Wednesday, July 17, 2019

बदनसीब कौन ? पार्टी ? या कुनबा ?

भारत में मई में सम्पन्न आम चुनावों के बाद से ही, जैसा कि परिणामों से स्वाभाविक था, कांग्रेस दल के अवसान की भविष्यवाणियां की जा रही हैं और नेहरू-गांधी परिवार (साफ़-साफ़ लफ़्ज़ों में श्रीमती सोनिया गांधी और उनके पुत्र-पुत्री) को इस दल की चुनावी दुर्गति के लिए उत्तरदायी ठहराया जा रहा है । इस परिवार को दल पर (और देश पर भी) भारस्वरूप माना जा रहा है और अच्छे-से-अच्छे तथा लब्धप्रतिष्ठित पत्रकार भी यह कह रहे हैं कि यदि यह परिवार कांग्रेस दल के शीर्ष पर रहा तो भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री का कांग्रेस-मुक्त भारत का स्वप्न शीघ्र ही साकार हो जाएगा । मुझे आश्चर्य है कि हमारे पत्रकार, विचारक एवं चिंतक इस समय इस दल के भविष्य पर इतना विचार-विमर्श कर रहे हैं जबकि महती आवश्यकता देश के भविष्य पर विचार करने की है जो अघोषित अधिनायकवाद में जकड़ा जा चुका है और उसी को लोकतंत्र समझकर देश के लोग बौराए घूम रहे हैं । कोई यह नहीं देखसोचसमझ पा रहा कि कांग्रेस रहे-न-रहे, भारत तो रहेगा । ऐसे में क्या समुचित यह नहीं कि कांग्रेस को उसके हाल पर छोड़कर देश के वर्तमान पर निष्पक्ष दृष्टि डालते हुए उसके भविष्य के संबंध में विवेकपूर्ण ढंग से विचार किया जाए तथा यह परखा जाए कि यह देश और उसके नागरिक किस दिशा में जा रहे हैं ? कहीं जॉर्ज ओरवेल की क्लासिक कृति 'एनिमल फ़ॉर्म' हमारे देश में हमारी आँखों के सामने ही तो चरितार्थ नहीं हो रही है ?

मैंने अपने लेख 'सफलता बनाम गुण में कहा है कि असफल व्यक्ति उपदेश लेने के ही योग्य समझा जाता है और उसकी असफलता को आधार बनाकर कोई भी ऐरा-ग़ैरा उसे उपदेश झाड़ने लगता है, स्वयं को सर्वज्ञ मानकर उसे यह बताने लगता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहींं करना चाहिए । यही कांग्रेस पार्टी के साथ हो रहा है । चुनावी रणक्षेत्र में धराशायी हो चुकने के बाद यह पार्टी ग़रीब की जोरू बन गई है जिसे हर कोई अपनी भाभी समझकर उससे मज़ाक़ कर रहा है और इस बहाने उसका मज़ाक़ उड़ा रहा है । कांग्रेस का उपहास, आलोचना और निंदा इस देश के निठल्लों का पसंदीदा टाइमपास बन गया है और उसे देश की सारी बुराइयों और समस्याओं की जड़ बताने में देश के नागरिकों के एक बड़े भाग को न केवल एक अद्भुत संतोष मिल रहा है बल्कि ऐसा बेबुनियाद अहसास भी हो रहा है मानो ऐसा करने से देश की बेहतरी होगी और उसे अपनी सारी  दुश्वारियों से निजात मिल जाएगी ।

लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि सुधी पत्रकारों तथा सुशिक्षित एवं विवेकशील नागरिकों सहित अधिसंख्य भारतवासी सत्ताधारी दल के सुर-में-सुर मिलाते हुए नेहरू-गांधी परिवार को गालियां देने में इस प्रकार लगे हैं जैसे इस परिवार को गरियाने में उन्हें किसी परपीड़क आनंद (सैडिस्टिक प्लेज़र) का अनुभव हो रहा हो । राष्ट्र की सारी छोटी-बड़ी समस्याओं, मुसीबतों और नुकसानों की ज़िम्मेदारी आधुनिक भारत के निर्माता और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तथा उनके वंशजों पर थोपी जा रही है । स्वस्थ तथा जीवंत लोकतंत्र की आधार विभिन्न संस्थाओं को स्थापित करने और स्वायत्तता देकर सुदृढ़ बनाने वाले पंडित नेहरू को वे लोग एक खलनायक की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं जो स्वयं उन संस्थाओं को ध्वस्त करने में निरंतर संलग्न हैं । राष्ट्रहित में एक-से-एक साहसिक निर्णय लेने वाली तथा युद्धभूमि में पाकिस्तान के दाँत खट्टे करके बांग्लादेश के उद्भव का पथ प्रशस्त करने वाली इंदिरा गांधी को केवल आपातकाल के लिए याद किया जा रहा है । राजनीति को स्वच्छ बनाने का संकल्प लेकर देश को इक्कीसवीं सदी में तकनीकी रूप से दक्ष  एक सबल राष्ट्र के रूप में ले जाने का स्वप्न देखने वाले सीधे-सच्चे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर ऐसे-ऐसे अनर्गल आरोप लगाए जा रहे हैं जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है । सत्ता के मद में चूर सत्ताधीश संभवतः यह मान बैठे हैं कि अब वे उस दुर्लभ स्थिति में विराजमान हैं जब उनकी वाणी से निकले प्रत्येक शब्द को ब्रह्म-वाक्य मानकर यथावत् स्वीकार कर लिया जाए ।

जवाहरलाल नेहरू के समय में सरकार सर्वेसर्वा नहीं होती थी और पार्टी का उस पर नियंत्रण एवं अनुशासन रहता था । नेहरू १९५४-५५ के बाद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद पर नहीं रहे एवं उनके निर्णयों तथा कार्यशैली की पार्टी में ही खुलकर विवेचना तथा आलोचना निर्भय होकर की जाती थी । वे कांग्रेस में वंशवाद के जनक भी नहीं थे । इसीलिए उनके उत्तराधिकारी के रूप में लालबहादुर शास्त्री ने प्रधानमंत्री का पद संभाला था जिन्हें इस संदर्भ में मोरारजी देसाई की प्रतिद्वंद्विता का सामना करना पड़ा था, इंदिरा गांधी की नहीं  कांग्रेस में वंशवाद का आरंभ इंदिरा गांधी ने किया जब उन्होंने पहले अपने छोटे पुत्र और उसके आकस्मिक निधन के उपरान्त अपने बड़े पुत्र को अपनी राजनीतिक विरासत संभालने के लिए चुना । और तब तक कांग्रेस में चाटुकारिता इतनी बढ़ गई थी कि राजीव गांधी के निधन के उपरांत स्वार्थी और निर्लज्ज कांग्रेसी वैधव्य के दुख में डूबीं सोनिया गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष (और उसके बाद प्रधानमंत्री भी) बनाने पर उतारू हो गए थे । यह  तो उस निर्लोभी, साहसी और परिपक्व महिला का दृढ़ व्यक्तित्व था जिसने उस विवेकहीन प्रस्त्ताव को और साथ ही भारतीय राजनीति को भी पूर्ण रूप से ठुकराकर अपना सुहाग गंवाने के असीम दुख को अपने भीतर-ही-भीतर अवशोषित करके अपनी संतानों के प्रति अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दी, उनकी शिक्षा-दीक्षा पूर्ण करवाई और पुत्री का उचित आयु में विवाह करके उसे अपना घर बसाने के लिए ससुराल भेजा ।

