Tuesday, March 26, 2019

अश्विन का आचरण और तथाकथित खेल-भावना का इतिहास


आईपीएल २०१९ में किंग्स इलेवन पंजाब के कप्तान रविचंद्रन अश्विन द्वारा विपक्षी दल राजस्थान रॉयल्स के बल्लेबाज़ जोस बटलर को उनके गेंद फेंकने से पहले ही अपनी नॉन स्ट्राइकिंग क्रीज़ छोड़ देने पर उन्हें रन आउट कर देने पर (अनावश्यक रूप से) चहुँओर चर्चा हो रही है । कोई उनके इस कृत्य को सही करार दे रहा है तो कोई ग़त । इस संदर्भ में भारत के महान ऑलराउंडर वीनू मनकड़ द्वारा १९४७ में सिडनी टेस्ट के दौरान ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज़ बिल ब्राउन को इसी प्रकार रन आउट कर देने की बात याद की जा रही है । इसी घटना के बाद इस तरीके से किसी गेंदबाज़ द्वारा नॉन स्ट्राइकर को रन आउट कर देने को मनकड़िंगकहा जाने लगा था । अश्विन के इस ताज़ातरीन काम के बाद जो मुक़ाबले की रवानी में किया गया एक साधारण काम ही था, क्रिकेट जगत दो खेमों में बंट गया है एक खेमा इसे सही मानता है तो दूसरा खेमा नैतिकता के आधार पर या खेल-भावना के आधार पर ग़ । यह भी कहा जा रहा है कि यदि अश्विन ने बटलर को इस बाबत पहले चेतावनी दी होती तो यह उचित होता जैसे कि भारत के एक अन्य महान ऑलराउंडर कपिल देव ने १९९२ में पोर्ट एलिज़ाबेथ में खेले गए एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच में दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाज़ पीटर कर्स्टन के साथ किया था

लेकिन ये नैतिकता के स्वयंभू ठेकेदार यह बड़ी सुविधा से भूल जाते हैं कि किसी भी मामले में दोहरे मानदंड नहीं अपनाए जाने चाहिए । दूसरे करें तो सही और कोई भारतीय करे तो ग़त ! यह कौनसा तरीका है मूल्यांकन और आलोचना का ? मुझे बड़ी खुंदक आती है यह देखकर कि तमाम विश्लेषक और अख़बारों तथा वेबसाइटों पर ऐसे विषयों पर कॉलम लिखने वाले (जो अपने आपको क्रिकेट का विशेषज्ञ समझते और बताते हैं) अपनी याददाश्त को अपने पक्षपातपूर्ण और पूर्वग्रहयुक्त दृष्‍टिकोण के हिसाब से इस्तेमाल करते हैं । जो अश्विन ने किया, उससे कहीं अधिक गम्भीर रूप से अनुचित कार्य क्रिकेट के मैदान पर विदेशी खिलाड़ियों द्वारा किए जा चुके हैं और ऐसे खिलाड़ियों की आलोचना तो दूर, उन पर कोई उंगली तक नहीं उठाई गई बल्कि उन्हें बड़ी बेशर्मी से अपने ग़त काम को सही ठहराने का मौका दिया गया है ।

