Tuesday, October 22, 2019

फ़लसफ़ा प्यार का

प्यार ! इश्क़ ! मुहब्बत ! आशिक़ी ! आशनाई ! और शुद्ध हिंदी में कहें तो प्रेम ! क्या है इस शय का फ़लसफ़ा ? क्या है इसका दर्शन ? क्या है इसका अर्थ ? कहने की आवश्यकता नहीं कि बात यहाँ स्त्री-पुरुष के उस प्रेम की हो रही है जो आदिकाल से चला आ रहा है और जो सृष्टि का आधार है । नर-मादा प्रणय-संबंध तो पशु-पक्षियों में भी होते हैं जिनसे उनकी प्रजाति उत्तरोत्तर चलती रहती है लेकिन मनुष्यों की बात भिन्न इसलिए है क्योंकि उनके प्रेम में केवल देह ही नहीं भावनाएँ भी सम्मिलित होती हैं । इसलिए एक पुरुष एवं एक नारी जब परस्पर प्रेम-बंधन में बंधते हैं तो वे एक-दूसरे से प्रेम में डूबी हुई बातें करते हैं, एक-दूसरे को प्रेम-पत्र लिखते हैं, जब मिलते हैं तो एक-दूसरे को प्रेमभरी दृष्टि से देखते हैं, बिना स्पर्श के भी एक-दूसरे के साहचर्य से आनंदित होते हैं, सीधे-सीधे मिलना संभव न हो तो एक-दूसरे को छुप-छुप के देखने का प्रयास करते हैं, कवि-हृदय हों तो कविताएँ रचते हैं, एक-दूसरे को प्रेमोपहार देते हैं जिनका मूल्यांकन केवल उनमें निहित भावों से ही किया जा सकता है । उर्दू शायरी भरी-पड़ी है इश्क़ो मुहब्बत के जज़्बात और इज़हार से । असफल प्रेमियों की दर्दभरी कथाएँ अमर हो चुकी हैं  और लोकरुचि का अंग बनकर सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती आ रही हैं । सभी भाषाओं और सभी देशों के साहित्य, नाट्यकर्म और सिनेमा का मुख्य अंश प्रेमकथाएँ ही हैं । यह संसार न केवल प्रेम के द्वारा ही चल रहा है वरन इसका सौंदर्य भी प्रेम के कारण ही है । ज़रा सोचिए, प्रेम के बिना यह संसार कितना कुरूप होता ! 

किसी को किसी से प्रेम क्यों और कैसे होता है, यह तो सनातन काल से चला आ रहा अनसुलझा रहस्य है । लेकिन इस लेख में एक हिंदी उपन्यास की समीक्षा के बहाने मैं इस बात पर विमर्श करना चाहता हूँ कि प्रेम वस्तुतः है क्या ? प्रेम में दैहिक आकर्षण सम्मिलित हो सकता है, लेकिन यह उससे कहीं अधिक है, बहुत अधिक है । मैंने देखा है, जाना है और महसूस किया है कि लोग प्रेम करते तो हैं लेकिन उसके मर्म को समझते नहीं । अपने निजी अनुभव से मैं यह जान पाया हूँ कि प्रेम कोई लेन-देन नहीं, यह तो केवल देने का ही नाम है । सच्चे प्रेम की कसौटी है त्याग और बलिदान । दिलों के सौदे नफ़ा-नुकसान देखकर नहीं किये जा सकते । नफ़े-नुकसान का सवाल जहाँ उठे, वहाँ और चाहे कुछ भी हो; प्यार नहीं हो सकता । प्यार में सौदा नहीं होता । न ही कोई शर्तें लगाई जाती हैं । जिससे प्यार किया जाए, उससे कुछ पाने की नहीं बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उसके लिये सब कुछ छोड़ देने की इच्छा ही प्यार करने वाले के मन में पूरी शिद्दत से समा जाती है । किसी की मुहब्बत ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं मिल सकती, उसे तो सजदा करके ही हासिल किया जा सकता है । कुछ ऐसे ही जज़्बात से सराबोर और पढ़ने वाले के दिल को छू जाने वाला हिंदी उपन्यास है - 'सुहाग से बड़ा' जो तीन दशक पूर्व स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की लेखनी से निकला था ।

