Monday, December 16, 2019

दूध का धुला कौन ? कोई नहीं !

नीरज पांडे द्वारा लिखित एवं दिग्दर्शित फ़िल्म 'अय्यारी' फ़रवरी २०१८ में प्रदर्शित हुई थी लेकिन उसकी विभिन्न समीक्षाएं पढ़ने के कारण मैंने उसे नहीं देखा था क्योंकि लगभग सभी समीक्षाओं में फ़िल्म की कटु आलोचना की गई थी तथा अपनी पहली फ़िल्म 'ए वेन्ज़डे' (२००८) के उपरान्त नीरज पांडे द्वारा प्रस्तुत फ़िल्में मेरी कसौटी पर खरी नहीं उतरी थीं । बहरहाल मैंने हाल ही में उसे इंटरनेट पर देखा और यही पाया कि वस्तुतः फ़िल्म ठीक से नहीं बनाई गई थी, अतः उसकी आलोचना उचित ही थी किंतु नीरज ने जिस विषय का चयन फ़िल्म के लिए किया, वह उनके साहस को ही दर्शाता है जिसके लिए उनकी निश्चय ही सराहना की जानी चाहिए । और वह विषय है - (भारतीय) सेना में भ्रष्टाचार । 

इस विषय पर कुछ कहने से पहले मैं अपनी ओर से भी फ़िल्म की समीक्षा कर देता हूँ । अय्यारी  शब्द का उल्लेख बाबू देवकीनंदन खत्री के कालजयी उपन्यास 'चन्द्रकान्ता' (तथा उसके विस्तार 'चन्द्रकान्ता संतति') में आता है जो अय्यारों की अय्यारी से भरपूर है । अय्यार वह गुप्तचर है जो वेश बदलने में निपुण है तथा (अपनी गुप्तचरी की आवश्यकता के अनुरूप) कभी भी किसी और का रूप धारण कर लेता है । प्रसिद्ध फ़िल्म समीक्षिका अनुपमा चोपड़ा ने इस फ़िल्म की अपनी समीक्षा में संभवतः ठीक ही लिखा है कि नीरज को इस शब्द (अय्यार अथवा अय्यारी) से ऐसा लगाव हुआ कि उन्होंने  फ़िल्म का शीर्षक पहले तय करके फिर उसे न्यायोचित ठहराने वाली कहानी उसके इर्द-गिर्द बुनी । अन्य शब्दों में कहा जाए तो नीरज ने पहले कोट का बटन चुना तथा उसके उपरांत उसे टाँकने के लिए उपयुक्त कोट के निर्माण में जुटे । इसीलिए फ़िल्म आदि से अंत तक बिखरी-बिखरी-सी है तथा कतिपय अपवादस्वरूप  दृश्यों को छोड़कर कहीं प्रभावित नहीं करती ।
'अय्यारी' के वेश बदलने में निपुण अय्यार हैं - भारतीय सेना के कर्नल अभय सिंह (मनोज बाजपेयी) तथा उनमें अटूट श्रद्धा रखने वाले उनके प्रिय शिष्य मेजर जय बक्शी (सिद्धार्थ मल्होत्रा) जो सेनाध्यक्ष (विक्रम गोखले) के आदेश पर देश की सुरक्षा हेतु एक पूर्णरूपेण गुप्त दल का गठन एवं संचालन करते हैं । कर्नल साहब अनुभवी हैं, मेजर साहब युवा । अतः दोनों के आदर्श एक होने के बावजूद उनकी सोचें पीढ़ियों के अंतर के कारण कुछ अलग हैं । इसीलिए जब मेजर साहब को सेना में फैली भ्रष्टाचार की दलदल का पता चलता है तो उन्हें अपना कर्तव्य-निर्वहन निरर्थक लगने लगता है और वे अपना पृथक् मार्ग चुन लेते हैं । अब कर्नल साहब के सामने दोहरी चुनौती है - मेजर साहब को पकड़ना तथा अपने गुप्त दल व उसके गुप्त कार्यकलापों की गोपनीयता को बनाए रखना ।
सेना में भ्रष्टाचार के मुद्दे को छूने वाली संभवतः पहली फ़िल्म थी - सोल्जर (१९९८) जिसके दिग्दर्शक थे अब्बास-मस्तान । लेकिन अब्बास-मस्तान ने अपनी कार्यशैली के अनुरूप केवल एक तेज़ रफ़्तार सस्पेंस-थ्रिलर बनाने पर ज़ोर दिया था और वे ऐसा करने में पूरी तरह से कामयाब भी रहे । फ़िल्म अत्यंत मनोरंजक बनी एवं इसीलिए व्यावसायिक रूप से सफल भी रही । किंतु सेना में भ्रष्टाचार की बात से कहानी शुरु करने के बावजूद फ़िल्म इस बात की गहराई में नहीं गई । इस महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील तथ्य की गहराई में जाने का कार्य 'अय्यारी' करती है लेकिन लेखक-निर्देशक नीरज पांडे इस कार्य को ढंग से निष्पादित नहीं कर सके । उनकी पहली विफलता एक लेखक के रूप में ही रही क्योंकि फ़िल्म के विषयानुरूप एक सशक्त पटकथा वे नहीं लिख सके (काश वे इसके लिए मेरे से सलाह ले लेते) । करेला और नीम चढ़ा यह कि उन्होंने जो लिखा, दिग्दर्शक के रूप में वे उसका उचित निर्वहन भी नहीं कर सके । फ़िल्म बनाते समय नीरज स्वयं भ्रमित रहे, इसीलिए उनकी फ़िल्म देखते समय जनता भी भ्रमित हो गई जिससे उसे मनोरंजन के स्थान पर सिरदर्द ही प्राप्त हुआ ।

मनोरंजन के अभिलाषी दर्शक के दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस आवश्यकता से अधिक लंबी फ़िल्म का एकमात्र गुण है - मनोज बाजपेयी का अत्यंत प्रभावशाली अभिनय । दोषों की तो फ़िल्म में भरमार है । युवा नायक तथा नायिका (रकुल प्रीत सिंह) के प्रेम-प्रसंग सहित अनेक दृश्य अनावश्यक हैं तो नायक जय बक्शी का चरित्र-चित्रण ही विश्वसनीय नहीं है । गीत अच्छे सही लेकिन वे इस धीमी फ़िल्म को और धीमा करके दर्शक की ऊब को बढ़ाते ही हैं ।  फ़िल्म में दर्शाई गई कई बातें देखने वाले के सर के ऊपर से गुज़र जाती हैं तो कई बातें खीझ उत्पन्न करती हैं । फ़िल्म मे भटकाव बहुत है तथा ऐसा लगता है कि भ्रष्ट व्यवस्था के साथ द्वंद्व में अपने नायकों को विजयी बनाने तथा फ़िल्म को समाप्त करने के लिए लेखक-निर्देशक नीरज पांडे को ऐसा कुछ सूझा ही नहीं जो (बुद्धिमान एवं विवेकशील) दर्शक समुदाय के गले उतर सके । इसीलिए न फ़िल्म का क्लाईमेक्स प्रभावी है, न ही अंत । अंत में निदा फ़ाज़ली साहब की एक ग़ज़ल से जो शेर सुनाए गए हैं, वे फ़िल्म के शीर्षक से ही मेल खाते हैं, उसकी कथावस्तु से नहीं । कुल मिलाकर यह फ़िल्म निराशाजनक है ।

लेकिन फ़िल्म की कथावस्तु दशकों पूर्व भी सामयिक थी और आज भी सामयिक है । सेना भ्रष्टाचार से अछूती न 'सोल्जर' के ज़माने में थी और न ही 'अय्यारी' के ज़माने में है । सेना को महिमामंडित करने में आज कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है और इस बाबत कोई भी प्रश्न उठाने वाले को इस युग के (सोशल मीडिया पर छाए हुए) बयानवीर राष्ट्र-विरोधी करार देने में चूकते नहीं है । पर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहचान यही होती है कि उसका कोई भी अंग तथा तंत्र का कोई भी पुरज़ा आलोचना एवं समीक्षा से परे नहीं होता है । और इस भ्रष्ट समय का पत्थर जैसा कठोर एवं नीम जैसा कड़वा सच यही है कि लोकतंत्र का कोई भी स्तंभ एवं शासन-प्रशासन का कोई भी तंत्र दूध का धुला नहीं है, दावे चाहे जो किए जाएं ।

भारतीय संविधान में लोकतंत्र के तीन स्तंभ निर्धारित किए गए हैं - विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका । इनके अतिरिक्त चौथा स्तंभ है - प्रैस (समाचार-पत्र) ।  इनकी सहायता तथा देश एवं नागरिकों की सुरक्षार्थ गठित की गई हैं - पुलिस एवं सेना । होना तो यही चाहिए कि ये सभी तंत्र एवं संस्थाएं अपना-अपना निर्धारित कर्तव्य-पालन पूर्ण सत्यनिष्ठा से करें तथा 'नियंत्रण एवं संतुलन' (चैक्स एंड बैलेंसेज़) के सिद्धांत के आधार पर एक-दूसरे को पथभ्रष्ट होने से रोकें भी । यह सिद्धांत इसीलिए किसी भी विराट समाज, संगठन अथवा राष्ट्र के लिए आवश्यक होता है क्योंकि इस कलियुग में दूध का धुला न तो कोई होता है और न ही किसी से ऐसा होने की अपेक्षा की जाती है । अपवादस्वरूप कोई व्यक्ति तो दूध का धुला हो भी सकता है लेकिन कोई व्यवस्था नहीं क्योंकि व्यवस्था सदैव व्यक्तियों के समूह से बनती एवं परिचालित होती है ।

लेकिन हमारे भारत महान में हाल यह है कि लोकतंत्र के चारों स्तंभ अपने आप को दूध का धुला बताते हुए दूसरों पर भ्रष्ट एवं पक्षपाती होने का दोषारोपण करते रहते हैं । पुलिस तो शासन-तंत्र के हाथ की कठपुतली बनी रहती ही है, हमारी भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था ने सेना को भी निष्कलंक नहीं रहने दिया है । अनेक बार सैन्य-प्रमुखों की नियुक्ति में वरिष्ठता के सर्वसम्मत सिद्धांत की बलि चढ़ाई गई है ताकि सरकार के आगे नतमस्तक रहने वाले चहेतों को पुरस्कृत किया जा सके एवं रीढ़ की हड्डी तानकर ग़लत बात का विरोध करने वालों को बाहर का मार्ग दिखाया जा सके । इसका सबसे कुरूप उदाहरण १९९८ में नौसेनाध्यक्ष एडमिरल विष्णु भागवत की बर्खास्तगी थी । शीर्ष सैन्य पदों पर की जाने वाली नियुक्तियों में बाहरी घटकों के हस्तक्षेप को (ताकि अपने चहेते को उस शक्तिशाली एवं अधिकार-संपन्न पद पर बैठाया जा सके) 'अय्यारी' में भी दर्शाया गया है ।

आज विधायिका एवं कार्यपालिका अपने आप को सुर्खरू समझते और बताते हुए न्यायपालिका तथा प्रैस को उपदेश झाड़ती रहती हैं कि वे उनके काम में हस्तक्षेप न करें तथा उनकी आलोचना से बचें जबकि न्यायपालिका एवं प्रैस अपने आप को आईना समझती हैं जो लोकतंत्र के दूसरे स्तम्भों को उनका असली चेहरा दिखाने के लिए है लेकिन किसी भी आईने में अपना चेहरा देखने की फ़ुरसत इनमें से किसी के पास नहीं । विधायिका एवं कार्यपालिका अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करतीं और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी रहती हैं लेकिन उनके भ्रष्टाचार पर उंगली उठाने वाली न्यायपालिका तथा प्रैस में भी भ्रष्टाचार कुछ कम तो नहीं जिसे रोकने में इनकी कोई रुचि कभी दिखाई नहीं देती । विगत कुछ वर्षों से तो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय तथा सर्वोच्च न्यायाधीश के कार्यकलाप भी विवादास्पद रहे हैं और उनकी छवि बेदाग़ नहीं रही । पर  'हम अच्छे हैं, वो बुरे हैं' वाली मानसिकता से ग्रस्त भारतीय लोकतंत्र के इन सभी स्तम्भों का दृष्टिकोण यही है  कि आलोचना करो तो 'उनकी' करो, हमारी नहीं; उंगली उठाओ तो 'उन' पर उठाओ, हम पर नहीं ।

जहाँ तक सेना का सवाल है, सीमा पर (और सीमाओं के भीतर भी) शहीद होने वाले सैनिकों की शहादत की आँच पर अपनी सत्ता की रोटियां सेकने वाले राजनेता उनके लिए तो केवल मगरमच्छ के आँसू ही बहाते हैं लेकिन देश पर मंडराते कथित ख़तरों का हौवा खड़ा करके राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सैन्य उपकरणों तथा अस्त्र-शस्त्रों के बड़े-बड़े सौदे (अरबों-खरबों‌ की राशि के) करते हैं जिनमें चाँदी काटी जाती है । शहीद सैनिकों की विधवाओं एवं परिजनों के लिए आवास तथा जीवन-यापन की व्यवस्था के नाम पर रीयल एस्टेट क्षेत्र से अपने लिए बहुमूल्य संपत्तियांँ जमा कर ली जाती हैं । 'अय्यारी' फ़िल्म सत्ताधारी राजनेताओं के साथ-साथ शीर्ष पदों पर रहने वाले तथा रह चुके (सेवारत एवं सेवानिवृत्त) सैन्य अधिकारियों के भ्रष्ट आचरण तथा शस्त्र-विक्रेताओं के साथ उनकी साठगाँठ को रेखांकित करती है तथा टीआरपी के भूखे टी.वी. चैनलों को भी कटघरे में खड़ा करती है । सैनिकों के प्रति इनका एक ही नज़रिया रहता है कि वे मरने के लिए हैं और हम अपनी जेबें भरने के लिए ।

तो फिर सेना को आलोचना से परे कैसे माना जाए ? विभिन्न व्यवस्थाओं की भाँति सेना भी एक व्यवस्था है जिसका वित्तपोषण विभिन्न प्रकार के कर चुकाने वाली जनता के धन से होता है । देश के विभिन्न भागों में तैनात सैनिकों द्वारा उन क्षेत्रों की सामान्य जनता पर किए जाने वाले अत्याचारों के आरोपों की वस्तुपरक एवं निष्पक्ष छानबीन क्यों न की जाए ? सैन्य सौदे कैसे किए जा रहे हैं तथा सैन्य उपकरण उचित मूल्य पर ही क्रय किए जा रहे हैं या नहीं, ये बातें सार्वजनिक संवीक्षा (पब्लिक स्क्रूटिनी) से बाहर क्यों रहें ? सूचना की संवेदनशीलता तथा गोपनीयता के नाम पर क्या जनता को सदा अंधेरे में ही रखा जाए तथा उसके धन की लूट बेरोकटोक चलती रहे ? अस्सी के दशक में रक्षा सौदों में दलाली का शोर मचाकर एक प्रधानमंत्री को सत्ताच्युत कर दिया गया लेकिन शोर मचाकर वह पद स्वयं हथिया लेने वाले महाशय ने क्या उसके उपरांत वास्तविक तथ्यों को जनता के समक्ष लाने के लिए कुछ किया ? नहीं ! क्योंकि उनका (सत्ताप्राप्ति का) निहित स्वार्थ तो शोर मचाकर चुनाव जीत लेने से ही सिद्ध हो गया था । आज स्थिति यह है कि सत्ताधारी कहते हैं कि किसी भी रक्षा सौदे पर उंगली मत उठाओ, लोक लेखा समिति द्वारा सौदे की जाँच की निर्धारित प्रक्रिया का पालन न किया जाए तो भी कुछ मत बोलो, सौदे की राशि न्यायोचित न लगे तो भी चुप रहो, कोई संबंधित सूचना न माँगो । ऐसा करोगे तो हमारे वीर सैनिकों का मनोबल गिर जाएगा और राष्ट्रीय सुरक्षा संकट में पड़ जाएगी । जबकि सत्य वही है जो 'अय्यारी' के मेजर जय बक्शी कहते हैं - 'हमाम में सभी नंगे हैं' ।

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Wednesday, December 11, 2019