मुझे इस संदर्भ में २००६ में क्राइस्टचर्च टेस्ट में न्यूज़ीलैंड के विकेटकीपर ब्रेंडन मैकुलम द्वारा किया गया एक नितांत अनुचित कृत्य स्मरण हो रहा है जिसकी बात कोई भी इस नवीनतम घटना के संदर्भ में नहीं कर रहा है । इस टेस्ट में विपक्षी दल श्रीलंका की दूसरी पारी में जब कुमार संगकारा एवं मुथैया मुरलीधरन की अंतिम जोड़ी खेल रही थी तो संगकारा ने एक रन लेकर अपना शतक पूरा किया । उनके साथी बल्लेबाज़ मुरलीधरन स्वाभाविक रूप से उन्हें शतक की बधाई देने के लिए उनके पास गए । तभी मैकुलम ने मुरलीधरन के छोर पर विकेट की गिल्लियां गिरा दीं और रन आउट की अपील की जिसे अंपायरों ने तकनीकी आधार पर सही माना और मुरलीधरन को आउट मानकर श्रीलंका की पारी को समाप्त कर दिया । न्यूज़ीलैंड को विजय के लिए जो लक्ष्य मिला उसे उन्होंने मुरलीधरन की घूमती हुई स्पिन गेंदों के आगे बड़ी कठिनाई से प्राप्त किया । यदि मुरलीधरन को इस तरह अनैतिक ढंग से आउट नहीं किया जाता और श्रीलंका की अंतिम बल्लेबाज़ जोड़ी ४०-५० रन भी और बना देती तो बहुत संभावना थी कि श्रीलंका उस टेस्ट में विजयी होता, पराजित नहीं । लेकिन इस स्पष्टतया अनैतिक कृत्य को न्यूज़ीलैंड के कप्तान स्टीफ़न फ़्लेमिंग ने पूरी निर्लज्जता से उचित और न्यायसंगत ठहराया था और नैतिकता के किसी स्वयंभू ठेकेदार ने चूं भी नहीं की थी । आज भी अश्विन के कृत्य के संदर्भ में वीनू मनकड़ के १९४७ वाले तथा कपिल देव के १९९२ वाले कृत्यों को तो स्मरण किया जा रहा है, मैकुलम के उस घोर अनैतिक कृत्य का उल्लेख कोई नहीं कर रहा है जो इतनी पुरानी बात भी नहीं है ।

खेल-भावना को अक्षुण्ण बनाए रखने का सारा ठेका भारतीयों अथवा एशियाई देशों के खिलाड़ियों ने ही नहीं ले रखा है । यदि खेल में खेल-भावना का अस्तित्व मूल्यवान माना जाता है तो उसकी सुरक्षा एवं सम्मान का दायित्व सभी देशों के सभी खिलाड़ियों पर (एवं खेल-निर्णायकों पर भी) है । भारत ही नहीं, लगभग सभी एशियाई तथा अश्वेत देश एक अलिखित एवं अघोषित रंगभेद का कटु अनुभव दशकों से करते आ रहे हैं जब वे कथित श्वेत देशों के साथ खेलते हैं । क्या इस संदर्भ में किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति अथवा अंतरराष्ट्रीय संस्था ने कुछ किया है ?  क्या खुलेआम अन्याय से पीड़ित होने वाले  खिलाड़ियों एवं देशों को कभी न्याय दिलाया गया है (अथवा न्याय दिलाने का कोई सार्थक प्रयास तक किया गया है) ? अश्विन पर उंगली उठाने वाले, बेहतर है, अपने गिरेबान में झांकें और यह न भूलें कि जब आप एक उंगली दूसरे पर उठाते हैं तो आपके उस हाथ की तीन दूसरी उंगलियां ख़ुद आप ही की ओर उठ जाती हैं ।

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Wednesday, March 13, 2019

बदला तो आपने हमसे ले लिया सुजॉय भाई

मैंने तक़रीबन एक दशक पहले हिंदी फ़िल्मों की समीक्षाएं लिखना आरंंभ इसलिए किया था क्योंकि मैंने विभिन्न समीक्षकों की (जिनमें कई प्रख्यात समीक्षक भी सम्मिलित थे) द्वारा की गई समीक्षाओं को न केवल सतही वरन पक्षपातपूर्ण भी पाया था । इस स्थिति में आज भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ है जिसका सत्यापन एक ही फ़िल्म की विभिन्न समीक्षाएं पढ़कर अत्यंत सरलता से किया जा सकता है । स्पष्टतया ऐसा करके समीक्षक वस्तुपरक समीक्षा करने के अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते हैं और अपनी समीक्षा पर विश्वास करके फ़िल्म देखने जाने वाले दर्शक-वर्ग के साथ अन्याय ही करते हैं जो फ़िल्म देखने के उपरांत स्वयं को ठगा गया अनुभव करता है ।  

