, कोई पत्थर का कलेजा रखने वाला ही इस दुनिया में घुस सकता है और रह सकता है । अब उसे कुछ (मनचाहा या अनचाहा) मिल पाता है या नहीं, यह दीगर बात है । 

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ने एक हिंदी उपन्यास इसी विषय को कथानक बनाकर लिखा था । इस उपन्यास का नाम है - 'जिगर का टुकड़ा' । 'जिगर का टुकड़ा' उस व्यक्ति को कहा जाता है जो आपको अत्यंत प्रिय हो । इसका सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है - माता के लिए उसकी संतान । यदि ऐसी संतान इकलौती हो तो और भी । चाहे पुत्र हो या पुत्री, ऐसा बच्चा अपनी माता के लिए उसके जिगर का टुकड़ा ही होता है । और अपने जिगर के टुकड़े की सलामती के लिए ममतामयी मां कुछ भी कर गुज़र सकती है । उसके जीवन एवं कल्याण के लिए वह सारे जग से लड़ सकती है । ऐसी ही एक मां की कहानी कहता है यह उपन्यास जिसकी कथावस्तु का एक अभिन्न भाग है तंत्र-मंत्र । 

इस उपन्यास में 'परकाया प्रवेश' का भी उल्लेख है । 'परकाया प्रवेश' अर्थात् किसी सिद्ध व्यक्ति का अपनी देह को छोड़कर किसी अन्य देह में प्रवेश कर जाना तथा अपनी इच्छानुसार पुनः मूल देह में लौट आना । यह किवदंती ही है, किसी ने देखी तो है नहीं । शर्माजी ने यह उपन्यास १९९३ में लिखा था और कम-से-कम उस ज़माने में तो वे ऐसी बातों पर यकीन नहीं ही करते थे । इसलिए उपन्यास के आरंभिक दृश्य में प्रदर्शित 'परकाया प्रवेश' के रहस्य को उन्होंने अंतिम पृष्ठों में सांसारिक कृत्यों पर आधारित बताते हुए ही खोला है और यही प्रतिपादित किया है कि वस्तुतः 'परकाया प्रवेश' जैसी कोई बात नहीं होती है । किंतु इसे उन्होंने पूरी तरह से ख़ारिज भी नहीं किया है और इसका वैज्ञानिक स्पष्टीकरण देते हुए यह कहा है कि हो सकता है कि कोई जीवन भर निष्ठापूर्वक साधना करके इस क्षमता को प्राप्त कर सकता हो ।

'जिगर का टुकड़ा' निस्संदेह शर्माजी के अंडर-रेटेड उपन्यासों में से एक है । न तो स्वयं उन्होंने इस अपने इस बेहतरीन उपन्यास का कोई प्रचार-प्रसार किया, न ही इसे वह चर्चा तथा सराहना मिल सकी जो उनके अनेक अन्य उपन्यासों को मिली । उनका पिछला उपन्यास 'वर्दी वाला गुण्डा' (मुख्यतः भरपूर प्रचार के कारण) व्यावसायिक रूप से अत्यंत सफल रहा था जबकि अगला उपन्यास 'लल्लू' उस पर 'सबसे बड़ा खिलाड़ी' नामक हिट फ़िल्म बन जाने के कारण बहुचर्चित हो गया । 'जिगर का टुकड़ा' इन दो अत्यंत लोकप्रिय, सफल एवं चर्चित उपन्यासों के बीच आया था, संभवतः इसलिए भी इसकी विशेष चर्चा नहीं हुई । लेकिन यदि एक पाठक एवं शर्माजी के प्रशंसक के रूप में मुझसे पूछा जाए तो मैं इसे उनके सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिनूंगा । एक ज़बरदस्त सस्पेंस-थ्रिलर है यह जिसमें न रहस्य की कमी है और न ही रोमांच की । साथ ही यह विश्वसनीयता की कसौटी पर भी खरा उतरता है क्योंकि इसमें ऐसी कोई बात नहीं है जो असामान्य लगे । नितांत तर्कपूर्ण ढंग से लिखा गया है यह उपन्यास । 

उपन्यास के केंद्र में है अनमोल नाम का एक पंद्रह वर्षीय बालक जो आँचल नामक एक धनाढ्य विधवा का इकलौता पुत्र है (अर्थात् उसके जिगर का टुकड़ा है) जिसकी हत्या का षड्यंत्र रचते हैं उसके चाचा बलराज तथा उनके संपूर्ण भारतवर्ष में फैले हुए विशाल व्यवसाय का मुख्य प्रबंधक जागेश्वर । यह षड्यंत्र रचा जाता है तंत्र-मंत्र की सहायता से जो करता है एक तांत्रिक - कपालतंत्र । कपालतंत्र ने ही तंत्र-मंत्र करके इस व्यवसाय के स्वामी, आँचल के पति तथा अनमोल के पिता मोहक की हत्या करवाई थी जिसके लिए उसे जागेश्वर से धन एवं एक वैभवशाली आवास प्राप्त हुआ था । कपालतंत्र का दावा है कि वह केवल तंत्र-मंत्र ही नहीं जानता वरन परकाया-प्रवेश भी जानता है तथा वह इसका प्रदर्शन (डिमॉन्स्ट्रेशन) भी करके दिखाता है । बलराज तथा जागेश्वर के यह कार्य तंत्र-मंत्र द्वारा करवाने का उद्देश्य यह है कि जिस प्रकार मोहक की मृत्यु एक दुर्घटना समझी गई थी, उसी प्रकार अनमोल की मृत्यु भी स्वाभाविक समझी जाए तथा हत्या जैसी किसी बात का संदेह न तो पुलिस को हो और न ही आँचल सहित अन्य लोगों को । 

लेकिन बलराज को लगता है कि सारे काम कपालतंत्र से ही करवाने से वह आने वाले समय में उन लोगों पर हावी हो जाएगा तथा संभव है कि वह उन्हें (अर्थात् बलराज एवं जागेश्वर को) ब्लैकमेल भी करने लगे । अतः वह षड्यंत्र को तीन भागों में बांटता है - प्रथम भाग में अनमोल को तंत्र-मंत्र द्वारा बीमार करने का, द्वितीय भाग में बीच-बीच में उसके कुछ-कुछ ठीक हो जाने का एवं तृतीय भाग में उसके मर जाने का । वह प्रथम एवं तृतीय भाग को तो पूर्ण रूप से कपालतंत्र को ही सौंपता है किन्तु द्वितीय भाग में झूठे तांत्रिकों का अभिनय करने के लिए कुछ मामूली बदमाशों को पकड़ लाता है जो धन लेकर किसी के भी लिए कैसा भी और कोई भी (कानूनी-ग़ैरकानूनी) काम करने को तैयार रहते हैं । इन चार बदमाशों का सरगना है - मार्कण्डेय तथा बाकी तीन हैं - उसकी पत्नी मोनिका एवं उसके दो विश्वसनीय साथी गबरू एवं रूस्तम । मार्कण्डेय अपने भूतकाल में अभिनेता रह चुका है एवं बलराज उसकी इसी योग्यता का लाभ उठाकर उसे तांत्रिक का अभिनय करने के लिए उसके साथियों सहित उस कोठी में ले आता है जिसमें वह स्वयं, उसकी भाभी आँचल तथा उसका भतीजा अनमोल रहते हैं । ढोंगी तांत्रिक मार्कण्डेय व उसके साथियों का काम होता है (बलराज द्वारा कपालतंत्र से लेकर आई हुई) तांत्रिक वस्तुओं से अनमोल का उपचार करना जिससे वह अस्थायी रूप से स्वस्थ हो जाए तथा कुछ समय के अंतराल के उपरांत पुनः रोगी हो जाए । 

इस सारे झमेले में दो और पात्र उलझे हुए हैं । एक तो है दिल्ली से सरकार द्वारा आँचल के अनुरोध पर अनमोल की सुरक्षा हेतु भेजा गया ब्लैक कैट कमांडो - डगलस तथा दूसरा है एक अत्यन्त रहस्यमय पात्र - 'अजगर' जो स्वयं सामने आए बिना मार्कण्डेय और उसके साथियों से भूतकाल में अपराध करवाता रहा है । मार्कण्डेय और उसका दल बिना कारण जाने तथा कार्य की पृष्ठभूमि के विषय में बिना कोई प्रश्न किए 'अजगर' के आदेश पर उससे धन लेकर अपराध करते रहे थे । इस बार वे 'अजगर' को बिना बताए बलराज से सौदा करके अनमोल की हत्या के षड्यंत्र में सम्मिलित हो जाते हैं । लेकिन उन्हें दो करारे झटके लगते हैं - एक तो 'अजगर' को अपने आप ही सब कुछ पता लग जाता है कि वे किस फ़िराक़ में हैं और वह उन्हें चुपचाप वहाँ से कूच कर जाने के लिए कहता है, दूसरा अचानक कपालतंत्र भी उस कोठी में आ धमकता है और उसे यह देखकर बहुत बुरा लगता है कि उससे बिना पूछे ही बलराज और जागेश्वर मार्कण्डेय एंड कंपनी को वहाँ ले आए थे । अब अपनी-अपनी पोल खुलने से बचने के लिए इन सभी को आँचल के सामने नाटक करना पड़ता है जिसके तहत कपालतंत्र ख़ुद को मार्कण्डेय वग़ैरह का गुरू तथा वे सभी ख़ुद को उसके चेले बताने लगते हैं । इधर डगलस को कतई ऐतबार नहीं है कि तंत्र-मंत्र जैसी कोई चीज़ होती है और वह इन सभी लोगों को शुरू से ही नक़ली तांत्रिक और ठग समझता है । लेकिन उसके कहने पर भी अपनी इकलौती बीमार औलाद के इलाज के लिए फ़िक्रमंद आँचल उन्हें कोठी से नहीं निकालती क्योंकि अनमोल किसी भी डॉक्टर के इलाज से ठीक नहीं हो पा रहा था ।