भारतीय क्रिकेट टीम के संकटमोचन : बिन्नी और मदन

अब जबकि विश्व कप क्रिकेट २०१९ में भारतीय क्रिकेट दल के सेमीफ़ाइनल में हार जाने की घटना की धूल बैठ चुकी है तथा भारतीय दल द्वारा विश्व टेस्ट चैम्पियनशिप में अपेक्षाकृत दुर्बल दलों को पराजित करके अंकतालिका में शीर्ष पर विराजमान होने पर भारतीय क्रिकेट-प्रेमी मंत्रमुग्ध हो रहे हैं तो मुझे दो ऐसे भारतीय हरफ़नमौला (ऑलराउंडर) खिलाड़ियों की याद आ रही है जिन्होंने न केवल १९८३ के विश्व कप में एवं उसके दो वर्षों के भीतर ही ऑस्ट्रेलिया में आयोजित विश्व चैम्पियनशिप में भारत की ऐतिहासिक विजयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी वरन अस्सी के दशक में विभिन्न टेस्ट मैचों में भी भारतीय क्रिकेट दल के लिए संकटमोचन सिद्ध हुए थे । ये कभी हिम्मत न हारने वाले एवं जीवट के धनी हरफ़नमौला थे - मदन लाल तथा रोजर बिन्नी ।
रोजर माइकल हम्फ़्री बिन्नी ने १९७९ में भारत के लिए पहला मैच खेला लेकिन इस प्रतिभाशाली ऑलराउंडर को अपनी पहली टेस्ट शृंखला में गेंद और बल्ले दोनों ही से संतोषजनक प्रदर्शन करने के बावजूद भारतीय चयनकर्ताओं का विश्वास जीतने में लंबा समय लगा । जल्दी ही उन्हें भारतीय दल से बाहर कर दिया गया जिसके लिए चयनकर्ताओं की आलोचना भी हुई । आख़िर १९८३ के विश्व कप के लिए कपिल देव के नेतृत्व में जब भारतीय दल का चयन हुआ, तब बिन्नी को अवसर मिला तथा उन्होंने इस अवसर का पूरा लाभ उठाते हुए अपने शानदार प्रदर्शन से भारत की अविस्मरणीय विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर भारतीय टेस्ट एवं एकदिवसीय क्रिकेट टीम में अपने लिए पक्का स्थान बनाया जिसके बाद वे बीच-बीच में दल से बाहर होते रहने के बावजूद १९८७ तक भारत के लिए खेले ।
मदन लाल शर्मा को भारत के लिए खेलने का अवसर १९७४ में ही मिल गया था जिसके बाद उन्होंने भारत के लिए टेस्ट ही नहीं, सीमित ओवरों के एक दिवसीय मैच भी उन दिनों खेले, जिन दिनों यह प्रारूप अपनी शैशवावस्था में था । मदन लाल को विश्व कप क्रिकेट की पहली गेंद फेंकने (बाउल करने) का श्रेय प्राप्त हुआ जब उन्होंने १९७५ में इंग्लैंड में हुए पहले विश्व कप के उद्घाटन मैच में इंग्लैंड के ही विरुद्ध नई गेंद से भारतीय तेज़ गेंदबाज़ी आक्रमण की शुरुआत की और अपना नाम इतिहास में लिखवा लिया । वे भारतीय क्रिकेट की एक ऐतिहासिक उपलब्धि के भी साक्षी बने जब १९७६ में भारत ने वेस्ट इंडीज़ की अत्यंत शक्तिशाली टीम को पोर्ट ऑव स्पेन टेस्ट में चौथी पारी में चार सौ से भी अधिक रनों का लक्ष्य प्राप्त करके हरा दिया । इस टेस्ट में मदन लाल ने भारत की पहली पारी में सर्वाधिक ४२ रन बनाए थे जबकि दूसरी पारी में वे मैदान में बृजेश पटेल के साथ उस ऐतिहासिक क्षण में उपस्थित थे जब विजयी लक्ष्य प्राप्त हुआ । भारतीय क्रिकेट में कपिल देव का युग आरंभ होने के बाद प्रायः मदन लाल ही उनके नई गेंद के जोड़ीदार रहे तथा १९८१ में बंबई टेस्ट में जब भारत ने इंग्लैंड को दूसरी पारी में केवल १०२ रन पर धराशायी करके टेस्ट जीता था तो मदन लाल ने केवल २३ रन देकर पाँच विकेट लिए थे । १९८२-८३ में छः टेस्ट मैचों के पाकिस्तान दौरे में भारत बुरी तरह हार गया लेकिन मदन लाल ने इमरान ख़ान की ख़ौफ़नाक स्विंग गेंदबाज़ी का ज़ोरदार तरीके से सामना किया तथा कराची टेस्ट की दूसरी पारी में नॉट आउट रहते हुए ५२ रन तथा फ़ैसलाबाद टेस्ट की पहली पारी में ५४ रन बनाए । यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि उस ज़माने में वे विश्व के सर्वश्रेष्ठ आउट-फ़ील्डरों में से एक थे । घरेलू क्रिकेट में भी वे भरपूर योगदान देते थे । परंतु रोजर बिन्नी की ही भाँति मदन लाल को भी भारतीय चयनकर्ताओं का विश्वास लगातार नहीं मिल सका । अतः वे भी भारतीय दल में कभी ले लिए जाते थे तो कभी बाहर कर दिए जाते थे । अंततः उनके भी अंतर्राष्ट्रीय खेल जीवन का स्वर्णिम अध्याय १९८३ का विश्व कप ही बना ।
१९८३ के विश्व कप के लिए जब कपिल देव के नेतृत्व में चौदह सदस्यीय भारतीय दल चुना गया तो मदन लाल को तो चुना ही गया, रोजर बिन्नी को भी लंबे समय के उपरांत वापस बुलाया गया । दोनों ने ही अपनी धारदार गेंदबाज़ी का कमाल पहले ही मैच से दिखाना शुरु कर दिया जब पहले के दोनों विश्व कपों में एक भी मैच न हारने वाली शक्तिशाली वेस्ट इंडीज़ टीम को भारत ने पहले ही मैच में चौंतीस रन से हरा दिया । इस मैच में बिन्नी ने तीन महत्वपूर्ण विकेट लिए । अगले ही मैच में मदन ने तीन महत्वपूर्ण विकेट लेकर मैन ऑव द मैच का पुरस्कार जीता जब भारत ने ज़िम्बाब्वे की टीम पर आसान जीत दर्ज़ की । आगे के दो मैच बुरी तरह से हारने के बाद ज़िम्बाब्वे के विरुद्ध दूसरे मैच में भी भारत पर पराजय का संकट आ खड़ा हुआ जब भारत ने केवल १७ रन के कुल योग पर पाँच विकेट खो दिए । ऐसे में कपिल देव ने नॉट आउट रहते हुए १७५ रन की असाधारण पारी खेली और भारत को सुरक्षित स्कोर तक पहुँचाया । लेकिन कपिल की यह ऐतिहासिक पारी बिना साझेदारों के संभव नहीं हो सकती थी । पहले बिन्नी ने उनका साथ दिया और छठे विकेट के लिए ६० रन जोड़े । फिर मदन उनके साथी बने और आठवें विकेट के लिए ६२ रन की भागीदारी हुई (आख़िर में कपिल का साथ विकेटकीपर किरमानी ने दिया जिन्होंने उनके साथ १२६ रन की अविजित साझेदारी की) ।

अब भारत फिर से सेमीफ़ाइनल की दौड़ में आ गया था लेकिन अंतिम मैच ऑस्ट्रेलिया के साथ था जिसने भारत को पहले मैच में बहुत बुरी तरह (१६२ रन से) हराया था । भारत ने ऑस्ट्रेलिया को २४८ रन का लक्ष्य दिया जिसके जवाब में मदन और बिन्नी की धारदार गेंदबाज़ी के सामने ऑस्ट्रेलियाई टीम चारों खाने चित्त हो गई और भारत ने ११८ रन की शाही जीत के साथ शान से सेमीफ़ाइनल में प्रवेश किया । बिन्नी ने चार विकेट लेकर ऑस्ट्रेलियाई पारी की रीढ़ तोड़ दी और मैन ऑव द मैच बने जबकि मदन ने भी चार विकेट लेकर ऑस्ट्रेलियाई पारी का परदा गिरा दिया ।
सेमीफ़ाइनल में इंग्लैंड को सहजता से पराजित करके भारत फ़ाइनल में पहुँचा जहाँ क्लाइव लॉयड के नेतृत्व में शक्तिशाली वेस्ट इंडीज़ की टीम लगातार तीसरा विश्व कप जीतने के लिए तैयार बैठी थी । वेस्ट इंडीज़ के ख़तरनाक तेज़ गेंदबाज़ों ने भारतीय पारी को केवल १८३ रन पर समेट दिया लेकिन भारत ने ज़ोरदार जवाबी प्रहार किया और मदन लाल ने तीन विकेट लेकर वेस्ट इंडियन पारी की कमर तोड़ दी । इन तीन विकेटों में विवियन रिचर्ड्स का बेशकीमती विकेट भी शामिल था जिसका कपिल देव ने पीछे की ओर भागते हुए असाधारण कैच लपका था । रोजर बिन्नी ने वेस्ट इंडीज़ के कप्तान लॉयड को आउट किया और अंततः भारत ने तैंतालीस रन से मैच, फ़ाइनल और कप जीतकर इतिहास रच दिया । पूरे विश्व कप में बिन्नी और मदन की गेंदबाज़ी छाई रही । जहाँ बिन्नी ने सर्वाधिक अट्ठारह विकेट लिए, वहीं मदन ने सतरह विकेट लिए ।

कुछ महीनों बाद पाकिस्तान की टीम भारतीय दौरे पर आई जिसमें इमरान ख़ान और अब्दुल क़ादिर जैसे कई बड़े खिलाड़ी शामिल नहीं थे । लेकिन बंगलौर में खेले गए पहले टेस्ट में पाकिस्तान के दोयम दर्ज़े के गेंदबाज़ी आक्रमण के सामने भारत के सूरमा बल्लेबाज़ों ने घुटने टेक दिए और भारत ने ८५ रन पर ही छः विकेट खो दिए  । ऐसे में रोजर बिन्नी और मदन लाल भारत के लिए संकटमोचन बने और उन्होंने सातवें विकेट पर १५५ रनों की रिकॉर्ड साझेदारी निभाकर भारत को संकट से निकाला । बिन्नी अंत तक आउट नहीं हुए और उन्होंने ८३ रन बनाए जबकि मदन ने ७४ रन बनाए । दोनों के ही टेस्ट करियर के ये सर्वोच्च स्कोर रहे । मदन ने तीन महत्वपूर्ण विकेट भी लिए और मैन ऑव द मैच का पुरस्कार जीता ।
इसी शृंखला के दूसरे टेस्ट (जालंधर) में बिन्नी ने अपना लगातार दूसरा अर्द्धशतक (५४ रन) बनाया लेकिन तीसरे टेस्ट (नागपुर) में उन्हें भारतीय एकादश में सम्मिलित नहीं किया गया । इस टेस्ट के अंतिम दिन पहली पारी में ७७ रन से पिछड़े भारत ने अपनी दूसरी पारी में भी आठ विकेट खो दिए और अचानक ही पराजय का ख़तरा मंडराने लगा । ऐसे में मदन ने विकेटकीपर किरमानी के साथ नवें विकेट पर ५५ रनों की अविजित साझेदारी की और टेस्ट को ड्रॉ करवाया ।

इसके तुरंत पश्चात् विश्व कप में अपनी पराजय से लगी चोट को सहलाते हुए क्लाइव लॉयड किसी घायल सिंह की भाँति अपना दल लेकर छः टेस्ट मैचों की शृंखला खेलने के लिए भारत पहुँचे । कानपुर में खेले गए पहले टेस्ट में वेस्ट इंडीज़ ने ४५४ रनों का स्कोर खड़ा किया और फिर मैल्कम मार्शल की अगुआई में उसके तेज़ गेंदबाज़ों ने ऐसी डरावनी गेंदबाज़ी की कि भारत के आठ विकेट केवल नब्बे रनों पर ही गिर गए और फ़ॉलोऑन का ख़तरा सर पर आ गया । ऐसे में रोजर बिन्नी और मदन लाल एक बार फिर संकट के साथी बनकर विकेट पर आ डटे और भारत के नामी बल्लेबाज़ों को बल्लेबाज़ी का सबक देते हुए नवें विकेट पर ११७ रनों की साझेदारी निभा डाली । बिन्नी ३९ रन बनाकर आउट हुए जबकि मदन ने अंत तक नॉट आउट रहते हुए ६३ रन बनाए । भारत न फ़ॉलोऑन बचा सका, न ही टेस्ट लेकिन बिन्नी और मदन के खेल का लोहा सभी को मानना पड़ा ।

दिल्ली में खेले गए इस शृंखला के दूसरे टेस्ट में पहली पारी में भारत ने ज़बरदस्त बल्लेबाज़ी करते हुए ४६४ रन बनाए जिसमें बिन्नी के भी ५२ रन शामिल थे । अंतिम दिन दूसरी पारी में भारतीय बल्लेबाज़ों की ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बल्लेबाज़ी का नतीज़ा यह निकला कि केवल १६६ रनों पर आठ विकेट गिर गए और एक अनचाहा संकट सामने आ गया । फिर से भारत के संकटमोचन बिन्नी और मदन ने धीरज के साथ विकेट पर टिकते हुए नवें विकेट पर ५२ रन जोड़े और मैच का रुख़ भारत की हार से परे करते हुए अनिर्णय की ओर मोड़ा ।

अहमदाबाद में हुए तीसरे टेस्ट में मदन को भारतीय एकादश से बाहर कर दिया गया । ऐसे में बिन्नी ने कपिल के साथ भारतीय गेंदबाज़ी आक्रमण की शुरुआत करते हुए देखते-ही-देखते वेस्ट इंडीज़ के तीन विकेट सस्ते में चटका दिए । लेकिन छः ओवर डालने के बाद ही मांसपेशियों के खिंचाव के कारण उन्हें मैदान से बाहर जाना पड़ा और उसके बाद वे मैच में गेंदबाज़ी नहीं कर सके । नतीज़ा यह निकला कि गेंदबाज़ी का लगभग पूरा दायित्व कपिल देव पर ही आ गया और दूसरी पारी में कपिल की सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ी (नौ विकेट) के बावजूद भारत टेस्ट हार गया ।

भारत यह शृंखला बुरी तरह से हारा लेकिन बिन्नी ने सभी टेस्ट खेलते हुए कई उपयोगी पारियां खेलीं जबकि मदन को केवल तीन टेस्ट मैचों में अवसर मिला । एक गेंदबाज़ के रूप में यह मदन के करियर का सबसे ख़राब दौर था जब उन्हें लगातार पाँच टेस्ट मैचों में कोई विकेट नहीं मिला । लेकिन यह भी था कि एक कप्तान के रूप में कपिल ने उन पर अधिक विश्वास नहीं जताया और उनके द्वारा खेले गए इस शृंखला के तीन टेस्ट मैचों में उन्हें बहुत कम ओवर दिए ।

कुछ माह के उपरांत (१९८४ में) शारजाह में आयोजित प्रथम एशिया कप क्रिकेट प्रतियोगिता में कपिल भारतीय दल का हिस्सा नहीं रहे लेकिन सुनील गावस्कर के नेतृत्व में भारतीय दल ने श्रीलंका और पाकिस्तान को सरलता से हराते हुए कप जीत लिया । जीत का अधिकतम श्रेय (तथा प्रमुख पुरस्कार) विकेटकीपर-बल्लेबाज़ सुरिंदर खन्ना ले गए लेकिन बिन्नी और मदन ने भी भारत की विजयों में महत्वपूर्ण योगदान दिया । श्रीलंका के विरुद्ध हुए प्रथम मैच में मदन ने तीन विकेट लिए जबकि पाकिस्तान के विरुद्ध हुए द्वितीय मैच में बिन्नी ने तीन विकेट लिए ।

कुछ माह के अंतराल के पश्चात् पाँच एक दिवसीय मैचों की शृंखला खेलने के लिए किम ह्यूज के नेतृत्व में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम भारत आई तो सलामी बल्लेबाज़ जोड़ी का चयन भारत के लिए एक समस्या बन गया क्योंकि कप्तान सुनील गावस्कर मध्य क्रम में खेलना चाहते थी और दूसरे बल्लेबाज़ फ़ॉर्म में नहीं थे । ऐसे में चौथे मैच में रवि शास्त्री के साथ रोजर बिन्नी को पारी की शुरुआत के लिए भेजा गया । बिन्नी ने शास्त्री के साथ प्रथम विकेट पर शतकीय साझेदारी निभाते हुए अपने एक दिवसीय करियर का सर्वश्रेष्ठ स्कोर (५७ रन) बनाया लेकिन उसके उपरांत कभी उन्हें ऐसा अवसर पुनः नहीं दिया गया ।

तदोपरांत पाकिस्तान के संक्षिप्त दौरे (भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के आकस्मिक निधन के कारण यह दौरा बीच में ही समाप्त कर दिया गया था) के पश्चात् जब डेविड गोवर के नेतृत्व में इंग्लैंड का दल भारत के लंबे दौरे पर आया तो बिन्नी और मदन, दोनों को ही भारतीय दल से बाहर कर दिया गया । इंग्लैंड की कमज़ोर टीम ने भी भारत को उसके घर में ही (टेस्ट और एक दिवसीय मैचों, दोनों की ही) शृंखला में परास्त किया और गावस्कर को कप्तान के रूप में पहली बार घरेलू टेस्ट शृंखला में पराजय सहनी पड़ी ।

फ़रवरी १९८५ में विक्टोरिया में यूरोपीय सैटलमेंट की डेढ़ सौ वीं जयंती के अवसर पर ऑस्ट्रेलिया में आयोजित बेंसन एंड हेजेज़ विश्व क्रिकेट चैम्पियनशिप के लिए जब सुनील गावस्कर के नेतृत्व में भारतीय दल चुना गया तो चयनकर्ताओं ने विवेक का परिचय देते हुए रोजर बिन्नी और मदन लाल को पुनः भारतीय दल में सम्मिलित किया । भारत ने सम्पूर्ण प्रतियोगिता में उच्च स्तरीय खेल का प्रदर्शन करते हुए अपने सभी मैच एवं अंततः प्रतियोगिता भी जीत ली जो निश्चय ही एक असाधारण उपलब्धि थी । बिन्नी अस्वस्थ होने के कारण फ़ाइनल नहीं खेल सके लेकिन उन्होंने  भारत की विजयों में अपनी भूमिका निभाते हुए स्पर्द्धा में आठ विकेट लिए जबकि मदन ने सात विकेट लिए । बिन्नी ने पाकिस्तान के विरुद्ध पहले ही मैच में चार विकेट चटकाए जबकि मदन ने न्यूज़ीलैंड के विरुद्ध कठिन सेमीफ़ाइनल मैच में चार विकेट लिए ।