अपने दिवंगत पति की ही भांति श्रीमती सोनिया गांधी भी स्वयं को तथा अपनी संतानों को राजनीति से दूर ही रखना चाहती थीं लेकिन जब सीताराम केसरी के नेतृत्व में कांग्रेस की दुर्गति हो रही थी तथा ऐसा लग रहा था कि यह शताधिक वर्ष प्राचीन राजनीतिक दल अनिवार्य रूप से अस्ताचल की ओर बढ़ रहा है तो अनिच्छापूर्वक ही उन्होंने राजनीति में पदार्पण किया एवं टूटते-बिखरते, भूलुंठित होते इस दल को संभाला क्योंकि वे इस दल को अपने ससुराल की राजनीतिक विरासत मानती थीं तथा इसे सहेजना एक पुत्रवधू के रूप में उन्हें अपना कर्तव्य लगा । राजनीति के इस दलदल में उतरने के उपरांत ही सम्भवतः उन्हें (अपने पति की ही भांति) यह अनुभूति हुई कि एक बार इस दलदल में उतरकर इससे पुनः बाहर नहीं निकला जा सकता । शीघ्र ही उन्हें यह भी समझ में आया कि यह दल अब नेहरू वंश पर इतना निर्भर हो चुका है कि यदि इस वंश से जुड़ा कोई व्यक्ति इसके शीर्ष पर न रहे तो यह टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा । इसीलिए वे सर्वाधिक लम्बी अवधि तक इस दल के अध्यक्ष पर रहीं;  स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की अत्यधिक लोकप्रियता के बल पर सत्ता में बैठे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का ही नहींअपने ही दल के अति-महत्वाकांक्षी नेताओं का भी सामना किया; पीठ में छुरा भोंकने को सदैव तत्पर रहने वाले अवसरवादी विपक्षी नेताओं की चालों को भी ठोकरें खाकर पहचाना और जनसमस्याओं को लेकर उस समय सड़कों पर संघर्ष करने उतरीं जब सत्ताधारी उनके विदेशी मूल को ही मुद्दा बनाकर जनता को भावनात्मक रूप से बरगलाने में जुटे थे और अटलजी की देशव्यापी लोकप्रियता के साथ-साथ इसी मुद्दे को भुनाकर २००४ का लोक सभा चुनाव समय से पूर्व ही आयोजित करके उसमें विजयश्री का वरण करने का स्वप्न देख रहे थे । उनका स्वप्न भंग हुआ जब सोनिया गांधी की मेहनत रंग लाई और न केवल कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी बल्कि सोनिया गांधी द्वारा इस खेल के नियमों को भलीभांति समझकर चुनाव से पूर्व ही कुछ अन्य दलों से गठबंधन कर लेने के कारण सरकार बनाने की स्थिति में भी आ गई । भारतीय संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से वंचित नहीं किया जा सकता था किन्तु उनके विदेशी मूल की होने के तथ्य को भावनात्मक उबाल देने पर उतारू कुछ विपक्षी तेवरों को देखते हुए उन्होंने एक बार पुनः इस पद से मुँह मोड़ा और स्वच्छ छवि वाले डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के पद पर प्रतिष्ठित किया । इसी दौरान उनसे एक भूल हुई ।

यह भूल थी अपने पुत्र राहुल गांधी को राजनीति में उतरने देना । अपनी सास और पति का हश्र देख लेने के उपरांत उनसे यह भूल नहीं होनी चाहिए थी । शायद इसलिए हो गई कि वे एक माता हैं और माता की इच्छा सदा यही होती है कि उसका पुत्र सफलता के शिखर पर पहुँचे । शायद उन्हें लगा कि यदि उनका पुत्र प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित हो गया तो उनकी सारी मेहनत सफल हो जाएगी । लेकिन पाँच साल बाद २००९ में पहले से अधिक सीटें लेकर सत्तारूढ़ होने पर भी उन्होंने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के स्थान पर मनमोहन सिंह को ही दूसरा कार्यकाल दिया । उनके इस एक कदम ने प्रधानमंत्री के पद को राहुल गांधी की पहुँच से बहुत दूर कर दिया क्योंकि कांग्रेसी चाटुकार एकाध साल बाद ही राहुल को प्रधानमंत्री बनाने का शोर मचाने लगे और मनमोहन सिंह के प्रति असम्मान दर्शाने लगे । राहुल गांधी ने भी समय-समय पर अपनी अपरिपक्वता का परिचय दिया और कांग्रेस का बड़ी मुश्किल से जम पाया जनाधार फिर से दरकने लगा । सच यही है कि घोटालों की सच्ची-झूठी ख़बरों, विरोधी दल द्वारा बड़ी सफ़ाई से इस्तेमाल किए गए अन्ना हज़ारे और योगगुरु रामदेव के कथित भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलनों, कांग्रेसियों की मूर्खतापूर्ण हरकतों और बयानों तथा जनता को मनमोहन सिंह की हैसियत और सम्मान घटता हुआ दिखाई देने के कारण २०१४ के चुनाव से बहुत पहले ही कांग्रेस जनविश्वास खो चुकी थी और उसका आगामी चुनाव में बुरी तरह पराजित होना तय हो गया था ।