अब चूंकि यह उपन्यास सस्पेंस-थ्रिलर है, इसलिए लंबी-चौड़ी पृष्ठभूमि बन जाने के उपरांत घात-प्रतिघात का खेल आरंभ होता है तथा हत्याएं होने लगती हैं । इससे पहले कि हत्याओं के पीछे का रहस्य जानने के लिए प्रयासरत डगलस सत्य तक पहुँचे, वेद प्रकाश शर्मा पाठकों के समक्ष रहस्योद्घाटन कर देते हैं कि वास्तविकता क्या है तथा इस रहस्योद्घाटन से पूर्व सभी दुष्ट एवं अपराधी मारे जाते हैं । 

'जिगर का टुकड़ा' एक अत्यंत चुस्त उपन्यास है जिसमें कहीं कोई फालतू बात नहीं लिखी गई है तथा प्रत्येक शब्द मुख्य कथानक से जुड़ा हुआ है । वेद प्रकाश शर्मा अपने आपको 'झटका स्पेशलिस्ट' कहलवाना पसंद करते थे तथा प्रायः अपने उपन्यासों के प्रथम पृष्ठ पर लिखवाते थे - 'इस उपन्यास के हर पृष्ठ पर वेद प्रकाश शर्मा ने शब्दरूपी करेंटयुक्त तार बिछा रखे हैं' (पढ़ने वालों को झटका देने के लिए) । साथ ही अंतिम पृष्ठ पर यह भी लिखवाते थे - 'सावधान ! इस पृष्ठ (या अंतिम पृष्ठ) पर लिखा कथानक से संबंधित एक शब्द भी 'पहले' न पढ़ें अन्यथा आप अपने द्वारा खर्च किए गए पैसे का भरपूर आनंद उठाने से वंचित रह जाएंगे' । ऐसी बातें उन्होंने 'जिगर का टुकड़ा' के भी प्रथम एवं अंतिम पृष्ठों पर लिखी हैं । और ये बातें उनके स्वर्णिम दिनों में सत्य भी होती थीं । 'जिगर का टुकड़ा' भी पाठकों को बीच-बीच में झटके देता है । इस उपन्यास की एक ख़ूबी यह भी है कि शर्माजी ने रहस्य को परत-दर-परत खोला है और पाठकों को सोचने का मौका भी दिया है कि वे ख़ुद सच्चाई का अंदाज़ा लगाएं । अगर कोई जीनियस पाठक लगा भी ले तो भी वह सच्चाई के एक हिस्से का ही अंदाज़ा लगा सकता है, पूरी सच्चाई का नहीं । उपन्यास में अपनी आवाज़ को किसी और की आवाज़ बना लेने की बात को छोड़कर (यह बात एकदम ग़लत है भी नहीं क्योंकि मिमिक्री की कला तो सर्वविदित है, अलबत्ता उसके लिए कुछ प्राकृतिक योग्यता तथा बहुत अधिक अभ्यास की आवश्यकता होती है) कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर विश्वास न किया जा सके ।'

अब तंत्र-मंत्र की बातें हक़ीक़त हैं या फ़साना, ख़ुदा ही जाने । इस वैज्ञानिक युग में इन बातों पर भरोसा करना कठिन ही है (वैसे वेद प्रकाश शर्मा ने उपन्यास में कपालतंत्र द्वारा डगलस को इन बातों का विशेषतः परकाया-प्रवेश का, विस्तृत एवं तार्किक स्पष्टीकरण दिलवाया है जो एक दृष्टि में तो पूर्णतः वैज्ञानिक ही लगता है) । मैं तो इस उपन्यास को वेद प्रकाश शर्मा की लेखनी से निकला एक अत्यंत मनोरंजक एवं आदि से अंत तक पाठकों को बांधे रखने वाला उपन्यास मानता हूँ जो मनोरंजन के अभ्यर्थियों को निराश नहीं करेगा एवं पढ़ चुकने के उपरांत उन्हें संतुष्टि की अनुभूति प्रदान करेगा । 

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Sunday, October 18, 2020

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

अपने अमर महाकाव्य 'कुरुक्षेत्र' के सप्तम सर्ग में कविवर रामधारी सिंह दिनकर शरशय्या पर अपनी निर्वाण-वेला की प्रतीक्षा में लेटे पितामह भीष्म से युधिष्ठिर को कहलवाते हैं - 

यह अरण्य झुरमुट जो काटे, अपनी राह बना ले
क्रीतदास यह नहीं किसी का, जो चाहे अपना ले 
जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर, जो उससे डरते हैं 
वह उनका जो चरण रोप, निर्भय होकर लड़ते हैं 

आज भारत में साधनहीन तथा निस्सहाय लोगों के लिए जो चीज़ें दुर्लभ हो गई हैं उनमें से सबसे महत्वपूर्ण है पीड़ित होने पर न्याय का मिलना । जिसके पास साधन न हों, समर्थन न हो, जो अपने लिए न्याय ख़रीद न सके (क्योंकि दुर्भाग्यवश हमारे देश में न्याय बिकाऊ ही है); वह यदि न्याय को छीनकर पाने में भी सक्षम न हो तो उसके लिए अपने पीड़ित होने के यथार्थ को सदा के लिए भूल जाने तथा न्याय की आकांक्षा को अपने भीतर से सदा के लिए निकाल देने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं रहता है । 

परन्तु इस स्थिति में दिनकर जी की ऊपर उद्धृत पंक्तियां ऐसे उत्पीड़ित एवं दबे-कुचले व्यक्तियों को न्याय के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती हैं, उसके लिए लड़ने की ऊर्जा तथा साहस देती हैं । फ़िल्मकार महेश भट्ट की तनूजा चंद्रा द्वारा निर्देशित अक्षय कुमार, प्रीति ज़िंटा एवं आशुतोष राणा की प्रमुख भूमिकाओं वाली फ़िल्म 'संघर्ष' (१९९९) का एक कालजयी संवाद है - 'जो अंधेरे का अंजाम जानते हैं, वे रोशनी ढूंढ ही लेते हैं चाहे उन्हें इसके लिए कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े' । तो जब पीड़ित का साथ समाज न दे, व्यवस्था न दे तो अपने चारों ओर फैले अंधेरे में रोशनी पाने के लिए उसे स्वयं ही संघर्ष करना होगा क्योंकि अंधेरे का अंजाम उसी को मालूम है । जिस पर बीतेगी, वही तो जानेगा ।

और पक्षपाती मानसिकता की बेड़ियों में जकड़े भारतीय समाज में बीतती तो रहती ही है उन पर जो दुर्बल हैं, विवश हैं, आसान शिकार (soft target) हैं । व्यवस्था प्रायः झूठों और आततायियों की ओर रहती है, अतः सत्य एवं न्याय के हिस्से पराजय ही आती है । अन्यायी के लिए अन्याय करना इसीलिए सरल होता है क्योंकि साधनहीन तथा एकाकी उत्पीड़ित के लिए न्याय पाना अत्यधिक कठिन होता है । अन्यायी इसी विश्वास के साथ अन्याय करता है कि जो अन्याय उसने चुटकियों में कर दिया है, उसके निराकरण तथा न्याय की प्राप्ति में उत्पीड़ित का संपूर्ण जीवन व्यतीत हो जाएगा (और तब भी उसे न्याय मिल ही जाए, यह आवश्यक नहीं) । इसीलिए भारत में अन्याय एवं अत्याचार होते ही रहते हैं, उनका सिलसिला थमता ही नहीं । एक हादसे की डरा देने वाली याद धुंधली भी नहीं पड़ी होती कि दूसरा, वैसा ही दहला देने वाला हादसा हो जाता है । घटनाएं वही रहती हैं, बस किरदार बदल जाते हैं ।

निर्भया मामले को अपने वैधानिक समापन तक पहुँचने में सात साल से अधिक लगे । इस बीच न जाने कितनी ही और निर्भयाएं जघन्य अत्याचार का शिकार बन गईं । बदायूँ कांड की पीड़ित दलित बच्चियों को न्याय केवल 'आर्टिकल पंद्रह' नामक फ़िल्म में ही मिला, वास्तविकता में कभी नहीं मिला । अब हाथरस की पीड़िता के मामले में तो व्यवस्था के ठेकेदारों ने अत्याचार की ही नहीं, असामाजिकता एवं संवेदनहीनता की भी सभी सीमाएं पार कर दी हैं लेकिन ... । लेकिन उस मार डाली गई युवती को अथवा उसके परिजनों को कभी न्याय मिल पाएगा, कहना कठिन ही है । मैंने अपने लेख दर्द सबका एक-सा में लिखा है कि सहानुभूति जताने और न्याय की माँग करने के लिए भी हमारा दृष्टिकोण 'मुँह देखकर तिलक करने' वाला बन गया है । वस्तुतः संसार का सबसे बड़ा और सबसे पुराना पीड़ित वर्ग हैं महिलाएं जिन पर बिना किसी जाति, धर्म व स्थान के अंतर के चिरकाल से अत्याचार एवं अन्याय होते आ रहे हैं । लेकिन आज के भारत की तुच्छ राजनीति में डूबी मानसिकता ने इन पीड़िताओं को भी  अनेक (उप)वर्गों में विभक्त कर दिया है । किसी वर्ग की उत्पीड़ित स्त्री के लिए किसी का मन पसीजता है तो किसी दूसरे वर्ग की उत्पीड़ित स्त्री के लिए किसी दूसरे का । हमारी संवेदनशीलता (यदि विद्यमान है तो) शुद्ध नहीं रही है, पक्षपाती हो गई है । हम दर्दमंदों के दर्द का सही मायनों में अहसास तभी कर पाते हैं जब वैसे ही दर्द से हमें भी गुज़रना पड़े । वरना ऐसे दिल हिला देने वाले मामलों में भी हमारी बातें हिंदुस्तानी राजनीतिबाज़ों की तरह दिखावटी और फ़रमायशी ही होती हैं । विगत एक दशक से तो ऐसा आभास हो रहा है मानो हम वास्तविक जीवन से दूर होकर केवल ट्विटर वाले बन गए हैं जो ट्वीट कर-कर के ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं अथवा फ़ेसबुक तथा वॉट्सअप पर अपना (अधकचरा) ज्ञान बघार कर स्वयं को सर्वज्ञ घोषित कर देते हैं ।