उसके उपरांत भारत ने रोथमैंस कप भी जीता लेकिन अगले विदेशी दौरों के लिए भारतीय दल के चयन में मदन लाल को पूरी तरह से उपेक्षित किया गया जबकि रोजर बिन्नी को श्रीलंका में हुई अप्रत्याशित पराजय के उपरांत ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के दौरों के लिए चुना गया । ऑस्ट्रेलिया दौरे में भारत बार-बार विजय के निकट पहुँच कर भी चूक गया लेकिन इंग्लैंड दौरे में कप्तान कपिल देव को अंततः चिर-प्रतीक्षित विजय मिल ही गई । लॉर्ड्स में हुए प्रथम टेस्ट में विजय के उपरांत भारतीय तेज़ गेंदबाज़ चेतन शर्मा के अस्वस्थ होने के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई कि उनके स्थान पर किसे लिया जाए । मदन लाल तो भ्रमणकारी भारतीय दल के सदस्य ही नहीं थे । लेकिन वे उन दिनों इंग्लैंड में ही थे और लंकाशायर की ओर से काउंटी क्रिकेट चैम्पियनशिप में खेल रहे थे । ऐसे में भारतीय दल प्रबंधन ने भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड से (तथा इंग्लैंड के भी संबंधित प्राधिकरण से) अनुमति लेकर मदन लाल को हैडिंग्ले (लीड्स) में खेले गए दूसरे टेस्ट के लिए भारतीय एकादश में सम्मिलित किया । और फिर जो हुआ, वह इतिहास है ।

२० जून, १९८६ से आरंभ हुए इस टेस्ट में  भारत के पहली पारी के २७२ रनों के उत्तर में इंग्लैंड की टीम मैदान में उतरी और कपिल के साथ मदन ने भारतीय गेंदबाज़ी आक्रमण का श्रीगणेश किया । देखते-ही-देखते मदन ने इंग्लैंड के दो विकेट और कपिल ने एक विकेट चटका दिए और स्कोर केवल चौदह रन पर तीन विकेट हो गया । कुछ देर बाद बिन्नी ने गेंद संभाली और अपने तब तक के करियर की सबसे प्रभावी गेंदबाज़ी करते हुए इंग्लैंड के पाँच विकेट गिरा दिए । मदन ने इंग्लैंड की इस पारी के कुल तीन विकेट लिए और भारत के इन दोनों हरफ़नमौला सीमरों के आगे इंग्लैंड की पारी १०२ रन पर ढेर हो गई । भारत ने यह टेस्ट (और साथ ही शृंखला भी) मुश्किल से सवा तीन दिन में २७९ रन के भारी अंतर से जीता जो उस समय टेस्ट क्रिकेट में इस दृष्‍टि से भारत की सबसे बड़ी जीत थी । मैन ऑव द मैच का पुरस्कार दिलीप वेंगसरकर को मिला लेकिन भारतीय गेंदबाज़ी के हीरो बिन्नी और मदन ही थे । इस मैच जिताऊ प्रदर्शन के बावजूद यह मदन के करियर का अंतिम टेस्ट साबित हुआ । एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैचों में वे अंतिम बार भारत के लिए १९८७ में  खेले । उन्हें भारत में ही आयोजित रिलायंस विश्व कप के लिए भी भारतीय दल में नहीं चुना गया ।

बिन्नी बहरहाल रिलायंस विश्व कप में खेले और उसके उपरांत उनके अंतर्राष्ट्रीय करियर का भी समापन हो गया । लेकिन उससे पूर्व उन्होंने भ्रमणकारी पाकिस्तानी दल के विरूद्ध टेस्ट शृंखला में भारत का प्रतिनिधित्व किया जिसके कलकत्ता टेस्ट में उन्होंने अपने टेस्ट करियर की सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ी करते हुए पहली पारी में छः विकेट  और दूसरी पारी में दो विकेट लिए लेकिन भारत वह मैच जीतने में सफल नहीं रहा । बिन्नी के टेस्ट करियर का पाकिस्तान और बंगलौर से कुछ अजीब-सा नाता रहा । उन्होंने अपने प्रथम एवं अंतिम टेस्ट पाकिस्तान के विरुद्ध बंगलौर में ही खेले और अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ी भी पाकिस्तान के विरुद्ध (१९८३ में) बंगलौर टेस्ट में ही की ।

बिन्नी और मदन ने बाद के वर्षों में भारतीय क्रिकेट टीम के चयनकर्ताओं की भूमिका भी निभाई । मदन भारतीय क्रिकेट टीम के प्रशिक्षक भी बने और वे इतने अनुशासन-प्रिय थे कि सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली जैसे नामी खिलाड़ियों को भी खरी-खरी सुनाने से चूकते नहीं थे । सम्भवतः इसीलिए एक कोच के रूप में उन्हें लंबा कार्यकाल नहीं दिया गया क्योंकि भारत में ठकुरसुहाती कहने वालों की ही कद्र है । बिन्नी के पुत्र स्टुअर्ट ने भी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व किया और उनके नाम एक दिवसीय क्रिकेट में भारत की ओर से सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ी (बांग्लादेश के विरुद्ध केवल चार रन देकर छः विकेट) का रिकॉर्ड है ।

रोजर बिन्नी और मदन लाल आज अपने जीवन के वार्धक्य में हैं और अपने स्वर्णिम अतीत को स्मरण करके आनंदित हो सकते हैं । भारतीय क्रिकेट टीम में हरफ़नमौला खिलाड़ी इनके जाने के बाद भी आए लेकिन जो जीवट इन दोनों में था - मुश्किल हालात में भी हौसला न हारने और जूझने का, वह फिर किसी भारतीय हरफ़नमौला क्रिकेटर में देखने को नहीं मिला । भारतीय क्रिकेट इनके योगदान को सदैव स्मरण रखेगा ।

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Thursday, November 28, 2019

रोनित रॉय : जान तेरे नाम से अदालत तक

ग्यारह अक्टूबर को भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन का जन्मदिवस पड़ता है जिसकी चर्चा सारे भारतीय मीडिया में होती है लेकिन इसी दिन एक और कलाकार का जन्म हुआ था जिसकी चर्चा कम-से-कम उसके जन्मदिवस पर होती हुई तो मैंने नहीं देखी । इस अत्यंत प्रतिभाशाली अभिनेता का नाम है रोनित रॉय जिसका नाम टी.वी. धारावाहिकों के कारण आज भारत के घर-घर में चित-परिचित है । एकता कपूर द्वारा निर्मित धारावाहिक  'कसौटी ज़िन्दगी की' अक्टूबर २००१  में स्टार प्लस चैनल पर प्रसारित होना आरम्भ हुआ था और तुरंत ही यह मेरा प्रिय धारावाहिक बन गया था जिसमें रोनित रॉय ने मिस्टर बजाज की भूमिका में अत्यंत प्रभावशाली अभिनय किया था । वे इक्कीसवीं सदी के संभवतः सबसे लोकप्रिय भारतीय टी.वी. धारावाहिक 'क्यूंकि सास भी कभी बहू थी' में भी आए तथा अनेक अन्य धारावाहिकों एवं रियलिटी शो में भी । वे छोटे परदे पर मिली इस सफलता के पूर्व एवं पश्चात् अनेक फ़िल्मों में भी विविध भूमिकाओं में दिखाई दिए थे जिनमें से विक्रमादित्य मोटवाने की बहुचर्चित फ़िल्म उड़ान (२०१०) में उनके अभिनय को पर्याप्त सराहना तथा पुरस्कार भी प्राप्त हुए । और उसके तुरंत बाद ही सोनी चैनल के धारावाहिक 'अदालत' में सत्य को ही जीवन का सार मानने वाले आदर्शवादी वकील के.डी. पाठक के रूप में वे अपनी लोकप्रियता के शिखर पर जा बैठे ।

मैंने उन दिनों 'अदालत' धारावाहिक नहीं देखा जिन दिनों यह प्रसारित होता था लेकिन मेरे पुत्र ने बराबर देखा और वह उसके पसंदीदा टी.वी. कार्यक्रमों में से एक था । मैंने तो इसे स्मार्टफ़ोन लेने के बाद और अपने तबादले की वजह से अकेला रहने पर देखना शुरु किया और चंद कड़ियां देखने के बाद ही मैं 'अदालत' का ख़ासतौर से के.डी. पाठक का दीवाना हो गया । मैं स्वयं एक आदर्शवादी व्यक्ति रहा हूँ एवं उदारीकरण के इस युग में वास्तविक संसार के साथ-साथ काल्पनिक संसार से भी आदर्शवाद के विलोपन ने मुझे अत्यंत व्यथित किया है । ऐसे में  जबकि सत्य की राह पर चलने वाले ढूंढे नहीं मिलते, के.डी. पाठक के आदर्शवादी व्यक्तित्व ने मेरे हृदय को ऐसा स्पर्श किया कि मैं अभिभूत हो गया । मेरा पुत्र इस तथ्य से प्रसन्न है लेकिन जो बात वह नहीं जानता, वह यह है कि मैं रोनित रॉय का प्रशंसक अब नहीं बना हूँ वरन १९९२ में ही बन गया था जब मैंने उनकी प्रथम फ़िल्म 'जान तेरे नाम' देखी थी ।

मैंने अपनी पसंदीदा रूमानी हिंदी फ़िल्मों पर लिखे गए अपने लेख में 'जान तेरे नाम' को भी स्थान दिया है जो कि प्रत्यक्षतः कॉलेज रोमांस पर आधारित एक साधारण फ़िल्म ही थी लेकिन उस फ़िल्म को असाधारण बनाया था नएनवेले युवा नायक रोनित रॉय ने विशेषतः फ़िल्म के अंतिम भाग में जब वे अपने प्रेम को खोने जा रहे प्रेमी के हृदय की वेदना और प्यार के जुनून को परदे पर जीवंत कर देते हैं । पहले 'रोने न दीजिएगा तो गाया न जाएगा' और फिर 'दिल क्या चीज़ है जानम अपनी जान तेरे नाम करता है' गीतों में, फिर फ़िल्म के अंतिम दो दृश्यों में रोनित ने नायिका (फ़रहीन) के लिए अपने प्यार के जिस जुनून को अपने हाव-भावों में झलकाया है, किसी को दिल से प्यार करने वाले के दिल में ऐसा ही जुनून होता है । वो मोहब्बत ही क्या, जिसमें जुनून न हो ? लेकिन यह जुनून अपने दिलबर को कोई नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं, प्यार के नाम पर ख़ुद मर-मिट जाने के लिए होता है । फ़िल्म के अंतिम दृश्य में मेरे नेत्र भर आए थे लेकिन उसके उपरांत मुझे फ़िल्म के सुखांत ने हर्षित भी किया । यह रोनित के अभिनय का ही कमाल था कि बिना किसी नाटकीयता के उन्होंने अपने दुखते दिल के दर्द को बयां कर दिया था । भावना की ऐसी तीव्रता कम ही देखने को मिलती है ।
मूलतः एक व्यवसायी परिवार से आने वाले रोनित को अपनी इस पहली फ़िल्म की सफलता का विशेष लाभ नहीं मिला तथा उसके उपरांत वे कुछ ही फ़िल्मों में और दिखाई दिए जिनमें से किसी को भी दर्शक वर्ग का अनुमोदन नहीं मिला । आख़िर छोटा परदा ही उनके भीतर के अदाकार के लिए सहारा बनकर आया और वे छोटे परदे पर मिली कामयाबी से बड़े परदे पर भी काम पाने लगे । लेकिन 'उड़ान' फ़िल्म में निभाई गई और ख़ूब सराही गई एक क्रूर पिता की नकारात्मक भूमिका के कुछ ही समय के उपरांत 'अदालत' धारावाहिक में एक पूर्णरूपेण विपरीत चरित्र, एक आदर्शवादी व्यक्ति का चरित्र जो सत्य के पथ पर चलने को ही अपने जीवन का उद्देश्य मानता है, में उन्होंने विराट भारतीय दर्शक समुदाय का हृदय विजित कर लिया, यह भी किसी चमत्कार से कम नहीं ।

'जान तेरे नाम' की ही भाँति 'अदालत'  की भी यूएसपी रोनित रॉय का अभिनय ही रहा यद्यपि मैं यह मानता हूँ कि अपनी दूसरी पारी में वह अधिक लोकप्रिय इसलिए नहीं रहा क्योंकि उसके कतिपय लोकप्रिय चरित्र यथा के.डी. पाठक का सहायक वरूण तथा इंस्पेक्टर दवे उसमें आने बंद हो गए एवं अपनी हरकतों और बातों से हास्य उत्पन्न करने वाले सरकारी वकील आई. एम. जायसवाल का आना भी कम हो गया । 'अदालत' की दूसरी पारी में पाठक साहब का शुद्ध हिंदी बोलना भी कम हो गया तथा उनके संवादों में अंग्रेज़ी का प्रयोग बढ़ गया, सम्भवतः यह भी इस धारावाहिक की लोकप्रियता  पर विपरीत प्रभाव डालने वाला एक घटक रहा ।

जासूसी कथाओं में रूचि रखने के कारण ढेर सारी जासूसी कथा-सामग्री पढ़ने और देखने वाले इन पंक्तियों के लेखक को 'अदालत' की अधिकांश कड़ियों के कथानक विदेशी कथानकों की नक़ल अथवा अविश्वसनीय ट्विस्ट के साथ समाप्त होने वाली मामूली कथाएं प्रतीत हुए । कथानक की दृष्‍टि से 'अदालत' के अधिकांश एपिसोड मुझे प्रभावित नहीं कर सके हालांकि सरकारी वकीलों के रूप में जायसवाल और अंजलि पुरी जैसी वकीलों के साथ के.डी. पाठक की नोकझोंक तथा पाठक साहब के कार्यालय में नौकरी करने वाली मिसेज़ बिलीमोरिया की बातों ने मेरा भरपूर मनोरंजन किया ।

'अदालत' में के.डी. पाठक के बाद यदि किसी चरित्र को बड़ी सावधानी के साथ गढ़ा गया था तो वह उनके युवा सहायक वरूण का चरित्र था जो कि (कभी न दिखाई गई) किसी शेफ़ाली नामक युवती से प्रेम करता है लेकिन अपने काम के प्रति पूरी तरह पेशेवर दृष्‍टिकोण रखता है एवं अपने बॉस पाठक साहब द्वारा सौंपे गए प्रत्येक कार्य को संपूर्ण निष्‍ठा तथा समर्पण के साथ संपादित करता है । किसी रूमानी युवा नायक जैसे आकर्षक व्यक्तित्व वाले (जैसे रोनित रॉय स्वयं 'जान तेरे नाम' में थे) इस नो-नॉनसेंस चरित्र ने मुझे बहुत प्रभावित किया । इंस्पेक्टर दवे का चरित्र भी प्रभावी था जिसके अभाव की पूर्ति इस धारावाहिक में बाद में आए राठौर तथा पवार जैसे इंस्पेक्टरों के चरित्र नहीं कर सकते थे । एक चोर से के.डी. पाठक के सहायक बन जाने वाले टपोरी युवक श्रवण का मनोरंजक चरित्र चाहे मुझे कम पसंद आया हो, संभवतः अधिकांश दर्शकों को पसंद आया होगा ।

'अदालत' में कथाएं कमज़ोर थीं लेकिन निर्देशन प्रभावी था जिसने कमज़ोर कहानियों को भी अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया । कला-निर्देशन, संपादन, (रहस्यभरा) पार्श्व संगीत, अनेक ग्रामीण स्थलों को समाहित किए हुए विभिन्न लोकेशन तथा सभी कलाकारों का अभिनय पूरे अंक दिए जाने योग्य रहा । कास्टिंग की एक बहुत बड़ी कमी बार-बार उन्हीं कलाकारों को अलग-अलग कथाओं में अलग-अलग भूमिकाओं में लिया जाना रहा जिसे अब इंटरनेट पर इन कड़ियों को देख रहे मुझ जैसे दर्शक अनुभव करते हैं ।

'अदालत' ने सदा भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वासों पर प्रहार किया तथा भारतीय दर्शकों को वैज्ञानिक एवं आधुनिक सोच अपनाने के लिए प्रेरित किया, इसके लिए इस धारावाहिक को बनाने वाले साधुवाद के पात्र हैं जिन्होंने दर्शकों के मनोरंजन के साथ-साथ समाज के मानसिक जागरण एवं उत्थान के लिए भी अपना योगदान दिया ।