जब कोई फ़िल्मकार एक प्रशंसित अथवा व्यावसायिक रूप से सफल एवं लोकप्रिय फ़िल्म बनाकर संचार माध्यमों में एवं फ़िल्म-जगत में प्रतिष्ठा अर्जित कर लेता है तो उसकी आगामी फ़िल्म के लिए उसके प्रदर्शन से पहले से ही एक सकारात्मक धारणा बना ली जाती है और तदनुरूप उसकी फ़िल्म पर उन प्रशंसाओं की अनावश्यक वर्षा की जाती है जिसकी वह अधिकारिणी नहीं होती (यद्यपि इसका विपरीत भी होता है जब अपेक्षा पर खरा न उतरने के कारण फ़िल्मकार को आलोचना सहनी पड़ती है) । संजय लीला भंसाली इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं जिनकी 'हम दिल दे चुके सनम' (१९९) से अर्जित प्रतिष्ठा आज तक उनके काम आ रही है और फ़िल्म समीक्षकों ने विगत एक दशक में आई उनकी कई फ़िल्मों की आँखें बंद करके अनावश्यक प्रशंसा ही की है और उनकी कमियों को अनदेखा किया है ।


यही बात सुजॉय घोष के साथ लागू होती है जिन्होंने अपनी 'कहानी' (२०२) से दर्शकों तथा समीक्षकों दोनों ही की सराहना प्राप्त की थी और उस फ़िल्म को टिकट खिड़की पर भी भरपूर सफलता मिली थी । उनकी बाद की फ़िल्में उस स्तर को नहीं छू सकीं लेकिन उनकी प्रतिष्ठा यथावत रही । अब वे अमिताभ बच्चन एवं तापसी पन्नू की प्रमुख भूमिकाओं से युक्त 'बदला' लेकर आए हैं । यद्यपि मैं रहस्यकथाओं का रसिया हूँ तथापि मैंने फ़िल्म देखने से पूर्व उसकी अनेक समीक्षाएं (हिंदी तथा अंग्रेज़ी दोनों ही भाषाओं में) पढ़ीं और अधिकांश समीक्षाओं में फ़िल्म की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई ही पाई । परिणामतः एक अच्छी, मनोरंजक तथा प्रभावशाली फ़िल्म देखने की अपेक्षा लिए मैं सिनेमाघर पहुँचा और बुरी तरह ठगा गया । 

