Sunday, September 29, 2019

सलेब्रिटी और सत्ता

अमिताभ बच्चन को दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिए जाने की घोषणा कर दी गई है । अमिताभ बच्चन इस पुरस्कार के सर्वथा योग्य हैं किंतु उन्हें यह पुरस्कार दिया जाना केवल उनकी योग्यता पर आधारित नहीं लगता क्योंकि भारतीय फ़िल्म जगत से जुड़े ऐसे कई कर्मयोगी इस पुरस्कार से वंचित रहे जो इसके लिए उनसे अधिक अर्हता रखते थे एवं उनसे कहीं पहले इसके अधिकारी थे । वे हमेशा सत्ता एवं सरकार के पक्ष में रहते हैं, इसलिए उन्हें यह सम्मान मिलना तो था ही । 

अमिताभ बच्चन ने फ़िल्में (तथा रियलिटी शो भी) केवल धनार्जन के निमित्त कीं और लगभग सदा राजनीतिक सत्ताधारियों से निकटता बनाए रखी । वे अच्छे अभिनेता हैं, इसमें कोई संदेह नहीं लेकिन इसमें भी कोई संदेह नहीं कि वे सदा अभिनय ही करते हुए लगते हैं । अपने वास्तविक एवं स्वाभाविक रूप में सम्भवतः वे केवल अपने परिजनों के समक्ष ही आते हैं । 'कौन बनेगा करोड़पति' शो हो या धन कमाने के लिए किए गए विज्ञापन या सरकारी योजनाओं के ब्रांड ऐम्बैसडर की भूमिका या कोई सार्वजनिक कार्यक्रम या फिर सोशल मीडिया पर उनकी अभिव्यक्तियां; उनका प्रत्येक शब्द एवं भावभंगिमा उनके द्वारा किया जा रहा अभिनय ही प्रतीत होते हैं ।  सत्तर के दशक में रूपहले परदे पर जिस व्यवस्था के फ़िल्मी विरोधी बनकर उन्होंने एंग्री यंग मैन के रूप में जनता के हृदय पर राज किया और चोटी के सितारे बनकर अकूत धन कमाया, वास्तविक जीवन में वे सदा उसी शोषक व दमनकारी व्यवस्था के साथ ही खड़े दिखाई दिए । १९८४ में लोकसभा का चुनाव जीतकर जनप्रतिनिधि बनने के उपरांत भी उन्होंने उस जनता के प्रति अपना कोई कर्तव्य नहीं निभाया जिसने उन्हें सदा सर-आँखों पर बिठाया था । विगत ढाई दशक से तो वे हर ताक़तवर के आगे झुकते तथा पैसे के लिए किसी का भी प्रचार करते दिखाई देते हैं । जो मुँहमाँगी रकम दे, वे उसी की बोली बोलने को तैयार बैठे रहते हैं । और उनकी ख़ुदगर्ज़ी व अहसानफ़रामोशी की हद यह है कि उन्होंने उसी सुब्रत रॉय से उसके बुरे वक़्त में मुँह मोड़ लिया जिसने उनके बुरे वक़्त में उनकी भरपूर सहायता की थी (जब अमिताभ की कम्पनी एबीसीएल दिवालिया होने के कगार पर खड़ी थी) । ख़ैर ...

यह रवैया सिर्फ़ उनका ही नहीं, उनके जैसे ज़्यादातर सलेब्रिटी लोगों का है हमारे देश में । सलेब्रिटी उन लोगों को कहा जाता है जो प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय होते हैं तथा सदैव समाचारों एवं पत्रिकाओं की सुर्खियों में बने रहते हैं । यद्यपि इनमें से अधिकांश धनी होते हैं किंतु सलेब्रिटी कहलाने का आधार धन से अधिक उनकी प्रसिद्धि, सामाजिक प्रतिष्ठा एवं मीडिया की चर्चा में बने रहना होता है । ये ख्यातनाम व्यक्ति (अंग्रेज़ी) दैनिकों के साथ संलग्न परिशिष्टों के पृष्ठ संख्या तीन पर अपने से संबंधित छोटी-बड़ी ख़बरों और तसवीरों के प्रकाशन के कारण 'पेज थ्री पर्सनैलिटी' कहलाते हैं । इनकी ख्याति अपने कार्यक्षेत्र में पर्याप्त सफलता अर्जित करने के कारण तो होती ही है, अपनी ओर से भी चर्चा में बने रहने के लिए ये मीडिया का भरपूर इस्तेमाल करते हैं । जनसामान्य में इनकी लोकप्रियता ही इनकी शक्ति होती है जिसे भुनाने एवं बनाए रखने में ये कोई कसर नहीं छोड़ते ।