लेकिन अंततोगत्वा 'अदालत' शुद्ध हिंदी बोलने वाले सत्य के पथिक एवं संवेदनशील वकील के.डी. पाठक का ही शो था । चूंकि मैं स्वयं शुद्ध भाषा बोलता हूँ, मैंने के.डी. पाठक के संवाद लिखने वाले के (हिंदी) भाषा-ज्ञान की अनेक कमियों को बड़ी सहजता से पकड़ा । रोनित रॉय अपने को दिए गए संवादों में तो कोई संशोधन नहीं कर सकते थे लेकिन उन्होंने अपनी शुद्ध हिंदी को कभी भी अस्वाभाविक प्रतीत नहीं होने दिया । के.डी. पाठक का पहेलियां बुझाने में रूचि लेना भी मुझ जैसे दर्शकों के लिए अतीत की सुहानी स्मृतियों को ताज़ा कर देने वाला सुखद अनुभव ही था जिसमें रोनित रॉय के अभिनय की भूमिका पहेलियां चुनने वाले से कम नहीं थी ।
आज जब मैं चहुँओर सत्य को टूटते-बिखरते-हारते हुए देखता हूँ तो 'अदालत' के सत्यकामी, आदर्शवादी एवं निर्दोष आरोपियों के मसीहा के.डी. पाठक का चरित्र मुझे बड़ी राहत प्रदान करता है । अब इस धारावाहिक की पुरानी कड़ियां ही इंटरनेट पर देखी जा सकती हैं क्योंकि धारावाहिक बंद हो चुका है । लेकिन रोनित रॉय ने 'जान तेरे नाम' से लेकर 'अदालत' तक अभिनय कला का एक लम्बा सफ़र तय किया है जो नवोदित कलाकारों के लिए प्रेरणा बनना चाहिए । अमिताभ बच्चन के जन्म के ठीक तेईस साल बाद इस दुनिया में आने वाले रोनित रॉय अमिताभ बच्चन तो नहीं बन सके लेकिन वे अपने इस सफ़र में आगे भी नए मुकाम, नई मंज़िलें तय करें; यह मेरी इस अत्यंत प्रतिभाशाली अभिनेता को हार्दिक शुभकामना है ।

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Tuesday, November 12, 2019

बायोपिक हो तो ऐसी हो

कुछ माह पूर्व मैंने बायोपिक की भेड़चाल शीर्षक से एक लेख लिखा था जिसमें मैंने जनता को मूर्ख समझते हुए  अपनी तिज़ोरियां भरने के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर बनाई जा रही बायोपिकों की आलोचना की थी । वस्तुत: बहुत कम बायोपिक ईमानदारी से बनाई जाती हैं जो दर्शकों को प्रेरित और उत्साहित करते हुए जीवन के प्रति सकारात्मक भाव से भर दें । अपने पिछले जन्मदिन (तीस अक्टूबर) को मैंने अपनी धर्मपत्नी के साथ जो बायोपिक पुणे के वेस्टएंड सिनेमा में देखी, वह एक ऐसी ही बायोपिक निकली । इस बायोपिक का नाम है -  'साँड की आँख' जिसे देखते समय मेरी धर्मपत्नी के नयन भर आए और मेरे मुख से निकल पड़ा - 'बायोपिक हो तो ऐसी हो' ।

यह फ़िल्म उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले के जौहड़ी गाँव की निवासिनी दो लगभग अशिक्षित ग्रामीण वृद्धाओं - चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर के जीवन पर आधारित है जो सम्पूर्ण राष्ट्र की उन नारियों के लिए प्रेरणा-स्रोत बन गए हैं जो न केवल साधनहीन हैं वरन पितृसत्तात्मक व्यवस्था की बेड़ियों में बुरी तरह से जकड़ी हुई हैं । साठ वर्ष की आयु पार कर चुकने के उपरांत ये प्रतिभाशाली और साहसी नारियां घर की चारदीवारी से बाहर निकलीं और  निशानेबाज़ी सीखकर सफलता की ऐसी ऊंचाइयों को उन्होंने छुआ कि वे शूटर दादियों के नाम से सारे देश में विख्यात हो गईं । एक ही परिवार में दो भाइयों से ब्याही गईं इस जेठानी-देवरानी की जोड़ी ने अपनी सम्पूर्ण युवावस्था एवं प्रौढ़ावस्था घर-परिवार में होम कर चुकने के उपरांत अपने वार्धक्य में वह कमाल कर दिखाया जिस पर एकबारगी तो सुनने वाले को विश्वास ही न हो ।

इन शूटर दादियों की प्रेरक जीवन-गाथा को दूरदर्शन पर आमिर ख़ान द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम 'सत्यमेव जयते' ने घर-घर पहुँचाया, भारत सरकार के 'महिला एवं बाल विकास मंत्रालय' द्वारा इन्हें ‘आइकन लेडी’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया तथा वर्ष २०१६ में इन्हें भारत की १०० वीमेन अचीवर्स में सम्मिलित किया गया । ढेर सारे बेटे-बेटियों और पोते-पोतियों वाली इन दादियों ने दो दशक पूर्व शूटिंग प्रतियोगिताओं में भाग लेना आरंभ किया था एवं आज ये अस्सी पार कर चुकी हैं । प्रकाशी की पुत्री सीमा २०१० में आईएसएसएफ़ द्वारा आयोजित निशानेबाज़ी विश्व कप में ट्रैप शूटिंग स्पर्धा में रजत पदक जीतकर इस प्रतियोगिता  में पदक जीतने वाली प्रथम भारतीय महिला बनी । 'साँड की आँख' फ़िल्म इन दादियों के संघर्ष, जीवट तथा साहस से न केवल स्वयं जीवन में आगे बढ़कर कुछ असाधारण उपलब्धि पाने वरन अपनी अगली पीढ़ियों की कन्याओं को भी सफलता और उन्नति की राह दिखाने की गाथा है । इन दादियों ने अपने जीवन को वह देदीप्यमान दीप बनाया जिसके प्रकाश में उनकी बेटियाँ एवं पोतियाँ अपना जीवन-मार्ग देख सकीं ।
'साँड की आँख' फ़िल्म भारतीय समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक व्यवस्था की विडम्बनाओं से आरंभ होती है जिन्हें समझाने के लिए तोमर परिवार के वयोवृद्ध मुखिया की यह बात ही पर्याप्त है - 'म्हारे घर की छोरियाँ आगे ना जावे है, दूसरा के घर जावे है' । अर्थात् कन्याओं के लिए परिवार द्वारा नियत व्यक्ति से विवाह करके पराये घर जाने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है ।  इसी बात की अगली कड़ी यह है कि पराये घर में भी उनकी स्थिति में कोई सुधार होने वाला नहीं है क्योंकि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में परिवार की स्त्रियों से यही अपेक्षित है कि वे सवेरे से रात तक घर तथा खेतों के कामकाज में खटती रहें, पुरुषों की सेवा-टहल करती रहें तथा संतानोत्पत्ति की मशीन की भाँति साल-दर-साल प्रसूति में जाकर परिवार का आकार बढ़ाती रहें । वंश-वृक्ष के लिए भूमि तथा परिवार के लिए बिना पारिश्रमिक की सेविका के अतिरिक्त उनकी न कोई भूमिका हो, न ही कोई महत्व तथा उन्हें वांछित सम्मान तक प्राप्त न हो एवं वे अपने पतियों द्वारा कारण-अकारण प्रताड़ित होकर भी मूक पशु की भाँति सब कुछ सहती रहें । पुरुष उन्हें पैर की जूती समझें एवं वे अपनी इस अवस्था को बिना किसी विरोध के स्वीकार कर लें । उनकी अपनी न कोई इच्छा हो, न कोई राय । पुरुष-प्रधान समाज की सदियों से चली आ रही इस अनुचित मानसिकता का दंश लाखों-करोड़ों भारतीय नारियों ने भोगा है और आज भी भुगतती हैं । फ़िल्म यह बताती है कि चंद्रो और प्रकाशी भी ऐसी ही अभागी नारियों की श्रेणी मेंं रहीं  जब तक कि वृद्धावस्था में पहुँच कर उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ नहीं आया ।

उनके गाँव जौहड़ी के ही डॉक्टर राजपाल सिंह जो विभिन्न स्थानों पर निशानेबाज़ी को प्रोत्साहन देने एवं युवा निशानेबाज़ों को तैयार करने का कार्य कर रहे थे, ने अपने ही गाँव में एक शूटिंग रेंज स्थापित की और गाँव के बालक-बालिकाओं को शूटिंग सीखने के लिए आमंत्रित किया । तोमर परिवार की बच्चियों के लिए पारिवारिक बेड़ियों से छुटकारा पाकर वहाँ जाना सहज नहीं था क्योंकि परिवार के पुरुष उन्हें इसकी अनुमति देने वाले नहीं थे । चंद्रो एवं प्रकाशी ने अपनी बच्चियों के लिए चुपचाप (बिना परिवार के पुरुषों की जानकारी के) वहाँ जाना सुनिश्चित किया क्योंकि वे नहीं चाहती थीं कि जैसे वे सारा जीवन घुट-घुटकर जीती रहीं, वैसे ही उनकी बच्चियाँ भी जियें । वे उन्हें लेकर वहाँ पहुँचीं और जब वे बच्चियाँ (सीमा तथा शेफ़ाली) गोली दाग़ने वाले हथियार से लक्ष्य (टारगेट) पर निशाना लगाना सीखने लगीं तो चंद्रो और प्रकाशी ने भी यूँ ही हथियार थामकर प्रयास किया और डॉक्टर राजपाल सिंह को दंग कर दिया क्योंकि उनके लगाए हुए निशाने सीधे दूर स्थित टारगेट के बीचोंबीच जाकर लगे जिसे निशानेबाज़ी की ज़ुबान में 'बुल्स आई' कहा जाता है ।

चकित एवं प्रसन्न डॉक्टर साहब अब न केवल बालिकाओं के साथ-साथ इन वृद्धाओं को भी सिखाने लगे बल्कि कुछ समय पश्चात् उन्हें स्पर्धाओं में भी भेजने लगे । अब स्पर्धाओं में भाग लेने के लिए गाँव से बाहर जाने की समस्या आई तो इन मेहनतकश लेकिन ज़िन्दा दिल औरतों ने अपने निशाना लगाने वाले हाथों के साथ-साथ अपने दिमाग़ों की भी तेज़ी दिखाई और नित नये बहाने घड़े जाने लगे ताकि (मर्दों की जानकारी में और उनकी इजाज़त से) गाँव से बाहर का सफ़र किया जा सके । और स्पर्धाओं से आने लगे विजय के प्रतीक पदक क्योंकि चंद्रो और प्रकाशी युवा प्रतिस्पर्धियों को लज्जित करती हुई एक-के-बाद-एक प्रतियोगिताएं जीतती चली गईं ।

कूपमंडूक सरीखी मानसिकता वाले अपने पुरुषों से और विशेषतः परिवार के मुखिया (जो कि गाँव के सरपंच भी थे) से इन सुयोग्य महिलाओं को अपनी योग्यता और उसका उपयोग ही नहीं, उससे अर्जित उपलब्धियाँ भी छुपानी पड़ीं क्योंकि उनकी संकीर्ण दृष्टि में तो यह सम्मान एवं गर्व की नहीं परिवार की तथाकथित परम्परा को तोड़ने व इस प्रकार परिवार की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचाने वाली बात थी । लेकिन कोई भी तथ्य सदा के लिए तो नहीं छुपाया जा सकता । फिर सीमा और शेफ़ाली जैसी बालिकाओं के भविष्य का भी प्रश्न था जिनके सपनों की मृत्यु इन दृढ़ निश्चयी स्त्रियों को स्वीकार्य नहीं थी जिनके तन बूढ़े थे पर मन में जवानों जैसा जोश था । ऐसे में साँड की आँख (बुल्स आई) पर अचूक निशाना लगाने वाली चंद्रो और प्रकाशी ने ज़िन्दगी के साँड का भी निडर होकर सामना किया और उसे सीधे सींगों से पकड़कर उसके साथ द्वंद्व में उसी तरह जीतीं जिस तरह वे निशानेबाज़ी की प्रतियोगिताओं में विजयी होती आई थीं ।

पटकथा में सिनेमाई छूटें ली गई होंगी जैसा कि वास्तविक व्यक्तियों के जीवन पर बनाई गई फ़िल्मों में होता ही है लेकिन काफ़ी हद तक (सम्भवतः स्वयं चंद्रो व प्रकाशी तथा उनके परिजनों से बात करके) यह फ़िल्म हक़ीक़त के नज़दीक है । फ़िल्म में संवादों की भाषा, पटकथा के प्रवाह एवं संपादन से जुड़ी कई कमियाँ हैं लेकिन इसका समेकित भावात्मक प्रभाव इतना प्रबल है कि वह सारी कमियों को ढक देता है । फ़िल्म एक ऐसे मानव-शरीर की तरह है जिसमें कई अंग ठीक नहीं हैं किन्तु हृदय बिल्कुल ठीक जगह पर है । जो फ़िल्म देखने वालों के नयनों में नीर उमड़ा दे, उसकी कमियों पर अधिक बात करना उचित नहीं । पर यह भी मानना होगा कि कई स्थानों पर यह फ़िल्म दर्शकों को हँसा भी देती है ।

परिवार के मुखिया का चरित्र पूरी तरह से नकारात्मक है जिसमें अपने फ़िल्म-निर्देशन के कौशल के लिए जाने जाने वाले प्रकाश झा ने अत्यंत प्रभावशाली अभिनय से प्राण फूंक दिए हैं । डॉक्टर राजपाल सिंह की भूमिका में विनीत कुमार सिंह, सेना में नौकरी कर रहे चंद्रो के पुत्र की भूमिका में शाद रंधावा, प्रतियोगिताओं में चंद्रो और प्रकाशी से हारकर उन्हें अपने महल में बुलाकर सम्मानित करने वाली (भूतपूर्व) रानी महेंद्र कुमारी की भूमिका में निकहत ख़ान तथा अनेक छोटी-बड़ी भूमिकाओं में विभिन्न कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है । पर अंततः यह फ़िल्म चंद्रो की भूमिका करने वाली भूमि पेडनेकर तथा प्रकाशी की भूमिका करने वाली तापसी पन्नू की फ़िल्म है । इन दोनों का मेकअप दोषपूर्ण है जिससे ये वृद्धाएं नहीं, अपनी वास्तविक आयु के आसपास ही दिखाई पड़ती हैं लेकिन इनका अभिनय ऐसा ज़ोरदार है कि इन्होंने चंद्रो तथा प्रकाशी को रजतपट पर जीवंत कर दिया है । रूपहले परदे पर इनकी आपसी समझ-बूझ एवं तालमेल भी इतना उम्दा है कि ये जेठानी-देवरानी नहीं, इक-दूजी पर जान छिड़कने वाली सखियाँ लगती हैं ।

कला-निर्देशक ने चित्रपट पर ग्रामीण पृष्ठभूमि को सजीव कर दिया है तो गीतकार एवं संगीतकार ने सुमधुर तथा हृदय-विजयी गीत प्रस्तुत किए हैं । आशा भोसले जी के स्वर में 'आसमां' गीत आँखें नम कर देने में पूरी तरह सक्षम है । फ़िल्म अपने अंतिम चरण में बार-बार खिंचती-सी लगती है जो कि पटकथा की कमी है लेकिन यह प्रेरक होने के साथ-साथ पूरी तरह रोचक एवं मनोरंजक है, इसमें कोई संदेह नहीं ।

मैंने फ़िल्म दंगल (२०१६) की समीक्षा में गीता फोगाट तथा बबीता फोगाट के संदर्भ में लिखा है कि मैं प्रार्थना करता हूँ कि सभी भारतीय बेटियाँ ऐसी ही साहसी, जुझारू एवं आत्मविश्वास से परिपूर्ण बनकर सफलता व सार्थकता के नये-नये आयाम छुएं ।  इस फ़िल्म को देखने तथा चंद्रो व प्रकाशी की प्रेरक गाथा से भली-भाँति परिचित हो चुकने के उपरान्त मैं यह प्रार्थना भी करता हूँ  कि सभी भारतीय माताएं एवं दादियाँ-नानियाँ भी उनके जैसी ही साहसी, जुझारू तथा आत्मविश्वास से परिपूर्ण होकर न केवल सफलता के नवीन-से-नवीन लक्ष्य स्वयं वेधें वरन अपने परिवार व समाज की बालिकाओं के लिए भी प्रेरणा की सतत सलिला बनकर रहें । पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी के लिए ऐसा स्थायी आदर्श (रोल मॉडल) बने कि उसे किसी और रोल मॉडल के लिए कहीं देखना ही न पड़े । अहंकारी तथा बंद दिमाग़ के पुरुषों को भी दर्पण दिखाने वाली यह फ़िल्म संपूर्ण परिवार के साथ देखने योग्य है ।

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Tuesday, October 22, 2019

फ़लसफ़ा प्यार का

प्यार ! इश्क़ ! मुहब्बत ! आशिक़ी ! आशनाई ! और शुद्ध हिंदी में कहें तो प्रेम ! क्या है इस शय का फ़लसफ़ा ? क्या है इसका दर्शन ? क्या है इसका अर्थ ? कहने की आवश्यकता नहीं कि बात यहाँ स्त्री-पुरुष के उस प्रेम की हो रही है जो आदिकाल से चला आ रहा है और जो सृष्टि का आधार है । नर-मादा प्रणय-संबंध तो पशु-पक्षियों में भी होते हैं जिनसे उनकी प्रजाति उत्तरोत्तर चलती रहती है लेकिन मनुष्यों की बात भिन्न इसलिए है क्योंकि उनके प्रेम में केवल देह ही नहीं भावनाएँ भी सम्मिलित होती हैं । इसलिए एक पुरुष एवं एक नारी जब परस्पर प्रेम-बंधन में बंधते हैं तो वे एक-दूसरे से प्रेम में डूबी हुई बातें करते हैं, एक-दूसरे को प्रेम-पत्र लिखते हैं, जब मिलते हैं तो एक-दूसरे को प्रेमभरी दृष्टि से देखते हैं, बिना स्पर्श के भी एक-दूसरे के साहचर्य से आनंदित होते हैं, सीधे-सीधे मिलना संभव न हो तो एक-दूसरे को छुप-छुप के देखने का प्रयास करते हैं, कवि-हृदय हों तो कविताएँ रचते हैं, एक-दूसरे को प्रेमोपहार देते हैं जिनका मूल्यांकन केवल उनमें निहित भावों से ही किया जा सकता है । उर्दू शायरी भरी-पड़ी है इश्क़ो मुहब्बत के जज़्बात और इज़हार से । असफल प्रेमियों की दर्दभरी कथाएँ अमर हो चुकी हैं  और लोकरुचि का अंग बनकर सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती आ रही हैं । सभी भाषाओं और सभी देशों के साहित्य, नाट्यकर्म और सिनेमा का मुख्य अंश प्रेमकथाएँ ही हैं । यह संसार न केवल प्रेम के द्वारा ही चल रहा है वरन इसका सौंदर्य भी प्रेम के कारण ही है । ज़रा सोचिए, प्रेम के बिना यह संसार कितना कुरूप होता ! 