लेकिन जिस पर गुज़री है, वह क्या करे ? अगर जान ही चली गई है तो वह ख़ुद तो कुछ कर नहीं सकता (या सकती) । जिसे उसके लिए इंसाफ़ चाहिए, उसे ताक़तवर सिस्टम से लड़ना होगा - उस ताक़तवर सिस्टम से जो ज़ुल्म करने वालों का सगा है, दौलत के हाथों बिकता है, ताक़त के आगे झुकता है; जिसे सही-ग़लत से कोई मतलब नहीं । समाज के दुर्बल भाग से संबद्ध किसी भी पीड़ित के लिए न्याय पाना (अथवा ऐसे किसी पीड़ित को न्याय दिलाना) असंभव की सीमा तक कठिन हो सकता है । पर फिर यही तो आततायियों की शक्ति है कि पीड़ित सदा न्याय का भिक्षुक बना रहे किन्तु उसे न्याय न मिले । ऐसे में मर-मर कर बरसों जीते रहने से तो बेहतर है कि इंसाफ़ के लिए लड़ते हुए ही मरा जाए । महात्मा गांधी ने भी तो जब किसी भी तरह मांगने से अंग्रेज़ों से आज़ादी नहीं मिली थी तो 'करो या मरो' का नारा दिया था । कायरों का जीवन जीने से तो मर जाना अच्छा है ।

वैधानिक व्यवस्था स्वयं को तटस्थ कहती है । बहुत-से लोग भी स्वयं को तटस्थ कहकर अपने आप को ही धोखा देते हैं - हम तो किसी की भी तरफ़ नहीं हैं । लेकिन सच वह है जो मेरे प्रिय हिंदी लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक अपने कई उपन्यासों में कह चुके हैं - तटस्थता आततायी का साथ देती है, पीड़ित का नहीं । तथाकथित तटस्थ व्यवस्था का अनकहा सिद्धांत यही तो है कि जो समर्थ है, वही सही है । गोस्वामी तुलसीदास तो सैकड़ों वर्ष पूर्व ही लिख गए हैं - समरथ को नहीं दोष गुसाईं । ज़ालिम तो समर्थ और ताक़तवर होगा ही, तभी तो वह कमज़ोर पर ज़ुल्म कर पाएगा । अगर आप शक्तिशाली आततायी एवं दुर्बल उत्पीड़ित में से किसी की ओर नहीं हैं तो अप्रत्यक्षतः आप आततायी की ही ओर हैं क्योंकि आपकी इस कथित तटस्थता का लाभ उसी को प्राप्त होगा ।

लेकिन ऐसे स्वयंभू तटस्थ लोगों को जो कि 'हमें क्या' का दृष्टिकोण पालकर निश्चिंत रहते हैं, यह विस्मरण नहीं करना चाहिए कि समय से अधिक बलवान कोई नहीं । उनका भी वक़्त हमेशा वैसा ही नहीं रहने वाला है जैसा वे आज देख रहे हैं । मैंने दिनकर जी की पंक्तियों के साथ यह लेख आरंभ किया था । उन्हीं की एक कालजयी कविता की इन पंक्तियों के साथ मैं इस लेख का समापन करता हूँ :

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

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Sunday, September 27, 2020

चापलूसी ! लच्छेदार बातें ! छवि-निर्माण ! क्या ये ही हैं सफलता के वास्तविक सूत्र ?

सफलता वह वस्तु है जिसके पीछे आज के युग में लगभग प्रत्येक कार्यशील व्यक्ति भाग रहा है । सफलता वह सब कुछ दिला सकती है जिसकी अभिलाषा है जबकि असफलता का अंतिम परिणान है - वंचन, कुंठा एवं लोगों की अस्वीकृति । सफलता सब को चाहिए, असफलता किसी को नहीं । तो क्या हैं आज के भारत में सफलता के वास्तविक सूत्र (जिनके विषय में सभी सफल व्यक्ति जानते हैं किन्तु मुख से कहते नहीं) ?

इस विषय पर विस्तृत विमर्श से पूर्व मैं विगत मास 'हिंदुस्तान टाइम्स' समाचार-पत्र में पढ़े गए एक लेख का उल्लेख समीचीन समझता हूँ - 'Meritocracy is a myth. And that is not bad' जिसे 'बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप' के भारत स्थित प्रभाग के अध्यक्ष जनमेजय शर्मा ने लिखा है ।  'बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप' संसार भर में प्रसिद्ध एक वैश्विक प्रबंधन सलाहकार संस्था है जिसके परामर्श को संसार की अनेक बड़ी एवं प्रतिष्ठित कंपनियां तथा संस्थाएं बहुमूल्य मानती हैं । लेकिन ऐसी सम्मानित संस्था जिससे कार्य-प्रदर्शन संबंधी उच्च मानदंडों के ही उत्थान एवं प्रसार की ही सभी को अपेक्षा होती है, की भारतीय इकाई के प्रमुख शर्मा जी ने जो कुछ इस लेख में कहा है, उसमें तो भारत में चिरकाल से प्रचलित मानसिकता की ही अनुगूंज मुझे सुनाई दी ।  

छब्बीस जनवरी उन्नीस सौ पचास को एक आधुनिक गणतंत्र बनने से पूर्व भारत चिरकाल तक (अनेक टुकड़ों में बंटकर) राजतंत्र में रहा था । अलग-अलग राज्य अथवा रजवाड़े हुआ करते थे जिनके पृथक्-पृथक् राजा होते थे । कई स्थानों पर राजाओं के अधीनस्थ सामंतों या सूबेदारों का शासन चलता था । जागीरें एवं ज़मींदारियां भी होती थीं जिनके ऊपर संबंधित जागीरदार एवं ज़मींदार शासन करते थे । १८५८ में भारत सरकार अधिनियम द्वारा भारत के एक बड़े भू-भाग को (जो पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार में था) बरतानवी सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया जिसके उपरांत भी निजी रियासतें अथवा रजवाड़े (साथ ही जागीरें एवं ज़मींदारियां भी) स्वतंत्र बने रहे तथा बीसवीं शताब्दी में स्वाधीनता के उपरांत भारत के एकीकरण तक उन्होंने जैसे-तैसे समय निकाला । किंतु १८५७ तक स्थिति यही थी कि विभिन्न राज्य अथवा रियासतें अपने शासकों की साम्राज्य-विस्तार की लालसा के चलते परस्पर युद्धरत रहते थे । जनकल्याण की भावना प्राचीन ग्राम-स्वराज्य के समय रही हो तो रही हो, ईस्वी संवत के आरंभ होने से पूर्व ही तलवार के बल पर राज्य-विस्तार करने वाले (अथवा उपलब्ध सुख-भोगों का आनंद उठाने वाले) शासक ही भारत-भू पर अधिकांशतः दृष्टिगोचर होने लगे थे । ऐसा कोई समय विरला ही हो सकता था जब आर्यावर्त तथा कालांतर में हिंदुस्तान कहलाने वाली इस धरा पर कहीं-न-कहीं युद्ध न हो रहा हो । राजाओं की वीरता उनका भूषण मानी जाने लगी थी । विदेशी आक्रांताओं के आगमन तथा मुग़लों एवं अंग्रेज़ों जैसे विदेशी आक्रांताओं द्वारा भारत में ही स्थापित होकर शासन करने लगने पर भी स्थिति यही रही । जनसामान्य की मानसिकता धीरे-धीरे यही हो गई कि कोउ नृप होइ, हमें का हानि । 

ऐसे में विविध राज्यों, रजवाड़ों, रियासतों, सूबों आदि में एक चाटुकारिता की संस्कृति विकसित हुई । चारण-भाट पनपे जो शासकों की वीरता तथा अन्य (वास्तविक अथवा काल्पनिक) गुणों का यशोगान करके अपनी आजीविका चलाने लगे । यद्यपि अनेक शासकों ने जनहित के कार्य भी किए तथा विभिन्न कला-प्रेमी शासकों की अपनी-अपनी रुचि के अनुरूप अनेक लोक-कलाएं तथा सांस्कृतिक धरोहरें भी अस्तित्व में आईं एवं भलीभांति विकसित हुईं जिनसे जनसामान्य एवं समाज का अप्रत्यक्ष रूप से भला ही हुआ, तथापि धीरे-धीरे लोग राजाओं के चरण-वंदन के अभ्यस्त हो गए । ऐसा भी समय था जब राजा ईश्वर के अवतार के रूप में देखे जाते थे एवं तदनुरूप ही पूजनीय थे । व्यक्ति की योग्यता अपने आप में महत्वपूर्ण नहीं रही, राजा की मान्यता पर निर्भर हो गई । अर्थात् योग्य वही जिसे राजा योग्य मान ले । चाटुकारिता स्वयमेव ही एक कला बन गई । 