वैसे तो राजनीतिक सत्ता के महत्वपूर्ण एवं शीर्ष पदों पर विराजमान व्यक्ति तथा अनौपचारिक सत्ता एवं प्रभाव रखने वाले (बालासाहेब ठाकरे जैसे) व्यक्ति स्वयं भी सलेब्रिटी होते हैं, यहाँ मैं उन सलेब्रिटी लोगों की बात कर रहा हूँ जो राजनीतिक सत्ता से सीधे-सीधे संबद्ध नहीं होते हैं । ऐसे व्यक्ति फ़िल्म तथा टीवी के सितारे भी होते हैं, सफल एवं लोकप्रिय कलाकार व साहित्यकार भी, फ़ैशन डिज़ाइनिंग व मॉडलिंग जैसे ग्लैमरयुक्त पेशों से जुड़े लोग भी और खेल के मैदान में झंडे गाड़ने वाले भी । इनमें से अधिकांश लोगों में जो एक समानता स्पष्टतः दिखाई देती है, वह है शक्तिशाली सत्ताधारियों से मधुर संबंध बनाए रखने में इनकी रुचि । अमिताभ बच्चन ऐसे ही एक व्यक्ति हैं और उनके जैसे दर्ज़नों को पहचाना जा सकता है । क्या कारण है इसका ?

कारण एक ही है - राजनीतिक सत्ता में निहित अत्यधिक शक्ति जो किसी व्यक्ति-विशेष का जीवन सँवार भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है; उसे लाभान्वित भी कर सकती है और भारी हानि भी पहुँचा सकती है । अतः सलेब्रिटी जिन्हें अपनी सफलता, समृद्धि एवं लोकप्रियता से ही वास्तविक लगाव होता है; सत्ताधारियों से डरते हैं । मैंने अपने लेख - सफलता बनाम गुण  में इस बात को रेखांकित किया है कि वर्तमान पीढ़ी यह मानती है कि सफलता के लिए बहुत कुछ त्यागा जा सकता है लेकिन सफलता को किसी के भी लिए दांव पर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि (सफल व्यक्तियों के लिए) वह सबसे अधिक मूल्यवान होती है । सलेब्रिटी लोगों के सत्ता-प्रेम का सच यही है । वे अपने कामयाब करियर के बरबाद होने का ख़तरा नहीं उठा सकते ।

इस स्वार्थारित प्रेम के कारण ही वे न केवल अपने प्रशंसकों, समाज एवं देश के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं करते वरन उसकी कुसेवा भी करते हैं । वे न केवल जब-तब सत्ताधारियों की चाटुकारितापूर्ण प्रशंसा करते रहते हैं वरन उनकी स्पष्टतः अनुचित नीतियों एवं कार्यकलापों का भी समर्थन ही करते हैं । येन-केन-प्रकारेण उनकी गुड-बुक्स में बने रहना ही ऐसे लोगों की नीति बन जाती है । ऐसे में ये सलेब्रिटी किसी भी विषय पर अपने वास्तविक विचार यदि रखते भी हैं तो उन्हें व्यक्त नहीं करते हैं (जो भूले-भटके ऐसा कर बैठते हैं, वे सत्ताधारियों के निशाने पर आ जाते हैं एवं उनके कोप का भाजन बनते हैं) । ऐसे लोगों की किसी भी सार्वजनिक महत्व के मुद्दे पर कही गई बातें सरकारी नीतियों की अनुगूंज ही होती हैं । परदे पर दर्शकों के समक्ष निडर एवं साहसी मानव के रूप में आने वाले अमिताभ बच्चन जैसे सलेब्रिटी अपने निजी जीवन में डर-डर के जीते हैं ।