भारतीय परंपरा और संस्कारों के अनुसार एक हिंदुस्तानी औरत के लिए उसका सुहाग अर्थात् उसका पति ही सर्वोपरि होता है (यदि वह क्रूर अथवा कुकर्मी हो तो बात अलग है) । भारतीय नारी के लिए उसके सुहाग से बढ़कर कुछ नहीं होता, कोई नहीं होता । एक हिंदू विवाहिता का आदर्श सावित्री है जो सत्यवान को मृत्यु के मुख से लौटा लाई थी । फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई उसके लिए उसके सुहाग से भी बड़ा बन जाए ? इस प्रश्न का उत्तर यह उपन्यास देता है जो एक मार्मिक प्रेमकथा द्वारा प्रेम की वास्तविक परिभाषा प्रस्तुत करता है ।  

'सुहाग से बड़ा' कहानी है देवराज और माधुरी के पवित्र प्रेम की । घटनाक्रम पटना शहर में रखा गया है । देवराज अपराध की दुनिया में है लेकिन बचपन में मिली एक गहरी पीड़ा ने उसके कोमल मन पर ऐसी छाप छोड़ी है कि वह अपराधी होकर भी एक संवेदनशील मानव है । कानून के ख़िलाफ़ काम करते हुए भी वह अपने उसूलों के साथ कोई समझौता नहीं करता । वह वे काम करता है जिनकी इजाज़त कानून नहीं देता मगर वह ऐसा कोई काम नहीं करता जिसकी इजाज़त उसका ज़मीर उसे नहीं देता ।   

इधर माधुरी बहन है अशोक की जिसे पुलिस में नौकरी मिलने पर उसकी प्रशिक्षण-अवधि में ही एक गोपनीय योजना के अंतर्गत पुलिस का मुख़बिर बनाकर देवराज के दल में घुसा दिया जाता है । ये दोनों भाई-बहन अनाथ हैं और इसीलिए जहाँ अशोक के लिए अपनी बहन माधुरी से बढ़कर कोई नहीं है, वहीं माधुरी के लिए सबसे प्यारा कोई है तो बस उसका भाई अशोक है । अशोक का मित्र अमित पहले से ही पुलिस की नौकरी में है और वह माधुरी से विवाह करना चाहता है जिस पर अशोक को कोई आपत्ति नहीं । जहाँ तक माधुरी का प्रश्न है, अपने भाई की इच्छा की ख़ातिर उसे भी अमित से विवाह करना स्वीकार्य है । लेकिन . . .

लेकिन हालात माधुरी को देवराज के निकट ले आते हैं । दोनों प्रेम-बंधन में बंध जाते हैं । यह वह पवित्र प्रेम है जो आत्मा से किया गया है, देह से नहीं । माधुरी के प्यार की ख़ातिर देवराज अपराध की दुनिया छोड़ देने का फ़ैसला भी कर लेता है पर तक़दीर को कुछ और ही मंज़ूर है । देवराज पर दो राज़ एक साथ खुलते हैं - एक तो यह कि उसके दल में सम्मिलित अशोक पुलिस का मुख़बिर है जिसे दल के नियम के अनुसार मृत्युदंड देना उसका कर्तव्य है और दूसरा यह कि अशोक उसकी प्रेमिका माधुरी का भाई है । देवराज माधुरी से यह सच्चाई नहीं छुपाता । अब माधुरी उसे उसकी मुहब्बत का वास्ता देती है और कहती है कि अगर उसकी मुहब्बत सच्ची है तो वह अशोक की जान बख़्श देगा ।