और यह कला आज तक चली आ रही है । इसके कलावंत इसे बिना किसी के सिखाए अपने आप ही साधते हैं । सच पूछिए तो शताब्दियों की दासता के परिणामस्वरूप यह कला कला ही न रहकर अधिकांश भारतीयों के स्वभाव का, संस्कारों का तथा व्यक्तित्व का एक अंग बन चुकी है । संयोगवश ऐसा हुआ कि मैंने जब (१९९४ में) प्रथम बार भारतीय सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा दी तो अनिवार्य हिंदी विषय के प्रश्न-पत्र में मुझे निबंध लेखन के लिए उपलब्ध विषयों में एक विषय मिला - 'चापलूसी की कला' । परीक्षा भवन में बैठे हुए मैंने अपनी कल्पनाओं को विस्तार दिया और इसी विषय को चुनकर एक ललित निबंध लिख डाला । परंतु आज मैं अनुभव करता हूँ कि काग़ज़ पर निबंध लिखना एक बात है जबकि वास्तविक जीवन में इस कला (!) को साधना पूर्णतः दूसरी । जो इसे साध सकता है (और साधना चाहता है), वह स्वतः ही इसमें पारंगत हो जाता है । जो न साध सके अथवा जिसका स्वाभिमान उसके समक्ष इस संदर्भ में कोई दुविधा खड़ी करे, वह जीवन भर इस मामले में अनाड़ी ही रह जाता है । भारतीय नाभिकीय ऊर्जा निगम में मेरे भूतपूर्व वरिष्ठ अधिकारी श्री एस. अलगुवेल ने मुझे एक बार (संभवतः सन दो हज़ार पाँच में) एक शुभचिंतक की भांति एकांत में अंग्रेज़ी भाषा में समझाया था - 'माथुर, तुम्हारी प्रगति के पथ में बाधा यह है कि तुम काम तो ठीक करते हो लेकिन तुममें दूसरे व्यक्तियों को प्रसन्न रखने की कला का अभाव है' । मैं संकोचवश उनसे पूछ नहीं सका -'आदरणीय श्रीमान, यदि इस कला को सिखाने की प्रशिक्षण कक्षाएं कहीं चलती हों तो मैं ज्वॉइन कर लूं' । ख़ैर ... 

आज भारतीय संगठनों, संस्थानों एवं व्यवस्थाओं में विशेषतः राजकीय क्षेत्र में चापलूसों का बोलबाला लगभग सभी स्थानों पर देखने को मिलता है । जो योग्य एवं कर्मठ हैं, वे भी अपनी योग्यता एवं परिश्रम का फल तभी पा सकते हैं जब वे काम के साथ-साथ ठीक से चापलूसी भी करें एवं उनके हितों का ध्यान रखने वाला कोई उच्च पद पर आसीन व्यक्ति हो (राजस्थानी भाषा में ऐसे व्यक्ति को धणीधोरी कहते हैं) जिसके वे निकटस्थ (अर्थात् चमचे) हों । अन्यथा सारी योग्यता उपेक्षित हो सकती है, सत्यनिष्ठापूर्वक किया गया संपूर्ण परिश्रम निष्फल हो सकता है । 

संगठन अथवा संस्था में पदोन्नति एवं अन्य परिलाभों की प्राप्ति के निमित्त व्यक्तिपरक निष्ठा एवं चापलूसी के साथ-साथ लच्छेदार बातें करने की कला भी बहुत उपयोगी होती है । प्रायः चापलूसी की कला में निष्णात लोग इस कला को भी साध लेते हैं । आज बातें बनाना श्रेष्ठ कार्य एवं प्रदर्शन (परफ़ॉरमेंस) की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गया है । जो बातों का जादूगर है, वह उन्हीं बातों का सौदागर बनकर बहुत कुछ पा लेता है जबकि चुपचाप अपना कर्तव्य-निर्वहन करने वाला देता ही रहता है, पाने वालों की पंक्ति में वह पीछे ही रह जाता है । आज कम-से-कम भारत में तो मीठी-मीठी बातें बनाना और सुनने वालों को लुभाकर अपना काम बना लेना ही विपणन (मार्केटिंग) की परिभाषा हो गया है । 

मेरे भूतपूर्व उच्चाधिकारी श्री अलगुवेल ने मुझे छवि-निर्माण का महत्व भी समझाया था एवं कहा था कि व्यक्ति की छवि उसके द्वारा किए गए कार्य से भी अधिक सार्थकता रखती है । आप सप्रयास अपनी एक बहुत अच्छी छवि गढ़ लें तो वह अन्य लोगों के लिए आपकी वास्तविकता से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है । आज का समाज ऊपरी आवरण ही देखता है, नीचे की वास्तविकता नहीं । अच्छा काम करो या न करो, बस अच्छी छवि बनाकर रखो तो  लगभग वह सब कुछ मिल सकता है जो आपको दूसरों से या तंत्र से चाहिए । छवि आपकी अपनी किसी त्रुटि से अथवा आपके किसी विरोधी की कुटिल चालों से कलंकित हो गई तो गए काम से । क्यों ? क्योंकि आपके विषय में लोगों का निर्णय आपकी छवि ही निर्धारित करती है, आपकी वास्तविकता अथवा आपके द्वारा किए गए वास्तविक कार्य नहीं ।

व्यक्ति के स्तर पर ये गुण तथा ये कार्यकलाप सफलता दिला सकते हैं जो कि इस भौतिक संसार में रहने वाले लगभग सभी (व्यावहारिक) लोगों का अभीष्ट है किंतु इनसे संबंधित संगठन, संस्थान अथवा व्यवस्था को हानि ही पहुँचती है । इसीलिए सफल संगठनों के स्वामी अथवा सर्वोच्च अधिकारी योग्य व्यक्तियों की योग्यता को एवं तदोपरांत उनकी कर्तव्यनिष्ठा को ही सर्वप्रथम परखते हैं । योग्यता को वरीयता देने पर ही योग्यता-तंत्र अथवा मेरिटोक्रेसी का पथ-प्रशस्त होता है जो कि किसी भी वृहत् व्यावसायिक संगठन अथवा संस्था अथवा सरकारी कार्यालय या मंत्रालय या निकाय की सफलता की कुंजी हो सकता है । अपने इस लेख के आरंभ में मैंने 'बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप'(बीसीजी) के भारत स्थित उच्चाधिकारी शर्मा जी के जिस लेख का उल्लेख किया है उसका सारांश यह है कि मेरिटोक्रेसी केवल एक मिथक (कपोल-कल्पना) है तथा इसका न होना कोई आपत्तिजनक बात नहीं । इस लेख में शर्मा जी ने संगठनों में उन्नति करने के लिए उच्चाधिकारियों के अनुकूल रहने एवं उनसे अच्छे संबंध रखने को निज-उन्नति के लिए आवश्यक बताया है एवं यह विचार व्यक्त किया है कि अधिक योग्य व्यक्ति उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के साथ सामंजस्य न बैठा सकें तो उनका अपने से कम योग्य व्यक्तियों से पिछड़ जाना स्वाभाविक है । उनके विचार में ऐसे (योग्य) व्यक्तियों को वह संगठन छोड़कर किसी ऐसे स्थान पर जाना चाहिए जहाँ वे सही समय पर एवं सही स्थान पर सही व्यक्ति के रूप में स्थापित हो सकें । घुमा-फिराकर परिष्कृत भाषा में कही गई ये बातें वस्तुतः हमारे देश में सर्वव्यापी चापलूसी की वकालत ही है ।

लेकिन वास्तविक उन्नति के लिए आवश्यक तो मेरिटोक्रेसी ही होती है चाहे उसे कोई कपोल-कल्पना ही क्यों न कहे । यदि विशुद्ध मेरिटोक्रेसी की स्थापना व्यावहारिक रूप से अत्यंत कठिन भी है तो भी उसके लिए निरंतर प्रयास किया जाना चाहिए क्योंकि आदर्श व्यवस्था तो वही है चाहे यथार्थ रूप में दिखाई न देती हो । मेरिटोक्रेसी को नकारना मीडियोक्रेसी (अर्थात् ऐसा तंत्र जिसमें कम योग्य अथवा अति-साधारण लोगों को प्राथमिकता दी जाए एवं पुरस्कृत किया जाए) की ओर ले जाता है क्योंकि यदि कोई कम योग्य व्यक्ति केवल प्रभावशाली एवं उच्च-पदस्थ लोगों के साथ अपने मधुर निजी संबंधों द्वारा आगे बढ़कर उच्च पद पर पहुँचेगा तो वह अपने जैसे लोगों को ही तो आगे बढ़ाएगा जिसके परिणामस्वरूप योग्यता की उपेक्षा आगे भी चलती ही रहेगी । आज मेरिटोक्रेसी की उपेक्षा के कारण ही हमारे भारतवर्ष में सर्वत्र मीडियोक्रेसी दिखाई देती है - विशेषतः सरकार में तथा सरकारी एवं अर्द्ध-सरकारी संस्थानों व संगठनों में । निजी क्षेत्र में भी जहाँ यह पांव पसार देती है, वहाँ संबंधित संस्था अथवा संगठन को सफल से असफल होने में अधिक समय नहीं लगता । और यह ढीला-ढाला अकुशल तंत्र बनता है चापलूसों, लच्छेदार बातें करने वालों एवं निजी छवि को येन-केन-प्रकारेण धवल बनाने (चाहे सत्य कुछ और हो) वाले अयोग्य एवं अकर्मठ (यानी निकम्मे) लोगों से । 

यही त्रासदी है हमारे देश की । यही कारण है अनेक समस्याओं के अकारण ही जन्म ले लेने का एवं अनेक समस्याओं के सुलझने के स्थान पर अनवरत उलझते जाने का जो अंततोगत्वा जनसामान्य को ही दारूण दुख देती हैं (समर्थों का कुछ नहीं बिगड़ता) । मुझे शर्मा जी का लेख पढ़कर दुख इस बात से हुआ कि अब उनके जैसे पेशेवर प्रबंधन विशेषज्ञ भी आगे बढ़ने के लिए निजी संबंधों (जिनका आधार चापलूसी अथवा स्वार्थाधारित आदान-प्रदान ही होता है) को व्यक्ति की योग्यता से अधिक महत्वपूर्ण बता रहे हैं । नई पीढ़ी तो वैसे भी 'सफलता किसी भी मूल्य पर' को अपने कार्यशील जीवन (करियर) का मूलमंत्र बना ही चुकी है । सभी को सफलता ही तो चाहिए चाहे वह कैसे भी मिले । और जब सफलता के सूत्र चापलूसी, लच्छेदार बातें एवं छवि-निर्माण ही हों तो मन लगाकर ईमानदारी से काम क्यों किया जाए ? कुर्सी चाहे राजनीति की हो अथवा किसी संगठन या कार्यालय के उच्च एवं अधिकार-संपन्न पदाधिकारी की, इन्हीं सूत्रों पर अमल करने से प्राप्त हो रही है । अपवादों को छोड़कर सभी प्रैक्टिकल हो गए हैं । आदर्शों की परवाह किसे है ? चरित्र, स्वाभिमान एवं सद्गुणों को पुस्तकीय बातें माना जाने लगा है (वैसे अब तो ये बातें पुस्तकों में भी नहीं दिखाई देतीं) । 

क्या होगा इस देश का ? 