सुजॉय घोष मौलिक कथाकार नहीं हैं (वैसे अब बॉलीवुड में मौलिक सर्जक बचे ही कितने हैं) । वे किसी-न-किसी विदेशी फ़िल्म की कथा लेकर उसे भारतीय पात्रों के साथ प्रस्तुत करते हैं । उन्होंने एक बहु-प्रशंसित स्पेनी फ़िल्म 'कोंट्राटिएंपो' (जिसका शाब्दिक अर्थ 'धक्का' या 'असफलता' होता है) जो अंग्रेज़ी में 'द इनविज़िबल गेस्ट'  के नाम से प्रदर्शित हुई थी, की कथा को अपने भारतीय (हिंदी) संस्करण के लिए लिया है ।  चूंकि इस कथा का ढाँचा ऐसा है कि इसे भारतीय परिवेश में स्थापित नहीं किया जा  सकता था  और घटनाओं का स्थल किसी भारतीय नगर को नहीं बनाया जा सकता था,  इसलिए उन्होंने घटनाक्रम का स्थान ग्लासगो (स्कॉटलैंड)  रखा है । इससे निश्चय ही उन्हें विदेशी लोकेशन के मनोहर बर्फ़ानी वातावरण की सुंदरता दिखाने का पर्याप्त अवसर मिला है और फ़िल्म के छायाकार (अविक मुखोपाध्याय) ने अपने छायांकन कौशल का अत्यंत प्रभावी प्रदर्शन किया है ।  पर फ़िल्म की विडम्बना यह है कि यह दर्शनीयता ही इस फ़िल्म का प्रमुख सकारात्मक पक्ष है जिसके लिए यह फ़िल्म देखी जा सकती है ।
सुजॉय घोष ने जिस स्पेनी फ़िल्म की कथा 'बदला' के लिए चुनी है, वह नेटफ्लिक्स पर सहजता से उपलब्ध है और अब भारत में नेटफ्लिक्स देखने वाले बहुतायत में हैं । इसलिए जिन लोगों ने मूल फ़िल्म देख ली है, उन्हें तो 'बदला' वैसे भी फीकी ही लगेगी क्योंकि सुजॉय घोष ने मूल कथा का अनुकूलन (एडेप्टेशन) नहीं किया है बल्कि उसे हू-ब-हू (केवल पात्रों का लिंग परिवर्तन करके) नक़ल कर लिया है । जब लोग असल देख सकते हैं (या देख चुके हैं) तो वे नक़ल क्यों देखेंगे ? दूसरी बात यह कि चूंकि नक़ल में भी अक़्ल की ज़रूरत होती है, अक़्ल ठीक से न लगाने के कारण सुजॉय घोष औंधे मुँह गिरे हैं । वे इस तथ्य को बिसरा बैठे कि भारतीय दर्शकों और विदेशी दर्शकों में बहुत अंतर होता है । फ़िल्म बेहद ऊबाऊ है और एक ही कमरे में हो रहे लम्बे-लम्बे वार्तालाप श्रोतागण के सर में दर्द कर देने के लिए पर्याप्त हैं । आपसी वार्तालाप में फ़िल्म के दोनों मुख्य पात्र एक-दूसरे को मूर्ख बनाना चाह रहे हैं लेकिन फ़िल्म के दर्शक को लगता है मानो वे एक-दूसरे को नहीं, उसे अर्थात फ़िल्म देखने वाले को मूर्ख बनाने का प्रयत्न कर रहे हों ।
'बदला' एक रहस्यकथा है जिसका नाम ही उसके कथानक में छुपे रहस्य की पोल खोल देने के लिए कुछ कम नहीं । उस पर तुर्रा यह कि अधिकांश दर्शक (जो कि निश्चय ही सुजॉय घोष से ज़्यादा समझदार हैं) वास्तविक रहस्य को पहले ही भांप जाते हैं । जिस अंतिम घुमाव (ट्विस्ट) का ढोल कई समीक्षकों ने ज़ोर-शोर से पीटा है, वह ऐसा बोदा और अविश्वसनीय घुमाव है (जो रहस्य को अंतिम रूप से खोल देता है) कि वह एक विवेकशील दर्शक को अपना सर पकड़ने तथा इस अनुभूति के साथ सिनेमाघर छोड़ने के लिए विवश कर देता है कि फ़िल्म बनाने वाला उसे परले दरज़े का बेवक़ूफ़ समझता है । ऐसे तथाकथित ट्विस्ट के साथ यदि कोई जासूसी उपन्यास लिखा जाता तो चल जाता (स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ऐसा टोटका अपने हिंदी उपन्यासों में बहुतायत से काम में लेते थे) लेकिन फ़िल्म में इसे देखकर फ़िल्म की कहानी लिखने वाले की और उसे निर्देशित करने वाले की (साथ में ऐसी फ़िल्म देखने के लिए अपनी भी) अक़्ल पर तरस ही खाया जा सकता है । समीक्षक इसे रहस्यकथाएं (सस्पेंस-थ्रिलर) पसंद करने वाले दर्शकों के लिए बेहतरीन फ़िल्म बता रहे हैं लेकिन सच यह है कि एक-से-बढ़कर-एक उम्दा रहस्यकथाएं पढ़ने और देखने वाले ऐसे दर्शक इस फ़िल्म को देखकर ख़ुद को बुरी तरह से ठगा गया महसूस करेंगे ।