प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक कार्य के लिए नहीं बना होता । राहुल गांधी राजनीति में उतरने के बजाय अगर सही आयु में विवाह करके घर बसा लेते तो यह उनके लिए भी और उनके दल के लिए भी अच्छा होता । उनके पिता भी राजनीति के लिए नहीं बने थे लेकिन नियति ने उन्हें १९८४ के लोक सभा चुनाव में अभूतपूर्व बहुमत प्रदान करके कम-से-कम पाँच साल तक सरकार चलाने के लायक तो बना ही दिया था । फिर जब इंसान कुर्सी पर बैठता है तो वह कुर्सी भी उसे सब कुछ नहीं तो भी कुछ-न-कुछ तो अवश्य ही सिखाती है । राहुल गांधी न कुर्सी पर बैठे, न कुछ सीख पाए, न ही अपने व्यक्तित्व एवं आचरण में परिपक्वता ला सके (इसीलिए उनके राजनीतिक विरोधियों का उनकी पप्पू वाली छवि बनाने का षड्यन्त्र सफल रहा) । वे अपनी माता की तरह धैर्यवान एवं परिश्रमी भी सिद्ध नहीं हो सके ताकि कुछ सीमा तक तो जनता में अपनी एक विश्वसनीय छवि का निर्माण कर पाते । इसीलिए वे कांग्रेस के उपाध्यक्ष और अध्यक्ष दोनों ही रूपों में विफल रहे और लगातार दूसरे आम चुनाव में कांग्रेस को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा । उनका सामना चौबीसों घंटे राजनीति करने वाले शतरंज के चतुर खिलाड़ियों से था जिसके लिए दूसरों पर भरोसा करने और उनके कहे अनुसार चलने की जगह अपने विवेक को सजग रखना और सही समय पर त्वरित एवं तार्किक निर्णय लेना आवश्यक था जो वे नहीं कर सके तथा एक बार पुनः सिद्ध कर बैठे कि वे सियासत में अनफ़िट हैं ।

अब कांग्रेस की हालत सांप-छंछूदर जैसी हो गई है । न निगलते बनता है, न उगलते । नेहरू-गांधी परिवार ही यदि उसे चलाने का उत्तरदायित्व संभाले रहे तो राजनीतिक विरोधियों का वंशवाद का आरोप बना रहता है (यद्यपि यह अब भारतीय राजनीति में सर्वत्र घुल-मिल गया है और कई दल पारिवारिक जागीर की ही तरह चलाए जा रहे हैं) और यदि उसे कांग्रेस के शीर्ष से हटा दिया जाए और दल के संचालन में उसका कोई हस्तक्षेप न रहे तो दल के ही बिखरकर अपना अस्तित्व खो बैठने का डर है । यूँ लगने लगा है जैसे यह परिवार कांग्रेस के लिए पनौती बन गया है और इसका कांग्रेस से जुड़ा रहना इस पार्टी की बदनसीबी है जिससे यह पार नहीं पा सकती । लेकिन मेरा नज़रिया कुछ और है ।

ग़लतियां किससे नहीं होतीं ? सर्वगुणसम्पन्न कौन है इस संसार में ? राष्ट्र की प्रत्येक समस्या एवं प्रत्येक हानि को नेहरू-गांधी परिवार के मत्थे मढ़ने में अनवरत जुटे पड़े सत्ताधारी क्या स्वयं सर्वगुणसम्पन्न हैं ? क्या वे विधाता की श्रेणी में आ गए हैं जो कुछ भी ग़लत नहीं कर सकते या उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है ? तो ऐसे में क्या केवल इस परिवार के सदस्यों की ग़लतियों का ही कोलाहल मचाया जाना चाहिए और उनके योगदान को पूरी तरह भुला दिया जाना चाहिए ? इस परिवार ने सत्ता भोगी है तो उसका भारी मूल्य भी चुकाया है जो वर्तमान सत्ताधारी न चुका सकते हैं, न ही चुका सकने का साहस उनमें दिखाई देता है । प्राणों से बड़ा मूल्य क्या हो सकता है ? इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने अपनी राजनीतिक भूलों का मूल्य अपने प्राणों का बलिदान देकर चुकाया । इंदिरा गांधी को अपने अत्यंत युवा पुत्र का असामयिक निधन सहना पड़ा । एक माता के लिए इससे बड़ा आघात और क्या हो सकता है ? राजीव गांधी से सच्चा प्रेम करने वालीं और उनके प्रेम के लिए अपना देश छोड़कर एक नये देश, नये परिवेश और नये वातावरण को अपनाने वालीं सोनिया गांधी को अपने उसी प्रियतम को, अपने सुहाग को गंवाना पड़ा । माँ भारती के सच्चे लाल जवाहरलाल नेहरू को अपने देहावसान से आधी सदी गुज़र जाने के बाद अपने ही देश में रात-दिन गालियां पड़ रही हैं ।अब और कौनसा त्याग वांछित है इस परिवार से ? अगर इस कुनबे के कारण यह पार्टी बदनसीब है तो यह कुनबा यकीनन उससे भी ज़्यादा बदनसीब है ख़ासतौर से इसकी वर्तमान मुखिया श्रीमती सोनिया गांधी ।