लेकिन इनसे भी कहीं अधिक कुसेवा अपने देश और नागरिकों की वे फ़िल्मी सलेब्रिटी करते हैं जो अपने सर्जक माध्यम का दुरूपयोग सत्ताधारियों के हित-साधन के निमित्त करते हैं । फ़िल्म-निर्माण या साहित्य-लेखन या चित्रकारी या संगीत जैसी कोई भी कला किसी राजनीतिक दल को (चुनावी) लाभ पहुँचाने के लिए नहीं होती, समाज के मन-रंजन तथा मार्गदर्शन (यदि संभव हो) के लिए होती है । यदि किसी कृति के सृजन का प्रयोजन ही मतदाताओं को (मिथ्या सूचनाओं द्वारा) भ्रमित करके किसी विशिष्ट राजनीतिक दल की चुनाव जीतने में सहायता करना है तो यह निश्चय ही ऐसा करने वाले सलेब्रिटी सर्जकों का एक निंदनीय कृत्य है । हाल के वर्षों में वर्तमान सत्ताधारी दल के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को बदनाम करने के लिए मिथ्या सूचनाओं से भरी कई फ़िल्में बनाई गई हैं जिनमें अप्रमाणित तथा अपुष्ट तथ्यों को इस रूप में प्रस्तुत किया गया है मानो वे स्थापित सत्य हों । वर्तमान भारतीय प्रधानमंत्री के जीवन पर भी उन्हें महिमामंडित करने वाली एक फ़िल्म बनाकर प्रदर्शित की गई है जिसमें ऐसी-ऐसी घटनाएं दिखाई गई हैं जो कभी हुई ही नहीं । ऐसी फ़िल्में भावी पीढ़ी के साथ अन्याय हैं जो स्वयं सत्य का अण्वेषण करने के स्थान पर इनमें प्रदर्शित बातों को ही सत्य मान बैठेगी ।

वो ज़माना गया जब विभिन्न क्षेत्रों के सितारे चुनाव में राजनीतिक दलों के लिए वोट माँगने तथा नेताओं की चुनावी सभाओं में भीड़ जुटाने का साधन थे । अब तो वे स्वयं राजनीतिक दलों के सदस्य बनते हैं और तुरत-फुरत टिकट पाकर चुनाव लड़ भी लेते हैं व प्रायः जीत भी लेते हैं । अब बॉलीवुड का भी जाति-धर्म-नस्ल के आधार पर भेदभाव न करने वाला चरित्र तथा मानव को मानव-मात्र ही समझने वाला दृष्‍टिकोण नहीं रह गया । अब तो ताक़तवर राजनेता के आगे मत्था टेकना और फ़ायदा उठाना ही ज़्यादातर लोगों का उसूल बन गया है । सलेब्रिटी बनकर सत्ता का दामन पकड़ा जा रहा है तो सत्ता का साथ पकड़कर ही सलेब्रिटियों की जमात में शामिल होने का भी जुगाड़ किया जा रहा है । देश, समाज, मानवता, सत्य, न्याय, जीवन-मूल्य; सब नेपथ्य में चले गए हैं । अमिताभ बच्चन ने २००४ में गोविंद निहलानी कृत फ़िल्म 'देव' में एक कर्तव्यपरायण पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई थी जो गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगों से जूझता है और ऊपर से आए ग़लत आदेशों की परवाह न करके निर्दोष तथा असहाय मुस्लिमों की जान बचाने व दोषियों को कानून द्वारा दंडित करवाने का प्रयास करता है । क्या वर्तमान राजनीतिक वातावरण में ऐसी भूमिका निभाने का साहस अब उनमें है ?

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Thursday, September 12, 2019