किसी को किसी से प्रेम क्यों और कैसे होता है, यह तो सनातन काल से चला आ रहा अनसुलझा रहस्य है । लेकिन इस लेख में एक हिंदी उपन्यास की समीक्षा के बहाने मैं इस बात पर विमर्श करना चाहता हूँ कि प्रेम वस्तुतः है क्या ? प्रेम में दैहिक आकर्षण सम्मिलित हो सकता है, लेकिन यह उससे कहीं अधिक है, बहुत अधिक है । मैंने देखा है, जाना है और महसूस किया है कि लोग प्रेम करते तो हैं लेकिन उसके मर्म को समझते नहीं । अपने निजी अनुभव से मैं यह जान पाया हूँ कि प्रेम कोई लेन-देन नहीं, यह तो केवल देने का ही नाम है । सच्चे प्रेम की कसौटी है त्याग और बलिदान । दिलों के सौदे नफ़ा-नुकसान देखकर नहीं किये जा सकते । नफ़े-नुकसान का सवाल जहाँ उठे, वहाँ और चाहे कुछ भी हो; प्यार नहीं हो सकता । प्यार में सौदा नहीं होता । न ही कोई शर्तें लगाई जाती हैं । जिससे प्यार किया जाए, उससे कुछ पाने की नहीं बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उसके लिये सब कुछ छोड़ देने की इच्छा ही प्यार करने वाले के मन में पूरी शिद्दत से समा जाती है । किसी की मुहब्बत ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं मिल सकती, उसे तो सजदा करके ही हासिल किया जा सकता है । कुछ ऐसे ही जज़्बात से सराबोर और पढ़ने वाले के दिल को छू जाने वाला हिंदी उपन्यास है - 'सुहाग से बड़ा' जो तीन दशक पूर्व स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की लेखनी से निकला था ।

भारतीय परंपरा और संस्कारों के अनुसार एक हिंदुस्तानी औरत के लिए उसका सुहाग अर्थात् उसका पति ही सर्वोपरि होता है (यदि वह क्रूर अथवा कुकर्मी हो तो बात अलग है) । भारतीय नारी के लिए उसके सुहाग से बढ़कर कुछ नहीं होता, कोई नहीं होता । एक हिंदू विवाहिता का आदर्श सावित्री है जो सत्यवान को मृत्यु के मुख से लौटा लाई थी । फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई उसके लिए उसके सुहाग से भी बड़ा बन जाए ? इस प्रश्न का उत्तर यह उपन्यास देता है जो एक मार्मिक प्रेमकथा द्वारा प्रेम की वास्तविक परिभाषा प्रस्तुत करता है ।  

'सुहाग से बड़ा' कहानी है देवराज और माधुरी के पवित्र प्रेम की । घटनाक्रम पटना शहर में रखा गया है । देवराज अपराध की दुनिया में है लेकिन बचपन में मिली एक गहरी पीड़ा ने उसके कोमल मन पर ऐसी छाप छोड़ी है कि वह अपराधी होकर भी एक संवेदनशील मानव है । कानून के ख़िलाफ़ काम करते हुए भी वह अपने उसूलों के साथ कोई समझौता नहीं करता । वह वे काम करता है जिनकी इजाज़त कानून नहीं देता मगर वह ऐसा कोई काम नहीं करता जिसकी इजाज़त उसका ज़मीर उसे नहीं देता ।   

इधर माधुरी बहन है अशोक की जिसे पुलिस में नौकरी मिलने पर उसकी प्रशिक्षण-अवधि में ही एक गोपनीय योजना के अंतर्गत पुलिस का मुख़बिर बनाकर देवराज के दल में घुसा दिया जाता है । ये दोनों भाई-बहन अनाथ हैं और इसीलिए जहाँ अशोक के लिए अपनी बहन माधुरी से बढ़कर कोई नहीं है, वहीं माधुरी के लिए सबसे प्यारा कोई है तो बस उसका भाई अशोक है । अशोक का मित्र अमित पहले से ही पुलिस की नौकरी में है और वह माधुरी से विवाह करना चाहता है जिस पर अशोक को कोई आपत्ति नहीं । जहाँ तक माधुरी का प्रश्न है, अपने भाई की इच्छा की ख़ातिर उसे भी अमित से विवाह करना स्वीकार्य है । लेकिन . . .

लेकिन हालात माधुरी को देवराज के निकट ले आते हैं । दोनों प्रेम-बंधन में बंध जाते हैं । यह वह पवित्र प्रेम है जो आत्मा से किया गया है, देह से नहीं । माधुरी के प्यार की ख़ातिर देवराज अपराध की दुनिया छोड़ देने का फ़ैसला भी कर लेता है पर तक़दीर को कुछ और ही मंज़ूर है । देवराज पर दो राज़ एक साथ खुलते हैं - एक तो यह कि उसके दल में सम्मिलित अशोक पुलिस का मुख़बिर है जिसे दल के नियम के अनुसार मृत्युदंड देना उसका कर्तव्य है और दूसरा यह कि अशोक उसकी प्रेमिका माधुरी का भाई है । देवराज माधुरी से यह सच्चाई नहीं छुपाता । अब माधुरी उसे उसकी मुहब्बत का वास्ता देती है और कहती है कि अगर उसकी मुहब्बत सच्ची है तो वह अशोक की जान बख़्श देगा ।

देवराज दुविधा में है कि भावना और कर्तव्य में से किसे चुने जबकि माधुरी को पूरा विश्वास है कि देवराज उसके प्राणप्रिय भाई को मारकर उसके प्रेम को कलंकित नहीं करेगा । दूसरी ओर बंतासिंह नामक एक अपराधी कारागार से फ़रार हो जाता है । वह अमित और देवराज, दोनों ही का शत्रु है । घटनाक्रम कुछ इस तरह घूमता है कि अमित अलग-अलग ढंग से माधुरी, अशोक और बंतासिंह; सभी के संपर्क में आता है और देवराज के अड्डे पर धावा बोलकर उसके संपूर्ण दल का सफ़ाया कर देता है । देवराज गिरफ़्तार हो जाता है और अशोक की लाश बरामद होती है । माधुरी को पूरा विश्वास है कि उसके भाई का हत्यारा उसका प्रेमी ही है । उसकी गवाही के दम पर अदालत देवराज को फाँसी की सज़ा सुना देती है और वह उसी दिन अमित से विवाह कर लेती है ।

अब उन बातों को बरसों बीत चुके हैं । देवराज की फाँसी की सज़ा ऊंची अदालत में अपील किए जाने पर उम्र-क़ैद में बदल चुकी है और वह जेल में अपने दिन काट रहा है । अमित पुलिस में पदोन्नति पाकर वरिष्ठ पद पर पहुँच गया है और उसकी पत्नी माधुरी अब उसके पुत्र की माँ है । बंतासिंह कभी का विदेश भागकर कानून की पकड़ से बहुत दूर हो चुका है । लेकिन . . .

लेकिन एक दिन अतीत के कब्रिस्तान में दफ़न कुछ मुरदे अपनी कब्रों से उठकर खड़े हो जाते हैं और कुछ भूले-बिसरे राज़ अपना परदाफ़ाश होने की धमकी देने लगते हैं । माधुरी को पता लगता है कि देवराज उसका सुहाग तो नहीं बन सका लेकिन वह उसके लिए सुहाग से भी बड़ा है । वह अब जान पाती है कि जो इंसान उसकी माँग में सिंदूर बनकर नहीं सज सका, उसका प्यार कितना महान है । लेकिन नियति तो अपना खेल खेल चुकी है । अब क्या हो सकता है ? दिल को झकझोर देने वाली इस दास्तान का क्लाईमेक्स सच्ची मुहब्बत की ऊंचाई को दिखलाता है । इस कहानी का अंत यह बताता है कि सच्चा प्यार करने वाले चाहे ख़ुद मिट जाएं, उनका प्यार एक रोशन मीनार बनकर आने वाली नस्लों तक को समझा सकता है कि हक़ीक़त में प्यार होता क्या है । 

मैं नहीं जानता कि इस बेमिसाल कहानी का मूल विचार स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की मौलिक सोच का परिणाम था अथवा उन्होंने इसे कहीं से उधार लिया था । लेकिन भावनाओं के कुशल चितेरे शर्मा जी ने इस उपन्यास को अत्यंत रोचक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है और सभी प्रमुख चरित्रों को स्वतः ही उभरने और कथानक पर अपनी-अपनी छाप छोड़ने का अवसर दिया है । उन्होंने बताया है कि प्यार कर बैठने वालों को प्यार करना आता हो और वे प्यार के फ़लसफ़े को ठीक से समझते हों, यह ज़रूरी नहीं । सच्चे प्रेम का आधार है विश्वास । और उसका अभिन्न अंग है अपने प्रिय के लिए बड़े-से‌‌‌-बड़ा त्याग कर सकने की क्षमता ।

रहस्यकथाएँ और रोमांचक उपन्यास (थ्रिलर) लिखने के लिए विख्यात वेद प्रकाश शर्मा ने अपने लेखन-कर्म के प्रारम्भिक वर्षों में सामाजिक उपन्यास भी लिखे थे । उनके ऐसे एक उपन्यास का नाम है - 'राखी और सिंदूर' जो सम्भवतः उन्होंने बहुत कम आयु में लिखा था । मैंने वह उपन्यास पढ़ा तो नहीं लेकिन अनुमान लगा सकता हूँ कि वह एक विवाहिता की दुविधा की कहानी होगी जिसे राखी अर्थात् अपने भाई और सिंदूर अर्थात् अपने पति में से किसी एक को चुनना हो । 'सुहाग से बड़ा' में नायिका के समक्ष ऐसी कोई दुविधा नहीं है । वह अपने भाई से अधिक प्रेम किसी से नहीं करती तथा उसके हत्यारे को दंडित करवाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है । इस उपन्यास में दुविधा वस्तुतः नायक के समक्ष है जिसका शर्मा जी ने बड़ा ही हृदयविदारक चित्रण किया है । देवराज को बेचैन कर रही उसकी उलझन और उसके अंतर्मन की पीड़ा, दोनों ही का वर्णन कुछ ऐसा है कि पढ़ने वाले को लगता है मानो वह जीते-जागते देवराज को अपनी आँखों से देख रहा हो । अपनी महबूबा के लिए देवराज दीवानगी की हद से गुज़र जाता है जिसे महसूस करके इस दर्दभरी दास्तां को पढ़ रहे शख़्स की आँखें नम हो सकती हैं  । और उपन्यास के अंतिम भाग में वास्तविकता से अवगत हो चुकी माधुरी की पीड़ा, प्रतिशोध और प्रायश्चित; सभी पढ़ने वाले के दिल की गहराई में उतर जाते हैं ।

मुझे दुख है कि वेद प्रकाश शर्मा ने अपनी इस असाधारण कृति पर 'इंटरनेशनल खिलाड़ी' (१९९९) जैसी मामूली फ़िल्म बनवाई जिसमें अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना ने नायक-नायिका की भूमिकाएँ निभाई थीं । फ़िल्म में उपन्यास की संपूर्ण कहानी नहीं बल्कि केवल उसके कुछ पात्र तथा उसके घटनाक्रम का एक अंश ही लिया गया है और बाकी की कहानी (जो कि कथानक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है) फ़िल्म से निकाल दी गई है । जहाँ उपन्यास एक अमर प्रेमकथा है, वहीं फ़िल्म एक साधारण एक्शन फ़िल्म से अधिक कुछ नहीं है । फ़िल्म में न भाई-बहन का प्रेम ठीक से उभर पाया है, न ही प्रेमी-प्रेमिका का । फ़िल्म में उपन्यास की रूह का नामोनिशान तक नहीं है । मुझे ऐसा लगता है कि पात्रों के चरित्र-चित्रण, भावपक्ष और कथानक की आत्मा की दृष्टि से कंगना राणावत की प्रथम फ़िल्म 'गैंगस्टर' (२००६) इस उपन्यास के अधिक निकट है बजाय 'इंटरनेशनल खिलाड़ी' के । 

सरल हिंदी में लिखा गया थ्रिलर और सामाजिक कथा का मिश्रण यह उपन्यास आदि से अंत तक पढ़ने वाले को बांधे रखता है । इसे उन लोगों को भी पढ़ना चाहिए जिन्होंने 'इंटरनेशनल खिलाड़ी' फ़िल्म देख रखी है क्योंकि उपन्यास का कैनवास फ़िल्म से बहुत अधिक विस्तृत है और इसमें प्यार का वह रंग है जो फ़िल्म में कहीं नज़र नहीं आता । प्यार तो अपने जीवन में लगभग सभी मनुष्य करते हैं चाहे वे किसी भी लिंग के हों लेकिन प्यार के फ़लसफ़े को उनमें से बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं । अगर आप समझना चाहते हैं तो 'सुहाग से बड़ा' को ज़रूर पढ़िए ।

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Sunday, September 29, 2019

सलेब्रिटी और सत्ता

अमिताभ बच्चन को दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिए जाने की घोषणा कर दी गई है । अमिताभ बच्चन इस पुरस्कार के सर्वथा योग्य हैं किंतु उन्हें यह पुरस्कार दिया जाना केवल उनकी योग्यता पर आधारित नहीं लगता क्योंकि भारतीय फ़िल्म जगत से जुड़े ऐसे कई कर्मयोगी इस पुरस्कार से वंचित रहे जो इसके लिए उनसे अधिक अर्हता रखते थे एवं उनसे कहीं पहले इसके अधिकारी थे । वे हमेशा सत्ता एवं सरकार के पक्ष में रहते हैं, इसलिए उन्हें यह सम्मान मिलना तो था ही । 

अमिताभ बच्चन ने फ़िल्में (तथा रियलिटी शो भी) केवल धनार्जन के निमित्त कीं और लगभग सदा राजनीतिक सत्ताधारियों से निकटता बनाए रखी । वे अच्छे अभिनेता हैं, इसमें कोई संदेह नहीं लेकिन इसमें भी कोई संदेह नहीं कि वे सदा अभिनय ही करते हुए लगते हैं । अपने वास्तविक एवं स्वाभाविक रूप में सम्भवतः वे केवल अपने परिजनों के समक्ष ही आते हैं । 'कौन बनेगा करोड़पति' शो हो या धन कमाने के लिए किए गए विज्ञापन या सरकारी योजनाओं के ब्रांड ऐम्बैसडर की भूमिका या कोई सार्वजनिक कार्यक्रम या फिर सोशल मीडिया पर उनकी अभिव्यक्तियां; उनका प्रत्येक शब्द एवं भावभंगिमा उनके द्वारा किया जा रहा अभिनय ही प्रतीत होते हैं ।  सत्तर के दशक में रूपहले परदे पर जिस व्यवस्था के फ़िल्मी विरोधी बनकर उन्होंने एंग्री यंग मैन के रूप में जनता के हृदय पर राज किया और चोटी के सितारे बनकर अकूत धन कमाया, वास्तविक जीवन में वे सदा उसी शोषक व दमनकारी व्यवस्था के साथ ही खड़े दिखाई दिए । १९८४ में लोकसभा का चुनाव जीतकर जनप्रतिनिधि बनने के उपरांत भी उन्होंने उस जनता के प्रति अपना कोई कर्तव्य नहीं निभाया जिसने उन्हें सदा सर-आँखों पर बिठाया था । विगत ढाई दशक से तो वे हर ताक़तवर के आगे झुकते तथा पैसे के लिए किसी का भी प्रचार करते दिखाई देते हैं । जो मुँहमाँगी रकम दे, वे उसी की बोली बोलने को तैयार बैठे रहते हैं । और उनकी ख़ुदगर्ज़ी व अहसानफ़रामोशी की हद यह है कि उन्होंने उसी सुब्रत रॉय से उसके बुरे वक़्त में मुँह मोड़ लिया जिसने उनके बुरे वक़्त में उनकी भरपूर सहायता की थी (जब अमिताभ की कम्पनी एबीसीएल दिवालिया होने के कगार पर खड़ी थी) । ख़ैर ...