देवराज दुविधा में है कि भावना और कर्तव्य में से किसे चुने जबकि माधुरी को पूरा विश्वास है कि देवराज उसके प्राणप्रिय भाई को मारकर उसके प्रेम को कलंकित नहीं करेगा । दूसरी ओर बंतासिंह नामक एक अपराधी कारागार से फ़रार हो जाता है । वह अमित और देवराज, दोनों ही का शत्रु है । घटनाक्रम कुछ इस तरह घूमता है कि अमित अलग-अलग ढंग से माधुरी, अशोक और बंतासिंह; सभी के संपर्क में आता है और देवराज के अड्डे पर धावा बोलकर उसके संपूर्ण दल का सफ़ाया कर देता है । देवराज गिरफ़्तार हो जाता है और अशोक की लाश बरामद होती है । माधुरी को पूरा विश्वास है कि उसके भाई का हत्यारा उसका प्रेमी ही है । उसकी गवाही के दम पर अदालत देवराज को फाँसी की सज़ा सुना देती है और वह उसी दिन अमित से विवाह कर लेती है ।

अब उन बातों को बरसों बीत चुके हैं । देवराज की फाँसी की सज़ा ऊंची अदालत में अपील किए जाने पर उम्र-क़ैद में बदल चुकी है और वह जेल में अपने दिन काट रहा है । अमित पुलिस में पदोन्नति पाकर वरिष्ठ पद पर पहुँच गया है और उसकी पत्नी माधुरी अब उसके पुत्र की माँ है । बंतासिंह कभी का विदेश भागकर कानून की पकड़ से बहुत दूर हो चुका है । लेकिन . . .

लेकिन एक दिन अतीत के कब्रिस्तान में दफ़न कुछ मुरदे अपनी कब्रों से उठकर खड़े हो जाते हैं और कुछ भूले-बिसरे राज़ अपना परदाफ़ाश होने की धमकी देने लगते हैं । माधुरी को पता लगता है कि देवराज उसका सुहाग तो नहीं बन सका लेकिन वह उसके लिए सुहाग से भी बड़ा है । वह अब जान पाती है कि जो इंसान उसकी माँग में सिंदूर बनकर नहीं सज सका, उसका प्यार कितना महान है । लेकिन नियति तो अपना खेल खेल चुकी है । अब क्या हो सकता है ? दिल को झकझोर देने वाली इस दास्तान का क्लाईमेक्स सच्ची मुहब्बत की ऊंचाई को दिखलाता है । इस कहानी का अंत यह बताता है कि सच्चा प्यार करने वाले चाहे ख़ुद मिट जाएं, उनका प्यार एक रोशन मीनार बनकर आने वाली नस्लों तक को समझा सकता है कि हक़ीक़त में प्यार होता क्या है । 

मैं नहीं जानता कि इस बेमिसाल कहानी का मूल विचार स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की मौलिक सोच का परिणाम था अथवा उन्होंने इसे कहीं से उधार लिया था । लेकिन भावनाओं के कुशल चितेरे शर्मा जी ने इस उपन्यास को अत्यंत रोचक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है और सभी प्रमुख चरित्रों को स्वतः ही उभरने और कथानक पर अपनी-अपनी छाप छोड़ने का अवसर दिया है । उन्होंने बताया है कि प्यार कर बैठने वालों को प्यार करना आता हो और वे प्यार के फ़लसफ़े को ठीक से समझते हों, यह ज़रूरी नहीं । सच्चे प्रेम का आधार है विश्वास । और उसका अभिन्न अंग है अपने प्रिय के लिए बड़े-से‌‌‌-बड़ा त्याग कर सकने की क्षमता ।