सुजॉय घोष ने एक विदेशी कहानी को बलपूर्वक भारतीय जामा पहनाने के लिए अमिताभ बच्चन के संवादों में महाभारत के उद्धरण डाले हैं जिनका कथा से कोई लेना-देना नहीं है और वे सब कथा पर उसी तरह थोपे गए लगते हैं जिस तरह इस विदेशी कहानी पर भारतीय पात्र थोपे गए हैं । यह काम काली मिट्टी में तुलसी का पौधा लगाने के प्रयास जैसा ही है । यदि सुजॉय घोष ने विदेशी फ़िल्म की कहानी की सीधे-सीधे नक़ल करने के स्थान पर उससे केवल प्रेरणा ली होती और भारतीय परिवेश में स्वाभाविक लगने वाली भारतीय कहानी लिखी होती तो वे सम्भवतः एक बेहतर फ़िल्म बना पाते ।
फ़िल्म का अभिनय पक्ष भी सशक्त नहीं है । अमिताभ बच्चन का अभिनय प्रभावी है लेकिन उनका पात्र मनोरंजन कम करता है, देखने वाले में चिढ़ अधिक उत्पन्न करता है । तापसी पन्नू के अभिनय के कसीदे बेवजह पढ़े जा रहे हैं । हाँ, अमृता सिंह का अभिनय निस्संदेह स्मरणीय है । मलयाली अभिनेता टोनी ल्यूक का दक्षिण भारतीय व्यक्ति के ढंग से संवाद बोलना फ़िल्म देखने वाले के जले पर नमक छिड़कने के समान ही काम करता है (चापलूसी की हद यह है कि कुछ समीक्षक इसे भी फ़िल्म की ख़ूबी बता रहे हैं) । पार्श्व संगीत ठीक है ।

सारांश यह कि पक्षपाती समीक्षकों की अधकचरी समीक्षाओं पर भरोसा करके यदि आप यह फ़िल्म देखेंगे तो मेरी ही तरह ठगे जाएंगे । वैसे फ़िल्म के निर्माता (शाहरुख़ ख़ान की कंपनी रेड चिलीज एंटरटेनमेंट) पहले ही सप्ताह में फ़िल्म की लागत और अपना लाभ तो वसूल कर ही चुके हैं लेकिन सुजॉय घोष ने यह फ़िल्म बनाकर अपनी साख पर बट्टा ही लगाया है । उन्होंने 'बदला' वस्तुतः उस विशाल भारतीय दर्शक-वर्ग से ले लिया है जो उनकी प्रतिभा एवं कार्यनिष्ठा पर विश्वास करके उनकी यह फ़िल्म देखने गया था ।

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Friday, March 1, 2019

आइए, सुवर्णा लक्ष्मी से कुछ सीखें

यह ब्लॉग लिखने की प्रेरणा मुझे तीन दिन पहले अंग्रेज़ी दैनिक 'द पायोनियर' में प्रकाशित एक समाचार फ़ीचर से मिली जिससे मैंने हैदराबाद के कुकटपल्ली क्षेत्र की निवासिनी सुवर्णा लक्ष्मी की मानवता और संवेदनशीलता से ओतप्रोत दैनिक गतिविधि के विषय में जाना । तिरेसठ वर्षीया सुवर्णा लक्ष्मी विगत चौदह वर्षों से उन मूक प्राणियों की देखभाल कर रही हैं जिनका लोग आवारा कुत्ते कहकर तिरस्कार करते हैं । समाचार-पत्र में प्रकाशित लेख से मुझे पता चला कि यह संवेदनशील साधारण तेलुगु महिला अपने सीमित संसाधनों से असहाय कुत्तों को न केवल खिलाती-पिलाती हैं वरन उनके बीमार पड़ने पर उनकी चिकित्सा भी करवाती हैं और अन्य प्रकार से भी उनकी इस प्रकार सेवा-शुश्रूषा करती हैं जैसे कि कोई माता अपनी संतान की करती है । सुनने-पढ़ने में अस्वाभाविक-सा लगने वाला यह कार्य अपने आप में कितना महान है, इसे समझने के लिए एक संवेदनशील हृदय और निस्वार्थ स्वभाव चाहिए ।