यह रवैया सिर्फ़ उनका ही नहीं, उनके जैसे ज़्यादातर सलेब्रिटी लोगों का है हमारे देश में । सलेब्रिटी उन लोगों को कहा जाता है जो प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय होते हैं तथा सदैव समाचारों एवं पत्रिकाओं की सुर्खियों में बने रहते हैं । यद्यपि इनमें से अधिकांश धनी होते हैं किंतु सलेब्रिटी कहलाने का आधार धन से अधिक उनकी प्रसिद्धि, सामाजिक प्रतिष्ठा एवं मीडिया की चर्चा में बने रहना होता है । ये ख्यातनाम व्यक्ति (अंग्रेज़ी) दैनिकों के साथ संलग्न परिशिष्टों के पृष्ठ संख्या तीन पर अपने से संबंधित छोटी-बड़ी ख़बरों और तसवीरों के प्रकाशन के कारण 'पेज थ्री पर्सनैलिटी' कहलाते हैं । इनकी ख्याति अपने कार्यक्षेत्र में पर्याप्त सफलता अर्जित करने के कारण तो होती ही है, अपनी ओर से भी चर्चा में बने रहने के लिए ये मीडिया का भरपूर इस्तेमाल करते हैं । जनसामान्य में इनकी लोकप्रियता ही इनकी शक्ति होती है जिसे भुनाने एवं बनाए रखने में ये कोई कसर नहीं छोड़ते ।

वैसे तो राजनीतिक सत्ता के महत्वपूर्ण एवं शीर्ष पदों पर विराजमान व्यक्ति तथा अनौपचारिक सत्ता एवं प्रभाव रखने वाले (बालासाहेब ठाकरे जैसे) व्यक्ति स्वयं भी सलेब्रिटी होते हैं, यहाँ मैं उन सलेब्रिटी लोगों की बात कर रहा हूँ जो राजनीतिक सत्ता से सीधे-सीधे संबद्ध नहीं होते हैं । ऐसे व्यक्ति फ़िल्म तथा टीवी के सितारे भी होते हैं, सफल एवं लोकप्रिय कलाकार व साहित्यकार भी, फ़ैशन डिज़ाइनिंग व मॉडलिंग जैसे ग्लैमरयुक्त पेशों से जुड़े लोग भी और खेल के मैदान में झंडे गाड़ने वाले भी । इनमें से अधिकांश लोगों में जो एक समानता स्पष्टतः दिखाई देती है, वह है शक्तिशाली सत्ताधारियों से मधुर संबंध बनाए रखने में इनकी रुचि । अमिताभ बच्चन ऐसे ही एक व्यक्ति हैं और उनके जैसे दर्ज़नों को पहचाना जा सकता है । क्या कारण है इसका ?

कारण एक ही है - राजनीतिक सत्ता में निहित अत्यधिक शक्ति जो किसी व्यक्ति-विशेष का जीवन सँवार भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है; उसे लाभान्वित भी कर सकती है और भारी हानि भी पहुँचा सकती है । अतः सलेब्रिटी जिन्हें अपनी सफलता, समृद्धि एवं लोकप्रियता से ही वास्तविक लगाव होता है; सत्ताधारियों से डरते हैं । मैंने अपने लेख - सफलता बनाम गुण  में इस बात को रेखांकित किया है कि वर्तमान पीढ़ी यह मानती है कि सफलता के लिए बहुत कुछ त्यागा जा सकता है लेकिन सफलता को किसी के भी लिए दांव पर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि (सफल व्यक्तियों के लिए) वह सबसे अधिक मूल्यवान होती है । सलेब्रिटी लोगों के सत्ता-प्रेम का सच यही है । वे अपने कामयाब करियर के बरबाद होने का ख़तरा नहीं उठा सकते ।

इस स्वार्थारित प्रेम के कारण ही वे न केवल अपने प्रशंसकों, समाज एवं देश के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं करते वरन उसकी कुसेवा भी करते हैं । वे न केवल जब-तब सत्ताधारियों की चाटुकारितापूर्ण प्रशंसा करते रहते हैं वरन उनकी स्पष्टतः अनुचित नीतियों एवं कार्यकलापों का भी समर्थन ही करते हैं । येन-केन-प्रकारेण उनकी गुड-बुक्स में बने रहना ही ऐसे लोगों की नीति बन जाती है । ऐसे में ये सलेब्रिटी किसी भी विषय पर अपने वास्तविक विचार यदि रखते भी हैं तो उन्हें व्यक्त नहीं करते हैं (जो भूले-भटके ऐसा कर बैठते हैं, वे सत्ताधारियों के निशाने पर आ जाते हैं एवं उनके कोप का भाजन बनते हैं) । ऐसे लोगों की किसी भी सार्वजनिक महत्व के मुद्दे पर कही गई बातें सरकारी नीतियों की अनुगूंज ही होती हैं । परदे पर दर्शकों के समक्ष निडर एवं साहसी मानव के रूप में आने वाले अमिताभ बच्चन जैसे सलेब्रिटी अपने निजी जीवन में डर-डर के जीते हैं ।

लेकिन इनसे भी कहीं अधिक कुसेवा अपने देश और नागरिकों की वे फ़िल्मी सलेब्रिटी करते हैं जो अपने सर्जक माध्यम का दुरूपयोग सत्ताधारियों के हित-साधन के निमित्त करते हैं । फ़िल्म-निर्माण या साहित्य-लेखन या चित्रकारी या संगीत जैसी कोई भी कला किसी राजनीतिक दल को (चुनावी) लाभ पहुँचाने के लिए नहीं होती, समाज के मन-रंजन तथा मार्गदर्शन (यदि संभव हो) के लिए होती है । यदि किसी कृति के सृजन का प्रयोजन ही मतदाताओं को (मिथ्या सूचनाओं द्वारा) भ्रमित करके किसी विशिष्ट राजनीतिक दल की चुनाव जीतने में सहायता करना है तो यह निश्चय ही ऐसा करने वाले सलेब्रिटी सर्जकों का एक निंदनीय कृत्य है । हाल के वर्षों में वर्तमान सत्ताधारी दल के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को बदनाम करने के लिए मिथ्या सूचनाओं से भरी कई फ़िल्में बनाई गई हैं जिनमें अप्रमाणित तथा अपुष्ट तथ्यों को इस रूप में प्रस्तुत किया गया है मानो वे स्थापित सत्य हों । वर्तमान भारतीय प्रधानमंत्री के जीवन पर भी उन्हें महिमामंडित करने वाली एक फ़िल्म बनाकर प्रदर्शित की गई है जिसमें ऐसी-ऐसी घटनाएं दिखाई गई हैं जो कभी हुई ही नहीं । ऐसी फ़िल्में भावी पीढ़ी के साथ अन्याय हैं जो स्वयं सत्य का अण्वेषण करने के स्थान पर इनमें प्रदर्शित बातों को ही सत्य मान बैठेगी ।

वो ज़माना गया जब विभिन्न क्षेत्रों के सितारे चुनाव में राजनीतिक दलों के लिए वोट माँगने तथा नेताओं की चुनावी सभाओं में भीड़ जुटाने का साधन थे । अब तो वे स्वयं राजनीतिक दलों के सदस्य बनते हैं और तुरत-फुरत टिकट पाकर चुनाव लड़ भी लेते हैं व प्रायः जीत भी लेते हैं । अब बॉलीवुड का भी जाति-धर्म-नस्ल के आधार पर भेदभाव न करने वाला चरित्र तथा मानव को मानव-मात्र ही समझने वाला दृष्‍टिकोण नहीं रह गया । अब तो ताक़तवर राजनेता के आगे मत्था टेकना और फ़ायदा उठाना ही ज़्यादातर लोगों का उसूल बन गया है । सलेब्रिटी बनकर सत्ता का दामन पकड़ा जा रहा है तो सत्ता का साथ पकड़कर ही सलेब्रिटियों की जमात में शामिल होने का भी जुगाड़ किया जा रहा है । देश, समाज, मानवता, सत्य, न्याय, जीवन-मूल्य; सब नेपथ्य में चले गए हैं । अमिताभ बच्चन ने २००४ में गोविंद निहलानी कृत फ़िल्म 'देव' में एक कर्तव्यपरायण पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई थी जो गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगों से जूझता है और ऊपर से आए ग़लत आदेशों की परवाह न करके निर्दोष तथा असहाय मुस्लिमों की जान बचाने व दोषियों को कानून द्वारा दंडित करवाने का प्रयास करता है । क्या वर्तमान राजनीतिक वातावरण में ऐसी भूमिका निभाने का साहस अब उनमें है ?

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Thursday, September 12, 2019

गोपिकाओं का निश्छल प्रेम

जन्माष्टमी आई और चली गई । प्रत्येक वर्ष आती है । हम धर्मप्राण हिंदू भगवान कृष्ण को स्मरण करते हैं, उनकी लीलाओं को विशेषतः उनकी गोकुल-वृंदावन में रचाई गई बाल-लीलाओं को याद करके और उनका नाट्य रूपांतर करके प्रफुल्लित होते हैं । गाँव-खेड़ों में रासलीलाओं के आयोजन होते हैं और कल्पनाएं की जाती हैं कि राधारानी और अन्य गोपिकाओं के साथ कृष्ण ने कैसे-कैसे रास रचाए होंगे, कैसे वे स्वयं आनंदित हुए होंगे और कैसे उन्होंने सर्वत्र आनंद-रस बरसाया होगा । इस सबके दौरान हम सहज ही यह मानकर चलते हैं कि उन रासलीलाओं तथा कृष्ण की बालसुलभ लीलाओं से ब्रज और गोकुल की गोपिकाएं भी आनंदित ही हुई होंगी । उन बालाओं को कृष्ण से हार्दिक प्रेम हो गया था, इस तथ्य से कोई इनकार नहीं करता । भक्त कवि सूरदास का तो संपूर्ण काव्य-सृजन ही इन्हीं सब कार्यकलाप तथा सुकोमल संबंधों पर आधारित है । लेकिन कृष्ण ने तो ग्यारह वर्ष की आयु में वृन्दावन छोड़ दिया था और मथुरा चले गए थे । इस तरह उनका गोकुल-वृंदावन की भूमि, अपने पालक माता-पिता अर्थात् नंदबाबा तथा यशोदा मैया एवं समस्त गोप-बालाओं तथा गोप-वधुओं से विछोह हो गया था । उस विछोह के उपरांत क्या हुआ ?

किवदंतियों की बात जाने दीजिए जिनसे आज इंटरनेट भरा पड़ा है और जिनमें से अधिकांश की कोई प्रामाणिकता नहीं है । कृष्ण की प्रामाणिक जीवन-कथा को आद्योपांत पढ़ा जाए तो यही पता लगता है कि एक बार गोकुल-वृंदावन छोड़ जाने के उपरांत वे पुनः वहाँ कभी नहीं लौटे । क्यों ? वे ही बेहतर जानते होंगे । क्या उन्हें कभी अपने उस बाल्यकाल की मधुर स्मृतियों ने, वृंदावन की कुंज-गलियों ने, नंदबाबा और यशोदा मैया के दुलार ने एवं उन पर प्राणप्रण से न्यौछावर हो जाने वाली गोपिकाओं के पावन प्रेम ने नहीं पुकारा ? यह भी वे ही बेहतर जानते होंगे । वे योगेश्वर कहलाए, महाभारत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, गीतोपदेश दिया तथा आजीवन पांडवों के सम्पर्क में रहे । उन्होंने अनेक लोगों से संबंध जोड़े, अनेक विवाह किए, द्वारिका नगरी बसाई और द्वापर के युगपुरुष के रूप में स्थापित हुए । भारतीय जनमानस में उनकी महानता आज भी निर्विवाद है । अत्यंत सफल रहे वे अपने जीवन में । लेकिन सफलता के आभामंडल में सरल प्रेम यदि कहीं खो जाए तो सफलता और स्वार्थपरता में भिन्नता करना कठिन हो जाता है । वे दीर्घजीवी रहे और अपने पड़पोतों तक का मुख देख सके ।  क्या अपने सुदीर्घ जीवन में उन्हें इतना भी समय नहीं मिला कि कभी गोकुल-वृंदावन जाकर अपने वियोग में तड़पने वालों की विरहाग्नि को शीतल कर देते ? सम्भवतः उनकी कभी ऐसी इच्छा ही नहीं हुई ।

प्रेम क्या है ? प्रेम हृदयों को जोड़ने वाला वह कच्चा धागा है जिसे कोई तोड़ना चाहे तो एक झटके में तोड़ दे और जो उसे न टूटना हो तो हज़ार हाथियों के बल से भी न टूटे ।  कृष्ण ने उस बाल्यकालीन निर्दोष प्रेम को किस रूप में देखा, वे ही जानें किंतु राधा सहित गोप-बालाओं के लिए तो वह ऐसा शक्तिशाली और चिरस्थायी धागा था जो किसी भाँति नहीं टूट सकता था, कभी नहीं टूट सकता था । अजर-अमर और सनातन था (और है) उनका प्रेम । और इसी प्रेम ने सृष्टि में अपनी चिरकालिक परिभाषा रची, वह परिभाषा जिसे शब्दों से नहीं, अनुभूति से समझा जा सकता है और उसी से समझा जाता है ।

एक फ़िल्मी गीत में कहा गया है - 'न जाने क्यूँ होता है ये ज़िन्दगी के साथ, अचानक ये मन किसी के जाने के बाद, करे फिर उसकी याद छोटी-छोटी-सी बात' । प्रिय के विछोह में त्रस्त विरही या विरहणी को उससे जुड़ी प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक व्यक्ति से गहरा लगाव हो जाता है क्योंकि वह वस्तु या व्यक्ति उसके लिए अपने प्रिय का ही प्रतीक बन जाता है । कई वर्षों के उपरांत जब बलराम वृंदावन आए तो उन्हें देखकर गोपियाँ भाव-विह्वल हो उठीं । क्यों ? गोपियों का लगाव तो कृष्ण से था, बलराम से नहीं । किंतु बलराम के आगमन एवं दर्शन ने भी उन्हें अतीव आनंदित किया क्योंकि वे कृष्ण के भाई थे और इसीलिए उनका आना भी गोपियों के आनंद का स्रोत बन गया था । बे बार-बार बलराम से पूछती रहीं कि कान्हा कैसे हैं, वे कभी उन्हें स्मरण करते हैं या नहीं । बलराम क्या उत्तर देते ?

कृष्ण ने विरहणी गोपियों के विकल मन को धीरज बंधाने के लिए तथा उन्हें मोह की निस्सारता समझाने के लिए उद्धव को गोकुल भेजा । उद्धव गए तो थे अपने ज्ञान से गोपियों के मन को शांत करने तथा उनकी मानसिकता एवं कृष्ण के प्रति दृष्टिकोण को मोड़ने लेकिन गोपिकाओं की विरह-वेदना देखकर संभवतः उन्हें अपने ज्ञान की निस्सारता का आभास हो गया और वे भाँप गए कि गोपिकाओं के असीम कृष्ण-प्रेम के समक्ष उनका तथाकथित  तत्व-ज्ञान तृणभर भी नहीं था और इसीलिए उनका विरह-व्यथित गोपिकाओं को समझाने का प्रयास निरर्थक ही था । सूरदास के शब्दों में गोपियों ने उद्धव से कहा - 'ऊधो मन न भए दस-बीस, एक हुतो सो गयो स्याम संग को अवराधै ईस' अर्थात् हमारे पास कोई दस-बीस मन तो थे नहीं, एक ही था जो कृष्ण के संग गया, अब कुछ है ही नहीं जिसे कहीं और लगाया जाए' । अब उद्धव क्या बोल सकते थे और क्या उपदेश दे सकते थे उन्हें ? मेरे अंतर्मन में यही प्रश्न उठता है कि जब कृष्ण उद्धव को भेज सकते थे तो क्या स्वयं नहीं जा सकते थे ? सूरदास के ही शब्दों में उन्होंने स्वयं उद्धव से (जो कि उनके सखा थे) कहा था - 'ऊधो, मोहि ब्रज बिसरत नाहीं' । जब वे ब्रज को भूल नहीं सकते थे तो जाने में क्या बाधा थी ?