गोपिकाओं का निश्छल प्रेम

जन्माष्टमी आई और चली गई । प्रत्येक वर्ष आती है । हम धर्मप्राण हिंदू भगवान कृष्ण को स्मरण करते हैं, उनकी लीलाओं को विशेषतः उनकी गोकुल-वृंदावन में रचाई गई बाल-लीलाओं को याद करके और उनका नाट्य रूपांतर करके प्रफुल्लित होते हैं । गाँव-खेड़ों में रासलीलाओं के आयोजन होते हैं और कल्पनाएं की जाती हैं कि राधारानी और अन्य गोपिकाओं के साथ कृष्ण ने कैसे-कैसे रास रचाए होंगे, कैसे वे स्वयं आनंदित हुए होंगे और कैसे उन्होंने सर्वत्र आनंद-रस बरसाया होगा । इस सबके दौरान हम सहज ही यह मानकर चलते हैं कि उन रासलीलाओं तथा कृष्ण की बालसुलभ लीलाओं से ब्रज और गोकुल की गोपिकाएं भी आनंदित ही हुई होंगी । उन बालाओं को कृष्ण से हार्दिक प्रेम हो गया था, इस तथ्य से कोई इनकार नहीं करता । भक्त कवि सूरदास का तो संपूर्ण काव्य-सृजन ही इन्हीं सब कार्यकलाप तथा सुकोमल संबंधों पर आधारित है । लेकिन कृष्ण ने तो ग्यारह वर्ष की आयु में वृन्दावन छोड़ दिया था और मथुरा चले गए थे । इस तरह उनका गोकुल-वृंदावन की भूमि, अपने पालक माता-पिता अर्थात् नंदबाबा तथा यशोदा मैया एवं समस्त गोप-बालाओं तथा गोप-वधुओं से विछोह हो गया था । उस विछोह के उपरांत क्या हुआ ?

किवदंतियों की बात जाने दीजिए जिनसे आज इंटरनेट भरा पड़ा है और जिनमें से अधिकांश की कोई प्रामाणिकता नहीं है । कृष्ण की प्रामाणिक जीवन-कथा को आद्योपांत पढ़ा जाए तो यही पता लगता है कि एक बार गोकुल-वृंदावन छोड़ जाने के उपरांत वे पुनः वहाँ कभी नहीं लौटे । क्यों ? वे ही बेहतर जानते होंगे । क्या उन्हें कभी अपने उस बाल्यकाल की मधुर स्मृतियों ने, वृंदावन की कुंज-गलियों ने, नंदबाबा और यशोदा मैया के दुलार ने एवं उन पर प्राणप्रण से न्यौछावर हो जाने वाली गोपिकाओं के पावन प्रेम ने नहीं पुकारा ? यह भी वे ही बेहतर जानते होंगे । वे योगेश्वर कहलाए, महाभारत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, गीतोपदेश दिया तथा आजीवन पांडवों के सम्पर्क में रहे । उन्होंने अनेक लोगों से संबंध जोड़े, अनेक विवाह किए, द्वारिका नगरी बसाई और द्वापर के युगपुरुष के रूप में स्थापित हुए । भारतीय जनमानस में उनकी महानता आज भी निर्विवाद है । अत्यंत सफल रहे वे अपने जीवन में । लेकिन सफलता के आभामंडल में सरल प्रेम यदि कहीं खो जाए तो सफलता और स्वार्थपरता में भिन्नता करना कठिन हो जाता है । वे दीर्घजीवी रहे और अपने पड़पोतों तक का मुख देख सके ।  क्या अपने सुदीर्घ जीवन में उन्हें इतना भी समय नहीं मिला कि कभी गोकुल-वृंदावन जाकर अपने वियोग में तड़पने वालों की विरहाग्नि को शीतल कर देते ? सम्भवतः उनकी कभी ऐसी इच्छा ही नहीं हुई ।

प्रेम क्या है ? प्रेम हृदयों को जोड़ने वाला वह कच्चा धागा है जिसे कोई तोड़ना चाहे तो एक झटके में तोड़ दे और जो उसे न टूटना हो तो हज़ार हाथियों के बल से भी न टूटे ।  कृष्ण ने उस बाल्यकालीन निर्दोष प्रेम को किस रूप में देखा, वे ही जानें किंतु राधा सहित गोप-बालाओं के लिए तो वह ऐसा शक्तिशाली और चिरस्थायी धागा था जो किसी भाँति नहीं टूट सकता था, कभी नहीं टूट सकता था । अजर-अमर और सनातन था (और है) उनका प्रेम । और इसी प्रेम ने सृष्टि में अपनी चिरकालिक परिभाषा रची, वह परिभाषा जिसे शब्दों से नहीं, अनुभूति से समझा जा सकता है और उसी से समझा जाता है ।