कतिपय परिवारों में कुत्ते पालतू पशु भी होते हैं । जो लोग (प्रायः किसी विशेष प्रजाति के) कुत्ते पालते हैं, वे तो अपने उन पालतुओं का पूरा ध्यान रखते हैं - उनके खान-पान से लेकर साफ़-सफ़ाई और सुबह-शाम टहलाने से लेकर बिछौने तक का ख़याल रखा जाता है लेकिन जो ऐसे ख़ुशकिस्मत नहीं, उनका क्या ? वे बेजुबान अपनी ज़रूरत और अपनी तक़लीफ़ किससे बयां करें ? कोई सुवर्णा लक्ष्मी जैसा रहमदिल ही उनके दर्द को समझे और उसकी बाबत कुछ करे तो ही बात बने । बाकी जीने को तो सब जैसे-तैसे जी ही लेते हैं । कहा गया है न कि - 'जब दाँत न थे तब दूध दियो, अब दाँत भये का अन्न न दइहै !' विधाता द्वारा रचित इस सृष्टि का कोई भी प्राणी मानव के रहमोकरम पर नहीं जी रहा है लेकिन उनके प्रति दिखाई गई (या न दिखाई गई) संवेदनशीलता इस बात की परिचायक है कि हम उस जीवन के योग्य हैं या नहीं जो विधाता से हमें मिला है ।

आवारा कुत्तों के विरुद्ध मुख्यतः यह बात कही जाती है कि उनसे नन्हे बालकों विशेषतः शिशुओं को ख़तरा रहता है तथा कई बार वे शिशुओं की जान भी ले लेते हैं । इसी तर्क का सहारा लेकर उन्हें विष देकर मार डालने तक को न्यायोचित सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है । मेरा प्रश्न है कि शिशुओं एवं नवजातों को असुरक्षित रूप से खुले में छोड़ देने के लिए उत्तरदेय कौन है ? क्या जन्म देने वाले अपनी रक्षा स्वयं करने में असमर्थ अपनी नन्ही संतानों की समुचित सुरक्षा के लिए उत्तरदायी नहीं हैं या जन्म देने से ही उनका कर्तव्य पूर्ण हो जाता है ? अपनी ग़ैर-ज़िम्मेदारी को बेजुबान जानवरों पर थोपकर उन पर ज़ुल्म ढाना कहाँ का इंसाफ़ है ? पिछले साल जब मैंने हैदराबाद शहर में एक ही स्थान पर तक़रीबन डेढ़ सौ कुत्तों के शव पाए जाने की ख़बर अख़बार मेंं पढ़ी तो मेरा दिल खून के आँसू रो पड़ा । इतनी क्रूरता ! अरे धिक्कार है ऐसे लोगों के इंसान होने पर ! अगर इंसान होना यही है तो मुझे अपने इंसान होने पर कोई फ़ख़्र नहीं ।

विभिन्न शहरों के स्थानीय निकाय (नगरपालिकाएं या नगर निगम) आवारा कुत्तों की संख्या बहुत अधिक हो जाने का तर्क भी उन्हें मार देने के लिए देते हैं । लेकिन इस समस्या को उत्पन्न ही न होने देने के लिए भी तो समय रहते उचित कदम उठाया जा सकता है जो कि उनका बंध्याकरण या नसबंदी है । उनकी संख्या को सीमित करने के लिए उनका प्राणांत ही तो विकल्प नहीं ? या फिर हक़ीक़त यह है कि किसी निरीह प्राणी को मार डालना आसान काम लगता है और पत्थर जैसे बेहिस निर्दयी लोगों के लिए यह एक वीभत्स आनंद का स्रोत भी है ?

कुत्ते से ज़्यादा वफ़ादार जानवर कोई दूसरा नहीं । रोटी का निवाला देने वाले हाथ को काट लेने की अहसानफ़रामोशी इंसान दिखा सकता है, कुत्ता नहीं । कुत्तों की स्वामिभक्ति और वफ़ादारी के किस्से सैकड़ों सालों से सुने-सुनाए जाते रहे हैं । और कुत्ता एक क्षमाशील प्राणी भी है । वह हम इंसानों की तरह किसी बात को गाँठ बाँधकर नहीं रखता और किसी से प्रतिशोध नहीं लेता ।  दुत्कारने और मारने वाला भी अगर कुछ समय के उपरांत प्यार से बुलाए तो चला आता है । क्षमादान और सरल चित्तवृत्ति का यह सबक यदि हम चाहें तो इस मूक प्राणी से सीख सकते हैं और इस सनातन सत्य को हृदयंगम कर सकते हैं कि बड़प्पन क्षमा में है, प्रतिशोध में नहीं ।