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Tuesday, September 15, 2020

मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे

सन २०१३ में प्रदर्शित 'काय पो छे' फ़िल्म देखने के उपरांत मैं सुशांत सिंह राजपूत का प्रशंसक बन गया था । तीन मित्रों की कथा पर बनी उस फ़िल्म में सबसे अधिक प्रभावशाली भूमिका भी उन्हें ही मिली थी । फ़िल्म के अंत में तो वे दर्शकों के मन को तल तक छू गए थे । २०१५ में 'डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी' देखने के बाद मेरा यह यकीन पुख़्ता हो गया कि वे बेजोड़ कलाकार थे । इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में बड़े परदे पर अपने करियर का आग़ाज़ करने वाले अदाकारों में उनकी पहचान एकदम जुदा थी - जवां दिलों पर राज करने वाली (छोटे परदे पर तो वे अपनी पहचान पहले ही बना चुके थे) । आने वाले सालों में उन्होंने और भी तरक्की की, तारीफ़ें पाईं, अपनी मक़बूलियत में इज़ाफ़ा किया । शोबिज़ की दुनिया में कामयाबी को अपने कदम चूमने पर मजबूर करने वाले सुशांत के चाहने वालों की तादाद दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही थी कि ... कि अचानक वे मौत को गले लगा बैठे । क्यों ? 

आख़िर क्यों केवल चौंतीस साल की उम्र में वे ज़िन्दगी से बेज़ार हो उठे ? ऐसा क्या हो गया ? यह सवाल केवल सुशांत के लिए ही नहीं, हर उस शख़्स के लिए पूछा जा सकता है जिसने ज़ाहिरा तौर पर कामयाब और ख़ुशी से लबरेज़ नज़र आने के बावजूद आख़िरकार मौत की गोद में ही सुकून महसूस किया । पूरी तरह सही जवाब किसी के लिए नहीं मिल सकता - न महान फ़िल्मकार गुरु दत्त के लिए, न नौजवानी से भरपूर जिया ख़ान के लिए, न किसी और ऐसे युवक या युवती के लिए । गुज़िश्ता कुछ वक़्त में ख़ुदकुशी करने वाले सलेब्रिटीज़ की मानो कतार-सी लग गई है । पर जिस किसी ने भी अपनी जान दी, उसने ऐसा क्यों किया, यह तो सही-सही वही जानता था (या जानती थी) । दूसरे लोग तो सिर्फ़ अंदाज़े ही लगा सकते हैं । हक़ीक़त पर से मुक़म्मल तौर पर परदा उठाना शायद किसी के बस की बात नहीं ।

अचानक ख़ुदकुशी कर लेने वालों के अलावा अपनी मरज़ी से मरने का हक़ भी लोगों द्वारा (कानून से) मांगा गया है जिसे इच्छा-मृत्यु (यूथेनेसिया) का अधिकार भी कहा जाता है । इसके अतिरिक्त मृत्युदान अथवा मर्सी किलिंग की बात भी समय-समय पर उठाई गई है जिसमें यह तर्क दिया जाता है कि यदि संबंधित व्यक्ति सम्मान के साथ जी न सके तो उसे अपने जीवन का अंत स्वयं कर लेने दिया जाए अथवा चिकित्सक उसके लिए यह कार्य कर दें । इस विषय पर बॉलीवुड में दो फ़िल्में बनीं हैं (मैने दोनों ही की समीक्षा की है) : १. शायद (१९७९), २. गुज़ारिश (२०१०) ।  'शायद' में मृत्युदान के विषय पर एक चिकित्सक के दृष्टिकोण से विमर्श किया गया था जबकि 'गुज़ारिश' में संबंधित व्यक्ति के देश के विधि-विधान से इच्छा-मृत्यु का अधिकार मांगने की कथा थी । मरने की ख़्वाहिश कोई अच्छी बात तो नहीं जिसे काबिल-ए-एहतराम समझा जाए लेकिन अगर किसी इंसान की ज़िन्दगी उसके लिए मौत से भी बदतर हो जाए, तब ? ज़िंदगी तो वही है जो जीने लायक हो । इंसान इज़्ज़त और ग़ैरत के साथ जी न सके तो उसे मौत में पनाह कैसे न नज़र आए ? 

किसी इंसान को मार डालना ग़लत है तो किसी को ज़बरदस्ती जीने पर मजबूर करना भी ग़लत ही है (अरुणा शानबाग का जीवन एक ऐसा ही उदाहरण रहा है जिन्हें उनकी देखभाल करने वालों के दबाव में बयालीस लंबे वर्षों तक ऐसी अवस्था में रखा गया जो केवल तकनीकी रूप से ही जीवित अवस्था कही जा सकती है, व्यावहारिक दृष्टि से एक मृतक के समान ही होती है) । लेकिन फिर इस बात को भी निगाह में रखना चाहिए कि ऐसा हर मामला अपने आप में अलग (यूनिक़) होता है । इंसानों के दुख-दर्द से जुड़े मामलों को चावल के दानों की तरह एक जैसा मानकर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि ज़िंदगी सभी को अलग-अलग ट्रीटमेंट देती है । अपना ग़म सभी को सबसे बड़ा लगता है जबकि दूसरों के ग़म हलके लगते हैं पर यह सच्चाई तो नहीं । ग़मों से न हारने वाले और उनसे जूझने का जज़्बा अपने अंदर रखने वाले का फ़लसफ़ा तो यह होता है - दुनिया में कितना ग़म है, मेरा ग़म कितना कम है । एक सच यह भी है कि मरने की बात करना जितना आसान है, उतना वास्तव में मर जाना नहीं । ज़्यादातर इंसान मौत से डरते हैं । ऐसे में मरने वाला / वाली किस असाधारण मानसिक अवस्था से गुज़र रहा था /  रही थी, इसे बूझने के लिए भी एक संवेदनशील हृदय चाहिए ।

और ऐसा संवेदनशील हृदय निश्चय ही उनके पास नहीं होता जो किसी की मौत को एक तमाशा बना देते हैं और बलि का ऐसा बकरा ढूंढ़ते हैं जिसके मत्थे उस मौत की ज़िम्मेदारी का मटका फोड़ा जा सके । विगत कुछ वर्षों से 'मीडिया ट्रायल' नामक एक शब्द-युग्म बहुप्रचलित हो गया है जिसका अभिप्राय है किसी आरोपी (अथवा संभावित आरोपी) के कथित अपराध का निर्णय न्यायालय में होने की प्रतीक्षा किए बिना संचार-माध्यमों विशेषतः टी.वी. चैनलों द्वारा अपने स्तर पर आधे-अधूरे तथ्यों एवं असंबद्ध लोगों द्वारा किए गए सतही विमर्श के आधार पर कर दिया जाना । ऐसे मीडिया-ट्रायल का परिणाम यह होता है कि आरोपी चाहे निर्दोष ही क्यों न हो (तथा कालांतर में न्यायालय द्वारा दोषमुक्त कर दिया जाए), जनसाधारण में उसकी छवि मलिन हो जाती है जिसके दुष्परिणाम उसे जीवन-भर भोगने पड़ते हैं । मीडिया-ट्रायल करने वाले अपने तुच्छ व्यावसायिक-स्वार्थ के निमित्त किसी मासूम का करियर एवं पारिवारिक जीवन नष्ट कर देते हैं और उनके इस दुष्कृत्य पर उंगली तक नहीं उठती ।

अब सुशांत के मामले में भी वैसा ही एक तमाशा शुरु हो गया है (जो दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है) जैसा कि निर्भया कांड के मामले में हुआ था । जिस तरह से निर्भया के मामले में उसके माता-पिता की भूमिका ऐसी लगती थी कि वे अपनी पुत्री की त्रासदी से दुखी कम और मीडिया पर सलेब्रिटी जैसी हैसियत पाकर प्रफुल्लित अधिक थे, वैसा ही सुशांत के परिजनों के मामले में भी लग रहा है । एक प्रतिभाशाली युवा संसार से चला गया, एक बिन मां का बेटा और परिवार का इकलौता पुत्र सबको छोड़कर चला गया, एक संभावनाओं से भरपूर कलाकार असमय ही दुनिया को अलविदा कह बैठा; यह गहन दुख की बात है, मीडिया पर तमाशा करने की नहीं । जिस रिया चक्रवर्ती के पीछे सुशांत के घरवाले (और राजनीतिक सत्ता से जुड़े अपने निहित स्वार्थों के वशीभूत सरकारी अभिकरण) हाथ धोकर पड़े हुए हैं; क्या वह किसी की बेटी नहीं, किसी की बहन नहीं, भारतभूमि पर जन्मी एक प्रतिभाशाली युवा कन्या नहीं ? क्या उसके कोई मानवीय अधिकार नहीं, क्या उसे बिना न्यायिक प्रक्रिया के केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर खलनायिका बना दिया जाना संवेदनहीनता की अति नहीं ? जब अधिकांश लोग सुशांत की मृत्यु से लगी आग पर केवल अपनी-अपनी रोटियां सेकने की जुगत में लगे हों तो इन गंभीर प्रश्नों की सुध कौन ले ? 