वर्तमान सत्ताधारी रोज़ पानी पी-पीकर १९७५ में लगाए गए आपातकाल को याद करते हैं ताकि कहीं वोट देने वाली जनता उसे भूल न जाए । लेकिन उनके पास इस बात का क्या जवाब है कि आपातकाल के वास्तविक खलनायक संजय गांधी की विधवा मेनका गांधी और उनके पुत्र को उन्होंने अपने दल में ससम्मान स्थान दिया है और संसद में पहुँचाया है ? मेनका गांधी तो २०१४ से २०१९ तक निरंतर केंद्रीय मंत्रिपरिषद में कैबिनेट स्तर की मंत्री भी रही हैं । क्या मेनका जी ने कभी आपातकाल के दौरान अपने पति द्वारा की गई ज़्यादतियों के लिए खेद व्यक्त किया है अथवा कभी आपातकाल की आलोचना की है ? संजय गांधी को तो विधाता ने अकाल मृत्यु द्वारा दंडित कर दिया लेकिन क्या मेनका जी (और उनके पुत्र) को राजनीतिक शरण देने वाले सत्ताधारियों ने कभी उनसे अपने स्वर्गीय पति की आपातकाल संबंधी ग़लतियों के लिए देश की जनता से क्षमा माँगने को कहा है

अब मैं कांग्रेस पार्टी के लिए कुछ नहीं कहना चाहता । यह दल रहता है तो रहे और समाप्त होता है तो समाप्त हो, मुझे इससे कोई मतलब नहीं । यह इस दल का अपना मामला है । भारत यदि वर्तमान सत्ताधारियों की इच्छानुरूप कांग्रेस-मुक्त होता है तो हो जाए, देश को कोई अंतर नहीं पड़ेगा । लेकिन यदि कोई प्रतिपक्ष ही नहीं रहे तो लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं रह जाता क्योंकि विरोध एवं असहमति से विहीन तो तानाशाही ही हो सकती है, लोकतंत्र नहीं । मैं तो इस बदनसीब कुनबे से कुछ कहना चाहता हूँ जिसे नाना प्रकार के माध्यमों से बदनाम किया जा रहा है - इसे लांछित करने वाली पुस्तकें लिखी गई हैं, फ़िल्में बनाकर प्रदर्शित की गई हैं और जनता के दिमाग में यह कील ठोककर बैठाया जा रहा है कि यह कुनबा बुराइयों की खान है । मैं राहुल गांधी को राजनीति  पूरी तरह से छोड़ने की सलाह देता हूँ क्योंकि यह उनके बस की बात नहीं है । उनकी बहन प्रियंका यदि राजनीति में सक्रिय रहना चाहती हैं तो अवश्य रहें और अपने पुरखों के नाम के दम पर नहीं, अपनी मेहनत और हुनर के दम पर अपना मुकाम बनाएं । और सोनिया गांधी जो बहुत कुछ कर चुकी हैं, बहुत कुछ सह चुकी हैं, अब अपने वार्धक्य में पूरी तरह आराम करें । वर्तमान सत्ताधारियों के मिज़ाज को देखते हुए कहा नहीं जा सकता कि वे उन्हें चैन से जीने देंगे या नहीं लेकिन मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वे अपना शेष जीवन शान्ति से बिता सकें ।

और कांग्रेस का फ़ातिहा पढ़ चुकने के बाद भी उसे और नेहरू-गांधी परिवार को बिन मांगी सलाहें दे रहे और उस पर बड़े-बड़े लेख लिखने में मसरूफ़ मूर्धन्य पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों से मैं इतनी ही इल्तज़ा करता हूँ कि अपनी ऊर्जा कांग्रेस पर कलम चलाने में ज़ाया न करें । कांग्रेस अहम नहीं, देश अहम है । इसलिए कांग्रेस के बारे में सोचना बंद करके देश के वर्तमान और भविष्य की फ़िक्र करनी शुरु करें ।

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