एक हिंदी फ़िल्म की समीक्षा में मैंने इस बात को रेखांकित किया है कि 'अपनों की कीमत सपनों से ज़्यादा होती है' । लेकिन संसार में निरंतर दृष्टिगोचर यथार्थ तो यही बताता है कि सपनों का पीछा करने वाले और सफलता को मुट्ठी में कर लेने वाले अपनों की परवाह करना भूल ही जाते हैं । उनकी संवेदनशीलता, भावनाएं और स्नेह: सब कुछ वास्तविक से प्रदर्शनी कब बन जाता है, सम्भवतः वे स्वयं भी नहीं जान पाते । मैंने अपने लेख 'सफलता बनाम गुण' में कहा है - सफलता के लिए बहुत कुछ त्यागा जा सकता है लेकिन सफलता को किसी के भी लिए दांव पर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि (सफल व्यक्तियों के लिए) वह सबसे अधिक मूल्यवान होती है। गोपियों को तो किसी भौतिक सफलता की अभिलाषा नहीं थी । वे तो कृष्ण के दरस से, उनके सान्निध्य से और उनकी लीलाओं से हो रही आनंद-प्राप्ति से ही अपने जीवन को धन्य मान चुकी थीं । वही उनके संपूर्ण जीवन के लिए पर्याप्त था । सफलता का महत्व तो कृष्ण के लिए रहा । सफल बनकर वे कूटनीतिज्ञ बन गए (प्राय: सभी सफल व्यक्त्ति बन ही जाते हैं), संवेदनशील नहीं रहे । उनके जीवन में आई सफलता की आँधी उनके भीतर निहित संवेदनाओं से युक्त एवं कोमल भावनाओं से ओतप्रोत प्रेमी को कहीं बाहर उड़ा ले गई । देवत्व प्राप्त करके वे मानव न रहे ।

गोपियों ने अपने मन पर पत्थर रखकर कृष्ण को विदा देने समय यह तो नहीं सोचा था कि वे उनसे और ब्रज-गोकुल से ऐसा मुँह फेरेंगे कि कभी पलटकर न आएंगे । वे भोली बालाएं तो यही समझती रहीं और सदा उनकी बाट जोहती रहीं कि वे कभी तो आएंगे । दिन महीनों में बदले और महीने बरसों में । उनका संपूर्ण जीवन कृष्ण का पंथ निहारते बीत गया, आँखें पथरा गईं होंगी उनकी, पलकों को भिगोते-भिगोते किसी दिन अश्रु भी सूख गए होंगे उनके । पर कान्हा न आए । केवल उनकी वर्षों पुरानी स्मृतियां ही साथ रहीं उनके । और अपने लाल पर दिन-रात स्नेह बरसाने वाली यशोदा मैया पर अपने पुत्र के वियोग में क्या बीती होगी, इसका केवल एक पीड़ादायी अनुमान ही लगाया जा सकता है ।

मैं नहीं जानता कि जयदेव रचित 'गीतगोविंद' में तथा रीतिकालीन कवियों की रचनाओं में वर्णित कृष्ण की राधा तथा अन्य गोप-बालाओं एवं गोप-वधुओं के साथ की गई क्रीड़ाओं में सत्य का अंश कितना है लेकिन इन सभी वर्णनों में दैहिकता ही प्रमुखता रखती है तथा ऐसा प्रतीत होता है कि कृष्ण ने अपनी रासलीलाओं द्वारा उन सरल एवं निष्पाप नारियों की कमनीय देहों का सुख लिया । किंतु गोप-बालाओं तथा गोप-वधुओं का उनके लिए प्रेम आत्मिक ही था जिसमें दैहिकता लेशमात्र भी नहीं थी । इसीलिए वह प्रेम कृष्ण की महानता से भी कहीं अधिक महान है क्योंकि वह निस्वार्थ था, निष्कलंक था, किसी भी प्रकार की अपेक्षा से मुक्त था । वह प्रेम कोई साधन नहीं, अपने आप में ही साध्य था ।

और इन्हीं गोपिकाओं में थीं - वृषभानुजा राधारानी जो कृष्ण से आयु में कई वर्ष बड़ी थीं लेकिन कृष्ण के लिए उनका प्रेम आयु और देह की सीमाओं से परे था । कृष्ण से विछोह हो जाने के उपरांत उन्होंने अपने माता-पिता की इच्छानुसार विवाह भी किया लेकिन अपने हृदय में अपने बंसीवाले कान्हा की छवि को अक्षुण्ण बनाए रखा । कौन जाने, वे ही कलियुग में मीरा बनकर अवतरित हुई हों । सत्य और तथ्य यही है कि कृष्ण ने चाहे जितने विवाह किए और चाहे जितनी उनकी पटरानियां (कुल आठ बताई जाती हैं) रही हों, उनके नाम के साथ सदा-सदा-सर्वदा के लिए यदि किसी का नाम संयुक्त हो गया तो राधा का । कृष्ण के किसी भी मंदिर में उनके साथ उनकी किसी पटरानी की प्रतिमा नहीं लगती, राधा की लगती है । उस राधा की जिसका कृष्ण के साथ संबंध सामाजिक नहीं: हार्दिक था, आत्मिक था, ऐसा था जिसमें वह पृथक् न रही, कृष्ण के अस्तित्व के साथ एकाकार हो गई । ऐसे निश्छल और पावन प्रेम को विवाह जैसी किसी औपचारिकता की आवश्यकता थी भी नहीं । उसे अमरत्व तो प्राप्त होना ही था ।

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Thursday, August 8, 2019

आर्टिकल पंद्रह और मोहल्ला अस्सी

विगत दिनों दो बहुचर्चित फ़िल्में देखीं  'आर्टिकल 15' और 'मोहल्ला अस्सी 'आर्टिकल 15' सिनेमाघर में जाकर देखी और 'मोहल्ला अस्सीइंटरनेट पर । प्रत्यक्षतः इन दोनों फ़िल्मों में कोई समानता नहीं दिखाई पड़ती । लेकिन मैंने फुरसत में जब ग़ौर से इन दोनों ही फ़िल्मों की कहानियों और उन्हें पेश करने की ईमानदारी पर मनन किया तो मुझे इनमें तुलना करने के लिए कई बिंदु मिले । दोनों ही की कथाओं का ठोस आधार है । हाल ही में (२०१९ में) प्रदर्शित 'आर्टिकल 15' जहाँ मई २०१४ में उत्तर प्रदेश के बदायूँ  में हुए दो दलित बालिकाओं के जघन्य हत्याकांड से प्रेरित हैवहीं गत वर्ष (२०१८ में) प्रदर्शित 'मोहल्ला अस्सीहिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार काशीनाथ सिंह की कृति 'काशी का अस्सीके एक अध्याय - 'पांडे कौन कुमति तोहे लागीपर आधारित है । दोनों ही फ़िल्में गुणवत्ता की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं लेकिन दोनों को ही वह व्यावसायिक सफलता नहीं मिली जो सैकड़ों करोड़ कमा लेने वाली औसत गुणवत्ता की फ़िल्मों को प्राय: सहज ही मिल जाती है । 'आर्टिकल 15' को प्रेरक होने के साथ-साथ मनोरंजक होने पर भी साधारण व्यावसायिक सफलता ही मिल सकी जबकि 'मोहल्ला अस्सीबुरी तरह असफल रही और अपनी लागत तक नहीं निकाल सकी । कारण ? हम भारतीय पलायनवादी हैं जो सत्य के साक्षात् से घबराते हैं । इसीलिए नेताओं द्वारा किया जाने वाला भांडनुमा मनोरंजन हमें भाता है और हम प्रसन्न होकर उन्हें वोट दे देते हैं चाहे वे हमारे प्रतिनिधि के रूप में अपने किसी भी कर्तव्य का पालन न करें । 

'आर्टिकल 15' के लेखक-निर्देशक अनुभव सिन्हा हैं जिन्होंने किसी ज़माने में 'तुम बिन' (२००१जैसी दिल को छू लेने वाली प्रेमकथा बनाकर अपने निर्देशकीय करियर का श्रीगणेश किया था और कुछ ही वर्षों में 'दस' (२००५) जैसी बड़े बजट की बहुसितारा थ्रिलर फ़िल्म उत्तम ढंग से बनाकर सभी को चौंका दिया था । व्यावसायिक फ़िल्में बनाते-बनाते उन्होंने 'मुल्क' (२०१८से अपने काम की धारा बदली और सार्थक सिनेमा की ओर मुड़े  'आर्टिकल 15' इस बात का प्रमाण है कि यह प्रतिभाशाली फ़िल्मकार निरंतर अपने क्षितिज का विस्तार कर रहा है और जोखिम उठाने से पीछे नहीं हट रहा है 

'मोहल्ला अस्सीके लेखक-निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी हैं जिन्होंने किसी ज़माने में दूरदर्शन के निमित्त अत्यंत प्रभावशाली तथा लोकप्रिय धारावाहिक 'चाणक्यबनाया था और उसमें शीर्षक भूमिका भी स्वयं ही निभाई थी । आने वाले समय में उन्होंने विभिन्न सृजनात्मक कार्यों में अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी जिनमें से प्रमुख रहा फ़िल्म 'पिंजर' (२००३) का लेखन-निर्देशन जो कि अमृता प्रीतम की इसी नाम वाली अमर कृति का सिनेमाई संस्करण थी । फ़िल्म चाहे व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही लेकिन वह अमृता जी की साहित्यिक कृति का अत्यंत ईमानदाराना और हृदयस्पर्शी प्रस्तुतीकरण थी ।

'आर्टिकल पंद्रह' और 'मोहल्ला अस्सी' दोनों ही फ़िल्मों के नायक ब्राह्मण हैं जिनकी अपनी-अपनी विचारधारा, अपनी-अपनी पृष्ठभूमि एवं अपनी-अपनी प्राथमिकताएं हैं । एक परंपरा में गहरे तक समा चुकी बुराइयों को दूर करना चाहता है और इसके लिए शत्रु-सदृश परिवेश तथा पक्षपाती प्रशासकीय तंत्र से जूझता है ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके जबकि दूसरा परंपरा की जड़ों से कटना नहीं चाहता, न ही उन जड़ों को बाज़ार के प्रहारों से मिटते-बिखरते हुए देख सकता है । एक को अपने ब्राह्मण होने का कोई अभिमान नहीं है तथा वह उस जातिवादी एवं विभेदकारी सामाजिक व्यवस्था का घोर विरोधी है जो एक वर्ग को उच्च तथा दूसरे वर्ग को निम्न की श्रेणी में डालते हुए एक के द्वारा दूसरे के शोषण तथा उत्पीड़न को न्यायोचित एवं अनदेखा करने के योग्य मान लेती है जबकि दूसरा उस सामाजिक व्यवस्था में भरपूर आस्था रखता है और उसे अपने ब्राह्मणत्व का अभिमान भी है लेकिन वह मानवीय संवेदनाओं से कोरा नहीं है तथा जीवन के उच्च मूल्यों एवं आदर्शों में पूर्ण  विश्वास रखते हुए उनका वास्तविक जीवन में पालन करता है  अपनी-अपनी जगह और अपने-अपने नज़रिये से दोनों ही ठीक हैं क्योंकि दोनों के परिवेश भिन्न हैं, हेतु भिन्न हैं और वैचारिक विकास तो भिन्न रूप में हुआ ही है । दोनों अपने प्रति ईमानदार हैं । दोनों के ज़मीर ज़िंदा हैं । दोनों ही अपने भीतर की आवाज़ को अनसुना नहीं करते । दोनों वही करते हैं जो उनकी नज़र में सही है चाहे दूसरों की राय कुछ भी हो  
'आर्टिकल 15' विदेश में शिक्षा-प्राप्त उस युवा अंग्रेज़ीदां पुलिस अधिकारी के दृष्टिकोण से उत्तर भारत के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में व्याप्त शोचनीय परिस्थितियों की सूक्ष्मता से पड़ताल करती है जिसके मन में भारतीय गाँवों की बड़ी रूमानी कल्पना है और जो उसे नगरीय भीड़ तथा प्रदूषण से दूर पर्यटन-स्थल सरीखे लगते हैं  उसके भ्रम अपने थाना-क्षेत्र में पदार्पण के साथ ही टूटने आरंभ हो जाते हैं और दो दलित वर्ग की अवयस्क श्रमिक बालिकाओं की दुराचार के उपरांत हत्या के अत्यंत घृणित अपराध के अण्वेषण में लगने पर यह रहस्य परत-दर-परत उसके समक्ष उजागर होता है कि भारतीय संविधान में अनुच्छेद पंद्रह के माध्यम से समस्त नागरिकों को प्रदत्त समानता का मौलिक अधिकार केवल कागज़ी है जिसका वास्तविकता के धरातल पर अस्तित्व न के बराबर है । जिस बदायूँ काण्ड की उत्पीड़ित बालिकाओं तथा उनके निर्धन एवं पददलित परिजनों को आज तक न्याय नहीं मिला है, उसी की तर्ज़ पर इस फ़िल्म का कथानक रचा गया है जो कि पुलिस प्रक्रियात्मक थ्रिलर के ढंग से आगे बढ़ता है और अपनी उस तार्किक परिणति तक पहुँचता हैै जिस तक वह वास्तविक काण्ड नहीं पहुँच पाया है  इस दौरान नायक के साथ-साथ फ़िल्म देख रहे उस पाखंडी भारतीय समाज का भी उसी के भीतर सड़ांध मारती हुई उस वास्तविकता से साक्षात् करवाया गया है जिसे वह भलीभाँति जानने के बावजूद उसकी ओर देखने तथा उसके अस्तित्व को स्वीकार करने से परहेज़ करता है । फ़िल्म में केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) की घटिया तथा पक्षपातपूर्ण कार्यशैली भी बेबाकी से दिखाई गई है जिसमें ईमानदारी से दोषियों को पकड़ने केे स्थान पर पीड़ित वर्ग को ही न केवल तंग किया जाता है वरन उसी पर मिथ्या दोषारोपण किया जाता है  बदायूँ में हुए वास्तविक कांड के संदर्भ में भी सीबीआई का यही रवैया (पीड़ित परिवारों की जुबानी) सामने आया था । फ़िल्म में ये कटु सच्चाइयां इतने स्पष्ट रूप से दिखाई गई हैं कि मुझे भारतीय फ़िल्म सेंसर बोर्ड से फ़िल्म का अपने मूल स्वरूप में पारित हो जाना ही फ़िल्मकार की एक उपलब्धि लगती है 

'मोहल्ला अस्सी' लगभग एक दशक की समयावधि (१९८८ से १९९८) में बाबा विश्वनाथ की नगरी के नाम से विख्यात काशी (अथवा वाराणसी अथवा बनारस) में हुईं सामाजिक-राजनीतिक हलचलों को सत्यनिष्ठा से प्रदर्शित करती है और साथ ही नब्बे के दशक में उभरे उदारीकरण और वैश्वीकरण द्वारा धर्मप्राण भारतीय मानस में सदा पावन समझी गईं पुरातन परंपराओं पर निर्ममता से किए गए प्रहारों और उनके दारूण परिणामों को भी बिना किसी लागलपेट के ज्यों-का-त्यों पटल पर रखती है । यह फ़िल्म तीव्रता से बदल रहे परिवेश में हो रही सभी आंतरिक एवं बाह्य हलचलों को एक विद्वान एवं धर्मनिष्ठ पंडित को केंद्र में रखकर देखती है लेकिन उनका प्रभाव संपूर्ण ब्राह्मण (या यूँ कहिए कि सवर्ण) समाज पर किस तरह पड़ा था, इसे समग्रता से दर्शक-वर्ग के समक्ष प्रस्तुत करती है । कभी देवभा
षा के नाम से सम्मानित संस्कृत परिवर्तित परिवेश में जहाँ अंग्रेज़ी का ज्ञान ही प्रमुखतः महत्व रखता है, अपनी प्रासंगिकता किस प्रकार खो चुकी है, इस पर भी यह फ़िल्म मार्मिक ढंग से प्रकाश डालती है 

इन दोनों ही फ़िल्मों को देखने वालों को प्रत्यक्षतः ऐसा आभास हो सकता है कि 'आर्टिकल 15' तथाकथित मनुवादी वर्ण-व्यवस्था का विरोध करती है जबकि 'मोहल्ला अस्सी' उसका समर्थन  वस्तुतः ये दोनों ही फ़िल्में एक मानवीय दृष्टिकोण की अंतर्धारा लिए हुए चलती हैं जिसमें न तो किसी वर्ग का समर्थन है और न ही किसी वर्ग का विरोध  'आर्टिकल 15' का नायक दूसरों की उस पीड़ा को अनुभव करता है जो उसने नहीं भोगी और इसीलिए वह संवेदनशील युवक मन-ही-मन स्वयं को लज्जित भी पाता है कि वह ऐसे विशेषाधिकारों से युक्त वर्ग में जन्मा जिसमें ऐसी पीड़ाओं के लिए कोई सम्भावना नहीं है । यह अनुभूति राजकुल में जन्म लेकर सभी सुख भोगने वाले राजकुमार सिद्धार्थ की संसार में व्याप्त दुख की उस अनुभूति से तुलनीय है जिसने उन्हें गौतम बुद्ध बना दिया था । इसके विपरीत जीवन के ऊँचे मूल्यों को लेकर चलने वाले और 'सादा जीवन उच्च विचार' में आस्था रखने वाले 'मोहल्ला अस्सी' के धर्मनाथ पांडेय की पीड़ा पहले तो बाह्य रहती है लेकिन धीरे-धीरे समय के प्रवाह के साथ वह न केवल निजी बन जाती है वरन उसका स्वरूप भी बदल जाता है । अपने सिद्धांतों के साथ आजीवन समझौता न करने वाले और मूल्यों के हनन तथा भोगवादी प्रवृत्तियों के विरूद्ध दूसरों से झगड़ते रहने वाले पांडेयजी को जब अपने परिवार के पालन-पोषण के निमित्त उनसे समझौता करना पड़ता है तो उससे जो कष्ट उभरता है, वह पूर्णतः उनका अपना है जिसमें उनकी उनके जैसी ही धर्मप्राण पत्नी के अतिरिक्त कोई साझेदार नहीं है । परिवार की निर्धनता एवं अभावों को लेकर उन्हें निरंतर ताने देती रहने वाली उनकी अद्धांगिनी भी नहीं चाहती कि सदा अपने सिद्धांतों के साथ जीने वाले पांडेयजी अब उन्हीं सिद्धांतों से समझौता करें लेकिन जीवन की कटु वास्तविकता ने पांडेयजी को यह अनुभव करवा दिया है कि संसार की भौतिक भागमभाग में वे बहुत पिछड़ चुके हैं और जो समझौता वे विवश होकर कर रहे हैं, वस्तुतः उसके लिए भी पहले ही बहुत विलम्ब हो चुका है । उनके द्वारा अपनी पत्नी से कही गई यह बात किसी भी आदर्शवादी हृदय को चीर  सकती है – रोटी का चक्कर जब कुचलता है तो सबसे पहले मूल्य-सिद्धांत ही कुचले जाते हैं सावित्री; ग़रीबी सब कुछ रौंद देती है  