एक फ़िल्मी गीत में कहा गया है - 'न जाने क्यूँ होता है ये ज़िन्दगी के साथ, अचानक ये मन किसी के जाने के बाद, करे फिर उसकी याद छोटी-छोटी-सी बात' । प्रिय के विछोह में त्रस्त विरही या विरहणी को उससे जुड़ी प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक व्यक्ति से गहरा लगाव हो जाता है क्योंकि वह वस्तु या व्यक्ति उसके लिए अपने प्रिय का ही प्रतीक बन जाता है । कई वर्षों के उपरांत जब बलराम वृंदावन आए तो उन्हें देखकर गोपियाँ भाव-विह्वल हो उठीं । क्यों ? गोपियों का लगाव तो कृष्ण से था, बलराम से नहीं । किंतु बलराम के आगमन एवं दर्शन ने भी उन्हें अतीव आनंदित किया क्योंकि वे कृष्ण के भाई थे और इसीलिए उनका आना भी गोपियों के आनंद का स्रोत बन गया था । बे बार-बार बलराम से पूछती रहीं कि कान्हा कैसे हैं, वे कभी उन्हें स्मरण करते हैं या नहीं । बलराम क्या उत्तर देते ?

कृष्ण ने विरहणी गोपियों के विकल मन को धीरज बंधाने के लिए तथा उन्हें मोह की निस्सारता समझाने के लिए उद्धव को गोकुल भेजा । उद्धव गए तो थे अपने ज्ञान से गोपियों के मन को शांत करने तथा उनकी मानसिकता एवं कृष्ण के प्रति दृष्टिकोण को मोड़ने लेकिन गोपिकाओं की विरह-वेदना देखकर संभवतः उन्हें अपने ज्ञान की निस्सारता का आभास हो गया और वे भाँप गए कि गोपिकाओं के असीम कृष्ण-प्रेम के समक्ष उनका तथाकथित  तत्व-ज्ञान तृणभर भी नहीं था और इसीलिए उनका विरह-व्यथित गोपिकाओं को समझाने का प्रयास निरर्थक ही था । सूरदास के शब्दों में गोपियों ने उद्धव से कहा - 'ऊधो मन न भए दस-बीस, एक हुतो सो गयो स्याम संग को अवराधै ईस' अर्थात् हमारे पास कोई दस-बीस मन तो थे नहीं, एक ही था जो कृष्ण के संग गया, अब कुछ है ही नहीं जिसे कहीं और लगाया जाए' । अब उद्धव क्या बोल सकते थे और क्या उपदेश दे सकते थे उन्हें ? मेरे अंतर्मन में यही प्रश्न उठता है कि जब कृष्ण उद्धव को भेज सकते थे तो क्या स्वयं नहीं जा सकते थे ? सूरदास के ही शब्दों में उन्होंने स्वयं उद्धव से (जो कि उनके सखा थे) कहा था - 'ऊधो, मोहि ब्रज बिसरत नाहीं' । जब वे ब्रज को भूल नहीं सकते थे तो जाने में क्या बाधा थी ?

एक हिंदी फ़िल्म की समीक्षा में मैंने इस बात को रेखांकित किया है कि 'अपनों की कीमत सपनों से ज़्यादा होती है' । लेकिन संसार में निरंतर दृष्टिगोचर यथार्थ तो यही बताता है कि सपनों का पीछा करने वाले और सफलता को मुट्ठी में कर लेने वाले अपनों की परवाह करना भूल ही जाते हैं । उनकी संवेदनशीलता, भावनाएं और स्नेह: सब कुछ वास्तविक से प्रदर्शनी कब बन जाता है, सम्भवतः वे स्वयं भी नहीं जान पाते । मैंने अपने लेख 'सफलता बनाम गुण' में कहा है - सफलता के लिए बहुत कुछ त्यागा जा सकता है लेकिन सफलता को किसी के भी लिए दांव पर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि (सफल व्यक्तियों के लिए) वह सबसे अधिक मूल्यवान होती है। गोपियों को तो किसी भौतिक सफलता की अभिलाषा नहीं थी । वे तो कृष्ण के दरस से, उनके सान्निध्य से और उनकी लीलाओं से हो रही आनंद-प्राप्ति से ही अपने जीवन को धन्य मान चुकी थीं । वही उनके संपूर्ण जीवन के लिए पर्याप्त था । सफलता का महत्व तो कृष्ण के लिए रहा । सफल बनकर वे कूटनीतिज्ञ बन गए (प्राय: सभी सफल व्यक्त्ति बन ही जाते हैं), संवेदनशील नहीं रहे । उनके जीवन में आई सफलता की आँधी उनके भीतर निहित संवेदनाओं से युक्त एवं कोमल भावनाओं से ओतप्रोत प्रेमी को कहीं बाहर उड़ा ले गई । देवत्व प्राप्त करके वे मानव न रहे ।