सुशांत की असाधारण लोकप्रियता के कारण उनका मामला हाई-प्रोफ़ाइल बन गया है अन्यथा विगत एक वर्ष में आत्मघात करने वाले कलाकारों की संख्या कम-से-कम दो अंकों में जाती है । लेकिन उनमें से किसी के दुखद आत्मघात पर कोई चर्चा नहीं हो रही है क्योंकि ऐसी चर्चा से किसी का स्वार्थ सिद्ध नहीं होता है । चार वर्ष पूर्व (नौ अगस्त सन दो हज़ार सोलह को) अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री कलिखो पुल ने आत्महत्या कर ली थी लेकिन एक मुख्यमंत्री स्तर के व्यक्ति द्वारा किए गए इस दुखद कृत्य की जाँच तो छोड़िए, ठीक से चर्चा तक नहीं हुई । उनके आत्महत्या-पत्र (सुइसाइड नोट) को सार्वजनिक तक नहीं किया गया जबकि यह कहा जाता है कि उन्होंने व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार से दुखित होकर ऐसा कदम उठाया था एवं अपने आत्महत्या-पत्र में बहुत-से चौंकाने वाले रहस्योद्घाटन किए थे । उनके आत्मघात को बड़ी सहूलियत से भुला दिया गया । यह केवल मीडिया, राजनीतिक दलों तथा संबंधित लोगों की ग़ैर-ज़िम्मेदारी का ही नमूना नहीं बल्कि हम भारतीयों की विवेकशून्यता एवं पाखंड का भी ज्वलंत उदाहरण है ।

आत्मघाती प्रवृत्ति अवसाद (डिप्रैशन) का ही उत्पाद है । छोटे-मोटे एवं अस्थायी अवसाद से तो अधिकतर लोगों का अपने जीवन में कभी-न-कभी साक्षात् हो ही जाता है किन्तु जब अवसाद का घनत्व एवं अवधि दोनों ही बढ़ने लगें तो वह निस्संदेह चिंता का विषय होता है । अवसादग्रस्त पुरुष / महिला यदि दृढ़ व्यक्तित्व का / की है तो वह अपना उपचार स्वयं ही कर सकता है / सकती है । गम्भीर अवस्था होती है अवसाद का ब्रेकिंग प्वॉइंट पर पहुँच जाना जिसके उपरांत संबंधित व्यक्ति मानसिक रूप से टूट जाता है । मैं स्वयं जीवन में कई बार गंभीर अवसाद से गुज़र चुका हूँ । प्रत्येक बार मैंने अपने आपको स्वयं ही संभाला तथा जीवन को नये सिरे से आरंभ किया । इसी विषय पर मैंने कई वर्ष पूर्व एक लेख लिखा था ‌- कहीं आप ब्रेकिंग प्वॉइंट के निकट तो नहीं जिसमें  मैंने समस्या तथा उसके समाधान, दोनों ही पर अपने विचार अभिव्यक्त्त किए थे । 

पेशे से चार्टर्ड लेखाकार होने के बावजूद मैंने जब सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी की थी तो अपने मुख्य विषयों के रूप में मनोविज्ञान एवं समाजशास्त्र को चुना था । आज आत्मघात के बारे में बात करते समय मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि अवसाद के ऐसी उन्नत अवस्था तक पहुँच जाने एवं व्यक्ति के पूरी तरह बिखर जाने को समझने के लिए मनोविज्ञान तथा समाजशास्त्र, दोनों ही को जानना आवश्यक है । टूटन और घुटन की मानसिक अवस्था व्यक्ति की निजी होती है जिसके मूल में यह तथ्य महत्वपूर्ण होता है कि उसके व्यक्तित्व का गठन किस प्रकार हुआ है तथा वह कितने दबाव सह सकता है लेकिन इस गठन के पीछे जो उसके बालपन एवं लड़कपन में हुए लालन-पालन एवं समाजीकरण की प्रक्रिया होती है, उसमें तो परिवार एवं समाज की ही भूमिका अहम रही होती है । स्वामी विवेकानंद अपने देशवासियों के लिए चाहते थे कि उनके स्नायु फ़ौलाद के हों अर्थात् वे मानसिक रूप से बहुत मज़बूत हों । लेकिन ऐसे नागरिकों के निर्माण के लिए आवश्यक है कि परिवार तथा समाज भी अपनी वांछित भूमिका सही ढंग से निभाएं ।

अवसाद का प्रमुख कारण होता है अपने भीतर एकाकीपन की अनुभूति - एक उदासी भरा अकेलेपन का अहसास कि मेरा कोई नहीं है । स्वर्गीय किशोर कुमार जी का अमर गीत इस स्थिति पर पूरी तरह से लागू होता है - कोई होता जिसको अपना हम अपना कह लेते यारों, पास नहीं तो दूर ही होता लेकिन कोई मेरा अपना' । यहाँ पास नहीं तो दूर ही होता' लफ़्ज़ बहुत गहरे मायने रखते हैंं । केवल किसी के साथ रहने या लोगों के इर्द-गिर्द मौजूद रहने से ही अकेलापन दूर हो जाए, यह ज़रूरी नहींं । अगर कोई समझने वाला न हो तो इंसान भीड़ में भी अकेला ही होता है । और ऐसा कोई जो आपको समझ ले, केवल किस्मत से मिलता है । भाग्यशाली है वो जिसे समझने वाला कोई हो, फिर (जैसा कि गीत में कहा गया है) चाहे वह भौतिक रूप से दूर ही क्यों न हो ।

लेकिन जब इंसान की ज़िंदगी में ऐसा कोई अपना, ऐसा कोई समझने वाला (या वाली) न हो और हालात (जो कभी-कभी बयान भी नहीं किए जा सकते) उसे बुरी तरह से तोड़ रहे हों तो वह क्या करे ? वही करे जो मैंने कई बार किया है (और अब भी करता हूँ) - ख़ुद ही ख़ुद को संभाले । एक ग़ज़ल की पंक्तियां हैं - दर्द पैग़ाम लिए चलता है, जैसे कोई चिराग़ जलता है, कौन किसको यहाँ संभालेगा, आदमी ख़ुद-ब-ख़ुद संभलता है । इसलिए जैसे भी हो,  इंसान ख़ुद को संभाले । आत्मघात कोई समाधान नहीं । किसी के मरने से दुनिया को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला । मैं तो ख़ुदकुशी की चाह रखने वाले हर परेशान-हाल शख़्स को कुँअर बेचैन जी के ये अशआर सुनाना चाहता हूँ : 
                                              माना कि मुश्किलों का तेरी हल नहीं कुँअर
                                              फिर भी तू ग़म की आग में यूं जल नहीं कुँअर
                                              कोई-न-कोई रोज़ ही करता है ख़ुदकुशी
                                              क्या बात है कि झील में हलचल नहीं कुँअर

अवसादग्रस्त व्यक्ति अगर कहे कि जीने की चाहत नहीं तो मैं उत्तर में यही कहूंगा कि मर के भी राहत नहीं । इंसान अपने ग़म से ज़्यादा उन लोगों के ग़म की परवाह करता है जिनसे उसे प्यार है, लगाव है (चाहे उन्हें न हो) । आज के भ्रष्ट भारत की सच्चाई यही है कि आत्महत्या करने वाला जिन्हें अपने पीछे छोड़ जाता है, उन्हें कई बार जीते-जी मरना पड़ता है (अगर वे ऊंची पहुँच वाले या अति-सामर्थ्यवान न हों) । उनकी ज़िन्दगी को मौत से भी बदतर बना देने में न तो सरकारी अमलदारी कोई कसर उठा रखती है, न ही मीडिया (चाहे आत्महत्या करने वाला अपने सुइसाइड नोट में यह लिखकर ही क्यों न जाए कि उसकी मृत्यु के लिए कोई अन्य उत्तरदायी नहीं) । आदमख़ोर मीडिया को तो रोज़ लाशें चाहिए - मुरदों की नहीं, ज़िन्दों की । और न्याय की बात करना ही व्यर्थ है । किसी अपवादस्वरूप उदाहरण को छोड़ दिया जाए तो स्वतंत्र भारत में दशकों से यही सिद्ध हो रहा है कि यहाँ  न्याय समर्थों की दासी है । ऐसे में डिप्रैशन का (या की) शिकार और उसका चहेता (या चहेती) अगर आम लोग हैं तो अपने बाद जीने पर मजबूर लोगों के हक़ में बेहतर है कि ऐसा इंसान मरने की जगह जिये और अपने डिप्रैशन से लड़े । वरना मरने के बाद भी चैन या राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है । काश सुशांत मरते वक़्त यह सोच पाते कि उनके जाने के बाद रिया और उनके परिजनों पर मीडिया और सरकारी महकमात के हाथों क्या बीतेगी !