रहस्यकथाएँ और रोमांचक उपन्यास (थ्रिलर) लिखने के लिए विख्यात वेद प्रकाश शर्मा ने अपने लेखन-कर्म के प्रारम्भिक वर्षों में सामाजिक उपन्यास भी लिखे थे । उनके ऐसे एक उपन्यास का नाम है - 'राखी और सिंदूर' जो सम्भवतः उन्होंने बहुत कम आयु में लिखा था । मैंने वह उपन्यास पढ़ा तो नहीं लेकिन अनुमान लगा सकता हूँ कि वह एक विवाहिता की दुविधा की कहानी होगी जिसे राखी अर्थात् अपने भाई और सिंदूर अर्थात् अपने पति में से किसी एक को चुनना हो । 'सुहाग से बड़ा' में नायिका के समक्ष ऐसी कोई दुविधा नहीं है । वह अपने भाई से अधिक प्रेम किसी से नहीं करती तथा उसके हत्यारे को दंडित करवाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है । इस उपन्यास में दुविधा वस्तुतः नायक के समक्ष है जिसका शर्मा जी ने बड़ा ही हृदयविदारक चित्रण किया है । देवराज को बेचैन कर रही उसकी उलझन और उसके अंतर्मन की पीड़ा, दोनों ही का वर्णन कुछ ऐसा है कि पढ़ने वाले को लगता है मानो वह जीते-जागते देवराज को अपनी आँखों से देख रहा हो । अपनी महबूबा के लिए देवराज दीवानगी की हद से गुज़र जाता है जिसे महसूस करके इस दर्दभरी दास्तां को पढ़ रहे शख़्स की आँखें नम हो सकती हैं  । और उपन्यास के अंतिम भाग में वास्तविकता से अवगत हो चुकी माधुरी की पीड़ा, प्रतिशोध और प्रायश्चित; सभी पढ़ने वाले के दिल की गहराई में उतर जाते हैं ।

मुझे दुख है कि वेद प्रकाश शर्मा ने अपनी इस असाधारण कृति पर 'इंटरनेशनल खिलाड़ी' (१९९९) जैसी मामूली फ़िल्म बनवाई जिसमें अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना ने नायक-नायिका की भूमिकाएँ निभाई थीं । फ़िल्म में उपन्यास की संपूर्ण कहानी नहीं बल्कि केवल उसके कुछ पात्र तथा उसके घटनाक्रम का एक अंश ही लिया गया है और बाकी की कहानी (जो कि कथानक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है) फ़िल्म से निकाल दी गई है । जहाँ उपन्यास एक अमर प्रेमकथा है, वहीं फ़िल्म एक साधारण एक्शन फ़िल्म से अधिक कुछ नहीं है । फ़िल्म में न भाई-बहन का प्रेम ठीक से उभर पाया है, न ही प्रेमी-प्रेमिका का । फ़िल्म में उपन्यास की रूह का नामोनिशान तक नहीं है । मुझे ऐसा लगता है कि पात्रों के चरित्र-चित्रण, भावपक्ष और कथानक की आत्मा की दृष्टि से कंगना राणावत की प्रथम फ़िल्म 'गैंगस्टर' (२००६) इस उपन्यास के अधिक निकट है बजाय 'इंटरनेशनल खिलाड़ी' के । 

सरल हिंदी में लिखा गया थ्रिलर और सामाजिक कथा का मिश्रण यह उपन्यास आदि से अंत तक पढ़ने वाले को बांधे रखता है । इसे उन लोगों को भी पढ़ना चाहिए जिन्होंने 'इंटरनेशनल खिलाड़ी' फ़िल्म देख रखी है क्योंकि उपन्यास का कैनवास फ़िल्म से बहुत अधिक विस्तृत है और इसमें प्यार का वह रंग है जो फ़िल्म में कहीं नज़र नहीं आता । प्यार तो अपने जीवन में लगभग सभी मनुष्य करते हैं चाहे वे किसी भी लिंग के हों लेकिन प्यार के फ़लसफ़े को उनमें से बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं । अगर आप समझना चाहते हैं तो 'सुहाग से बड़ा' को ज़रूर पढ़िए ।

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