गोपियों ने अपने मन पर पत्थर रखकर कृष्ण को विदा देने समय यह तो नहीं सोचा था कि वे उनसे और ब्रज-गोकुल से ऐसा मुँह फेरेंगे कि कभी पलटकर न आएंगे । वे भोली बालाएं तो यही समझती रहीं और सदा उनकी बाट जोहती रहीं कि वे कभी तो आएंगे । दिन महीनों में बदले और महीने बरसों में । उनका संपूर्ण जीवन कृष्ण का पंथ निहारते बीत गया, आँखें पथरा गईं होंगी उनकी, पलकों को भिगोते-भिगोते किसी दिन अश्रु भी सूख गए होंगे उनके । पर कान्हा न आए । केवल उनकी वर्षों पुरानी स्मृतियां ही साथ रहीं उनके । और अपने लाल पर दिन-रात स्नेह बरसाने वाली यशोदा मैया पर अपने पुत्र के वियोग में क्या बीती होगी, इसका केवल एक पीड़ादायी अनुमान ही लगाया जा सकता है ।

मैं नहीं जानता कि जयदेव रचित 'गीतगोविंद' में तथा रीतिकालीन कवियों की रचनाओं में वर्णित कृष्ण की राधा तथा अन्य गोप-बालाओं एवं गोप-वधुओं के साथ की गई क्रीड़ाओं में सत्य का अंश कितना है लेकिन इन सभी वर्णनों में दैहिकता ही प्रमुखता रखती है तथा ऐसा प्रतीत होता है कि कृष्ण ने अपनी रासलीलाओं द्वारा उन सरल एवं निष्पाप नारियों की कमनीय देहों का सुख लिया । किंतु गोप-बालाओं तथा गोप-वधुओं का उनके लिए प्रेम आत्मिक ही था जिसमें दैहिकता लेशमात्र भी नहीं थी । इसीलिए वह प्रेम कृष्ण की महानता से भी कहीं अधिक महान है क्योंकि वह निस्वार्थ था, निष्कलंक था, किसी भी प्रकार की अपेक्षा से मुक्त था । वह प्रेम कोई साधन नहीं, अपने आप में ही साध्य था ।

और इन्हीं गोपिकाओं में थीं - वृषभानुजा राधारानी जो कृष्ण से आयु में कई वर्ष बड़ी थीं लेकिन कृष्ण के लिए उनका प्रेम आयु और देह की सीमाओं से परे था । कृष्ण से विछोह हो जाने के उपरांत उन्होंने अपने माता-पिता की इच्छानुसार विवाह भी किया लेकिन अपने हृदय में अपने बंसीवाले कान्हा की छवि को अक्षुण्ण बनाए रखा । कौन जाने, वे ही कलियुग में मीरा बनकर अवतरित हुई हों । सत्य और तथ्य यही है कि कृष्ण ने चाहे जितने विवाह किए और चाहे जितनी उनकी पटरानियां (कुल आठ बताई जाती हैं) रही हों, उनके नाम के साथ सदा-सदा-सर्वदा के लिए यदि किसी का नाम संयुक्त हो गया तो राधा का । कृष्ण के किसी भी मंदिर में उनके साथ उनकी किसी पटरानी की प्रतिमा नहीं लगती, राधा की लगती है । उस राधा की जिसका कृष्ण के साथ संबंध सामाजिक नहीं: हार्दिक था, आत्मिक था, ऐसा था जिसमें वह पृथक् न रही, कृष्ण के अस्तित्व के साथ एकाकार हो गई । ऐसे निश्छल और पावन प्रेम को विवाह जैसी किसी औपचारिकता की आवश्यकता थी भी नहीं । उसे अमरत्व तो प्राप्त होना ही था ।

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