अपनी बात मैं अज़ीम शायर ज़ौक़ साहब के इस शेर के साथ ख़त्म करता हूँ :

                                             अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे
                                               मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे ?
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Saturday, September 5, 2020

सुर बिन तान नहीं, गुरु बिन ज्ञान नहीं

आज शिक्षक दिवस है - भारत में शिक्षकों के नाम समर्पित एक दिन । भारतीय परंपरा में  न केवल गुरु को माता-पिता के समकक्ष माना गया है वरन उसे देवों से कम नहीं समझा गया है । बृहदारण्यक उपनिषद में श्लोक है :

                                              गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
                                              गुरुः साक्षात्‌ परंब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

प्राचीन भारत में विद्यमान बड़े पवित्र गुरु-शिष्य संबंधों के विषय में हमें उपलब्ध ग्रंथों एवं प्रचलित व बहुश्रुत कथाओं के माध्यम से जानने को मिलता है । यह वह युग था जब शिष्य अपने घर-परिवार से दूर गुरुकुल में गुरु के साथ ही रहते हुए गुरु तथा गुरुपत्नी की सेवा करते हुए शिक्षा एवं संस्कार दोनों ही प्राप्त करता था । गुरु का उद्देश्य केवल औपचारिक शिक्षा देना ही नहीं, आदर्श नागरिकों के रूप में आदर्श समाज की नींव रखना भी होता था । न गुरु धन-लोभी होता था, न शिष्य मात्र नौकरी का आकांक्षी । 

अब न वे गुरु रहे, न वे शिष्य और न वह युग । ज़माना बदल गया है । अब गुरु का स्थान वेतनभोगी अथवा ट्यूशन (अथवा कोचिंग कक्षाओं) से कमाने वाले अध्यापक ले चुके हैं  एवं शिष्य नौकरी के लिए आवश्यक अर्हता पाने के लिए जो ज्ञान चाहिए, उसे अध्यापक को (अथवा संबंधित संस्थान को) शुल्क देकर प्राप्त करते हैं । संस्कार व चरित्र पुस्तकीय बातें बनकर रह गए हैं जिनकी आवश्यकता किसी को नहीं है - न पढ़ने वालों को, न पढ़ाने वालों को, न शिष्यों के परिजनों को, न समाज को, न सरकार को ।

तिस पर भी अच्छे तथा निष्ठावान शिक्षकों को अपने विद्यार्थियों का आदर-मान प्राप्त होता ही है । मैं श्री सुरेन्द्र कुमार मिश्र को सदैव स्मरण रखता हूँ जिन्होंने मुझे अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान दिया तथा इस प्रतिस्पर्द्धी संसार के योग्य बनाया । मैं पंडित नारदानंद जी को भी सदा अपनी स्मृतियों में रखता हूँ जिन्होंने मुझे संगीत के संसार से सदा के लिए संयुक्त कर दिया । आज ये महान व्यक्ति दिवंगत हो चुके हैं लेकिन मेरे तथा मेरे जैसे अनेक शिष्यों के हृदय में वे सदैव ज्योति बनकर जलते रहेंगे, उन्हें प्रकाशित करते रहेंगे । मेरी धर्मपत्नी सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने से पूर्व सतरह वर्षों से अधिक समय तक (ग्रामीण क्षेत्र में) शिक्षिका रहीं तथा अपने निष्ठापूर्ण अध्यापन का फल उन्हें अनेक बालक-बालिकाओं तथा उनके अभिभावकों से जीवन भर के सम्मान  के रूप में मिला है ।

हिंदी फ़िल्मों ने गुरु-शिष्य संबंध की महत्ता को भलीभांति पहचाना तथा इस विषय पर बहुत-सी फ़िल्में बॉलीवुड में बनाई गईं विशेषतः स्वातंत्र्योत्तर सिनेमा में । मैं जागृति (१९५४), परिचय (१९७२), पायल की झंकार (१९८०) तथा तारे ज़मीन पर (२००७) को महान फ़िल्मों की श्रेणी में रखता हूँ । इनमें से 'परिचय' एक खंडित परिवार के बालकों को बिना शारीरिक दंड के अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले अल्पकालिक शिक्षक की प्रेरक गाथा है जो दर्शक को एक अच्छी अनुभूति देकर समाप्त होती है । श्वेत-श्याम फ़िल्म 'जागृति' तथा इक्कीसवीं सदी की फ़िल्म 'तारे ज़मीन पर' ऐसी मार्मिक फ़िल्में रही हैं जिन्होंने मुझे अश्रु बहाने पर विवश कर दिया । 

पायल की झंकार (१९८०) सबसे अलग पहचान रखती है क्योंकि यह वास्तव में ही हमारे देश की महान गुरु-शिष्य परंपरा को आधुनिक युग में प्रस्तुत करती है । इसमें आदर्शवादी नृत्य-गुरु भी हैं तो आदर्शवादी, सेवाभावी, संवेदनशील तथा नृत्य-कला के प्रति समर्पित शिष्या भी । शिष्या जो एक नन्ही बालिका ही है, वयोवृद्ध गुरु के घर में उनके परिवार की एक सदस्या ही बनकर रहती है तथा उनसे नृत्य कला का ज्ञान प्राप्त करती है । मुझे यह फ़िल्म इतनी पसंद आई कि मैंने इसकी समीक्षा हिंदी तथा अंग्रेज़ी, दोनों ही भाषाओं में लिखी । 

गुरु-शिष्य संबंधों के विविध आयाम - नर्तकी (१९६३), बूंद जो बन गई मोती (१९६७), आँसू बन गए फूल (१९६९), अंजान राहें (१९४), इम्तिहान (१९४), बुलंदी (१९), हिप हिप हुर्रे (१९), सर (१९३), सुर (२००२), से सलाम इंडिया (२००७), गुड बॉय बैड बॉय (२००७), आरक्षण (२०१) आदि हिंदी फ़िल्मों में देखने को मिले । इनमें से कुछ फ़िल्में औसत गुणवत्ता की रहीं तो कुछ अपनी विषय-वस्तु के साथ ठीक से न्याय नहीं कर पाईं । फिर भी एक तवायफ़ का जीवन संवारने वाले शिक्षक की कथा - 'नर्तकी', स्वर्गीय वी. शांताराम द्वारा प्रस्तुत एक आदर्शवादी शिक्षक की कथा - 'बूंद जो बन गई मोती', भटके विद्यार्थी को मार्गदर्शन देकर स्वयं ही पथभ्रष्ट हो जाने वाले शिक्षक की कथा - 'आँसू बन गए फूल' तथा अनुशासनहीन विद्यार्थियों को अनुशासित होकर जीतना सिखाने वाले खेल-शिक्षक की कथा - 'हिप हिप हुर्रे' निश्चय ही अच्छी फ़िल्में मानी जा सकती हैं । अपेक्षाकृत नवीन फ़िल्म (२०८ में प्रदर्शित)  'हिचकी' भी गुरु-शिष्य संबंधों पर अपने समग्र रूप में एक अच्छी फ़िल्म कही जा सकती है ।

'अंजान राहें' युवा होते विद्यार्थियों की अनकही समस्या जैसे एक अछूते विषय पर बनाई गई फ़िल्म थी जिसे उस ज़माने में हटकर माना जा सकता था लेकिन अच्छे विषय के बावजूद वह फ़िल्म एक बेहतर फ़िल्म बनते-बनते रह गई । 'हिप हिप हुर्रे' जैसी अच्छी फ़िल्म बनाकर अपना निर्देशकीय करियर आरंभ करने वाले प्रकाश झा 'आरक्षण' बनाते समय अपनी ही राजनीतिक उलझन के मकड़जाल में फँसकर फ़िल्म का कबाड़ा कर बैठे । 'सुर' का विषय अलग हटकर था जिसमें शिक्षक (या गुरु कह लें) कोई आदर्शवादी व्यक्ति न होकर इक्कीसवीं सदी का दुनियादार आदमी था जबकि शिष्या गुरु से अधिक प्रतिभाशाली होने के साथ-साथ आदर्शवादी एवं गुरु पर श्रद्धा रखने वाली थी; पर निर्देशिका तनूजा चंद्रा संभवतः स्वयं ही इस जटिल विषय को ठीक से समझ नहीं सकीं और दर्शकों के समक्ष उन्होंने एक अधकचरी फ़िल्म परोस दी ।


'इम्तिहान' स्वर्गीय विनोद खन्ना अभिनीत एक ऐसी फ़िल्म है जो फ़ॉर्मूलाबद्ध होकर भी प्रभावित करती है । इसका कालजयी गीत 'रुक जाना नहीं तू कहीं हार के' विगत कई दशकों से इस लेख के लेखक सहित असंख्य दर्शकों एवं श्रोताओं को प्रेरणा देता आ रहा है तथा आगे भी देता रहेगा ।

अंत में 'पायल की झंकार' की बात पुनः करना चाहूंगा । 'पायल की झंकार' की कहानी की भांति ही इसका संगीत भी अत्यंत मधुर एवं हृदय-विजयी है । इसका एक गीत है 'सुर बिन तान नहीं, गुरु बिन ज्ञान नहीं' । और सच ही है । परीक्षा देने के लिए औपचारिक शिक्षा तो किसी भी तरह पाई जा सकती है लेकिन ज्ञान तो गुरु से ही मिलता है । सौभाग्यशाली है वह शिष्य जिसे सच्चा गुरु मिले । और आज के युग में वह सच्चा गुरु भी सौभाग्यशाली ही कहा जाएगा जिसे सच्चा एवं समर्पित शिष्य मिल जाए ।

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Friday, September 4, 2020

मेरी लेखन-यात्रा का नया पड़ाव : किंडल तथा यूट्यूब पर पदार्पण

कल शिक्षक दिवस है तथा मैं इस अवसर पर पृथक् रूप से कुछ लिखने का प्रयास करूंगा क्योंकि प्रत्येक शिक्षक दिवस पर मुझे अपने अंग्रेज़ी शिक्षक स्वर्गीय श्री सुरेन्द्र कुमार मिश्र की याद आ जाती है जो यदि मुझे न मिले होते तो मैं भी उन असंख्य राजस्थानी छात्रों की भांति अंग्रेज़ी भाषा के ज्ञान में दुर्बल ही रह जाता जो राजकीय विद्यालयों में हिंदी माध्यम से शिक्षार्जन करते थे (एवं अब भी करते होंगे) । वे अपना उपनाम मिश्र ही लिखते थे लेकिन मेरे गृहनगर (सांभर झील, ज़िला जयपुर) में सब उन्हें आदरपूर्वक मिश्राजी कहते थे  यह मेरा परम सौभाग्य है कि मैं मिश्राजी का शिष्य बना जिसका परिणाम यह निकला कि न केवल मेरे अंग्रेज़ी भाषा के भावी ज्ञान एवं उपयोग की सुदृढ़ नींव रखी गई वरन मैंने १९८५ में  राजस्थान बोर्ड की उच्च माध्यमिक (हायर सैकंडरी) परीक्षा के वाणिज्य वर्ग में सर्वप्रथम स्थान भी प्राप्त किया एवं अंग्रेज़ी भाषा के प्रश्न-पत्र में पचास में से उनचास अंक प्राप्त करके सभी को चौंका दिया । 