'आर्टिकल 15' तथा 'मोहल्ला अस्सी' के विवेकशील दिग्दर्शकों ने नायकों के साथ-साथ  अन्य पात्रों को भी कथा-प्रवाह में यथोचित स्थान दिया है और उनके माध्यम से ठोस तथ्यों पर आधारित सच्चाइयों के साथ-साथ उनसे प्रभावित होने वाली मानसिकताओं को भी पूरी ईमानदारी से दर्शाया है । इस संदर्भ में वे वास्तविक जीवन के चरित्रों (जिनमें भारत के राजनेता तथा राजनीतिक दल सम्मिलित हैं) पर घेरा डालने से कतराए नहीं हैं और निर्भय होकर कथा के पात्रों के माध्यम से उन पर छींटाकशी की है  'आर्टिकल 15' में दलों के चुनाव-चिह्नों का उल्लेख करके उन्हें लक्ष्य बनाया गया है जबकि 'मोहल्ला अस्सी' में तो नेताओं के साफ़-साफ़ नाम लिए गए हैं  'आर्टिकल 15' की कहानी में एक विद्रोही दलित युवक तथा उसकी दलित वर्ग से ही संबंधित प्रेयसी भी है । यह पात्र तथा उसका दल निश्चय ही उत्तर प्रदेश के एक वास्तविक युवा दलित नेता एवं उनके दल से प्रेरित है । इन पात्रों के अतिरिक्त नायक के विभाग के अन्य पुलिसकर्मियों के पात्र, उसके घर में काम करने वाली कम आयु की कन्या का पात्र (जो कि एक पुलिसकर्मी की ही बहिन है), जातिवादी सोच वाले शोषक ठेकेदार का पात्र, शव-परीक्षण (पोस्टमार्टम) करने वाली चिकित्सिका का पात्रनायक की महिला-मित्र का पात्र (जिससे वह फ़ोन पर अपने अनुभव बांटता रहता है और विचार-विमर्श करता रहता है), नायक के बालपन के मित्र का पात्र, अफ़सरशाही वाली सोच रखने वाले सीबीआई के उच्चाधिकारी का पात्र आदि सभी कथा में अपनी पहचान बनाए रखते हैं तथा जितना भी समय (स्क्रीन टाइम) उन्हें मिलता हैदर्शकों के मन पर अपनी (अच्छी या बुरी) छाप छोड़ते हैं 'मोहल्ला अस्सी' में पांडेयजी के साथ-साथ उनकी धर्मपत्नी, उसकी सखी (जो कि एक नाविक की पत्नी है), विभिन्न प्रकार की दलालियां करके धनोपार्जन करने वाला तथाकथित गाइड, विदेशी पर्यटक स्त्री से विवाह करके कालांतर में योगाचार्य बन बैठने वाला नाई, पांडेयजी के मोहल्ले के अन्य ब्राह्मण जो कि अस्सी घाट पर बैठकर यजमानों के माध्यम से जीविकोपार्जन करते हैं, मांसाहार करके असत्य वोलने वाले ब्राह्मण गली के किराएदार युवक, सब्ज़ी की दुकान करने वाला मुसलमान, पर्यटक विदेशी महिलाएं, काशी के भविष्य की व्याख्या करने वाले महात्माजी, संस्कृत विद्यालय के व्यवस्थापक, पांडेयजी की बड़ी हो रही पुत्री और सबसे बढ़कर विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े वे लोग जो 'पप्पू की दुकान' के नाम से जानी जाने वाली एक चाय की दुकान पर चाय सुड़कते हुए हँसी-ठट्ठे के बीच सामाजिक-राजनीतिक बहस करते हैं; सभी कथानक में महत्वपूर्ण हैं । इस प्रकार ये दोनों ही फ़िल्में अपनी-अपनी बात का अधिकांश भाग अपने-अपने पात्रों और उनके संवादों के माध्यम से कहती हैं  दोनों ही फ़िल्मों के संवाद अत्यंत प्रभावशाली हैं और सीधे मर्म पर प्रहार करते हैं 

'आर्टिकल 15' की समीक्षा करते हुए एक समीक्षक महोदय ने फ़िल्मकार से प्रश्न किया है कि क्या होता यदि फ़िल्म का नायक ब्राह्मण न होकर दलित वर्ग (एस सी) से ही संबंधित होता प्रश्न उचित है जिसका उत्तर मेरे पास तो निश्चय ही है । संविधान-प्रदत्त आरक्षण की सुविधा से उच्च राजकीय पदों पर पहुँचने वाले ऐसे दलित वर्ग के अधिकारी विरले ही हैं जिन्होंने अपने वर्ग के निम्नत
 स्तर पर नारकीय जीवन जी रहे लोगों की दशा सुधारने के लिए, उन पर होने वाले अत्याचारों को रोकने तथा उत्पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए अथवा उन्हें मानव-जीवन की मूलभूत सुविधाओं से युक्त सम्मानपूर्ण जीवन जीने में सक्षम बनाने हेतु कुछ सार्थक कार्य किया है । ऐसे अधिकांश महानुभावों ने अपनी ऊर्जा अपने निज-हित की रक्षार्थ जातिगत आरक्षण को चिरस्थायी बनाने तथा उससे अधिकाधिक लाभ उठाने में ही व्यय की है अन्यथा मैला ढोने की घृणित प्रथा इक्कीसवीं सदी तक नहीं चलती रहती  पददलित वर्ग की वास्तविक समस्याओं एवं उन पर हो रहे अत्याचारों को देखने-समझने तथा उन्हें सच्चे अर्थों में न्याय दिलाने की दिशा में कुछ किया है तो उसी सवर्ण वर्ग के सही सोच वाले लोगों ने किया है जिन्हें दलित नेता तथा उन्हीं की बोली बोलने वाले आरक्षणवादी बिना सोचे-समझे गालियां देते रहते हैं  कथा के सवर्ण नायक की ही संवेदना उत्पीड़ितों के लिए जागी अन्यथा जातियों से भी आगे उपजातियों में बंटे हमारे समाज में विशुद्ध मानवीय आधार पर तथ्यों को देखने वाले कहाँ मिलते हैं और कितने मिलते हैं ? इस नग्न सत्य को कथानायक अपने थाने के अधीनस्थों के साथ होने वाली बातचीत में ही देख लेता है  'आर्टिकल 15' की वास्तविक आलोचना इस आधार पर की जा सकती है कि नायक को अंततः विजयी बनाने के लिए लेखकीय तथा सिनेमाई छूटें ली गई हैं जो वास्तविकता में संभव नहीं होतीं (अन्यथा बदायूँ कांड में मारी गई निर्दोष बालिकाओं एवं उनके दुखी परिवारों को भी न्याय मिल गया होता)  मैले से भरे गड्ढे में एक सफ़ाई कर्मचारी का बिना किसी रक्षक-उपकरण (प्रोटेक्टिव गियर) को धारण किए आपादमस्तक उतरने का दृश्य हृदयवेधक तो है किंतु व्यावहारिक नहीं लगता  संभवतः फ़िल्म को अधिक प्रभावशाली बनाने के अतिरिक्त प्रयास में ही दिग्दर्शक अनुभव सिन्हा उसे महानता की देहरी तक ही ले जा सके, उसकी परिधि में प्रवेश नहीं दिला सके 

'मोहल्ला अस्सी' की विभिन्न समीक्षकों ने तीखी आलोचना की है तथा कहा है कि किसी पुस्तक के आधार पर ऐसी फ़िल्म नहीं बननी चाहिए जिसे देखने से पहले (अर्थात् समझने के लिए) उस पुस्तक को पढ़ना आवश्यक हो क्योंकि सिनेमा अपने आप में एक स्वतंत्र माध्यम है । मैं इस तर्क को स्वीकार करता हूँ क्योंकि मैंने स्वयं काशीनाथजी की कृति 'काशी का अस्सीपढ़ी है और फ़िल्म देखने से पहले ही पढ़ी है । इसी कारण मैं समझ सकता हूँ कि पुस्तक को पढ़ने वाले उस पर आधारित इस फ़िल्म को बेहतर समझ सकते हैं और इसका बेहतर आनंद उठा सकते हैं  लेकिन ऐसा भी नहीं है कि जिन्होंने पुस्तक नहीं पढ़ी, उनके लिए यह फ़िल्म बेकार है । फ़िल्म मनोरंजक है और कथावाचक (एवं कथानायक) के दृष्टिकोण से प्रेरक भी । फिर भी यदि इसको देखकर किसी कमी का आभास होता है तो वह इस कारण है कि काशीनाथजी की कृति का विन्यास ही ऐसा है कि उस पर उचित लंबाई की फ़ीचर फ़िल्म ठीक तरह से बनाना कोई सरल कार्य नहीं । उसमें भारत में राजनीतिक तथा सामाजिक विक्षुब्धता एवं अस्थिरता से ओतप्रोत एक दशक के काशी के समाज (विशेषतः ब्राह्मण समाज) पर पड़े प्रभावों का विवरण विभिन्न अध्यायों के माध्यम से किसी रेखाचित्र की मानिंद किया गया है, कथा की मानिंद नहीं । इसीलिए चंद्रप्रकाश द्विवेदी द्वारा उस पर (मुख्यतः उसके एक अध्याय पर) पूरी लंबाई की फ़िल्म बनाने का निर्णय जोखिमपूर्ण ही था । जब पुस्तक की सामग्री ही बिखरी-बिखरी थी तो उस बिखराव का फ़िल्म में भी आ जाना स्वाभाविक ही था चाहे द्विवेदीजी ने फ़िल्म के लिए पटकथा कितनी भी सावधानी से लिखी हो । लेकिन बिखराव के बावजूद फ़िल्म अच्छी बन पड़ी है एवं इसकी कटु आलोचना अंग्रेज़ी के समीक्षकों ने इसलिए की है क्योंकि वे हिंदी फ़िल्में ही देखते हैं, हिंदी पुस्तकें नहीं पढ़ते; इसी कारण वे इसकी गुणवत्ता को ठीक से देख-समझ-पहचान नहीं सके  

'मोहल्ला अस्सी' की आलोचना अपशब्दों के प्रयोग के कारण भी की गई है जिसके कारण इसे महिलाओं के न देखने योग्य पाया गया है । चूंकि चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने पुस्तक की आत्मा को यथावत् रखते हुए ईमानदारी से फ़िल्म बनाई, इसलिए पुस्तक में प्रयुक्त अपशब्द समझे जाने वाले शब्दों को भी उन्होंने संवादों में स्थान दिया । मैं स्वयं फ़िल्मों में (तथा पुस्तकों में भी) अभद्र शब्दों के प्रयोग को वर्जनीय मानता हूँ तथा अनुभव सिन्हा की इस बात के लिए प्रशंसा करता हूँ कि कथानक के परिवेश को देखते हुए (पुलिसिया ज़ुबान वाले) अपशब्दों की गुंजाइश होने के बावजूद उन्होंने 'आर्टिकल 15' के संवादों को अपशब्दों से मुक्त रखा लेकिन द्विवेदीजी चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकते थे क्योंकि यदि वे ऐसा करते तो फ़िल्म में पुस्तक की सामग्री ही रहती, उसकी आत्मा नहीं  यहाँ मैं यह भी स्पष्ट कर देता हूँ कि फ़िल्म में माताओं-बहिनों को अपमानित करने वाले सर्वथा त्याज्य अपशब्द नहीं हैं बल्कि वे अपशब्द हैं जो काशी की लोकभाषा में अंग्रेज़ी भाषा के व्याकरण में अंतर्निहित सहायक क्रियाओं की भाँति उपयोग में लाए जाते हैं एवं जो जितना अधिक आत्मीय होता है, उस 
 उतनी ही अधिक आवृत्ति में ये अपशब्द न्यौछावर किए जाते हैं  पुस्तक की ही भाँति फ़िल्म में भी दो ही अपशब्दों का प्रयोग किया गया है जिनमें से बात-बात पर और लगभग प्रत्येक वाक्य में लगाया जाने वाला (स्त्रियों द्वारा भी) अपशब्द तो एक ही है । शालीन दर्शक वर्ग यदि इस तथ्य को परिवेश की प्रामाणिकता के लिए आवश्यक मानकर सह ले तो यह फ़िल्म निश्चय ही उसे भी प्रशंसनीय ही लगेगी । जिन लोगों को भारतीय राजनीति तथा तत्कालीन (१९८८ से १९९८ की अवधि वाले) कालखंड में हुए सामाजिक-राजनीतिक उच्चावचनों तथा उनके जनमानस पर प्रभाव में रुचि है, उन्हें तो यह फ़िल्म पसंद न आने का कोई कारण ही नहीं है । सम्भवतः इन अपशब्दों के कारण ही इस फ़िल्म को विवेक से कोरे भारतीय फ़िल्म सेंसर बोर्ड ने वर्षों तक अटकाए रखा और इसमें अनावश्यक काट-छांट भी की जिसने फ़िल्म के प्रभाव को भी घटाया और इसके व्यावसायिक रूप से सफल होने की संभावना को तो ग्रहण ही लगा दिया 

इन दोनों ही फ़िल्मों में कला-निर्देशकों तथा छायाकारों ने अत्यंत प्रशंसनीय कार्य किया है और कथानकों के परिवेश को हू-ब-हू चित्रपट पर उतार दिया है । दोनों में ही गीत-संगीत की अधिक गुंजाइश नहीं थी लेकिन संगीत-निर्देशकों ने अच्छा संगीत दिया है 'आर्टिकल 15' का सबसे असरदार नग़मा इसके आरंभ में ही आने वाला लोकगीतनुमा गाना 'कहब को लग जाई धक से' है जिसके बोलों से फ़िल्म की रूह झाँकती है और जिसे फ़िल्म मेंं एक अहम किरदार निभाने वाली सयानी गुप्ता ने ही गाया है  लेकिन अनुभव सिन्हा (और फ़िल्म के संपादक) अगर केवल यह एक ही गाना फ़िल्म में रखते तो बेहतर होता  दोनों ही फ़िल्मों में पार्श्व संगीत भी अच्छा है और अभिनय पक्ष तो अत्यंत सराहनीय है । कुछ समय पूर्व तक इक्कीसवीं सदी के अमोल पालेकर कहे जा रहे आयुष्मान खुराना के अभिनय की सीमाएं लगातार फैलती जा रही हैं और 'आर्टिकल 15' में वे सचमुच के नायक बनकर उभरे हैं जो कहीं से भी फ़िल्मी नहीं लगता । छोटी-सी भूमिका में मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब भी दिल को छू जाते हैं । और बाकी कलाकारों के लिए इतना ही कहना पर्याप्त है कि उनमें मानो होड़ लगी थी कि कौन सबसे अच्छा अभिनय करता है   'मोहल्ला अस्सी' में सर्वश्रेष्ठ अभिनय निश्चय ही पांडेयजी की धर्मपत्नी सावित्री के रूप में साक्षी तंवर ने किया है । उनके बाद सबसे प्रभावशाली एक चतुर गाइड और दलाल के रूप में रवि किशन रहे हैं । सहायक भूमिकाओं में अन्य सभी कलाकारों ने कम समय मिलने पर भी कमाल कर दिखाया है और दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया है । सन्नी देओल को समीक्षकों ने विद्वान और कट्टर धार्मिक पंडित धर्मनाथ पांडेय की भूमिका के लिए अनुपयुक्त (मिस्कास्ट) बताया है लेकिन जहाँ तक मेरी राय है, वे केवल अपशब्दों का उच्चारण करते हुए ही अस्वाभाविक लगते हैं और ऐसा आभास होता है जैसे वे मन  मारकर विवशता में उन्हें अपने मुख से निकाल रहे हों । लेकिन इसके अतिरिक्त वे अपनी भूमिका में उपयुक्त ही लगते हैं और फ़िल्म के पहले भाग में पांडेयजी की अतिरेकपूर्ण धार्मिकता (या धर्मांधता) को तथा दूसरे भाग में उनकी निर्धनता-जनित विवशता और उससे उपजी आंतरिक पीड़ा को उन्होंने अत्यंत स्वाभाविकता से प्रदर्शित किया है 

दोनों ही फ़िल्में हिंदू चतुर्वर्णीय व्यवस्था में भी प्रत्येक वर्ण (या जाति) में विद्यमान ऊँचे-नीचे के विभाजन को सामने रखती हैं  'आर्टिकल 15' में जहाँ नायक को उसका सहायक बताता है कि उसकी सरयूपारीण जाति ब्राह्मण वर्ग में कान्यकुब्ज जाति से नीचे ही है, वहीं 'मोहल्ला अस्सी' में पांडेयजी को चतुर दलाल कन्नी उनके मुँह पर ही कह देता है कि उसका शांडिल्य गोत्र पांडेयजी के गोत्र से ऊँचा है (अतः वे धर्म के मामले को लेकर उससे बहस न करें)  और सौ बातों की एक बात - दोनों ही फ़िल्में अंत में अपने-अपने नायकों के हश्र द्वारा यह पत्थर जैसी चोट करने वाली हक़ीक़त दर्शकों के सामने रख देती हैं कि घाटे में वही रहेगा और तक़लीफ़ वही उठाएगा जो अपने अंतर की सुनेगा, अपने और अपने आदर्शों-सिद्धांतों के प्रति ईमानदार रहेगा । उसी के मन में तो पीड़ा उठेगी जिसकी अंतरात्मा अस्तित्व में होगी । जो अपनी अंतरात्मा को पहले ही गहरी नींद सुला चुके हों, उन्हें निजी भौतिक लाभ हेतु कुछ भी कर गुज़रने में कैसी हिचक होगी और कहाँ दर्द  होगा फिर भी हम चाहें तो 'आर्टिकल 15' में  विद्रोही  दलित नेता द्वारा  हत्यारों के हाथों प्राण गंवाने से पहले कही गई  इस अंतिम बात को स्मरण करके  भविष्य के प्रति आशान्वित हो सकते हैं - 'हम आख़िरी थोड़े ही न थे

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