शहरों तथा बस्तियों में स्थानीय निकायों द्वारा कुत्ते पकड़ने वाले (डॉग कैचर) भी भेजे जाते हैं । ये लोग एक बड़ा-सा जाल लेकर उसमें कुत्तों को पकड़ते हैं और पकड़े हुए कुत्तों को एक वैन में डालकर ले जाते हैं । कुछ साल पहले ऐसे ही लोगों का एक दल मेरे प्रिय मित्र कुत्ते रामू को ले गया और यह केवल मेरी अक्षम्य लापरवाही है कि मैंने उस समय त्वरित कदम उठाकर उस निर्दोष प्राणी को नहीं बचाया जिससे मुझे अपने सगे वालों से भी ज़्यादा प्यार मिला था - निस्वार्थ प्यार ! बाद में मुझे उन लोगों ने (पुनः आने पर) बताया कि ऐसे पकड़े गए कुत्तों को बंध्याकरण के उपरांत वापस उसी क्षेत्र में छोड़ दिया जाता है जहाँ से उन्हें पकड़ा गया था । लेकिन रामू नहीं लौटा और मेरे हृदय पर अपराध-बोध का ऐसा असहनीय भार रह गया जो सम्भवतः मेरे प्राणों के साथ ही जाएगा ।

मैंने अपने लेख - 'मैं शाकाहारी क्यों हूँ ?' में कहा है कि प्रकृति ने पर्यावरण में अद्भुत संतुलन रखते हुए सभी प्रकार के जीवों का सृजन किया है और इसीलिए जीवन का जितना अधिकार मनुष्यों को है, अन्य प्राणियों को किसी भी प्रकार उससे कम नहीं है । मनुष्य के अतिरिक्त कोई भी प्राणी प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करता, उसके संतुलन को नहींं बिगाड़ता । ये हम ही हैं जो एक ओर प्रकृति की सर्वोत्तम रचना होने का  ढिंढोरा पीटते हैं और दूसरी ओर उसी प्रकृति को अपने स्वार्थ के लिए विकृत करते हैं । चाहे वन के हिंस्र पशु हों या सर्प एवं वृश्चिक जैसे विषैले जंतु, सभी अपने मूल स्वभाव के अनुरूप ही आचरण करते हैं और अकारण किसी को हानि पहुँचाने नहीं जाते । अकारण या निहित स्वार्थ से रक्तपात करने वाला, अबलाओं की दैहिक शुचिता पर आघात करने वाला तथा लूटपाट एवं ध्वंस करने वाला अधम प्राणी यदि कोई है तो वह मनुष्य ही है जिसे मस्तिष्क सम्भवतः इसीलिए मिला है ताकि वह सभी प्रकार के कुकृत्य करने के उपरांत उन्हें न्यायोचित ठहराने हेतु कारण एवं तर्क गढ़ सके 

रामू के सम्बन्ध में जो गुनाह सरीखी भूल मुझसे हो गई, उसका प्रायश्चित्त यही हो सकता है कि मैं, जहाँ तक मेरी सामर्थ्य है, आजीवन मासूम पशु-पक्षियों की देखभाल में लगा रहूँ । सुवर्णा लक्ष्मी के रूप में मेरे समक्ष एक अनुकरणीय उदाहरण भी है । विधाता द्वारा रचित इस सृष्टि के प्रत्येक प्राणी का अपना महत्व है और प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में अपनी एक भूमिका है । तो आइए, सुवर्णा लक्ष्मी से कुछ सीखें, अपने हृदय में संवेदना को जगाएं तथा प्राणिमात्र के लिए अपनी-अपनी सीमाओं के भीतर जो कुछ हमसे बन पड़े, करें ।    


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