मिश्राजी ने मुझे नौवीं तथा दसवीं कक्षाओं में अंग्रेज़ी विषय पढ़ाया । यह वही समय था जब न केवल मेरी अंग्रेज़ी की लिखावट में सुंदरता आई वरन मुझे अपने मन से कुछ-न-कुछ लिखना भी अच्छा लगने लगा । मेरी माता स्वर्गीया  श्रीमती शकुंतला माथुर ने हिंदी भाषा में प्रभाकर की उपाधि प्राप्त की थी । हिंदी भाषा तथा साहित्य में (तथा कुछ-कुछ उर्दू भाषा की ओर भी) मेरा रूझान उन्हीं के कारण बना । आज आयु का एक वृहत् भाग व्यतीत हो चुकने के उपरांत मुझे दिखाई देता है कि मैं इन दोनों ही भाषाओं से अनुरक्त हूँ । इसीलिए मैं दोनों ही में पढ़ता हूँ, दोनों ही में लिखता हूँ । मुझे उर्दू लिपि नहीं आती लेकिन उर्दू शायरी, साहित्य, ग़ज़लें, नज़्में और नग़मे मुझे बहुत भाते हैं । उन्हें या तो मैं सुनता हूँ या देवनागरी लिपि में उपलब्ध हों तो पढ़ता हूँ । 

अंग्रेज़ी तथा हिंदी, दोनों ही भाषाओं की औपचारिक शिक्षा तो मेरे लिए केवल बारहवीं कक्षा तक ही चली । मैंने स्नातक (बी. कॉम.) तक की शिक्षा हिंदी भाषा में प्राप्त की । तदोपरान्त चार्टर्ड लेखाकार की उपाधि (कलकत्ता से) अंग्रेज़ी भाषा में परीक्षाएं देकर प्राप्त की एवं जब १९९८ में भारतीय सिविल सेवा परीक्षा तथा २००० में राजस्थान प्रशासनिक सेवा के साक्षात्कार स्तर तक पहुंचा तो मेरा लिखित परीक्षा एवं साक्षात्कार, दोनों में ही माध्यम अंग्रेज़ी था । बहरहाल विभिन्न नौकरियों के साथ-साथ दोनों ही भाषाओं की पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते कभी-कभार कुछ लिखने का भी मन करता था तो यूं ही मन-बहलाव के लिए कुछ लिख लेता था । तब भी एवं अब भी, मेरा शुद्धता पर बल रहता है तथा मैं अपने लेखन में भाषाओं की मिलावट जहाँ तक संभव हो, नहीं ही करता । 

२००३ में मैंने अपना पहला हिंदी एकांकी 'दोस्ती' लिखा जिसका सौभाग्य है कि उसे कतिपय नाट्यमंडलों ने मंचित किया तथा उसका एक वीडियो स्वरूप आज यूट्यूब पर भी उपलब्ध है । आने वाले वर्षों में मैंने तीन हिंदी एकांकी और लिखे - २००८ में 'भूमि-पुत्र', २००९ में 'प्रेम और संस्कृति' तथा २००- में 'चिराग-ए-सहर' । २०० में हिन्दी फ़िल्मों तथा पुस्तकों की (कालांतर में अंग्रेज़ी तथा प्रांतीय फ़िल्मों एवं पुस्तकों की भी) समीक्षाएं अंग्रेज़ी भाषा में लिखकर इंटरनेट पर उपलब्ध माउथशट नामक एक प्लेटफ़ॉर्म पर डालनी आरंभ कीं । चूंकि वे तथा उनके साथ बीच-बीच में लिखे गए अंग्रेज़ी ब्लॉग पर्याप्त रूप से लोकप्रिय हुए तो यह लेखन बरसों तक चला । अब मेरे ये अंग्रेज़ी लेख वर्डप्रैस नामक वेबसाइट पर  भी उपलब्ध हैं ।

२० तथा २०२ में हैदराबाद 'बी' रेडियो पर हिंदी वार्ताएं देने का अवसर मिला जो 'प्रकाश किरण' नामक कार्यक्रम में प्रातःकाल (मेरे ही स्वर में) प्रसारित हुईं । कुल चार वार्ताएं मैंने इस निमित्त लिखीं - १. भावनाएं, २. संंवेदना, ३. मर्यादा, ४. संत-सेवा । अब मैंने अपना हिंदी का (प्रस्तुत) ब्लॉग भी आरंभ कर दिया तथा इन वार्ताओं को तो लेख के रूप में इस पर डाला ही, समय-समय पर अन्य हिन्दी लेख भी सिरजकर इस पर डालने आरंभ कर दिए । अंग्रेज़ी की तुलना में हिंदी में कम लिखा । इस बात का संबंध पढ़ने वालों की कम संख्या से नहीं है क्योंकि मेरा सिद्धांत तो सदा स्वांत: सुखाय के लिए अथवा आत्मसंतोष के लिए लिखना ही रहा है चाहे उसे कोई पढ़े अथवा नहीं ।

२०२ में अंग्रेज़ी तथा बांग्ला की सुपरिचित लेखिका, कवयित्री एवं समीक्षिका - गीताश्री चटर्जी की प्रेरणा से एक हिंदी उपन्यास लिखना आरंभ किया । मौलिक सृजन था, बहुत सोचना पड़ता था और लेखन की गाड़ी बार-बार अटक जाती थी । अतः डेढ़ साल के उपरान्त २०४ में जाकर मैं उसे पूरा कर पाया । उपन्यास का नाम है - 'क़त्ल की आदत' । 

अब लिख तो लिया पर छापे कौन ? छापने वाला आज तक न मिला । मेरी पुत्री की इच्छा है कि यह काग़ज़ पर छपे तथा इसे लोग किताब के रूप में पढ़ें । अब उसकी इच्छा मैं कब पूरी कर पाता हूँ, यह भविष्य ही बताएगा । बहरहाल भारत में स्व-प्रकाशन के प्रणेताओं में अग्रणी रहीं महिला उपन्यासकार - रसना अत्रेय जी की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से मैं सतत प्रयास करता रहा कि काग़ज़ पर नहीं तो ई-पुस्तक के रूप में ही प्रकाशित हो जाए । ई-पुस्तक के रूप में यह पहले पोथी डॉट कॉम नामक स्व-प्रकाशन वेबसाइट पर छपा जहाँ यह आज भी उपलब्ध है तथा कुछ समय के लिए डेलीहंट नामक वेबसाइट पर भी उपलब्ध रहा । दोनों ही स्थलों पर यह पीडीएफ़ रूप में डाला गया । लेकिन विलंब से ही सही, अब मैंने इसे किंडल पर भी प्रकाशित कर दिया है । मैं फ़ेसबुक से प्रायः दूर ही रहता हूँ लेकिन अपने इस उपन्यास के नाम से मैंने फ़ेसबुक पर भी एक पृष्ठ बना रखा है जिसका नाम वही है जो उपन्यास का नाम है ।

उपन्यास से संबंधित लिंक इस प्रकार हैं : 

https://www.facebook.com/pages/category/Book/%E0%A5%98%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%A4-585891931517016/

https://store.pothi.com/book/ebook-%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A5%81%E0%A4%B0-%E0%A5%98%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%A4

https://www.amazon.in/%E0%A5%98%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-ebook/dp/B0899QTWF1

मेरा पुत्र विगत कुछ समय से एक लोकप्रिय यूट्यूब चैनल चला रहा है । फ़िल्म समीक्षाएं करने में मेरी रुचि को देखकर उसने मेरे लिए भी एक यूट्यूब चैनल बना डाला है - Forgotten Bollywood Gems जिस पर मैंने हिंदी में बोलते हुए भूली-बिसरी हिंदी फ़िल्मों के विषय में अपने ज्ञान को साझा करना आरंभ किया है । इस पर डाला गया पहला वीडियो एक भूली-बिसरी श्वेत-श्याम हिंदी फ़िल्म - 'इंसाफ़ का मंदिर' (१९६९) से संबंधित है जिसका लिंक इस प्रकार है :

https://www.youtube.com/watch?v=Yt5Atd8BmmM

मैं कैमरे के समक्ष सहज नहीं हूँ, अत: देखने वालों को इस चैनल तथा मेरे प्रदर्शन, दोनों में ही सुधार की बहुत आवश्यकता प्रतीत होगी । मुझे तो हुई ही है । और सुधार की भावना तो कर्म करने वाले के मानस में सदा रहनी ही चाहिए । 

मैं नौकरी-पेशा हूँ, इसलिए रचनात्मकता के लिए समय कम ही मिलता है । तिस पर मैं तकनीकी रूप से अधिक सक्षम भी नहीं हूँ । इस यूट्यूब चैनल का श्रेय वस्तुतः मेरी संतानों (पुत्र-पुत्री) को ही जाता है जिनसे मैं इन दिनों दूर रहता हूँ क्योंकि मेरी नौकरी विशाखापट्टणम में है जबकि मेरा परिवार पुणे में रहता है ।

अपनी लेखन-यात्रा के इस पड़ाव पर मैं अपने सभी प्रशंसकों तथा आलोचकों का आभारी हूँ एवं आगे भी रहूंगा । शुक्रिया ! शुक्रिया ! शुक्रिया !